Namo Namo Durge Sukh Karni Lyrics: दुर्गा चालीसा का पाठ

दुर्गा माता की आराधना करने के लिए दुर्गा चालीसा (Durga Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ बहुत ही श्रेष्ठ माना जाता है| हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि त्यौहार के नौ दिनों में दुर्गा चालीसा नियमित तथा पूर्ण श्रद्धा के साथ पाठ करने से शत्रुओं से छुटकारा मिलता है|

दुर्गा चालीसा का पाठ करने से भक्तों के मन की सभी इच्छाएं माता दुर्गा पूर्ण कर देती है| धार्मिक ग्रंथों के अनुसार दुर्गा चालीसा का पाठ नवरात्रि के समय करना बहुत ही शुभ माना जाता है|

दुर्गा चालीसा

माँ दुर्गा के जो भी भक्त नवरात्रि का उपवास करते है| उन्हें अपनी सभी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए दुर्गा चालीसा का पाठ निश्चित रूप से करना चाहिए|

इसके अलावा यह भी माना जाता है कि दुर्गा चालीसा का जाप व्यक्ति के भीतर अध्यात्मिक तथा भावनात्मक दृष्टिकोण को जागृत करने में सहायता करता है|

दुर्गा चालीसा का पाठ व्यक्ति को मानसिक शांति प्रदान करता है तथा मन में चल रहे अनावश्यक विचारों से भी मुक्ति दिलाता है|

ऐसा भी कहा जाता है कि दुर्गा चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति के अन्दर सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है एवं बुरी शक्तियों से लड़ने के लिए ताकत मिलती है|

दुर्गा चालीसा का पाठ भक्तों को सभी प्रकार की परेशानियों से बचाता है| अब हम आपको 99Pandit के बारे में जानकारी देंगे|

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Namo Namo Durge Sukh Karni Lyrics – दुर्गा चालीसा हिंदी में

|| दुर्गा चालीसा ||

नमो नमो दुर्गे सुख करनी ।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी ॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी ।
तिहूँ लोक फैली उजियारी ॥

शशि ललाट मुख महाविशाला ।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला ॥

रूप मातु को अधिक सुहावे ।
दरश करत जन अति सुख पावे ॥

तुम संसार शक्ति लै कीना ।
पालन हेतु अन्न धन दीना ॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला ।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला ॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी ।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी ॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें ।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ॥

रूप सरस्वती को तुम धारा ।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा ॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा ।
परगट भई फाड़कर खम्बा ॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो ।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो ॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं ।
श्री नारायण अंग समाहीं ॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा ।
दयासिन्धु दीजै मन आसा ॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी ।
महिमा अमित न जात बखानी ॥

मातंगी अरु धूमावति माता ।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता ॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी ।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी ॥

केहरि वाहन सोह भवानी ।
लांगुर वीर चलत अगवानी ॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै ।
जाको देख काल डर भाजै ॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला ।
जाते उठत शत्रु हिय शूला ॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत ।
तिहुँलोक में डंका बाजत ॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे ।
रक्तबीज शंखन संहारे ॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी ।
जेहि अघ भार मही अकुलानी ॥

रूप कराल कालिका धारा ।
सेन सहित तुम तिहि संहारा ॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब ।
भई सहाय मातु तुम तब तब ॥

अमरपुरी अरु बासव लोका ।
तब महिमा सब रहें अशोका ॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी ।
तुम्हें सदा पूजे नरनारी ॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावैं ।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें ॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई ।
जन्ममरण ताकौ छुटि जाई ॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी ।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी ॥

शंकर आचारज तप अति कीनो ।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो ॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को ।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको ॥

शक्ति रूप का मरम न पायो ।
शक्ति गई तब मन पछितायो ॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी ।
जय जय जय जगदम्ब भवानी ॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा ।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा ॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो ।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो ॥

आशा तृष्णा निपट सतावें ।
मोह मदादिक सब बिनशावें ॥

शत्रु नाश कीजै महारानी ।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी ॥

करो कृपा हे मातु दयाला ।
ऋद्धि सिद्धि दै करहु निहाला ॥

जब लगि जिऊँ दया फल पाऊं ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊं ॥

श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै ।
सब सुख भोग परमपद पावै ॥

देवीदास शरण निज जानी ।
कहु कृपा जगदम्ब भवानी ॥

|| दोहा ||

शरणागत रक्षा करे,
भक्त रहे निशंक ।
मैं आया तेरी शरण में,
मातु लिजिये अंक ॥

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा ॥

दुर्गा चालीसा

Durga Chalisa Lyrics in English – नमो नमो दुर्गे सुख करनी

|| Durga Chalisa ||

Namo Namo Durge Sukh Karni |
Namo Namo Ambe Dukh Harni ||

NIrankar Hai Jyoti Tumhari |
Tihun Lok Feli Ujiyari ||

Shashi Lalaat Mukh Maha Vishala |
Netra Lal Bhrikutee Vikrala ||

Roop Maatu Ko Adhik Suhaave |
Darshan Karat Jan Ati Sukh Paave ||

Tum Sansar Shakti Lai Keena |
Palan Hetu Anna Dhan Deena ||

Annapoorna Hui Jag Pala |
Tumhi Aadi Sundari Bala ||

Pralaykaal Sab Naashan Haari |
Tum Gauri Shiv Shankar Pyari ||

Shiv Yogi Tumhre Gun Gaavein |
Brahma Vishnu Tumhein Nit Dhyavein ||

Roop Saraswati Ko Tum Dhara |
De Subuddhi Rishi Munin Ubara ||

Dharyo Roop Narsingha Ko Amba |
Pragat Bhayi Phaad Kar Khamba ||

Raksha Kari Prahlaad Bachayo |
Hiranyaksha ko Swarg Pathayo ||

Laksmi Roop Dharo Jag Mahin |
Shree Narayan Anga Samahin ||

Ksheer Sindhu Mein Karat Vilasa |
Daya Sindhu Dije Man Aasa ||

Hingalaj Mein Tum Hi Bhawani |
Mahima Amit Na Jaat Bakhani ||

Matangi Aru Dhoomawati Mata |
Bhuvneshwari Bagala Sukhdata

Shree Bhairav Tara Jag Tarani |
Chhinna Bhala Bhava Dukh Nivarini ||

Kehri Vahan Soha Bhavani |
Laangur Veer Chalata Agavani ||

Kar Mein Khappar Khadaga Virajay |
Jako Dekh Kaal Dar Bhajey ||

Sohe Astra Aur Trishula |
Jaate Uthat Shatru Hiya Shoola ||

Nagarkot Mein Tumhi Virajat |
Tihun Lok Mein Danka Baajat ||

Shumbh – Nishumbh Daanv Tum Maare |
Rakta Beej Shankhan Sanhaare ||

Mahishasur Nrip Ati Abhimaani |
Jehi Agh Bhar Mahi Akulaani ||

Roop Karaal Kalika Dhara |
Sen Sahita Tum Tihin Sanhara ||

Pari Gaadh Santan Par Jab Jab |
Bhayi Sahay Matu Tum Tab Tab ||

Amarpuri Aru Baasav Lokaa |
Tab Mahima Sab Rahe Ashoka ||

Jwala Mein Hai Jyoti Tumhari |
Tumhein Sada Poojey Nar Nari ||

Prem Bhakti Se Jo Yash Gaave |
Dukh Daaridra Nikat Nahin Aave ||

Dhyaave Tumhein Jo Nar Man Layi |
Janma Maran Tako Chhouti Jaayi ||

Jogi Sur Muni Kahat Pukaari |
Yog Na Hoye Bina Shakti Tumhari ||

Shankar Aacharaj Tap Ati Keenho |
Kaam Aru Krodh Jeeti Sab Leenho ||

Nishidin Dhayn Dharo Shankar Ko |
Kahu Kaal Nahin Sumiron Tumko ||

Shakti Roop Ka Maram Na Payo |
Shakti Gayi Tab Man Pachitayo ||

Sharnagat Huyi Kirti Bakhani |
Jai Jai Jai Jagdamb Bhavani ||

Bhayi Prasann Aadi Jagadamba |
Dayi Shakti Nahin Keen Vilamba ||

Mauko Maatu Kashta Ati Ghero |
Tum Bin Kaun Harey Dukh Mero ||

Asha Trishna Nipat Satavein |
Moh Madadik Sab Binshaave ||

Shatru Nash Kijey Maharani |
Sumiron Ikchit Tumhein Bhavani ||

Karo Kripa Hey Maatu Dayala |
Riddhi Siddhi Dey Karahou Nihaala ||

Jab Lagi Jiyoun Daya Phal Paoun |
Tumhro Yash Mein Sada Sunaoun ||

Shree Durga Chalisa Jo Koi Gaave |
Sab Sukh Bhog Parampad Pave ||

Devidas Sharan Nij Jaani |
Kahun Kripa Jagadamb Bhavani ||

|| Doha ||

Sharanaagat Raksha Kare,
Bhakt Rahe Nishank ।
Main Aaya Teri Sharan Me,
Maatu Lijiye Ank ॥

Aigiri Nandini Lyrics in Sanskrit: महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम संस्कृत में

अयि गिरिनन्दिनि के नाम से जाना जाने वाला महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम दुर्गा माता का एक लोकप्रिय देवी मंत्र है| ऊर्जा, लय तथा शब्दों को आवधिक स्विंग इस महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम [Aigiri Nandini Lyrics in Sanskrit] को वास्तव में एक उत्कृष्ट मंत्र बनाती है|

कहा जाता है कि देवी दुर्गा माता के इस महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम [Aigiri Nandini Lyrics in Sanskrit] की रचना शंकराचार्य के द्वारा की गई थी|

Mahishasur Mardini Stotram

इस महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम में माँ पार्वती के अवतार माता दुर्गा तथा राक्षस महिषासुर के युद्ध का बखान किया गया है| इस मंत्र को महिषासुर मरिधिनी श्लोक भी कहा जाता है|

महिषासुर मर्दिनी देवी दुर्गा का रूप माना जाता है| इस महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम [Aigiri Nandini Lyrics in Sanskrit] का जप हमारी आत्मा के भीतर से सभी प्रकार के भय को नष्ट कर देती है|

इस महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम का जाप नवरात्रि के समय करना बहुत ही शुभ माना जाता है| आगे हम आपको महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम मंत्र हिंदी भाषा में उपलब्ध करवा रहे है| जिसका उच्चारण आप दुर्गा पूजा के समय कर सकते है| अब हम आपको 99Pandit के बारे में जानकारी देंगे|

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Aigiri Nandini Lyrics in Sanskrit – महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम

|| महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम ||

अयि गिरिनन्दिनि नन्दितमेदिनि विश्वविनोदिनि नन्दिनुते
गिरिवरविन्ध्यशिरोऽधिनिवासिनि विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते ।
भगवति हे शितिकण्ठकुटुम्बिनि भूरिकुटुम्बिनि भूरिकृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शङ्करतोषिणि किल्बिषमोषिणि घोषरते
दनुजनिरोषिणि दितिसुतरोषिणि दुर्मदशोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि जगदम्ब मदम्ब कदम्ब वनप्रियवासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्गहिमलय शृङ्गनिजालय मध्यगते ।
मधुमधुरे मधुकैटभगञ्जिनि कैटभभञ्जिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि शतखण्ड विखण्डितरुण्ड वितुण्डितशुण्द गजाधिपते
रिपुगजगण्ड विदारणचण्ड पराक्रमशुण्ड मृगाधिपते ।
निजभुजदण्ड निपातितखण्ड विपातितमुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि रणदुर्मद शत्रुवधोदित दुर्धरनिर्जर शक्तिभृते
चतुरविचार धुरीणमहाशिव दूतकृत प्रमथाधिपते ।
दुरितदुरीह दुराशयदुर्मति दानवदुत कृतान्तमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि शरणागत वैरिवधुवर वीरवराभय दायकरे
त्रिभुवनमस्तक शुलविरोधि शिरोऽधिकृतामल शुलकरे ।
दुमिदुमितामर धुन्दुभिनादमहोमुखरीकृत दिङ्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि निजहुङ्कृति मात्रनिराकृत धूम्रविलोचन धूम्रशते
समरविशोषित शोणितबीज समुद्भवशोणित बीजलते ।
शिवशिवशुम्भ निशुम्भमहाहव तर्पितभूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

