Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi: माँ लक्ष्मी चालीसा हिंदी में

माता लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए लक्ष्मी चालीसा [Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi] का पाठ किया जाता है| माना जाता है कि माता लक्ष्मी की पूजा करने के पश्चात लक्ष्मी चालीसा [Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi] का पाठ तथा लक्ष्मी जी की आरती की जाती है| धार्मिक ग्रंथों की मान्यताओं के अनुसार ही इस व्रत तथा त्योहारों के अलावा भी सुबह – शाम माता लक्ष्मी चालीसा का पाठ करना चाहिए|

यदि प्रतिदिन लक्ष्मी चालीसा [Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi] का पाठ किया जाए तो यह जातक के बहुत ही लाभदायक हो सकता है| लक्ष्मी चालीसा [Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi] का पाठ दिवाली के पावन त्यौहार पर करना बहुत ही शुभ माना जाता है|

Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi

शुक्रवार का दिन भी लक्ष्मी माता को समर्पित किया गया है| इस कारण लक्ष्मी चालीसा का पाठ प्रत्येक शुक्रवार के दिन भी किया जा सकता है| लक्ष्मी चालीसा का नियमित रूप से पाठ करने से माँ लक्ष्मी अपने सभी भक्तों के दुख व दरिद्रता को दूर कर देती है| इस लक्ष्मी चालीसा [Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi] की रचना कवि प्रदीप जी के द्वारा की गई थी|

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Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi – माँ लक्ष्मी चालीसा पाठ हिंदी में

|| लक्ष्मी चालीसा ||

|| सोरठा ||

यही मोर अरदास , हाथ जोड़ विनती करुं
सब विधि करौ सुवास, जय जननि जगदंबिका ॥
सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही ,ज्ञान बुद्धि विघा दो मोही ॥

|| चौपाई ||

सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही।
ज्ञान बुद्धि विघा दो मोही ॥

तुम समान नहिं कोई उपकारी ।
सब विधि पुरवहु आस हमारी ॥

जय जय जगत जननि जगदम्बा ।
सबकी तुम ही हो अवलम्बा ॥

तुम ही हो सब घट घट वासी ।
विनती यही हमारी खासी ॥

जगजननी जय सिन्धु कुमारी ।
दीनन की तुम हो हितकारी ॥

विनवौं नित्य तुमहिं महारानी ।
कृपा करौ जग जननि भवानी ॥

केहि विधि स्तुति करौं तिहारी ।
सुधि लीजै अपराध बिसारी ॥

कृपा दृष्टि चितववो मम ओरी ।
जगजननी विनती सुन मोरी ॥

ज्ञान बुद्घि जय सुख की दाता ।
संकट हरो हमारी माता ॥

क्षीरसिन्धु जब विष्णु मथायो ।
चौदह रत्न सिन्धु में पायो ॥

चौदह रत्न में तुम सुखरासी ।
सेवा कियो प्रभु बनि दासी ॥

जब जब जन्म जहां प्रभु लीन्हा ।
रुप बदल तहं सेवा कीन्हा ॥

स्वयं विष्णु जब नर तनु धारा ।
लीन्हेउ अवधपुरी अवतारा ॥

तब तुम प्रगट जनकपुर माहीं ।
सेवा कियो हृदय पुलकाहीं ॥

अपनाया तोहि अन्तर्यामी ।
विश्व विदित त्रिभुवन की स्वामी ॥

तुम सम प्रबल शक्ति नहीं आनी ।
कहं लौ महिमा कहौं बखानी ॥

मन क्रम वचन करै सेवकाई ।
मन इच्छित वांछित फल पाई ॥

तजि छल कपट और चतुराई ।
पूजहिं विविध भांति मनलाई ॥

और हाल मैं कहौं बुझाई ।
जो यह पाठ करै मन लाई ॥

ताको कोई कष्ट नोई ।
मन इच्छित पावै फल सोई ॥

त्राहि त्राहि जय दुःख निवारिणि ।
त्रिविध ताप भव बंधन हारिणी ॥

जो चालीसा पढ़ै पढ़ावै ।
ध्यान लगाकर सुनै सुनावै ॥

ताकौ कोई न रोग सतावै ।
पुत्र आदि धन सम्पत्ति पावै ॥

पुत्रहीन अरु संपति हीना ।
अन्ध बधिर कोढ़ी अति दीना ॥

विप्र बोलाय कै पाठ करावै ।
शंका दिल में कभी न लावै ॥

पाठ करावै दिन चालीसा ।
ता पर कृपा करैं गौरीसा ॥

सुख सम्पत्ति बहुत सी पावै ।
कमी नहीं काहू की आवै ॥

बारह मास करै जो पूजा ।
तेहि सम धन्य और नहिं दूजा ॥

प्रतिदिन पाठ करै मन माही ।
उन सम कोइ जग में कहुं नाहीं ॥

बहुविधि क्या मैं करौं बड़ाई ।
लेय परीक्षा ध्यान लगाई ॥

करि विश्वास करै व्रत नेमा ।
होय सिद्घ उपजै उर प्रेमा ॥

जय जय जय लक्ष्मी भवानी ।
सब में व्यापित हो गुण खानी ॥

तुम्हरो तेज प्रबल जग माहीं ।
तुम सम कोउ दयालु कहुं नाहिं ॥

मोहि अनाथ की सुधि अब लीजै ।
संकट काटि भक्ति मोहि दीजै ॥

भूल चूक करि क्षमा हमारी ।
दर्शन दजै दशा निहारी ॥

बिन दर्शन व्याकुल अधिकारी ।
तुमहि अछत दुःख सहते भारी ॥

नहिं मोहिं ज्ञान बुद्घि है तन में ।
सब जानत हो अपने मन में ॥

रुप चतुर्भुज करके धारण ।
कष्ट मोर अब करहु निवारण ॥

केहि प्रकार मैं करौं बड़ाई ।
ज्ञान बुद्धि मोहि नहिं अधिकाई ॥

॥ दोहा॥

त्राहि त्राहि दुख हारिणी,
हरो वेगि सब त्रास ।
जयति जयति जय लक्ष्मी,
करो शत्रु को नाश ॥

रामदास धरि ध्यान नित,
विनय करत कर जोर ।
मातु लक्ष्मी दास पर,
करहु दया की कोर ॥

Lakshmi Chalisa Lyrics in Hindi

Lakshmi Chalisa Lyrics in English – सिन्धु सुता मैं सुमिरौ तोही

|| Lakshmi Chalisa ||

|| Sortha ||

Yahi mor ardaas,
Haath jod vinati karun |
Sab vidhi karau suvaas,
Jai Janani Jagdambika ||

|| Chaupai ||

Sindhu suta main sumirau tohi |
Gyaan buddhi vigya do mohi ||

Tum samaan nahin koi upkaari |
Sab vidhi purvahu aas hamaari ||

Jai Jai Jagat Janani Jagdamba |
Sabki tum hi ho avalamba ||

Tum hi ho sab ghat ghat vaasi |
Vinati yahi hamaari khaasi ||

Jagjanni jai Sindhu kumari |
Deenan ki tum ho hitkaari ||

Vinavau nitya tumhi maharani |
Kripa karau Jag Janani Bhavani ||

Kehi vidhi stuti karau tihari |
Sudhi lije apradh bisaari ||

Kripa drishti Chitvavo mam oree |
Jagjanni vinati sun mori ||

Gyaan buddhi jai sukh ki daata |
Sankat haro hamaari mata ||

Ksheersindhu jab Vishnu Mathaayo |
Chaudah ratna Sindhu mein Paayo ||

Chaudah ratna mein tum sukhraasi |
Seva kiyo Prabhu bani daasi ||

Jab jab janm jahaan Prabhu leenha |
Roop badal tahan seva keenha ||

Swayam Vishnu jab nar tanu dhaara |
Leenha Avadhapuri avataara ||

Tab tum pragat Janakpuri maahi |
Seva kiyo hriday pulakaahi ||

Apnaaya tohi antaryami |
Vishwa Vidit tribhuvan ki swami ||

Tum sam prabal shakti nahin aani |
Kahan lau mahima kahoon bakhaani ||

Man kram vachan karai sevakaai |
Man ichchhit vaanchhit phal paai ||

Taji chhal kapat aur chaturai |
Poojhin vividh bhaanti manlaai ||

Aur haal main kahoon bujhaai |
Jo yah paath karai man laai ||

Taako koi kasht noee |
Man ichchhit paavai phal soee ||

Traahi traahi jai dukh nivaarini |
Trividh taap bhav bandhan haarini ||

Jo chaaleesaa padhai padhaavai |
Dhyaan lagaakar sunai sunaavai ||

Taakau koi na roga sataavai |
Putra aadi dhan sampatti paavai ||

Putraheen aru sampatti heena |
Andha badhir kodhi ati deena ||

Vipra bolaaye kai paath karaavai |
Shanka dil mein kabhi na laavai ||

Paath karaavai din chaaleesaa |
Ta par kripa karai Gaurisa ||

Sukh sampatti bahut si paavai |
Kami nahin kaahoon ki aavai ||

Baarah maas karai jo pooja |
Te hi sam dhany aur nahin dooja ||

Pratidin paath karai man maahi |
Un sam koi jag mein kahun naahi ||

Bahuvidhi kya main karau badaai |
Ley pariksha dhyaan lagaai ||

Kari Vishwas karai vrata nema |
Hoy siddh upjai ur prema ||

Jai jai jai Lakshmi Bhavani |
Sab mein Vyapit ho gun khani ||

Tumharo tej prabal jag maahi |
Tum sam kou dayalu kahun naahin ||

Moi anaath ki sudhi ab lijai |
Sankat kaati bhakti moi dijai ||

Bhool chook kari kshama hamaari |
Darshan dajai dasha nihaari ||

Bin darshan vyakul adhikaari |
Tumhi achhat dukh sahate bhaari ||

Nahin moi gyaan buddhi hai tan mein |
Sab jaanat ho apne man mein ||

Roop chaturbhuj karke dharaan |
Kasht mor ab karahu nivaaran ||

Kehi prakaar main karau badaai |
Gyaan buddhi moi nahin adhikai ||

|| Doha ||

Traahi traahi dukh haarinii,
Haro vegi sab traas |
Jayati jayati jai Lakshmi,
Karo shatru ko naash ||

Ramdas dhari dhyaan nit,
Vinay karat kar jor |
Maatu Lakshmi daas par,
Karahu daya ki kor ||

Kali Chalisa Lyrics in Hindi: माँ काली चालीसा

माँ काली चालीसा (Kali Chalisa) का पाठ करने से भक्तों को काली माता का आशीर्वाद प्राप्त होता है| काली चालीसा (Kali Chalisa) का पाठ घर में सुख शांति बनाए रखने के लिए किया जाता है| इस काली चालीसा (Kali Chalisa) का जाप माँ काली को प्रसन्न करने के लिए प्रतिदिन भी किया जाता है|

अधिकांश काली माता की पूजा दीपावली के समय मुख्य राज्य – कोलकाता, पश्चिम बंगाल, असम, झारखण्ड और उड़ीसा में अमावस्या के दिन की जाती है| इस दिन काली माँ की पूजा करने के पश्चात काली चालीसा (Kali Chalisa) तथा काली माता की आरती का जाप करना बहुत ही लाभकारी माना गया है तो जानते है माँ काली चालीसा (Kali Chalisa) के लिरिक्स के बारे में|

Kali Chalisa Lyrics in Hindi

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माँ काली चालीसा लिरिक्स हिंदी में – Kali Chalisa Lyrics in Hindi

|| काली चालीसा ||

॥दोहा॥

जयकाली कलिमलहरण,
महिमा अगम अपार ।
महिष मर्दिनी कालिका,
देहु अभय अपार ॥

॥ चौपाई ॥

अरि मद मान मिटावन हारी ।
मुण्डमाल गल सोहत प्यारी ॥

अष्टभुजी सुखदायक माता ।
दुष्टदलन जग में विख्याता ॥

भाल विशाल मुकुट छवि छाजै ।
कर में शीश शत्रु का साजै ॥

दूजे हाथ लिए मधु प्याला ।
हाथ तीसरे सोहत भाला ॥

चौथे खप्पर खड्ग कर पांचे ।
छठे त्रिशूल शत्रु बल जांचे ॥

सप्तम करदमकत असि प्यारी ।
शोभा अद्भुत मात तुम्हारी ॥

अष्टम कर भक्तन वर दाता ।
जग मनहरण रूप ये माता ॥

भक्तन में अनुरक्त भवानी ।
निशदिन रटें ॠषी-मुनि ज्ञानी ॥

महशक्ति अति प्रबल पुनीता ।
तू ही काली तू ही सीता ॥

पतित तारिणी हे जग पालक ।
कल्याणी पापी कुल घालक ॥

शेष सुरेश न पावत पारा ।
गौरी रूप धर्यो इक बारा ॥

तुम समान दाता नहिं दूजा ।
विधिवत करें भक्तजन पूजा ॥

रूप भयंकर जब तुम धारा ।
दुष्टदलन कीन्हेहु संहारा ॥

नाम अनेकन मात तुम्हारे ।
भक्तजनों के संकट टारे ॥

कलि के कष्ट कलेशन हरनी ।
भव भय मोचन मंगल करनी ॥

महिमा अगम वेद यश गावैं ।
नारद शारद पार न पावैं ॥

भू पर भार बढ्यौ जब भारी ।
तब तब तुम प्रकटीं महतारी ॥

आदि अनादि अभय वरदाता ।
विश्वविदित भव संकट त्राता ॥

कुसमय नाम तुम्हारौ लीन्हा ।
उसको सदा अभय वर दीन्हा ॥

ध्यान धरें श्रुति शेष सुरेशा ।
काल रूप लखि तुमरो भेषा ॥

कलुआ भैंरों संग तुम्हारे ।
अरि हित रूप भयानक धारे ॥

सेवक लांगुर रहत अगारी ।
चौसठ जोगन आज्ञाकारी ॥

त्रेता में रघुवर हित आई ।
दशकंधर की सैन नसाई ॥

खेला रण का खेल निराला ।
भरा मांस-मज्जा से प्याला ॥

रौद्र रूप लखि दानव भागे ।
कियौ गवन भवन निज त्यागे ॥

तब ऐसौ तामस चढ़ आयो ।
स्वजन विजन को भेद भुलायो ॥

ये बालक लखि शंकर आए ।
राह रोक चरनन में धाए ॥

तब मुख जीभ निकर जो आई ।
यही रूप प्रचलित है माई ॥

बाढ्यो महिषासुर मद भारी ।
पीड़ित किए सकल नर-नारी ॥

करूण पुकार सुनी भक्तन की ।
पीर मिटावन हित जन-जन की ॥

तब प्रगटी निज सैन समेता ।
नाम पड़ा मां महिष विजेता ॥

शुंभ निशुंभ हने छन माहीं ।
तुम सम जग दूसर कोउ नाहीं ॥

मान मथनहारी खल दल के ।
सदा सहायक भक्त विकल के ॥

दीन विहीन करैं नित सेवा ।
पावैं मनवांछित फल मेवा ॥

संकट में जो सुमिरन करहीं ।
उनके कष्ट मातु तुम हरहीं ॥

प्रेम सहित जो कीरति गावैं ।
भव बन्धन सों मुक्ती पावैं ॥

काली चालीसा जो पढ़हीं ।
स्वर्गलोक बिनु बंधन चढ़हीं ॥

दया दृष्टि हेरौ जगदम्बा ।
केहि कारण मां कियौ विलम्बा ॥

करहु मातु भक्तन रखवाली ।
जयति जयति काली कंकाली ॥

सेवक दीन अनाथ अनारी ।
भक्तिभाव युति शरण तुम्हारी ॥

॥दोहा॥

प्रेम सहित जो करे,
काली चालीसा पाठ ।
तिनकी पूरन कामना,
होय सकल जग ठाठ ॥

Kali Chalisa Lyrics in Hindi

Kali Chalisa Lyrics in English | अरि मद मान मिटावन हारी

|| Kali Chalisa ||

॥ Doha ॥

Jayakali Kalimalharan,
Mahima agam apaar.
Mahish mardini KaliKa,
Dehu abhay apaar॥

