Shri Dadaji Chalisa Lyrics: दादाजी चालीसा पाठ

दादाजी चालीसा का जाप प्रतिदिन लाखों भक्तों के द्वारा किया जाता है| दादाजी हिन्दू धर्म के दाधिच समाज में पूजे जाने वाले बहुत ही प्रसिद्ध देवता है| माना जाता है कि दादाजी हनुमान जी के बहुत ही बड़े भक्त थे| दादाजी का जन्म राजस्थान के चुरू जिले में दाधिच ब्राह्मण श्री हरजीराम जी के घर में हुआ था| इनका नाम अखाराम जी था|

कहा जाता था कि इनके चिमटे के स्पर्श करने तथा इनकी धुनी की भभूती मिलाने से जो कलवानी तैयार होती है| उसे अमृत के समान माना जाता है| इस दादाजी चालीसा का जाप करने दादाजी अखाराम जी अपने भक्तों से बहुत प्रसन्न होते है तो आइये पढ़ते है दादाजी अखाराम जी यह पवित्र चालीसा |

दादाजी चालीसा

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Dadaji Chalisa Lyrics In Hindi | दादाजी अखाराम जी चालीसा

|| दादाजी चालीसा ||

|| दोहा ||

अक्षय तेरा कोष है, अक्षय तेरा नाम।
अक्षय पलकें खोल दे, अक्षय दे वरदान।

|| चौपाई ||

जय अक्षय हरजी सुत देवा। शीश नवायें, करते सेवा।।
जय मारुति सेवक सुखदायक। जय जय जय अंजनि सुत पायक।।
जय जय संत शिरोमणि दाता। जय जीवू बाई के भ्राता।।
जय हरजी सुत कीरति पावन। त्रिभुवन यश सब शोक नसावन।।
जय हनुमत चरणों के दासा। पूर्ण करो सब मन की आशा।।
जय तुम कींकर महावीर का। सरजीवन है किया नीर का।।
जय तुम पौत्रवंश सुखदायक। महावीर सेवक कुलनायक।।
संवत पन्द्रह सौ पचास में। भादव बदी पंचमी प्रात: में ।।
परसाणें से नाम ग्राम में । जन्मे प्रभुजी धरा धाम में।।
कृष्ण पक्ष शुभ घड़ी लग्न में। लियो जन्म हरजी आंगन में ।।
नाम दिया पिता ने अक्षा। सुमिरन से करते हो रक्षा।।
सरल नाम तव अखाराम है। करते सुमिरन सुबह शाम है।।
दिव्य ललाट केशर का टीका । कटी पीताम्बर सोहे निका।।
हाथ छड़ी गल माला सोहे। पंचरंग पाग भक्त मन मोहे।।
सुन्दर राजे गले जनेऊ। रेशम जामा, पगां खड़ाऊँ ।।
छड़ी चिमटा है विष हर्ता। दुखित जनों के पालन कर्ता ।।
तांती और भभूति नीकी। दलन रोग भव मुरि अमीसी ।।
डेरी माँई गऊ चराई। घूणी पर नभ वाणी सुनाई ।।
तपबल से कपि दर्शन पाया। मूरत ले परसाणे आया ।।
भानु दिशा मुख बजरंग कीन्हा। ध्रुव दिश देवल तुमको दीन्हा ।।
सन्मुख पीपल है बजरंग के। हरे खेजड़ी अवगुण चित्त के ।।
बेरी तरु की महिमा भारी। कफ दोषन को टारनहारी ।।
पोल एक पुरब मुख सोहे। मंदिर छवि भक्तन मन मोहे ।।
अमृत कुण्ड और धर्मशाल है। शुभ सुन्दर मन्दिर विशाल है ।।
पूनम, मंगल, शनिवार है। मंदिर दर्शन की बहार है ।।
रात्रि जागरण भजन सुनावै। जो सेवक मांगे सो ही पावै ।।
पौत्र, प्रपौत्र, बहू सब आते। कर दर्शन सब मंगल गाते ।।
श्री फल लड्डू भोग चढ़वे। मनवाँछित फल सो नर पावै ।।
द्वार पितामह के जो आवे । बिन मांगे सब कुछ पा जावे ।।
कृष्ण पक्ष पंचमी का मेला। कोई युगल भक्त अकेला।।
दादा तेरा अमर नाम है। प्रतिपल मुख पर राम राम है ।।
हुकमचंद सुत रामबगस के। विषधर गया पैर में डसके ।।
रोम रोम विष मूँजा फूटा। व्याकुल भए, धीरज मन छूटा ।।
जब कलवाणी दी तत्काला। जैसे तेल दिये बीच डाला ।।
ऐसे काज अनेकों सारे। ते मम ते नहीं जाये उचारे ।।
बैंडवा में भी आज बिराजे। अगणी गुमटी छापर राजे ।।
प्रात: सांय सिगड़ी के दर्शन। तापर लक्ष्मी होती परसन ।।
कर दे दादा वरद हस्त अब। अभय दान दीजे अक्षय तब ।।
कीड़ कांट प्रभु रक्षा करते । भूत-प्रेत भय व्याधा हरते ।।
देश विदेश जहाँ जो ध्यावे । चम्पा सुखद परम पद पावे ।।

|| दोहा ||

तुम हो दया निधान प्रभु, मैं मूरख अज्ञान।
भूल चूक सब क्षमा करो, पौत्र वंश तव जान।।

दादाजी चालीसा

Dadaji Chalisa Lyrics In English | जय अक्षय हरजी सुत देवा

|| Dadaji Chalisa ||

|| Doha ||

Akshay tera kosh hai, Akshay tera naam.
Akshay palkein khol de, Akshay de varadan

|| Chaupai ||

Jay Akshay Harji Sut Deva | Sheesh Navaye, Karte Seva.
Jai Maruti Sevak Sukhdaayak | Jai Jai Jai Anjani Sut Paayak.
Jay Jai Sant Shiromani Data | Jai Jeevoo Baare Ke Bhrata.
Jai Harji Sut Keerti Pavan | Tribhuvan Yash Sab Shok Nasaavan.
Jay Hanumat Charanon Ke Daasa | Purn Karo Sab Man Ki Aasha.
Jai Tum Kinkar Mahaveer Ka | Sarjeevan Hai Kiya Neer Ka.
Jay Tum Pautravansh Sukhdaayak | Mahaveer Sevak Kulnaayak.
Sanvat Pandrah Sau Pachaas Mein | Bhadav Badi Panchami Praatah Mein.
Parasaane Se Naam Gram Mein | Janme Prabhuji Dhara Dhaam Mein.
Krishna Paksh Shubh Ghadi Lagn Mein | Liyo Janm Harji Aangan Mein.
Naam Diya Pita Ne Aksha | Smiran Se Karte Ho Raksha.
Saral Naam Tav Akharam Hai | Karte Smiran Subah Shaam Hai.
Divya Lalaat Keshar Ka Teeka | Kati Peetambar Sohe Nika.
Haath Chhadi Gale Maala Sohe | Panchrang Paag Bhakt Man Mohe.
Sundar Raaje Gale Janeu | Resham Jama, Pagaan Khadaaun.
Chhadi Chimta Hai Vish Harta | Dukhit Janon Ke Palan Karta.
Taanti Aur Bhavuti Neeki | Dalan Rog Bhav Muri Ameesi.
Deri Maai Gau Charaai | Ghooni Par Nabhi Vaani Sunaai.
Tapbal Se Kapi Darshan Paaya | Moorti Le Parasane Aaya.
Bhanu Disha Mukh Bajrang Keenha | Dhruv Disha Deval Tumko Deenha.
Sanmukh Peepal Hai Bajrang Ke | Hare Khejadi Avgun Chitt Ke.
Beri Taru Ki Mahima Bhari | Kaph Doshan Ko Taaranhaari.
Pol Ek Purab Mukh Sohe | Mandir Chhavi Bhakton Man Mohe.
Amrit Kund Aur Dharmashal Hai | Shubh Sundar Mandir Vishal Hai.
Poonam, Mangal, Shanivaar Hai | Mandir Darshan Ki Bahaar Hai.
Ratri Jaagran Bhajan Sunaave | Jo Sevak Maange Soi Paave.
Pautr, Prapautr, Bahu Sab Aate | Kar Darshan Sab Mangal Gaate.
Shri Phal Laddu Bhog Chadhave | Manvaanchhit Phal So Nar Paave.
Dwaar Pitamah Ke Jo Aave | Bin Maange Sab Kuch Pa Jaave.
Krishna Paksh Panchami Ka Mela | Koi Yugala Bhakt Akela.
Dada Tera Amar Naam Hai | Pratipal Mukh Par Raam Raam Hai.
Hukamchand Sut Raambaksh Ke | Vishadhar Gaya Pair Mein Daskhe.
Rom Rom Vish Munja Phoota | Vyaakul Bhaaye, Dheeraj Man Chhoota.
Jab Kalvaani Di Tatkaala | Jaise Tel Diye Beech Daala.
Aise Kaaj Aneko Saare | Te Mam Te Nahi Jaaye Uchaare.
Bandwa Mein Bhi Aaj Biraaje | Agni Gumti Chaapar Raaje.
Pratah Saanjh Sigdi Ke Darshan | Taapar Lakshmi Hoti Parasan.
Kar De Dada Varad Hast Ab | Abhay Daan Deeje Akshay Tab.
Keed Kaant Prabhu Raksha Karte | Bhoot-pret Bhay Vyadha Harate.
Desh Videsh Jahan Jo Dhyaave | Champa Sukhad Param Pad Paave.

|| Doha ||

Tum ho daya nidhan Prabhu, main moorkh agyaan.
Bhool chook sab kshama karo, pautra vansh tav jaan.

Chitragupta Chalisa Lyrics: चित्रगुप्त चालीसा हिंदी लिरिक्स

भगवान चित्रगुप्त को प्रसन्न करने के चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) एक बहुत अच्छा मार्ग माना जाता है| इस चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) का जाप करने से भक्तों पर भगवान चित्रगुप्त की कृपा हमेशा बनी रहती है| भगवान चित्रगुप्त यम लोक में निवास करते है| भगवान चित्रगुप्त का कार्य पापों तथा पुण्य का आंकलन करना है|

भगवान चित्रगुप्त की पूजा करने से तथा चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) का पाठ करने से भक्तों को उनके कारोबार में उन्नति प्राप्त होती है| आइये जानते है चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) के लिरिक्स के बारे में|

 चित्रगुप्त चालीसा

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे शिव तांडव स्तोत्रम [Shiv Tandav Stotram], सरस्वती आरती [Saraswati Aarti], या कनकधारा स्तोत्र [Kanakdhara Stotra] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