धनुरनुषङ्ग रणक्षणसङ्ग परिस्फुरदङ्ग नटत्कटके
कनकपिशङ्ग पृषत्कनिषङ्ग रसद्भटशृङ्ग हताबटुके ।
कृतचतुरङ्ग बलक्षितिरङ्ग घटद्बहुरङ्ग रटद्बटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

सुरललना ततथेयि तथेयि कृताभिनयोदर नृत्यरते
कृत कुकुथः कुकुथो गडदादिकताल कुतूहल गानरते ।
धुधुकुट धुक्कुट धिंधिमित ध्वनि धीर मृदंग निनादरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

जय जय जप्य जयेजयशब्द परस्तुति तत्परविश्वनुते
झणझणझिञ्झिमि झिङ्कृत नूपुरशिञ्जितमोहित भूतपते ।
नटित नटार्ध नटी नट नायक नाटितनाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि सुमनःसुमनःसुमनः सुमनःसुमनोहरकान्तियुते
श्रितरजनी रजनीरजनी रजनीरजनी करवक्त्रवृते ।
सुनयनविभ्रमर भ्रमरभ्रमर भ्रमरभ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

सहितमहाहव मल्लमतल्लिक मल्लितरल्लक मल्लरते
विरचितवल्लिक पल्लिकमल्लिक झिल्लिकभिल्लिक वर्गवृते ।
शितकृतफुल्ल समुल्लसितारुण तल्लजपल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अविरलगण्ड गलन्मदमेदुर मत्तमतङ्ग जराजपते
त्रिभुवनभुषण भूतकलानिधि रूपपयोनिधि राजसुते ।
अयि सुदतीजन लालसमानस मोहन मन्मथराजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

कमलदलामल कोमलकान्ति कलाकलितामल भाललते
सकलविलास कलानिलयक्रम केलिचलत्कल हंसकुले ।
अलिकुलसङ्कुल कुवलयमण्डल मौलिमिलद्बकुलालिकुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

Mahishasur Mardini Stotram

करमुरलीरव वीजितकूजित लज्जितकोकिल मञ्जुमते
मिलितपुलिन्द मनोहरगुञ्जित रञ्जितशैल निकुञ्जगते ।
निजगणभूत महाशबरीगण सद्गुणसम्भृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

कटितटपीत दुकूलविचित्र मयुखतिरस्कृत चन्द्ररुचे
प्रणतसुरासुर मौलिमणिस्फुर दंशुलसन्नख चन्द्ररुचे
जितकनकाचल मौलिमदोर्जित निर्भरकुञ्जर कुम्भकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

विजितसहस्रकरैक सहस्रकरैक सहस्रकरैकनुते
कृतसुरतारक सङ्गरतारक सङ्गरतारक सूनुसुते ।
सुरथसमाधि समानसमाधि समाधिसमाधि सुजातरते ।
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति योऽनुदिनं सुशिवे
अयि कमले कमलानिलये कमलानिलयः स कथं न भवेत् ।
तव पदमेव परम्पदमित्यनुशीलयतो मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

कनकलसत्कलसिन्धुजलैरनुषिञ्चति तेगुणरङ्गभुवम्
भजति स किं न शचीकुचकुम्भतटीपरिरम्भसुखानुभवम् ।
तव चरणं शरणं करवाणि नतामरवाणि निवासि शिवम्
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूतपुरीन्दु मुखी सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते ।
मम तु मतं शिवनामधने भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

अयि मयि दीन दयालुतया कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि यथासि तथानुमितासिरते ।
यदुचितमत्र भवत्युररीकुरुतादुरुतापमपाकुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि रम्यकपर्दिनि शैलसुते ॥

Vishwakarma Chalisa: भगवान विश्वकर्मा चालीसा पाठ

विश्वकर्मा चालीसा [Vishwakarma Chalisa] का पाठ भगवान विश्वकर्मा की आराधना करने के लिए किया जाता है| भगवान विश्वकर्मा जी को इस सृष्टि का सृजनकर्ता माना जाता है|

विश्वकर्मा जी की आरती करने के पश्चात विश्वकर्मा चालीसा [Vishwakarma Chalisa] का पाठ पूर्ण श्रद्धा के साथ करने से नवीन निर्माण की शक्ति प्राप्त होती है|

भगवान विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर विश्वकर्मा चालीसा [Vishwakarma Chalisa] के पाठ का जाप करना बहुत ही शुभ माना जाता है| इस विश्वकर्मा चालीसा [Vishwakarma Chalisa] का प्रारंभ “जय श्री विश्वकर्म भगवाना” से होता है|

विश्वकर्मा चालीसा

विश्वकर्मा चालीसा [Vishwakarma Chalisa] में भगवान विश्वकर्मा के गुणों तथा उनकी महिमा का वर्णन किया गया है|

भगवान विश्वकर्मा जी को औजार, मशीन तथा उपकरण का देवता माना जाता है| इस चालीसा का पाठ करने से विश्वकर्मा भगवान बहुत प्रसन्न होते है|

भगवान विश्वकर्मा के प्रसन्न होने से तथा उनकी कृपा से व्यवसाय तथा नौकरी में तरक्की मिलती है| भगवान विश्वकर्मा जी की पूजा करने से व्यक्ति को चारों और से ही उन्नति की प्राप्ति होती है|



बता दे कि हिन्दू धर्म मे जांगिड़ ब्राह्मण समाज के लोग भगवान विश्वकर्मा जी को बहुत मानते है| प्रत्येक वर्ष 17 सितंबर या कन्या संक्रांति के दिन विश्वकर्मा जयंती मनाई जाती है|

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विश्वकर्मा चालीसा पाठ – Vishwakarma Chalisa Lyrics in Hindi

|| विश्वकर्मा चालीसा ||

|| दोहा ||

श्री विश्वकर्म प्रभु वन्दऊं,
चरणकमल धरिध्यान ।
श्री, शुभ, बल अरु शिल्पगुण,
दीजै दया निधान ॥

|| चौपाई ||

जय श्री विश्वकर्म भगवाना ।
जय विश्वेश्वर कृपा निधाना ॥

शिल्पाचार्य परम उपकारी ।
भुवना-पुत्र नाम छविकारी ॥

अष्टमबसु प्रभास-सुत नागर ।
शिल्पज्ञान जग कियउ उजागर ॥

अद्‍भुत सकल सृष्टि के कर्ता ।
सत्य ज्ञान श्रुति जग हित धर्ता ॥

अतुल तेज तुम्हतो जग माहीं ।
कोई विश्व मंह जानत नाही ॥

विश्व सृष्टि-कर्ता विश्वेशा ।
अद्‍भुत वरण विराज सुवेशा ॥

एकानन पंचानन राजे ।
द्विभुज चतुर्भुज दशभुज साजे ॥

चक्र सुदर्शन धारण कीन्हे ।
वारि कमण्डल वर कर लीन्हे ॥

शिल्पशास्त्र अरु शंख अनूपा ।
सोहत सूत्र माप अनुरूपा ॥

धनुष बाण अरु त्रिशूल सोहे ।
नौवें हाथ कमल मन मोहे ॥

दसवां हस्त बरद जग हेतु ।
अति भव सिंधु मांहि वर सेतु ॥

सूरज तेज हरण तुम कियऊ ।
अस्त्र शस्त्र जिससे निरमयऊ ॥

चक्र शक्ति अरू त्रिशूल एका ।
दण्ड पालकी शस्त्र अनेका ॥

विष्णुहिं चक्र शूल शंकरहीं ।
अजहिं शक्ति दण्ड यमराजहीं ॥

इंद्रहिं वज्र व वरूणहिं पाशा ।
तुम सबकी पूरण की आशा ॥

भांति-भांति के अस्त्र रचाए ।
सतपथ को प्रभु सदा बचाए ॥

अमृत घट के तुम निर्माता ।
साधु संत भक्तन सुर त्राता ॥

लौह काष्ट ताम्र पाषाणा ।
स्वर्ण शिल्प के परम सजाना ॥

विद्युत अग्नि पवन भू वारी ।
इनसे अद्भुत काज सवारी ॥

खान-पान हित भाजन नाना ।
भवन विभिषत विविध विधाना ॥

विविध व्सत हित यत्रं अपारा ।
विरचेहु तुम समस्त संसारा ॥

द्रव्य सुगंधित सुमन अनेका ।
विविध महा औषधि सविवेका ॥

शंभु विरंचि विष्णु सुरपाला ।
वरुण कुबेर अग्नि यमकाला ॥

तुम्हरे ढिग सब मिलकर गयऊ ।
करि प्रमाण पुनि अस्तुति ठयऊ ॥

भे आतुर प्रभु लखि सुर-शोका ।
कियउ काज सब भये अशोका ॥

अद्भुत रचे यान मनहारी ।
जल-थल-गगन मांहि-समचारी ॥

शिव अरु विश्वकर्म प्रभु मांही ।
विज्ञान कह अंतर नाही ॥

बरनै कौन स्वरूप तुम्हारा ।
सकल सृष्टि है तव विस्तारा ॥

रचेत विश्व हित त्रिविध शरीरा ।
तुम बिन हरै कौन भव हारी ॥

मंगल-मूल भगत भय हारी ।
शोक रहित त्रैलोक विहारी ॥

चारो युग परताप तुम्हारा ।
अहै प्रसिद्ध विश्व उजियारा ॥

ऋद्धि सिद्धि के तुम वर दाता ।
वर विज्ञान वेद के ज्ञाता ॥

मनु मय त्वष्टा शिल्पी तक्षा ।
सबकी नित करतें हैं रक्षा ॥

पंच पुत्र नित जग हित धर्मा ।
हवै निष्काम करै निज कर्मा ॥

प्रभु तुम सम कृपाल नहिं कोई ।
विपदा हरै जगत मंह जोई ॥

जै जै जै भौवन विश्वकर्मा ।
करहु कृपा गुरुदेव सुधर्मा ॥

इक सौ आठ जाप कर जोई ।
छीजै विपत्ति महासुख होई ॥

पढाहि जो विश्वकर्म-चालीसा ।
होय सिद्ध साक्षी गौरीशा ॥

विश्व विश्वकर्मा प्रभु मेरे ।
हो प्रसन्न हम बालक तेरे ॥

मैं हूं सदा उमापति चेरा ।
सदा करो प्रभु मन मंह डेरा ॥

॥ दोहा ॥

करहु कृपा शंकर सरिस,
विश्वकर्मा शिवरूप ।
श्री शुभदा रचना सहित,
ह्रदय बसहु सूर भूप ॥

विश्वकर्मा चालीसा

Vishwakarma Chalisa Lyrics in English – जय श्री विश्वकर्म भगवाना, जय विश्वेश्वर कृपा निधाना

|| Vishwakarma Chalisa ||

|| Doha ||

Shri Vishwakarma Prabhu Vandau,
Charan-kamal dharidhyan.
Shri, shubh, bal aru shilpgun,
Dijai daya nidhan.

|| Chaupai ||

Jai Shri Vishwakarma Bhagwana.
Jai Vishweshwar kripa nidhana.