॥ Chaupai ॥

Ari mad maan mitavan haari.
Mundmaal gal sohat pyaari॥

Ashtabhujee sukhadaayak maata.
Dushtdaln jag mein vikhyata॥

Bhaal vishaal mukut chhav chhajai.
Kar mein sheesh shatru ka sajai॥

Dooje haath liye madhu pyaala.
Haath teesre sohat bhaala॥

Chauthe khappar khadag kar paanche.
Chhathe trishool shatru bal jaanche॥

Saptam karadamkat asi pyaari.
Shobha adbhut maat tumhaari॥

Ashtam kar bhaktan var daata.
Jag manharan roop ye maata॥

Bhaktan mein anurakt bhawani.
Nishadin raten rishi-muni gyaani॥

Mahashakti ati prabal punieta.
Tu hi Kali, tu hi Seeta॥

Patit taarinee, hey jag paalak.
Kalyaani paapi kul ghaalak॥

Shesh suresh na paavat paar.
Gauri roop Dharyo ik baara॥

Tum samaan daata nahin dooja.
Vidhivat karen bhaktajan pooja॥

Roop bhayankar jab tum dhaara.
Dushtdalan keenhehu samhaara॥

Naam anekan maat tumhaare.
Bhaktajon ke sankat taare॥

Kali ke kasht kaleshan harani.
Bhav bhay mochan mangal karani॥

Mahima agam ved yash gaavain.
Narad Shaarad paar na paavain॥

Bhoo par bhaar badhyau jab bhaari.
Tab tab tum prakateen mahataari॥

Aadi anaadi abhay vardaata.
Vishvavidit bhav sankat traata॥

Kusamay naam tumhaaro leenha.
Usko sada abhay var deenha॥

Dhyaan Dharen shruti shesh suresha.
Kaala roop lakhi tumaro bhesh॥

Kalua bhainron sang tumhaare.
Ari hit roop bhayaanak dhaare॥

Sevak laangur rahta agaari.
Chausath jogna aajnyaakaari॥

Treta mein Raghuvir hit Aayi.
Dashakandhar ki sain nasaai॥

Khela ran ka khel niraala.
Bhara maans-majja se pyaala॥

Roudra roop lakhi daanav bhaage.
Kiyau gavan bhavan nij tyage॥

Tab aisau taamas chhad aayo.
Swajan vijan ko bhed bhulaayo॥

Ye balak lakhi Shankar aaye.
Raah rok charanan mein dhaaye॥

Tab mukh jeebh nikar jo aayi.
Yahi roop prachalit hai maai॥

Baadhyo Mahishasur mad Bhaari.
Peedit kiye sakal nar-naari॥

Karun pukaar suni bhakton ki.
Peer mitaavan hit jan-jan ki॥

Tab pragati nij sain sameta.
Naam pada maan Mahish vijeta॥

Shumbh Nishumbh hane chhan maahi.
Tum sam jag doosar kou naahi॥

Maan mathanhaari khal dal ke.
Sada sahaayak bhakt vikal ke॥

Deen viheen karain nit seva.
Paavain manvanchhit phal meva॥

Sankat mein jo sumiran karahi.
Unke kasht maatu tum harahi॥

Prem sahit jo keerati gaavain.
Bhav bandhan so mukti paavain॥

Kali chalisa jo padhahi.
Swargalok binu bandhan chadhahi॥

Daya drishti heru jagadamba.
Kehi kaaran maan kiyo vilambha॥

Karahu maatu bhaktan rakhwali.
Jayati jayati Kali Kankaali॥

Sevak deen anaath anaari.
Bhaktibhav yuti sharan tumhaari॥

॥ Doha ॥

Prem sahit jo kare,
Kali chalisa path.
Tin ki pooran kaamna,
Hoye sakal jag thaat॥

Bhagavad Gita Chapter 3 in Hindi: भगवद गीता तृतीय अध्याय अर्थ सहित

भगवद गीता तृतीय अध्याय: क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे|

जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता तृतीय अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 3) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता तृतीय अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 3) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

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Chapter 3 – कर्मयोगः (Yoga Of Action)

अर्जुन उवाच 
ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम्॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे जनार्दन ! यदि आप कर्म की अपेक्षा ज्ञान को श्रेष्ठ मानते है तो फिर हे केशव ! मुझे (इस युद्धरुपी) भयंकर कर्म में क्यों लगाते है? आप मिले – जुले हुए वचनों से मेरी बुद्धि को मानो मोहित सा कर रहे है इसलिए उस एक बात को निश्चित करके कहिये जिससे मैं कल्याण को प्राप्त हो जाऊं|

English Meaning – Arjun said – O Janardan! If you consider knowledge better than action, then O Keshav! Why do you involve me in this terrible act (like war)? It seems as if you are mesmerising my mind with mixed words, so please tell me one thing clearly so that I can attain welfare.

भगवद गीता तृतीय अध्याय

श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ।
ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्॥
न कर्मणामनारम्भान् नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति॥

हिंदी अर्थ – भगवान श्रीकृष्ण बोले – हे निष्पाप ! इस लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गई है| उनमे से सांख्य योगियों की निष्ठा तो ज्ञान योग और योगियों की निष्ठा कर्मयोग से होती है| मनुष्य न तो कर्मों का आरंभ किए बिना निष्कर्मता को या योगनिष्ठा को प्राप्त होता है और न कर्मों के केवल त्यागमात्र से सिद्धि को ही प्राप्त होता है|

English Meaning – Lord Shri Krishna said – O sinless one! There are two types of loyalty in this world that I have mentioned earlier. Among them, Sankhya Yogis have faith in Gyan Yoga, and Yogis have faith in Karma Yoga. Man neither attains Nirshma (non-action) or devotion to yoga without starting the deeds nor does he attain success merely by renunciation of deeds.


न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥
कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥

हिंदी अर्थ – नि:संदेह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति से उत्पन्न गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य होता है, जो मनुष्य कर्मेन्द्रियों को हठपूर्वक रोककर मन से उन इन्द्रियों के विषयों का चिंतन करता रहता है, वह असत्य आचरण वाला कहा जाता है|

English Meaning – Undoubtedly, no human being remains without doing any work, even for a moment at any time, because the entire human community is bound to do the work under the influence of qualities arising from nature, which man, by stubbornly restraining the senses of action, stops thinking about the objects of those senses with his mind. If he continues to do so, he is said to be of false conduct.


यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥

हिंदी अर्थ – किन्तु हे अर्जुन ! जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ समस्त इन्द्रियों द्वारा कर्मयोग का आचरण करता है, वह विशिष्ट है| तुम शास्त्र – विहित कर्मों को करो क्योंकि कर्म न करने की अपेक्षा कर्म करना ही श्रेष्ठ है तथा कर्म न करने से तो तुम्हारा शरीर – निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा|

English Meaning – But O Arjun! The man who controls the senses from the mind and becomes detached and practices Karmayoga through all the senses is special. You should perform the rituals prescribed in the scriptures because doing the work is better than not doing the work and by not doing the work, even your physical subsistence will not be successful.

भगवद गीता तृतीय अध्याय

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक्॥

हिंदी अर्थ – यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों से अतिरिक्त दुसरे कर्मों में लगा हुआ ही यह मनुष्य समुदाय कर्मों से बंधता है| इसलिए हे अर्जुन ! तुम आसक्ति – रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही कर्म करो| प्रजापति ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजाओं को रचकर उनसे कहा कि तुम लोग इस यज्ञ द्वारा वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम लोगों को इच्छित भोग प्रदान करने वाला हो|

English Meaning – It is only when a human being is engaged in activities other than the activities performed for the sake of Yagya that he gets bound by the community’s activities. Therefore O Arjun! You should be free from attachment and work only for the sake of that Yagya. At the beginning of the Kalpa, Prajapati Brahma created the people along with Yagya and told them that you people should attain prosperity through this Yagya and this Yagya should provide them the desired enjoyment.


देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥

हिंदी अर्थ – तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की आराधना करो और वे देवता तुम लोगों का पोषण करे| इस प्रकार एक – दुसरे को संतुष्ट करते हुए तुम लोग परम कल्याण को प्राप्त हो जाओगे| यज्ञ द्वारा पूजित हुए देवता तुम लोगों को,निश्चित रूप में इच्छित भोग देते रहेंगे| इस प्रकार उन देवताओं द्वारा दिए हुए भोगों को जो पुरुष उनको अर्पण किये बिना स्वयं भोगता है, वह चोर ही है|

English Meaning – You people should worship the gods through this yagya and may those gods nourish you. By satisfying each other in this way, you will attain ultimate welfare. The Gods worshipped through Yagya will definitely continue to give you the desired offerings. In this way, the person who enjoys the offerings given by the gods without offering them to them is a thief.


यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः।
यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥

हिंदी अर्थ – यज्ञ से बचे हुए अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते है और जो लोग केवल अपने लिए अन्न पकाते है, वे तो पाप को ही खाते है| सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते है, अन्न वर्षा से उत्पन्न होता है, वर्षा यज्ञ से होती है और यज्ञ विहित कर्मों से उत्पन्न होने वाला है|

English Meaning – The noblemen who eat the food left over from the Yagya become free from all sins and those who cook food only for themselves, eat only sin. All living beings are born from food, food is born from rain, rain is born from Yagya and Yagya is born from prescribed actions.

भगवद गीता तृतीय अध्याय

कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्।
तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥

हिंदी अर्थ – कर्मसमुदाय को तुम वेद से और वेद को अविनाशी परमात्मा से उत्पन्न हुआ जानो| इसलिए सर्वव्यापी परम अक्षर परमात्मा सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है| हे पार्थ ! जो पुरुष इस प्रकार परंपरा से प्रचलित सृष्टीचक्र के अनुकूल कार्य नहीं करता, वह इन्द्रियों द्वारा भोगों में रमण करने वाला पापायु पुरुष व्यर्थ ही जीता है|

English Meaning – Know that the community of actions originated from the Vedas and the Vedas from the immortal God. Therefore, the omnipresent Supreme Personality of Godhead is always present in Yagya. Hey Parth! The man who does not act in accordance with the prevailing worldly cycle in this way is a sinful man who enjoys the pleasures of the senses and lives in vain.


यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥
नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन।
न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥

हिंदी अर्थ – परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही संतुष्ट है, उसके लिए कोई भी कर्तव्य नहीं है| उस महापुरुष का इस विश्व में न तो कर्म करने से कोई प्रयोजन रहता है और न कर्मों के न करने से ही| समस्त प्राणियों से भी उसका बिल्कुल भी स्वार्थ का संबंध नहीं रहता|

English Meaning – But the person who rejoices in the soul, is satisfied in the soul and is satisfied in the soul, there is no duty for him. That great man has no purpose in this world either by doing deeds or by not doing deeds. He has no selfish relationship at all with all living beings.


तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर।
असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥
कर्मणैव हि संसिद्धिमा स्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥

हिंदी अर्थ – इसलिए तुम निरंतर आसक्ति से रहित होकर सदा कर्तव्य – कर्म को भलीभांति करो क्योंकि आसक्ति से रहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्मा को प्राप्त हो जाता है| जनक आदि भी आसक्ति रहित कर्म द्वारा ही परम सिद्धि को प्राप्त हुए थे, इसलिए लोकसंग्रह को देखते हुए भी तुम्हे कर्म करना ही उचित है|

English Meaning – Therefore, you should always be free from attachment and always do your duty well, because by doing work free from attachment, a person attains God. Janak etc. also attained supreme success through action without attachment, hence it is appropriate for you to perform the action even after considering the gathering of people.


यद्यदाचरति श्रेष्ठस् तत्त देवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किंचन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥

हिंदी अर्थ – श्रेष्ठ पुरुष जैसा – जैसा आचरण करता है, अन्य पुरुष भी वैसा – वैसा ही आचरण करते है| वह जो कुछ प्रमाण कर देता है, समस्त मनुष्य – समुदाय उसी के अनुसार बरतने लग जाता है| हे अर्जुन ! मेरा इन तीनों लोकों में न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई भी प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्त है, तो भी मैं कर्म में ही बरतता हूँ|

English Meaning – Whatever a great man behaves, other men also behave in the same way. Whatever he proves, the entire human community starts acting accordingly. Hey Arjun! I neither have any duty in these three worlds nor do I have any attainable thing, yet I continue to do my work only.


यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
संकरस्य च कर्ता स्यामु पहन्यामिमाः प्रजाः॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि हे पार्थ ! यदि मैं सावधान होकर कर्मों में न बरतूं तो बड़ी हानि हो जाए क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते है| इसलिए यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्ट – भ्रष्ट हो जाएँ और मैं संकरता का करने वाला होऊं तथा इस समस्त प्रजा को नष्ट करने वाला बनूँ |

English Meaning – Because O Parth! If I am not careful in my actions, I may suffer a great loss because people follow my path in every way. Therefore, if I do not do the work then all these human beings will get destroyed and corrupted and I will become the one who causes hybridity and will become the one who destroys all these people.


सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्त श्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम्॥
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्तः समाचरन्॥

हिंदी अर्थ – हे भारत ! कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते है, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे| ज्ञानी पुरुष शास्त्रविहित कर्मों में आसक्ति वाले अज्ञानियों की बुद्धि को भ्रमित न करे, किन्तु स्वयं शास्त्रविहित समस्त कर्म भली भांति करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाए|

English Meaning – O Bharat! The way ignorant people who are attached to work do their work, a scholar without attachment should also work in the same way if he wants to collect money. A knowledgeable person should not mislead the minds of the ignorant people who are attached to the rituals prescribed by the scriptures, but by doing all the rituals prescribed by the scriptures himself, he should make them do the same.


प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥
तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥

हिंदी अर्थ – सम्पूर्ण कर्म सब प्रकार से प्रकृति के गुणों द्वारा किए जाते है, तो भी अहंकार से मोहित अंत: करण वाला अज्ञानी ‘मैं कर्ता हूँ’, ऐसा मानता है| परन्तु हे महाबाहो ! गुण विभाग और कर्म विभाग के तत्व को जानने वाला ज्ञान योगी सम्पूर्ण गुण ही गुणों में बरत रहे है, ऐसा समझकर उनमे आसक्त नहीं होता|

English Meaning – All actions are performed in all ways by the modes of nature, yet an ignorant person with a conscience deluded by ego believes, ‘I am the doer’. But oh mighty one! A Gyan Yogi, who knows the principles of Guna-division and Karma-division, does not get attached to them considering that they are using all the qualities in the Gunas.


प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥

हिंदी अर्थ – प्रकृति के गुणों से अत्यंत मोहित हुए मनुष्य गुणों में और कर्मों में आसक्त रहते है, उन पूर्णतया न समझने वाले मंदबुद्धियों को ज्ञानी विचलित न करे| मुझ अन्तर्यामी परमात्मा में लगे हुए द्वारा सम्पूर्ण कर्मों को मुझमे अर्पण करके आशारहित, ममतारहित और सन्तापरहित होकर तुम युद्ध करो|

English Meaning – People who are extremely fascinated by the qualities of nature remain engrossed in its qualities and actions; the wise should not disturb those dull-witted people who do not understand completely. By being engaged in the inner God, you should surrender all your deeds to me and fight without hope, without affection and without sorrow.

भगवद गीता तृतीय अध्याय

ये मे मतमिदं नित्यम नुतिष्ठन्ति मानवाः।
श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम्।
सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥

हिंदी अर्थ – जो कोई मनुष्य दोषदृष्टि से रहित और श्रद्धायुक्त होकर मेरे इस मत का सदा अनुसरण करते है, वे भी सम्पूर्ण कर्मों से छूट जाते है| परन्तु जो मनुष्य मुझमे दोषारोपण करते हुए मेरे इस मत के अनुसार नहीं चलते है, उन मूर्खो को तुम सभी ज्ञानों में मोहित और नष्ट हुए ही समझो|

English Meaning – Any person who always follows this belief of mine and is free from evil thoughts and has faith, also becomes free from all the karmas. But those people who blame me and do not follow my opinion, consider them as fools who have been deluded and destroyed in all knowledge.


सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि।
प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥

हिंदी अर्थ – सभी प्राणी और ज्ञानी भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करते है और प्रकृति को ही प्राप्त होते है फिर इसमें किसी का हठ क्या करेगा| प्रत्येक इन्द्रिय और उसके विषय में राग और द्वेष छिपे हुए स्थित है| मनुष्य को उन दोनों के वश में नहीं होना चाहिए क्योंकि वे दोनों ही इसके कल्याण मार्ग में विघ्न करने वाले महान शत्रु है|

English Meaning – All living beings and knowledgeable people also try according to their nature and attain only nature, then what will anyone’s stubbornness do in this? Attachment and aversion are hidden in every sense organ and its object. Man should not be under the control of both of them because both of them are great enemies who create obstacles in the path of his welfare.


श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥
अर्जुन उवाच
अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥

हिंदी अर्थ – अच्छी प्रकार आचरण में लाए हुए दुसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म अति उत्तम है| अपने धर्म में तो मरना भी कल्याणकारक है और दुसरे का धर्म भय को देने वाला है| अर्जुन बोले – हे कृष्ण ! तो फिर यह मनुष्य स्वयं न चाहता हुआ भी बलात लगाए हुए की भांति किससे प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है|

English Meaning – Better one’s own duty, even if it is devoid of the qualities of another’s duty, is the best. Even dying in one’s own duty is beneficial, while someone else’s duty gives fear. Arjun said – O Krishna! Then, this man himself commits sin even though he does not want to, as if he is being forced to commit sin.


श्रीभगवानुवाच काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥
धूमेनाव्रियते वह्नि र्यथादर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस् तथा तेनेदमावृतम्॥

हिंदी अर्थ – श्रीकृष्ण बोले – रजोगुण से उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है| यह बहुत खाने वाला अर्थात् भोगो से कभी न अघानेवाला और बड़ा पापी है| इसको ही तू इस विषय में वैरी जान| जिस प्रकार धुंए से अग्नि और मेल से दर्पण ढँका जाता है तथा जिस प्रकार गर्भ भ्रूण से ढँका रहता है, वैसे ही उस काम द्वारा यह ज्ञान ढँका रहता है|

English Meaning – Shri Krishna said – This lust born out of passion is anger. He eats a lot i.e. he never stops eating and is a big sinner. You know him as your enemy in this matter. Just as fire is covered by smoke and a mirror by mail and just as the womb is covered by the fetus, similarly this knowledge is covered by that work.

भगवद गीता तृतीय अध्याय

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥
इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥

हिंदी अर्थ – और हे अर्जुन ! ज्ञानियों के नित्य वैरी इस अग्नि के समान कभी न पूर्ण होने वाले काम द्वारा मनुष्य का ज्ञान ढँका हुआ है| इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि – ये सब इसके वासस्थान कहे जाते है| यह काम इन मन, बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके जीवात्मा को मोहित करता है|

English Meaning – And O Arjun! Man’s knowledge is covered by this never-ending work, like fire, which is always the enemy of the wise. Senses, mind and intellect – all these are called its abode. This work fascinates the soul by covering knowledge through the mind, intellect and senses.


तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥
इन्द्रियाणि पराण्याहु रिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥

हिंदी अर्थ – इसलिए हे अर्जुन ! तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके इस ज्ञान और विज्ञान का नाश करने वाले महान पापी काम को अवश्य ही बलपूर्वक मार डालो| इन्द्रियाँ स्थूल शरीर से श्रेष्ठ है, इन इन्द्रियों से श्रेष्ठ मन है, मन से भी श्रेष्ठ बुद्धि है और जो बुद्धि से भी अत्यंत श्रेष्ठ है, वह आत्मा है|

English Meaning – So O Arjun! You must first control the senses and forcefully kill the great sinful act that is destroying this knowledge and science. The senses are superior to the physical body, the mind is superior to these senses, the intellect is superior to the mind and the one who is extremely superior to the intellect is the soul.


एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥

हिंदी अर्थ – इस प्रकार बुद्धि से श्रेष्ठ आत्मा को जानकर और बुद्धि द्वारा मन को वश में करके हे महाबाहो ! तुम इस कामरूप दुर्जय शत्रु को मार डालो|

English Meaning – In this way, by knowing the soul superior to the intellect and by controlling the mind through the intellect, O mighty-armed one! You kill this formidable enemy of Kamarupa.


भगवद गीता तृतीय अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 2: भगवद गीता अध्याय 2 अर्थ सहित

भगवद गीता अध्याय 2: क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे|

जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता अध्याय 2 (Bhagavad Gita Chapter 2) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी

आज हम भगवद गीता अध्याय 2 (Bhagavad Gita Chapter 2) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

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Chapter 2 – सांख्ययोग (Yoga Of Knowledge)

:- संजय उवाच :-
तं तथा कृपयाविष्टमश्रु पूर्णाकुलेक्षणम्‌।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः॥

हिंदी अर्थ – संजय बोले – तब करुणा – ग्रस्त और आंसुओं से पूर्ण, व्याकुल दृष्टि वाले, शोकयुक्त अर्जुन से भगवान मधुसूदन ने यह वचन कहा |

English Meaning – Sanjay said – Then Lord Madhusudan said these words to Arjun, filled with compassion and tears, with a troubled look and grief stricken.

भगवद गीता अध्याय 2

श्रीभगवानुवाच कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यम्‌ कीर्तिकरमर्जुन॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप॥

हिंदी अर्थ – श्रीभगवान बोले – हे अर्जुन ! तुम्हें इस असमय में यह शोक किस प्रकार हो रहा है? क्योकि न यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग देने वाला है और न ही यश देने वाला है| हे पृथा – पुत्र ! कायरता को मत प्राप्त हो, यह तुम्हें शोभा नहीं देती है| हे शत्रु – तापन ! हृदय की तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ |

English Meaning – Lord Krishna said – O Arjun! How are you feeling this grief at this untimely time? Because it is neither practiced by great men, nor does it give heaven, nor does it give fame. O son of Pritha! Do not succumb to cowardice, it does not suit you. O enemy – heating! Abandon trivial weakness of heart and stand up for battle.


अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्‍ख्ये द्रोणं च मधुसूदन।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन॥
गुरूनहत्वा हि महानुभावा ञ्छ्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान्‌ रुधिरप्रदिग्धान्‌॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे मधुसूदन ! मैं रणभूमि में किस प्रकार बाणों से पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य के विरुद्ध लडूंगा? क्योंकि हे अरिसूदन ! ये दोनों ही पूजनीय है | इन महान गुरुजनों को मारने से इस लोक में, मैं भिक्षा का अन्न खाना अधिक कल्याणकार समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मारकर भी मैं उनके रुधिर से सने हुए अर्थ और कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा |

English Meaning – Arjun said – O Madhusudan! How will I fight with arrows on the battlefield against Grandfather Bhishma and GuruDronacharya? Because O Arisudan! Both of them are worshipable. In this world, I consider it more beneficial to eat alms than to kill these great mentors, because even after killing the mentors, I will still enjoy the pleasures of artha and kamapra, stained with their blood.


न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः॥
कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्‌॥

हिंदी अर्थ – हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना श्रेष्ठ है या न करना और यह भी नहीं जानते कि हम उन्हें जीतेंगे या वह हमको जीतेंगे | जिनको वध करके हम स्वयं जीना नहीं चाहते, वे धृतराष्ट्र के पुत्र ही हमारे सम्मुख खड़े है | कायरता रूप दोष से पराजित स्वभाव वाला और धर्म के विषय में मोहित चित्त, मैं आपसे पूछता हूँ कि जो मेरे लिए निश्चित और कल्याणकारक साधन हो, वह बताइए | मैं आपका शिष्य हूँ, अतः मुझे शिक्षा दीजिये |

English Meaning – We don’t even know whether we should fight or not and we don’t even know whether we will conquer them or they will conquer us. Those whom we do not want to kill and live, those sons of Dhritarashtra are standing in front of us. Having a nature defeated by the vices of cowardice and a mind fascinated by religion, I ask you to tell me the sure and beneficial means for me. I am your disciple, so teach me.

भगवद गीता अध्याय 2

न हि प्रपश्यामि ममापनुद्या द्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्‌।
अवाप्य भूमावसपत्रमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम्‌॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इतिगोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह॥

हिंदी अर्थ – पृथ्वी का सब प्रकार से समृद्ध और निष्कंटक राज्य पाकर या देवताओं का आधिपत्य पाकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ, जो इन्द्रियों को सुखाने वाले मेरे इस शोक को दूर कर सके | संजय बोले – निद्रा को जीतने वाले शत्रु – तापन अर्जुन ने अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण से इस प्रकार कहा | फिर हे गोविन्द ! ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ ऐसा कहकर चुप हो गए |

English Meaning – Even after getting a prosperous and carefree kingdom on earth in every way or having the authority of the gods, I do not see a solution that can remove this grief of mine which dries up the senses. Sanjay said – The one who conquers sleep is the enemy – heat. Arjun said this to the innermost Lord Shri Krishna. Then O Govind! Saying this, ‘I will not fight’, he became silent.


तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदंतमिदं वचः॥
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः॥

हिंदी अर्थ – हे भरतवंशी धृतराष्ट्र ! अंतर्यामी भगवान श्रीकृष्ण दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन से हँसते हुए यह बोले | तुम शोक न करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक करते हो और पंडितों जैसी बात भी करते हो, परन्तु बुद्धिमान लोग जिनके प्राण चले गए है, उनके लिए और जिनके प्राण नहीं गए है उनके लिए शोक नहीं करते है|

English Meaning – O Dhritarashtra of Bharatvanshi! Antaryami Lord Shri Krishna laughingly said this to Arjun while mourning between the two armies. You mourn for people who don’t deserve to mourn and also talk like scholars, but intelligent people don’t mourn for those who have died or those who haven’t.


न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम्‌॥
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्ति र्धीरस्तत्र न मुह्यति॥

हिंदी अर्थ – न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था, तुम नहीं थे अथवा ये राजा लोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे| जैसे इस शरीर में जीवात्मा को कुमार, युवा और वृद्धावस्था प्राप्त होती है, वैसे ही अन्य शरीर की प्राप्ति भी होती है, इस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता है|

English Meaning – Neither is it that I did not exist in any time, you were not there or these kings were not there nor is it that we all will not exist from this onwards. Just as the soul in this body attains virginity, youth and old age, in the same way it attains another body, a patient person is not deluded in this matter.

भगवद गीता अध्याय 2

मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्या स्तांस्तितिक्षस्व भारत॥
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥

हिंदी अर्थ – हे कुंतीपुत्र ! सर्दी – गर्मी और सुख – दुःख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग तो उत्पत्ति – विनाशशील और अनित्य है, इसलिए हे भारत ! तुम उनको सहन करो| क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख – सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य हो जाता है|

English Meaning – O son of Kunti! The combinations of senses and objects that give rise to cold-heat and happiness-sorrow are destructible and impermanent, hence O India! You tolerate them. Because oh best man! The patient person who considers happiness and sorrow as equal and is not disturbed by the combination of senses and objects becomes eligible for salvation.


नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्त स्त्वनयोस्तत्वदर्शिभिः॥
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्‌।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥

हिंदी अर्थ – असत्‌ वस्तु की तो सत्ता नहीं है और सत्‌ का अभाव नहीं है| इस प्रकार इन दोनों का ही तत्व ज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा गया है| नाशरहित तो तुम उसको जानो, जिससे यह सम्पूर्ण दृश्य जगत व्याप्त है| इस अविनाशी का विनाश करने में कोई भी समर्थ नहीं है|

English Meaning – The unreal has no existence and the real has no absence. In this way, the essence of both of these has been seen by wise men. Only you know Him to be immortal, through whom this entire visible world is pervaded. No one is capable of destroying this indestructible thing.


अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत॥
य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्‌।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते॥

हिंदी अर्थ – इस नाशरहित, अप्रमेय, नित्यस्वरूप जीवात्मा के ये सब शरीर नाशवान कहे गए है, इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन ! तुम युद्ध करो| जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा हुआ मानता है, वे दोनों ही नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वास्तव में न तो किसी को मारता है और न किसी के द्वारा मारा जा सकता है|

English Meaning – All these bodies of this imperishable, immeasurable, eternal soul are said to be perishable, hence O Arjun of Bharatvanshi! You fight. The one who considers this soul to be a killer and the one who considers it dead, both of them do not know because in reality this soul neither kills anyone nor can be killed by anyone.

भगवद गीता अध्याय 2

न जायते म्रियते वा कदाचि न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे॥
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम्‌।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम्‌॥

हिंदी अर्थ – यह आत्मा किसी भी काल में ना तो जन्म लेती है और ना ही मरती है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर न होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी आत्मा नही मरती है| हे पृथापुत्र अर्जुन ! जो पुरुष इस आत्मा को नाशरहित, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह पुरुष कैसे किसी को मार या मरवा सकता है|

English Meaning – This soul neither takes birth nor dies at any time, nor is it going to be born again, because it is unborn, eternal, eternal and ancient, the soul does not die even after the death of the body. O Arjun, son of Pritha! How can a person who knows this soul to be indestructible, eternal, unborn and indestructible, kill or cause someone to be killed?


वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

हिंदी अर्थ – जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दुसरे नए वस्त्रों को धारण करता है, उसी प्रकार ही जीवात्मा भी पुराने शरीर को त्यागकर दुसरे नए शरीरों को प्राप्त होती है| इस आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, आग इसको जला नहीं सकती, जल इसको गला सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती|

English Meaning – Just as a human being gives up old clothes and puts on new clothes, in the same way the soul also gives up the old body and acquires new bodies. Weapons cannot cut this soul, fire cannot burn it, water cannot melt it and air cannot dry it.


अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयम क्लेद्योऽशोष्य एव च।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम विकार्योऽयमुच्यते।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि॥

हिंदी अर्थ – यह आत्मा अच्छेघ है, यह आत्मा अदाह्य, अक्लेघ और नि:संदेह अशोष्य है| यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर और सनातन है| यह आत्मा अव्यक्त है, यह आत्मा अचिन्त्य है और यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है| इसलिए हे अर्जुन ! इस आत्मा को इस प्रकार से जानकर तुम्हारे लिए शोक उचित नहीं है|

English Meaning – This soul is impermeable, this soul is incombustible, un-dissolvable and undoubtedly undryable. This soul is eternal, omnipresent, immovable, stable and eternal. This soul is unmanifested, this soul is unthinkable and this soul is said to be free from disorders. So O Arjun! It is not appropriate for you to mourn after knowing this soul in this manner.


अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम्‌।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि॥
जातस्त हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥

हिंदी अर्थ – किन्तु यदि तुम इस आत्मा को सदा जन्मने वाला तथा सदा मरने वाला भी मानो, तो भी हे महाबाहो ! तुम्हे इस प्रकार शोक नहीं करना चाहिए क्योंकि जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म भी निश्चित है| इसलिए इस अनिवार्य विषय में तुम शोक करने योग्य नहीं हो|

English Meaning – But even if you consider this soul to be always born and always dying, then also O mighty-armed one! You should not mourn like this because the death of the one who is born is certain and the birth of the one who dies is also certain. Therefore you are not worthy of mourning over this inevitable matter.

भगवद गीता अध्याय 2

अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्‌॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! सम्पूर्ण प्राणी जन्म से पहले अप्रकट थे और मरने के बाद भी अप्रकट हो जाने वाले है, केवल बीच में ही प्रकट है, फिर इस स्थिति में क्या शोक करना | कोई एक आत्मदर्शी ही इस आत्मा को आश्चर्य की भांति देखता है और वैसे ही कोई दूसरा आत्मज्ञ ही इसके तत्व का आश्चर्य की भांति वर्णन करता है तथा अन्य कोई अधिकारी ही इसे आश्चर्य की भांति सुनता है और कोई तो सुनकर भी इसे नही जानता |

English Meaning – O Arjun! All beings were invisible before birth and will become invisible even after death, they are visible only in the middle, so why mourn in this situation? Only one ascetic sees this soul as a wonder and similarly only another astute describes its essence as a wonder and only another authority hears it as a wonder and someone does not know it even after hearing it.


देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि॥
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! सबके शरीर में स्थित यह आत्मा सदा ही अवध्य है| इसलिए तुम्हे किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए और अपने धर्म को देखकर भी तुम भय करने योग्य नहीं हो क्योंकि क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कोई दूसरा कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है|

English Meaning – Hey Arjun! This soul present in everyone’s body is always immortal. Therefore, you should not mourn for any living being and you should not be afraid even after seeing your religion because for a Kshatriya there is no other more welfare duty than righteous war.


यदृच्छया चोपपन्नां स्वर्गद्वारमपावृतम्‌।
सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्‌॥
अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्‍ग्रामं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! अपने – आप प्राप्त हुए और खुले हुए स्वर्ग के द्वार – रूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय ही पाते है| किन्तु यदि तुम इस धर्मयुक्त युद्ध को नहीं करोगे तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त होंगे |

English Meaning – Hey Parth! Only the fortunate Kshatriyas get to fight this type of war which is automatically achieved and opens the doors of heaven. But if you do not wage this righteous war, you will lose your self-righteousness and fame and commit sin.


अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्‌।
सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते॥
भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्‌॥

हिंदी अर्थ – और सब लोग तुम्हारी बहुत समय तक रहने वाली अकीर्ति की भी चर्चा करेंगे और प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए अकीर्ति मृत्यु से भी बढ़कर मानी जाती है और जिनकी दृष्टि में तुम बहुत सम्मानित हो, अब उनके मत में तुच्छता को प्राप्त होंगे, वे महारथी लोग तुम्हे भय के कारण युद्ध से हटा हुआ मानेंगे|

English Meaning – And everyone will also talk about your infamy that lasted for a long time and for an eminent person, infamy is considered worse than death and in whose eyes you are very respected, now you will be reduced to insignificance in their opinion, those great people will fear you. Due to this will be considered as removed from the war.


अवाच्यवादांश्च बहून्‌ वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम्‌॥

हिंदी अर्थ – शत्रु – गण तुम्हारे सामर्थ्य की निंदा करते हुए तुम्हे बहुत से न कहने योग्य वचन भी कहेंगे, उससे अधिक दु:खदायक और क्या होगा?

English Meaning – Enemies will criticize your abilities and will also say many unspeakable words to you, what could be more painful than that?


हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्‌।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि॥

हिंदी अर्थ – यदि तुम युद्ध में मारे गए तो तुम स्वर्ग को प्राप्त करोगे अन्यथा युद्ध में जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगोगे| इसलिए हे अर्जुन ! तुम युद्ध का निश्चय करके खड़े हो जाओ| जय – पराजय, लाभ – हानि और सुख – दुःख को समान समझकर, युद्ध में लग जाओ, इस प्रकार युद्ध करने से तुम पाप को प्राप्त नहीं होगे|

English Meaning – If you are killed in the war then you will attain heaven otherwise after winning the war you will enjoy the kingdom of the earth. Therefore O Arjun! You decide to fight and stand up. Considering victory-defeat, profit-loss and happiness-sorrow as equal, engage in war, by fighting in this way you will not commit sin.


एषा तेऽभिहिता साङ्‍ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।
बुद्ध्‌या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि॥
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवातो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्‌॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! तुम्हारे लिए यह बुद्धि ज्ञानयोग के विषय में कही गई और अब तुम इसको कर्मयोग के विषय में सुनो| जिस बुद्धि से युक्त होकर तुम कर्मो के बंधन को नष्ट कर सकोगे| इस कर्मयोग में आरंभ का नाश नहीं है और इसमें उल्टा फलरूप दोष भी नहीं है, बल्कि इस कर्मयोग रूप धर्म का थोडा भी साधन जन्म – मृत्यु रूपी महान भय से रक्षा कर लेता है|

English Meaning – Hey Parth! For you, this wisdom was said about Gyan Yoga and now you listen to it about Karma Yoga. By possessing this intelligence you will be able to destroy the bondage of karma. In this Karmayoga, there is no destruction of the beginning and there is no defect in the form of opposite results, rather even a little practice of Dharma in the form of this Karmayoga protects from the great fear of birth and death.


व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्‌॥
यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः।
वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! इस कर्मयोग में निश्चयात्मिक बुद्धि एक ही होती है, किन्तु अस्थिर विचार वाले मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चय ही बहुत भेदों वाली और अनंत होती है| हे अर्जुन ! जो अयथार्थ वेद के कहने वाले अविवेकीजन इस प्रकार की शोभायुक्त वाणी कहा करते है कि स्वर्ग से बढ़कर दूसरी कोई वस्तु ही नहीं है|

English Meaning – Hey Arjun! In this Karmayoga, there is only one determined intellect, but the intellects of people with unstable thoughts are definitely diverse and infinite. Hey Arjun! The ignorant people who say the inauthentic Vedas say such beautiful words that there is nothing greater than heaven.


कामात्मानः स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम्‌।
क्रियाविश्लेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति॥
भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्‌।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते॥

हिंदी अर्थ – जिनके लिए स्वर्ग ही परम प्राप्य है, जो कि जन्मरूप कर्मफल देने वाली एवं भोग तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए नाना प्रकार की बहुत – सी क्रियाओं में रूचि रखने वाले है, जो भोग और ऐश्वर्य में अत्यंत आसक्त है, और जिनका चित्त उस वाणी द्वारा हर लिया गया है, उन पुरुषों की परमात्मा में निश्चियात्मिका बुद्धि नहीं होती|

English Meaning – For those for whom heaven is the ultimate attainment, who are interested in many types of activities that give the fruits of their birth and for the attainment of pleasures and opulence, who are extremely attached to pleasures and opulence, and whose mind is controlled by that speech. It has been said that those men do not have the decisive intellect of God.


त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन।
निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्‌॥
यावानर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके।
तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! वेद तीनों गुणों (सत्त्व, रज और तम) के कार्य रूप समस्त भोगों एवं उनके साधनों का प्रतिपादन करने वाले है, इसलिए तुम उन भोगों एवं उनके साधनों में आसक्तिहीन, हर्ष – शोकादि द्वंदों से रहित, नित्यवस्तु परमात्मा में स्थित योग (अप्राप्त की प्राप्ति का नाम ‘योग’ है) क्षेम (प्राप्त वस्तु की रक्षा का नाम ‘क्षेम’ है|) को न चाहने वाले और आत्म – परायण बनो |

English Meaning – Hey Arjun! Vedas are the ones that explain all the pleasures and their means as the working form of the three Gunas (Sattva, Raja and Tama), hence you are free from attachment to those pleasures and their means, free from joy-sorrow conflicts, situated in the eternal God, Yoga (attainment of the unattainable) The name of this is ‘Yoga’) Do not seek welfare (the name of protection of the achieved thing is ‘Kshem’) and become self-reliant.


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भुर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि॥
योगस्थः कुरु कर्माणि संग त्यक्त्वा धनंजय।
सिद्धयसिद्धयोः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥

हिंदी अर्थ – तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, उनके फलों में नहीं| तुम कर्मों के फल का कारण मत बनों और तुम्हारी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो| हे धनंजय ! योग में स्थित रहते हुए तुम आसक्ति को त्यागकर , सिद्धि और आसिद्धि में समान रह कर कर्मों को करो, इस समता को ही योग कहते है|

English Meaning – Your right lies only in the actions you perform, not in their fruits. Do not become the cause of the consequences of your actions and do not be attached to not doing your actions. Hey Dhananjay! While remaining situated in Yoga, you should give up attachment and do your work with equality in accomplishment and accomplishment, this equality is called Yoga.


दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय।
बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः॥
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌॥

हिंदी अर्थ – हे धनंजय ! इस समता रूपी बुद्धि योग से सकाम कर्म अत्यंत ही निम्न श्रेणी के है इसलिए यौम समबुद्धि का ही आश्रय लो क्योंकि आसक्ति पूर्वक कर्म करने वाले अत्यंत दीन है| (सम) बुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों से इसी लोक में मुक्त हो जाता है इसलिए तुम समत्व रूप योग के लिए प्रयत्न करो, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है|

English Meaning – O Dhananjay! The actions resulting from this yoga of equanimity of intellect are of very low grade, hence take shelter only of equanimity of mind because those who perform actions with attachment are extremely miserable. A person with (equal) intelligence becomes free from both virtue and sin in this world, therefore you should strive for the equanimity of yoga, this equanimity of yoga is efficiency in actions.


कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः।
जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌॥
यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि कर्म – बुद्धि से युक्त मनीषी (विचारक) भी कर्मों के फल को त्यागकर जन्म – रूपी बंधन से मुक्त होकर निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते है| (इस प्रकार कर्म करते हुए) जिस काल में तुम्हारी बुद्धि मोहरूपी दलदल को भली – भांति पार कर जाएगी, उस समय तुम सुने हुए और भविष्य में सुनने वाले सभी भोगों से वैराग्य को हो जाओगे|

English Meaning – Because the wise man (thinker) who has the intellect of karma also, by renouncing the fruits of his actions, gets freed from the bondage of birth and attains the supreme position without any vices. (By acting in this manner) at the time when your intellect will cross the mire of illusion, at that time you will become detached from all the pleasures you have heard and will hear in the future.


श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि॥
अर्जुन उवाच
स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्‌॥

हिंदी अर्थ – भांति – भांति के वचनों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि जब स्थिर होकर अचल समाधि में स्थित हो जाएगी तब तुम्हारी बुद्धि योग को प्राप्त हो जाएगी| अर्जुन बोले – हे केशव ! समाधि में स्थित स्थिर प्रज्ञा वाले पुरुष का क्या लक्षण है? वह स्थिर – बुद्धि वाला पुरुष कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?

English Meaning – When your mind, which has been distracted by listening to various words, becomes stable and becomes stable in stable samadhi, then your mind will attain Yoga. Arjun said – Hey Keshav! What is the characteristic of a person with stable intelligence in samadhi? How does that stable-minded man speak, how does he sit and how does he walk?


श्रीभगवानुवाच प्रजहाति यदा कामान्‌ सर्वान्पार्थ मनोगतान्‌।
आत्मयेवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते॥

हिंदी अर्थ – भगवान श्रीकृष्ण बोले – हे अर्जुन ! जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को भलीभांति त्याग देता है और मन में आत्म – स्वरुप का चिंतन करता हुआ उसी में संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ का चिंतन करता हुआ उसी में संतुष्ट रहता है, उस काल में वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है| दु:खों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं होता, सुखों की प्राप्ति में सर्वथा नि:स्पृह है तथा जिसके राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए है, ऐसा मुनि स्थिर – बुद्धि कहा जाता है|

English Meaning – Lord Shri Krishna said – O Arjun! During the period when this person completely abandons all the desires present in the mind and remains contented in the same while contemplating the Self in the mind, in that period he remains satisfied in the same while contemplating the situated Pragya, in that period he Is called Sthitapragya. A sage whose mind does not get agitated after suffering, who is completely disinterested in attaining happiness and whose attachment, fear and anger have been destroyed, is said to have a stable mind.


यः सर्वत्रानभिस्नेहस् तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्‌।
नाभिनंदति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गनीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस् तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित हुआ प्रारब्धवश प्राप्त शुभ या अशुभ से न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि स्थिर है| जैसे कच्छुआ अपने अंगों को सब ओर से समेत लेता है, उसी प्रकार जब यह पुरुष इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से सब प्रकार से हटा लेता है, तब उसकी बुद्धि स्थिर है|

English Meaning – The person who is devoid of affection everywhere and is neither happy nor averse to the good or bad received by his destiny, his intellect is stable. Just as a tortoise covers its body parts from all sides, in the same way, when a man removes his senses from the objects of the senses in all respects, then his intelligence is stable.


विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते॥
यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः॥

हिंदी अर्थ – इन्द्रियों द्वारा विषयों को ग्रहण न करने वाले पुरुषों के भी विषय तो निवृत्त नहीं होती| इस स्थितप्रज्ञ पुरुष की तो आसक्ति भी परमात्मा का साक्षात्कार करके निवृत्त हो जाती है| हे अर्जुन ! (आसक्ति का नाश होने के कारण) यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी ये इन्द्रियाँ बलात्‌ हर लेती है|

English Meaning – Even for those who do not grasp objects through their senses, their objects do not go away. Even the attachment of a man of this state of wisdom goes away after realizing God. Hey Arjun! (Due to destruction of attachment) these senses forcefully take away even the mind of an intelligent person while making efforts.


तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
ध्यायतो विषयान्पुंसः संगस्तेषूपजायते।
संगात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

हिंदी अर्थ – इसलिए साधक उन सारी इन्द्रियों को वश में करके समाहित चित्त हुआ मेरे परायण होकर ध्यान में बैठे क्योंकि जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है| विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पड़ने से क्रोध उत्पन्न होता है|

English Meaning – Therefore, the seeker, after controlling all those senses, becomes devoted to me and has an absorbed mind and sits in meditation because the intellect of a person whose senses are under control becomes stable. A person who contemplates on subjects becomes attached to those subjects, and from attachment arises a desire for those subjects and when there is an obstacle in the desire, anger arises.


क्रोधाद्‍भवति सम्मोहः सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥
रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्‌।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति॥

हिंदी अर्थ – क्रोध से अत्यंत मूढ़ भाव उत्पन्न हो जाता है, मूढ़ भाव से स्मृति – भ्रंश हो जाने से बुद्धि नाश हो जाता है और बुद्धि का नाश हो जाने से यह पुरुष अपनी स्थिति से गिर जाता है| अपने वश में किये हुए अन्तः करण की निर्मलता को प्राप्त होता है|

English Meaning – Anger gives rise to extremely foolish feelings, due to loss of memory due to foolish feelings, the intellect gets destroyed and due to the destruction of the intellect, the person falls from his position. One attains the purity of the conscience under one’s control.


प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।
प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिर शान्तस्य कुतः सुखम्‌॥

हिंदी अर्थ – अन्तः करण निर्मल होने पर इसके सभी दुखों का नाश हो जाता है और उस प्रसन्न – चित्त वाले उस कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है| योग – रहित पुरुष की निश्च्यात्मिकता बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त पुरुष में आत्म – विषयक भावना भी नहीं होती| भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलता और अशांत मनुष्य को सुख कहाँ?

English Meaning – When the heart becomes pure, all its sorrows are destroyed and the intellect of that Karmayogi with a happy mind soon becomes stable. A person without yoga does not have the mindless intellect and the uneducated person also does not have a sense of self. An emotionless man does not get peace and where can a disturbed man find happiness?


इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि॥
तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस् तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि विषयों में विचरती हुई इन्द्रियों से संयुक्त होकर मन बुद्धि को वैसे ही हर लेता है जैसे जल में चलने वाली नाव को वायु| इसलिए हे महाबाहो ! जिस पुरुष की इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के विषयो में सब प्रकार से निग्रह की हुई है, उसकी बुद्धि स्थिर है|

English Meaning – Because the mind, combined with the senses wandering in objects, takes away the intellect just like the wind takes over a boat moving on water. That’s why oh great arms! The person whose senses and objects of the senses are controlled in every way, his intellect is stable.


या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी।
यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः॥
आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्‌।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी॥

हिंदी अर्थ – आत्म – विषयक जो बुद्धि सम्पूर्ण प्राणियों के लिए रात्रि के समान (अज्ञात) है, उस आत्मा – विषयक बुद्धि में जितेन्द्रिय पुरुष जागता है और जिस अनात्म – विषयक बुद्धि में सब प्राणी जागते है, उस मुनि के लिए वह रात्रि के समान है| जैसे सब ओर से परिपूर्ण, अचल प्रतिष्ठा वाले समुन्द्र में (अनेक नदियों के जल) उसमे क्षोभ न उत्पन्न करते हुए समा जाते है, वैसे ही जिस पुरुष में सब भोग बिना किसी प्रकार का विकार उत्पन्न किए समा जाते है, वही पुरुष शान्ति को प्राप्त होता है, भोगो को चाहने वाला नहीं|

English Meaning – The soul-related intelligence which is like night (unknown) to all living beings, in that soul-related intelligence the Jitendriya Purusha is awake and the non-soul-related intelligence in which all beings are awake is like night for that sage. Just as the waters of the many rivers (waters of many rivers) are absorbed into the ocean, which is perfect from all sides, without creating any disturbance in it, similarly, the man in whom all the pleasures are absorbed without creating any kind of disorder, only he is the man who attains peace. It happens that he is not a lover of pleasures.


विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति॥
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष सम्पूर्ण कामनाओं को त्यागकर, ममतारहित, अहंकाररहित और स्पृहारहित हुआ विचरता है, वह शान्ति को प्राप्त होता है| हे अर्जुन ! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए पुरुष की स्थिति है, इसको प्राप्त होकर मनुष्य फिर कभी मोहित नहीं होता और अन्तकाल मे भी इस ब्राह्मी स्थिति में स्थित होकर ब्रह्मानन्द को प्राप्त हो जाता है|

English Meaning – The man who gives up all desires and wanders without affection, without ego and without desires, attains peace. Hey Arjun! This is the state of a man who has attained Brahma, after attaining this man never gets deluded again and even in the last moments, being situated in this Brahmi state, he attains Brahmananda.


|| द्वितीय अध्याय समाप्त ||


Bhagavad Gita Chapter 1: भगवद गीता प्रथम अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता प्रथम अध्याय का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे|

जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता प्रथम अध्याय को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता प्रथम अध्याय को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

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Chapter 1 – अर्जुनविषादयोग: (अर्जुन विषादयोग) Disappointment Of Arjun

-: धृतराष्ट्र उवाच :-
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥

हिंदी अर्थ – (सत् और असत् के विवेक रूपी नेत्रों से रहित) धृतराष्ट्र बोले – हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?

English Meaning – (Devoid of eyes which can discriminate between right and wrong, hence blind) Dhrutarashtra asks: O Sanjay! What are my sons and Pandavas, who are eager to fight, doing in the holy battlefield of Kurukshetra?


संजय उवाच
दृष्टवा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा।
आचार्यमुपसंगम्य राजा वचनमब्रवीत्‌॥

हिंदी अर्थ – संजय बोले – उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहररचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा|

English Meaning – Sanjay says: After seeing the orderly arranged army of Pandavas, Duryodhana approached his GuruDrona and said.


पश्यैतां पाण्डुपुत्राणा माचार्य महतीं चमूम्‌।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता॥

हिंदी अर्थ – हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिए|

English Meaning – O Acharya! See this great army of the sons of Pandu, properly arranged by the son of Drupada and your intelligent disciple.

भगवद गीता प्रथम अध्याय

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः॥
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्‌।
पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङवः॥
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्‌।
सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः॥

हिंदी अर्थ – इस सेना में बड़े बड़े धनुषों वाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यिक और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद है| धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिभोज और मनुष्यों में श्रेष्ठ शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र – ये सभी महारथी है|

English Meaning – In this army there are great warriors comparable to Bheem and Arjun, like Yuyudhana (Satyaki), Virata and Drupadha. Besides these, Drushtaketu, Chekitan, the mighty King of Kasi, Purujit Kunti Bhoj and the great among men shaibya, very powerful Yudhamanyu and mighty uttamouja, subadhra’s son Abhimanyu and the five sons of Draupadi are all great warriors.


अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम।
नायका मम सैन्यस्य सञ्ज्ञार्थं तान्ब्रवीमि ते॥

हिंदी अर्थ – हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान वीर है, उनको आप जान लीजिये | मेरी सेना के जो – जो सेनापति है, आपकी जानकारी के लिए, उनको बतलाता हूँ |

English Meaning – O great among Brahmans! Our army also has great warriors which you should know. Let me list them for your knowledge.


भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः।
अश्वत्थामा विकर्णश्च सौमदत्तिस्तथैव च॥

हिंदी अर्थ – आप (द्रोणाचार्य) और पितामह भीष्म तथा कर्ण और संग्रामविजयी कृपाचार्य तथा अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत्त का पुत्र भूरिश्रवा |

English Meaning – You (Dronacharya), Bheeshma, Karna, war – winner Kripacharya, Aswatthama, Vikarna and son of Soumadutta (Bhurishrawa).


अन्ये च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः।
नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः॥

हिंदी अर्थ – और भी बहुत से ऐसे शूरवीर, जिन्होंने मेरे लिए अपने जीवन की आशा को त्याग दिया है, अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित तथा सभी के सभी युद्ध में कुशल है|

English Meaning – There are many more warriors, ready to sacrifice their lives for my sake and they are well armed and experts in war.


अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्‌।
पर्याप्तं त्विदमेतेषां बलं भीमाभिरक्षितम्‌ ॥

हिंदी अर्थ – भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारा सैन्य बल पर्याप्त नहीं होगा और भीम द्वारा रक्षित इन लोगों का सैन्य बल अधिक है|

English Meaning – Our army. Led by Bheeshma is of inadequate strength and the strength of their army is adequate, due to its protection by Bheem.

भगवद गीता प्रथम अध्याय

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि॥

हिंदी अर्थ – इसलिए सब मोर्चों पर अपनी – अपनी जगह स्थित रहते हुए आप सभी लोग भीष्म पितामह की ही सब ओर से रक्षा करे |

English Meaning – Therefore, while staying at your respective places on all fronts, all of you should protect Bhishma Pitamah from all sides.


तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शंख दध्मो प्रतापवान्‌॥

हिंदी अर्थ – उस दुर्योधन के हृदय में हर्ष उत्पन्न करते हुए, कौरवों में श्रेष्ठ, प्रतापी पितामह भीष्म ने उच्च स्वर से सिंहनाद करते हुए शंख बजाया |

English Meaning – Creating joy in the heart of that Duryodhana, the best among the Kauravas, the glorious Pitamah Bhishma blew his conch with a loud lion’s cry.


ततः शंखाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत्‌॥

हिंदी अर्थ – तब शंख और नगाड़े, ढोल, मृदंग और नरसिंघे आदि बाजे एक साथ ही बज उठे | उनका वह शब्द बड़ा भयंकर हुआ |

English Meaning – Then, several conchs, drums, cymbals and gongs, blew together in unison which produced great sound.


ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ।
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शंखौ प्रदध्मतुः॥

हिंदी अर्थ – इसके पश्चात सफ़ेद घोड़ो वाले उत्तम रथ में बैठे हुए भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने भी आलौकिक शंख बजाए |

English Meaning – After this, Lord Shri Krishna and Arjun, sitting in a beautiful chariot with white horses, also blew supernatural conch shells.


पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंख भीमकर्मा वृकोदरः॥

हिंदी अर्थ – भगवान श्रीकृष्ण ने पाञ्चजन्य, अर्जुन ने देवदत्त और भयानक कर्म वाले भीमसेन ने पौण्ड्रं नामक शंख बजाया|

English Meaning – Lord Shri Krishna blew the conch called Panchjanya, Arjun blew the conch called Devdutt and Bhimsen, who had terrible deeds, blew the conch called Paundram.


अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ॥

हिंदी अर्थ – कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनन्तविजय और नकुल – सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नाम वाले शंख बजाए |

English Meaning – Kunti’s son King Yudhishthir blew the conch shells named Anantvijay and Nakul-Sahadeva blew the conch shells named Sughosh and Manipushpak.

भगवद गीता प्रथम अध्याय

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः।
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः॥
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते।
सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्‌॥

हिंदी अर्थ – हे राजन! श्रेष्ठ धनुष वाले काशिराज और महारथी शिखंडी एवं धृष्टद्युम्न, राजा विराट और अजेय सात्यकि, द्रुपद एवं द्रौपदी के पाँचों पुत्र और बड़ी भुजाओं वाले सुभद्रा – पुत्र अभिमन्यु ने, पूरी तरह से अपने – अपने शंख बजाए|

English Meaning – O king! King of Kashi and the mighty charioteer Shikhandi and Dhrishtadyumna, King Virata and the invincible Satyaki, the five sons of Drupada and Draupadi, and Subhadra’s son Abhimanyu, who had large arms, blew their respective conch shells to their fullest.


स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्‌।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलो व्यनुनादयन्‌॥

हिंदी अर्थ – उस भयानक शब्द ने आकाश और पृथ्वी को भी गुंजाते हुए धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण कर दिए |

English Meaning – That terrible word echoed in the sky and the earth and tore the hearts of Dhritarashtra’s sons.


अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्‌ कपिध्वजः।
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डवः॥
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते।
अर्जुन उवाच
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत॥

हिंदी अर्थ – हे राजन! इसके बाद कपिध्वज अर्जुन ने धृतराष्ट्र – संबंधियों को व्यूह में स्थित होकर शस्त्र चलाने के लिए तैयार देखकर धनुष उठाकर सबके हृदय के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण से यह वचन कहा – हे अच्युत! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच में खड़ा कीजिये|

English Meaning – O king! After this, Kapidhwaj Arjun, seeing Dhritarashtra’s relatives situated in the array and ready to fire weapons, raised his bow and said these words to Lord Shri Krishna, the Lord of everyone’s heart – O Achyut! Make my chariot stand between the two armies.


यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्‌।
कैर्मया सह योद्धव्यम स्मिन् रणसमुद्यमे॥

हिंदी अर्थ – और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में स्थित इन विपक्षी योद्धाओं का निरीक्षण न कर लूँ कि इस युद्ध में मुझे किन – किन के साथ युद्ध करना योग्य है|

English Meaning – And until I inspect these opposing warriors situated in the battlefield, with whom I am worthy of fighting in this war.


योत्स्यमानानवेक्षेऽहं य एतेऽत्र समागताः।
धार्तराष्ट्रस्य दुर्बुद्धे र्युद्धे प्रियचिकीर्षवः॥

हिंदी अर्थ – दुर्बुद्धि दुर्योधन का युद्ध में प्रिय चाहने वाले जो राजा युद्ध की इच्छा से इस सेना में आए है, उनको मैं देखना चाहूँगा |

English Meaning – I would like to see those kings who loved the foolish Duryodhana in the war and who have come to this army with the desire of war.

भगवद गीता प्रथम अध्याय

संजय उवाच
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये स्थापयित्वा रथोत्तमम्‌॥
भीष्मद्रोणप्रमुखतः सर्वेषां च महीक्षिताम्‌।
उवाच पार्थ पश्यैतान्‌ समवेतान्‌ कुरूनिति॥

हिंदी अर्थ – संजय बोले – अर्जुन के द्वारा इस प्रकार कहे जाने वाले पर भगवान श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में उस उत्तम रथ को खड़ा कर दिया और कहा – हे पार्थ! युद्ध के लिए एकत्रित हुए इन कौरवों, प्रमुख रूप से भीष्म और द्रोणाचार्य तथा सम्पूर्ण राजाओं को देखो |

English Meaning – Sanjay said – On Arjun saying this, Lord Shri Krishna made that excellent chariot stand in between the two armies and said – O Partha! Look at these Kauravas gathered for war, especially Bhishma and Dronacharya and all the kings.


तत्रापश्यत्स्थितान्‌ पार्थः पितृनथ पितामहान्‌।
आचार्यान्मातुलान्भ्रातृन् पुत्रान्पौत्रान्सखींस्तथा॥

हिंदी अर्थ – इसके बाद पृथापुत्र अर्जुन ने उन दोनों ही सेनाओ में स्थित पिता (ताऊ – चाचा), पितामह, आचार्य, मामा, भाई, पुत्र, पौत्र, मित्र, ससुर और सुह्रदों को देखा |

English Meaning – After this, Pritha’s son Arjun saw his father (uncle), grandfather, teacher, maternal uncle, brother, son, grandson, friend, father-in-law and relatives present in both the armies.


श्वशुरान्‌ सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्‌ बन्धूनवस्थितान्‌॥

हिंदी अर्थ – उपस्थित उन सभी बंधुओं को देखकर वे कुंतीपुत्र अर्जुन अत्यंत करुणा – युक्त होकर शोक करते हुए यह बोले |

English Meaning – Seeing all those brothers present, Kunti’s son Arjun became very compassionate and said this while mourning


अर्जुन उवाच
कृपया परयाविष्टो विषीदत्रिदमब्रवीत्‌।
दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।
वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे कृष्ण ! यहाँ मैं युद्ध के अभिलाषी स्वजनों को ही देखता हूँ | मेरे अंग शिथिल हुए हो रहे है और मुख सूख रहा है और मेरा शरीर काँप रहा है और रोएं खड़े हो रहे है|

English Meaning – Arjun said- O Krishna! Here I see only relatives desirous of war. My limbs are becoming weak and my mouth is dry and my body is trembling and hairs are standing on my body.


गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥

हिंदी अर्थ – मेरे हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और मेरी त्वचा जल रही है| मैं खड़ा रहने में भी असमर्थ हो रहा हूँ, मेरा मन भ्रमित – सा हो रहा है|

English Meaning – The Gandiva bow is falling from my hand and my skin is burning. I am unable to even stand, my mind is getting confused.


निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥

हिंदी अर्थ – हे केशव ! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ और युद्ध में स्वजनों को मारकर किसी प्रकार से कल्याण भी नहीं देखता हूँ |

English Meaning – Hey Keshav! I am seeing the opposite symptoms and do not see any benefit in killing relatives in war.


न काङ्‍क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च।
किं नो राज्येन गोविंद किं भोगैर्जीवितेन वा॥

हिंदी अर्थ – हे कृष्ण ! मैं न तो विजय चाहता हूँ और न राज्य तथा सुखों को भी | हे गोविन्द ! हमे ऐसे राज्य, भोग अथवा जीवन से क्या लाभ है?

English Meaning – Hey Krishna! I neither want victory nor kingdom and happiness. Hey Govind! What benefit do we get from such kingdom, enjoyment and life?


येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च।
त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च॥

हिंदी अर्थ – हमे जिनके लिए राज्य, भोग और सुखादि अभीष्ट है, वे ही सब धन और जीवन की आशा को त्यागकर युद्ध में खड़े है|

English Meaning – Those for whom we desire kingdom, pleasures and happiness, they are the ones who have given up the hope of wealth and life and are standing in the war.


आचार्याः पितरः पुत्रास् तथैव च पितामहाः।
मातुलाः श्वशुराः पौत्राः श्यालाः संबंधिनस्तथा॥
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन।
अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते॥

हिंदी अर्थ – आचार्यगण, पिता (ताऊ – चाचा), पुत्र और पितामह, और मामा, ससुर, पौत्र, साले तथा और भी संबंधी| हे मधुसूदन ! इनके द्वारा मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के राज्य के लिए भी मैं इन सबको नहीं मारना चाहता, फिर पृथ्वी के लिए तो बात ही क्या है?

English Meaning – Acharyagan, father (uncle), son and grandfather, maternal uncle, father-in-law, grandson, brother-in-law and other relatives. Hey Madhusudan! Even if they kill me or for the sake of the kingdom of the three worlds, I do not want to kill all of them, let alone the earth?


निहत्य धार्तराष्ट्रान्न का प्रीतिः स्याज्जनार्दन।
पापमेवाश्रयेदस्मान्‌ हत्वैतानाततायिनः॥

हिंदी अर्थ – हे जनार्दन ! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमे क्या प्रसन्नता होगी? इन आततायियों को मारकर तो हमे केवल पाप ही लगेगा |

English Meaning – Hey Janardan! What pleasure will we get by killing Dhritarashtra’s sons? By killing these terrorists we will only commit sin.


तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्‌।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव॥
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम्‌॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्‌।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन॥

हिंदी अर्थ – इसलिए हे माधव ! हमारे लिए अपने ही बान्धव धृतराष्ट्र – पुत्रों को मारना उचित नहीं है क्योंकि अपने ही कुटुंब को मारकर हम कैसे सुखी होंगे ? यधपि लोभ से भ्रष्ट – चित्त हुए ये लोग कुल के नाश से उत्पन्न दोष को और मित्रों से विरोध करने में पाप को नहीं देखते है, तो भी हे जनार्दन ! कुल के नाश से उत्पन्न दोष को जानने वाले हम लोगों को इस पाप से बचने के लिए क्यों नहीं प्रयत्न नहीं करना चाहिए ?

English Meaning – That’s why O Madhav! It is not right for us to kill our own kinsmen, Dhritarashtra’s sons, because how can we be happy by killing our own family? Even though these people, corrupted by greed, do not see the sin arising from the destruction of the family and the sin in opposing their friends, yet O Janardan! Why shouldn’t we, who are aware of the sin arising from the destruction of the clan, try to avoid this sin?


कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः।
धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम धर्मोऽभिभवत्युत॥

हिंदी अर्थ – कुल के नाश से सनातन कुल – धर्म नष्ट हो जाते है और धर्म का नाश हो जाने पर सम्पूर्ण कुल में अधर्म बढ़ जाता है|

English Meaning – With the destruction of the clan, the eternal clan-religion is destroyed and with the destruction of religion, unrighteousness increases in the entire clan.


अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥

हिंदी अर्थ – हे कृष्ण ! अधर्म के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती है और हे वार्ष्णेय ! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है| वह वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है| पिण्ड और जल – दान की क्रिया से वंचित उनके पितर भी अधोगति को प्राप्त होते है|

English Meaning – Hey Krishna! Due to increase in unrighteousness the women of the family become polluted and O Varshneya! When women become infected, hybrids arise. That caste is meant only to take the murderers and the clan to hell. Those ancestors who are deprived of the ritual of donating body and water also attain degradation.


दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः॥
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम॥

हिंदी अर्थ – वर्ण – संकरता के कारण होने वाले इन दोषों से कुलघातियों के सनातन कुल – धर्म और जाति – धर्म नष्ट हो जातें है| हे जनार्दन ! और हम ऐसा सुनते हुए आये है कि नष्ट कुल – धर्म वाले मनुष्यों का अनिश्चित काल तक नरक में वास होता है|

English Meaning – Due to these defects caused by varna-hybridity, the eternal clan-religion and caste-religion of the Kulghatis are destroyed. Hey Janardan! And we have been hearing that people with destroyed family and religion reside in hell indefinitely.


अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्‌।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः॥

हिंदी अर्थ – अरे बड़े दुर्भाग्य की बात है कि हम लोग राज्य और सुख के लोभ से स्वजनों को मारने रूपी महान पाप करने को भी उघत है|

English Meaning – Oh, it is very unfortunate that out of greed for kingdom and happiness, we are even ready to commit the great sin of killing our own people.


यदि मामप्रतीकारम शस्त्रं शस्त्रपाणयः।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस् तन्मे क्षेमतरं भवेत्‌॥

संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्‍ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्‌।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः॥

हिंदी अर्थ – यदि मुझे सामना न करने वाले और शस्त्ररहित को शस्त्र लिए हुए धृतराष्ट्र के पुत्र रण में मार डाले तो वह मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा | संजय बोले – इस प्रकार कहकर, रणभूमि में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन, बाण सहित धनुष को त्याग कर रथ के पिछले भाग में बैठ गए|

English Meaning – It would be more beneficial for me if the son of Dhritarashtra, armed with a weapon, kills me in battle, who is unable to face me and is unarmed. Sanjay said – Having said this, Arjun, whose mind was troubled with grief on the battlefield, abandoned his bow and arrows and sat at the rear of the chariot.


|| प्रथम अध्याय समाप्त ||


Chandra Shekhar Ashtakam: चन्द्रशेखर अष्टकम के बारे में हिंदी अर्थ सहित

यह चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) एक ऐसी प्रार्थना है जो भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की जाती है| जैसे कि हम सभी जानते है कि हिन्दू धर्म में प्रत्येक दिन किसी ना किसी भगवान को समर्पित किया जाता है| यदि हम बात करे सोमवार के दिन की तो यह दिन भगवान शिव को समर्पित किया गया है, जिनकी उपासना के लिए चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) का पाठ किया जाता है|

इस दिन भगवान शिव के भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए बहुत सारी चीज़े करते है| भगवान शिव के बारे में यह माना जाता है कि यह केवल एक लौटा जल चढाने से ही प्रसन्न हो जाते है| भगवान शंकर की पूजा करने से भक्तों से सभी प्रकार की परेशानियां दूर होती है तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है|

चन्द्रशेखर अष्टकम

आज हम इस लेख के माध्यम से आपको चन्द्रशेखर अष्टकम के बारे में बतायेंगे| इस चन्द्रशेखर अष्टकम का पाठ प्रतिदिन नियमित रूप से करने पर यह जातक के प्रति बहुत ही सकारात्मक प्रभाव दिखाता है| चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) पाठ प्रत्येक सोमवार को पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक तनाव से छुटकारा मिलता है तथा भगवन शिव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है|

इसी के साथ धन की बचत करने के कई सारे भी मार्ग आपको नज़र आयेंगे| सोमवार के दिन चन्द्र देव की पूजा करने का विधान माना जाता है| चन्द्र देव भगवान शिव के सिर पर विराजमान है| व्यक्ति की कुंडली में चन्द्र देव के अशुभ होने मानसिक तनाव तथा जीवन में अशांति बढती है|

तो आइये इस लेख के द्वारा जानते है चन्द्रशेखर अष्टकम के बारे में हिंदी अर्थ के साथ| इस चन्द्रशेखर अष्टकम के साथ ही हम आपको बताते है 99Pandit के बारे में| यदि आप हिन्दू धर्म से संबंधित किसी भी तरह की पूजा जैसे  त्रिपिंडी श्राद्ध, नवरात्रि  की पूजा करवाना चाहते है तो 99Pandit आपके लिए एक बहुत ही अच्छा विकल्प होगा|

श्री चन्द्रशेखर अष्टकम हिंदी अर्थ सहित – Chandrashekhar Ashtakam with Hindi Meaning

चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहिमाम् |
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ‖1

अर्थ – हे चन्द्रशेखर (भगवान जिनका मुकुट चंद्रमा है), कृपया मेरी रक्षा करें|
हे चन्द्रशेखर (भगवान जिनका मुकुट चंद्रमा है), कृपया मुझे बचाएं| 

रत्नसानु शरासनं रजताद्रि शृङ्ग निकेतनं
शिञ्जिनीकृत पन्नगेश्वर मच्युतानल सायकम् |
क्षिप्रदग्द पुरत्रयं त्रिदशालयै रभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ‖ 2

अर्थ – ऐसे भगवान जिन्होंने बहुमूल्य पत्थरों से भरे पर्वत (मेरु पर्वत) को अपना धनुष , जो स्वयं चांदी के पर्वत पर निवास करते है, जिन्होंने नागों के राजा (वासुकी) को अपने धनुष की प्रत्यंचा बनाया था, जिन्होंने भगवान विष्णु को तीर के रूप में इस्तेमाल किया था, जिन्हें तीनो लोकों में सभी प्रणाम करे| मै उन भगवान चंद्रशेखर की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

पञ्चपादप पुष्पगन्ध पदाम्बुज द्वयशोभितं
फाललोचन जातपावक दग्ध मन्मध विग्रहं |
भस्मदिग्द कलेबरं भवनाशनं भव मव्ययं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ‖ 3 ‖

अर्थ – जिनके पैर पांच दिव्य वृक्षों के फूलों तथा गंध से चमक रहे है, जिन्होंने अपने माथे पर मौजूद आँख की आग से प्रेम के भगवान, मनमदा को जला दिया| जिनके शरीर पर पवित्र राख या भस्म लगी हुई है, जो दुखों का नाश करने वाले है, जो अनंत काल तक जीवित है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

मत्तवारणमुख्यचर्मकॄतोत्तरीयमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपूजितांघ्रिसरोरुहम ।
देवसिन्धुतरङ्गसीकर सिक्तशुभ्रजटाधरं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥ 4॥ 

अर्थ – जो अपनी भुजाओं पर बड़े ओजस्वी हाथी की खाल को वस्त्र के रूप में धारण करते है, जो मंत्रमुग्ध दिखाई देते है, जिनके कमल के समान चरणों की पूजा स्वयं सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी करते है, जो अधिकतर पंकजासन पर विराजमान रहते है| जिनके उलझे हुए बाल आकाश गंगा की लहरों से आने वाली बूंदों से साफ़ हो जाते है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेबरम ।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥5॥ 

अर्थ – ऐसे भगवान जो कुबेर के निकट है, जो नागों को आभूषण के रूप में धारण करते है| जिनके शरीर का बायाँ भाग पर्वतो की पुत्री देवी पार्वती के शरीर से सुशोभित है| जिनका कंठ नीला है| जिनके हाथ शास्त्र के रूप में कुल्हाड़ी से सुशोभित है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

चन्द्रशेखर अष्टकम

कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वर कुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम ।
अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥6॥ 

अर्थ – जिनके कानों में कुंडलित सर्प है, जिनका वाहन बैल है| जिनके महानता की प्रसन्नता नारद जी तथा अन्य ऋषि – मुनियों के द्वारा की जाती है| वह सभी लोगों के स्वामी माने जाते है| जिन्होंने अंधक के घमंड को नष्ट किया| मै जिनकी शरणागत के लिए कामना करता हूँ| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञविनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम ।
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं सकलाघसंघनिबर्हणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥7॥

अर्थ – जो दुखी व्यक्ति के जीवन में एक औषधि के रूप में कार्य करते है, सभी कष्टों और बाधाओं को दूर करने वाले, दक्ष यज्ञ के विध्वंसक, तीन नेत्रों वाले, भक्ति, मोक्ष  तथा अन्य इच्छाओं के दाता| मै सभी पापों का नाश करने वाले उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

भक्तवत्सलमर्चितं निधिक्षयं हरिदंबरं
सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनुत्तमम ।
सोमवारिदभूहुताशनसोमपानिलखाकृतिं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥8॥ 

अर्थ – जो अपने सभी भक्तों का ध्यान रखते , जिनकी सभी लोग पूजा करते है, जो अपने भक्तों के लिए किसी खजाने के समान है, जो इस सम्पूर्ण दुनिया के परे है, जिनकी तुलना किसी के साथ नहीं की जा सकती है, जो विधिपूर्वक सोमपान करने वाले के रूप में विद्यमान है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमपि प्रपञ्चमशेषलोकनिवासिनम ।
कीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमन्वितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥9॥

अर्थ – जो भगवान इस सृष्टि की रचना करते है, जो सृष्टि के पालन पोषण में हमेशा तैयार रहते है| जो उचित समय पर सृष्टि का विनाश भी कर सकते है| जिन्होंने इस संसार में असंख्य लोगों के निवास का स्थान बनाया है| जो हर दिन चंचल रहते है तथा रात्रि गणों के मुखिया है, जो उन गणों में से एक की भांति ही व्यवहार करते है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

मृत्युभीतमृकण्डुसूनुकृतस्तवं शिवसन्निधौ
यत्र कुत्र च यः पठेन्न हि तस्य मृत्युभयं भवेत ।
पूर्णमायुररोगतामखिलार्थसंपदमादरात
चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः॥10॥

अर्थ – जो भी मृत्यु से भयभीत व्यक्ति मृकुंद के पुत्र द्वारा लिखी इस चन्द्रशेखर अष्टकम(Chandra Shekhar Ashtakam) को भगवान शिव के मंदिर में पढता है तो इसके माध्यम से उस व्यक्ति के मन से मृत्यु का भय खत्म हो जाता है| उस पूर्ण रूप से स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है| जब कोई मुक्ति पाने का प्रयास करता है तो चंद्रमा के शिखर भगवान शिव उसे सम्पूर्ण जीवन धन तथा अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते है|

॥ इति श्रीचन्द्रशेखराष्टकस्तोत्रं संपूर्णम ॥ 

चन्द्रशेखर अष्टकम का महत्व – Importance of Chandrashekhar Ashtakam

इस चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) को सुनना या उसका ध्यान करना व्यक्ति के सुखद जीवन जीने में बहुत ही काम आ सकता है| इस अष्टकम में भगवान शिव को चंद्रशेखर (चंद्र – चंद्रमा, शेखर – मुकुट) के रूप में बताया गया है| इसका अर्थ है जो अपने मुकुट को चंद्रमा से सुशोभित करते है|

यह चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) मार्कंडेय ऋषि के द्वारा लिखा गया है| इस बारे में एक कथा काफी पुराने काल से चली आ रही है कि किस प्रकार भगवान शिव ने भगवान यम से मार्कंडेय ऋषि के प्राण किस प्रकार बचाएं थे| आज हम इस लेख के माध्यम से इस कथा के बारे में जानेंगे|

पौराणिक कथा – Mythology

मृकंडु ऋषि तथा उनकी पत्नी मरूदमती ने पुत्र प्राप्ति के हेतु भगवान शिव की प्रार्थना की| उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और दम्पति को पुत्र के दो विकल्प प्रदान किये| जिसमे एक विकल्प था कि जिसमे उन्हें एक धर्मी पुत्र की प्राप्ति होगी किन्तु उसकी आयु क्षीण होगी| वही दूसरा विकल्प यह था उनके पुत्र की आयु सौ वर्ष होगी किन्तु वह मुर्ख होगा| मृकंडु ऋषि ने पहले विकल्प का चुनाव किया| जिससे उन्हें एक धर्मी पुत्र मार्कंडेय की प्राप्ति हुई| जिसकी आयु 16 वर्ष तक होनी निश्चित थी| 

ऋषि मार्कंडेय बड़े होकर बहुत ही बड़े शिव भक्त बने| अपने मृत्यु वाले दिन भी ऋषि मार्कंडेय ने मंदिर में भगवान शिव की पूजा जारी रखी| पूजा जारी रखने की वजह से यम दूत ऋषि मार्कंडेय को ले जाने में असमर्थ थे| इस वजह से यमराज को ऋषि मार्कंडेय के प्राण लेने स्वयं ही आना पड़ा| यमराज ने ऋषि मार्कंडेय के गले फंदा डाल दिया| अपने मंदिर में अपने भक्त के साथ ऐसा होते देखकर भगवान शिव को क्रोध आ गया है|

चन्द्रशेखर अष्टकम

इसके पश्चात यमराज तथा भगवान शिव के मध्य भयंकर युद्ध हुआ| भगवान शिव यमराज को मृत्यु की स्थिति तक हराने के पश्चात उन्हें पुनर्जीवित इस शर्त के तहत किया कि धर्मनिष्ठ व्यक्ति हमेशा जीवित रहेगा| इस समय से भगवान शिव को कालांतक(मृत्यु का अंत) के नाम से भी जाना जाने लगा| इसके पश्चात ऋषि मार्कंडेय ने भगवान शिव की स्तुति के रूप में चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) गाया था| 

चन्द्रशेखर अष्टकम पूजा की कीमत – Chandrashekhar Ashtakam Puja Cost

  1. 551 पाठों के साथ: पुजारियों की संख्या: 5; INR – 11,000; अवधि – 1 दिन 
  2. 1,100 पाठों के साथ : पुजारियों की संख्या: 11; INR – 21,000; अवधि – 1 दिन 
  3. 2,100 पाठों के साथ: पुजारियों की संख्या: 21; INR – 35,000; अवधि – 1 दिन 

निष्कर्ष

किसी भी तरह की पूजा करने के लिए हमें बहुत सारी तैयारियां करनी होती है| गावों में पूजा आसानी से हो जाती है लेकिन शहरों में लोगों के पास समय की कमी होती है| जिस वजह से वह लोग पूजा नहीं करवा पाते है तो उनकी इस समस्या का समाधान हम लेकर आये है 99Pandit के साथ|

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हालांकि, किसी भी समय भगवान की पूजा करना आपको कठिनाइयों, समस्याओं, तनाव और नकारात्मक ऊर्जाओं से हमेंशा बचाता है। जैसा कि आपने चन्द्रशेखर अष्टकम पाठ के हिंदी अर्थ तथा महत्व के बारे में जाना|

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.चन्द्रशेखर अष्टकम किसके द्वारा लिखा गया है?

A.ऋषि मार्कंडेय ने भगवान शिव की स्तुति के रूप में चन्द्रशेखर अष्टकम गाया था|

Q.प्रत्येक सोमवार को चन्द्रशेखर अष्टकम का पाठ करने से क्या होता है?

A.प्रत्येक सोमवार के दिन चन्द्रशेखर अष्टकम का पाठ करने से कुंडली में चन्द्र देव का नकारात्मक प्रभाव कम होता है|

Q.चंद्रशेखर का मतलब क्या होता है?