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चित्रगुप्त चालीसा हिंदी में | Chitragupta Chalisa Lyrics in Hindi

|| दोहा ||

सुमिर चित्रगुप्त ईश को, सतत नवाऊ शीश।
ब्रह्मा विष्णु महेश सह, रिनिहा भए जगदीश॥
करो कृपा करिवर वदन, जो सरशुती सहाय।
चित्रगुप्त जस विमलयश, वंदन गुरूपद लाय॥

|| चौपाई ||

जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर।
जय यमेश दिगंत उजागर॥

अज सहाय अवतरेउ गुसांई।
कीन्हेउ काज ब्रम्ह कीनाई॥

श्रृष्टि सृजनहित अजमन जांचा।
भांति-भांति के जीवन राचा॥

अज की रचना मानव संदर।
मानव मति अज होइ निरूत्तर॥ 4 ॥

भए प्रकट चित्रगुप्त सहाई।
धर्माधर्म गुण ज्ञान कराई॥

राचेउ धरम धरम जग मांही।
धर्म अवतार लेत तुम पांही॥

अहम विवेकइ तुमहि विधाता।
निज सत्ता पा करहिं कुघाता॥

श्रष्टि संतुलन के तुम स्वामी।
त्रय देवन कर शक्ति समानी॥ 8 ॥

पाप मृत्यु जग में तुम लाए।
भयका भूत सकल जग छाए॥

महाकाल के तुम हो साक्षी।
ब्रम्हउ मरन न जान मीनाक्षी॥

धर्म कृष्ण तुम जग उपजायो।
कर्म क्षेत्र गुण ज्ञान करायो॥

राम धर्म हित जग पगु धारे।
मानवगुण सदगुण अति प्यारे॥ 12 ॥

विष्णु चक्र पर तुमहि विराजें।
पालन धर्म करम शुचि साजे॥

महादेव के तुम त्रय लोचन।
प्रेरकशिव अस ताण्डव नर्तन॥

सावित्री पर कृपा निराली।
विद्यानिधि माँ सब जग आली॥

रमा भाल पर कर अति दाया।
श्रीनिधि अगम अकूत अगाया॥ 20 ॥

ऊमा विच शक्ति शुचि राच्यो।
जाकेबिन शिव शव जग बाच्यो॥

गुरू बृहस्पति सुर पति नाथा।
जाके कर्म गहइ तव हाथा॥

रावण कंस सकल मतवारे।
तव प्रताप सब सरग सिधारे॥

प्रथम् पूज्य गणपति महदेवा।
सोउ करत तुम्हारी सेवा॥ 24 ॥

रिद्धि सिद्धि पाय द्वैनारी।
विघ्न हरण शुभ काज संवारी॥

व्यास चहइ रच वेद पुराना।
गणपति लिपिबध हितमन ठाना॥

पोथी मसि शुचि लेखनी दीन्हा।
असवर देय जगत कृत कीन्हा॥

लेखनि मसि सह कागद कोरा।
तव प्रताप अजु जगत मझोरा॥ 28 ॥

विद्या विनय पराक्रम भारी।
तुम आधार जगत आभारी॥

द्वादस पूत जगत अस लाए।
राशी चक्र आधार सुहाए॥

जस पूता तस राशि रचाना।
ज्योतिष केतुम जनक महाना॥

तिथी लगन होरा दिग्दर्शन।
चारि अष्ट चित्रांश सुदर्शन॥ 32 ॥

राशी नखत जो जातक धारे।
धरम करम फल तुमहि अधारे॥

राम कृष्ण गुरूवर गृह जाई।
प्रथम गुरू महिमा गुण गाई॥

श्री गणेश तव बंदन कीना।
कर्म अकर्म तुमहि आधीना॥

देववृत जप तप वृत कीन्हा।
इच्छा मृत्यु परम वर दीन्हा॥ 36 ॥

धर्महीन सौदास कुराजा।
तप तुम्हार बैकुण्ठ विराजा॥

हरि पद दीन्ह धर्म हरि नामा।
कायथ परिजन परम पितामा॥

शुर शुयशमा बन जामाता।
क्षत्रिय विप्र सकल आदाता॥

जय जय चित्रगुप्त गुसांई।
गुरूवर गुरू पद पाय सहाई॥ 40 ॥

जो शत पाठ करइ चालीसा।
जन्ममरण दुःख कटइ कलेसा॥

विनय करैं कुलदीप शुवेशा।
राख पिता सम नेह हमेशा॥

॥ दोहा ॥

ज्ञान कलम, मसि सरस्वती, अंबर है मसिपात्र।
कालचक्र की पुस्तिका, सदा रखे दंडास्त्र॥
पाप पुन्य लेखा करन, धार्यो चित्र स्वरूप।
श्रृष्टिसंतुलन स्वामीसदा, सरग नरक कर भूप॥

॥ इति श्री चित्रगुप्त चालीसा समाप्त॥

 चित्रगुप्त चालीसा

Chitrgupta Chalisa Lyrics in English | जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर

|| Doha ||

Sumir Chitragupta Ish ko, satat navaau sheesh.
Brahma Vishnu Mahesh sah, riniha bhae Jagadish.
Karo kripa karivar vadn, jo Saraswati sahay.
Chitragupt jas vimalyash, vandan gurupad laay.

|| Chaupai ||

Jai Chitragupt gyaan ratnakaar.
Jai Yamesh digant ujaagar.

Aj sahay avataru gusaanee.
Keenuh kaaj Bramh keenaa.

Shristi srijanahit ajman jaancha.
Bhanti-bhanti ke jeevan raacha.

Aj ki rachna maanav sandar.
Maanav mati aj hoi niruttar.

Bhae prakat Chitragupt sahaayee.
Dharmaadharma gun gyaan karaayee.

Raacheu dharam dharam jag maanhee.
Dharam avataar let tum paanhee.

Aham vivekai tumahi vidhaata.
Nij satta paa karahin kughaata.

Shristi santulan ke tum swaami.
Tray devan kar shakti samaanee.

Paap mrityu jag mein tum laaye.
Bhayaka bhoot sakal jag chhaaye.

Mahaakaal ke tum ho saakshi.
Bramhau marn na jaan meenaakshi.

Dharm Krishna tum jag upajaayo.
Karma kshetra gun gyaan karaayo.

Raam dharam hit jag pagu dhaare.
Maanavgun sadgun ati pyaare.

Vishnu chakra par tumahi viraajein.
Paalan dharam karam shuchi saaje.

Mahaadev ke tum tray lochan.
Prerakshiv as Tandav Nartan.

Savitri par kripa niraalee.
Vidyaanidhi maa sab jag aalee.

Rama bhaal par kar ati daaya.
Shreenidhi agam akoot agaaya.

Ooma vich shakti shuchi raachyo.
Jaake bin Shiv shav jag baachyo.

Guru Brihaspati sur pati naathaa.
Jaake karm gahai tav haathaa.

Raavan kans sakal matvaare.
Tav prataap sab sarg siddhaare.

Pratham poojya Ganpati Mahadeva.
Sou karat tumhaari sevaa.

Riddhi siddhi paay dwainaaaree.
Vighn haran shubh kaaj samvaaree.

Vyaas chahi rach ved puraana.
Ganpati lipibadh hitman thaan.

Pothee masi shuchi lekhani deenhaa.
Asavar dey jagat krit keenhaa.

Lekhani masi sah kaagad kora.
Tav prataap aju jagat majhora.

Vidya vinay paraakram bhaaree.
Tum aadhaar jagat aabhaaree.

Dvaadas poot jagat as laaye.
Raashi chakra aadhaar suhaaye.

Jas poota tas raashi rachanaa.
Jyotish ketum janak mahaanaa.

Tithi lagan hora digdarshan.
Chaari asht chitraansh sudarshan.

Raashi nakhat jo jaatak dhaare.
Dharam karam phal tumahi adhaare.

Ram Krishna Guruvrar grih jaaee.
Pratham guruji mahimaa gun gaayee.

Shree Ganesh tav bandan keenaa.
Karm akarm tumahi aadheena.

Devvrit jap tap vrit keenhaa.
Ichha mrityu param var deenhaa.

Dharmahiin saudaas kuraajaa.
Tap tumhaara baikunth viraajaa.

Hari pad deenha dharam Hari naamaa.
Kaayath parijan param pitaamaa.

Shur shuyashma ban jaamaataa.
Kshatriya vipra sakal aadaataa.

Jai jai Chitragupt gusaanee.
Guruvar guru pad paay sahaaee.

Jo shat paath karai chalisa.
Janmamarn dukh katai kalesa.

Vinay karain kuldeep shweshaa.
Raakh pita sam neha hameshaa.

|| Doha ||

Gyaan kalam, masi Saraswati, ambar hai masipaatra.
Kaalachakr ki pustika, sada rakhe dandastra.
Paap punya lekha karan, dhaaryo Chitr swaroop.
Shristi santulan swami sada, sarg narak kar bhup.

|| Iti Shri Chitragupt Chalisa samaapt ||

Parvati Chalisa in Hindi: पार्वती चालीसा पाठ

पार्वती चालीसा (Parvati Chalisa) का पाठ माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| नवरात्रि के पांचवे दिन माता पार्वती के निमित्त उपवास तथा उनकी पूजा भी की जाती है| पौराणिक ग्रंथों में माता पार्वती को स्कंदमाता के नाम से भी जाना जाता है| इस दिन माता पार्वती की पूजा के साथ-साथ माँ पार्वती चालीसा (Parvati Chalisa) का जाप करने से भक्तों को शुभ फल की प्राप्ति होती है|

माना जाता है कि जो भी व्यक्ति नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा तथा पार्वती चालीसा (Parvati Chalisa) का पाठ करता है, उस व्यक्ति पर माता पार्वती के साथ भगवान शिव की भी अपार कृपा बरसती है| भगवान शिव तथा माता पार्वती की कृपा से जातक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है तथा उसके घर में सुख समृद्धि प्राप्त होती है|

पार्वती चालीसा

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माँ पार्वती चालीसा पाठ हिंदी में | Parvati Chalisa Lyrics in Hindi

|| पार्वती चालीसा ||

|| दोहा ||

जय गिरी तनये दक्षजे
शम्भू प्रिये गुणखानि ।
गणपति जननी पार्वती
अम्बे! शक्ति! भवानि ॥

|| चालीसा ||

ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे ।
पंच बदन नित तुमको ध्यावे ॥

षड्मुख कहि न सकत यश तेरो ।
सहसबदन श्रम करत घनेरो ॥

तेऊ पार न पावत माता ।
स्थित रक्षा लय हिय सजाता ॥

अधर प्रवाल सदृश अरुणारे ।
अति कमनीय नयन कजरारे ॥

ललित ललाट विलेपित केशर ।
कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर ॥

कनक बसन कंचुकि सजाए ।
कटी मेखला दिव्य लहराए ॥

कंठ मदार हार की शोभा ।
जाहि देखि सहजहि मन लोभा ॥

बालारुण अनंत छबि धारी ।
आभूषण की शोभा प्यारी ॥

नाना रत्न जड़ित सिंहासन ।
तापर राजति हरि चतुरानन ॥

इन्द्रादिक परिवार पूजित ।
जग मृग नाग यक्ष रव कूजित ॥
गिर कैलास निवासिनी जय जय ।
कोटिक प्रभा विकासिनी जय जय ॥

त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी ।
अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी ॥

हैं महेश प्राणेश तुम्हारे ।
त्रिभुवन के जो नित रखवारे ॥

उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब ।
सुकृत पुरातन उदित भए तब ॥

बूढ़ा बैल सवारी जिनकी ।
महिमा का गावे कोउ तिनकी ॥

सदा श्मशान बिहारी शंकर ।
आभूषण हैं भुजंग भयंकर ॥

कण्ठ हलाहल को छबि छायी ।
नीलकण्ठ की पदवी पायी ॥

देव मगन के हित अस किन्हो ।
विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो ॥

ताकी तुम पत्नी छवि धारिणी ।
दुरित विदारिणी मंगल कारिणी ॥

देखि परम सौंदर्य तिहारो ।
त्रिभुवन चकित बनावन हारो ॥

भय भीता सो माता गंगा ।
लज्जा मय है सलिल तरंगा ॥

सौत समान शम्भू पहआयी ।
विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी ॥

तेहि कों कमल बदन मुरझायो ।
लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो ॥

नित्यानंद करी बरदायिनी ।
अभय भक्त कर नित अनपायिनी ॥

अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी ।
माहेश्वरी हिमालय नन्दिनी ॥

काशी पुरी सदा मन भायी ।
सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी ॥

भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री ।
कृपा प्रमोद सनेह विधात्री ॥

रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे ।
वाचा सिद्ध करि अवलम्बे ॥

गौरी उमा शंकरी काली ।
अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली ॥

सब जन की ईश्वरी भगवती ।
पतिप्राणा परमेश्वरी सती ॥

तुमने कठिन तपस्या कीनी ।
नारद सों जब शिक्षा लीनी ॥

अन्न न नीर न वायु अहारा ।
अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा ॥

पत्र घास को खाद्य न भायउ ।
उमा नाम तब तुमने पायउ ॥

तप बिलोकी ऋषि सात पधारे ।
लगे डिगावन डिगी न हारे ॥

तब तब जय जय जय उच्चारेउ ।
सप्तऋषि निज गेह सिद्धारेउ ॥

सुर विधि विष्णु पास तब आए ।
वर देने के वचन सुनाए ॥

मांगे उमा वर पति तुम तिनसों ।
चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों ॥

एवमस्तु कही ते दोऊ गए ।
सुफल मनोरथ तुमने लए ॥

करि विवाह शिव सों भामा ।
पुनः कहाई हर की बामा ॥

जो पढ़िहै जन यह चालीसा ।
धन जन सुख देइहै तेहि ईसा ॥

|| दोहा ||

कूटि चंद्रिका सुभग शिर,
जयति जयति सुख खा‍नि
पार्वती निज भक्त हित,
रहहु सदा वरदानि ।

॥ इति श्री पार्वती चालीसा ॥

पार्वती चालीसा

Parvati Chalisa Lyrics in English | ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे

|| Parvati Chalisa ||

|| Doha ||

Jai giri tanaye dakshaje,
Shambhu priye gunakhaani.
Ganpati janani Parvati,
Ambe! Shakti! Bhavani.

|| Chalisa ||

Brahma bhed na tumharo paave,
Panch badan nit tumko dhyaave.