Shilpacharya param upkari.
Bhuvan-putra naam chhavikari.

Ashtam basu Prabhasut nagar.
Shilp gyan jag kiyou ujagar.

Adbhut sakal srishti ke karta.
Satya gyan shruti jag hit dharta.

Atul tej tumhato jag maheen.
Koi vishwa manh Jaanat Nahi.

Vishwa srishti-karta Vishwesha.
Adbhut varan viraj suvesha.

Eka-nan panchanan raaje.
Dvibhuj chaturbhuj das bhuj saaje.

Chakra sudarshan dharan kiya.
Vari kamandal var kar liya.

Shilpshastra aru shankh Anupa.
Sohat sutra maap anurupa.

Dhanush ban aru Trishul sohe.
Nauben hath kamal man mohe.

Dasaven hast barad jag hetu.
Ati bhav sindhu maanhi var setu.

Sooraj tej haran tum kiyo.
Astra shastra jisase nirmyo.

Chakra shakti aru trishul eka.
Dand palkee shastra aneka.

Vishnuhim chakra shool Shankarhi.
Ajahim shakti dand Yamarajhi.

Indrahim vajra aru varunahim pasha.
Tum sabkee poorn ki aasha.

Bhanti-Bhanti ke astra Rachaye.
Satpath ko prabhu sada Bachaye.

Amrit ghat ke tum nirmata.
Sadhu sant bhaktan sur traata.

Lauh kaasht taamra paashaanahim.
Swarn shilp ke param sajana.

Vidyut agni pavan bhu vaaree.
Inase adbhut kaaj savaare.

Khaan-paan hit bhaajan naana.
Bhavan Vibhishat Vividh Vidhana.

Vividh vashat hit yatram apaara.
Virachehu tum samast sansara.

Dravya sugandhit suman aneka.
Vividh maha Aushadhi Saviweka.

Shambhu viranchi Vishnu surpala.
Varun Kubera agni Yama kaala.

Tumhare dhig sab milakar gayoo.
Kari pramaan puni astuti thayoo.

Bhe aatur prabhu lakhi sur-shoka.
Kiyou kaaj sab bhaye ashoka.

Adbhut rache yaan manhaaree.
Jal-thal-gagan maanhi-samacharee.

Shiv Aru Vishwakarma Prabhu Maanhi.
Vigyaan kah antar nahee.

Barnai kaun swaroop tumhaara.
Sakal srishti hai tav vistara.

Rachet Vishwa hit Trividh Shareera.
Tum bin harai kaun bhav haaree.

Mangal-mool bhakt bhay haaree.
Shok rahit trailok vihaaree.

Charon yug partap tumhara.
Ahae Prasiddh Vishwa Ujiyara.

Riddhi siddhi ke tum var daata.
Var vigyaan ved ke gyaata.

Manu may Tvastaa shilpee Takshaa.
Sabakee nit Karaten hain Raksha.

Panch putra nit jag hit dharm.
Havai nishkaam karai nij karma.

Prabhu tum sam Kripaal Nahee koyee.
Vipada harai jagat manh joee.

Jai jai jai Bhuvan Vishwakarma.
Karahu krupa Gurudev sudharma.

Ik sau aath jaap kar joee.
Cheejai vipatti mahasukh hoi.

Padhaahi jo Vishwakarma Chalisa.
Hoye Siddh Sakshi Gaurisha.

Vishwa Vishwakarma prabhu mere.
Ho prasann hum balak tere.

Main hoon sada Umapati chera.
Sadaa karo prabhu man man dhera.

|| Doha ||

Karahu krupa Shankar saris,
Vishwakarma Shivroop.
Shri Shubhda rachna Sahit,
Hriday Basahu sur bhup.

Lord Shri Krishna Chalisa Lyrics: भगवान श्रीकृष्ण चालीसा पाठ

कृष्ण चालीसा का पाठ भगवान श्रीकृष्ण के भक्तों के द्वारा उनको प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| प्रत्येक वर्ष में भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को जन्माष्टमी का पावन त्यौहार मनाया जाता है|

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन इस कृष्ण चालीसा का जाप करने से व्यक्ति को अपने जीवन में भुत ही लाभ होता है|

भगवान श्रीकृष्ण को विष्णु जी का पूर्ण अवतार माना जाता है| श्रीकृष्ण ऐसे अवतार थे जो कि सम्पूर्ण 16 कलाओं से निपुण थे तो आइये जानते है भगवान श्रीकृष्ण चालीसा पाठ के बारे में|

कृष्ण चालीसा

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श्रीकृष्ण चालीसा पाठ | Shri Krishna Chalisa Lyrics In Hindi

|| श्रीकृष्ण चालीसा ||

|| दोहा ||

बंशी शोभित कर मधुर,
नील जलद तन श्याम ।
अरुण अधर जनु बिम्बफल,
नयन कमल अभिराम ॥

पूर्ण इन्द्र, अरविन्द मुख,
पीताम्बर शुभ साज ।
जय मनमोहन मदन छवि,
कृष्णचन्द्र महाराज ॥

|| चौपाई ||

जय यदुनंदन जय जगवंदन ।
जय वसुदेव देवकी नन्दन ॥

जय यशुदा सुत नन्द दुलारे ।
जय प्रभु भक्तन के दृग तारे ॥

जय नटनागर, नाग नथइया |
कृष्ण कन्हइया धेनु चरइया ॥

पुनि नख पर प्रभु गिरिवर धारो ।
आओ दीनन कष्ट निवारो ॥

वंशी मधुर अधर धरि टेरौ ।
होवे पूर्ण विनय यह मेरौ ॥

आओ हरि पुनि माखन चाखो ।
आज लाज भारत की राखो ॥

गोल कपोल, चिबुक अरुणारे ।
मृदु मुस्कान मोहिनी डारे ॥

राजित राजिव नयन विशाला ।
मोर मुकुट वैजन्तीमाला ॥

कुंडल श्रवण, पीत पट आछे ।
कटि किंकिणी काछनी काछे ॥

नील जलज सुन्दर तनु सोहे ।
छबि लखि, सुर नर मुनिमन मोहे ॥

मस्तक तिलक, अलक घुँघराले ।
आओ कृष्ण बांसुरी वाले ॥

करि पय पान, पूतनहि तार्यो ।
अका बका कागासुर मार्यो ॥

मधुवन जलत अगिन जब ज्वाला ।
भै शीतल लखतहिं नंदलाला ॥

सुरपति जब ब्रज चढ़्यो रिसाई ।
मूसर धार वारि वर्षाई ॥

लगत लगत व्रज चहन बहायो ।
गोवर्धन नख धारि बचायो ॥

लखि यसुदा मन भ्रम अधिकाई ।
मुख मंह चौदह भुवन दिखाई ॥

दुष्ट कंस अति उधम मचायो ।
कोटि कमल जब फूल मंगायो ॥

नाथि कालियहिं तब तुम लीन्हें ।
चरण चिह्न दै निर्भय कीन्हें ॥

करि गोपिन संग रास विलासा ।
सबकी पूरण करी अभिलाषा ॥

केतिक महा असुर संहार्यो ।
कंसहि केस पकड़ि दै मार्यो ॥

मातपिता की बन्दि छुड़ाई ।
उग्रसेन कहँ राज दिलाई ॥

महि से मृतक छहों सुत लायो ।
मातु देवकी शोक मिटायो ॥

भौमासुर मुर दैत्य संहारी ।
लाये षट दश सहसकुमारी ॥

दै भीमहिं तृण चीर सहारा ।
जरासिंधु राक्षस कहँ मारा ॥

असुर बकासुर आदिक मार्यो ।
भक्तन के तब कष्ट निवार्यो ॥

दीन सुदामा के दुःख टार्यो ।
तंदुल तीन मूंठ मुख डार्य ॥

प्रेम के साग विदुर घर मांगे |
दुर्योधन के मेवा त्यागे ||

लखि प्रेम की महिमा भारी |
ऐसे श्याम दीन हितकारी ||

भारत के पारथ रथ हांके |
लिए चक्र कर नहिं बल ताके ||

निज गीता के ज्ञान सुनाये |
भक्तन ह्रदय सुधा वर्षाये ||

मीरा थी ऐसी मतवाली |
विष पी गई बजाकर ताली ||

राना भेजा सांप पिटारी |
शालिग्राम बने बनवारी ||

निज माया तुम विधिहिं दिखायो |
उर ते संशय सकल मिटायो ||

तब शत निन्दा करी तत्काला |
जीवन मुक्त भयो शिशुपाला ||

जबहिं द्रौपदी टेर लगाई |
दीनानाथ लाज अब जाई ||

तुरतहिं वसन बने ननन्दलाला |
बढ़े चीर भै अरि मुँह काला ||

अस नाथ के नाथ कन्हैया |
डूबत भंवर बचावत नैया ||

सुन्दरदास आस उर धारी |
दयादृष्टि कीजै बनवारी ||

नाथ सकल मम कुमति निवारो |
क्षमहु बेगि अपराध हमारो ||

खोलो पट अब दर्शन दीजै |
बोलो कृष्ण कन्हैया की जै ||

|| दोहा ||

यह चालीसा कृष्ण का,
पाठ करै उर धारि |
अष्ट सिद्धि नवनिधि फल,
लहै पदारथ चारि ||

कृष्ण चालीसा

Shri Krishna Chalisa Lyrics In English | जय यदुनंदन जय जगवंदन

|| Shri Krishna Chalisa ||

|| Doha ||

Banshi Shobhit kar Madhur,
Neel jalad tan shyam.
Arun adhar janu bimbphal,
Nayan kamal abhiram.

Purna Indra, Arvind mukh,
Pitambar shubh saaj.
Jay Manmohan Madan Chhavi,
Krishna Chandra Maharaj

|| Chaupai ||

Jai Yadunandan Jai Jagvandan,
Jai Vasudev Devaki Nandan.

Jai Yashoda Sut Nand Dulare,
Jai Prabhu Bhaktan Ke Drig Taare.

Jai Natnagar, Naag Nathaiya,
Krishna Kanhaiya Dheenu Charaiya.

Puni Nakh Par Prabhu Girivar Dharo,
Aao Deenan Kasht Nivaro.

Vanshi Madhur Adhar Dhar Terau,
Hove Purna Vinay Yeh Mero.

Aao Hari Puni Makhan Chakho,
Aaj Laaj Bharat Ki Rakho.

Gol Kapol, Chibuk Arunare,
Mridu Muskan Mohini Dare.

Rajit Rajiv Nayan Vishala,
Mor Mukut Vaijanti Mala.

Kundal Shravan, Peet Pat Aache,
Kati Kinkini Kaachhani Kaache.

Neel Jalaj Sundar Tanu Sohe,
Chabi Lakhi, Sur Nar Muniman Mohe.

Mastak Tilak, Alak Ghunghrale,
Aao Krishna Bansuri Wale.

Kari Pay Pan, Pootanahi Taryo,
Aka Baka Kagasur Maryo.

Madhuvan Jalat Agin Jab Jwala,
Bhai Sheetal Lakhtahi Nandalala.

Surpati Jab Braj Chadhyo Risaai,
Musar Dhar Vari Varshaai.

Lagat Lagat Vraj Chahan Bahaayo,
Govardhan Nakh Dhar Bachaayo.

Lakhi Yasuda Man Bhram Adhikai,
Mukh Man Chaudah Bhuvan Dikhai.

Dusht Kansa Ati Udham Machayo,
Koti Kamal Jab Phool Mangayo.

Nathi Kaliyahi Tab Tum Leene,
Charan Chihn Dai Nirbhay Keene.