A.इस अष्टकम में भगवान शिव को चंद्रशेखर (चंद्र – चंद्रमा, शेखर – मुकुट) के रूप में बताया गया है| इसका अर्थ है जो अपने मुकुट को चंद्रमा से सुशोभित करते है|

Q.भगवान शिव को कालांतक क्यों कहा जाता है?

A.यमराज तथा भगवान शिव के मध्य भयंकर युद्ध हुआ| भगवान शिव यमराज को मृत्यु की स्थिति तक हराने के पश्चात उन्हें पुनः जीवित इस शर्त के तहत किया कि धर्मनिष्ठ व्यक्ति हमेशा जीवित रहेगा| इस समय से भगवान शिव को कालांतक (मृत्यु का अंत) के नाम से भी जाना जाने लगा|

आदित्य हृदय स्तोत्र: सम्पूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित

आदित्य हृदय स्तोत्र: सनातन धर्म वर्तमान में सबसे अधिक वृद्धि करने वाला धर्म है| इस धर्म में सभी देवी – देवताओं के साथ ही प्रकृति में उपस्थित सभी चीज़ों को पूजनीय योग्य माना जाता है| इसके अलावा भी हिन्दू धर्म में सभी देवी – देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक के लिए कोई ना कोई मंत्र, चालीसा, व अनेक प्रकार के पाठों का निर्माण किया गया|

जैसे कि हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा और भगवान श्री राम को प्रसन्न करने के रामायण का पाठ किया जाता है| उसी प्रकार जिस स्तोत्र के बारे में हम बात करेंगे| इसे भगवान सूर्य देव को प्रसन्न करने के निर्मित किया गया था| इसका नाम आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ है|

आदित्य हृदय स्तोत्र

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार अपनी कुंडली में सूर्य ग्रह को मजबूत करने के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र (Aditya Hridaya Stotra in Hindi) पाठ को सबसे बेहतर माना गया है| इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करने पर यह मनुष्य के जीवन में से सभी नकारात्मक प्रभाव होते है और सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाता है|

इससे जातक के जीवन में पूर्व से भिन्न प्रभाव देखने को मिलते है| इस पाठ करने से भक्तों को बहुत अधिक लाभ होता है| माना जाता है कि यह पाठ वाल्मीकि जी द्वारा लिखी हुई रामायण के युद्धकाण्ड का एक सौ पांचवां सर्ग है|

ऐसा कहा जाता है कि रामायण में जब भगवान श्री राम रावण से युद्ध करने से जा रहे थे| तब वहां उपस्थित ऋषि अगस्त्य ने उन्हें इस स्तोत्र का पाठ करने के लिये कहा| आदित्य हृदय स्तोत्र की रचना ऋषि अगस्त्य के द्वारा ही की गई थी|

भगवान सूर्य देव को समर्पित यह आदित्य हृदय स्तोत्र मनुष्य के भीतर शक्ति, ऊर्जा और बुद्धि का संचार करता है| आदित्य हृदय स्तोत्र के बारे में और अच्छे जानने के लिए इस लेख को पूरा पढ़े| 

आदित्य हृदय स्तोत्र क्या है ?

यह आदित्य हृदय स्तोत्र (Aditya Hridaya Stotra in Hindi) भगवान सूर्य देव को समर्पित किया गया है| हिन्दू धर्म में सूर्य देव को प्रसन्न करने व जातक की कुंडली में से सूर्य देव के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है| आदित्य हृदय स्तोत्र के बारे में उल्लेख वाल्मीकि जी के द्वारा लिखी रामायण में मिलता है|

जिसमे माना जाता है कि इस स्तोत्र के बारे में ऋषि अगस्त्य ने भगवान श्री राम को बताया था| जिसकी सहायता से वह रावण पर विजय प्राप्त कर पाए| हिन्दू धर्म में आदित्य हृदय स्तोत्र को पढना काफी लाभकारी माना गया है| इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने मात्र से ही मनुष्य के सभी पाप, कष्ट और दुख सभी तुरंत नष्ट हो जाते है|



ज्योतिषशास्त्र में भी आदित्य हृदय स्तोत्र को बहुत ही बड़ा महत्व दिया गया है| माना जाता है कि इस आदित्य हृदय स्तोत्र का सुबह नियमित से पाठ करने से मनुष्य के सभी कष्ट और दर्द दूर हो जाते है| क्योंकि जैसा हमने आपको बताया कि यह आदित्य हृदय स्तोत्र भगवान सूर्य देव को समर्पित किया गया है और सूर्य देव को सभी ग्रहों का राजा या अधिपति के रूप में भी जाना जाता है|

इसलिए जिस भी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह का प्रभाव बहुत अधिक है| उन लोगों को इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए| 

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ – Aditya Hridaya Stotra in Hindi

विनियोग:

ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टूपछन्द:, आदित्येहृदयभूतो भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोग: || 

ध्यानम् – 

नमस्सवित्रे जगदेक चक्षुसे,
जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे,
विरिश्ची नारायण शंकररात्मने ||

|| अथ आदित्य हृदय स्तोत्रम ||

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम् ||
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा ||

अर्थ – इधर भगवान श्री राम थककर चिंता में लीन हुए रणभूमि में खड़े हुए| उसी समय रावण भी युद्ध के लिए रणभूमि में आ गया| यह सब देखकर ऋषि अगस्त्य भगवान श्री राम के समीप गए और ऐसे बोले| 

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ||

अर्थ – सभी के हृदय में बसने वाले हे महाबाहो श्री राम! यह गोपनीय स्तोत्र सुनो| इस चमत्कारी स्तोत्र के जप करने से तुम अवश्य ही अपने शत्रु पर विजय पा लोगे| यह आदित्य हृदय स्तोत्र सबसे पवित्र और सभी शत्रुओं का नाश करने वाला स्तोत्र है| इसका जप करने से हमेशा ही विजय की प्राप्ति होती है| यह अत्यंत ही कल्याणकारी स्तोत्र है| 

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम् ॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ 

अर्थ – यह स्तोत्र सभी कार्यो में मंगल, पापों का नाश करने वाला है| इसी के साथ यह चिंता और शौक को भी दूर करता है और मनुष्य की आयु में भी वृद्धि करता है| जो कि अनंत किरणों से शोभायमान, नित्य उदय होने वाली, देवों और असुरों के द्वारा नमस्कृत है| तुम इस सम्पूर्ण विश्व में प्रकाश फ़ैलाने वाले संसार के स्वामी भगवान सूर्य देव का पूजन करो| 

सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ 

अर्थ – महर्षि अगस्त्य कहते है कि सभी देवता इनके रूप है| सूर्य देव अपने प्रकाश की किरणों से इस जगत को स्फूर्ति प्रदान करते है| सूर्यदेव ही अपनी ऊर्जा के माध्यम से ही इस सृष्टि में देवतागण और असुरों दोनों का पालन करते है| यही है जो ब्रह्मा, स्कन्द, शिव, इंद्र, कुबेर, प्रजापति, समय, काल, यम, चंद्रमा और वरुण आदि को प्रकट करते है|

आदित्य हृदय स्तोत्र

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः॥  

अर्थ – यह पितरों, वसु, साध्य, अश्विनीकुमारों, मरूदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण और ऋतुओं को जन्म देने वाले प्रभा के पुंज है| इनको अलग – अलग नामों से जैसे – आदित्य, सविता(जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य(सर्व व्याप्त), खग, पूषा, गभस्तिमान, भानु, हिरण्येता, दिवाकर और 

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः ।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः ॥ 

अर्थ – हरिदश्व, सहस्रार्चि, सप्तसप्ति (सात घोड़ो वाले), मरिचिमान(किरणों से सुशोभित), तिमिरोमन्थन(अंधकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तन्डक, हिरण्यगर्भ, शिशिर(स्वभाव से सुख प्रदान करने वाले), तपन(गर्मी उत्पन्न करने वाले),  भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदितिपुत्र, शंख, शीत का नाश करने वाले और 

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः ॥ 

अर्थ – व्योमनाथ, तमभेदी, ऋग ,यजु और सामवेद के पारगामी, धन वृष्टि, अपाम मित्र, विन्ध्यावीथिप्लवंग (आकाश में तीव्र गति से चलने वाले), आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोदभव है|

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥  

अर्थ – नक्षत्र, ग्रह और तारों के अधिपति, विश्वभावन (विश्व की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी तेजस्वी और द्वादशात्मा को नमस्कार है| पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है| ज्योतिर्गणों के स्वामी तथा दिन के अधिपति को नमस्कार है|



जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तुते ॥ 

अर्थ – जो जय के रूप है, विजय के रूप है, हरे रंग के घोड़ों से युक्त रथ वाले भगवान को नमस्कार है| सहस्त्रों किरणों से प्रभावान आदित्य को बारम्बार नमस्कार है| उग्र, वीर और सारंग भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है| कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेज वाले मार्तण्ड को नमन है| 

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायदित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥ 

अर्थ – आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के स्वामी है| सूर आपकी संज्ञा है| यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है| आप प्रकाश से परिपूर्ण है| सबको स्वाहा: करने वाली अग्नि के स्वरूप है| रौद्र रूप आपको नमस्कार है| अज्ञान, अन्धकार के नाशक, शीत के निवारक तथा शत्रुओं के नाशक आपका रूप अप्रमेय है| 

तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ 

अर्थ – आपकी प्रभा तप्त वर्ण के समान है| आप ही हरि (अज्ञान को हरने वाले), विश्वकर्मा (संसार की रचना करने वाले), तम या अँधेरे के नाशक, प्रकाशरूप और जगत के साक्षी आपको हमारा नमस्कार है| हे रघुनन्दन, भगवान सूर्य देव ही सभी भूतों के संहार, रचना और पालन करने वाले है| यही अपनी किरणों से गर्मी और वर्षा करते है| 

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ||
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः || 

अर्थ – यह देव सभी भूतों में अंतर्स्थित होकर उन्हें सो जाने पर भी जागते रहते है, यही अग्निहोत्री कहलाते है| यही वेद, यज्ञ और यज्ञ से मिलने वाले फल है| यह देव सम्पूर्ण लोकों की क्रिया का फल देने वाले देव है| 

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति ॥ 

अर्थ – इसमें महर्षि अगस्त्य भगवान श्री राम से कहते है कि राघव! किसी विपत्ति में, कष्ट में, कठिन मार्ग में तथा किसी भय के समय जो भी सूर्यदेव का कीर्तन या उन्हें याद करता है| उसे किसी भी प्रकार दुःख या पीड़ा सहन नहीं करना पड़ता है| आप एकाग्रचित होकर देवादिदेव सूर्यदेव का पूजन करो, इस आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार लगातार जप करने से आपको युद्ध में अवश्य ही विजय की प्राप्ति होगी| 

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥  

अर्थ – हे महाबाहो इस क्षण आप रावण का वध कर पायेंगे| इस प्रकार ऋषि अगस्त्य आये थे उसी प्रकार वपिस लौट गए| उस समय ऋषि अगस्त्य का यह उपदेश सुनकर महातेजस्वी भगवान श्री राम के सभी शोक दूर हो गई| प्रसन्न और प्रयत्नशील होकर |

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत् ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् || 

अर्थ – परम हर्षित और शुद्धचित्त होकर भगवान श्री राम ने सूर्य देव की तरफ देखा और तीन बार आदित्य हृदय स्तोत्र का जप किया| उसके पश्चात श्री राम जी ने धनुष उठाकर युद्ध के लिए आये हुए रावण को देखा और उससे युद्ध करने का निश्चय किया| 

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति || 

अर्थ – तब सभी देवताओं के बीच में खड़े भगवान सूर्य देव ने प्रसन्न होकर भगवान श्री राम की तरफ देखा और राक्षस रावण का अंत का समय निकट जानकार प्रसन्नता पूर्वक कहा “अब जल्दी करो” 

|| इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मिकिये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पस्चाधिक शततम सर्ग: || 

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ की विधि

  • सूर्यदेव की पूजा करने के लिए सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करें| इसके बाद भगवान सूर्य देव के दर्शन करते हुए ॐ घृणि सूर्याय नमः, इस मंत्र का जप करते – करते भगवान सूर्य देव को जल अर्पित करना चाहिए| 
  • सूर्य देव को जल चढ़ाते समय गायत्री मंत्र का भी जाप किया जा सकता है और इसके अलावा सूर्यदेव के समीप आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए| 
  • इस पाठ को शुक्ल पक्ष के रविवार को पढना अत्यंत शुभ माना जाता है| इस दिन यह पाठ करने भक्तों की सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है| 
  • इसका पाठ का सम्पूर्ण लाभ पाने के लिए आपको यह पाठ नित्य रूप से सूर्योदय के समय ही करना अच्छा माना गया है|

आदित्य हृदय स्तोत्र

  • इस पाठ के समाप्त होने के पश्चात आपको भगवान सूर्य देव का ध्यान करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए| 
  • अगर यह पाठ किसी जातक के लिए प्रतिदिन करना संभव नहीं है तो वह इस पाठ को प्रत्येक रविवार के दिन पढ़ सकते है| 
  • आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करते समय इस बात का ध्यान रखें कि जब भी आप यह पाठ करे तो उस दिन मांसाहारी भोजन व तेल से बना भोजन खाने से बचे| अगर हो सके तो इस दिन नमक का सेवन करने से भी बचना चाहिए|

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ से लाभ

  • जो भी व्यक्ति आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ नियमित रूप से जाप करता है तो उस व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और वह व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में भी अच्छा प्रदर्शन करता है| 
  • यदि किसी भी व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी है तो उस व्यक्ति को आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित रूप से या प्रत्येक रविवार को पाठ करना चाहिए|
  • आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने लोगों के मन से भय दूर होता है और सभी प्रकार के नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है|
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  • सरकारी विवादों के मामले में भी आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से बहुत ही जल्दी लाभ मिलता है| और प्रशासनिक अधिकारियों का सहयोग भी मिलता है| 
  • भगवान सूर्य देव को पिता का कारक भी माना गया है| आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से पुत्र और पिता के संबंध अच्छे होते है| 

निष्कर्ष

किसी भी तरह की पूजा करने के लिए हमें बहुत सारी तैयारियां करनी होती है| गावों में पूजा आसानी से हो जाती है लेकिन शहरों में लोगों के पास समय की कमी होती है| जिस वजह से वह लोग पूजा नहीं करवा पाते है तो उनकी इस समस्या का समाधान हम लेकर आये है 99Pandit के साथ| यह सबसे बेहतरीन प्लेटफार्म है जिससे आप किसी पूजा के लिए ऑनलाइन पंडित जी को बुक कर सकते है|



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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ करने से क्या होता है ?

A.इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करने पर यह मनुष्य के जीवन में से सभी नकारात्मक प्रभाव होते है और सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाता है|

Q.आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए ?

A.इस पाठ को शुक्ल पक्ष के रविवार को पढना अत्यंत शुभ माना जाता है| इस दिन यह पाठ करने भक्तों की सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है|

Q.आदित्य हृदय स्तोत्र किसने दिया था?

A.आदित्य हृदय स्तोत्र की रचना ऋषि अगस्त्य के द्वारा ही की गई थी| 

Q.आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए ?