Shadmukh kahi na sakat yash tero,
Sahasbadan shram karat ghanero.

Teeru paar na paavat maata,
Sthit raksha lay hiya sajaata.

Adhar praval sadrish arunaare,
Ati kamniya nayan kajraare.

Lalit Lalat vilepit Keshar,
Kumkum Akshat shobha manahar.

Kanak basan kanchuki sajaaye,
Kati mekhla divya lahraaye.

Kanth madaar haar ki shobha,
Jaahi dekhi sahajahi man lobha.

Baalarun anant chhabi dhaari,
Aabhooshan ki shobha pyaari.

Nana ratna jadit sinhaasan,
Taapar rajati hari chaturanan.

Indraadik parivaar poojit,
Jag mrig naag yaksh rav koojit.

Gir Kailaas nivaasini jai jai,
Kotik prabha vikaasini jai jai.

Tribhuvan sakal kutumb tihaari,
Anu anu maham tumhaari ujiyaari.

Hain Mahesh praanesh tumhaare,
Tribhuvan ke jo nit rakhwaare.

Unaso pati tum praapt keenh jab,
Sukrit puratan udit bhae tab.

Boodha bail sawaari jinki,
Mahima ka gaave kou tinki.

Sadaa shmashaan bihaari Shankar,
Aabhooshan hain bhujang bhayankar.

Kanth Halaahal ko Chhavi Chhaayi,
Neelkanth ki padvi paayi.

Dev magn ke hit as kinho,
Vish lai aapu tinhi ami dinho.

Taaki tum patni chhavi dhaarin,
Durit vidaarin mangal kaarin.

Dekhi param saundarya tihaaro,
Tribhuvan chakit banaavan haaro.

Bhay bhita so maata Ganga,
Lajja may hai salil taranga.

Saut saman Shambhu pahaayi,
Vishnu padaabj chhodi so dhaayi.

Tehein komal badan murjhaayo,
Lakhi Satwar Shiv sheesh Chadhayo.

Nityanand kari bardaayini,
Abhay bhakt kar nit anapaayini.

Akhil paap trayatap nikandini,
Maaheshwari Himalay nandini.

Kaashi puri sadaa man bhaayi,
Siddh peeth tehi aap banaayi.

Bhagwati pratidin bhiksha daatri,
Kripa pramod sneh vidhaatri.

Ripukshay kaarini jai jai Ambe,
Vaacha siddh kari avalambe.

Gauri Uma Shankari Kaali,
Annapurna jag pratipali.

Sab Jan ki Ishwari Bhagwati,
Patiprana Parmeshwari Sati.

Tumne kathin tapasya kini,
Narad so jabb shiksha leeni.

Ann na neer na vaayu ahaara,
Asthi maatrat tan bhayau tumhaara.

Patra ghaas ko khadya na bhayau,
Uma naam tab tumne paayau.

Tap biloki rishi saath padhaare,
Lage digavaan digi na haare.

Tab tab jai jai jai ucharaayo,
Saptarishi nij geh siddhaaraayo.

Sur vidhi Vishnu paas tab aaye,
Var dene ke vachan sunaaye.

Maange Uma var pati tum tinaso,
Chaahat jag tribhuvan nidhi jinaso.

Evamastu kahi te doo gaye,
Sufal Manorath Tumne laaye.

Kari vivaah Shiv so bhaama,
Punah kahai Hari ki baama.

Jo padh hai jan yah chaalisa,
Dhan jan sukh deihai tehi eesa.

|| Doha ||

Kooti chandrika subhag shir,
Jayati jayati sukh khaani.
Parvati nij bhakt hit,
Rahahu sadaa vardani.

|| Iti Shri Parvati Chalisa ||

Surya Dev Chalisa Lyrics: सूर्य चालीसा पाठ

सूर्य चालीसा (Surya Chalisa) का जाप भगवान सूर्य देव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| प्रतिदिन भगवान सूर्य देव की पूजा, अर्घ्य देने तथा सूर्य चालीसा (Surya Chalisa) का जाप करने का एक ख़ास महत्व बताया गया है| प्रत्येक रविवार के दिन सूर्य देव की पूजा करने तथा सूर्य चालीसा (Surya Chalisa) का पाठ करने से भगवान सूर्य देव प्रसन्न होते है| रविवार का दिन सूर्य देव को समर्पित किया जाता है| सूर्य देव प्रत्यक्ष देव माने जाते है| पौराणिक शास्त्रों में बताया गया है कि जो भी भगवान सूर्य देव की पूजा तथा सूर्य चालीसा (Surya Chalisa) का पाठ करता है| उसे भगवान सूर्य की कृपा से मान-सम्मान की प्राप्ति होती है|

सूर्य चालीसा

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सूर्य देव चालीसा का पाठ | Surya Chalisa Lyrics in Hindi

|| सूर्य चालीसा ||

॥ दोहा ॥

कनक बदन कुण्डल मकर, मुक्ता माला अङ्ग,
पद्मासन स्थित ध्याइए, शंख चक्र के सङ्ग॥

॥ चौपाई ॥

जय सविता जय जयति दिवाकर,
सहस्त्रांशु सप्ताश्व तिमिरहर॥

भानु पतंग मरीची भास्कर,
सविता हंस सुनूर विभाकर॥

विवस्वान आदित्य विकर्तन,
मार्तण्ड हरिरूप विरोचन॥

अम्बरमणि खग रवि कहलाते,
वेद हिरण्यगर्भ कह गाते॥

सहस्त्रांशु प्रद्योतन, कहिकहि,
मुनिगन होत प्रसन्न मोदलहि॥

अरुण सदृश सारथी मनोहर,
हांकत हय साता चढ़ि रथ पर॥

मंडल की महिमा अति न्यारी,
तेज रूप केरी बलिहारी॥

उच्चैःश्रवा सदृश हय जोते,
देखि पुरन्दर लज्जित होते॥

मित्र मरीचि, भानु, अरुण, भास्कर,
सविता सूर्य अर्क खग कलिकर॥

पूषा रवि आदित्य नाम लै,
हिरण्यगर्भाय नमः कहिकै॥

द्वादस नाम प्रेम सों गावैं,
मस्तक बारह बार नवावैं॥

चार पदारथ जन सो पावै,
दुःख दारिद्र अघ पुंज नसावै॥

नमस्कार को चमत्कार यह,
विधि हरिहर को कृपासार यह॥

सेवै भानु तुमहिं मन लाई,
अष्टसिद्धि नवनिधि तेहिं पाई॥

बारह नाम उच्चारन करते,
सहस जनम के पातक टरते॥

उपाख्यान जो करते तवजन,
रिपु सों जमलहते सोतेहि छन॥

धन सुत जुत परिवार बढ़तु है,
प्रबल मोह को फंद कटतु है॥

अर्क शीश को रक्षा करते,
रवि ललाट पर नित्य बिहरते॥

सूर्य नेत्र पर नित्य विराजत,
कर्ण देस पर दिनकर छाजत॥

भानु नासिका वासकरहुनित,
भास्कर करत सदा मुखको हित॥

ओंठ रहैं पर्जन्य हमारे,
रसना बीच तीक्ष्ण बस प्यारे॥

कंठ सुवर्ण रेत की शोभा,
तिग्म तेजसः कांधे लोभा॥

पूषां बाहू मित्र पीठहिं पर,
त्वष्टा वरुण रहत सुउष्णकर॥

युगल हाथ पर रक्षा कारन,
भानुमान उरसर्म सुउदरचन॥

बसत नाभि आदित्य मनोहर,
कटिमंह, रहत मन मुदभर॥

जंघा गोपति सविता बासा,
गुप्त दिवाकर करत हुलासा॥

विवस्वान पद की रखवारी,
बाहर बसते नित तम हारी॥

सहस्त्रांशु सर्वांग सम्हारै,
रक्षा कवच विचित्र विचारे॥

अस जोजन अपने मन माहीं,
भय जगबीच करहुं तेहि नाहीं ॥

दद्रु कुष्ठ तेहिं कबहु न व्यापै,
जोजन याको मन मंह जापै॥

अंधकार जग का जो हरता,
नव प्रकाश से आनन्द भरता॥

ग्रह गन ग्रसि न मिटावत जाही,
कोटि बार मैं प्रनवौं ताही॥

मंद सदृश सुत जग में जाके,
धर्मराज सम अद्भुत बांके॥

धन्य-धन्य तुम दिनमनि देवा,
किया करत सुरमुनि नर सेवा॥

भक्ति भावयुत पूर्ण नियम सों,
दूर हटतसो भवके भ्रम सों॥

परम धन्य सों नर तनधारी
हैं प्रसन्न जेहि पर तम हारी॥

अरुण माघ महं सूर्य फाल्गुन,
मधु वेदांग नाम रवि उदयन॥

भानु उदय बैसाख गिनावै,
ज्येष्ठ इन्द्र आषाढ़ रवि गावै॥

यम भादों आश्विन हिमरेता,
कातिक होत दिवाकर नेता॥

अगहन भिन्न विष्णु हैं पूसहिं,
पुरुष नाम रविहैं मलमासहिं॥

॥ दोहा ॥

भानु चालीसा प्रेम युत, गावहिं जे नर नित्य,
सुख सम्पत्ति लहि बिबिध, होंहिं सदा कृतकृत्य॥

सूर्य चालीसा

Surya Chalisa Lyrics in English | जय सविता जय जयति दिवाकर

|| Surya Chalisa ||

॥ Doha ॥

Kanak badan kundal makar,
mukta mala ang,
padmasan sthit dhyaaiye,
shankh chakra ke sang॥