Kari Gopin Sang Raas Vilasa,
Sabki Purna Kari Abhilasha.

Ketik Maha Asur Sanhaari,
Kansahi Kes Pakad Dai Maryo.

Mat Pita Ki Bandi Chhudaai,
Ugrasen Kahan Raj Dilaai.

Maha Se Mrityak Chhaho Sut Laayo,
Matu Devaki Shok Mitaayo.

Bhaumasur Mur Daitya Sanhaari,
Laaye Shat Dash Sahas Kumari.

Dai Bhimahi Trin Chir Sahaara,
Jarasindh Rakhshaas Kahan Mara.

Asur Bakasur Aadik Maryo,
Bhaktan Ke Tab Kasht Nivaaryo.

Deen Sudama Ke Dukh Taaryo,
Tandul Teen Muth Mukh Daaryo.

Prem Ke Saag Vidur Ghar Maange,
Duryodhan Ke Meva Tyage.

Lakhi Prem Ki Mahima Bhaari,
Aise Shyam Deen Hitkaari.

Bharat Ke Parath Rath Haanke,
Liye Chakra Kar Nahin Bal Taake.

Nij Gita Ke Gyan Sunaaye,
Bhakton Hriday Sudha Varshaaye.

Meera Thi Aisi Matwaali,
Vish Pee Gayi Bajaakar Taali.

Raana Bheja Saap Pitaari,
Shaligram Bane Banwaari.

Nij Maya Tum Vidhi Hi Dikhaayo,
Ur Te Sanshay Sakal Mitaayo.

Tab Shat Ninda Kari Tatkaala,
Jeevan Mukta Bhayo Shishupala.

Jabahi Draupadi Ter Lagayi,
Deenanath Laaj Ab Jaayi.

Turat Hi Vasna Bane Nandanlala,
Badhe Cheer Bhai Aari Munh Kaala.

As Nath Ke Nath Kanhaiya,
Doobat Bhramar Bachaav Naiya.

Sundardas Aas Ur Dhaari,
Daya Drishti Kijai Banwaari.

Nath Sakal Mam Kumat Nivaaro,
Kshamahu Begi Aparadh Hamaaro.

Kholo Pat Ab Darshan Dijai,
Bolo Krishna Kanhaiya Ki Jai.

|| Doha ||

Yeh Chalisa Krishna ka,
Path karai ur dhari.
Ashta Siddhi Navanidhi Phal,
Lahai Padarath Chari

Hanuman Chalisa Path Lyrics: श्री हनुमान चालीसा पाठ हिंदी में

श्री हनुमान चालीसा पाठ: कलयुग में हनुमान जी ही एकमात्र ऐसे साक्षात देव है जो थोड़ी सी पूजा मात्र से ही अपने भक्तों से प्रसन्न हो जाते है और अपने भक्तों के सभी दुःख व कष्टों का निवारण कर देते है|

हनुमान जी की उपासना करने से आपको जीवन में सुख, शांति व आरोग्य की प्राप्ति होती है| किसी भी तरह की नकारात्मक शक्ति हनुमान जी के भक्तों को परेशान नहीं करती है|

भगवान हनुमान जी की महिमा और भक्तों के मन में उनके लिए अटूट श्रद्धा की वजह से ही गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए ही हनुमान चालीसा की रचना की थी|

हनुमान चालीसा पाठ

हनुमान चालीसा पाठ (Jai Hanuman Gyan Gun Sagar Lyrics) को मंगलवार और शनिवार के दिन पढना बहुत अच्छा माना जाता है| इससे भक्तों को आन्तरिक शांति प्राप्त होती है|

दुनिया भर में हर व्यक्ति भगवान हनुमान जी पूजा करता है क्योंकि हनुमान जी सबसे शक्तिशाली देवों में से एक है|

हनुमान चालीसा पाठ शक्तिशाली पवित्र ग्रंथो में से एक है जो लोगो को बुरी व नकारात्मक शक्तियों से सुरक्षित रखने और संकट को दूर करने में सहायता करता है|

हनुमान जी एक वानर देवता है जो भगवान श्री राम के सबसे शक्तिशाली और उत्साही अनुयायी है| हनुमान चालीसा का जप तुरंत फल प्रदान करता है और भक्त के जीवन में काफी चमत्कार दिखाता है|

यह हनुमान चालीसा का पाठ कई सारे लोग करते है लेकिन इसको पढ़ने के फायदे कोई भी नहीं जनता है| पौराणिक कथाओ के अनुसार हनुमान जी 8 चिरंजीवियों में से एक है|

लोगों का मानना  है कि वे आज भी इस धरती पर जीवित है और भगवान राम की भक्ति कर रहे है| मंगल, शनि, एवं पितृ दोषों में भी हनुमान चालीसा पाठ लाभदायक है|

हनुमान चालीसा पाठ – Jai Hanuman Gyan Gun Sagar Lyrics

|| दोहा ||

श्रीगुरु चरन सरोज रज,
निज मनु मुकुरु सुधारि |
बरनउँ रघुबर बिमल जसु,
जो दायकु फल चारि ||

बुद्धिहीन तनु जानिके,
सुमिरौं पवन-कुमार |
बल बुद्धि बिद्या देहु मोहिं,
हरहु कलेस बिकार ||

|| चौपाई ||

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर,
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर |
राम दूत अतुलित बल धामा,
अंजनि पुत्र पवनसुत नामा ||

महाबीर बिक्रम बजरंगी,
कुमति निवार सुमति के संगी ||
कंचन बरन बिराज सुबेसा,
कानन कुण्डल कुँचित केसा ||

हाथ ब्रज अरु ध्वजा बिराजै,
काँधे मूँज जनेऊ साजै |
शंकर स्वयं/सुवन केसरी नंदन,
तेज प्रताप महा जगवंदन ||

बिद्यावान गुनी अति चातुर,
राम काज करिबे को आतुर |
प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया,
राम लखन सीता मन बसिया ||

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा,
बिकट रूप धरि लंक जरावा |
भीम रूप धरि असुर संहारे,
रामचन्द्र के काज सँवारे ||

लाय सजीवन लखन जियाए,
श्री रघुबीर हरषि उर लाये |
रघुपति कीन्ही बहुत बड़ाई,
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ||

सहस बदन तुम्हारो जस गावैं,
अस कहि श्रीपति कंठ लगावै |
सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा,
नारद सारद सहित अहीसा ||

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते,
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते |
तुम उपकार सुग्रीवहिं कीन्हा,
राम मिलाय राज पद दीन्हा ||

तुम्हारो मंत्र विभीषण माना,
लंकेश्वर भए सब जग जाना |
जुग सहस्त्र जोजन पर भानु,
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ||

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं,
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं |
दुर्गम काज जगत के जेते,
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते ||

राम दुआरे तुम रखवारे,
होत न आज्ञा बिनु पैसारे |
सब सुख लहै तुम्हारी सरना,
तुम रक्षक काहू को डरना ||

आपन तेज सम्हारो आपै,
तीनों लोक हाँक तै कांपै |
भूत पिशाच निकट नहिं आवै,
महावीर जब नाम सुनावै ||

नासै रोग हरै सब पीरा,
जपत निरंतर हनुमत बीरा |
संकट तै हनुमान छुड़ावै,
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ||

सब पर राम तपस्वी राजा,
तिनके काज सकल तुम साजा |
और मनोरथ जो कोई लावै,
सोई अमित जीवन फल पावै ||

चारों जुग परताप तुम्हारा,
है परसिद्ध जगत उजियारा |
साधु सन्त के तुम रखवारे,
असुर निकंदन राम दुलारे ||

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता,
अस बर दीन जानकी माता |
राम रसायन तुम्हरे पासा,
सदा रहो रघुपति के दासा ||

तुम्हरे भजन राम को पावै,
जनम जनम के दुख बिसरावै |
अंतकाल रघुवरपुर जाई,
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ||

और देवता चित्त न धरई,
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई |
संकट कटै मिटै सब पीरा,
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ||

जै जै जै हनुमान गोसाईं,
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं |
जो सत बार पाठ कर कोई,
छूटहि बंदि महा सुख होई ||

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा,
होय सिद्धि साखी गौरीसा |
तुलसीदास सदा हरि चेरा,
कीजै नाथ हृदय मह डेरा ||

|| दोहा ||

पवन तनय संकट हरन,
मंगल मूरति रूप |
राम लखन सीता सहित,
हृदय बसहु सुर भूप ||

 

Hanuman Chalisa Path Lyrics in English – जय हनुमान ज्ञान गुण सागर

|| Doha ||

Shri Guru Charan Saroj Raj,
Nij Manu Mukuru Sudhaari |
Baranau Raghubar Bimal Jasu,
Jo Daayaku Phal Chaari ||

Buddhiheen Tanu Jaanike,
Sumirau Pavan – Kumar |
Bal Buddhi Vidya Dehu Mohin,
Harahu Kales Bikaar ||

|| Chaupai ||

Jai Hanuman Gyaan Gun Sagar,
Jai Kapise Tihun Lok Ujaagar |
Ram Doot Atulit Bal Dhamaa,
Anjani Putra Pavansut Naamaa ||

Mahaveer Bikram Bajrangi,
Kumati Nivaar Sumati Ke Sangi ||
Kanchan Baran Biraj Subhesa,
Kaanan Kundal Kunchit Kesa ||

Haath Braj Aru Dhwaja Birajai,
Kaanthe Moonj Janeu Saajai |
Shankar Swayam/Suvan Kesari Nandan,
Tej Pratap Maha Jagvandan ||

Vidyaavaan Gunee Ati Chaatur,
Ram Kaaj Karibe Ko Aatur |
Prabhu Charitra Sunibe Ko Rasiyaa,
Ram Lakhana Seeta Man Basiyaa ||

Sookshm Roop Dhari Siahin Dikhaavaa,
Bikat Roop Dhari Lank Jaraavaa |
Bheem Roop Dhari Asur Sanhaare,
Ramchandra Ke Kaaj Sanvaare ||

Laay Sajeevan Lakhana Jiyaaye,
Shri Raghubir Harashi Ur Laaye |
Raghupati Keenhi Bahut Badaai,
Tum Mama Priya Bharatahi Sam Bhaai ||

Sahas Badan Tumhaaro Jas Gaavain,
As Kahi Shripati Kanth Lagaavain |
Sanakaadik Brahmaadi Muneesaa,
Naarad Saarad Sahit Aheesaa ||

Jam Kubera Digpaal Jahaan Te,
Kabi Kobid Kahi Sake Kahaan Te |
Tum Upakaar Sugreevahin Keenhaa,
Ram Milaay Raaj Pad Deenhaa ||

Tumhaaro Mantra Vibheeshan Maanaa,
Lankeshwar Bhaye Sab Jag Jaanaa |
Jug Sahasra Jojan Par Bhaanu,
Leelyo Taahi Madhur Phal Jaanoo ||

Prabhu Mudrikaa Meli Mukh Maahi,
Jaladhi Laanghi Gaye Acharaj Naahi |
Durgam Kaaj Jagat Ke Jete,
Sugam Anugrah Tumhare Tete ||

Ram Duaare Tum Rakhvaare,
Hot Na Aajnaa Binu Paisaare |
Sab Sukh Lahai Tumhaari Saranaa,
Tum Rakshak Kaahu Ko Daranaa ||

Aapan Tej Samhaaro Aapai,
Teenon Lok Haank Tai Kaampai |
Bhoot Pishaach Nikat Nahin Aavai,
Mahaaveer Jab Naam Sunaavai ||

Naasai Rog Harai Sab Peeraa,
Japat Nirantar Hanumat Beeraa |
Sankat Tai Hanuman Churaavai,
Man Kram Bachan Dhyaan Jo Laavai ||