A.इस पाठ को प्रतिदिन 1 बार अवश्य करना चाहिए| इससे सूर्य देव का आशीर्वाद मिलता है|

Khatu Shyam Ji Chalisa Lyrics: खाटू श्याम जी चालीसा

खाटू श्याम जी चालीसा (Khatu Shyam Ji Chalisa) का जाप करने से भगवान खाटू श्याम जी जिन्हें हारे का सहारा भी कहा जाता है, वह अपने भक्तों से प्रसन्न होते है तथा भक्तों की सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते है| सभी भक्तजन अपने जीवन में सुख समृद्धि पाने के लिए खाटू श्याम जी चालीसा (Khatu Shyam Ji Chalisa) का जाप करते है|

इस घोर कलयुग के समय में सभी भक्त अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए भगवान खाटू श्याम जी से प्रार्थना करते है तथा उन्हें प्रसन्न करने के लिए खाटू श्याम जी चालीसा (Khatu Shyam Ji Chalisa) का भी जाप करते हैं|

खाटू श्याम जी चालीसा

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे बगलामुखी चालीसा [Baglamukhi Chalisa], या जया एकादशी व्रत कथा [Jaya Ekadashi Vrat Katha] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

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खाटू श्याम जी चालीसा लिरिक्स हिंदी में | Khatu Shyam Chalisa Lyrics in Hindi

|| खाटू श्याम चालीसा ||

॥ दोहा॥

श्री गुरु चरणन ध्यान धर,
सुमीर सच्चिदानंद ।
श्याम चालीसा भजत हूँ,
रच चौपाई छंद ।

॥ चौपाई ॥

श्याम-श्याम भजि बारंबारा ।
सहज ही हो भवसागर पारा ॥

इन सम देव न दूजा कोई ।
दिन दयालु न दाता होई ॥

भीम सुपुत्र अहिलावाती जाया ।
कही भीम का पौत्र कहलाया ॥

यह सब कथा कही कल्पांतर ।
तनिक न मानो इसमें अंतर ॥

बर्बरीक विष्णु अवतारा ।
भक्तन हेतु मनुज तन धारा ॥

बासुदेव देवकी प्यारे ।
जसुमति मैया नंद दुलारे ॥

मधुसूदन गोपाल मुरारी ।
वृजकिशोर गोवर्धन धारी ॥

सियाराम श्री हरि गोबिंदा ।
दिनपाल श्री बाल मुकुंदा ॥

दामोदर रण छोड़ बिहारी ।
नाथ द्वारिकाधीश खरारी ॥

राधाबल्लभ रुक्मणि कंता ।
गोपी बल्लभ कंस हनंता ॥

मनमोहन चित चोर कहाए ।
माखन चोरि-चारि कर खाए ॥

मुरलीधर यदुपति घनश्यामा ।
कृष्ण पतित पावन अभिरामा ॥

मायापति लक्ष्मीपति ईशा ।
पुरुषोत्तम केशव जगदीशा ॥

विश्वपति जय भुवन पसारा ।
दीनबंधु भक्तन रखवारा ॥

प्रभु का भेद न कोई पाया ।
शेष महेश थके मुनिराया ॥

नारद शारद ऋषि योगिंदरर ।
श्याम-श्याम सब रटत निरंतर ॥

कवि कोदी करी कनन गिनंता ।
नाम अपार अथाह अनंता ॥

हर सृष्टी हर सुग में भाई ।
ये अवतार भक्त सुखदाई ॥

ह्रदय माहि करि देखु विचारा ।
श्याम भजे तो हो निस्तारा ॥

कौर पढ़ावत गणिका तारी ।
भीलनी की भक्ति बलिहारी ॥

सती अहिल्या गौतम नारी ।
भई श्रापवश शिला दुलारी ॥

श्याम चरण रज चित लाई ।
पहुंची पति लोक में जाही ॥

अजामिल अरु सदन कसाई ।
नाम प्रताप परम गति पाई ॥

जाके श्याम नाम अधारा ।
सुख लहहि दुःख दूर हो सारा ॥

श्याम सलोवन है अति सुंदर ।
मोर मुकुट सिर तन पीतांबर ॥

गले बैजंती माल सुहाई ।
छवि अनूप भक्तन मान भाई ॥

श्याम-श्याम सुमिरहु दिन-राती ।
श्याम दुपहरि कर परभाती ॥

श्याम सारथी जिस रथ के ।
रोड़े दूर होए उस पथ के ॥

श्याम भक्त न कही पर हारा ।
भीर परि तब श्याम पुकारा ॥

रसना श्याम नाम रस पी ले ।
जी ले श्याम नाम के ही ले ॥

संसारी सुख भोग मिलेगा ।
अंत श्याम सुख योग मिलेगा ॥

श्याम प्रभु हैं तन के काले ।
मन के गोरे भोले-भाले ॥

श्याम संत भक्तन हितकारी ।
रोग-दोष अध नाशे भारी ॥

प्रेम सहित जब नाम पुकारा ।
भक्त लगत श्याम को प्यारा ॥

खाटू में हैं मथुरावासी ।
पारब्रह्म पूर्ण अविनाशी ॥

सुधा तान भरि मुरली बजाई ।
चहु दिशि जहां सुनी पाई ॥

वृद्ध-बाल जेते नारि नर ।
मुग्ध भये सुनि बंशी स्वर ॥

हड़बड़ कर सब पहुंचे जाई ।
खाटू में जहां श्याम कन्हाई ॥

जिसने श्याम स्वरूप निहारा ।
भव भय से पाया छुटकारा ॥

॥ दोहा ॥

श्याम सलोने संवारे,
बर्बरीक तनुधार ।
इच्छा पूर्ण भक्त की,
करो न लाओ बार

॥ इति श्री खाटू श्याम चालीसा ॥

खाटू श्याम जी आरती

Khatu Shyam Ji Chalisa Lyrics in English | श्याम-श्याम भजि बारंबारा

|| Khatu Shyam Chalisa ||

॥ Doha ॥

Shri Gurucharanan dhyaan dhar,
Sumir sachchidaanand.
Shyaam chaalisa bhajat hoon,
Rach chaupaai chhand.

॥ Chaupaai ॥

Shyaam-shyaam bhaji baarambaara.
Sahaj hi ho bhavsaagar paara.

Inn sam dev na duja koi.
Din dayaalu na daata hoi.

Bheem sputra ahilaavaatee jaaya.
Kaheen Bheem ka pautra kahalaaya.

Yeh sab katha kahi kalpaantar.
Tanik na maano ismein antar.

Barbareek Vishnu avataara.
Bhakton hetu manuj tan dhaara.

Basudev Devaki pyaare.
Jasumati maiyya Nand dhulaare.

Madhusudan Gopal Muraari.
Vrjkishor Govardhan dhari.

Siyaaram Shri Hari Govinda.
Dinpaal Shri Baal Mukunda.

Damodar ran Chhod Bihari.
Naath Dwarikadheesh kharaari.

RadhaBallabh Rukmani Kanta.
Gopi Ballabh Kans hanta.

Manmohan chit chor Kahaaye.
Maakhan chori-chhaari kar khaaye.

MurliDhar Yadupati Ghanashyama.
Krishna patit paavan Abhirama.

Mayapati Lakshmipati Ishaa.
Purushottam Keshav Jagadisha.

Vishwapati jai bhuvan pasaara.
Deenabandhu bhakton rakhvaara.

Prabhu ka bhed na koi paaya.
Shesh Mahesh thake Muniraaya.

Narad Shaarad Rishi Yogindrar.
Shyaam-shyaam sab ratat nirantar.

Kavi kodi kari kanan gintaa.
Naam apaar athaah anantaa.

Har srishti har sug mein bhaai.
Ye avataar bhakt sukhdaai.

Hriday maahi kari dekhu vichaara.
Shyaam bhaje to ho nistaara.

Kaur padhavat ganika taari.
Bheelani ki bhakti balihari.

Sati Ahilya Gautam naari.
Bhai shraapvash shila dhulaari.

Shyaam charan raj chit laai.
Pahunchi pati lok mein jaahi.

Ajamil aru sadan kasaai.
Naam prataap param gati paai.

Jaake Shyaam naam adhaara.
Sukh lahai dukh door ho saara.

Shyaam salovan hai ati sundar.
Mor mukut sir tan peetaambar.

Gale baijanti maal suhaai.
Chhavi anoop bhakton maan bhaai.

Shyaam-shyaam sumirahu din-raati.
Shyaam dupahari kar prabhaati.

Shyaam saarthi jis rath ke.
Rode door hoye us path ke.

Shyaam bhakt na kahee par haara.
Bheer pari tab Shyaam pukaara.

Rasna Shyaam naam ras pee le.
Jee le Shyaam naam ke hi le.

Sansaari sukh bhog milega.
Ant Shyaam sukh yog milega.

Shyaam prabhu hain tan ke kaale.
Man ke gore bhole-bhaale.

Shyaam sant bhakton hitkaari.
Rog-dosh adh nashe bhaari.

Prem sahit jab naam pukaara.
Bhakt lagat Shyaam ko pyaara.

Khaatu mein hain Mathura vaasi.
Parbrahm poorn avinaashi.

Sudha taan bhari murli bajaai.
Chahu dishi jahaan suni paai.

Vridh-baal jete naari nar.
Mugdh bhaye suni bansi swar.

Hadbad kar sab pahunchi jaai.
Khaatu mein jahaan Shyaam Kanhai.

Jisne Shyaam swaroop nihaara.
Bhav bhay se paaya chhutkaara.

॥ Doha ॥

Shyaam salon ne sanvaare,
Barbareek tanudhaar.
Ichha poorn bhakt ki,
Karo na laao baar.

॥ Iti Shri Khatu Shyam Chalisa ॥

Hanuman Bahuk Lyrics: हनुमान बाहुक पाठ हिंदी में

हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) का जाप करने से भगवान हनुमान जी अपने भक्तों से बहुत ही प्रसन्न होते है| जैसा कि आप सभी को यह ज्ञात है कि मंगलवार का दिन श्री राम भक्त हनुमान जी को समर्पित किया गया है| मंगलवार के दिन सम्पूर्ण विधि-विधान से उपवास किया जाता है तथा हनुमान जी की पूजा के साथ-साथ हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) का जाप भी किया जाता है|

माना जाता है कि मंगलवार एवं शनिवार के दिन हनुमान जी की पूजा व हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) करने से भक्तों के मन से भय , संकट तथा उन्हें सभी प्रकार के रोग दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है| हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) की रचना तुलसीदास के द्वारा की गई थी|

हनुमान बाहुक पाठ

कलयुग के कारण हो रही पीड़ा को दूर करने के लिए तुलसीदास जी ने हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) की रचना की थी| तो आइये जानते है हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) के लिरिक्स के बारे में जिससे भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते है| हनुमान बाहुक पाठ का जाप करने से रुके हुए कार्य भी जल्दी पूर्ण होते है|

इसके आलवा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे अंगारक दोष पूजा (Angarak Dosh Puja), सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja), तथा नामकरण पूजा (Namkaran Puja) के लिए हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

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हनुमान बाहुक पाठ लिरिक्स हिंदी में – Hanuman Bahuk Lyrics in Hindi

श्रीगणेशाय नमः
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीमद्-गोस्वामी-तुलसीदास-कृत

|| छप्पय ||

सिंधु-तरन, सिय-सोच-हरन, रबि-बाल-बरन तनु ।
भुज बिसाल, मूरति कराल कालहुको काल जनु ।।
गहन-दहन-निरदहन लंक निःसंक, बंक-भुव ।
जातुधान-बलवान-मान-मद-दवन पवनसुव ।।
कह तुलसिदास सेवत सुलभ सेवक हित सन्तत निकट ।
गुन-गनत, नमत, सुमिरत, जपत समन सकल-संकट-विकट ।।१।।

स्वर्न-सैल-संकास कोटि-रबि-तरुन-तेज-घन ।
उर बिसाल भुज-दंड चंड नख-बज्र बज्र-तन ।।
पिंग नयन, भृकुटी कराल रसना दसनानन ।
कपिस केस, करकस लँगूर, खल-दल बल भानन ।।
कह तुलसिदास बस जासु उर मारुतसुत मूरति बिकट ।
संताप पाप तेहि पुरुष पहिं सपनेहुँ नहिं आवत निकट ।।२।।

|| झूलना ||

पंचमुख-छमुख-भृगु मुख्य भट असुर सुर, सर्व-सरि-समर समरत्थ सूरो ।
बाँकुरो बीर बिरुदैत बिरुदावली, बेद बंदी बदत पैजपूरो ।।
जासु गुनगाथ रघुनाथ कह, जासुबल, बिपुल-जल-भरित जग-जलधि झूरो ।
दुवन-दल-दमनको कौन तुलसीस है, पवन को पूत रजपूत रुरो ।।३।।

|| घनाक्षरी ||

भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो ।
पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।।
कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो।
बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।।४।।

भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो ।
कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ।।
बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूँतें घाटि नभतल भो ।
नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ।।५

गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो ।
द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।।
संकट समाज असमंजस भो रामराज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो ।
साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ।।६

कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो ।
जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ।।
कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईंधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो ।
भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ।।७

दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको, तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो ।
सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ।।
दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो ।
ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ।।८

दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को ।
पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ।।
लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को ।
राम को दुलारो दास बामदेव को निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ।।९।।

महाबल-सीम महाभीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को ।
कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीर को ।।
दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को ।
सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ।।१०।।

रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि, हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो ।
धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ।।
खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो ।
आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ।।११।।

सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ।।
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को ।
सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ-तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ।।१२।।

सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ।।
केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की ।
बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ।।१३।।

करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ ।
बामदेव-रुप भूप राम के सनेही, नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।।
आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ ।
मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ।।१४।।

मन को अगम, तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं ।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ।।१५।।

हनुमान बाहुक पाठ

|| सवैया ||

जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो ।
ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ।।
साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहाँ तुलसी को न चारो ।
दोष सुनाये तें आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तौ हिय हारो ।।१६।।

तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले ।।
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले ।
बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ।।१७।।

सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से ।
तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से ।।
तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से ।
बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ।।१८।।

अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुंजर केहरि-बारो ।।
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो ।
पाप-तें साप-तें ताप तिहूँ-तें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो ।।१९।।

|| घनाक्षरी ||

जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन, मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ।।
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ।।२०।।

बालक बिलोकि, बलि बारेतें आपनो कियो, दीनबन्धु दया कीन्हीं निरुपाधि न्यारिये ।
रावरो भरोसो तुलसी के, रावरोई बल, आस रावरीयै दास रावरो बिचारिये ।।
बड़ो बिकराल कलि, काको न बिहाल कियो, माथे पगु बलि को, निहारि सो निवारिये ।
केसरी किसोर, रनरोर, बरजोर बीर, बाँहुपीर राहुमातु ज्यौं पछारि मारिये ।।२१।।

उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो सँभारिये ।
राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।।
साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये ।
पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यौं पकरि कै बदन बिदारिये ।।२२।।

राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये ।
मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।।
कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै बिचारिये ।
महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह-पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ।।२३।।

लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ।।
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ।।२४।।

करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बकभगिनी काहू तें कहा डरैगी ।
बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहूबल बालक छबीले छोटे छरैगी ।।
आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसी की, बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ।।२५।।

भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की ।
करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ।।
पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की ।
आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ।।२६।।

सिंहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ।।
तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महँतारी है ।
भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ।।२७।।

तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहु की ।।
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की ।
आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ।।२८।।

टूकनि को घर-घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ।।
इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु, कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ।।२९।।

आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ।।
करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ।।३०।।

दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ।।
एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को ।
थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ।।३१।।

देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ।।
घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ।।३२।।

तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ।।
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के ।
तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ।।३३।।

पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ।।
अँबु तू हौं अँबुचर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ।।३४।।

घेरि लियो रोगनि, कुजोगनि, कुलोगनि ज्यौं, बासर जलद घन घटा धुकि धाई है ।
बरसत बारि पीर जारिये जवासे जस, रोष बिनु दोष धूम-मूल मलिनाई है ।।
करुनानिधान हनुमान महा बलवान, हेरि हँसि हाँकि फूँकि फौजैं ते उड़ाई है ।
खाये हुतो तुलसी कुरोग राढ़ राकसनि, केसरी किसोर राखे बीर बरिआई है ।।३५।।

हनुमान बाहुक पाठ

|| सवैया ||

राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो ।
पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।।
बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो ।
श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ।।३६।।

|| घनाक्षरी ||

काल की करालता करम कठिनाई कीधौं, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ।।
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ।।३७।।

पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुँह पीर, जरजर सकल पीर मई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।।
हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है ।
कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ।।३८।।

बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुँहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं ।
राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ।।
सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ, जिनके समूह साके जागत जहान हैं ।
तुलसी सँभारि ताड़का सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ।।३९।।

बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।।
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ।
तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।।४०।।

असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को ।
तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ।।
नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को ।
ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ।।४१।।

जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को ।
तुलसी के दुहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँउ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ।।
मोको झूटो साँचो लोग राम को कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को ।
भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ।।४२।।

सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।।
ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ।।४३।।

कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।।
माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये ।
तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि, हौं हूँ रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ।।४४।।