॥ Chaupai ॥

Jay savita jay jayati divakar, sahastransh saptashv timirahar॥

Bhaanu patang marichi bhaaskar, savita hans sunoor vibhakar॥

Vivaswaan aaditya vikartan, maartand harirup virochan॥

Ambarmani khag ravi kahlatae, ved hiranyagarbh kah gaate॥

Sahastransh pradyotan, kahikahi, munigan hot prasann modalahi॥

Arun sadrish saarthi manohar, haankat hay saataa chadhi rath par॥

Mandal ki mahima ati nyaari, tej roop keri balihari॥

Uchchhaishrava sadrish hay jote, dekhi purandar lajjit hote॥

Mitr marichi, bhaanu, arun, bhaaskar, savita soory arka kalikar॥

Poosha ravi aaditya naam lai, hiranyagarbhaay namah kahikai॥

Dwaadas naam prem so gavaein, mastak baarah baar navaavein॥

Chaara padaarth jan so paavain, dukh daaridra agh punj nasaavain॥

Namaskaar ko chamatkaar yah, vidhi harihar ko kripasaar yah॥

Sevai Bhanu tumahin man laai, Ashtasiddhi navnidhi tehin paai॥

Baarah naam uchaaran karte, sahas janam ke paatak tarte॥

Upaakhyaan jo karte tavajan, ripu so jamalhate sotehi chhan॥

Dhan sut jut parivaar badhatu hai, prabal moh ko phand katatu hai॥

Arka sheesh ko Raksha karte, ravi lalaat par nitya biharate॥

Soorya netra par nitya viraajat, karn des par dinakar chhaajat॥

Bhaanu naasika vaasakar hunait, bhaaskar karat sada mukhko hit॥

Oanth rahain parjanya hamaare, rasnaa beech teekshn bas pyaare॥

Kanth suvarn ret ki shobha, tigm tejashah kaandhe lobha॥

Pooshaam baahu mitr peethhim par, tvastaa varun rahat suushnkar॥

Yugal haath par raksha kaaran, bhaanumaan urasarm suudarachan॥

Basat naabhi aaditya manohar, katimanh, rahat man mudbhar॥

Jangha gopati savita baasa, gupt divakar karat hulaasa॥

Vivaswaan pad ki rakhwaari, baahar basate nit tam haari॥

Sahastransh sarvaang samhaare, raksha kavach vichitr vichaare॥

As jojan apne man maahin, bhay jagabeich karahun tehi naahi॥

Dadru kusht tehin kabahu na vyaapai, jojan yaako man manh jaapai॥

Andhakaar jag ka jo hartaa, nav prakaash se aanand bharata॥

Grah gan grasi na mitaavat jaahi, koti baar main pranavon taahi॥

Mand sadrish sut jag mein jaake, dharmaraj sam adbhut baanke॥

Dhany-dhany tum dinamani deva, kiya karat suramuni nar seva॥

Bhakti bhaavyut poorn niyam so, door hattats o bhavke bhram so॥

Param dhany so nar tandhaari, hain prasann jehi par tam haari॥

Arun maagh maham soory falgun, madhu vedaang naam ravi udayan॥

Bhaanu uday baisaakh ginaavai, jyeshth indra aashaadh ravi gaavai॥

Yam bhaadon aashvin himreta, kaatik hot divakar neta॥

Agahan bhinna vishnu hain poosahin, purush naam ravihain malamaasahin॥

॥ Doha ॥

Bhaanu chaalisa prem yut,
gaavahin je nar nitya,
sukh sampatti lahi bibidh,
hohnahi sadaa kritakritya॥

Tulsi Chalisa Lyrics: तुलसी चालीसा लिरिक्स हिंदी में

हिन्दू धर्म में तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa) की पूजा तथा तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa) का पाठ करना बहुत ही शुभ माना जाता है| ऐसा माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन तुलसी माता की पूजा तथा साथ ही तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa) का जाप करता है, उस पर सदैव ही भगवान श्रीहरि विष्णु व माता लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है| इसलिए यदि आप प्रतिदिन तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa) का पाठ करते है तो आपको अद्भुद लाभ प्राप्त होगा|

तुलसी चालीसा

तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa) का जाप करने से भगवान विष्णु के साथ ही जातक माता लक्ष्मी जी की भी कृपा प्राप्त होती है| जिससे घर में धन-समृद्धि सदा बनी रहती है| तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa) के नियमित जाप से नवग्रहों को भी शांति प्राप्त होती है| आइये जानते है तुलसी चालीसा (Tulsi Chalisa) पाठ के बारे में|

इसके आलवा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja), विवाह पूजा (Marriage Puja), तथा ऑफिस उद्घाटन पूजा (Office Opening Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

तुलसी चालीसा लिरिक्स हिंदी में | Tulsi Chalisa Lyrics in Hindi

|| तुलसी चालीसा ||

॥ दोहा ॥

जय जय तुलसी भगवती सत्यवती सुखदानी ।
नमो नमो हरि प्रेयसी श्री वृन्दा गुन खानी ॥

श्री हरि शीश बिरजिनी, देहु अमर वर अम्ब ।
जनहित हे वृन्दावनी अब न करहु विलम्ब ॥

॥ चौपाई ॥

धन्य धन्य श्री तलसी माता ।
महिमा अगम सदा श्रुति गाता ॥

हरि के प्राणहु से तुम प्यारी ।
हरीहीँ हेतु कीन्हो तप भारी ॥

जब प्रसन्न है दर्शन दीन्ह्यो ।
तब कर जोरी विनय उस कीन्ह्यो ॥

हे भगवन्त कन्त मम होहू ।
दीन जानी जनि छाडाहू छोहु ॥

सुनी लक्ष्मी तुलसी की बानी ।
दीन्हो श्राप कध पर आनी ॥

उस अयोग्य वर मांगन हारी ।
होहू विटप तुम जड़ तनु धारी ॥

सुनी तुलसी हीँ श्रप्यो तेहिं ठामा ।
करहु वास तुहू नीचन धामा ॥

दियो वचन हरि तब तत्काला ।
सुनहु सुमुखी जनि होहू बिहाला ॥

समय पाई व्हौ रौ पाती तोरा ।
पुजिहौ आस वचन सत मोरा ॥

तब गोकुल मह गोप सुदामा ।
तासु भई तुलसी तू बामा ॥

कृष्ण रास लीला के माही ।
राधे शक्यो प्रेम लखी नाही ॥

दियो श्राप तुलसिह तत्काला ।
नर लोकही तुम जन्महु बाला ॥

यो गोप वह दानव राजा ।
शङ्ख चुड नामक शिर ताजा ॥

तुलसी भई तासु की नारी ।
परम सती गुण रूप अगारी ॥

अस द्वै कल्प बीत जब गयऊ ।
कल्प तृतीय जन्म तब भयऊ ॥

वृन्दा नाम भयो तुलसी को ।
असुर जलन्धर नाम पति को ॥

करि अति द्वन्द अतुल बलधामा ।
लीन्हा शंकर से संग्राम ॥

जब निज सैन्य सहित शिव हारे ।
मरही न तब हर हरिही पुकारे ॥

पतिव्रता वृन्दा थी नारी ।
कोऊ न सके पतिहि संहारी ॥

तब जलन्धर ही भेष बनाई ।
वृन्दा ढिग हरि पहुच्यो जाई ॥

शिव हित लही करि कपट प्रसंगा ।
कियो सतीत्व धर्म तोही भंगा ॥

भयो जलन्धर कर संहारा ।
सुनी उर शोक उपारा ॥

तिही क्षण दियो कपट हरि टारी ।
लखी वृन्दा दुःख गिरा उचारी ॥

जलन्धर जस हत्यो अभीता ।
सोई रावन तस हरिही सीता ॥

अस प्रस्तर सम ह्रदय तुम्हारा ।
धर्म खण्डी मम पतिहि संहारा ॥

यही कारण लही श्राप हमारा ।
होवे तनु पाषाण तुम्हारा ॥

सुनी हरि तुरतहि वचन उचारे ।
दियो श्राप बिना विचारे ॥

लख्यो न निज करतूती पति को ।
छलन चह्यो जब पारवती को ॥

जड़मति तुहु अस हो जड़रूपा ।
जग मह तुलसी विटप अनूपा ॥

धग्व रूप हम शालिग्रामा ।
नदी गण्डकी बीच ललामा ॥

जो तुलसी दल हमही चढ़ इहैं ।
सब सुख भोगी परम पद पईहै ॥

बिनु तुलसी हरि जलत शरीरा ।
अतिशय उठत शीश उर पीरा ॥

जो तुलसी दल हरि शिर धारत ।
सो सहस्त्र घट अमृत डारत ॥

तुलसी हरि मन रञ्जनी हारी ।
रोग दोष दुःख भंजनी हारी ॥

प्रेम सहित हरि भजन निरन्तर ।
तुलसी राधा में नाही अन्तर ॥

व्यन्जन हो छप्पनहु प्रकारा ।
बिनु तुलसी दल न हरीहि प्यारा ॥

सकल तीर्थ तुलसी तरु छाही ।
लहत मुक्ति जन संशय नाही ॥

कवि सुन्दर इक हरि गुण गावत ।
तुलसिहि निकट सहसगुण पावत ॥

बसत निकट दुर्बासा धामा ।
जो प्रयास ते पूर्व ललामा ॥

पाठ करहि जो नित नर नारी ।
होही सुख भाषहि त्रिपुरारी ॥

॥ दोहा ॥

तुलसी चालीसा पढ़ही तुलसी तरु ग्रह धारी ।
दीपदान करि पुत्र फल पावही बन्ध्यहु नारी ॥

सकल दुःख दरिद्र हरि हार ह्वै परम प्रसन्न ।
आशिय धन जन लड़हि ग्रह बसही पूर्णा अत्र ॥

लाही अभिमत फल जगत मह लाही पूर्ण सब काम ।
जेई दल अर्पही तुलसी तंह सहस बसही हरीराम ॥

तुलसी महिमा नाम लख तुलसी सूत सुखराम ।
मानस चालीस रच्यो जग महं तुलसीदास ॥

तुलसी चालीसा

Tulsi Chalisa Lyrics in English | धन्य धन्य श्री तलसी माता

|| Tulsi Chalisa ||

॥ Doha ॥

Jai Jai Tulsi Bhagwati Satyavati Sukhdaani।
Namo Namo Hari Preyasi Shri Vrinda Gun Khaani॥

Shri Hari Shish Birajini, Dehu Amar Var Amb।
Janhit He Vrindavani Ab Na Karahu Vilamb॥