Sab Par Ram Tapasvi Raajaa,
Tinake Kaaj Sakal Tum Saajaa |
Aur Manorath Jo Koi Laavai,
Soi Amit Jeevan Phal Paavai ||

Chaaron Jug Parataap Tumhaaraa,
Hai Parasiddh Jagat Ujiyaaraa |
Saadhu Sant Ke Tum Rakhvaare,
Asur Nikandan Ram Dulaare ||

Asht Siddhi Nau Nidhi Ke Daata,
As Bar Deen Janakee Maata |
Ram Rasaayan Tumhare Paasaa,
Sadaa Raho Raghubati Ke Daasaa ||

Tumhare Bhajan Ram Ko Paavai,
Janam Janam Ke Dukh Bisaraavai |
Antakaal Raghubarapur Jaai,
Jahan Janma Haribhakt Kahaai ||

Aur Devataa Chitt Na Dharaai,
Hanumat Sei Sarb Sukh Karaai |
Sankat Katai Mitai Sab Peeraa,
Jo Sumirai Hanumat Balbiiraa ||

Jai Jai Jai Hanumaan Gosaaee,
Kripaa Karahu Gurudev Kee Naai |
Jo Sat Baar Paath Kar Koee,
Chhootahi Bandi Mahaa Sukh Hoee ||

Jo Yah Padhai Hanumaan Chaaleesaa,
Hoy Siddhi Saakhee Gaurisaa |
Tulaseedaas Sadaa Hari Cheraa,
Keejai Naath Hriday Mah Deraa ||

|| Doha ||

Pavan Tanay Sankat Haran,
Mangal Moorti Roop |
Ram Lakhana Seeta Sahit,
Hriday Basahu Sur Bhoop ||

हनुमान चालीसा क्या है ? – What is Hanuman Chalisa

त्रेता युग में जब भगवान विष्णु राम अवतार लेते है| तब उनके साथ ही अन्य देवता भी वानर रूप में अवतार लेते है|

ताकि वे सभी रावण के विरुद्ध इस युद्ध में भगवान राम की सहायता कर सके| शेषनाग ने लक्ष्मण जी (राम के भाई) व भगवान शिव ने हनुमान जी का अवतार लिया|

हनुमान चालीसा पाठ एक काव्य कृति है जिसमे हनुमान जी के सभी गुणों व कार्यों का चालीस चौपाइयों में वर्णन किया गया है|

यह पहली ऐसी लघु रचना है जिसमें पवन पुत्र हनुमान जी की स्तुति को काफी सुन्दर रूप में दर्शाया गया है|

श्री हनुमान चालीसा पाठ में चालीसा शब्द का अर्थ चालीस (40) है यानी कि इस हनुमान चालीसा पाठ में कुल चालीस चौपाई है और दो दोहे है|

यह भक्तों द्वारा हनुमान जी को प्रसन्न की जाने वाली प्रार्थना है जिसमें कुल चालीस पंक्तियाँ है| इस वजह से इसे हनुमान चालीसा पाठ कहते है|

हनुमान चालीसा पाठ गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा लिखा गया है| जिसे बहुत ही शक्तिशाली माना गया है| हनुमान चालीसा पाठ को करने से भक्तों के मन से भय दूर हो जाता है|

जब अकबर ने तुलसीदास जी को भगवान राम का प्रदर्शन करने को बोला तो उन्होंने कहा कि श्री राम को कोई भी व्यक्ति केवल सच्ची भक्ति से देख सकता है|

इस बात पर क्रोधित होकर अकबर ने तुलसीदास जी को कैद कर लिया| इसके इकतालीसवे दिन तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा पाठ की रचना की और उसका प्रदर्शन किया है|

इसके पश्चात वानरों के द्वारा अकबर के महल को लूटे जाने के बाद वे तुलसीदास जी के चरणों में गिर पड़े और उन्हें रिहा कर दिया|

भगवान हनुमान जी के बारे में विवरण – Details About Lord Hanuman Ji

वेदों के अनुसार हनुमान जी का जन्म 1 करोड़ 85 लाख 58 हज़ार 115 वर्ष पहले त्रेतायुग के अंतिम चरण में चैत्र पूर्णिमा को मंगलवार के दिन सुबह 6.30 बजे आंजन नामक एक छोटे से पहाड़ी गाँव में हुआ था| इनके पिता का नाम केसरी और माता का नाम अंजना था|

हनुमान जी बल, बुद्धि और विद्या तीनो में ही सर्वश्रेष्ठ रहे थे| हनुमान जी की शुरुआती शिक्षा उनकी माँ द्वारा हुई थी|

इसके पश्चात जब वह बड़े हो गये तो उन्हें पवन देव के आग्रह पर शिक्षा लेने सूर्यदेव के पास भेज दिया था|

हनुमान चालीसा पाठ

जहाँ पर उन्होंने केवल सात दिनों में ही सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर लिया और प्रभु श्री राम की भक्ति में लीन हो गए|

हनुमान जी ने कई सारे राक्षसों का संहार करके उनके आतंक से कई गाँवों को मुक्त किया| इसके अलावा बचपन में भूख लगने पर सूर्य को अपने उदर में धारण कर लिया और भगवान शिव के आग्रह पर सूर्य देव को मुक्त किया|

हनुमान जी को सभी देवी – देवताओं से बहुत सारे वरदान प्राप्त थे| जिस कारण वह प्रभु श्री राम की सहायता के साथ – साथ जग कल्याण के लिए सक्षम हो गये थे| उन्होंने रावण के साथ युद्ध में भगवान श्री राम के विजय पथ को सरल कर दिया|

जब बचपन में हनुमान जी ने सूर्य देव को निगला था| उस समय इंद्र ने सूर्य देव को मुक्त करने के लिए वज्र से हनुमान जी पर प्रहार किया|

जिससे उनकी ठुड्डी टूट गयी| उसी समय से इनका नाम हनुमान हो गया| इसके अलावा भी इनके कई नाम है:-

  • बजरंग बली
  • मारुति 
  • अंजनी सूत 
  • केसरी नंदन 
  • संकट मोचन 
  • पवन पुत्र 
  • महावीर 

भगवान हनुमान जी के रूप – Forms of Lord Hanuman ji

हनुमान जी एक ही रूप है लेकिन वो भी काफी दुर्लभ है| हनुमान जी का एक पंचमुखी रूप है| जिसमे हनुमान जी के पांच मुख है| ऐसा माना जाता है कि इस रूप के दर्शन बहुत ही दुर्लभ होतें है|

  • वराह मुख 
  • नरसिंह मुख 
  • गरुड़ मुख 
  • हयग्रीव मुख 
  • हनुमान मुख 

हनुमान जी के भाइयों के नाम – Brothers of Hanuman Ji

भगवान हनुमान जी के पांच भाई थे| जिनके नाम निम्न है:

  • श्रुतिमान 
  • मतिमान 
  • केतुमान 
  • गतिमान 
  • धृतिमान 

हनुमान चालीसा पाठ का महत्व – Importance of Hanuman Chalisa Path

यह हनुमान चालीसा पाठ हनुमान जी को प्रसन्न करने वाला एक बेहतरीन गीत है| भगवान राम के प्रति इनके उदारता के कारण, हनुमान जी को बहुत सम्मान दिया जाता है और इन्हें भक्ति, समर्पण और विश्वास के रूप में देखा जाता है|

हनुमान चालीसा पाठ (Hanuman Chalisa Path Lyrics) को तुलसीदास जी द्वारा, जिन्होंने रामचरितमानस की रचना की, लिखा गया है|

तुलसीदास जी ने हनुमान चालीसा पाठ तब लिखा था जब वे अस्वस्थ थे| हनुमान चालीसा पाठ से उन्हें अपना स्वास्थ्य पुन: पाने में सहायता मिली| हनुमान चालीसा पाठ अवधि भाषा में लिखी 40 छंदों वाली एक ऐसी प्रार्थना है जिसमे हनुमान जी के गुणों का बखान किया गया है|

हनुमान जी का दूसरा नाम संकट मोचन भी है जिसका अर्थ होता है – पीड़ा को दूर करने वाला| इसका तात्पर्य यही है कि हनुमान जी अपने भक्तों को कष्टों और भय से मुक्ति दिलाने की क्षमता रखते है|

हवन की सहायता से आप अपनी बाधाओं पर हमेशा के लिए काबू पा सकते है| यह आपको हनुमान जी वीरता और विशाल शक्ति तक पहुचने में सक्षम होता है| यह आपको वे कार्य करने में भी सक्षम बना सकता है जिसकी आप केवल कल्पना कर  सकते है|

हनुमान चालीसा पाठ करने की विधि – Method of Reciting Hanuman Chalisa Path

श्री हनुमान चालीसा पाठ को शुरू करने से सबसे शुभ दिन मंगलवार और शनिवार है| अगर हो सके तो हनुमान चालीसा पाठ करने के लिए मंदिर जरूर जाए| जब भी आप हनुमान चालीसा पाठ को करना आरम्भ करे तो इसे लगातार 40 दिनों तक करिए|

इसके पश्चात आप को अगले 11 मंगलवार और 11 शनिवार तक 21 हनुमान चालीसा के पाठ करने होंगे| इस चीज़ का ध्यान रखे कि आपको हनुमान चालीसा का पाठ सुबह 4.00 बजे ही करना है|

हनुमान चालीसा पाठ

श्री हनुमान चालीसा पाठ को पूर्ण विधि से करने पर हनुमान जी प्रसन्न होतें है| हनुमान चालीसा पढ़ने से पहले एक बार प्रभु श्री राम का नाम अवश्य लेना चाहिए|

मान्यता है कि जब भी हनुमान जी की पूजा के पहले श्री राम का नाम लिया  जाता है तो हनुमान जी प्रसन्न होते है और सारी मनोकामनाएं पूर्ण करते है क्योकि हनुमान जी प्रभु श्री राम के अनुयायी है|

हनुमान चालीसा पाठ (Jai Hanuman Gyan Gun Sagar Lyrics) करते समय एक तुलसी की माला ले और पाठ करते हुए तीन से ग्यारह पाठ करें| श्री हनुमान चालीसा का पाठ करते समय किसी भी तरल पदार्थ पीने या कुछ भी खाने से बचें|

ध्यान रहे कि जब भी आप हनुमान चालीसा कर रहे हो तब आपको किसी के भी द्वारा रोका ना जाए| पूजा के पश्चात हनुमान जी को भोग लगाएं फिर जरूरतमंदों को बूंदी चूरमा खिलाएं|

हनुमान चालीसा पाठ करने से होने वाले लाभ

श्री हनुमान चालीसा का पाठ करने से हनुमान जी अपने भक्तों को नकारात्मक शक्ति और जीवन में चल रही हर दुविधा से मुक्ति दिलाते है|

हनुमान चालीसा का पाठ विशेष रूप से मंगलवार और शनिवार के दिन कोई भी व्यक्ति कर सकता है| इन दिनों हनुमान जी के मंदिर जाने की सलाह दी जाती है|

आज हम आपको आपके घर में हनुमान चालीसा पाठ का जाप करने के फायदे बताने जा रहे हैं:

