Vindheshwari Chalisa Lyrics in Hindi: श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा हिंदी में

श्री विंधेश्वरी चालीसा देवी दुर्गा के अवतार माँ विंध्येश्वरी को समर्पित है। देवी विंध्येश्वरी को विंध्यवासिनी नाम से भी जाना जाता है।

ऐसा माना जाता है कि जो भी व्यक्ति पूर्ण श्रद्धा के साथ मां विंधेश्वरी चालीसा का पाठ करता है उसके जीवन की सभी कठिनाइयां दूर हो जाती हैं।

विंध्यवासिनी देवी (विंध्येश्वरी देवी) हिंदू देवी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे विंध्य में निवास करती हैं। विंध्यवासिनी देवी तीन देवताओं या “देवियों” से बनी हैं। पहली स्वयं विंध्यवासिनी हैं, दूसरी काली हैं, और तीसरी अष्टभुजा “आठ भुजा वाली” हैं।

विन्ध्येश्वरी चालीसा

देवी विंध्येश्वरी को समर्पित चालीसा (श्री विंध्येश्वरी देवी चालीसा) बहुत शक्तिशाली हैं और ऐसी मान्यता है कि जो भी इसे नियमित रूप से पाठ करता है, उसे मां विंध्यवासिनी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

साथ ही मां विंध्यवासिनी की पूजा और साधना का बहुत प्रचलन है। उनकी साधना तुरंत ही फलित होती है।

आइये, 99Pandit के साथ जाने इस महत्वपूर्ण चालीसा के बारे में। साथ ही जानेंगे कि इसका पाठ करने के लिए क्या नियम है।

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देवी विंध्येश्वरी कौन है?

देवी विंध्येश्वरी को माँ दुर्गा का रूप कहा जाता है। उन्हें कई नमो से जाना जाता है जैसे- विंध्यवासिनी, जगदम्ब, आदिशक्ति, विन्ध्याचल रानी, योगमाया, आदी। देवी विंध्येश्वरी निशुम्भ और शुम्भ नामक दो बहुत क्रूर राक्षसों का नाश करने वाली हैं।

विंध्येश्वरी माता अपने भक्तों को बुरी शक्तियों से बचाने और उन्हें चुनौतियों से पार पाने के लिए शक्ति और साहस प्रदान करने के लिए जानी जाती हैं।

विंध्यवासिनी देवी हिंदू देवी हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि वे विंध्य में निवास करती हैं। विंध्यवासिनी देवी तीन देवताओं या “देवियों” से बनी हैं। पहली स्वयं विंध्यवासिनी हैं, दूसरी काली हैं, और तीसरी अष्टभुजा “आठ भुजा वाली” हैं।

विंध्यवासिनी देवी को अक्सर सबसे शक्तिशाली हिंदू देवताओं में से एक माना जाता है क्योंकि देवी महात्मा के अनुसार उन्होंने मंदिशा नामक बैल राक्षस को हराया था। उन्हें आदि पराशक्ति के रूप में पहचाना जाता है।

श्री विन्ध्येश्वरी चालीसा – Shree Vindheshwari Chalisa Lyrics in Hindi

चौपाई – 1

नमो नमो विन्ध्येश्वरी नमो नमो जगदंबे।
संतजनो के काज में मां करती नहीं विलंभ॥

अर्थ– मैं श्री विंध्येश्वरी को नमस्कार करता हूँ, मैं श्री जगदम्बा को नमस्कार करता हूँ जो सज्जनों की इच्छा पूरी करने में कभी देरी नहीं करतीं

चौपाई – 2

जय जय जय विन्ध्याचल रानी।
आदि शक्ति जग विदित भवानी॥

अर्थ– जय हो, जय हो, जय हो श्री विंध्याचल रानी की जो आदिशक्ति हैं तथा संसार में भवानी के नाम से विख्यात हैं।

चौपाई – 3

सिंहवाहिनी जै जग माता।
जय जय जय त्रिभुवन सुखदाता॥

अर्थ– जय हो जगत जननी की जिनका वाहन सिंह है। जय हो उस माता की जो सम्पूर्ण जगत को शांति प्रदान करती हैं।

चौपाई – 4

कष्ट निवारिनी जय जग देवी।
जय जय जय जय असुरासुर सेवी॥

अर्थ– जय हो जगत की देवी की जो सभी बाधाओं को दूर करती हैं। जय हो उस माँ की जो सदैव दानवों और देवताओं द्वारा समान रूप से पूजित हैं।

चौपाई – 5

महिमा अमित अपार तुम्हारी ।
शेष सहस मुख वर्णत हारी ॥

अर्थ– आपकी महिमा अपार है, जिसका वर्णन करना असंभव है। आप शेष नाग के समान हजार फनों वाले हैं।

चौपाई – 6

दीनन के दुःख हरत भवानी ।
नहिं देख्यो तुम सम कोई दानी ॥

अर्थ– हे भवानी! दुःखी मनुष्य के दुःख दूर करने वाली! मैंने उनसे अधिक दानशील स्वभाव वाली कोई नहीं देखी।

चौपाई – 7

सब कर मनसा पुरवत माता ।
महिमा अमित जगत विख्याता ॥

अर्थ– हे माँ! आप अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं और इसके लिए आप पूरे संसार में प्रसिद्ध हैं।

चौपाई – 8

जो जन ध्यान तुम्हारो लावै ।
सो तुरतहि वांछित फल पावै ॥

अर्थ– जो व्यक्ति अनन्य भाव से आपकी पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं तुरंत पूरी हो जाती हैं।

चौपाई – 9

तू ही वैष्णवी तू ही रुद्राणी ।
तू ही शारदा अरु ब्रह्माणी ॥

अर्थ– आप देवी वैष्णवी हैं। आप रुद्राणी भी हैं। आप देवी शारदा हैं और आप ब्रह्माणी भी हैं।

चौपाई – 10

रमा राधिका शामा काली ।
तू ही मात सन्तन प्रतिपाली ॥

अर्थ- राम, राधिका और काली – वास्तव में आपके विभिन्न रूप हैं। हे माँ, आप अच्छाई की रक्षा और संरक्षण भी करती हैं।

चौपाई – 11

उमा माधवी चण्डी ज्वाला ।
बेगि मोहि पर होहु दयाला ॥

अर्थ- उमा, माधवी, चण्डी और ज्वाला। कृपया मुझ पर शीघ्र ही अपनी कृपा बरसाइये।

चौपाई – 12

तू ही हिंगलाज महारानी ।
तू ही शीतला अरु विज्ञानी ॥

अर्थ- आप हिमगंगा की महारानी हैं। आप माता शीतला और ज्ञान की देवी हैं।

चौपाई – 13

दुर्गा दुर्ग विनाशिनी माता ।
तू ही लक्श्मी जग सुखदाता ॥

अर्थ- तुम देवी लक्ष्मी के रूप में संसार को सुख दे रही हो। तुम बुराइयों का नाश करने वाली दुर्गा माता हो!

चौपाई – 14

तू ही जान्हवी अरु उत्रानी ।
हेमावती अम्बे निर्वानी ॥

अर्थ- आप जान्हवी हैं, आप उन्नावनी हैं, आप अम्बा हैं और आप आत्माओं को मोक्ष प्रदान करने के लिए यहां हैं!

चौपाई – 15

अष्टभुजी वाराहिनी देवी ।
करत विष्णु शिव जाकर सेवी ॥

अर्थ– आप आठ भुजाओं वाली वराहणी देवी हैं जिनकी स्तुति विष्णु और शिव करते हैं।

चौपाई – 16

चोंसट्ठी देवी कल्यानी ।
गौरी मंगला सब गुण खानी ॥

अर्थ- आप देवी के 64 रूप हैं जो कल्याण सुनिश्चित करते हैं। आप गौरी हैं और सभी कल्याण करने वाली हैं!

चौपाई – 17

पाटन मुम्बा दन्त कुमारी ।
भद्रकाली सुन विनय हमारी ॥

अर्थ- हे भद्रकाली, जो पाटन मुंबा और दंता कुमारी के नाम से प्रसिद्ध हैं, कृपया मेरी प्रार्थना पर ध्यान दें!

चौपाई – 18

वज्रधारिणी शोक नाशिनी ।
आयु रक्शिणी विन्ध्यवासिनी ॥

अर्थ- हे वज्रधारी और सभी दुखों का नाश करने वाली। हे विंध्यवासिनी देवी, हमारी रक्षा करो।

चौपाई – 19

जया और विजया बैताली।
मातु सुगन्धा अरु विकराली॥

अर्थ-  जया, विजया, बैतालि, संकटि और विक्रालि!

चौपाई – 20

नाम अनन्त तुम्हार भवानी ।
बरनैं किमि मानुष अज्ञानी ॥

अर्थ-  हे भवानी! आपके नाम अनंत हैं। मुझ जैसा अज्ञानी मनुष्य उन सबका वर्णन कैसे कर सकता है?

चौपाई – 21

जा पर कृपा मातु तव होई ।
तो वह करै चहै मन जोई ॥

अर्थ- हे माँ ! आपकी कृपा से भक्त कुछ भी प्राप्त कर सकता है।

चौपाई – 22

कृपा करहु मो पर महारानी ।
सिद्धि करिय अम्बे मम बानी ॥

अर्थ- हे देवी रानी! मुझ पर अपनी कृपा बरसाओ और मेरी अभिलाषा पूरी करो।

चौपाई – 23

जो नर धरै मातु कर ध्याना ।
ताकर सदा होय कल्याना ॥

अर्थ- जो भी व्यक्ति भक्ति भाव से माता की पूजा करता है वह सदैव सुखी और समृद्ध रहता है।

चौपाई – 24

विपत्ति ताहि सपनेहु नहिं आवै।
जो देवी कर जाप करावै ॥

अर्थ- जो देवी का नाम जपता है, उसे स्वप्न में भी कभी कोई परेशानी नहीं होती!

चौपाई – 25

जो नर कहं ऋण होय अपारा।
सो नर पाठ करै शत बारा ॥

अर्थ- जो व्यक्ति भारी कर्ज में डूबा हो उसे देवी का नाम सौ बार जपना चाहिए।

चौपाई – 26

निश्चय ऋण मोचन होई जाई।
जो नर पाठ करै मन लाई॥

अर्थ– जो व्यक्ति एकनिष्ठ भक्ति के साथ देवी का नाम जपता है, उसके सारे ऋण समाप्त हो जाते हैं।

चौपाई – 27

अस्तुति जो नर पढ़े पढ़ावे।
या जग में सो बहु सुख पावै॥

अर्थ- जो इन स्तोत्रों को भक्तिपूर्वक पढ़ता है तथा दूसरों को भी पढ़वाता है, उसे इस लोक में शांति मिलती है।

चौपाई – 28

जाको व्याधि सतावै भाई।
जाप करत सब दूरि पराई॥

अर्थ– जब कोई बीमार पड़ता है तो देवी का नाम जपने से वह ठीक हो जाता है।

चौपाई – 29

जो नर अति बन्दी महं होई।
बार हजार पाठ कर सोई॥

अर्थ– यदि कोई व्यक्ति किसी बंधन (शारीरिक या मानसिक) में हो तो उसे मुक्ति पाने के लिए देवी का नाम एक हजार बार जपना चाहिए।

चौपाई – 30

निश्चय बन्दी ते छुटि जाई।
सत्य बचन मम मानहु भाई॥

अर्थ– वह अवश्य ही सभी बंधनों से मुक्त हो जायेगा। हे भाई! मेरी बात को सत्य समझो।

चौपाई – 31

जा पर जो कछु संकट होई।
निश्चय देबिहि सुमिरै सोई॥

अर्थ– यदि किसी को कोई परेशानी हो तो उसे भक्ति भाव से देवी की स्तुति करनी चाहिए।

चौपाई – 32

जो नर पुत्र होय नहिं भाई।
सो नर या विधि करे उपाई॥

अर्थ– यदि किसी दम्पति को कोई पुरुष समस्या न हो तो उन्हें यह विधि अवश्य अपनानी चाहिए।

चौपाई – 33

पांच वर्ष सो पाठ करावै।
नौरातर में विप्र जिमावै॥

अर्थ– दम्पति को लगातार पांच वर्षों तक देवी की पूजा करनी चाहिए तथा नवरात्रि के दौरान ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए।

चौपाई – 34

निश्चय होय प्रसन्न भवानी।
पुत्र देहि ताकहं गुण खानी॥

अर्थ– यदि कोई व्यक्ति अनुष्ठान सही ढंग से करता है तो देवी प्रसन्न होंगी और दम्पति की इच्छा पूरी करेंगी।

चौपाई – 35

ध्वजा नारियल आनि चढ़ावै।
विधि समेत पूजन करवावै॥

अर्थ– वह भक्त पुत्र प्राप्ति के पश्चात् भगवान के पास आये। मंदिर काविंध्यवासिनी देवीऔर नारियल का गोला चढ़ाएं, झंडा फहराएं और अनुष्ठानिक पूजा करें।

चौपाई – 36

नित प्रति पाठ करै मन लाई।
प्रेम सहित नहिं आन उपाई॥

अर्थ- प्रतिदिन पूर्ण श्रद्धा के साथ देवी की पूजा करने के अलावा कोई अन्य उपाय नहीं है।

चौपाई – 37

यह श्री विन्ध्याचल चालीसा।
रंक पढ़त होवे अवनीसा॥

अर्थ– यदि कोई दरिद्र भी देवी के इन स्तोत्रों को पढ़े तो वह भी राजा के समान बन सकता है।

चौपाई – 38

यह जनि अचरज मानहु भाई।
कृपा दृष्टि तापर होई जाई॥

अर्थ– कृपया आश्चर्यचकित न हों, लेकिन यदि देवी प्रसन्न हो जाएं तो असंभव से असंभव कार्य भी आसान हो जाता है।

चौपाई – 39

जय जय जय जगमातु भवानी।
कृपा करहु मो पर जन जानी॥

अर्थ- हे भवानी ! आपकी जय हो !! हे जगत जननी ! कृपया मुझे अपनी कृपा प्रदान करें।

चौपाई – 40

यह चालीसा जो कोई गावे
सब सुख भोग परमपद पावे

अर्थ– जो मनुष्य देवी की महिमा को समर्पित इन चालीस दोहों का गायन करता है, वह संसार में शांति का आनंद लेता है और परमगति को प्राप्त करता है।

विन्ध्येश्वरी चालीसा

श्री विंधेश्वरी चालीसा – Shree Vindheshwari Chalisa Lyrics in English

Chaupai – 1

Namo Namo Vindhyeshwari Namo Namo Jagdamba
Sant janon ke kaj men karati nahin vilamh

Meaning: I proudly salute Shree Vindhyeshwari and Shree Jagdamba, who unwaveringly fulfill the desires of noble individuals without hesitation.

Chaupai – 2

Jai Jai Jai Vindhyachal rani
Adi Shakti jad vidita Bhavani

Meaning: Victory to Shree Vindhyachal Rani, who is the Primal Power and known in the world by the name of Bhavani

Chaupai – 3

Sinha Vahini Jai Jag Mata
Jai Jai Jai Tribhuvan sukhdata

Meaning: Victory to the Mother of the World, whose vehicle is the lion. Victory to the Mother provides solace to the entire world.

Chaupai – 4

Kasht nivarani Jai Jag Devi
Jai Jai Jai Asurasur sevi

Meaning: Attainment to the Goddess of the World who clears all the barriers. Victory to the Mother ever serviced by the demon and gods alike.

Chaupai – 5

Mahima amita apar tumhari
Shesh sahas mukh varnat hari

Meaning: Endless is the praise, whose description is beyond capacity. Like serpent Shesh, you have a thousand hoods.

Chaupai – 6

Deenan ke dukh harat Bhavani
Nahin dekhyo tum sam kou dani

Meaning: O Bhavani! The savior of the distressed person’s sufferings. I have not seen anyone having a more unselfish nature.

Chaupai – 7

Sab kar mansa purvat mata
Mahima amita jagat vikhyata

Meaning: O Mother! You fulfill your devotees’ wishes, and for this, you are famous worldwide.

Chaupai – 8

Jo jan dhyan tumharo lave
So turatahi wanchhita phal pave

Meaning: Anyone who worships you with single-minded devotion instantly has all his ambitions fulfilled.

Chaupai – 9

Tu hi Vaishnavi Aru Rudrani
Tu Hi Sharada aru Brahmani

Meaning: You are Goddess Vaishnavi. You are also Rudrani. You are Goddess Sharada, and you are Brahmani.

Chaupai – 10

Rama Radhika Shyama Kali
Tu hi Matu Santan pratipali

Meaning: Rama, Radhika, and Kali are your different forms. O Mother, you also protect and preserve goodness.

Chaupai – 11

Uma Madhavi Chandi Jwala
Begi mohi par hou dayala

Meaning: Uma, Madhavi, Chandi and Jwala. Kindly shower your favor upon me soon.

Chaupai – 12

Tum hi Hingalaj Maharani
Tum hi Sheetala aru Vigyani

Meaning: You are Maharani of Himgalaj. You are Mother Sheetala and Goddess of knowledge and wisdom.

Chaupai – 13

Tum hi Lakshmi jag sukhdata
Durga durg vinashani Mata

Meaning: You are offering happiness to the world in the form of Goddess Lakshmi. You are Durga Mata, who destroys evil!

Chaupai – 14

Tum hi Janhavi aru Unnani
Hemavati Ambe Nirvani

Meaning: You are Janhavi, and you are Unnani, and you are Amba and are here to provide salvation to the souls!

Chaupai – 15

Ashthabhuja Varahini Devi
Karat Vishnu Shiv ja kar sevi

Meaning: You are the eight-armed Varahani Devi whom Lord Vishnu and Lord Shiva praise.

Chaupai – 16

Chausatti Devi Kalyani
Gauri Mangala sab gun khani

Meaning: You are the 64 forms of Goddess providing welfare. You are Gauri and the doer of all good!

Chaupai – 17

Patan Mumba Dant Kumari
Bhadrakali sun vinay hamari

Meaning: O Bhadrakali, well-known by the names of Patan Mumba and Danta Kumari, please heed my supplication!

Chaupai – 18

Vajra dharani shoka Nashini
Ayurakshani Vindhyavasini

Meaning: O Wielder of the Thunderbolt and Destroyer of all sorrow. O Vindhyavasini Devi, protect us.

Chaupai – 19

Jaya aur Vijaya Baitali
Matu Sankati aru Vikrali

Meaning: Jaya, Vijaya, Baitali, Sankati and Vikrali!

Chaupai – 20

Naam ananta tumhar Bhavani
Barane kim manush agyani

Meaning: O Bhavani! Infinite are your names. How can an ignorant man like me describe them all?

Chaupai – 21

Ja par kripa Matu tav hoi
Tau waha kare chahe man joi

Meaning: O Mother! With your favor, a devotee can achieve anything.