॥ Chaupai ॥

Dhany Dhany Shri Tulsi Mata।
Mahima Agam Sada Shruti Gaata॥

Hari Ke Pranhu Se Tum Pyaari।
Harihin Hetu Keenho Tap Bhari॥

Jab Prasann Hai Darshan Deenhyo।
Tab Kar Jori Vinay Us Kinhyo॥

He Bhagavant Kant Mam Hohoo।
Deen Jaani Jani Chhaadahoo Chhohoo॥

Suni Lakshmi Tulsi Ki Baani।
Deenho Shraap Kadha Par Aani॥

Us Ayogya Var Maangan Haari।
Hohoo Vitap Tum Jad Tanu Dhaari॥

Suni Tulsi He Shrapyo Tehim Thaama।
Karahu Vaas Tuhoo Neechan Dhaama॥

Diyo Vachan Hari Tab Tatkaala।
Sunhu Sumukhi Jani Hohoo Bihaala॥

Samay Paai Vhau Rau Paati Tora।
Pujihau Aas Vachan Sat Mora॥

Tab Gokul Mah Gop Sudama।
Taasu Bhaee Tulsi Tu Baama॥

Krishna Raas Leela Ke Maahi।
Radhe Shakyu Prem Lakhi Naahi॥

Diyo Shraap Tulsahi Tatkaala।
Nar Lokahi Tum Janmahu Baala॥

Yo Gop Vah Daanav Raaja।
Shankh Chud Naamak Shir Taaja॥

Tulsi Bhaee Taasu Ki Naari।
Param Sati Gun Roop Agaari॥

As Dvai Kalp Beet Jab Gayou।
Kalp Triteey Janm Tab Bhayou॥

Vrinda Naam Bhayo Tulsi Ko।
Asur Jaladhar Naam Pati Ko॥

Kari Ati Dvand Atul Baladhaama।
Leenha Shankar Se Sangraama॥

Jab Nij Sainya Sahit Shiv Haare।
Marahi Na Tab Har Harih Pukaare॥

Pativrata Vrinda Thi Naari।
Koou Na Sake Patihi Sanhaari॥

Tab Jaladhar He Bheesh Banaai।
Vrinda Dheeg Hari Pahuchyo Jaai॥

Shiv Hit Lahee Kari Kapat Prasanga।
Kiyo Satitva Dharm Tohee Bhanga॥

Bhayo Jaladhar Kar Sanhaara।
Suni Ur Shok Upaara॥

Tihi Kshan Diyo Kapat Hari Taari।
Lakhi Vrinda Dukh Gira Uchaari॥

Jaladhar Jas Hatyo Abhita।
Soee Raavan Tas Harih Sita॥

As Prastar Sam Hriday Tumhaara।
Dharm Khandi Mam Patihi Sanhaara॥

Yahi Kaaran Lahee Shraap Hamaara।
Hove Tanu Paashaan Tumhaara॥

Suni Hari Turatahi Vachan Uchaare।
Diyo Shraap Bina Vichaare॥

Lakhyo Na Nij Karatooti Pati Ko।
Chhalan Chahyo Jab Paarvati Ko॥

Jadmati Tuhu As Ho Jadaroopa।
Jag Mah Tulsi Vitap Anoopa॥

Dhagv Roop Ham Shaaligraama।
Nadi Gandaki Beach Lalaama॥

Jo Tulsi Dal Hamahi Chadh Ihai।
Sab Sukh Bhogi Param Pad Paihai॥

Binu Tulsi Hari Jalat Shareera।
Atishay Uthat Sheesh Ur Peera।

Jo Tulsi Dal Hari Shir Dhaarat।
So Sahasr Ghat Amrit Daarat॥

Tulsi Hari Mann Ranjani Haari।
Rog Dosh Dukh Bhanjani Haari॥

Prem Sahit Hari Bhajan Nirantar।
Tulsi Radha Mein Naahi Antar॥

Vyanjan Ho Chhappanhu Prakaara।
Binu Tulsi Dal Na Harihi Pyaara॥

Sakal Teerth Tulsi Taru Chhaahi।
Lahat Mukti Jan Sanshay Naahi॥

Kavi Sundar Ik Hari Gun Gaavat।
Tulsahi Nikat Sahasgun Paavat॥

Basat Nikat Durbasa Dhaama।
Jo Prayaas Te Poorv Lalaama॥

Paath Karahi Jo Nit Nar Naari।
Hohi Sukh Bhashahi Tripuraari॥

॥ Doha ॥

Tulsi Chalisa Padhihi Tulsi Taru Grah Dhaari।
Deepdaan Kari Putra Phal Paavahi Bandhyahu Naari॥

Sakal Dukh Daridra Hari Haar Hvai Param Prasann।
Aashiy Dhan Jan Ladahi Grah Basahi Poorna Atra॥

Laahi Abhimat Phal Jagat Mah Laahi Poorna Sab Kaam।
Jee Dal Arpahi Tulsi Tanh Sahas Basahi Hariraam॥

Tulsi Mahima Naam Lakh Tulsi Soot Sukhram।
Maanas Chalisa Rachyo Jag Mahan Tulsidas॥

Jai Jai Jai Shree Bagla Mata Chalisa Lyrics: माँ बगलामुखी चालीसा पाठ

बगलामुखी चालीसा (Baglamukhi Chalisa) का पाठ माता बगलामुखी को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| बगलामुखी माता को हिन्दू धर्म की एक प्रसिद्ध देवी के रूप में जाना जाता है| बगलामुखी माता के सभी भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए बगलामुखी चालीसा (Baglamukhi Chalisa) पाठ का करते है| माता बगलामुखी का पूजन अधिकांश रूप से तंत्र-मंत्र की विद्या के लिए किया जाता है| यह बगलामुखी चालीसा (Baglamukhi Chalisa) पाठ शत्रुओं से रक्षा के लिए भी किया जाता है| बगलामुखी माता को युद्ध की देवी भी कहा जाता है| प्राचीन समय में कई सारे योद्धा युद्ध में जाने पूर्व माँ बगलामुखी की आराधना करते थे तो आइये जानते है बगलामुखी चालीसा (Baglamukhi Chalisa) लिरिक्स के बारे में |

बगलामुखी चालीसा

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बगलामुखी चालीसा पाठ हिंदी में | Baglamukhi Chalisa Lyrics in Hindi

|| बगलामुखी चालीसा ||

॥ दोहा ॥

सिर नवाइ बगलामुखी,
लिखूं चालीसा आज ॥
कृपा करहु मोपर सदा,
पूरन हो मम काज ॥

॥ चौपाई ॥

जय जय जय श्री बगला माता ।
आदिशक्ति सब जग की त्राता ॥

बगला सम तब आनन माता ।
एहि ते भयउ नाम विख्याता ॥

शशि ललाट कुण्डल छवि न्यारी ।
असतुति करहिं देव नर-नारी ॥

पीतवसन तन पर तव राजै ।
हाथहिं मुद्गर गदा विराजै ॥

तीन नयन गल चम्पक माला ।
अमित तेज प्रकटत है भाला ॥

रत्न-जटित सिंहासन सोहै ।
शोभा निरखि सकल जन मोहै ॥

आसन पीतवर्ण महारानी ।
भक्तन की तुम हो वरदानी ॥

पीताभूषण पीतहिं चन्दन ।
सुर नर नाग करत सब वन्दन ॥

एहि विधि ध्यान हृदय में राखै ।
वेद पुराण संत अस भाखै ॥

अब पूजा विधि करौं प्रकाशा ।
जाके किये होत दुख-नाशा ॥

प्रथमहिं पीत ध्वजा फहरावै ।
पीतवसन देवी पहिरावै ॥

कुंकुम अक्षत मोदक बेसन ।
अबिर गुलाल सुपारी चन्दन ॥

माल्य हरिद्रा अरु फल पाना ।
सबहिं चढ़इ धरै उर ध्याना ॥

धूप दीप कर्पूर की बाती ।
प्रेम-सहित तब करै आरती ॥

अस्तुति करै हाथ दोउ जोरे ।
पुरवहु मातु मनोरथ मोरे ॥

मातु भगति तब सब सुख खानी ।
करहुं कृपा मोपर जनजानी ॥

त्रिविध ताप सब दुख नशावहु ।
तिमिर मिटाकर ज्ञान बढ़ावहु ॥

बार-बार मैं बिनवहुं तोहीं ।
अविरल भगति ज्ञान दो मोहीं ॥

पूजनांत में हवन करावै ।
सा नर मनवांछित फल पावै ॥

सर्षप होम करै जो कोई ।
ताके वश सचराचर होई ॥

तिल तण्डुल संग क्षीर मिरावै ।
भक्ति प्रेम से हवन करावै ॥

दुख दरिद्र व्यापै नहिं सोई ।
निश्चय सुख-सम्पत्ति सब होई ॥

फूल अशोक हवन जो करई ।
ताके गृह सुख-सम्पत्ति भरई ॥

फल सेमर का होम करीजै ।
निश्चय वाको रिपु सब छीजै ॥

गुग्गुल घृत होमै जो कोई ।
तेहि के वश में राजा होई ॥

गुग्गुल तिल संग होम करावै ।
ताको सकल बंध कट जावै ॥

बीलाक्षर का पाठ जो करहीं ।
बीज मंत्र तुम्हरो उच्चरहीं ॥

एक मास निशि जो कर जापा ।
तेहि कर मिटत सकल संतापा ॥

घर की शुद्ध भूमि जहं होई ।
साध्का जाप करै तहं सोई ॥

सेइ इच्छित फल निश्चय पावै ।
यामै नहिं कदु संशय लावै ॥

अथवा तीर नदी के जाई ।
साधक जाप करै मन लाई ॥

दस सहस्र जप करै जो कोई ।
सक काज तेहि कर सिधि होई ॥

जाप करै जो लक्षहिं बारा ।
ताकर होय सुयशविस्तारा ॥

जो तव नाम जपै मन लाई ।
अल्पकाल महं रिपुहिं नसाई ॥

सप्तरात्रि जो पापहिं नामा ।
वाको पूरन हो सब कामा ॥

नव दिन जाप करे जो कोई ।
व्याधि रहित ताकर तन होई ॥

ध्यान करै जो बन्ध्या नारी ।
पावै पुत्रादिक फल चारी ॥

प्रातः सायं अरु मध्याना ।
धरे ध्यान होवैकल्याना ॥

कहं लगि महिमा कहौं तिहारी ।
नाम सदा शुभ मंगलकारी ॥

पाठ करै जो नित्या चालीसा ।
तेहि पर कृपा करहिं गौरीशा ॥

॥ दोहा ॥

सन्तशरण को तनय हूं,
कुलपति मिश्र सुनाम ।
हरिद्वार मण्डल बसूं ,
धाम हरिपुर ग्राम ॥

उन्नीस सौ पिचानबे सन् की,
श्रावण शुक्ला मास ।
चालीसा रचना कियौ,
तव चरणन को दास ॥

बगलामुखी चालीसा

Baglamukhi Chalisa Path Lyrics in English | जय जय जय श्री बगला माता

|| Baglamukhi Chalisa ||

॥ Doha ॥

Sir navaai bagalamukhi,
Likhu chalisa aaj.
Kripa karhu mopar sada,
Puran ho mam kaaj.

॥ Chaupai ॥

Jay jay jay shri bagla mata,
Aadishakti sab jag ki traata.

Bagla sam tab aanan mata,
Ehi te bhayau naam vikhyata.

Shashi lalat kundal chhavi nyaari,
Asatuti karhin dev nar-naari.

Peetavasan tan par tav raajai,
Haathhin mudgar gada virajai.

Teen nayan gal champak maala,
Amit tej prakat hai bhaala.

Ratn-jatit sinhasan sohai,
Shobha nirakhi sakal jan mohai.

Aasan peetvarn maharani,
Bhaktan ki tum ho vardani.

Peetabhooshan peetahin Chandan,
Sur nar naag karat sab vandan.

Ehi vidhi dhyan hriday mein rakhe,
Ved puran sant as bhakhe.

Ab pooja vidhi karun prakasha,
Jaake kiye hot dukh-naasha.

Prathamhin peet Dhvaja fahravai,
Peetavasan devi pahiravai.

Kunkum akshat modak besan,
Abir gulaal supari chandan.

Malya haridra aru phal paana,
Sabahin chadhai dharai ur dhyaana.

Dhoop deep karpoor ki baati,
Prem-sahit tab karai aarti.

Astuti karai haath dou jore,
Purvahu matu manorath more.

Matu bhagati tab sab sukh khani,
Karhun kripa mopar jan jaani.

Trividh taap sab dukh nashaavahu,
Timir mitaakar gyaan badhaavahu.

Bar-bar main binavahun tohi,
Aviral bhagati gyaan do mohee.

Poojanaant mein havan karaavai,
Saa nar manovaanchhit phal paavai.

Sarshap hom Karai jo koi,
Taake vash Sacharachar hoi.

Til tandul sang ksheer miraavai,
Bhakti prem se havan karaavai.

Dukh daridra vyaapai nahin soi,
Nishchay sukh-sampatti sab hoi.

Phool ashok havan jo karai,
Taake grih sukh-sampatti bharai.

Phal semar ka hom karijai,
Nishchay vaako ripu sab chhijai.

Guggul ghrit homai jo koi,
Te hi ke vash mein raaja hoi.

Guggul til sang hom karaavai,
Taako sakal bandh kat jaavai.

Beelaakshar ka paath jo karahi,
Beej mantra tumharo uchcharahi.