  • हनुमान चालीसा पाठ का प्रभाव साढ़े साती के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है और साढ़े साती से पीड़ित लोगों की समस्याओ को ख़त्म करने में सहायता करता है|
  • जिस भी व्यक्ति को बुरे सपने आते है तो उसे इस चालीसा का पाठ करके सोना चाहिए|
  • इस चालीसा का पाठ करने से व्यक्ति को उसके भूतकाल के अनुभवों  से उबरने में भी सहायता मिलती है|
  • अपनी चिंता और उदासी को स्थायी रूप से हल करने के लिए हनुमान चालीसा का पाठ प्रतिदिन सात बार करना चाहिए|
  • जो भी भक्त अपनी सुरक्षा के लिए लगातार सोचते रहते है उन्हें आज से ही हनुमान चालीसा का पाठ शुरू करना चाहिए| जिससे हनुमान जी उनकी हर परिस्थिति में रक्षा करेंगे|
  • प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करने से भक्तों को क़ानूनी लड़ाई जीतने में भी सहायता मिलती है|
  • कई लोग अपनी गाड़ियों में हनुमान जी की मूर्ति रखते है क्योकि ऐसा मानना है कि हनुमान जी दुर्घटनाओ को रोक सकते है|

निष्कर्ष – Conclusion

हालांकि, किसी भी समय भगवान की पूजा करना आपको कठिनाइयों, समस्याओं, तनाव और नकारात्मक ऊर्जाओं से हमेंशा बचाता है। जैसा कि आपने हनुमान चालीसा पाठ पढ़ने के लाभ और चरण पढ़े हैं। अब आप सभी इससे अवगत हो चुके हैं|

अपनी सभी चिंताओं से मुक्ति पाने के लिए संकट मोचन वीर हनुमान को हमेशा याद रखें।  हनुमान हवन के दौरान हनुमान चालीसा का पाठ करने से भगवान का आशीर्वाद, खुशी, आत्मविश्वास और भयमुक्त जीवन मिलता है।

हनुमान जी आर्थिक और कर्ज संबंधी समस्याओं से भी मुक्ति दिलाते हैं। इसके अलावा भी अगर आप किसी और पूजा के बारे में जानकारी लेना चाहते है। तो आप हमारी वेबसाइट पर जाकर सभी तरह की पूजा या त्योहारों के बारे में सम्पूर्ण ज्ञान ले सकते है।

इसके अलावा अगर आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे सुंदरकांड, अखंड रामायण पाठ, गृहप्रवेश और विवाह के लिए भी आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित  बहुत आसानी से बुक कर सकते है।

आप हमे कॉल करके भी पंडित जी को किसी की कार्य के बुक कर सकते है जो कि वेबसाइट पर दिए गए है फिर चाहे आप किसी भी राज्य से हो। हम आपको आपकी भाषा वाले ही पंडित जी से ही जोड़ेंगे|


Ganesh Chalisa Lyrics in Hindi: जय जय जय गणपति गणराजू

हिन्दू धर्म में किसी पूजा या कार्य से पूर्व जितना महत्व गणेश जी की पूजा का है, उतना ही पूजा के पश्चात पढ़ी जाने वाली गणेश चालीसा (Ganesh Chalisa Lyrics in Hindi) का भी है|

भगवान गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए गणेश चालीसा (Ganesh Chalisa) का पाठ किया जाता है, ताकि बुद्धि प्रदान करने वाले देवता हमेशा भक्तों पर अपनी कृपा बनाएं रखे|

गणेश चालीसा

माना जाता है कि गणेश चालीसा का पाठ भगवान गणेश जी को प्रसन्न करने का सबसे अच्छा व सबसे आसान तरीका है|

जो भी भक्त सच्चे मन से गणेश चालीसा (Ganesh Chalisa Lyrics in Hindi) तथा Ganesh Ji Ki Aarti का नियमित पाठ करता है तो गणेश जी उसके जीवन से सभी कष्टों को दूर कर देते है|

गणेश चालीसा का पाठ हमेशा साफ़ – सुथरे स्थान तथा साफ़ वस्त्र धारण करके ही करना चाहिये| इसके पश्चात यदि आप अपने घर के मंदिर में गणेश चालीसा का जाप कर रहे है तो पाठ करते समय भगवान गणेश जी को बूंदी के लड्डू तथा मोदक का भोग लगाना बहुत ही शुभ माना जाता है|

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बताया गया है कि गणेश चालीसा (Ganesh Chalisa Lyrics in Hindi) का जाप करते समय व्यक्ति को अपना मुख हमेशा पूर्व या उत्तर दिशा में रखना चाहिए|

99Pandit एक ऐसा ऑनलाइन प्लेटफार्म है जिसकी सहायता से आप हिन्दू धर्म से संबंधित किसी भी पूजा जैसे – नामकरण पूजा [Namkaran Puja], दिवाली पूजा [Diwali Puja] व अन्य कई पूजाओं के लिए ऑनलाइन पंडित बुक कर सकते है| यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है|

बस आपको “बुक ए पंडित” [Book a Pandit] विकल्प का चुनाव करना होगा और अपनी सामान्य जानकारी जैसे कि अपना नाम, मेल, पूजन स्थान, समय,और पूजा का चयन के माध्यम से आप अपना पंडित बुक कर सकेंगे|

गणेश चालीसा हिंदी में – Ganesh Chalisa Lyrics in Hindi

|| गणेश चालीसा पाठ ||

|| दोहा ||

जय गणपति सदगुणसदन, कविवर बदन कृपाल।

विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

|| चौपाई ||

जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥

रिद्धि – सिद्धि तव चंवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

कहौ जन्म शुभ-कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥

एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥

भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुंच्यो तुम धरि द्विज रुपा॥

अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

अति प्रसन्न है तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

मिलहि पुत्र तुहि, बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण, यहि काला॥

गणनायक, गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम, रुप भगवाना॥

अस कहि अन्तर्धान रुप है। पलना पर बालक स्वरुप है॥

बनि शिशु, रुदन जबहिं तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

सकल मगन, सुखमंगल गावहिं। नभ ते सुरन, सुमन वर्षावहिं॥

शम्भु, उमा, बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन, सुत देखन आवहिं॥

लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥

निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक, देखन चाहत नाहीं॥

गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर, न शनि तुहि भायो॥

कहन लगे शनि, मन सकुचाई। का करिहौ, शिशु मोहि दिखाई॥

नहिं विश्वास, उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥

पडतहिं, शनि दृग कोण प्रकाशा। बोलक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

गिरिजा गिरीं विकल हुए धरणी। सो दुख दशा गयो नहीं वरणी॥

हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हो लखि सुत को नाशा॥

तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधायो। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥

बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण, मंत्र पढ़ि शंकर डारयो॥

नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि, वन दीन्हे॥

बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी कर प्रदक्षिणा लीन्हा॥

चले षडानन, भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

तुम्हरी महिमा बुद्ध‍ि बड़ाई। शेष सहसमुख सके न गाई॥

मैं मतिहीन मलीन दुखारी। करहुं कौन विधि विनय तुम्हारी॥

भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग, ककरा, दुर्वासा॥

अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी भक्ति शक्ति कछु दीजै॥

श्री गणेश यह चालीसा। पाठ करै कर ध्यान॥

नित नव मंगल गृह बसै। लहे जगत सन्मान॥

|| दोहा ||

सम्वत अपन सहस्त्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश।

पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

गणेश चालीसा

Ganesh Chalisa Lyrics in English – जय जय जय गणपति गणराजू

|| Ganesh Chalisa Path ||

|| Doha ||

Jai Ganpati Sadgun Sadan, Kavivar Badan Kripal ||
Vighna Haran Mangal Karan, Jai Jai Girijalal ||

|| Chaupai ||

Jai Jai Jai Ganpati Ganraju | Mangal Bharan Karan Shubh Kaju ||

Jai Gajbadan Sadan Sukhdata | Vishwa Vinayaka Buddhi Vidhata ||

Vakra Tunda Shuchi Shund Suhawana | Tilak Tripund Bhal Man Bhavan ||

Rajat Mani Muktan Ur Mala | Svarn Mukut Shir Nayan Vishala ||

Pustak Pani Kuthar Trishoolan | Modak Bhog Sugandhit Phoolan ||

Sundar Pitambar Tan Sajit | Charan Paduka Muni Man Rajit ||

Dhani Shiv Shuvan Shadanan Bhrata | Gauri Lalan Vishv – Vikhyata ||

Riddhi – Siddhi Tav Chanvar Sudhare | Mushak Vahan Sohat Dvare ||

Kahau Janm Shubh Katha Tumari | Ati Shuchi Pavan Mangalkari ||

Ek Samay Giriraj Kumari | Putra Hetu Tap Kinha Bhari ||

Bhayo Yagya Jab Purn Anoopa | Tab Pahunchiyo Tum Dhari Dwij Roopa ||

Atithi Jani Ke Gauri Sukhari | Bahuvidhi Seva Kari Tumhari ||

Ati Prasann Hai Tum Var Dinha | Matu Putra Hit Jo Tap Kinha ||

Milahi Putr Tuhi Buddhi Vishala | Bina Garbh Dharan Yahi Kala ||

Gananayak Gun Gyan Nidhana | Poojit Pratham Roop Bhagwana ||

As Kahi Antardhan Roop Hai | Palan Par Balak Swaroop Hai ||

Bani Shishu Rudan Jabahin Tum Thana | Lakhi Mukh Sukh Nahin Gauri Samana ||

Sakal Magan, Sukhmangal Gavahin | Nabh Te Suran, Suman Varshwahin ||

Shambhu, Uma, Bahudan Lutavahin | Sur Munijan, Sut Dekhan Aawahin ||

Lakhi Ati Anand Mangal Saja | Dekhan Bhi Aye Shani Raja ||

Nij Avgun Guni Shani Man Mahin | Balak Dekhan Chahat Nahin ||

Girija Kachhu Man Bhed Badhayo | Utsav Mor, Na Shani Tuhi Bhayo ||

Kahan Lage Shani, Man Sakuchai | Ka Karihau, Shishu Mohi Dikhai ||

Nahin Vishwas, Uma Ur Bhayoo | Shani So Balak Dekhan Kahayoo ||

Padtahin Shani Drg Kon Prakasha | Balak Sir Udi Gayo Akasha ||

Girija Giri Vikal Hue Dharani | So Dukh Dasha Gayo Nahin Varani ||

Hahakar Machyo Kailasha | Shani Kinho Lakhi Sut Ko Naasha ||

Turat Garud Chadhi Vishnu Sidhayo | Kati Chakra So Gaj Sir Laye ||

Balak Ke Dhad Oopar Dharayo | Pran Mantr Padhi Shankar Darayo ||

Nam Ganesh Shambhu Tab Kinhe | Prathan Poojya Buddhi Nidhi, Var Dinhe ||

Buddhi Pariksha Jab Shiv Kinha | Prathvi Kar Pradakshina Linha ||

Chale Sadanan, Bharami Bhulai | Rache Baith Tum Budhhi Upai ||

Dhani Ganesh Kahi Shiv Hiye Harashe | Nabh Te Suran Suman Bahu Barase ||

Charan Matu – Pitu Ke Dhar Linhen | Tinake Sat Pradakshin Kinhe ||

Tumhari Mahima Buddhi Badai | Shesh Sahasmukh Sake Na Gai ||

Main Matihin Malin Dukhari | Karahun Kaun Vidhi Vinay Tumhari ||

Bhajat Ramsundar Prabhudas | Jag Prayag, Kakara, Durvasa ||

Ab Prabhu Daya Din Par Kije | Apmi Shakti Bhakti Kachhu Dije ||

Shri Ganesh Yah Chalisa, Path Kare Kar Dhyan |

Nit Nav Mangal Grah Basai, Lahe Jagat Sanman ||

|| Doha ||

Sambandh Aapne Sahastra Dash,
Rishi Panchami Dinesh |
Puran Chalisa Bhayo,
Mangal Murti Ganesh ||