Chaupai – 22

Kripa karahu mo par Maharani
Siddh karau Ambe mum bani

Meaning: O Queen of Goddess! Shower thy favor on me and fulfill my ambition.

Chaupai – 23

Jo nar dhare Matu kar dhyana
Ta kar sada hoya Kalyana

Meaning: Whoever prays to Mata with devotion is always joyful and prosperous.

Chaupai – 24

Vipati tahi sapnehu nahi ave
Jo Devi kau Jap karave

Meaning: Anyone who recites the name of the Goddess never experiences any problem, even in dreams!

Chaupai – 25

Jo nar kahan rina hoya apara
So nar path karey shatvara

Meaning: Whoever is indebted heavily should recite the name of the Goddess a hundred times.

Chaupai – 26

Nishchaya rina Mochan hui Jayi
Jo nar path kare man Layi

Meaning: Whoever chants the name of the Goddess with undivided devotion will pay off all his debts.

Chaupai – 27

Astuti jo nar Padhe Padhave
Ya jag men so bahu sukh pave

Meaning: Whoever reads these hymns devotedly and also causes others to read achieves peace in the world.

Chaupai – 28

Jaka Vyadhi Satave bhai
Jap karati sab door parai

Meaning: When anybody is ill, he will get well by reciting the name of the Goddess.

Chaupai – 29

Jo nar ati bandhan men hoi
Bar hazar Path kar soi

Meaning: If a man is in bondage (physical or mental), he has to recite the goddess’s name a thousand times to gain liberation.

Chaupai – 30

Nishchaya bandhan se chhuti jai
Satya vachan mum manahu bhai

Meaning: He will be released from all bondages. O brother! Consider my word to be true.

Chaupai – 31

Jo par jo kachhu sankat hoi
Nishchaya Devihi sumire soi

Meaning: If anyone is facing any trouble, he should chant the Goddess’s praises with devotion.

Chaupai – 32

Ja kahan putra hoya nahin bhayi
So nar ya vidhi kare upayi

Meaning: If the couple has no son, then they should adopt this Vidhi

Chaupai – 33

Pancha baras so path karave
Nauratan mahan vipra jimave

Meaning: The couple should perform the worship of the Goddess incessantly for five years and feed the Brahmans during Navratra.

Chaupai – 34

Nishchaya honya prasanna Bhavani
Putra dehin takanha gun khani

Meaning: If one performs the ritual correctly, Devi will be pleased and will grant the desire of the married couple.

Chaupai – 35

Dhwaja Nariyal ani chadhave
Vidhi sameta poojan karvave

Meaning: That devotee, having obtained the son, should approach the Temple of Vindhyavasini Devi and give a coconut shell, hoist a flag, and perform the ritual worship ceremonially.

Chaupai – 36

Nita prati path kare man layi
Prem sahita nahin ani upayi

Meaning: Every day, there is no other go but worshipping the Goddess with all devotion.

Chaupai – 37

Yaha Shree Vindhyachal Chalisa
Rank padhat hove avaneesa

Meaning: If even a poor man reads these Goddess’s hymns, then he can even become a king.

Chaupai – 38

Yaha jani acharaj manahu bhai
Kripa drishtihi ja par hoi jai

Meaning: Please don’t be shocked, but if the Goddess is pleased, the most impossible work seems to be possible.

Chaupai – 39

Jai Jai Jai Jag Matu Bhavani
Karahu kripa mo par jan jani

Meaning: O Bhavani! Victory to Mother of the World! Please grant me your grace.

Chaupai – 40

Yaha Chalisa jo koi gave
Sab sukh bhog parampad pave

Meaning: Anyone who chants these forty couplets devoted to the glory of the Goddess enjoys peace in the world and attains the Highest State.

निष्कर्ष

विंधेश्वरी चालीसा देवी विंध्येश्वरी या विंध्यवासिनी की 40 पद्यीय प्रार्थना है। हिंदू धर्म में प्रतिदिन विंधेश्वरी चालीसा का पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है।

ऐसा माना जाता है जो कोई भी इस चालीसा का पाठ करता है उसके जीवन की सभी समस्याएं दूर होती हैं तथा यह मनोकामनाओं को पूरा करने वाला चालीसा है।

हिंदू धर्मग्रंथों के अनुसार देवी का ये नाम उनको विंध्य पर्वत से मिला हुआ है। माता के इस रूप का अर्थ है- विंध्य में निवास करने वाली।

इस चालीसा के नियमित पाठ से सभी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। विंधेश्वरी चालीसा को देवी दुर्गा की पूजा के दौरान भजन के रूप में गाया जा सकता है।

इसी के साथ आज के ब्लॉग में इतना ही। ऐसे ब्लॉग पढ़ने के लिए जुड़े रहिए 99Pandit के साथ। आप विंधेश्वरी चालीसा के लिए हमारी 99Pandit वेबसाइट की मदद से पंडित को बुक करवा सकते हैं। तो आज ही 99Pandit के साथ पंडित बुक करें।

Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics in Hindi: कुंजबिहारी जी की आरती

आपको बता दे कि भगवान विष्णु के अवतार श्री कृष्ण को ही कुंजबिहारी जी के रूप में भी जाना जाता है| कुंजबिहारी जी को प्रसन्न करने के लिए कुंजबिहारी जी की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics) का जाप किया जाता है|

ऐसे तो कुंजबिहारी जी की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics) कभी भी की जा सकती है लेकिन अधिकतर इस कुंजबिहारी जी की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics) का जाप जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भक्तों के द्वारा घरों तथा मंदिरों में किया जाता है|

कुंजबिहारी जी की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics) का जप करने से व्यक्ति के मन में सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होने लगता है|

कुंजबिहारी जी की आरती

यह कुंजबिहारी जी की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics) भगवान श्री कृष्ण का सम्मान करने वाले समारोह का एक बड़ा हिस्सा है|

इस कुंजबिहारी जी की एक खास बात यह भी है कि जब भी आप इस आरती का जप करेंगे तो आप भगवान श्री कृष्ण को अपने समीप ही महसूस करेंगे|

इस कुंजबिहारी जी की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics) का जाप करते समय भक्त भगवान श्री कृष्ण का भक्त भगवान श्री कृष्ण से प्रेम और आशीर्वाद पाने की कामना करते है|

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आरती श्री कुंजबिहारी की – Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics in Hindi

|| आरती श्री कुंजबिहारी की ||

आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

गले में बैजंती माला,
बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला,
नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली,
राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली
भ्रमर सी अलक,
कस्तूरी तिलक,
चंद्र सी झलक,
ललित छवि श्यामा प्यारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

कनकमय मोर मुकुट बिलसै,
देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै ।
बजे मुरचंग,
मधुर मिरदंग,
ग्वालिन संग,
अतुल रति गोप कुमारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

जहां ते प्रकट भई गंगा,
सकल मन हारिणि श्री गंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा
बसी शिव सीस,
जटा के बीच,
हरै अघ कीच,
चरन छवि श्रीबनवारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

चमकती उज्ज्वल तट रेनू,
बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुँ दिसि गोपि ग्वाल धेनू
हंसत मृदु मंद,
चांदनी चंद,
कटत भव फंद,
टेर सुन दीन दुखारी की,
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥
आरती कुंजबिहारी की,
श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की ॥

कुंजबिहारी जी की आरती

Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics in English – Kunj Bihari Ji Ki Aarti

|| Aarti Kunj Bihari Ki ||

Aarti Kunjbihari Ki,
Shri Girdhar Krishna Murari Ki ||
Aarti Kunjbihari Ki,
Shri Girdhar Krishna Murari Ki ||

Gale Me Baijanti Mala,
Bajave Murali Madhur Bala |
Shravan Me Kundal Jhalakala,
Nand Ke Anand Nandlala |
Gagan Sam Ang Kanti Kali,
Radhika Chamak Rahi Aali |
Latan Me Thade Banmali
Bhramar Si Alak,
Kasturi Tilak,
Chandra Si Jhalak,
Lalit Chhavi Shyama Pyaari Ki,
Shri Girdhar Krishan Murari Ki ||

Aarti Kunjbihari Ki,
Shri Girdhar Krishan Murari Ki ||

Kanak May Mor Mukut Bilsai,
Devta Darshan Ko Tarse |
Gagan Sau Suman Rasi Barse |
Baje Murchang,
Madhur Mirdang,
Gwalin Sang,
Atul Rati Gop Kumari Ki,
Shri Girdhar Krishan Murari ||

Aarti Kunjbihari Ki,
Shri Girdhar Krishna Murari Ki ||

Jahan Te Prakat Bhayi Ganga,
Sakal Man Harini Shree Ganga |
Smaran Te Hot Moh Bhanga
Basi Shiv Sis,
Jata Ke Beech,
Hare Agha Keech,
Charan Chhavi Shri Banwari Ki,
Shri Girdhar Krishna Murari Ki ||

Aarti Kunjbihari Ki,
Shri Girdhar Krishna Murari Ki ||

Chamakti Ujjawal Tat Renu,
Baaj Rahi Vrindavan Benu |
Chahun Disi Gopi Gwal Dhenu
Hasat Mridu Mand,
Chandani Chand,
Katat Bhav Fand,
Ter Sun Deen Dukhari Ki,
Shri Girdhar Krishna Murari Ki ||

Aarti Kunjbihari Ki,
Shri Girdhar Krishna Murari Ki ||

निष्कर्ष

कुंजबिहारी जी की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics), भगवान श्री कृष्ण की भक्ति में डूबने का एक अनमोल साधन है| इस कुंजबिहारी जी की आरती का गान करने से भक्तों के मन को शांति प्राप्त होती है|

इस आरती को किसी भी दिन गाया जा सकता है किन्तु कुंजबिहारी जी की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics) को श्री कृष्ण जन्माष्ठमी के दिन गाने से जातक पर भगवान श्री कृष्ण की असीम कृपा होती है| कृष्ण जन्माष्ठमी के दिन इस आरती जाप करना बहुत ही लाभदायक माना जाता है|

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Bhaktamar Stotra in Hindi: श्री भक्तामर स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

भक्तामर स्तोत्र: जैन धर्म एक प्राचीन धर्म है। जैन धर्म के भक्तों को “जैन” के रूप में नामित किया गया है, यह शब्द संस्कृत शब्द जीना (विजेता) से लिया गया है।

नैतिक और गहन जीवन के माध्यम से जीवन के पुनरुत्थान की बाढ़ को पार करने में विजय के मार्ग का महत्व है।

जैन अपने इतिहास का अनुसरण चौबीस विजयी नायकों और प्रशिक्षकों की श्रृंखला के माध्यम से करते हैं जिन्हें तीर्थंकर के नाम से जाना जाता है, जिनमें पहले शासक आदिनाथ या ऋषभ देव थे।

भक्तामर स्तोत्र

भक्तामर स्तोत्र (भक्त + ‘अमर’) जैनियों के बीच एक बहुत लोकप्रिय स्तोत्र है, और इसका पाठ कई परिवारों द्वारा प्रतिदिन किया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि इस भक्तामर स्तोत्र (Bhaktamar Stotra) के प्रत्येक श्लोक में मंत्र की शक्ति है और यह सपनों को साकार करने में सहायक है।

जैन धर्मग्रंथों के अनुसार, जैन मुनि, आचार्य मानतुंगाचार्यजी ने भगवान आदिनाथ की स्तुति (स्तुति) में भक्तामर स्तोत्र लिखा था।

भक्तामर स्तोत्र का प्रत्येक शब्द उनकी ज्ञानवर्धक भक्ति और भगवान के प्रति असीम आस्था को प्रकट करता है।

भक्तामर स्तोत्र का महत्व अवंती के शासक राजा हर्ष के दरबार में बाना और मयूर नामक दो महान विद्वान थे।

आइये, 99Pandit के साथ जानते हैं इस महत्वपूर्ण भक्तामर स्तोत्र लिरिक्स (Bhaktamar Stotra Lyrics) के बारे में।

भक्तामर स्तोत्र क्या है? What is Bhaktamar Stotra?

भक्तामर स्तोत्र एक प्रसिद्ध जैन संस्कृत प्रार्थना है। इसकी रचना आचार्य मानतुंगा (7वीं शताब्दी ई.पू.) द्वारा की गई थी।

भक्तामर नाम दो संस्कृत नामों, “भक्त” और “अमर” के संयोजन से आया है। इस भक्तामर स्तोत्र में, आचार्य मानतुंगा ने 48 सबसे प्रमुख खंडों में इस साहसिक कार्य को चित्रित किया है।

जब आप प्राथमिक शब्द ‘भक्त’ प्रस्तुत करना शुरू करते हैं, तो आप सर्वशक्तिमान की तीव्रता के व्यक्तित्व चित्रण में संलग्न हो जाते हैं।

जब आप अंतिम शब्द, ‘लक्ष्मी’ के साथ समापन करते हैं, तो आपके पूरे शरीर में जीवन शक्ति की एक स्पष्ट सकारात्मक प्रगति होती है।

ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक में मंत्र की शक्ति है और यह सपनों को साकार करने में सहायक है।

जैन धर्मग्रंथों के अनुसार, जैन मुनि, आचार्य मानतुंगाचार्यजी ने भगवान आदिनाथ की स्तुति (स्तुति) में भक्तामर स्तोत्र लिखा था।

यह उन्होंने जेल में लिखा था, क्योंकि राजा भोज ने उन्हें अपनी रहस्यवादी शक्तियां न दिखाने के कारण कैद कर लिया था।

उनके भक्तामर श्लोकों की शक्ति ऐसी थी कि, जैसे ही उन्होंने स्तोत्र लिखना पूरा किया, 48 जेल के ताले चमत्कारिक रूप से एक-एक करके खुल गए।

भक्तामर स्तोत्र लिरिक्स – Bhaktamar Stotra Lyrics with Meaning

श्लोक- 1

भक्तामर-प्रणत-मौलि-मणि-प्रभाणा-
मुद्योतकं दलित-पाप-तमो-वितानम् ।
सम्यक्-प्रणम्य जिन प-पाद-युगं युगादा-
वालम्बनं भव-जले पततां जनानाम् ॥1॥

हिंदी अर्थ – झुके हुए भक्त देवो के मुकुट जड़ित मणियों की प्रथा को प्रकाशित करने वाले, पाप रुपी अंधकार के समुह को नष्ट करने वाले, कर्मयुग के प्रारम्भ में संसार समुन्द्र में डूबते हुए प्राणियों के लिये आलम्बन भूत जिनेन्द्रदेव के चरण युगल को मन वचन कार्य से प्रणाम करके । (मैं मुनि मानतुंग उनकी स्तुति करूँगा)

English Meaning – When the Gods bow down at Bhagavan Rishabhdeva’s feet, the divine glow of his nails increases the shininess of the jewels of their crowns.

The mere touch of his feet absolves beings from sins. He who submits himself at these feet is saved from taking birth again and again.

I offer my reverential salutations at the feet of Bhagavan Rishabhadeva, the first Tirthankar, the propagator of religion at the beginning of this era.

श्लोक- 2

य: संस्तुत: सकल-वां मय-तत्त्व-बोधा-
दुद्भूत-बुद्धि-पटुभि: सुर-लोक-नाथै: ।
स्तोत्रैर्जगत्-त्रितय-चित्त-हरैरुदारै:,
स्तोष्ये किलाहमपि तं प्रथमं जिनेन्द्रम् ॥2॥

हिंदी अर्थ – सम्पूर्णश्रुतज्ञान से उत्पन्न हुई बुद्धि की कुशलता से इन्द्रों के द्वारा तीन लोक के मन को हरने वाले, गंभीर स्तोत्रों के द्वारा जिनकी स्तुति की गई है उन आदिनाथ जिनेन्द्र की निश्चय ही मैं (मानतुंग) भी स्तुति करूँगा।

English Meaning – Wise celestial lords, who have acquired wisdom from all the canons, have eulogized Bhagavan Adinath with Hymns, bringing joy to the audience of three realms (heaven, earth, and hell).

I(Matungacharya, a humble man with little wisdom) shall be steadfast in my endeavor to eulogize that first Tirthankar.

श्लोक- 3

बुद्ध्या विनापि विबुधार्चित-पाद-पीठ!
स्तोतुं समुद्यत-मतिर्विगत-त्रपोऽहम् ।
बालं विहाय जल-संस्थित-मिन्दु-बिम्ब-
मन्य: क इच्छति जन: सहसा ग्रहीतुम् ॥3॥

हिंदी अर्थ – देवों के द्वारा पूजित हैं सिंहासन जिनका, ऐसे हे जिनेन्द्र मैं बुद्धि रहित होते हुए भी निर्लज्ज होकर स्तुति करने के लिये तत्पर हुआ हूँ क्योंकि जल में स्थित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को बालक को छोड़कर दूसरा कौन मनुष्य सहसा पकड़ने की इच्छा करेगा? अर्थात् कोई नहीं ।

English Meaning – As an ignorant child takes up the impossible task of grabbing the moon’s reflection in the water out of impudence alone, an uneducated man like me is trying to eulogize a great soul like you.

श्लोक- 4

वक्तुं गुणान्गुण-समुद्र ! शशांक-कान्तान्,
कस्ते क्षम: सुर-गुरु-प्रतिमोऽपि बुद्ध्या ।
कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-नक्र-चक्रं ,
को वा तरीतुमलमम्बुनिधिं भुजाभ्याम् ॥4॥

हिंदी अर्थ – हे गुणों के भंडार! आपके चन्द्रमा के समान सुन्दर गुणों को कहने लिये ब्रहस्पति के सद्रश भी कौन पुरुष समर्थ है? अर्थात् कोई नहीं। अथवा प्रलयकाल की वायु के द्वारा प्रचण्ड है मगरमच्छों का समूह जिसमें ऐसे समुद्र को भुजाओं के द्वारा तैरने के लिए कौन समर्थ है
अर्थात् कोई नहीं ।

English Meaning – O Ocean of virtues! Can even Brihaspati, the guruji of gods, with the help of his unlimited wisdom, narrate your virtues as transparent and blissful as the moon? (Certainly not.) Is it possible for a man to swim across the reptile-infested ocean, lashed by gales of deluge? (Certainly not.)

श्लोक- 5

सोऽहं तथापि तव भक्ति-वशान्मुनीश!
कर्तुं स्तवं विगत-शक्ति-रपि प्रवृत्त: ।
प्रीत्यात्म-वीर्य-मविचार्य मृगी मृगेन्द्रम्
नाभ्येति किं निज-शिशो: परिपालनार्थम् ॥5॥

हिंदी अर्थ – हे मुनीश! तथापि-शक्ति रहित होता हुआ भी, मैं- अल्पज्ञ, भक्तिवश, आपकी स्तुति करने को तैयार हुआ हूँ।

हरिणि, अपनी शक्ति का विचार न कर, प्रीतिवश अपने शिशु की रक्षा के लिये, क्या सिंह के सामने नहीं जाती? अर्थात जाती हैं।

English Meaning – O Apostle of apostles! I am incapable of narrating your infinite virtues. Still, inspired by my devotion to you, I intend to compose a hymn in your praise.