Ek maas nisi jo kar jaapa,
Te hi kar mitat sakal santaapa.

Ghar ki shuddh bhoomi jah hoee,
Saadhka jaap karai tah soee.

Sei ichhit phal nishchay paavai,
Yaamai nahin kadu sanshay laavai.

Athavaa teer nadi ke jaai,
Saadhak jaap karai man laai.

Das sahasra jap karai jo koi,
Sak kaaj tehi kar sidhi hoi.

Jaap karai jo lakhahin baara,
Taakar hoy suyashvistaara.

Jo tav naam japai man laai,
Alpakaal mahan ripuhin nasai.

Saptaraatri jo paapahin naama,
Vaako pooran ho sab kaama.

Nav din jaap kare jo koi,
Vyaadhi rahit taakar tan hoi.

Dhyaan karai jo bandhya naari,
Paavai putraadik phal chaari.

Pratah saayam aru madhyaana,
Dhare dhyaan hovaikalyaana.

Kaham lagi mahima kahoun tihaari,
Naam sada shubh mangalkaari.

Paath karai jo nitya chalisa,
Te hi par kripa karahin gaurisha.

॥ Doha ॥

Santasharan ko tanay hoon,
Kulpati mishra sunaam.
Haridwar mandal basoon,
Dhaam haripur gram.

Unnis sau pichaanbe san ki,
Shravan shukla maas.
Chalisa rachna kiyau,
Tav charanan ko daas.

Bhagavad Gita Chapter 18: भगवद गीता अठारहवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता अठारहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 18) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता अठारहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 18) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

Bhagavad Gita Chapter 18

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Chapter 18 – मोक्षसंन्यासयोगः (The Perfection of Renunciation)


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (1-2)

अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥
श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन कहते है – हे महाबाहो ! हे अन्तर्यामिन ! हे वासुदेव ! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को अलग-अलग जानना चाहता हूँ| श्री भगवान कहते है – कुछ कवि (विद्वान) तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते है पर दुसरे विचारक सभी कर्मों में फल-त्याग को त्याग कहते है|

English Meaning – Arjun says – O mighty one! O Antaryamin! Hey Vasudev! I want to know the essence of renunciation and renunciation separately. Shri Bhagwan says that some poets (scholars) consider renunciation of lustful deeds as renunciation, but other thinkers call renunciation of the fruits of all actions.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (3-4)

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥

हिंदी अर्थ – कुछ मनीषी कहते है कि सभी कर्म दोषयुक्त है, इसलिए त्यागने योग्य है और दुसरे कहते है कि यज्ञ, दान और तप जैसे रूपी कर्म त्यागने योग्य नहीं है| हे भारतश्रेष्ठ अर्जुन ! इस विषय में त्याग के सम्बन्ध में मेरा निश्चय सुनो| हे पुरुषसिंह त्याग तीन (सात्त्विक, राजस और तामस) प्रकार का कहा गया है|

English Meaning – Some sages say that all the deeds are flawed and hence deserve to be renounced and others say that deeds like Yagya, charity and penance are not worth giving up. O great Arjun of India! Listen to my determination regarding renunciation in this matter. O Purushasingha, renunciation has been said to be of three types (Sattvik, Rajasic and Tamasic).


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (5-6)

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥

हिंदी अर्थ – यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, वे तो अवश्य करने चाहिए क्योंकि यज्ञ, दान आयर तप मनीषियों को भी पवित्र करने वाले है| इसलिए हे पार्थ ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है|

English Meaning – Yagya, charity and penance are not worth renouncing, they must be done because yagya, charity and penance purify even the wise people. That’s why O Parth! These sacrifices, donations, penances and all other duties must be performed by renouncing attachment and fruits, this is my firm opinion.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (7-8)

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस् तामसः परिकीर्तितः ॥
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥

हिंदी अर्थ – स्वरुप से त्याग करना उचित नहीं है| इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है| जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है – ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता|

English Meaning – It is not right to sacrifice one’s form. Therefore, giving up attachment due to attachment is called Tamasic renunciation. Whatever action there is, it is all a form of sorrow – if someone gives up his duties due to the fear of physical suffering, then he does not get the fruit of such rajasic renunciation in any way.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (9-10)

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है – इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है – वही सात्त्विक त्याग माना गया है| जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता – वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है|

English Meaning – Hey Arjun! Doing the work as per the scriptures, which is done in the same spirit by renouncing attachment and results, is considered as Sattvik renunciation. The man who does not hate unskilled work and is not attached to skilled work – that man with pure Sattva Guna is free from doubt, intelligent and a true renunciate.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (11-12)

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा संपूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है – यह कहा जाता है| कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ – ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नही होता|

English Meaning – Because it is not possible for any human being with a body to completely renounce all the actions, hence it is said that one who has renounced the results of the actions. The deeds of people who do not give up the results of their actions have three types of results – good, bad and mixed – after death, but the deeds of people who give up the results of their actions do not get results even in any period of time.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (13-14)

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥

हिंदी अर्थ – हे महाबाहो ! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पांच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य – शास्त्र में कहे गए है, उनको तू मुझसे भलीभांति जान| इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पांचवां हेतु देव है|

English Meaning – O great-armed one! These five reasons for the accomplishment of all the deeds have been mentioned in the Sankhya Shastra which tells the remedies for ending the deeds, you should know them very well from me. In this matter i.e. in the accomplishment of the deeds, there is the establishment and the doer and different types of causes and different types of efforts and similarly, the fifth reason is God.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (15-16)

शरीरवाङ्‌मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥
तत्रैवं सति कर्तारमात् मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान् न स पश्यति दुर्मतिः ॥

हिंदी अर्थ – मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है – उसके ये पाँचों कारण है| परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्धि बुद्धि होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरुप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता|

English Meaning – Whatever action a man does with his mind, speech and body as per the scriptures or against it – these are the five reasons for it. But even if this happens, the person who, due to his impure intellect, considers only the pure soul as the doer in that matter i.e. in the happening of the deeds, that ignorant person with impure intellect does not understand the reality.

Bhagavad Gita Chapter 18

Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (17-18)

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥

हिंदी अर्थ – जिस पुरुष के अन्तःकरण में ‘मैं करता हूँ’ ऐसा भाव नहीं आता है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मरता है और न पाप से बंधता है| ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय – ये तीनों प्रकार की कर्म-प्रेरणा है और कर्ता, करण तथा क्रिया – ये तीनों प्रकार का कर्म – संग्रह है|

English Meaning – The person who does not have the feeling of ‘I do’ in his heart and whose mind is not absorbed in worldly things and actions, that person neither actually dies nor gets bound by sin even after killing all these worlds. Knower, knowledge and known – these are the three types of action-inspiration and doer, action and action – these are the three types of action-collection.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (19-20)

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥

हिंदी अर्थ – गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए है, उनको भी तू मुझसे भलीभांति सुन| जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान|

English Meaning – In the scriptures that enumerate the qualities, only three types have been said, different from the qualities of knowledge, action and doer, listen to them very well from me. The knowledge by which man sees the one imperishable divine spirit present in all separate beings with equanimity without division, consider that knowledge as Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (21-22)

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थ – किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावो को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान| परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है – वह तामस कहा गया है|

English Meaning – But that knowledge, that is, the knowledge through which man knows the different types of emotions in all the beings, you should consider that knowledge as Rajas. But the knowledge which is attached to the body as a function and which is devoid of logic, devoid of metaphysical meaning and insignificant, is called Tamasic.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (23-24)

नियतं सङ्गरहितम रागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थ – जों कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो – वह सात्त्विक कहा जाता है| परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है|

English Meaning – The work which is prescribed by the scriptures and is free from the pride of being a doer and is done by a person who does not want the fruit, without attachment or hatred, is called Sattvik. But the work which involves a lot of hard work and is done by a person desirous of pleasures or by a person full of ego, that work is called Rajasic.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (25-26)

अनुबन्धं क्षयं हिंसा मनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥

हिंदी अर्थ – जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है| जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाले, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष – शोकादि विकारो से रहित है – वह सात्त्विक कहा जाता है|

English Meaning – The action which is started only out of ignorance without considering the consequences, harm, violence and potency is called Tamas. The doer who is free from attachments, does not speak words of ego, has patience and enthusiasm and is free from the joys and sorrows when the work is accomplished or not – he is called Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (27-28)

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥

हिंदी अर्थ – जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है| जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है| वह तामस कहा जाता है|

English Meaning – The doer who is greedy and desirous of the fruits of his actions with attachment and has a nature of causing pain to others, is impure and indulges in joy and sorrow is called Rajas. The doer who is illiterate, devoid of education, arrogant, cunning, who destroys the livelihood of others and is a mourner, lazy and long-winded. That is called tamas.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (29-30)

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थ – हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा संपूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन| हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृतिमार्ग और निवृति मार्ग को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है – वह बुद्धि सात्त्विकी है|

English Meaning – Hey Dhananjay! Now listen to me explaining in detail the three types of intelligence and wisdom as per their qualities. Hey Parth! The intellect which accurately knows the path of practice and the path of retirement, duty and non-duty, fear and fearlessness, bondage and salvation – that intellect is Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (31-32)

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है| हे अर्जुन ! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी ‘यह धर्म’ ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है|

English Meaning – Hey Parth! The intellect by which a human being does not accurately know righteousness and unrighteousness, as well as duty and non-duty, is a royal intellect. Hey Arjun! The intellect which is surrounded by Tamasic nature and considers unrighteousness as ‘this religion’ and similarly considers all other things as opposite, that intellect is tamasic.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (33-34)

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है| परन्तु हे पृथापुत्र अर्जुन ! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है|

English Meaning – Hey Parth! The power of unadulterated retention by which a human being absorbs the activities of mind, life and senses through meditation and yoga is called Dhriti Sattviki. But O Arjun, son of Pritha! The power of retention by which a person desirous of getting results, with utmost attachment, holds on to religion, wealth and works, that power of retention is royal.