Ganesh Atharvashirsha in Hindi: श्री गणेश अथर्वशीर्ष पाठ हिंदी में

बुद्धि के दाता भगवान श्री गणेश जी को प्रसन्न करने के लिए गणेश अथर्वशीर्ष (Ganesh Atharvashirsha in Hindi) का पाठ एक अच्छा उपाय माना जाता है| गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करने से भक्तों को श्री गणेश का आशीर्वाद प्राप्त होता है|

माना जाता है कि गणेश अथर्वशीर्ष पाठ हिन्दू धर्म के प्रमुख वेदों में से एक अथर्ववेद का हिस्सा है| इस गणेश अथर्वशीर्ष (Ganesh Atharvashirsha in Hindi) पाठ का जाप करने से मनुष्य का मन शांत रहता है तथा यह एकाग्रता को भी बढाता है|

गणेश अथर्वशीर्ष

यह पाठ भगवान गणेश जी की आराधना करने हेतु बहुत मंगलकारी माना जाता है| आज इस लेख में हम आपको गणेश अथर्वशीर्ष (Ganesh Atharvashirsha in Hindi) पाठ के हिंदी अर्थ के बारे में बताने वाले है|

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे शिव तांडव स्तोत्रम [Shiv Tandav Stotram], दुर्गा कवच [Durga Kavach], या कनकधारा स्तोत्र [Kanakdhara Stotra] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

इसके अलावा आप हमारे ऐप 99Pandit For Users पर भी आरतियाँ व अन्य कथाओं को पढ़ सकते है| इस ऐप में भगवद गीता के सभी अध्यायों को हिंदी अर्थ समझाया गया है|

गणेश अथर्वशीर्ष पाठ हिंदी अर्थ सहित – Ganesh Atharvashirsha Lyrics with Hindi Meaning

|| श्री गणपति अथर्वशीर्ष ||

ॐ नमस्ते गणपतये।
त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि
त्वमेव केवलं कर्ताऽसि
त्वमेव केवलं धर्ताऽसि
त्वमेव केवलं हर्ताऽसि
त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि
त्व साक्षादात्माऽसि नित्यम्।।1।।

हिंदी अर्थ – ॐकारापति भगवान श्री गणेश जी को मेरा प्रणाम है| हे गणेश जी ! आप ही केवल कर्ता है| आप ही केवल धर्ता है| आप ही केवल हर्ता है| निश्चयपूर्वक आप ही इन सभी रूपों में विराजमान ब्रह्म हो| आप साक्षात् नित्य आत्मस्वरूप हो|

ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि।।2।।

हिंदी अर्थ – मैं न्यायसंगत बात कहता हूँ| सत्य कहता हूँ|

अव त्व मां। अव वक्तारं।
अव श्रोतारं। अव दातारं।
अव धातारं। अवानूचानमव शिष्यं।
अव पश्चातात। अव पुरस्तात।
अवोत्तरात्तात। अव दक्षिणात्तात्।
अवचोर्ध्वात्तात्।। अवाधरात्तात्।।
सर्वतो मां पाहि-पाहि समंतात्।।3।।

हिंदी अर्थ – हे पार्वती नंदन गणेश ! आप मुझ शिष्य की रक्षा करो| आचार्य की रक्षा करो| श्रोता की रक्षा करों| दाता की रक्षा करो| धाता की रक्षा करो| व्याख्या करने वाले गुरु की रक्षा करो| शिष्य की रक्षा करो| पूर्व से रक्षा करो| पश्चिम से रक्षा करो| उत्तर से रक्षा करो| दक्षिण से रक्षा करो| चारों ओर से मेरी रक्षा करो| सभी ओर से मेरी रक्षा करो|

त्वं वाङ्‍मयस्त्वं चिन्मय:।
त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममय:।
त्वं सच्चिदानंदाद्वितीयोऽषि।
त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्माषि।
त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽषि।।4।।

हिंदी अर्थ – तुम वाङ्मय हो, चिन्मय हो| तुम आनंदमय हो| तुम ब्रह्ममय हो| तुम ही सच्चिदानंद अद्वितीय हो| तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो| तुम ही दानमय विज्ञानमय हो|

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते।
सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति।
सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति।
सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति।
त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभ:।
त्वं चत्वारिकाकूपदानि।।5।।

हिंदी अर्थ – यह संसार आपसे ही उत्पन्न होता है| यह सम्पूर्ण जगत तुममे लय को प्राप्त होगा| इस सारे जगत की आप में प्रतीति हो रही है| आप जल, भूमि, अग्नि, आकाश और वायु हो| परा, बैखरी एवं मध्यमा वाणी के ये विभाग तुम्ही हो|

त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीत:।
त्वं देहत्रयातीत:। त्वं कालत्रयातीत:।
त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यं।
त्वं शक्तित्रयात्मक:।
त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं।
त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं
रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं
वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं
ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।।6।।

हिंदी अर्थ – आप रज, सत्व एवं तम तीनों गुणों से परे हो| तुम जागृत, सुषुप्ति एवं स्वप्न तीनों अवस्थाओं से परे हो| तुम वर्तमान, सूक्ष्म और स्थूल तीनों देहों से परे हो| तुम भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों कालों से परे हो| तुम मूलाधार चक्र में सदा स्थित रहते हो| क्रिया, इच्छा और ज्ञान तीनों प्रकार की शक्तियां आप ही हो| सभी योगीजन नित्य आपका ध्यान करते है| तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रूद्र हो, तुम इंद्र हो, तुम अग्नि हो, तुम सूर्य हो, तुम वायु हो,तुम ब्रह्म हो, तुम चंद्रमा हो, भू:, भूर्व:, स्व: हो|

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरं।
अनुस्वार: परतर:। अर्धेन्दुलसितं।
तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्वरूपं।
गकार: पूर्वरूपं। अकारो मध्यमरूपं।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपं। बिन्दुरूत्तररूपं।
नाद: संधानं। सँ हितासंधि:
सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि:
निचृद्गायत्रीच्छंद:। गणपतिर्देवता।
ॐ गं गणपतये नम:।।7।।

हिंदी अर्थ – गण के आदि अर्थात “ग” का पहले उच्चारण करे| उसके बाद में वर्णों में प्रथम वर्ण “अ” का उच्चारण करे| इस प्रकार से अर्धचन्द्र से सुशोभित ‘गं’ ॐ उच्चारण से अवरुद्ध होने पर आपके बीज मंत्र (ॐ गं) का ही स्वरुप है| गकार इसका पूर्ण रूप है| बिंदु उत्तर रूप है| नाद संधान है| संहिता संविध है| ऐसी यह गणेश विद्या है| इस महामंत्र के गणक ऋषि है| वह महामंत्र – ॐ गं गणपतये नमः है|

गणेश अथर्वशीर्ष

एकदंताय विद्‍महे।
वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दंती प्रचोदयात।।8।।

हिंदी अर्थ – एक दंत को हम जानते है| वक्रतुंड का हम ध्यान करते है| वह गजानन हमे प्रेरणा प्रदान करें|

एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुशधारिणम्।
रदं च वरदं हस्तैर्विभ्राणं मूषकध्वजम्।
रक्तं लंबोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम्।
रक्तगंधाऽनुलिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्।।
भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारणमच्युतम्।
आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्।
एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वर:।।9।।

हिंदी अर्थ – एकदंत चतुर्भुज अपनी चारों भुजाओं में पाक्ष, अंकुश, अभय और वरदान की मुद्रा धारण किये हुए है| मूषक चिन्ह ध्वजा लिए हुए, रक्तवर्ण लम्बोदर वाले सूप जैसे-जैसे बड़े कानों वाले रक्त वस्त्रधारी शरीर पर चंदन का लेप किये हुए रक्तपुष्पों से पूजित| भक्त पर अनुकम्पा करने वाले देवता, जगत के कारण अच्युत, पुरुष से परे श्रीगणेशजी का जो नित्य ध्यान करता है, वह योगी सभी में श्रेष्ठ है|

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये।
नम: प्रमथपतये।
नमस्तेऽस्तु लंबोदरायैकदंताय।
विघ्ननाशिने शिवसुताय।
श्रीवरदमूर्तये नमो नम:।।10।।

हिंदी अर्थ – देव समूह के नायक को नमस्कार| गणपति जी को नमस्कार| शिवजी के गणों के अधिनायक को नमस्कार| एकदंत, लम्बोदर, शिवजी के पुत्र एवं श्री वरदमूर्ति को मेरा नमस्कार|

एतदथर्वशीर्ष योऽधीते।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते।
स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते।
स सर्वत: सुखमेधते।
स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते।।11।।

हिंदी अर्थ – यह अथर्ववेद का उपनिषद है| इसका पाठ जो भी करता है वह ब्रह्म को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है| किसी भी प्रकार के विघ्न उसके लिए बाधक साबित नहीं होते है| वह हर जगह सुख ही पाता है| वह पांच प्रकार के पातकों एवं उपपातको से मुक्त हो जाता है|

सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति।
सायंप्रात: प्रयुंजानोऽपापो भवति।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति।
धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति।।12।।

हिंदी अर्थ – सायंकाल पाठ करने वाला दिन के पापों का नाश करता है| प्रात:काल इसका पाठ करने से रात्रि के पापों का नाश होता है| जो दोनों समय इसका जाप करता है| वह मनुष्य निष्पाप हो जाता है| वह सर्वत्र विघ्नों का नाश करता है| वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष को प्राप्त करता है|

इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्।
यो यदि मोहाद्‍दास्यति स पापीयान् भवति।
सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत्।13।।

हिंदी अर्थ – इस अथर्वशीर्ष को जो शिष्य न हो उसे देना चाहिए| जो मोह के कारण देता हो, वह पातकी हो जाता है| इस पाठ का एक हज़ार बार जाप करने से मनुष्य अपनी प्रत्येक कामना को सिद्ध कर सकता है|

अनेन गणपतिमभिषिंचति
स वाग्मी भवति
चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति
स विद्यावान भवति।
इत्यथर्वणवाक्यं।
ब्रह्माद्यावरणं विद्यात्
न बिभेति कदाचनेति।।14।।

हिंदी अर्थ – इसके द्वारा जो भी गणपति जी को स्नान कराता है, वह वक्ता बन जाता है| जो मनुष्य चतुर्थी तिथि को व्रत करके इसका जाप करता है, वह विद्यावान हो जाता है| यह अथर्व वाक्य है जो इस मंत्र के द्वारा तपश्चरण करना जानता है, वह कभी भी भयभीत नहीं होता है|

यो दूर्वांकुरैंर्यजति
स वैश्रवणोपमो भवति।
यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति
स मेधावान भवति।
यो मोदकसहस्रेण यजति
स वाञ्छित फलमवाप्रोति।
य: साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते स सर्वं लभते।।15।।

हिंदी अर्थ – जो भी व्यक्ति भगवान गणेश जी का यजन करता है, वह कुबेर के समान हो जाता है| जो लाजो के द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी तथा मेधावी होता है| जो हज़ार लड्डुओं के द्वारा यजन करता है| उसे मन वांछित फल की प्राप्ति होती है| जो घृत के साथ समिधा से यज्ञ करता है, उसे सब कुछ प्राप्त होता है|

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा
सूर्यवर्चस्वी भवति।
सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ
वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति।
महाविघ्नात्प्रमुच्यते।
महादोषात्प्रमुच्यते।
महापापात् प्रमुच्यते।
स सर्वविद्भवति से सर्वविद्भवति।
य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।।16।।