It is well known that to protect her fawn, even a doe puts her feet down and faces a lion, forgetting its frailty.

श्लोक- 6

अल्प-श्रुतं श्रुतवतां परिहास-धाम,
त्वद्-भक्तिरेव मुखरी-कुरुते बलान्माम् ।
यत्कोकिल: किल मधौ मधुरं विरौति,
तच्चाम्र-चारु-कलिका-निकरैक-हेतु: ॥6॥

हिंदी अर्थ – विद्वानों की हँसी के पात्र, मुझ अल्पज्ञानी को आपकी भक्ति ही बोलने को विवश करती हैं। बसन्त ऋतु में कोयल जो मधुर शब्द करती है उसमें निश्चय से आम्र कलिका ही एक मात्र कारण हैं ।

English Meaning – O lord! I am such an ignorant that I am an object of ridicule for the wise.

Still, my devotion to you compels me to sing hymns in your praise as the mango sprouts compel the cuckoo during the springtime to produce its melodious coo.

श्लोक- 7

त्वत्संस्तवेन भव-सन्तति-सन्निबद्धं,
पापं क्षणात्क्षयमुपैति शरीरभाजाम् ।
आक्रान्त-लोक-मलि-नील-मशेष-माशु,
सूर्यांशु-भिन्न-मिव शार्वर-मन्धकारम् ॥7॥

हिंदी अर्थ – आपकी स्तुति से, प्राणियों के, अनेक जन्मों में बाँध गये पाप कर्म क्षण भर में नष्ट हो जाते हैं जैसे सम्पूर्ण लोक में व्याप्त रात्री का अंधकार सूर्य की किरणों से क्षणभर में छिन्न भिन्न हो जाता है।

English Meaning – Just as the bright sun rays remove darkness, the sins accumulated by living beings are wiped out by praying to you.

श्लोक- 8

मत्वेति नाथ! तव संस्तवनं मयेद,-
मारभ्यते तनु-धियापि तव प्रभावात् ।
चेतो हरिष्यति सतां नलिनी-दलेषु,
मुक्ता-फल-द्युति-मुपैति ननूद-बिन्दु: ॥8॥

हिंदी अर्थ – हे स्वामिन्! ऐसा मानकर मुझ मन्दबुद्धि के द्वारा भी आपका यह स्तवन प्रारम्भ किया जाता है, जो आपके प्रभाव से सज्जनों के चित्त को हरेगा। निश्चय से पानी की बूँद कमलिनी के पत्तों पर मोती के समान शोभा को प्राप्त करती हैं।

English Meaning – I compose this panegyric with the belief that, though composed by an ignorant like me, it will certainly please noble people due to your divine influence. Indeed, when on lotus leaves, dew drops gleam like pearls presenting a pleasant sight.

श्लोक – 9

आस्तां तव स्तवन-मस्त-समस्त-दोषं,
त्वत्संकथाऽपि जगतां दुरितानि हन्ति ।
दूरे सहस्रकिरण: कुरुते प्रभैव,
पद्माकरेषु जलजानि विकासभांजि ॥9॥

हिंदी अर्थ – सम्पूर्ण दोषों से रहित आपका स्तवन तो दूर, आपकी पवित्र कथा भी प्राणियों के पापों का नाश कर देती है। जैसे, सूर्य तो दूर, उसकी प्रभा ही सरोवर में कमलों को विकसित कर देती है।

English Meaning – The brilliant sun is far away; still, at dawn its soft glow makes the drooping lotus buds bloom.

Similarly, O Jina! Let alone the immeasurable powers of your eulog, mere utterance of your name with devotion destroys the sins of the mundane beings and purifies them.

श्लोक – 10

नात्यद्-भुतं भुवन-भूषण ! भूूत-नाथ!
भूतैर्गुणैर्भुवि भवन्त-मभिष्टुवन्त: ।
तुल्या भवन्ति भवतो ननु तेन किं वा
भूत्याश्रितं य इह नात्मसमं करोति ॥10॥

हिंदी अर्थ – हे जगत् के भूषण! हे प्राणियों के नाथ! सत्यगुणों के द्वारा आपकी स्तुति करने वाले पुरुष पृथ्वी पर यदि आपके समान हो जाते हैं तो इसमें अधिक आश्चर्य नहीं है।

क्योंकि उस स्वामी से क्या प्रयोजन, जो इस लोक में अपने अधीन पुरुष को सम्पत्ति के द्वारा अपने समान नहीं कर लेता ।

English Meaning – O ornament of the world! O Lord of the living beings! If the men who praise you through true virtues become like you on earth, then there is no surprise in it.

Because what is the use of a master who does not make the man under his control in this world equal to himself through wealth.

श्लोक – 11

दृष्ट्वा भवन्त मनिमेष-विलोकनीयं,
नान्यत्र-तोष-मुपयाति जनस्य चक्षु: ।
पीत्वा पय: शशिकर-द्युति-दुग्ध-सिन्धो:,
क्षारं जलं जलनिधेरसितुं क इच्छेत्?॥11॥

हिंदी अर्थ – हे अभिमेष दर्शनीय प्रभो! आपके दर्शन के पश्चात् मनुष्यों के नेत्र अन्यत्र सन्तोष को प्राप्त नहीं होते। चन्द्रकीर्ति के समान निर्मल क्षीरसमुद्र के जल को पीकर कौन पुरुष समुद्र के खारे पानी को पीना चाहेगा? अर्थात् कोई नहीं ।

English Meaning – O Jina! Your divine magnificence is spell-binding. After looking at your divine form nothing else please the eye.

Obviously, who would like to taste the saline sea water after drinking fresh water of the divine milk-ocean, pure and soothing like moonlight?

भक्तामर स्तोत्र

श्लोक – 12

यै: शान्त-राग-रुचिभि: परमाणुभिस्-त्वं,
निर्मापितस्-त्रि-भुवनैक-ललाम-भूत !
तावन्त एव खलु तेऽप्यणव: पृथिव्यां,
यत्ते समान-मपरं न हि रूप-मस्ति ॥12॥

हिंदी अर्थ – हे त्रिभुवन के एकमात्र आभुषण जिनेन्द्रदेव! जिन रागरहित सुन्दर परमाणुओं के द्वारा आपकी रचना हुई वे परमाणु पृथ्वी पर निश्चय से उतने ही थे क्योंकि आपके समान दूसरा रूप नहीं है ।

English Meaning – O Crown of the three realms! It appears as if the quiescen ce and harmony imparting ultimate particles became extinct after constituting your body, because I do not witness such out of the world magnificience other than yours.

श्लोक – 13

वक्त्रं क्व ते सुर-नरोरग-नेत्र-हारि,
नि:शेष-निर्जित-जगत्त्रितयोपमानम् ।
बिम्बं कलंक-मलिनं क्व निशाकरस्य,
यद्वासरे भवति पाण्डुपलाश-कल्पम् ॥13॥

हिंदी अर्थ – हे प्रभो! सम्पूर्ण रुप से तीनों जगत् की उपमाओं का विजेता, देव मनुष्य तथा धरणेन्द्र के नेत्रों को हरने वाला कहां आपका मुख? और कलंक से मलिन, चन्द्रमा का वह मण्डल कहां? जो दिन में पलाश (ढाक) के पत्ते के समान फीका पड़ जाता ।

English Meaning – Analogy of your face with the moon does not appear proper to me. How can your scintillating face, that please the eyes of gods, angels, humans and other beings alike, be compared with the spotted moon that is dull and pale, during the day, as the autumn leaves. Indeed, even the best available analogy for your face is lowly in comparison.

श्लोक – 14

सम्पूर्ण-मण्डल-शशांक-कला-कलाप-
शुभ्रा गुणास्-त्रि-भुवनं तव लंघयन्ति ।
ये संश्रितास्-त्रि-जगदीश्वरनाथ-मेकं,
कस्तान् निवारयति संचरतो यथेष्टम् ॥14॥

हिंदी अर्थ – पूर्ण चन्द्र की कलाओं के समान उज्ज्वल आपके गुण, तीनों लोको में व्याप्त हैं क्योंकि जो अद्वितीय त्रिजगत् के भी नाथ के आश्रित हैं उन्हें इच्छानुसार घुमते हुए कौन रोक सकता हैं? कोई नहीं ।

English Meaning – O Lord of the three realms! Surpassing the glow of the full moon, your infinite virtues are radiating throughout the universe- even beyond the three realms; the hymns in praise of your virtues can be heard everywhere throughout the universe.

Indeed, who can curb the freedom of movement of devotees of the only omnipotent like you? (Certainly no one is capable of).

श्लोक – 15

चित्रं-किमत्र यदि ते त्रिदशांग-नाभिर्-
नीतं मनागपि मनो न विकार-मार्गम् ।
कल्पान्त-काल-मरुता चलिताचलेन,
किं मन्दराद्रिशिखरं चलितं कदाचित् ॥15॥

हिंदी अर्थ – यदि आपका मन देवागंनाओं के द्वारा किंचित् भी विक्रति को प्राप्त नहीं कराया जा सका, तो इस विषय में आश्चर्य ही क्या है? पर्वतों को हिला देने वाली प्रलयकाल की पवन के द्वारा क्या कभी मेरु का शिखर हिल सका है? नहीं ।

English Meaning – O Passionless! Divine nymphs have tried their best to allure you through libid gestures, but it is not surprising that your tranquillity has not been disturbed even fractionally.

Of course, the tremendous gale of the doomsday that moves common hillocks can not disturb even the tip of the great Sumeru mountain.

श्लोक – 16

निर्धूम-वर्ति-रपवर्जित-तैल-पूर:,
कृत्स्नं जगत्त्रय-मिदं प्रकटीकरोषि ।
गम्यो न जातु मरुतां चलिताचलानां,
दीपोऽपरस्त्वमसि नाथ ! जगत्प्रकाश: ॥16॥

हिंदी अर्थ – हे स्वामिन्! आप धूम तथा बाती से रहित, तेल के प्रवाह के बिना भी इस सम्पूर्ण लोक को प्रकट करने वाले अपूर्व जगत् प्रकाशक दीपक हैं जिसे पर्वतों को हिला देने वाली वायु भी कभी बुझा नहीं सकती ।

English Meaning – O Lord! You are an all enlightening divine lamp that needs neither a wick nor oil,and is smokeless, yet enlightens three realms. Even the storm that moves the immovables does not effect it.

श्लोक – 17

नास्तं कदाचिदुपयासि न राहुगम्य:,
स्पष्टीकरोषि सहसा युगपज्-जगन्ति ।
नाम्भोधरोदर-निरुद्ध-महा-प्रभाव:,
सूर्यातिशायि-महिमासि मुनीन्द्र! लोके ॥17॥

हिंदी अर्थ – हे मुनीन्द्र! आप न तो कभी अस्त होते हैं न ही राहु के द्वारा ग्रसे जाते हैं और न आपका महान तेज मेघ से तिरोहित होता है आप एक साथ तीनों लोकों को शीघ्र ही प्रकाशित कर देते हैं अतः आप सूर्य से भी अधिक महिमावन्त हैं ।

English Meaning – O Monk among monks! Your unabounding glory is greater than that of the sun. The sun rises every day but sets as well, but the orb of your omniscience is ever shining; it never sets.

The sun is eclipsed, but you are passionless and infinitely virtuous; as such, no mundane passion or desire eclipses the glory of your virtues.

The sun slowly rises over parts of the world, but the glow of your omniscience reaches every part of the world at once.

Insignificant clouds obstruct the sun’s rays, but there is nothing that can obstruct the radiance of your knowledge.

श्लोक – 18

नित्योदयं दलित-मोह-महान्धकारं,
गम्यं न राहु-वदनस्य न वारिदानाम् ।
विभ्राजते तव मुखाब्ज-मनल्पकान्ति,
विद्योतयज्-जगदपूर्व-शशांक-बिम्बम् ॥18॥

हिंदी अर्थ – हमेशा उदित रहने वाला, मोहरुपी अंधकार को नष्ट करने वाला जिसे न तो राहु ग्रस सकता है, न ही मेघ आच्छादित कर सकते हैं, अत्यधिक कान्तिमान, जगत को प्रकाशित करने वाला आपका मुखकमल रुप अपूर्व चन्द्रमण्डल शोभित होता है ।

English Meaning – O Lord! Your lotus face is a moon par excellence. The moon shines only at night, and that too in a fortnightly cycle, but your face is ever radiant.

While moonlight penetrates darkness only to a limited extent, your face removes the universal darkness of ignorance and desire.

The moon is eclipsed and covered by clouds, but there is nothing that can veil your face.

श्लोक – 19

किं शर्वरीषु शशिनाह्नि विवस्वता वा,
युष्मन्मुखेन्दु-दलितेषु तम:सु नाथ!
निष्पन्न-शालि-वन-शालिनी जीव-लोके,
कार्यं कियज्जल-धरै-र्जल-भार-नमै्र: ॥19॥

हिंदी अर्थ – हे स्वामिन्! जब अंधकार आपके मुख रुपी चन्द्रमा के द्वारा नष्ट हो जाता है तो रात्रि में चन्द्रमा से एवं दिन में सूर्य से क्या प्रयोजन? पके हुए धान्य के खेतों से शोभायमान धरती तल पर पानी के भार से झुके हुए मेघों से फिर क्या प्रयोजन।

English Meaning – O Lord of the Universe! Where is the need for the sun during the day and the moon during the night when your ever-radiant face sweeps away the darkness of the world? Indeed, once the crop is ripe, what is needed for the thundering rain clouds?

श्लोक – 20

ज्ञानं यथा त्वयि विभाति कृतावकाशं,
नैवं तथा हरि-हरादिषु नायकेषु ।
तेजो महा मणिषु याति यथा महत्त्वं,
नैवं तु काच-शकले किरणाकुलेऽपि ॥20॥

हिंदी अर्थ – अवकाश को प्राप्त ज्ञान जिस प्रकार आप में शोभित होता है वैसा विष्णु महेश आदि देवों में नहीं। कान्तिमान मणियों में, तेज जैसे महत्व को प्राप्त होता है वैसे किरणों से व्याप्त भी काँच के टुकड़े में नहीं होता ।

English Meaning – O Lord! The pure, incessant and complete knowledge that you have, can not be found in any other deity in this world.

Indeed, the lustre and light of priceless gems can hardly be seen in the glass pieces glittering in a beam of light.

श्लोक – 21

मन्ये वरं हरि-हरादय एव दृष्टा,
दृष्टेषु येषु हृदयं त्वयि तोषमेति ।
किं वीक्षितेन भवता भुवि येन नान्य:,
कश्चिन्मनो हरति नाथ ! भवान्तरेऽपि ॥21॥

हिंदी अर्थ – हे स्वामिन्। देखे गये विष्णु महादेव ही मैं उत्तम मानता हूँ, जिन्हें देख लेने पर मन आपमें सन्तोष को प्राप्त करता है। किन्तु आपको देखने से क्या लाभ? जिससे कि प्रथ्वी पर कोई दूसरा देव जन्मान्तर में भी चित्त को नहीं हर पाता।

English Meaning – O Supreme Lord! It is good that I have seen other mundane deities before seeing you; because the discontent even after seeing them has been removed by the glimpse of your detached and serene expression.

Now that I have witnessed the ultimate, I can not be satisfied with anything less in this life or the later lives.

श्लोक – 22

स्त्रीणां शतानि शतशो जनयन्ति पुत्रान्,
नान्या सुतं त्वदुपमं जननी प्रसूता ।
सर्वा दिशो दधति भानि सहस्र-रश्मिं,
प्राच्येव दिग्जनयति स्फुरदंशु-जालम् ॥22॥

हिंदी अर्थ – सैकड़ों स्त्रियाँ सैकड़ों पुत्रों को जन्म देती हैं, परन्तु आप जैसे पुत्र को दूसरी माँ उत्पन्न नहीं कर सकी। नक्षत्रों को सभी दिशायें धारण करती हैं परन्तु कान्तिमान् किरण समूह से युक्त सूर्य को पूर्व दिशा ही जन्म देती हैं।

English Meaning – O Unique! Numerous stars and planets can be seen in all directions but the sun rises only in the East.

Similarly innumerable women give birth to sons but an illustrious son like you was born only to one mother; you are unique.

श्लोक- 23

त्वामामनन्ति मुनय: परमं पुमांस-
मादित्य-वर्ण-ममलं तमस: पुरस्तात् ।
त्वामेव सम्य-गुपलभ्य जयन्ति मृत्युं,
नान्य: शिव: शिवपदस्य मुनीन्द्र! पन्था:॥23॥

हिंदी अर्थ – हे मुनीन्द्र! तपस्वीजन आपको सूर्य की तरह तेजस्वी निर्मल और मोहान्धकार से परे रहने वाले परम पुरुष मानते हैं।

वे आपको ही अच्छी तरह से प्राप्त कर म्रत्यु को जीतते हैं। इसके सिवाय मोक्षपद का दूसरा अच्छा रास्ता नहीं है।

English Meaning – O Sage of sages! All sages believe you to be the supreme being beyond the darkness,and brilliant as the sun.

You are free of the malignance of attachment and aversion and beyond the darkness of ignorance.

One gains immortality by perceiving, understanding,and following the path of purity you have shown. There is no other path leading to salvation.

श्लोक – 24

त्वा-मव्ययं विभु-मचिन्त्य-मसंख्य-माद्यं,
ब्रह्माणमीश्वर-मनन्त-मनंग-केतुम् ।
योगीश्वरं विदित-योग-मनेक-मेकं,
ज्ञान-स्वरूप-ममलं प्रवदन्ति सन्त: ॥24॥

हिंदी अर्थ – सज्जन पुरुष आपको शाश्वत, विभु, अचिन्त्य, असंख्य, आद्य, ब्रह्मा, ईश्वर, अनन्त, अनंगकेतु, योगीश्वर, विदितयोग, अनेक, एक ज्ञानस्वरुप और अमल कहते हैं ।

English Meaning – O Lord! Viewing you from different perspectives, sages address you as: Amaranthine(in existence), All-pervading (in knowledge), Unfathomable (in perception), Infinite(in virtues), Progenitor(of philosophy), Perpetually blissful(in-state), Majestic(in spiritual glory), Eternal(in purity), Serene(with respect to sensuality), Lord of ascetics(in meditation), Preceptor of Yoga(in the yoga philosophy), Multidimensional(in perspective), Unique(in identity), Omniscient(in form), and Pure(free from all vices).