Bhagavad Gita Chapter 18

Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (35-36-37)

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दुःख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किये र्रेहता है – वह धारण शक्ति तामसी है| हे भरतश्रेष्ठ ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन| जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुखो के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है|

English Meaning – Hey Parth! The power of retention by which a person with evil mind does not leave sleep, fear, worry, sorrow and even madness, i.e. keeps holding it – that power of retention is Tamasic. Oh great Bharat! Now listen to me about three types of happiness also. The happiness in which a seeker rejoices through the practice of bhajan, meditation and service etc. and which leads to the end of suffering, is such happiness that, although it appears like poison in the beginning, but in the end it is like nectar. Therefore, the happiness arising from the offerings of the intellect related to God has been called Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (38-39-40)

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्त दग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥

हिंदी अर्थ – जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, वह पहले – भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य है इसलिए वह सुख राजस काहा गया है| जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निंद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है| पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कही भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो|

English Meaning – The happiness that occurs due to the combination of objects and senses, although it appears to be like nectar in the first period of enjoyment, yet in the end it is like poison, hence that happiness is called Rajas. The pleasure which fascinates the soul during enjoyment as well as in its outcome is called Tamasic, the pleasure arising from sleep, laziness and carelessness. There is no such entity in the earth or in the sky or among the gods or anywhere else, which is devoid of these three qualities arising from nature.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (41-42)

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥

हिंदी अर्थ – हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए है| अंत:करण का निग्रह करना, इन्द्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना – ये सब के सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म है|

English Meaning – Hey Parantap! The actions of Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras are divided according to the qualities arising from nature. Controlling the conscience, suppressing the senses, enduring hardships for the sake of following the Dharma, remaining pure inside and out, forgiving the transgressions of others, keeping the mind, senses and body simple – all these are the natural actions of a Brahmin.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (43-44)

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥

हिंदी अर्थ – शूरवीर, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव – ये सब के सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म है| खेती, गोलापन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म है तथा सब वर्णों की सेवा करना शुद्र का भी स्वाभाविक कर्म है|

English Meaning – Bravery, swiftness, patience, cleverness, not running away from battle, giving charity and possessiveness – all these are the natural deeds of a Kshatriya. Farming, circularity and correct behavior in the form of buying and selling – these are the natural duties of a Vaishya and serving all the varnas is also the natural duty of a Shudra.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (45-46)

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

हिंदी अर्थ – अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है| अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन| जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है| उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है|

English Meaning – A person who is diligently engaged in his natural activities attains ultimate perfection in the form of God-realization. Listen to the method by which a person engaged in his natural work attains supreme success by doing such work. The God from whom all living beings have originated and from whom this entire world is pervaded. By worshiping that God through his natural actions, man attains supreme perfection.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (47-48)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥

हिंदी अर्थ – अच्छे प्रकार आचरण किये हुए दुसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता| अतएव हे कुन्तीपुत्र ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धुंए से अग्नि की भांति सभी कर्म किसी न किसी दोष से युक्त है|

English Meaning – One’s own religion, even if it is well-conducted and devoid of any virtues, is superior to the religion of others, because while doing the work of one’s own religion as determined by nature, a person does not commit sin. Therefore O son of Kunti! Sahaj Karma should not be abandoned even if it is flawed, because like smoke and fire, all actions are tainted with some flaw or the other.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (49-50)

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥

हिंदी अर्थ – सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंत:करण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है| जो कि ज्ञान की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुंतीपुत्र ! तू संक्षेप मे ही मुझसे जान|

English Meaning – A person with an intellect free from attachment everywhere, without desires and with a living conscience, attains the supreme accomplishment of renunciation through Sankhyayoga. O son of Kunti, the way a man attains Brahma by attaining that selfless accomplishment which is the ultimate devotion to knowledge! You know me briefly.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (51-52-53)

बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

हिंदी अर्थ – विशुद्धि बुद्धि से युक्त तथा हल्का, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के द्वारा अंत:करण और इन्द्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभांति दृढ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है|

English Meaning – One who has pure intellect and eats light, sattvik and regular food, gives up words etc. and enjoys solitude and pure country, controls the mind, speech and body by controlling the conscience and senses through sattvik dharna power. One who completely destroys attachment and hatred and takes shelter of well-established renunciation and who renounces ego, power, pride, lust, anger and attachment and remains devoted to constant meditation, a man free from attachment and peaceful, who is integrally situated in Sachchidanandaghan Brahma.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (54-55)

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥

हिंदी अर्थ – फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है| ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त होता है| उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा का वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमे प्रविष्ट हो जाता है|

English Meaning – Then, that yogi with a happy mind, established in unity with Sachchidanandaghan Brahma, neither mourns for anyone nor aspires for anyone. A yogi who has equanimity among all living beings attains supreme devotion towards me. Through that devotion, he knows me, the Supreme Soul, exactly as I am and as much as I am, and through that devotion, knowing me from the essence, he immediately enters into me.

Bhagavad Gita Chapter 18

Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (56-57)

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥

हिंदी अर्थ – मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है| सब कर्मों को मन से मुझमे अर्पण करके तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमे चित्तवाला हो|

English Meaning – A Karmayogi who becomes devoted to me, while always performing all the deeds, attains the eternal, imperishable supreme state by my grace. By offering all your actions to Me wholeheartedly and by relying on Yoga in the form of equanimity, you should become devoted to Me and always remain mindful of Me.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (58-59)

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥

हिंदी अर्थ – उर्पयुक्त प्रकार में मुझमे चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा| जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबरदस्ती युद्ध में लगा देगा|

English Meaning – By having your mind in Me in the above-mentioned manner, you will easily overcome all difficulties by My grace and if you do not listen to My words due to ego, you will be destroyed, that is, you will be corrupted by charity. If you are taking refuge in ego and believing that ‘I will not fight’, then this determination of yours is false, because your nature will force you to engage in war.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (60-61)

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

हिंदी अर्थ – हे कुंतीपुत्र ! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा| हे अर्जुन ! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अंतर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है|

English Meaning – O son of Kunti! The work which you do not want to do due to attachment, you will also do it under the influence of your previous natural karma. Hey Arjun! The inner God, who is present in the body as a device, guides all the living beings through His Maya according to their deeds and is situated in the heart of all the living beings.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (62-63)

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‌गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥

हिंदी अर्थ – हे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा| उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा| इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया| अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भली भांति विचार कर, जैसे तू चाहता है वैसे ही कर|

English Meaning – Hey Bharat! You take refuge in that God in every way. Only by the grace of that God will you attain ultimate peace and the eternal supreme abode. In this way I have told you this most confidential knowledge. Now consider this mysterious knowledge thoroughly and do as you wish.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (64-65)

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥

हिंदी अर्थ – सम्पूर्ण गोपनियों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन| तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा| हे अर्जुन ! तू मुझमे मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर| ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है|

English Meaning – You still listen to my most secret word, which is the most secret of all secrets. You are very dear to me, hence I will tell you these very beneficial words. Hey Arjun! You should be interested in me, become my devotee, worship me and pay obeisance to me. By doing this you will get me only, I make this true promise to you because you are very dear to me.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (66-67)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

हिंदी अर्थ – सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमे त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा| मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर| तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमे दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए|

English Meaning – Abandoning all the religions i.e. all the duties and responsibilities in me, you surrender yourself only to me the almighty God. I will free you from all sins, do not grieve. At any time, you should not tell this mysterious sermon in the form of a song, neither to a person devoid of penance, nor to a person without devotion, nor to anyone without the desire to listen, and you should never say it to someone who has a negative view of me.

Bhagavad Gita Chapter 18

Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (68-69-70)

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मा दन्यः प्रियतरो भुवि ॥
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष मुझमे परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा – इसमें कोई संदेह नहीं है| उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं| जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊंगा – ऐसा मेरा मत है|

English Meaning – The person who, with utmost love for me, will speak this most mysterious Geeta Shastra among my devotees, will be blessed by me only – there is no doubt about it. There is no one among humans who does work more dear to me than him and in the future there will be no one more dear to me on earth than him. I believe that the man who will read the Gita Shastra in this religious form of dialogue between us, will also be worshiped by him through the Gyan Yagya.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (71-72)

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुया दपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥

हिंदी अर्थ – जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालो के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा| हे पार्थ ! क्या इस गीताशास्त्र को तूने एकाग्रचित भाव से श्रवण किया? और हे धनंजय ! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?

English Meaning – The person who listens to this Gita Shastra with faith and without any evil eye, will also be free from sins and will reach the best worlds of those who do good deeds. Hey Parth! Did you listen to this Gita Shastra with concentration? And O Dhananjay! Has your attachment born of ignorance been destroyed?


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (73-74)

अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौष मद्भुतं रोमहर्षणम् ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा| संजय बोले – इस प्रकार मैं श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना|

English Meaning – Arjun said – O Achyut! By your grace my attachment has been destroyed. I have regained my memory, now I am free from doubt and stable, hence I will follow your orders. Sanjay said – This is how I heard this wonderful, mysterious and thrilling conversation between Shri Vasudev and Mahatma Arjun.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (75-76)

व्यासप्रसादाच्छ्रुत वानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात् साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥

हिंदी अर्थ – श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टी पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना| हे राजन ! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत संवाद को पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ|

English Meaning – Having received divine vision by the grace of Shri Vyasji, I heard this highly confidential yoga being said to Arjun directly from Yogeshwar Lord Shri Krishna himself. Hey king! I feel happy again and again remembering this mysterious, beneficial and wonderful conversation between Lord Krishna and Arjun.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (77-78)

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

हिंदी अर्थ – हे राजन ! श्रीहरि के उस अत्यंत विलक्षण रूप को भी पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ| हे राजन ! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण है और जहाँ गांडीव-धनुषधारी अर्जुन है, वही पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है – ऐसा मेरा मत है|

English Meaning – Hey king! Remembering that very unique form of Sri Hari. there is great surprise in my mind and I am feeling happy again and again. Hey king! Where Yogeshwar is Lord Shri Krishna and where Gandiva-bow-wielding Arjun is there, there is Shri, Vijay, Vibhuti and Achal Niti – this is my opinion.


|| भगवद गीता अठारहवाँ अध्याय समाप्त ||

Bhagavad Gita Chapter 17: भगवद गीता सत्रहवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता सत्रहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 17) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता सत्रहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 17) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

Bhagavad Gita Chapter 17

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Chapter 17 – श्रद्धा त्रय विभाग योग (The Divisions of Faith)


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (1-2)

अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥
श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते है, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी? श्री भगवान् बोले – मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी – ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है| उसको तू मुझसे सुन|

English Meaning – Arjun said – O Krishna! What is the condition of those people who abandon the scriptures and worship Goddess Devadika with faith? Is it sattvik or rajasi or tamasi? Shri Bhagwan said that the faith of human beings which is devoid of the classical sanskaras and arises only from nature, is of three types – sattvik, rajasic and tamasic. You hear it from me.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (3-4)

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥

हिंदी अर्थ – हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्त:करण के अनुरूप होती है| यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है,वह स्वयं भी वही है| सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते है, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य है, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते है|

English Meaning – Hey Bharat! The faith of all human beings is according to their conscience. This man has faith, hence the one who has faith like the man, himself is the same. Sattvik people worship gods, Rajasic people worship Yakshas and demons and other Tamasic people worship ghosts and ghosts.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (5-6)

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥

हिंदी अर्थ – जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मन:कल्पित घोर तप को तपते है तथा दंभ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त है| जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्त:करण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले है| उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान|

English Meaning – Those people who practice severe penance only in their mind and are devoid of the scriptures and are full of arrogance and ego and are also full of desire, attachment and pride of power. Which is going to destroy the ghost community present in the body, the Supreme Soul present in the heart. You consider those ignorant people to be of a demonic nature.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (7-8)

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥
आयुःसत्त्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥

हिंदी अर्थ – भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है| वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते है| उनके इस पृथक-पृथक भेद को तू मुझसे सुन| आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रति को बढाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय – ऐसे आहार अर्थात भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते है|

English Meaning – Everyone likes three types of food according to their nature. Similarly, Yagya, penance and charity are also of three types. You listen to me about their different secrets. A Sattvik man likes such food items which increase life span, intelligence, strength, health, happiness and energy, which are juicy, smooth and stable and are dear to the mind by nature.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (9-10)

कट्‌वम्ललवणात्युष्ण तीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा-दुःखशोकामयप्रदाः ॥
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥

हिंदी अर्थ – कडवे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते है| जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है|

English Meaning – Food items that are bitter, sour, salty, very hot, pungent, dry, inflammatory and cause sorrow, anxiety and diseases are loved by a Rajas man. The food which is half-cooked, tasteless, foul-smelling, stale and unhygienic and which is also impure, is liked by a tamasic person.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (11-12)

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥

हिंदी अर्थ – जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है – इस प्रकार मन का समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है| परन्तु हे अर्जुन ! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान|

English Meaning – It is the duty to perform Yagya as prescribed by the scriptures – this is done by people who satisfy their mind and do not want any result, it is Sattvik. But oh Arjun! The yagya that is performed only for the sake of arrogance or keeping the results in mind, consider that yagya as rajasic.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (13-14)

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥
देवद्विजगुरुप्राज्ञ पूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थ – शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मंत्रों के, बिना किसी दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते है| देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा – यह शरीर – संबंधी तप कहा जाता है|

English Meaning – The Yagya which is performed inferior to the scriptures, without food donation, without mantras, without any Dakshina and without reverence is called Tamas Yagya. Worship of Gods, Brahmins, Teachers and learned people, purity, simplicity, celibacy and non-violence – these are called penances related to the body.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (15-16)

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥

हिंदी अर्थ – जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है – वही वाणी – संबंधी तप कहा जाता है| मन की प्रसन्नता, शांतभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का विग्रह और अंत:करण के भावों को भलीभांति पवित्रता, इस प्रकार यह मन संबंधी तप कहा जाता है|

English Meaning – The speech which is free from irritation, sweet, beneficial and correct and which is the practice of reading the Vedas and chanting the name of God, is called penance related to speech. Happiness of the mind, peaceful feeling, nature of thinking about God, separation of the mind and complete purity of the feelings of conscience, thus this is called penance related to the mind.