हिंदी अर्थ – आठ ब्राह्मणों को सम्यक रीति से ग्राह कराने पर सूर्य की भांति तेजस्वी होता है| सूर्य ग्रहण के समय महानदी में या प्रतिमा के समीप जपने से मंत्र की सिद्धि होती है| वह महाविघ्न से मुक्त हो जाता है| जो इस प्रकार जानता है वह सर्वज्ञ हो जाता है|

|| अथर्ववेदीय गणपतिउपनिषद समाप्त ||

Sundarkand Path Lyrics: सम्पूर्ण सुंदरकांड पाठ हिंदी लिरिक्स

सुंदरकांड पाठ: भगवान हनुमान जी कलयुग के देवता है| जिन्हें प्रसन्न करना ज्यादा कठिन कार्य नहीं है| यह थोड़ी – सी पूजा मात्र से ही प्रसन्न हो जाते है| हनुमान जी को प्रसन्न करके उनकी कृपा पाने के लिए लोग अलग – अलग प्रकार के पूजा पाठ करते है|

इन्ही में से एक सुंदरकांड पाठ भी है| जिसका पाठ हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| सुंदरकांड पाठ को एक बहुत बड़े कार्यक्रम के रूप में भी किया जाता है|

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Shree Sundarkand Path Lyrics – जामवंत के बचन सुहाए

।।आसन।।

कथा प्रारम्भ होत है। सुनहुँ वीर हनुमान।।
आसान लीजो प्रेम से। करहुँ सदा कल्याण।।

|| श्लोक ||

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्,
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं,
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम् ।।1।।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ।।2।।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ।।3।।

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ।।1।।

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान ।।2।।

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।
दो0-पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
दो0-तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
दो0-रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ ।।5।।

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।
दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
दो0-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
दो0-निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
दो0- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
दो0-भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

सुंदरकांड पाठ

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
दो0-जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
सो0-कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।
दो0-कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
दो0-रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
दो0-निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
दो0-देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
दो0-कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
दो0-ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
दो0-कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

सुंदरकांड पाठ

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।
दो0-जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

जानउँ मैं तुम्हरि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।
दो0-प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
दो0-मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
दो-कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
दो0-हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
दो0-पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
दो0-जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
दो0-जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
दो0-प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
दो0-नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
दो0-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
दो0-सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
दो0-कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।

छं0-चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।
दो0-एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
दो0–राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

सुंदरकांड पाठ

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
दो0-सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
दो0- काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
दो0-बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
दो0-तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
दो0=रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
दो0=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
दो0=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
दो0-श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
दो0-तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
दो0–अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
दो0- सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
दो0-रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
दो0-प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
दो0-सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
दो0-कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
दो0–की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
दो0-द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

सुंदरकांड पाठ

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
दो0–सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
दो0–बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
दो0-बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
दो0-काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
दो0-सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
छं0-निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
दो0-सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड पाठ,

(इति सुन्दरकाण्ड समाप्त)

|| सुन्दरकाण्ड समापन दोहा ||

कथा विसर्जन होत है,
सुनहु वीर हनुमान।
जो जन जहाँ से आत है,
जह तह करो प्रयाण।।
राम लखन सिया जानकी,
सदा करहूँ कल्याण।
रामायण वैकुण्ठ की,
विदा होत हनुमान।।
सियावर रामचंद्र की जय।
पवनसुत हनुमान की जय।

Shani Chalisa Lyrics in Hindi: शनि चालीसा – जयति जयति शनिदेव दयाला

हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) के पाठ को शनिवार के दिन करना बहुत ही शुभ माना जाता है।

शनि देव की पूजा करने के बाद शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करने से शनिदेव अपने भक्तों से बहुत ही प्रसन्न होते है।

इस शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करने से भक्तों के सभी कष्ट व परेशानियां दूर होती है।

शनि चालीसा

ऐसा माना जाता है कि जिन लोगों पर शनि देव की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही हो, उन्हें इससे मुक्ति पाने व शनि देव को प्रसन्न करने के लिए शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करना चाहिए जैसा आप सभी जानते है कि शनि देव को न्याय के देवता के रूप में भी जाना जाता है

शनि अमावस्या के दिन शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करने व्यक्ति को पितृ दोष में भी राहत मिलती है शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ कभी भी किया जा सकता है

यदि आप शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ प्रारंभ करना चाहते है तो शनिवार इसके लिए सबसे शुभ दिन माना जाता है

शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ बहुत अधिक लाभकारी होता है, जब इसका जाप शनि देव के मंदिर में किया जाए

शनि देव की विशेष कृपा पाने के लिए पीपल के पेड़ के नीचे शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करना चाहिए

अब हम आपको 99Pandit के बारे में जानकारी देंगे| 99Pandit एक ऐसा ऑनलाइन प्लेटफार्म है जिसकी सहायता से आप हिन्दू धर्म से संबंधित किसी भी पूजा जैसे – दिवाली पूजा [Diwali Puja], तथा  धनतेरस पूजा [Dhanteras Puja] के लिए ऑनलाइन पंडित बुक कर सकते है|

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शनि चालीसा पाठ – Shani Chalisa Lyrics in Hindi 

|| शनि चालीसा ||

|| दोहा ||

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥

|| चौपाई ||

जयति जयति शनिदेव दयाला ।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै ।
माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥

परम विशाल मनोहर भाला ।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके ।
हिय माल मुक्तन मणि दमकै ॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा ।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥

पिंगल, कृष्णों, छाया नन्दन ।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन ॥

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा ।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं ।
रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥

पर्वतहू तृण होई निहारत ।
तृणहू को पर्वत करि डारत ॥

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो ।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥

बनहूँ में मृग कपट दिखाई ।
मातु जानकी गई चुराई ॥

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा ।
मचिगा दल में हाहाकारा ॥

रावण की गतिमति बौराई ।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥

दियो कीट करि कंचन लंका ।
बजि बजरंग बीर की डंका ॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा ।
चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी ।
हाथ पैर डरवाय तोरी ॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो ।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो ॥

विनय राग दीपक महं कीन्हयों ।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी ।
आपहुं भरे डोम घर पानी ॥

तैसे नल पर दशा सिरानी ।
भूंजीमीन कूद गई पानी ॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई ।
पारवती को सती कराई ॥

तनिक विलोकत ही करि रीसा ।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी ।
बची द्रौपदी होति उघारी ॥

कौरव के भी गति मति मारयो ।
युद्ध महाभारत करि डारयो ॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला ।
लेकर कूदि परयो पाताला ॥

शेष देवलखि विनती लाई ।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥

वाहन प्रभु के सात सजाना ।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥

जम्बुक सिंह आदि नख धारी ।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं ।
हय ते सुख सम्पति उपजावैं ॥

गर्दभ हानि करै बहु काजा ।
सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै ।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी ।
चोरी आदि होय डर भारी ॥

तैसहि चारि चरण यह नामा ।
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं ।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥

समता ताम्र रजत शुभकारी ।
स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी ॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै ।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला ।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई ।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत ।
दीप दान दै बहु सुख पावत ॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा ।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥

|| दोहा ||

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार ।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥

शनि चालीसा

Shani Chalisa Lyrics in English – जयति जयति शनिदेव दयाला

|| Shani Chalisa ||

|| Doha ||

Jai Ganesh Girija Suvan, Mangal karan Kripal |
Dinan Ke Dukh Dur Kari, Kije Nath Nihaal ||

Jai Jai Shree Shanidev Prabhu, Sunahu Vinay Maharaj |
Karahu Kripa He Ravi Tanay, Raakhhu Jan Ki Laaj ||

|| Chaupai ||

Jayati Jayati Shanidev Dayala |
Karan Sada Bhaktan Pratipala ||

Chaari Bhuja, Tanu Shyam Viraaje |
Maathe Ratan Mukut Chhabi Chhaje ||

Param Vishal Manohar Bhala |
Tedhi Drishti Bhrikuti Vikrala ||

Kundal Sharavan Chamacham Chamke |
Hiya Maal Muktan Mani Damke ||

Kar Me Gada Trishul Kuthara |
Pal Bich Kare Arihi Sanhara ||

Pingal, Krishano, Chhaya Nandan |
Yam, Konstha, Raudra, Dukhbhanjan ||

Sauri, Mand, Shani, Dash Nama |
Bhaanu Putra Pujanhi Sab Kama ||

Jaa Par Prabhu Prasann He Jaanhi |
Rankhun Raav Kare Kshan Maahin ||

Parvathu Trin Hoe Niharat |
Trinhu Ko Parvat Kari Daarat ||

Raaj Milat Ban Ramhin Dinhon |
Kaikeihun Ki Mati Hari Linhyo ||

Banahun Me Mrig Kapat Dikhayi |
Maatu Jaanki Gai Churai ||

Lakanhi Shakti Vikal Karidara |
Machiga Dal Me Hahakar ||

Ravan Ki Gatimati Baurai |
Ramchandra Sau Bair Badhai ||

Diyo Kit Kari Kanchan Lanka |
Baji Bajrang Bir Ki Danka ||

Nrip Vikram Par Tuhi Pagu Dhara |
Chitr Mayur Nigali Gai Hara ||

Haar Naulakha Laagyo Chauri |
Haath Pair Darvaay Tori ||

Bhari Dasha Nikrisht Dikhayo |
Telihin Ghar Kolhu Chalvaayo ||

Vinay Rag Deepak Maham Kinhayo |
Tab Prasann Prabhu Haiv Sukh Dinhayo ||

Harischandra Nrip Naari Bikaani |
Apahun Bhare Dom Ghar Paani ||

Taise Nal Par Dasha Sirani |
Bhunjimin Kud Gai Paani ||

Shree Shankarhin Gahyo Jaai |
Parvati Ko Sati Karai ||

Tanik Vilokat Hi Kari Risa |
Nabh Udi Gayo Gaurisut ||

Paandav Par Bhe Dasha Tumhari |
Bachi Draupadi Hoti Ughaari ||

Kaurav Ke Bhi Gati Mati Maaryo |
Yuddha Mahabharat Kari Daaryo ||

Ravi Kahn Mukh Mahn Tatkala |
Lekar Kudi Paryo Patala ||

Shesh Devlakhi Vinati Laai |
RAvi Ko Mukh Te Diyo Chhudai ||

Vahan Prabhu Ke Saat Sajaanna |
Jag Digaaj Gardabh Mrig Swana ||

Jambuk Singh Aadi Nakh Dhaari |
So Fal Jyotish Kahat Pukari ||

Gaj Vahan Laxmi Gruh Aave |
Haya Te Sukh Sampati Upjaave ||

Gardabh Haani Kare Bahu Kaja |
Singh Siddhkar Raj Samaja ||

Jambuk Buddhi Nashth Kar Daare |
Mrig De Kashth Praan Sanhaare ||

Jab Aavahin Prabhu Swaan Sawari |
Chori Aadi Hoya Dar Bhaari ||

Taisahi Chaari Charan Yah Nama |
Swarn Lauha Chandi Aru Tama ||

Lauha Charan Par Jab Prabhu Aave |
Dhan Jan Sampatti Nashth Karave ||

Samta Taamr Rajat Shubhkari |
Swarn Sarv Sarv Sukh Mangal Bhari ||

Jo Yah Shani Charitra Nit Gaave |
Kabahun Na Dasha Nikrashth ||

Adbhut Nath Dikhaave Leela |
Kare Shatru Ke Nashi Bali Dhila ||

Jo Pandit Suyogya Bulvaae |
Vidhivat Shani Grah Shanti Karai ||

Pipal Jal Shani Divas Chadhavat |
Deep Dan De Bahu Sukh Paavat ||

Kahat Ram Sundar Prabhu Dasa |
Shani Sumirat Sukh Hot Prakasha ||

|| Doha ||

Paath Shanischar Dev Ko, Ki Ho Bhakt Taiyaar |
Karat Paath Chalish Din, Ho Bhavsagar Paar ||