श्लोक – 25

बुद्धस्त्वमेव विबुधार्चित-बुद्धि-बोधात्,
त्वं शंकरोऽसि भुवन-त्रय-शंकरत्वात् ।
धातासि धीर! शिव-मार्ग विधेर्विधानाद्,
व्यक्तं त्वमेव भगवन् पुरुषोत्तमोऽसि ॥25॥

हिंदी अर्थ – देव अथवा विद्वानों के द्वारा पूजित ज्ञान वाले होने से आप ही बुद्ध हैं। तीनों लोकों में शान्ति करने के कारण आप ही शंकर हैं।

हे धीर! मोक्षमार्ग की विधि के करने वाले होने से आप ही ब्रह्मा हैं। और हे स्वामिन्! आप ही स्पष्ट रुप से मनुष्यों में उत्तम अथवा नारायण हैं।

English Meaning – O Jina! The wise have eulogized your omniscience, so you are the Buddha. You are the ultimate benefactor of all the beings in the universe, so you are Shamkara.

You are the originator of the codes of conduct (Right faith, right knowledge, and right conduct)leading to Moksha, and you are Brahma.

You are manifest in the thoughts of all the devotees in all the splendor of the ultimate, so you are Vishnu. Hence, you are the supreme of all.

श्लोक – 26

तुभ्यं नमस्-त्रिभुवनार्ति-हराय नाथ!
तुभ्यं नम: क्षिति-तलामल-भूषणाय ।
तुभ्यं नमस्-त्रिजगत: परमेश्वराय,
तुभ्यं नमो जिन! भवोदधि-शोषणाय ॥26॥

हिंदी अर्थ – हे स्वामिन्! तीनों लोकों के दुःख को हरने वाले आपको नमस्कार हो, प्रथ्वीतल के निर्मल आभुषण स्वरुप आपको नमस्कार हो, तीनों जगत् के परमेश्वर आपको नमस्कार हो और संसार समुन्द्र को सुखा देने वाले आपको नमस्कार हो।

English Meaning – O Deliverer from all the miseries of the three realms ! I bow to you. O Virtuous adoration of this world! I bow to you.

O Lord paramount of the three realms! I bow to you. O Terminator of the unending chain of waves of rebirths! I bow to you.

श्लोक – 27

को विस्मयोऽत्र यदि नाम गुणै-रशेषैस्-
त्वं संश्रितो निरवकाशतया मुनीश !
दोषै-रुपात्त-विविधाश्रय-जात-गर्वै:,
स्वप्नान्तरेऽपि न कदाचिदपीक्षितोऽसि ॥27॥

हिंदी अर्थ – हे मुनीश! अन्यत्र स्थान न मिलने के कारण समस्त गुणों ने यदि आपका आश्रय लिया हो तो तथा अन्यत्र अनेक आधारों को प्राप्त होने से अहंकार को प्राप्त दोषों ने कभी स्वप्न में भी आपको न देखा हो तो इसमें क्या आश्चर्य?

English Meaning – O Virtuous! It is not surprising that all the virtues have been drawn and densely fused into you, leaving no scope for vices.

The vices have crept into a multitude of other beings. Elevated by false pride, they drift away and do not approach you, even in dreams.

श्लोक- 28

उच्चै-रशोक-तरु-संश्रितमुन्मयूख-
माभाति रूपममलं भवतो नितान्तम् ।
स्पष्टोल्लसत्-किरण-मस्त-तमो-वितानं,
बिम्बं रवेरिव पयोधर-पाश्र्ववर्ति ॥28॥

हिंदी अर्थ – ऊँचे अशोक वृक्ष के नीचे स्थित, उन्नत किरणों वाला, आपका उज्ज्वल रुप जो स्पष्ट रुप से शोभायमान किरणों से युक्त है, अंधकार समूह के नाशक, मेघों के निकट स्थित सूर्य बिम्ब की तरह अत्यन्त शोभित होता है।

English Meaning – O Tirthankara! Sitting under the Ashoka tree, the aura of your scintillating body radiating, you look as divinely splendid as the orb of the sun amidst dense clouds, piercing the growing darkness with its rays.

श्लोक- 29

सिंहासने मणि-मयूख-शिखा-विचित्रे,
विभ्राजते तव वपु: कनकावदातम् ।
बिम्बं वियद्-विलस-दंशुलता-वितानं
तुंगोदयाद्रि-शिरसीव सहस्र-रश्मे: ॥29॥

हिंदी अर्थ – मणियों की किरण-ज्योति से सुशोभित सिंहासन पर, आपका सुवर्ण कि तरह उज्ज्वल शरीर, उदयाचल के उच्च शिखर पर आकाश में शोभित, किरण रुप लताओं के समूह वाले सूर्य मण्डल की तरह शोभायमान हो रहा है।

English Meaning – O Tirthankara! Sitting on throne with multicoloured hue of gems. Your bright golden body looks resplendent and attractive like the rising sun on the peak of the eastern mountain’s radiating golden rays under the canopy of the blue sky.

श्लोक – 30

कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं,
विभ्राजते तव वपु: कलधौत-कान्तम् ।
उद्यच्छशांक-शुचिनिर्झर-वारि-धार-
मुच्चैस्तटं सुरगिरेरिव शातकौम्भम् ॥30॥

हिंदी अर्थ – कुन्द के पुष्प के समान धवल चॅवरों के द्वारा सुन्दर है शोभा जिसकी, ऐसा आपका स्वर्ण के समान सुन्दर शरीर, सुमेरुपर्वत, जिस पर चन्द्रमा के समान उज्ज्वल झरने के जल की धारा बह रही है, के स्वर्ण निर्मित ऊँचे तट की तरह शोभायमान हो रहा है।

English Meaning – O Tirthankara! The snow white fans of loose fibres (giant whisks) swinging on both sides of your golden body appear like streams of water, pure and glittering as the rising moon, flowing down th sides of the peakof the golden mountain, Sumeru.

श्लोक – 31

छत्रत्रयं-तव-विभाति शशांककान्त,
मुच्चैः स्थितं स्थगित भानुकर-प्रतापम् ।
मुक्ताफल-प्रकरजाल-विवृद्धशोभं,
प्रख्यापयत्त्रिजगतः परमेश्वरत्वम् ॥31॥

हिंदी अर्थ – चन्द्रमा के समान सुन्दर, सूर्य की किरणों के सन्ताप को रोकने वाले, तथा मोतियों के समूहों से बढ़ती हुई शोभा को धारण करने वाले, आपके ऊपर स्थित तीन छत्र, मानो आपके तीन लोक के स्वामित्व को प्रकट करते हुए शोभित हो रहे हैं।

English Meaning – O Tirthankara! A three tier canopy adorns the space over your head. It has the soft white glow of the moon and is decorated with pearl frills.

This canopy has screened the scorching sun rays. Indeed, this three-tier canopy symbolizes your paramountcy over the three realms.

भक्तामर स्तोत्र

श्लोक – 32

गम्भीर-तार-रव-पूरित-दिग्विभागस्-
त्रैलोक्य-लोक-शुभ-संगम-भूति-दक्ष: ।
सद्धर्म-राज-जय-घोषण-घोषक: सन्,
खे दुन्दुभि-ध्र्वनति ते यशस: प्रवादी ॥32॥

हिंदी अर्थ – गम्भीर और उच्च शब्द से दिशाओं को गुञ्जायमान करने वाला, तीन लोक के जीवों को शुभ विभूति प्राप्त कराने में समर्थ और समीचीन जैन धर्म के स्वामी की जय घोषणा करने वाला दुन्दुभि वाद्य आपके यश का गान करता हुआ आकाश में शब्द करता है।

English Meaning – The deep resonant drum beats fill space in all directions as if felicitating your serene presence and giving a call to all the beings of the three realms to join the pious path shown by you. All space is reverberating with this announcement of victory of the true religion. 

श्लोक – 33

मन्दार-सुन्दर-नमेरु-सुपारिजात-
सन्तानकादि-कुसुमोत्कर-वृष्टि-रुद्घा ।
गन्धोद-बिन्दु-शुभ-मन्द-मरुत्प्रपाता,
दिव्या दिव: पतति ते वचसां ततिर्वा ॥33॥

हिंदी अर्थ – सुगंधित जल बिन्दुओं और मन्द सुगन्धित वायु के साथ गिरने वाले श्रेष्ठ मनोहर मन्दार, सुन्दर, नमेरु, पारिजात, सन्तानक आदि कल्पवृक्षों के पुष्पों की वर्षा आपके वचनों की पंक्तियों की तरह आकाश से होती है।

English Meaning – O Tirthankara! The divine spray of perfumes and shower of fragrant flowers, like Mandar, Sundar, Nameru, Parijata, etc., float toward you with the drift of mild breeze.

This enchanting scene creates an impression that the pious words you utter have turned into flowers and are floating toward the earthlings.

श्लोक – 34

शुम्भत्-प्रभा-वलय-भूरि-विभा-विभोस्ते,
लोक-त्रये-द्युतिमतां द्युति-माक्षिपन्ती ।
प्रोद्यद्-दिवाकर-निरन्तर-भूरि-संख्या,
दीप्त्या जयत्यपि निशामपि सोमसौम्याम् ॥34॥

हिंदी अर्थ – हे प्रभो! तीनों लोकों के कान्तिमान पदार्थों की प्रभा को तिरस्कृत करती हुई आपके मनोहर भामण्डल की विशाल कान्ति एक साथ उगते हुए अनेक सूर्यों की कान्ति से युक्त होकर भी चन्द्रमा से शोभित रात्रि को भी जीत रही है ।

English Meaning – O Tirthankara! The splendorous halo around you is more brilliant than any other luminous object in the universe.

It dispels darkness of the night and is more dazzling than many suns put together; but still it is as cool and soothing as the bright full moon. 

श्लोक – 35

स्वर्गापवर्ग-गम-मार्ग-विमार्गणेष्ट:,
सद्धर्म-तत्त्व-कथनैक-पटुस्-त्रिलोक्या: ।
दिव्य-ध्वनि-र्भवति ते विशदार्थ-सर्व-
भाषास्वभाव-परिणाम-गुणै: प्रयोज्य: ॥35॥

हिंदी अर्थ – आपकी दिव्यध्वनि स्वर्ग और मोक्षमार्ग की खोज में साधक, तीन लोक के जीवों को समीचीन धर्म का कथन करने में समर्थ, स्पष्ट अर्थ वाली, समस्त भाषाओं में परिवर्तित करने वाले स्वाभाविक गुण से सहित होती है।

English Meaning – O Tirthankara! Your divine voice (discourse) is potent enough to show the path of liberation to all beings.

It has the clarity to reveal the mystery of matter and its trasformation. Profound but candid, it has the astounding capacity of transforming into the language understood by each being of the world.

श्लोक – 36

उन्निद्र-हेम-नव-पंकज-पुंज-कान्ती,
पर्युल्-लसन्-नख-मयूख-शिखाभिरामौ।
पादौ पदानि तव यत्र जिनेन्द्र ! धत्त:,
पद्मानि तत्र विबुधा: परिकल्पयन्ति ॥36॥

हिंदी अर्थ – पुष्पित नव स्वर्ण कमलों के समान शोभायमान नखों की किरण प्रभा से सुन्दर आपके चरण जहाँ पड़ते हैं वहाँ देव गण स्वर्ण कमल रच देते हैं।

English Meaning – O Jina! Your feet are resplendent like fresh golden lotuses. Their nails have a comely glow. Wherever you put your feet the gods create divine golden lotuses.

श्लोक – 37

॥ अन्तरंग-बहिरंग लक्ष्मी के स्वामी मंत्र॥
इत्थं यथा तव विभूति-रभूज्-जिनेन्द्र्र !
धर्मोपदेशन-विधौ न तथा परस्य।
यादृक्-प्र्रभा दिनकृत: प्रहतान्धकारा,
तादृक्-कुतो ग्रहगणस्य विकासिनोऽपि ॥37॥

हिंदी अर्थ – हे जिनेन्द्र! इस प्रकार धर्मोपदेश के कार्य में जैसा आपका ऐश्वर्य था वैसा अन्य किसी का नहीं हुआ अंधकार को नष्ट करने वाली जैसी प्रभा सूर्य की होती है वैसी अन्य प्रकाशमान भी ग्रहों की कैसे हो सकती है?

English Meaning – O lord of ascetics! The height of eloquence, lucidity, and eruditeness evident in your discourse is not seen anywhere else.

Indeed, the darkness-dissipating dazzle of the sun can never be seen in the twinkling stars and planets.

श्लोक – 38

॥ हस्ती भय निवारण मंत्र ॥
श्च्यो-तन्-मदाविल-विलोल-कपोल-मूल,
मत्त-भ्रमद्-भ्रमर-नाद-विवृद्ध-कोपम्।
ऐरावताभमिभ-मुद्धत-मापतन्तं
दृष्ट्वा भयं भवति नो भवदाश्रितानाम् ॥38॥

हिंदी अर्थ – आपके आश्रित मनुष्यों को, झरते हुए मद जल से जिसके गण्डस्थल मलीन, कलुषित तथा चंचल हो रहे है और उन पर उन्मत्त होकर मंडराते हुए काले रंग के भौरे अपने गुजंन से क्रोध बढ़ा रहे हों ऐसे ऐरावत की तरह उद्दण्ड, सामने आते हुए हाथी को देखकर भी भय नहीं होता।

English Meaning – O Jina! The devotees who have submitted to you are not scared even of a mad mammoth with dripping humor and being incessantly goaded by humming bees.

(They are always and everywhere fearless as the quietitude of their deep meditation pacifies even the most oppressive of the beings. 

श्लोक – 39

॥ सिंह-भय-विदूरण मंत्र ॥
भिन्नेभ-कुम्भ-गल-दुज्ज्वल-शोणिताक्त,
मुक्ता-फल-प्रकरभूषित-भूमि-भाग:।
बद्ध-क्रम: क्रम-गतं हरिणाधिपोऽपि,
नाक्रामति क्रम-युगाचल-संश्रितं ते ॥39॥ 

हिंदी अर्थ – सिंह, जिसने हाथी का गण्डस्थल विदीर्ण कर, गिरते हुए उज्ज्वल तथा रक्तमिश्रित गजमुक्ताओं से पृथ्वी तल को विभूषित कर दिया है तथा जो छलांग मारने के लिये तैयार है वह भी अपने पैरों के पास आये हुए ऐसे पुरुष पर आक्रमण नहीं करता जिसने आपके चरण युगल रुप पर्वत का आश्रय ले रखा है।

English Meaning – O Jina! A ferocious lion tears open the temples of elephant and scatters around white bone-pearls made crimson with blood.

Even such angry and roaring lion, ready to leap at its prey, gets pacified and does not attack a devotee who has taken shelter at your secure feet. (In other words, your devotee is free of the fear of ferocious lions.) 

श्लोक – 40

॥ अग्नि भय-शमन मंत्र ॥
कल्पान्त-काल-पवनोद्धत-वह्नि-कल्पं,
दावानलं ज्वलित-मुज्ज्वल-मुत्स्फुलिंगम्।
विश्वं जिघत्सुमिव सम्मुख-मापतन्तं,
त्वन्नाम-कीर्तन-जलं शमयत्यशेषम् ॥40॥

हिंदी अर्थ – आपके नाम यशोगानरुपी जल, प्रलयकाल की वायु से उद्धत, प्रचण्ड अग्नि के समान प्रज्वलित, उज्ज्वल चिनगारियों से युक्त, संसार को भक्षण करने की इच्छा रखने वाले की तरह सामने आती हुई वन की अग्नि को पूर्ण रुप से बुझा देता है।

English Meaning – O Jina! Even the all-consuming forest conflagration, as if kindled by the doomsday tempest and having incandescant sparking flames, is extinguished in no time by the quenching stream of your name laudition. (That is, your devotee has no fear of fire.) 

श्लोक – 41

॥ सर्प-भय-निवारण मंत्र ॥
रक्तेक्षणं समद-कोकिल-कण्ठ-नीलम्,
क्रोधोद्धतं फणिन-मुत्फण-मापतन्तम्।
आक्रामति क्रम-युगेण निरस्त-शंकस्-
त्वन्नाम-नागदमनी हृदि यस्य पुंस: ॥41॥

हिंदी अर्थ – जिस पुरुष के हृदय में नामरुपी-नागदौन नामक औषध मौजूद है, वह पुरुष लाल लाल आँखो वाले, मदयुक्त कोयल के कण्ठ की तरह काले, क्रोध से उद्धत और ऊपर को फण उठाये हुए, सामने आते हुए सर्प को निश्शंक होकर दोनों पैरो से लाँघ जाता है।

English Meaning – O Benevolent! A devotee who has absorbed the anti-toxin of your pious name crosses fearlessly over an extremely venomous and hissing serpent with blood-red eyes, a black body, an obnoxious appearance and a raised hood. (That is, your devotee has no fear of snakes.)

श्लोक – 42

॥ रण-रंगे-शत्रु पराजय मंत्र ॥
वल्गत्-तुरंग-गज-गर्जित-भीमनाद-
माजौ बलं बलवता-मपि-भूपतीनाम्।
उद्यद्-दिवाकर-मयूख-शिखापविद्धं
त्वत्कीर्तनात्तम इवाशु भिदामुपैति: ॥42॥

हिंदी अर्थ – आपके यशोगान से युद्धक्षेत्र में उछलते हुए घोड़े और हाथियों की गर्जना से उत्पन भयंकर कोलाहल से युक्त पराक्रमी राजाओं की भी सेना, उगते हुए सूर्य किरणों की शिखा से वेधे गये अंधकार की तरह शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाती है।

English Meaning – O Conqueror of vices! As darkness recedes with the rising of the sun, the armies of formidable kings, creating a tumultuous uproar of whinnying horses and trumpeting elephants, retreat when your pious name is chanted. (In other words, your devotee is free of the fear of enemies.)

श्लोक- 43

॥ रणरंग विजय मंत्र ॥
कुन्ताग्र-भिन्न-गज-शोणित-वारिवाह,
वेगावतार-तरणातुर-योध-भीमे।
युद्धे जयं विजित-दुर्जय-जेय-पक्षास्-
त्वत्पाद-पंकज-वनाश्रयिणो लभन्ते: ॥43॥

हिंदी अर्थ – हे भगवन् आपके चरण कमलरुप वन का सहारा लेने वाले पुरुष, भालों की नोकों से छेद गये हाथियों के रक्त रुप जल प्रवाह में पड़े हुए, तथा उसे तैरने के लिये आतुर हुए योद्धाओं से भयानक युद्ध में, दुर्जय शत्रु पक्ष को भी जीत लेते हैं।

English Meaning – O, Vanquisher of the passion! In the fierce battle, where brave warriors are eager to plod over the streams of blood gushing out of the bodies of elephants pierced by sharp spears, the devotee, having sought protection of the garden of your lotus feet, embraces victory ultimately. (In other words, your devotee is always victorious in the end.)