Bhagavad Gita Chapter 17

Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (17-18)

श्रद्धया परया तप्तं तपस् तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥

हिंदी अर्थ – फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों के द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते है| जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है|

English Meaning – The three types of penances mentioned above, performed with utmost devotion by yogis who do not desire results, are called Sattvik. The penance which is done out of nature or hypocrisy for the sake of respect, honor and worship . That penance which has uncertain and momentary results is called Rajas here.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (19-20)

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थ – जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दुसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है – वह तप तामस कहा गया है| दान देना ही कर्तव्य है – ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल और पात्र के प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है|

English Meaning – The penance which is done foolishly, out of stubbornness, with pain of mind, speech and body or to cause harm to others – that penance is called Tamasic. One should give charity in such a spirit towards the country, the time, and the person who does not do any favor at the time of receiving it, and it is said to be Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (21-22)

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥
अदेशकाले यद्दानम पात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थ – किन्तु जो दान क्लेश्पूर्वक तथा प्रत्युपचुर के प्रयोजन से अथवा किसी प्रकार के फल को दृष्टि मर रखकर किया जाता है| वह दान राजस कहलाता है| जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है|

English Meaning – But the donation which is made out of pain and for the purpose of retribution or without any kind of result in mind. The charity is called Rajasic. People call the charity which is given without respect or contemptuously in an unworthy place and time and towards a deserving person, tamas.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (23-24)

ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥

हिंदी अर्थ – ॐ, तत, सत-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम बताया गया है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए| इसलिए वेदमंत्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएं सदा ‘ॐ’ इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती है|

English Meaning – Om, Tat, Sat – these three types of Sachchidanandaghan Brahma have been described as names, from which Brahmins, Vedas and Yajnadis were created in the beginning of creation. Therefore, the yagya, charity and penance activities prescribed by the scriptures of the great men who recite the Veda mantras always begin by chanting the name of God ‘Om’.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (25-26)

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥

हिंदी अर्थ – तत अर्थात् तत नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही सब है – इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएं तथा दानरूप क्रियाएं की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती है| सत – इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्याभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ ! उत्तम कर्म में भी ‘सत’ शब्द का प्रयोग किया जाता है|

English Meaning – Tat i.e. everything belongs to the God who is called by the name Tat – in this sense. The people who have the desire of not getting the result perform various types of Yagya, penance activities, and charity activities. Sat – In this way this name of God is used in the sense of truth and in the sense of superiority and O Partha! People also use the word ‘Sat’ in good deeds.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (27-28)

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस् तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥

हिंदी अर्थ – तथा यज्ञ, ताप और दान में जो स्थिति है, वह भी ‘सत’ इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत – ऐसे कहा जाता है| हे अर्जुन ! बिना श्रद्धा से किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है – वह समस्त ‘असत’ – इस प्रकार कहा जाता है इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही|

English Meaning – And the state of Yagya, penance and charity is also called ‘Sat’.  The work done for God is definitely called Sat. Hey Arjun! The havan performed without faith, the charity given, the penance performed and whatever auspicious work done is all ‘Asat’. This is called like this, so it is neither beneficial in this world nor even after death.


|| भगवद गीता सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ||


Shri Narayan Kavach Lyrics: नारायण कवच पाठ

नारायण कवच (Narayan Kavach) को श्रीमदभागवत पुराण से लिया गया है| जिसके भीतर इस सम्पूर्ण संसार के सभी बन्धनों से मुक्त होने का साधन बताया गया है| नारायण कवच (Narayan Kavach) का जाप प्रतिदिन करने से यह हमारी शत्रुओं से रक्षा करने के लिए एक कवच की भांति कार्य करता है| पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि नारायण कवच (Narayan Kavach) पाठ का जाप करने के पश्चात ही इंद्र देव ने अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था|

नारायण कवच

माना जाता है कि जो भी व्यक्ति नारायण कवच (Narayan Kavach) का पाठ करता है| उस व्यक्ति की आत्मा पूर्ण रूप से पवित्र हो जाती है तथा जो भी व्यक्ति नारायण कवच (Narayan Kavach) का सच्ची श्रद्धा से पाठ करता है| भगवान विष्णु सदैव ही उस व्यक्ति की रक्षा करते है| नारायण कवच (Narayan Kavach) को एक बहुत ही संक्षिप्त स्त्रोत माना गया है| इस नारायण कवच (Narayan Kavach) को पढने में अधिकांश 10 मिनट का समय लगता है|

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Narayan Kavach Lyrics in Hindi – नारायण कवच लिरिक्स इन हिंदी

|| नारायण कवच पाठ ||

ॐ श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ नमो नारायणाय ।

अङ्गन्यासः

ॐ ॐ नमः पादयोः ।
ॐ नं नमः जानुनोः ।
ॐ मों नमः ऊर्वोः ।
ॐ नां नमः उदरे ।
ॐ रां नमः हृदि ।
ॐ यं नमः उरसि ।
ॐ णां नमः मुखे ।
ॐ यं नमः शिरसि ॥

करन्यासः

ॐ ॐ नमः दक्षिणतर्जन्याम् ।
ॐ नं नमः दक्षिणमध्यमायाम् ।
ॐ मों नमः दक्षिणानामिकायाम् ।
ॐ भं नमः दक्षिणकनिष्ठिकायाम् ।
ॐ गं नमः वामकनिष्ठिकायाम् ।
ॐ वं नमः वामानामिकायाम् ।
ॐ तें नमः वाममध्यमायाम् ।
ॐ वां नमः वामतर्जन्याम् ।
ॐ सुं नमः दक्षिणांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि ।
ॐ दें नमः दक्षिणांगुष्ठाय पर्वणि ।
ॐ वां नमः वामांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि ।
ॐ यं नमः वामांगुष्ठाय पर्वणि ॥

विष्णुषडक्षरन्यासः

ॐ ॐ नमः हृदये ।
ॐ विं नमः मूर्धनि ।
ॐ षं नमः भ्रुवोर्मध्ये ।
ॐ णं नमः शिखायाम् ।
ॐ वें नमः नेत्रयोः ।
ॐ नं नमः सर्वसन्धिषु ।
ॐ मः अस्त्राय फट् प्राच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् आग्नेयाम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् दक्षिणस्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् नैरृत्ये ।
ॐ मः अस्त्राय फट् प्रतीच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् वायव्ये ।
ॐ मः अस्त्राय फट् उदीच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् ऐशान्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् ऊर्ध्वायाम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् अधरायाम् ॥
अथ श्रीनारायणकवचम् ।

राजोवाच ।

यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान्रिपुसैनिकान् ।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ॥ १॥

भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् ।
यथाऽऽततायिनः शत्रून् येन गुप्तोऽजयन्मृधे ॥ २॥

श्रीशुक उवाच ।

वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते ।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ॥ ३॥

विश्वरूप उवाच ।

धौताण्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदण्मुखः ।
कृतस्वाण्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ॥ ४॥

नारायणमयं वर्म सन्नह्येद्भय आगते ।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ॥ ५॥

मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत् ।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥ ६॥

करन्यासं ततः कुर्याद्द्वादशाक्षरविद्यया ।
प्रणवादियकारान्तमण्गुल्यण्गुष्ठपर्वसु ॥ ७॥

न्यसेद्धृदय ॐकारं विकारमनु मूर्धनि ।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत् ॥ ८॥

वेकारं नेत्रयोर्युण्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु ।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद्बुधः ॥ ९॥

सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् ।
ॐ विष्णवे नम इति ॥ १०॥

आत्मानं परमं ध्यायेद्ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम् ।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥ ११॥

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां
न्यस्ताण्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे ।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-
पाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ॥ १२॥

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-
र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् ।
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्
त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥ १३॥

दुर्गेश्वतव्याजिमुखादिषु प्रभुः
पायन्नृसिंहोऽसूरुथपरिः
विमुञ्चतो यस्य महत्तहासं
दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥ १४॥

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः ।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे
सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ॥ १५॥

मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादा-
न्नारायणः पातु नरश्च हासात् ।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः
पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥ १६॥

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-
द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् ।
देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्
कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥ १७॥

धन्वन्तरिर्भगवान्पत्वपथ्यत्
दद्वन्द्वद्भयदृषभो निर्जितात्मा
यज्ञश्च लोकादवतञ्जनान्तात्
बलो गणत्क्रोधवाषाधिन्द्रः ॥ १८॥

द्वैपायनो भगवानप्रबोधा-
द्बुद्धस्तु पाखण्डगणप्रमादात् ।
कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु
धर्मावनायोरुकृतावतारः ॥ १९॥

मां केशवो गदया प्रातरव्या-
द्गोविन्द आसण्गवमात्तवेणुः ।
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्ति-
र्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ॥ २०॥

देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा
सायं त्रिधामावतु माधवो माम् ।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे
निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ॥ २१॥

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः
प्रत्युष ईशोऽसिधरो जनार्दनः ।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते
विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ॥ २२॥

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि
भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम् ।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु
कक्षं यथा वातसखो हुताशः ॥ २३॥

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिण्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि ।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-
भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ॥ २४॥

त्वं यातुधान प्रमथ प्रेतमातृ-
पिशाचविप्राग्रहघोरदृष्टीं
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो
भीमस्वनोऽरेहृदयानि कम्पयन् ॥ २५॥

त्वं तिग्मधाराशिवरारिसैन्य-
मिशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि
चक्षौंषि चर्मञ्चत्चन्द्र छादय
द्वेषमघोनां हर पापचक्षुषम् ॥ २६॥

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत्केतुभ्यो नृभ्य एव च ।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य वा ॥ २७ ॥

सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात् ।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः ॥ २८॥

गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः ।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ॥ २९ ॥

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः ।
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान्पान्तु पार्षदभूषणाः ॥ ३०॥

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१॥

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम् ।
भूषणायुधलिण्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३२॥

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः ।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३३॥

विदिक्षु दिक्षौरध्वमधः समन्ता-
दन्तर्बिर्भगवाननरसिंहः
प्रहपायनलोकभ्यं स्वेनेन
सत्जेसा जीतसमस्ततेजाः ॥ ३४॥

मेघवनिदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसूरुथपान ॥ ३५॥

एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।
पदा वा संस्पृशेत्सद्यः साध्वसात्स विमुच्यते ॥ ३६॥

न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३७॥

इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन् द्विजः ।
योगधारणया स्वाण्गं जहौ स मरुधन्वनि ॥ ३८॥

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा ।
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ॥ ३९ ॥

गगनान्न्यपतत्सद्यः सविमानो ह्यवाक्षिराः ।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः ।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ॥ ४०॥

श्रीशुक उवाच ।

य इदं शृणुयात्काले यो धारयति चादृतः ।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ॥ ४१॥

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः ।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् ॥ ४२॥

॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
षष्ठस्कन्धे नारायणवर्मकथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