श्लोक – 44

॥ समुद्र उल्लंघन मंत्र ॥
अम्भोनिधौ क्षुभित-भीषण-नक्र-चक्र-
पाठीन-पीठ-भय-दोल्वण-वाडवाग्नौ।
रंगत्तरंग-शिखर-स्थित-यान-पात्रास्-
त्रासं विहाय भवत: स्मरणाद्-व्रजन्ति: ॥44॥

हिंदी अर्थ – क्षोभ को प्राप्त भयंकर मगरमच्छों के समूह और मछलियों के द्वारा भयभीत करने वाले दावानल से युक्त समुद्र में विकराल लहरों के शिखर पर स्थित है जहाज जिनका, ऐसे मनुष्य, आपके स्मरण मात्र से भय छोड़कर पार हो जाते हैं।

English Meaning – O Equanimous! Abroad, a ship caught at the crest of giant waves and surrounded by attacking alligators, giant oceanic creatures, and marine fire, with the help of your name chanting, the devotee surmounts such horrors and crosses the ocean. (That is, your devotees are free of the fear of water.)

श्लोक – 45

॥ रोग-उन्मूलन मंत्र ॥
उद्भूत-भीषण-जलोदर-भार-भुग्ना:,
शोच्यां दशा-मुपगताश्-च्युत-जीविताशा:।
त्वत्पाद-पंकज-रजो-मृत-दिग्ध-देहा:,
मत्र्या भवन्ति मकर-ध्वज-तुल्यरूपा: ॥45॥

हिंदी अर्थ – उत्पन्न हुए भीषण जलोदर रोग के भार से झुके हुए, शोभनीय अवस्था को प्राप्त और नहीं रही है जीवन की आशा जिनके, ऐसे मनुष्य आपके चरण कमलों की रज रुप अम्रत से लिप्त शरीर होते हुए कामदेव के समान रुप वाले हो जाते हैं ।

English Meaning – O Omniscient! An extremely sick person, disfigured due to advanced dropsy and having lost all hopes of recovery and survival, when rubs the nectar-like dust particles taken from your lotus feet, fully recovers and becomes handsome as Adonis.

श्लोक – 46

॥ बन्धन मुक्ति मंत्र ॥
आपाद-कण्ठमुरु-शृंखल-वेष्टितांगा,
गाढं-बृहन्-निगड-कोटि निघृष्ट-जंघा:।
त्वन्-नाम-मन्त्र-मनिशं मनुजा: स्मरन्त:,
सद्य: स्वयं विगत-बन्ध-भया भवन्ति: ॥46॥

हिंदी अर्थ – जिनका शरीर पैर से लेकर कण्ठ पर्यन्त बड़ी-बड़ी सांकलों से जकड़ा हुआ है और विकट सघन बेड़ियों से जिनकी जंघायें अत्यन्त छिल गईं हैं ऐसे मनुष्य निरन्तर आपके नाममंत्र को स्मरण करते हुए शीघ्र ही बन्धन मुक्त हो जाते है।

English Meaning – O Liberated soul! Persons put in prison, tied from head to toe in heavy chains, whose thighs have been bruised by the rough edges of the chain-links, get unshackled and freed from bondage by chanting your name.

श्लोक – 47

॥ सकल भय विनाशन मंत्र ॥
मत्त-द्विपेन्द्र-मृग-राज-दवानलाहि-
संग्राम-वारिधि-महोदर-बन्ध-नोत्थम्।
तस्याशु नाश-मुपयाति भयं भियेव,
यस्तावकं स्तव-मिमं मतिमानधीते: ॥47॥

हिंदी अर्थ – जो बुद्धिमान मनुष्य आपके इस स्तवन को पढ़ता है उसका मत्त हाथी, सिंह, दवानल, युद्ध, समुद्र जलोदर रोग और बन्धन आदि से उत्पन्न भय मानो डरकर शीघ्र ही नाश को प्राप्त हो जाता है। 

English Meaning – O jina! The wise who recites this panegyric with devotion is always free of fears of mad elephants, ferocious lions, forest fire, poisonous snakes tempestuous sea, fatal diseases,and bondage. In fact, fear itself is afraid of him.

श्लोक – 48

॥ जिन-स्तुति-फल मंत्र ॥
स्तोत्र-स्रजं तव जिनेन्द्र गुणैर्निबद्धाम्,
भक्त्या मया विविध-वर्ण-विचित्र-पुष्पाम्।
धत्ते जनो य इह कण्ठ-गता-मजस्रं,
तं मानतुंग-मवशा-समुपैति लक्ष्मी: ॥48॥

हिंदी अर्थ – हे जिनेन्द्र देव! इस जगत् में जो लोग मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक (ओज, प्रसाद, माधुर्य आदि) गुणों से रची गई नाना अक्षर रुप, रंग बिरंगे फूलों से युक्त आपकी स्तुति रुप माला को कंठाग्र करता है।

उस उन्नत सम्मान वाले पुरुष को अथवा आचार्य मानतुंग को स्वर्ग मोक्षादि की विभूति अवश्य प्राप्त होती है।

English Meaning – O Jina! With devotion, I have made up this string (panegyric) of your virtues. I have decorated it with charming and multicolored (words) flowers (sentiments).

The devotee who always wears it on the neck (memories and chants) attracts the goddess of success (attracts the highest honor, the goal of liberation).

निष्कर्ष

भक्तामर स्तोत्र (Bhaktamar Stotra in Hindi) एक दिव्य एवं चमत्कारिक रूप से प्रभावशाली औषधि है।

इस स्तोत्र को आचार्य मानतुंगा सूरीजी ने लिखा है। भक्ति की इस अविरल धारा का प्रवाह और बल प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ के लिए है।

भक्तामर स्तोत्र का प्रत्येक शब्द भगवान के प्रति उनकी ज्ञानवर्धक भक्ति और असीम आस्था को प्रकट करता है। इस स्तोत्र को श्वेतांबर और दिगंबर के दोनों मुख्य संप्रदाय स्वीकार करते हैं।

यह प्रथम जिन, ऋषभनाथ या भगवान ऋषभ को समर्पित है, जिन्हें अक्सर आदिनाथ के नाम से जाना जाता है, जिसका अर्थ है ‘प्रथम भगवान‘।

यह स्तोत्र संस्कृत में विस्तृत काव्यात्मक शैली में लिखा गया है। भक्तामर-स्तोत्र जिना की विशेषताओं और लक्षणों पर केंद्रित है। सबसे प्रमुख हैं जिना की चमक और पूर्ण शांति, जो उनकी पूर्ण पूर्णता की विशेषताएं हैं।

Shiv Chalisa Lyrics in Hindi: शिव चालीसा का लाभ तथा महत्व

Shiv Chalisa Lyrics in Hindi: हिन्दू धर्म में अनेकों देवी – देवताओं की पूजा की जाती है| सभी लोग अपनी श्रद्धा व आस्था के अनुसार अलग – अलग देवी – देवताओं को मानते है| उनसे प्रार्थना करने के लिए कई सारे पूजा – पाठ, चालीसा, आरतियाँ और अन्य कई ऐसे बहुत सी चीज़े है|

आज हम जिनकी चालीसा के बारे में बात करेंगे वो है इस संसार के पालक भगवान शिव| जिसे शिव चालीसा के नाम से भी जाना जाता है|

माना जाता है कि भगवान केवल एक दीपक जलने मात्र से ही अपने भक्तों से प्रसन्न हो जाते है| भगवान को प्रसन्न करने के लिए अनेकों आरतियों और चालीसा और मंत्रो का निर्माण किया गया जिनका नियमित रूप से जप करने से भगवान की कृपा प्राप्त होती है तथा सभी कष्टों का निवारण होता है|

शिव चालीसा

भगवान शिव की इस शिव चालीसा (Shiv Chalisa Lyrics in Hindi) को उनके प्रिय ग्रंथ शिव पुराण से लिया गया है|

शिव पुराण की रचना महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गयी है| इसलिए शिव चालीसा के रचयिता भी महर्षि वेदव्यास जी ही है| शिव पुराण एक बहुत ही पवित्र ग्रन्थ है|

जिसे देववाणी संस्कृत में लिखा गया है| इस शिव पुराण में 24 हजार श्लोक है| शिव चालीसा (Shiv Chalisa Lyrics in Hindi) का यह पाठ भगवान शंकर को प्रसन्न करने एक बहुत ही अच्छा साधन है|

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार शिव चालीसा का पाठ करने से भक्तों को बहुत जल्द लाभ की प्राप्ति होती है|

शिव चालीसा (Shiv Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ कुछ जरुरी नियम को अपनाकर करने से महादेव अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते है और उनके सभी दुःख व कष्टों को भी दूर करते है| शिव चालीसा  में “चालीस” चौपाईयां है| जिनमे भगवान शिव की स्तुति का गुणगान किया गया है|

शिव चालीसा पाठ चौपाई – Shiv Chalisa Lyrics in Hindi

|| दोहा ||

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल मूल सुजान ।
कहत अयोध्यादास तुम, देहु अभय वरदान ॥

|| चौपाई ||

जय गिरिजा पति दीन दयाला, सदा करत सन्तन प्रतिपाला ।
भाल चन्द्रमा सोहत नीके, कानन कुण्डल नागफनी के ॥ 

अंग गौर शिर गंग बहाये, मुण्डमाल तन क्षार लगाए ।
वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे, छवि को देखि नाग मन मोहे ॥

मैना मातु की हवे दुलारी, बाम अंग सोहत छवि न्यारी ।
कर त्रिशूल सोहत छवि भारी, करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे, सागर मध्य कमल हैं जैसे |
कार्तिक श्याम और गणराऊ, या छवि को कहि जात न काऊ ॥

देवन जबहीं जाय पुकारा, तब ही दुख प्रभु आप निवारा ।
किया उपद्रव तारक भारी, देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ, लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ।
आप जलंधर असुर संहारा, सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई, सबहिं कृपा कर लीन बचाई |
किया तपहिं भागीरथ भारी, पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥ 

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं, सेवक स्तुति करत सदाहीं |
वेद नाम महिमा तव गाई, अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला, जरत सुरासुर भए विहाला |
कीन्ही दया तहं करी सहाई, नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥ 

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा, जीत के लंक विभीषण दीन्हा |
सहस कमल में हो रहे धारी, कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 

एक कमल प्रभु राखेउ जोई, कमल नयन पूजन चहं सोई |
कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर, भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी, करत कृपा सब के घटवासी |
दुष्ट सकल नित मोहि सतावै, भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 

मात-पिता भ्राता सब होई, संकट में पूछत नहिं कोई |
स्वामी एक है आस तुम्हारी, आय हरहु मम संकट भारी ॥

धन निर्धन को देत सदा हीं, जो कोई जांचे सो फल पाहीं |
अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी, क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥ 

शंकर हो संकट के नाशन, मंगल कारण विघ्न विनाशन |
योगी यति मुनि ध्यान लगावैं, शारद नारद शीश नवावैं ॥ 

नमो नमो जय नमः शिवाय, सुर ब्रह्मादिक पार न पाय |
जो यह पाठ करे मन लाई, ता पर होत है शम्भु सहाई ॥ 

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी, पाठ करे सो पावन हारी |
पुत्र हीन कर इच्छा जोई, निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 

पण्डित त्रयोदशी को लावे, ध्यान पूर्वक होम करावे |
त्रयोदशी व्रत करै हमेशा, ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे, शंकर सम्मुख पाठ सुनावे |
जन्म जन्म के पाप नसावे, अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी, जानि सकल दुःख हरहु हमारी |

|| दोहा ||

नित्त नेम कर प्रातः ही, पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना, पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु, संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि, पूर्ण कीन कल्याण ॥

Shiv Chalisa Lyrics in English – जय गिरिजा पति दीन दयाला

|| Doha ||

Jay Ganesh Girija Suvan,
Mangal Mool Sujan.
Kahat Ayodhya Das Tum,
Dehu Abhay Varadan.

|| Chaupai ||

Jay Girija Pati Deen Dayala, Sada Karat Santan Pratipala.
Bhaal Chandrama Sohat Nike, Kaanan Kundal Naagphani Ke.

Ang Gaur Shir Gang Bahaye, Mundamal Tan Kshar Lagaye.
Vastr Khaal Baghambar Sohe, Chhavi Ko Dekhi Naag Man Mohe.

Maina Matu Ki Have Dulari, Baam Ang Sohat Chhavi Nyari.
Kar Trishul Sohat Chhavi Bhari, Karat Sada Shatrun Kshayakari.

Nandi Ganesh Sohai Tah Kaise, Saagar Madhya Kamal Hain Jaise.
Kartik Shyam Aur Ganraau, Ya Chhavi Ko Kahi Jaat Na Kaau.

Devan Jabahi Jaay Pukaara, Tab Hi Dukh Prabhu Aap Nivaara.
Kiya Upadrav Tarak Bhari, Devan Sab Mili Tumhin Juhaari.

Turat Shadanan Aap Pathaayau, Lavanimansh Maham Mari Girayau.
Aap Jalandhar Asur Sanhaara, Suyash Tumhaar Vidit Sansara.

Tripurasur San Yudh Machaai, Sabahin Kripa Kar Leen Bachaai.
Kiya Tapihin Bhagirath Bhari, Purab Pratijna Taasu Puraari.

Danin Mahin Tum Sam Koi Naahi, Sevak Stuti Karat Sadaahi.
Ved Naam Mahima Tav Gaai, Akath Anadi Bhed Nahi Paai.

Prakati Udadh Manthan Mein Jwaala, Jarat Surasur Bhae Vihaala.
Keenhi Daya Tahan Kari Sahaai, Neelakanth Tab Naam Kahaai.

Poojan Ramchandra Jab Keenha, Jeet Ke Lank Vibhishan Deenha.
Sahas Kamal Mein Ho Rahe Dhaari, Keenhi Pariksha Tabahin Puraari.

Ek Kamal Prabhu Raakheu Joi, Kamal Nayan Poojan Chahan Soi.
Kathin Bhakti Dekhi Prabhu Shankar, Bhae Prasann Diye Ichhit Var.

Jay Jay Jay Anant Avinaashi, Karat Kripa Sab Ke Ghatvaasi.
Dusht Sakal Nit Mohi Sataavai, Bhramat Rahoun Mohi Chain Na Aavai.

Maat-Pita Bhrata Sab Hoi, Sankat Mein Poochat Nahi Koi.
Swami Ek Hai Aas Tumhaari, Aay Harahu Mam Sankat Bhari.

Dhan Nirdhan Ko Det Sada Hi, Jo Koi Jaanche So Phal Paahi.
Astuti Kehi Vidhi Karain Tumhaari, Kshamahu Nath Ab Chook Hamaari.

Shankar Ho Sankat Ke Nashan, Mangal Kaaran Vighna Vinaashan.
Yogi Yati Muni Dhyaan Lagaavain, Sharad Narad Shish Navaavain.

Namo Namo Jay Namah Shivaya, Sur Brahmaadik Paar Na Paai.
Jo Yeh Paath Kare Man Laai, Ta Par Hot Hai Shambhu Sahaai.

Riniyaan Jo Koi Ho Adhikaari, Paath Kare So Paavan Haari.
Putr Heen Kar Ichha Joi, Nishchay Shiv Prasad Tehi Hoi.

Pandit Trayodashi Ko Laave, Dhyaan Poorvak Hom Karaave.
Trayodashi Vrat Karai Hamesha, Taake Tan Nahin Rahai Kalesha.

Dhoop Deep Naivedya Chadhaave, Shankar Sammukh Paath Sunaave.
Janam Janam Ke Paap Nasaave, Ant Dhaam Shivapur Mein Paave.

Kahain Ayodhya Das Aas Tumhaari, Jaani Sakal Dukh Harahu Hamaari.

|| Doha ||

Nitt Nem Kar Praatah Hi, Paath Karau Chalisa.
Tum Meri Manokamana, Purn Karo Jagadish.

Magasar Chhati Hemant Ritu, Samvat Chausath Jaan.
Astuti Chalisa Shivahi, Purn Kin Kalyan.

शिव चालीसा क्या है ?

भगवान शिव अपने भक्तों से एक लोटा जल चढ़ाने मात्र से ही बहुत प्रसन्न हो जाते है| सभी देवों में से महादेव ही एकमात्र ऐसे जो अपने भक्तो के बहुत ही जल्दी प्रसन्न हो जाते है| महादेव अपनी सरल प्रकृति के साथ ही अपने रौद्र रूप के लिए भी जाने जाते है| भगवान शिव का व्यवहार अत्यंत ही भोला है| इसलिए उन्हें भोले नाथ के नाम से भी जाना जाता है|

भगवान महादेव को प्रसन्न करने के लिए ही शिव चालीसा का निर्माण किया गया था| जो भी व्यक्ति सच्चे मन से इस शिव चालीसा (Shiv Chalisa Lyrics in Hindi) प्रत्येक को सोमवार के दिन पढता है| भगवान शिव के द्वारा उसे मनचाहे फल की प्राप्ति होती है|

Shiv Chalisa Lyrics in Hindi

वेदों के अनुसार शिव चालीसा का पाठ अधिकतर तब किया जाता है| जब किसी भक्त पर कोई परेशानी या संकट आया हो| शिव चालीसा ही एक मात्र ऐसा उपाय है जिसकी सहायता से भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है और भक्तों के सभी दुःख – दर्द दूर हो जाते है| हिन्दू धर्म में भगवान शिव के भक्तों के लिए शिव चालीसा (Shiv Chalisa Lyrics in Hindi) का बहुत ही बड़ा महत्व माना गया है|

शिव चालीसा में महर्षि वेद व्यास जी के द्वारा लिखे आसान शब्दों की सहायता से भगवान शिव को बहुत ही जल्दी प्रसन्न किया जा सकता है| शिव चालीसा से कठिन से कठिन कार्यों को भी किया जा सकता है| शिव चालीसा में उपस्थित चालीस पंक्तियों के भीतर भगवान शिव की महिमा का बखान किया गया है|

भगवान शिव जितने ही स्वभाव के अच्छे है| उतना ही उनका क्रोध भी भयानक है| हनुमान जी को भगवान शंकर के ही 11 वे रूद्र अवतार में जाना जाता है| हनुमान चालीसा के बारे में भी यदि आप कुछ जानना चाहते है तो हमारी वेबसाइट 99Pandit पर जाकर देख सकते है|

भगवान शिव के बारे में विवरण

सनातन धर्म में  भगवान शिव अनेकों नामों से जाना जाता है| जैसे – शंकर भगवान, महादेव, आदिनाथ, भोलेनाथ, आदि ऐसे ही कई नामो से जाना जाता है| एक ब्रह्माण्ड में जिस तरह से ब्रह्मा जी को इस सृष्टि का रचनाकार, विष्णु भगवान को पालनकर्ता|

उसी प्रकार ही भगवान शिव को इस सृष्टि के संहारक के रूप में भी जाना जाता है| हमारे महादेव का रहन – सहन और उनकी वेशभूषा बिल्कुल ही अलग है| महादेव का यही रूप इनके भक्तों को बहुत ही भाता है| आज हम आपको कैलाश पर्वत के अधिपति भगवान शंकर व उनके जीवन से जुड़ी हुई कई सारी बातों के बारे में जानेंगे|

इस धरती पर सबसे पहले भगवान शंकर ने ही जीवन के प्रचार और प्रसार के लिए कोशिश की थी| इसके भोलेनाथ तो आदिनाथ के नाम से भी जाना जाता है| भगवान शिव के अनेकों शस्त्र है| जैसे – धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु तथा सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है जो की महादेव के द्वारा ही बनाए गए है|

इसके अलावा भगवान शिव के गले में जो नाग लिपटा हुआ रहता है उनका नाम वासुकी है जो कि शेषनाग के छोटे भाई है| भगवान शिव की पहले पत्नी सती माँ ने ही पार्वती जी के रूप में दोबारा जन्म लिया था| उन्हें उमा, उर्मि कहा जाता है| माता पार्वती और भगवान शिव के कुल 6 पुत्र है| जिनके नाम – गणेश जी, कार्तिकेय जी, सुकेश, जलंधर, अयप्पा और भूमा है|

भगवान शिव के बहुत सारे गण है जिनमे से सबसे प्रमुख भैरव, वीरभद्र, चंदिस, श्रृंगी, नंदी, भृगिरिटी, घंटाकर्ण, जय और अजय है| और इन सबके अलावा पिशाच, राक्षस, नाग – नागिन और पशु और पक्षियों को भी भगवान शिव का ही गण माना गया है|

शिव चालीसा पाठ करने का नियम

भगवान शिव एकमात्र ऐसे देवता है जो अपने भक्तों से बहुत ही जल्दी प्रसन्न हो जाते है| महादेव के कई सारे भक्त उनकी पूजा करते है और शिव चालीसा का पाठ करते है| लेकिन उन लोगों को इसका पूर्ण रूप से लाभ नहीं मिल पाता है| इसके कई कारण हो सकते है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारण यह है कि कही ना कही हम लोगों से शिव चालीसा (Shiv Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करने के जो नियम है, उनमे चूक हो जाती है|

शिव चालीसा

बहुत से लोग है जिनको शिव चालीसा पाठ के नियमों के बारे कुछ भी पता नहीं है| यदि आपको शिव चालीसा पाठ का सम्पूर्ण लाभ चाहिए तो आपको शिव चालीसा (Shiv Chalisa Lyrics in Hindi) से सम्बंधित नियम और विधि के बारे में ज्ञान होना आवश्यक है| तो आइये जानते है कि वह क्या नियम और विधि है जिनका हमे शिव चालीसा पढ़ते समय ध्यान रखना होता है|

महत्वपूर्ण नियम –

  • भगवान शिव की इस पवित्र शिव चालीसा का पाठ करने के लिए हिन्दू धर्म में ब्रह्म मुहूर्त बताया गया| इसलिए हो सके तो शिव चालीसा का पाठ ब्रह्म मुहूर्त में किया जाना चाहिए|  
  • सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ़ वस्त्रों को धारण करना चाहिए| भगवान शिव को हल्के रंग के काफी ज्यादा पसंद है तो इस दिन गहरे रंग की अपेक्षा हल्के रंग के कपड़े ही धारण करे| 
  • भगवान की वंदना या चालीसा पढ़ते समय फिर चाहे वो किसी भी भगवान की हो, हमेशा साफ़ सुथरा आसन बिछाकर ही करे| जमीन पर बैठकर शिव चालीसा नही पढनी चाहिए|
  • भगवान शिव को चढाने के लिए बतासे या मिश्री का उपयोग अधिकतर किया जाता है| आप पत्थर वाली मिश्री का भी उपयोग कर सकते है लेकिन उसमें अशुद्धता नहीं होनी चाहिए| इसके अलावा आपको बता दे कि भगवान को सफ़ेद चीनी का भोग लगाना वर्जित है| 
  • जब आप शिव चालीसा का पाठ करने वाले उससे पहले भगवान शिव के समीप एक गाय के घी का दीपक जरूर जलाये| उसके पश्चात एक लोटे में जल भरकर भगवान के सामने रख दीजिये| 
  • इसके पश्चात अपने हाथ में थोड़े अक्षत (चावल),  फूल और जल लेकर स्वयं का नाम और अपने गौत्र का नाम बोलकर संकल्प लेवे| आपने अपनी श्रद्धा के अनुसार कितने भी दिन का संकल्प ले सकते है| 
  • अब आप सबसे पहले गणेश जी को नमन कीजिये| उसके बाद में यदि आपके पास शिवलिंग है तो उस शिवलिंग का जल से अभिषेक करें 
  • पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि शिव चालीसा का पाठ विषम संख्या के रूप में भी किया जाता है| जैसे – 3,5,11 | कम से कम 3 बार तो शिव चालीसा का पाठ करना सर्वोत्तम माना गया है|

शिव चालीसा पाठ के लाभ  

  • इस शिव चालीसा का प्रतिदिन नियमित रूप से पाठ करने से व्यक्ति के मन में साहस बहुत ही अधिक बढ़ता है और शक्ति का संचार होता है| जिसकी सहायता से वह हर प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है| 
  • यदि आप किसी इसे रोग से पीड़ित है, जिसका उपचार काफी समय से नहीं हो पा रहा है| तो उस व्यक्ति जल्द से जल्द ही भगवान शिव की उपसना करना शुरू कर देना चाहिए| सनातन धर्म में इस बात का उल्लेख है कि शिव चालीसा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए सबसे अच्छा विकल्प माना गया है| 
  • शिव चालीसा का पाठ करने मात्र से ही व्यक्ति के सभी दुख व दर्द दूर होने लगते है| 
  • यदि आप के जीवन में धन सम्बंधित समस्या चल रही है तो शिव चालीसा का नियमित रूप से पाठ करने से धीरे – धीरे आपकी आर्थिक संबंधी समस्या दूर होने लगेगी|
  • मान्यता के अनुसार शिव चालीसा का विधिवत रूप से पाठ करने से मनचाहे जीवन साथी की भी प्राप्ति होती है|  

निष्कर्ष

किसी भी तरह की पूजा करने के लिए हमें बहुत सारी तैयारियां करनी होती है| गावों में पूजा आसानी से हो जाती है लेकिन शहरों में लोगों के पास समय की कमी होती है| जिस वजह से वह लोग पूजा नहीं करवा पाते है तो उनकी इस समस्या का समाधान हम लेकर आये है 99Pandit के साथ|

यह सबसे बेहतरीन प्लेटफार्म है जिससे आप किसी पूजा के लिए ऑनलाइन पंडित जी को बुक कर सकते है| इसके अलावा वर्तमान में ऐसे बहुत से लोग जिन्हें अपने ग्रंथो के बारे में कुछ भी नहीं पता है, यदि आप हनुमान चालीसा  या श्री रामचरितमानस के बारे में जानकारी लेनी हो या किसी पूजा के लिए पंडित जी की तलाश कर रहे है तो हम आपको आज एक ऐसी वेबसाइट के बारे में बताने जा रहे है|

जिसकी सहायता से आप घर बैठे ही किसी भी जगह से आपकी पूजा के उपयुक्त और अनुभवी पंडित जी को खोज सकते है| आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर जाकर सभी तरह की पूजा या त्योहारों के बारे में सम्पूर्ण जानकारी ले सकते है| 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.शिव चालीसा का पाठ कैसे किया जाता है ?

A.सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ़ वस्त्रों को धारण करना चाहिए| भगवान शिव को हल्के रंग के काफी ज्यादा पसंद है तो इस दिन गहरे रंग की अपेक्षा हल्के रंग के कपड़े ही धारण करे| भगवान की वंदना या चालीसा पढ़ते समय फिर चाहे वो किसी भी भगवान की हो, हमेशा साफ़ सुथरा आसन बिछाकर ही करे|

Q.शिव चालीसा का पाठ कब करना चाहिए ?

A.सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ़ वस्त्रों को धारण करना चाहिए इसके पश्चात ही शिव चालीसा का पाठ करना चाहिए|

Q.शिव चालीसा पढ़ने से क्या लाभ है ? 

A.इस शिव चालीसा का प्रतिदिन नियमित रूप से पाठ करने से व्यक्ति के मन में साहस बहुत ही अधिक बढ़ता है और शक्ति का संचार होता है| जिसकी सहायता से वह हर प्रकार के भय से मुक्त हो जाता है|

Q.भोलेनाथ (भगवान शिव) को सर्वाधिक प्रिय क्या है ?

A.हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार भगवान शिव को बेलपत्र बहुत अधिक प्रिय है| यदि भगवान शिव को बेलपत्र चढ़ाया जाए तो भगवान शिव इससे बहुत ही प्रसन्न होते है और अपने भक्तों की सभी मनोकामनाए पूर्ण करते है|


Om Sarve Bhavantu Sukhinah – In Sanskrit with Meaning

‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ (Sarve Bhavantu Sukhinah) एक बहुत ही लोकप्रिय संस्कृत श्लोक है। परंतु इस मंत्र की उत्पत्ति कहि इतिहास में खो गई है। इसका उल्लेख आध्यात्मिकता और कल्याण के सन्दर्भ में किया जाता है। प्राचीन संस्कृत मंत्र, ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः, सार्वभौमिक सुख, शांति और कल्याण के लिए एक गहन प्रार्थना है।

इस श्लोक की उत्पत्ति प्राचीन वैदिक ग्रंथों से हुई है और यह भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं, विशेषकर सनातन धर्म (हिंदू धर्म) में गहराई से अंतर्निहित है। यह श्लोक केवल शब्दों का समूह नहीं है, बल्कि सार्वभौमिक प्रेम, करुणा और सामूहिक कल्याण की गहन अभिव्यक्ति है।

Sarve Bhavantu Sukhinah

योग अभ्यासी इस शांति मंत्र का उपयोग जीवन की व्यापक समझ प्राप्त करने की दिशा में मन को प्रभावी ढंग से निर्देशित करने के लिए करते हैं। आज 99Pandit के साथ हम जानेंगे ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ (Sarve Bhavantu Sukhinah) श्लोक के बारे में। आइए इस प्राचीन योग मंत्र और इसके अर्थ के बारे में जानें।

इसके अलावा अगर आप अपने घर, मंदिर, और ऑफिस में किसी भी प्रकार की पूजा करवाने की इच्छा रखते हैं और कुशल पंडित की तलाश कर रहे हैं, तो 99Pandit सबसे अच्छा विकल्प है। 99Pandit की सहायता से आप अपने घर पर ही पंडित को बुला कर पूजा करा सकते हैं।

ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः मंत्र क्या है? What is Om Sarve Bhavantu Sukhinah Mantra?

‘ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः’ श्लोक संस्कृत में एक गहन शांति मंत्र है जिसका उद्देश्य सभी व्यक्तियों के लिए शांति, सद्भाव और इष्टतम कल्याण को बढ़ावा देना है। इस मंत्र का उपयोग योग अभ्यास के दौरान शांत शांति और समग्र कल्याण की स्थिति विकसित करने के लिए किया जाता है।

वैदिक शास्त्रों के ज्ञान में निहित, यह मंत्र निःस्वार्थ प्रेम और करुणा का सार प्रस्तुत करता है। यह धार्मिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे है, सभी प्राणियों के लिए सद्भाव और सामूहिक कल्याण की वकालत करता है।

ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः श्लोक को अक्सर सर्वे भवन्तु सुखिनः शांति मंत्र के रूप में जाना जाता है। हालाँकि मंत्र के मूल घटक ज्यादातर अपरिवर्तित रहते हैं, लेकिन इसे बोलने और लिप्यंतरित करने के तरीके में अंतर हो सकता है।

इसके अलावा, इस मंत्र के लिए वैकल्पिक पदनामों में सार्वभौमिक शांति प्रार्थना या शांति पाठ शामिल हो सकते हैं। इस श्लोक की अर्थपूर्ण व्याख्या अपरिवर्तित रहती है।

Om Sarve Bhavantu Sukhinah Mantra in Sanskrit with Meaning

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

Transliteration:
oṃ sarve bhavantu sukhinaḥ
sarve santu nirāmayāḥ
sarve bhadrāṇi paśyantu mā kaścidduḥ khabhāgbhaveta।
oṃ śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ॥

हिंदी अनुवाद:
सभी सुखी होवें,
सभी रोगमुक्त रहें,
सभी मंगलमय घटनाओं के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े।
ॐ शांति शांति शांति॥

English Translation:
May all sentient beings be at peace,
may no one suffer from illness,
May all see what is auspicious, and may no one suffer.
Om, peace, peace, peace.

सर्वे भवन्तु सुखिनः मंत्र का आध्यात्मिक महत्व – Spiritual Significance of Sarve Bhavantu Sukhinah Mantra

‘ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः’ प्रार्थना केवल एक वर्ग के लिए नहीं बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए है। यह सनातन धर्म के मूल सिद्धांतों (सनातन धार्मिकता) और वसुधैव कुटुंबकम (दुनिया एक परिवार है) के दर्शन की अभिव्यक्ति है।

दार्शनिक और आध्यात्मिक समझ यह मंत्र व्यक्तिगत लाभ के विपरीत सभी की भलाई पर प्रकाश डालता है। यह हमें याद दिलाता है कि खुशी दूसरों को खुश करने और दर्द से मुक्त करने में है।

Sarve Bhavantu Sukhinah

यह विचार बौद्ध, जैन और अन्य आध्यात्मिक दर्शनों के अनुरूप है जो करुणा, निस्वार्थता और दूसरों की सेवा पर जोर देते हैं।

प्रार्थना सेवा, या निःस्वार्थ सेवा के मूल योग दर्शन से भी जुड़ी हुई है। इन शब्दों को कहने और जीने से, वक्ता सभी प्राणियों के बीच करुणा, प्रेम और परस्पर जुड़ाव की भावना विकसित करता है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः मंत्र के लाभ – Benefits of Sarve Bhavantu Sukhinah Mantra

ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः श्लोक का उच्चारण करने वाले और इसे सुनने वाले व्यक्ति दोनों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए कई लाभ हैं। इस मधुर योग मंत्र को अपने ध्यान अभ्यास में शामिल करके, आप निम्नलिखित जैसे कई लाभों का अनुभव कर सकते हैं:

  1. मानसिक शांति को बढ़ावा देता है

‘ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का नियमित जप तनाव और चिंता को कम करने में मदद करता है, शांत और संतुलित दिमाग को बढ़ावा देता है।

  1. सहानुभूति जगाता है

इस मंत्र के जप से हमारे अंदर प्रेम और करुणा का जो सहज भंडार है, उसे जागृत करने में सहायता मिलती है।

  1. सकारात्मक ऊर्जा को प्रोत्साहित करता है

‘ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः’ मंत्र का कंपन सकारात्मकता को बढ़ाता है, जिससे सौहार्दपूर्ण वातावरण बनता है।

  1. आशावाद को बढ़ावा देता है

यह मंत्र शांति, आशावाद और आनंद के लिए हमारी इच्छा को मजबूत करने में अद्भुत है।

  1. भावनात्मक कल्याण को बढ़ाता है

सार्वभौमिक खुशी पर ध्यान केंद्रित करने से, व्यक्तियों में आंतरिक शांति और संतुष्टि की भावना विकसित होती है।

  1. लोभ और ईर्ष्या को समाप्त करता है

‘ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः’ मंत्र लालच और ईर्ष्या जैसे नकारात्मक विचारों को दबाने में सहायता करता है।

  1. समग्र स्वास्थ्य में सुधार

इस मंत्र का शांत प्रभाव रक्तचाप को कम करने और समग्र स्वास्थ्य को बढ़ावा देने में सहायता करता है।

  1. आध्यात्मिक विकास को बढ़ावा देता है

‘ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः मंत्र का जाप व्यक्तियों को उच्च चेतना के साथ जोड़ता है, जिससे उनका आध्यात्मिक संबंध गहरा होता है।

  1. सामाजिक सद्भाव को मजबूत करता है

सामूहिक भलाई को प्रोत्साहित करने से पारस्परिक संबंध और सामाजिक एकता मजबूत होती है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः श्लोक का इतिहास – History of Sarve Bhavantu Sukhinah Shloka

सर्वे भवन्तु सुखिनः श्लोक का व्यापक रूप से आध्यात्मिकता, धर्म, सार्वभौमिकता और कल्याण के संदर्भ में उल्लेख किया जाता है क्योंकि यह सभी के कल्याण की अवधारणा को खूबसूरती से चित्रित करता है।

हालाँकि, यह उल्लेखनीय है कि इस अंश की उत्पत्ति का सटीक उल्लेख करने वाले पाठ्य संदर्भों की कमी है।

कई ऑनलाइन साइटों और यहाँ तक कि कई अकादमिक लेखों में पाया जाने वाला एकमात्र उद्धरण इस कविता को बृहदारण्यक उपनिषद (1.4.14) से जोड़ता है।

यह दावा पूरी तरह से गलत है, क्योंकि उल्लिखित उपनिषद में किसी भी तरह से यह अंश शामिल नहीं है।

इस प्रसिद्ध श्लोक की उत्पत्ति कहां से हुई?

यह पंक्ति गरुड़ पुराण (2.35.51) और भविष्य पुराण (3.2.35.14) के अंतिम श्लोक में थोड़े बदले हुए रूप में पाई जा सकती है।

यहाँ, प्रारंभिक पंक्ति अपने पारंपरिक उपयोग और समझ से अलग है। हालाँकि, सार लगभग वही रहता है। गरुड़ पुराण में पाई जाने वाली कविता इस प्रकार है:

“सर्वेषां मङ्गलं भूयात् सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग् भवेत्।।”

अर्थ: सब अच्छे हों और सभी स्वस्थ रहें।
सब अच्छे रहें और किसी को कोई कष्ट न हो।

ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः का दैनिक जीवन में उपयोग

आज की भाग-दौड़ भरी और आत्म-केंद्रित दुनिया में, ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः के सार को अपनाना जीवन बदलने वाला हो सकता है। इस मंत्र को दैनिक जीवन में लागू करने के कुछ तरीके निम्नलिखित हैं:

1. माइंडफुलनेस और मेडिटेशन

सुबह और शाम के ध्यान के दौरान ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः मंत्र का जाप करने से आंतरिक शांति और सार्वभौमिक करुणा की भावना पैदा हो सकती है।

2. दयालुता के कार्य

छोटे कार्य, जैसे पड़ोसी की सहायता करना, गरीबों को खाना खिलाना, या एक दयालु शब्द साझा करना, सकारात्मकता और कल्याण का प्रभाव पैदा कर सकता है।

3. सामुदायिक सेवा

स्वयंसेवा और सामाजिक गतिविधियाँ सामूहिक खुशी और पारस्परिक विकास की भावना को बढ़ावा देती हैं।

4. क्षमा और कृतज्ञता

दूसरों को क्षमा करना और जीवन के आशीर्वाद के लिए आभारी होना भावनात्मक और आध्यात्मिक कल्याण में सुधार करता है।

5. सतत जीवन

ग्रह की देखभाल करना, व्यवसाय में जिम्मेदार होना और समाज के साथ सद्भाव को बढ़ावा देना मंत्र के लोकाचार के साथ गूंजता है।

सर्वे भवन्तु सुखिनः श्लोक का पाठ क्यों करें? Why recite Sarve Bhavantu Sukhinah verse?

अगर कोई इस मंत्र का अर्थ पूरी तरह समझे बिना भी इसका जाप करता है, तो भी उसे कुछ लाभ अवश्य मिलेंगे। ब्रह्मांड को यह संदेश व्यक्त करने मात्र से ही ऊर्जा का प्रसार होता है।

फिर भी, इन शब्दों के अंतर्निहित महत्व की अधिक गहन समझ प्राप्त करना इस उत्तम प्रार्थना के व्यापक लाभ प्राप्त करने के लिए महत्वपूर्ण है।

हालाँकि इस प्रार्थना की उत्पत्ति हिंदू परंपरा में हुई है, लेकिन इन शब्दों के उच्चारण से उत्पन्न ऊर्जा निश्चित रूप से सभी व्यक्तियों के लिए सुलभ है, चाहे उनकी धार्मिक संबद्धता, विश्वास या सांस्कृतिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। इन मंत्रों को अपनी दिनचर्या में शामिल करने के लिए किसी धार्मिक मान्यता का पालन करना आवश्यक नहीं है।

Sarve Bhavantu Sukhinah

यह प्रार्थना सभी लोगों या चीज़ों पर लागू होती है। यह परोपकार और सहानुभूति के साथ-साथ मन, शरीर और आत्मा की शांति और स्थिरता को बढ़ावा देती है।

हम सभी प्राणियों के लिए सार्वभौमिक कल्याण और आनंद चाहते हैं, जिसमें संपूर्ण ब्रह्मांड की हर चीज़ शामिल है।

हम खुद को इस सामूहिक समग्रता के एक अभिन्न अंग के रूप में पहचानते हैं। इस प्रकार, जब आप चाहते हैं कि यह ऊर्जा सभी को और हर चीज़ को मिले, तो आप इसे अपने लिए चाहते हैं, क्योंकि आप सामूहिक समग्रता के एक अभिन्न अंग हैं।

निष्कर्ष

‘ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः’ एक सार्वभौमिक प्रार्थना है. यह दया और करुणा के साथ-साथ मन, शरीर और आत्मा की शांति को बढ़ावा देता है।

हम सभी प्राणियों और वास्तव में, पूरे ब्रह्मांड में मौजूद हर चीज के लिए भलाई और खुशी की मांग कर रहे हैं… संपूर्ण समूह के रूप में सभी चीजें, जिनका हम हिस्सा और संपूर्ण हैं।

इसलिए जब आप इस ऊर्जा की कामना हर किसी और सभी के लिए करते हैं, तो आप इसे अपने लिए भी चाह रहे होते हैं क्योंकि आप हर किसी और सभी का हिस्सा हैं!

ओम सर्वे भवन्तु सुखिनः केवल एक प्रार्थना से कहीं अधिक है; यह जीवन का एक तरीका है। अक्सर मतभेदों से विभाजित दुनिया में, यह मंत्र एक अनुस्मारक के रूप में कार्य करता है कि खुशी और कल्याण एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

इसके सार को अपनाकर, व्यक्ति और समुदाय शांति, करुणा और सद्भाव की दुनिया को बढ़ावा दे सकते हैं।

हमें आशा है कि आपका आज का आर्टिकल पसंद आएगा। ऐसे ही ब्लॉग, कहानियां, और पूजा-पाठ से संबंधित जानकारी प्राप्त करने के लिए जुड़े रहिए 99Pandit के साथ।

आइए हम सभी इस पवित्र प्रार्थना के अनुसार जीने का प्रयास करें और एक बेहतर, अधिक समावेशी दुनिया में योगदान दें।

Karmanye Vadhikaraste ma Phaleshu Kadachana Shloka in Sanskrit Meaning

Karmanye Vadhikaraste ma Phaleshu Kadachana: Srimad Bhagavad Gita is one of the most sacred texts of Hindu philosophy, filled with timeless wisdom that guides us on how to live a meaningful and fulfilling life.

One of the most significant verses is “Karmanye Vadhikaraste Ma Phaleshu Kadachana.” It’s about selfless action and the attitude of nonattachment to the fruits of action.

Chapter 2, Verse 47, advises people to engage themselves in duties seriously without expecting fruits.

Karmanye Vadhikaraste ma Phaleshu Kadachana

While man has a role in performing, he doesn’t have any say in the outcome. This philosophy, if embraced, can lead to a life of peace, perseverance, and true success.

The Srimad Bhagavad Gita has 18 chapters and 700 verses. Its original language is Sanskrit. The Gita is one of the Upanishads, which is why it is also known as the Geetopanishad.

It is an important spiritual text because it establishes a person’s right to ask questions about everything.

All the verses of the Shrimad Bhagwad Gita inspire us to live human lives in the truest sense.

Today, with 99Pandit, let us try to understand the meaning of some popular verses of the Bhagavad gita, such as ‘Karmanye Vadhikaraste Ma Phaleshu Kadachana’ in Sanskrit.

Meaning of Karmanye Vadhikaraste Ma Phaleshu Kadachana

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥

Meaning –

In this verse, Lord Krishna is telling Arjun that you have the right only to do your work, not on the fruit of your work.

Therefore, no work should be done for the fruit. Therefore, you should not worry about the fruit of your work and do not get attached to inaction.

This is the 47th verse of the Bhagavad Gita Chapter 2. It is a very famous verse, and most students in Indian schools are familiar with it.

It gives insight into doing work without any selfish motive and is often mentioned when discussing Karma Yoga.

This verse gives four teachings about Karma Yoga:

  1. Perform your duty but do not worry about its results.
  2. The results of your actions are not for your happiness, i.e., you are not the enjoyer of the fruits of your actions.
  3. Do not have any ego even while performing your duty.
  4. Do not be attached to inaction.

Philosophical Significance of Karmanye Vadhikaraste Ma Phaleshu Kadachana Shlok

This verse personifies Karma Yoga, the path of selfless action. Here are a few key takeaways:

1. Focus on Effort, Not Outcomes

We care about the outcome of life, be it success or failure, reward or recognition. This verse reminds us that though we can control effort, outcomes are often out of our control, being determined by many other external factors. Detachment from results reduces anxiety and disappointment.

2. Work Without Expectation

When we act with expectations, we either become too elated by success or too dejected by failure.

Karmanye Vadhikaraste ma Phaleshu Kadachana

Krishna advises Arjuna (and all of us) to work with sincerity and dedication without being obsessed with the rewards. This brings peace and stability.

3. Avoid Laziness and Inaction

The verse promotes no carefree attitude or goal-less attitude; instead, it emphasizes executing duties with the highest commitment without demoralizing failures.

4. Practical Application to Modern Life

In Work and Career: Dedicate your very best at your job without bothering yourself with promotions or salary hikes. Results will automatically result.

In Studying: Succeed in Studies rather than a grade chaser. Knowledge shall be the core of success in the long term.

Benefits of Chanting Karmanye Vadhikaraste Ma Phaleshu Kadachana Shlok

1. Control Mind

The mind of the person who regularly reads Bhagavad Gita’s Karmanye Vadhikaraste Ma Phaleshu Kadachana Shlok always remains calm. He can control his mind even in difficult situations. He can use his mind as he wants.

2. Freedom from Anger

People who study the Bhagavad Gita’s 47th verse daily are freed from the bondage of lust, anger, greed, attachment, illusion, etc. And the person who gets freedom from all this his life passes happily.

3. Transmitting Positive Energy

The person who recites the Bhagavad Gita daily, all the negative energies start going away from his life. And positive energy starts flowing.

Not only this, but by reading the Gita, the self-confidence of the person increases, and the person becomes courageous and moves forward on the path of his duty.

4. Get Relief from Stress

A person who reads the Gita gets the knowledge of truth and lies, God and living beings.

He understands good and bad. By reading the Bhagavad Gita, a person also gets relief from stress.

Other Shlokas of Bhagavad Gita

Shlok: 1

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात्संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते॥

Meaning: By thinking about material things, a person gets attached to them. This gives rise to desire for them, and anger is born when desires are obstructed.

Therefore, try to stay away from attachment to anything and remain absorbed in work. Children start insisting on something as soon as they see it.

Soon, they get angry when they do not get it. This shloka is excellent to avoid such a situation.

Shlok: 2

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌॥

Meaning: Whenever there is a decline in religion and an increase in unrighteousness, then I (Shri Krishna) create myself, i.e., take incarnation for the revival of religion.

Shlok: 3

क्रोधाद्भवति संमोह: संमोहात्स्मृतिविभ्रम:।
स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति॥

Meaning: Anger destroys a person’s intelligence, and when intelligence is destroyed, a person destroys himself. Many children get very angry. This shloka makes them aware of the harm caused by anger.

Karmanye Vadhikaraste ma Phaleshu Kadachana

Shlok: 4

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

Meaning: Whatever conduct or work a great man does, other people also behave in the same way or, say, do the same work.

Whatever example or proof a great man presents, the entire human community starts following that. This shloka tells the benefits of good conduct, which is very useful for children.

Shlok: 5

श्रद्धावान्ल्लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय:।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति॥

Meaning: People who have faith and control over their senses acquire knowledge with readiness, and then, after attaining knowledge, they soon attain supreme peace.

This shloka is very good for children studying. It inspires them to concentrate and focus on their goals.

Shlok: 6

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः॥

Meaning: Neither weapons can cut the soul, nor fire can burn it. Neither water can wet it, nor wind can dry it. (Here, Lord Shri Krishna has talked about the soul being immortal and eternal).

Shlok: 7

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥

Meaning: If you (Arjuna) attain martyrdom in battle, you will attain heaven, and if you are victorious, you will enjoy the happiness of the earth. Therefore arise, O Kaunteya (Arjuna), fights with determination.

(Here, Lord Krishna has discussed the consequences of the present action, meaning that there is nothing better than the present action).

Conclusion

Srimad Bhagavad Gita is considered to be a special book among the Hindu religious texts. It is not just the book, but it is a sermon given thousands of years ago that teaches man the art of living today.

In Srimad Bhagavad Gita, the verse Karmanye Vadhikaraste Ma Phaleshu Kadachana is one of the important Shlok. In this Shlok, Lord Krishna taught Arjuna a lesson.

He told Arjuna, ‘You have the right to perform your prescribed duties, but you are not entitled to receive the fruits of your actions.

Do not consider yourself the cause of the fruits of your actions, and do not have any attachment to remaining inactive.’

In the Gita, Lord Krishna only inspires us to do Karma. He told Arjuna valuable things.

The knowledge given by Lord Shri Krishna to Arjun is considered to be the best knowledge, which is also called Gita knowledge. Shrimad Bhagwat Gita is a collection of valuable things told by Shri Krishna.

Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi: विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र हिंदी में

विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi) भगवान विष्णु का सबसे शक्तिशाली तथा प्रभावशाली मंत्र माना जाता है|

विष्णु सहस्त्रनाम में भगवान विष्णु के एक हजार नामों को केवल जाप करने मात्र से ही भक्तों के सभी कष्ट तथा संकट दूर हो जाते है,

जो भी भक्त विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi) का जाप करता है| उसे भगवान विष्णु असीम कृपा प्राप्त होती है|

विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र

इस विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi) का जाप करने के लिए कोई विशेष विधि तथा नियम नहीं है, केवल भगवान विष्णु के प्रति अटूट श्रद्धा के साथ विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi) का जाप सभी संकटों को दूर कर देता है|

भगवान विष्णु की पूजा तथा एकादशी तिथि के दिन विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi) का पाठ करना भक्तों के लिए अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है|

इस स्तोत्र का पाठ करने धन, संपदा एवं ऐश्वर्य की भी प्राप्ति होती है तो आइये जानते है विष्णु सहस्रनाम स्तोत्र (Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi) के बारे में|

इसी के साथ यदि आप शिव तांडव स्तोत्रम [Shiv Tandav Stotram], दुर्गा कवच [Durga Kavach Lyrics], या कनकधारा स्तोत्र [Kanakdhara Stotra] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

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विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र लिरिक्स हिंदी में – Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi

|| विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्र ||

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो भूत-भव्य-भवत-प्रभुः ।
भूत-कृत भूत-भृत भावो भूतात्मा भूतभावनः ।। 1 ।।

पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमं गतिः।
अव्ययः पुरुष साक्षी क्षेत्रज्ञो अक्षर एव च ।। 2 ।।

योगो योग-विदां नेता प्रधान-पुरुषेश्वरः ।
नारसिंह-वपुः श्रीमान केशवः पुरुषोत्तमः ।। 3 ।।

सर्वः शर्वः शिवः स्थाणु: भूतादि: निधि: अव्ययः ।
संभवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभु: ईश्वरः ।। 4 ।।

स्वयंभूः शम्भु: आदित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः ।
अनादि-निधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः ।। 5 ।।

अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभो-अमरप्रभुः ।
विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः ।। 6 ।।

अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः ।
प्रभूतः त्रिककुब-धाम पवित्रं मंगलं परं ।। 7।।

ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः ।
हिरण्य-गर्भो भू-गर्भो माधवो मधुसूदनः ।। 8 ।।

ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः ।
अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृति: आत्मवान ।। 9 ।।

सुरेशः शरणं शर्म विश्व-रेताः प्रजा-भवः ।
अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः ।। 10 ।।

अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादि: अच्युतः ।
वृषाकपि: अमेयात्मा सर्व-योग-विनिःसृतः ।। 11 ।।

वसु:वसुमनाः सत्यः समात्मा संमितः समः ।
अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः ।। 12 ।।

रुद्रो बहु-शिरा बभ्रु: विश्वयोनिः शुचि-श्रवाः ।
अमृतः शाश्वतः स्थाणु: वरारोहो महातपाः ।। 13 ।।

सर्वगः सर्वविद्-भानु:विष्वक-सेनो जनार्दनः ।
वेदो वेदविद-अव्यंगो वेदांगो वेदवित् कविः ।। 14 ।।

लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृता-कृतः ।
चतुरात्मा चतुर्व्यूह:-चतुर्दंष्ट्र:-चतुर्भुजः ।। 15 ।।

भ्राजिष्णु भोजनं भोक्ता सहिष्णु: जगदादिजः ।
अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः ।। 16 ।।

उपेंद्रो वामनः प्रांशु: अमोघः शुचि: ऊर्जितः ।
अतींद्रः संग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः ।। 17 ।।

वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः।
अति-इंद्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः ।। 18 ।।

महाबुद्धि: महा-वीर्यो महा-शक्ति: महा-द्युतिः।
अनिर्देश्य-वपुः श्रीमान अमेयात्मा महाद्रि-धृक ।। 19 ।।

महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः ।
अनिरुद्धः सुरानंदो गोविंदो गोविदां-पतिः ।। 20 ।।

मरीचि:दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः ।
हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः ।। 21 ।।

अमृत्युः सर्व-दृक् सिंहः सन-धाता संधिमान स्थिरः ।
अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा ।। 22 ।।

गुरुःगुरुतमो धामः सत्यः सत्य-पराक्रमः ।
निमिषो-अ-निमिषः स्रग्वी वाचस्पति: उदार-धीः ।। 23 ।।

अग्रणी: ग्रामणीः श्रीमान न्यायो नेता समीरणः ।
सहस्र-मूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात ।। 24 ।।

आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सं-प्रमर्दनः ।
अहः संवर्तको वह्निः अनिलो धरणीधरः ।। 25 ।।

सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृक्-विश्वभुक्-विभुः ।
सत्कर्ता सकृतः साधु: जह्नु:-नारायणो नरः ।। 26 ।।

असंख्येयो-अप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्ट-कृत्-शुचिः ।
सिद्धार्थः सिद्धसंकल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः ।। 27।।

वृषाही वृषभो विष्णु: वृषपर्वा वृषोदरः ।
वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुति-सागरः ।। 28 ।।

सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेंद्रो वसुदो वसुः ।
नैक-रूपो बृहद-रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः ।। 29 ।।

ओज: तेजो-द्युतिधरः प्रकाश-आत्मा प्रतापनः ।
ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मंत्र:चंद्रांशु: भास्कर-द्युतिः ।। 30 ।।

अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिंदुः सुरेश्वरः ।
औषधं जगतः सेतुः सत्य-धर्म-पराक्रमः ।। 31 ।।

भूत-भव्य-भवत्-नाथः पवनः पावनो-अनलः ।
कामहा कामकृत-कांतः कामः कामप्रदः प्रभुः ।। 32 ।।

युगादि-कृत युगावर्तो नैकमायो महाशनः ।
अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजित्-अनंतजित ।। 33 ।।

इष्टो विशिष्टः शिष्टेष्टः शिखंडी नहुषो वृषः ।
क्रोधहा क्रोधकृत कर्ता विश्वबाहु: महीधरः ।। 34 ।।

अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः ।
अपाम निधिरधिष्टानम् अप्रमत्तः प्रतिष्ठितः ।। 35 ।।

स्कन्दः स्कन्द-धरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः ।
वासुदेवो बृहद भानु: आदिदेवः पुरंदरः ।। 36 ।।

अशोक: तारण: तारः शूरः शौरि: जनेश्वर: ।
अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः ।। 37 ।।

पद्मनाभो-अरविंदाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत ।
महर्धि-ऋद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुड़ध्वजः ।। 38 ।।

अतुलः शरभो भीमः समयज्ञो हविर्हरिः ।
सर्वलक्षण लक्षण्यो लक्ष्मीवान समितिंजयः ।। 39 ।।

विक्षरो रोहितो मार्गो हेतु: दामोदरः सहः ।
महीधरो महाभागो वेगवान-अमिताशनः ।। 40 ।।

उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः ।
करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः ।। 41 ।।

व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो-ध्रुवः ।
परर्रद्वि परमस्पष्टः तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः ।। 42 ।।

रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयो-अनयः ।
वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठ: धर्मो धर्मविदुत्तमः ।। 43 ।।

वैकुंठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः ।
हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः ।। 44।।

ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः ।
उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्व-दक्षिणः ।। 45 ।।

विस्तारः स्थावर: स्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम ।
अर्थो अनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः ।। 46 ।।

अनिर्विण्णः स्थविष्ठो-अभूर्धर्म-यूपो महा-मखः ।
नक्षत्रनेमि: नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः ।। 47 ।।

यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः ।
सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमं ।। 48 ।।

सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत ।
मनोहरो जित-क्रोधो वीरबाहुर्विदारणः ।। 49 ।।

स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत ।
वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः ।। 50 ।।

Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi

धर्मगुब धर्मकृद धर्मी सदसत्क्षरं-अक्षरं ।
अविज्ञाता सहस्त्रांशु: विधाता कृतलक्षणः ।। 51 ।।

गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः ।
आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद गुरुः ।। 52 ।।

उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः ।
शरीर भूतभृद्भोक्ता कपींद्रो भूरिदक्षिणः ।। 53 ।।

सोमपो-अमृतपः सोमः पुरुजित पुरुसत्तमः ।
विनयो जयः सत्यसंधो दाशार्हः सात्वतां पतिः ।। 54 ।।

जीवो विनयिता-साक्षी मुकुंदो-अमितविक्रमः ।
अम्भोनिधिरनंतात्मा महोदधिशयो-अंतकः ।। 55 ।।

अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः ।
आनंदो नंदनो नंदः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः ।। 56 ।।

महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः ।
त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाश्रृंगः कृतांतकृत ।। 57 ।।

महावराहो गोविंदः सुषेणः कनकांगदी ।
गुह्यो गंभीरो गहनो गुप्तश्चक्र-गदाधरः ।। 58 ।।

वेधाः स्वांगोऽजितः कृष्णो दृढः संकर्षणो-अच्युतः ।
वरूणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः ।। 59 ।।

भगवान भगहानंदी वनमाली हलायुधः ।
आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णु:-गतिसत्तमः ।। 60 ।।

सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः ।
दिवि:स्पृक् सर्वदृक व्यासो वाचस्पति:अयोनिजः ।। 61 ।।

त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक ।
संन्यासकृत्-छमः शांतो निष्ठा शांतिः परायणम ।। 62 ।।

शुभांगः शांतिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः ।
गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः ।। 63 ।।

अनिवर्ती निवृत्तात्मा संक्षेप्ता क्षेमकृत्-शिवः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतां वरः ।। 64 ।।

श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः ।
श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमान्-लोकत्रयाश्रयः ।। 65 ।।

स्वक्षः स्वंगः शतानंदो नंदिर्ज्योतिर्गणेश्वर: ।
विजितात्मा विधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः ।। 66 ।।

उदीर्णः सर्वत:चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः ।
भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः ।। 67 ।।

अर्चिष्मानर्चितः कुंभो विशुद्धात्मा विशोधनः ।
अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः ।। 68 ।।

कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः ।
त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः ।। 69 ।।

कामदेवः कामपालः कामी कांतः कृतागमः ।
अनिर्देश्यवपुर्विष्णु: वीरोअनंतो धनंजयः ।। 70 ।।

ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृत् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः ।
ब्रह्मविद ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ।। 71 ।।

महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः ।
महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः ।। 72 ।।

स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः ।
पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः ।। 73 ।।

मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः ।
वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः ।। 74 ।।

सद्गतिः सकृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः ।
शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः ।। 75 ।।

भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयो-अनलः ।
दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरो-अथापराजितः ।। 76 ।।

विश्वमूर्तिमहार्मूर्ति:दीप्तमूर्ति: अमूर्तिमान ।
अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः ।। 77 ।।

एको नैकः सवः कः किं यत-तत-पद्मनुत्तमम ।
लोकबंधु: लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः ।। 78 ।।

सुवर्णोवर्णो हेमांगो वरांग: चंदनांगदी ।
वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरऽचलश्चलः ।। 79 ।।

अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक ।
सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः ।। 80 ।।

तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः ।
प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकश्रृंगो गदाग्रजः ।। 81 ।।

चतुर्मूर्ति: चतुर्बाहु:श्चतुर्व्यूह:चतुर्गतिः ।
चतुरात्मा चतुर्भाव:चतुर्वेदविदेकपात ।। 82 ।।

समावर्तो-अनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः ।
दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा ।। 83 ।।

शुभांगो लोकसारंगः सुतंतुस्तंतुवर्धनः ।
इंद्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः ।। 84 ।।

उद्भवः सुंदरः सुंदो रत्ननाभः सुलोचनः ।
अर्को वाजसनः श्रृंगी जयंतः सर्वविज-जयी ।। 85 ।।

सुवर्णबिंदुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः ।
महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधः ।। 86 ।।

कुमुदः कुंदरः कुंदः पर्जन्यः पावनो-अनिलः ।
अमृतांशो-अमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ।। 87 ।।

सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
न्यग्रोधो औदुंबरो-अश्वत्थ:चाणूरांध्रनिषूदनः ।। 88 ।।

सहस्रार्चिः सप्तजिव्हः सप्तैधाः सप्तवाहनः ।
अमूर्तिरनघो-अचिंत्यो भयकृत्-भयनाशनः ।। 89 ।।

अणु:बृहत कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान् ।
अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः ।। 90 ।।

भारभृत्-कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः ।
आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः ।। 91 ।।

धनुर्धरो धनुर्वेदो दंडो दमयिता दमः ।
अपराजितः सर्वसहो नियंता नियमो यमः ।। 92 ।।

सत्त्ववान सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः ।
अभिप्रायः प्रियार्हो-अर्हः प्रियकृत-प्रीतिवर्धनः ।। 93 ।।

विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग विभुः ।
रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः ।। 94 ।।

अनंतो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः ।
अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकधिष्ठानमद्भुतः ।। 95।।

सनात्-सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः ।
स्वस्तिदः स्वस्तिकृत स्वस्ति स्वस्तिभुक स्वस्तिदक्षिणः ।। 96 ।।

अरौद्रः कुंडली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः ।
शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः ।। 97 ।।

अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणां वरः ।
विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।। 98 ।।

उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः ।
वीरहा रक्षणः संतो जीवनः पर्यवस्थितः ।। 99 ।।

अनंतरूपो-अनंतश्री: जितमन्यु: भयापहः ।
चतुरश्रो गंभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः ।। 100 ।।

अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मी: सुवीरो रुचिरांगदः ।
जननो जनजन्मादि: भीमो भीमपराक्रमः ।। 101 ।।

आधारनिलयो-धाता पुष्पहासः प्रजागरः ।
ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः ।। 102 ।।

प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत प्राणजीवनः ।
तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्यु जरातिगः ।। 103 ।।

भूर्भवः स्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः ।
यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञांगो यज्ञवाहनः ।। 104 ।।

यज्ञभृत्-यज्ञकृत्-यज्ञी यज्ञभुक्-यज्ञसाधनः ।
यज्ञान्तकृत-यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च ।। 105 ।।

आत्मयोनिः स्वयंजातो वैखानः सामगायनः ।
देवकीनंदनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः ।। 106 ।।

शंखभृन्नंदकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः ।
रथांगपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः ।। 107 ।।

सर्वप्रहरणायुध ॐ नमः इति।

वनमालि गदी शार्ङ्गी शंखी चक्री च नंदकी ।
श्रीमान् नारायणो विष्णु: वासुदेवोअभिरक्षतु ।

Vishnu Sahasranamam Lyrics in English – ॐ विश्वं विष्णु: वषट्कारो

|| Vishnu Sahasranamam Lyrics ||

Om namo bhagavate vasudevaya nam

Om Vishvam Vishnu: vashtkaro bhoot-bhavya-bhavat-prabhuh।
Bhoot-krit bhoot-bhrit bhaavo bhootaatmaa bhoot-bhavannah।। 1 ।।

Pootaatmaa paramaatmaa ch muktaanaam paramam gatih।
Avyay Purush Sakshi Kshetrajno Akshar ev ch।। 2 ।।

Yogo yog-vidaam netaa pradhan-purusheshwarah।
Narasinh-vapuh shreeman keshavah purushottamah।। 3 ।।

Sarvah sharvah shivah sthaanuh bhootaadih nidhih avyayah।
Sambhavo Bhaavano Bharata Prabhavah Prabhuh ishwarah।। 4 ।।

Swayambhoo shambo aadityah pushkaraaksho mahaasvanah।
Anaadi-nidhano dhaataa vidhaataa dhaturuttamah।। 5 ।।

Aprameyo Hrisheekeshah padmanaabho-amaraprabhuh।
Vishvakarmaa manustvashthaa sthavishtah sthaviro dhruvah।। 6 ।।

Agrahyah shaashvatah krishno lohitakshah pratardanah।
Prabhootah trikakub-dhaam pavitram mangalam param।। 7।।

Eeshanah praanadah praanah jyeshthah shreshthah prajaapatih।
Hiranyagarbho bhoogarbho maadhavo madhusoodanah।। 8 ।।

Eeshvaro vikramee dhanvee medhaavee vikramah kramah।
Anuttamo duraadharshah kritajnah kritih aatmavaan।। 9 ।।

Sureshah sharanam sharm vishva-retaa praja-bhavah।
Ahah samvatsaro vyaalah pratyayah sarvadarshanah।। 10 ।।

Ajah sarveshvarah siddhah siddhih sarvaadih achyutah।
Vrishakapih ameyaatmaa sarva-yog-vinahsrutah।। 11 ।।

Vasu: vasumanaah satyah samaatmaa sammitah samah।
Amoghah pundareekaaksho vrishakarmaa vrishaakritih।। 12 ।।

Rudro bahu-shiraa babhruh vishvayonih shuchi-shravaah।
Amritah shaashvatah sthaanuh varaaroho mahaatapaah।। 13 ।।

Sarvagah sarvavid-bhaanuh vishvak-seno janaardanah।
Vedo vedavid-avyangah vedaang vedavit kavih।। 14 ।।

Lokaadhyakshah suraadhyaaksho dharmadhyaakshah kruta-krutah।
Chaturaatmaa chaturvyooh-chaturdamshtrah chaturbhujah।। 15 ।।

Bhraajishnu bhojanam bhoktaa sahishnuh jagadaadijah।
Anagho vijayo jetaa vishvayonih punarvasuh।। 16 ।।

Upendro vaamanah praanshuh amoghah shuchi: oorjitah।
Ateendrah samgrahah sargo dhrutaatmaa niyamo yamah।। 17 ।।

Vedyo vaidyah sadaayogee veerahaa maadhavo madhuh।
Ati-indriyo mahaamaayo mahotsaaho mahaabalah।। 18 ।।

Mahaabuddhih mahaaveeryo mahaashaktih mahaadyutih।
Anirdeshy-vapuh shreemaan ameyaathmaa mahaadri-dhrik।। 19 ।।

Maheshvaaso mahii-bhartaa shreenivaasah sataam gatih।
Aniruddhah suraanandoh govindoh govindaam-patih।। 20 ।।

Marichidamano hamsah suparno bhujagottamah।
Hiranyanaabhah sutapaah padmanaabhah prajaapatih।। 21 ।।

Amrityuh sarva-drik-singhah san-dhaataa sandhimaan sthirah।
Ajo durmarshanah shaastaa vishrutaatmaa suraarihah।। 22 ।।

Guruh-gurutamo dhaamah satyah satya-paraakramah।
Nimisho-animishah sragvee vaachaspati: udaar-dhih।। 23 ।।

Agranih graamanih shreemaan nyaayo netaa samiranah।
Sahasra-moordhaa vishvaatmaa sahasraakshah sahasra-paat।। 24 ।।

Aavartano nivrittatmaa samvritah sam-pramardanah।
Ahah samvartako vahnih anilo dharaneedharah।। 25 ।।

Suprasaadah prasannaatmaa vishvadhrk-vishvabhuk-vibhuh।
Satkartaa sakritah saadhu jahnu-narayanoh narah।। 26 ।।

Asankhyeyo-aprameyaatmaa vishishtah shishta-krit-shuchih।
Siddhaartha: siddhasamkalpah siddhidah siddhi-saadhanah।। 27।।

Vrishaahii vrishabho vishnuh vrishaparvaa vrishodarah।
Vardhano vardhamaanashch viviktah shruti-saagarah।। 28 ।।

Subhujo durdharo vaagmee maheendro vasudo vasuh।
Naik-roopo bruhad-roopah shipivishtah prakaashanah।। 29 ।।

Ojah tejod-yutidharah prakaash-aatmaa prataapanah।
Riddhah spashthaaksharo mantrah chandraamshuh bhaaskar-dyutih।। 30 ।।

Amritaamshoodbhavo bhaanuh shashabinduh sureeshvarah।
Aushadham jagatah setuh satya-dharma-paraakramah।। 31 ।।

Bhoot-bhavya-bhavat-naathah pavanah paavano-analah।
Kaamahaa kaamakrit-kaantah kaamah kaamapradah prabhuh।। 32 ।।

Yugaadi-krit yugaavarto naikamaayo mahaashanah।
Adrisyo vyaktaroopashch sahasrajit-anantajit।। 33 ।।

Ishto vishishtah shishteshtah shikhandee nahusho vrishah।
Krodhahaa krodhakrit karta vishvabaahu: mahidharah।। 34 ।।

Achyutah prathitah praanah praanado vaasavaanujah।
Apaam nidhiradhistaanam apramattah pratishtitah।। 35 ।।

Skandhah skand-dharo dhuryo varado vaayuvaahanah।
Vaasudev bhrad-bhaanuh aadidevah purandarah।। 36 ।।

Ashokah taaranah taarah shoorah shaurih janesvarah।
Anukoolah shataavartah padmee padmanibhekshanah।। 37 ।।

Padmanaabho-aravindaakshah padmagarbhah shareerabhrit।
Mahardhi-riddho vriddhaatmaa mahaaksho garud-dhwajah।। 38 ।।

Atulah sharabho bheemah samayajno havirharih।
Sarva-lakshana lakshanyo lakshmeevaan samitinjayah।। 39 ।।

Viksharo rohitah maargo hetuh daamodarah sahah।
Mahidharo mahaabhaago vegavaan-amitaashanah।। 40 ।।

Udbhav kshobhan dev, Shreegarbh parameshwar.
Karann kaaran karta, vikarta gahano guh.।। 41 ।।

Vyavasayo vyavasthaan, sansthaan sthaanado-dhruv.
Parararvi paramaspasht, tusht pusht shubhekshan.।। 42 ।।

Ram viram virajo, maargo neyo nayo-anay.
Veer shaktimatam Shresht, dharma dharmaviduttam.।। 43 ।।

Vaikunth purush pran, pranadah pranav prithu.
Hiranyagarbh shatrughno, vyaapto vaayuradhokshaj.।। 44 ।।

Ritu sudarshan kaal, Parameshthi parigraha.
Ugrh Samvatsaro Daksho, Vishramo Vishwadakshin.।। 45 ।।

Vistaar sthaavar sthaanu, pramaanam beejavyay.
Arth anarth mahakosh, mahabhogo mahadhan.।। 46 ।।

Anirvinn Sthavishtho-Abhoordharm-Yupo Mahamakh.
Nakshatranemih nakshatri, kshamah kshaamah samiihan।। 47 ।।

Yajn ijyo mahedyashch, kratu satram sataam gati.
Sarvadarshi vimuktaatma, sarvajno gyanuttam।। 48 ।।

Suvratah sumukh sookshm, sughosh sukhad suhrit.
Manoharo jit-krodho, veerbaahurvidaaran।। 49 ।।

Swaapanah swavasho vyaapi, naikaatma naikakarmakrit.
Vatsaro Vatsalo Vatsi, Ratnagarbho dhaneshwar।। 50 ।।

Vishnu Sahasranamam Lyrics in Hindi

Dharmagub dharmakrid dharmi, sadasatksharam-aksharam.
Avignaataa sahastramshuh, vidhaataa kritalakshan।। 51 ।।

Gabastinemih Sattvasthah, Simho bhutamaheshwar.
Aadidevo mahaadevo, devesho devabhrud guru।। 52 ।।

Uttaro gopatirgopta, gyanagamyah puraatan.
Shareer bhutabhridbhoakta, kapindro bhuridakshin।। 53 ।।

Somapo-amritapah somah, purujit purusattam.
Vinayo jayah satyasandho, daasharhah saatvataam patih।। 54 ।।

Jeevo vinayitasakshi, mukundoamitavikram.
Ambhonidhiranantaatma, mahodadhishayohantak।। 55 ।।

Ajo mahaarhah swaabhaavyo, jitaamitrah pramodanah.
Aanando nandanah nandah, satyadharmaa trivikram।। 56 ।।

Maharshi kapilaachaaryah, kritajno medinipatih.
Tripadasthridashaadhyaksho, mahaashrngah kritaantakrit।। 57 ।।

Mahaavaraaho govindah, sushenah kanakaangadi.
Guhyo Gambhiro Gahano, guptachakra-gadaadharah।। 58 ।।

Vedah swaangojitah krishno, dridhah sankarshanochyutah.
Varuno vaaruno vrkshah, pushkaraaksho mahamanah।। 59 ।।

Bhagavaan bhagahaanandee, vanamaali halaayudhah.
Aadityo jyotiraadityah, sahishnu-gatisattamah।। 60 ।।

Sudhanvaa khandaparashurdaaruno dravinapradah.
Divisprk sarvadrk vyaaso vaachaspatihayonijah।। 61 ।।

Trisaamaa saamagah saama, nirvaanam bheshajam bhishak.
Sannyaasakrit-shamah shaanto, nishthaa shaantih paraayanam।। 62 ।।

Shubhaangah shaantidah srashtaa, kumudah kuvaaleshayah.
Gohito gopatirgoptaa, vrshabhaaksho vrshapriyah।। 63 ।।

Anivarti nivrittaatmaa, samkseptaa kshemakrit-shivah.
Shrivatsavakshaah shrivaasah, shripatih shrimataam varah।। 64 ।।

Shreedah Shreeshah shrinivaasah, shrinidhish shrivibhaavanah.
Shreedharah Shreekarah Shreyah, shreemaan-lokatrayaashrayah।। 65 ।।

Swakshah swangah shataanando, nandirjyotirganeshwarah.
Vijitaatmaa vidheyaatmaa, satkiirtishchinnasamshayah।। 66 ।।

Udheernah sarvatah-chakshuraneeshah shaashvatasthirah.
Bhooshayo bhooshano bhootirvishokah shokanashanah।। 67 ।।

Archismaanarchitah kumbho, vishuddhaatmaa vishodhanah.
Aniruddho-apratirathah, pradyumnoamitavikramah।। 68 ।।

Kaalaneminihaa veerah, shaurih shurajaneshwarah.
Trilokaatmaa trilokeshah, keshavah keshihaa harih।। 69।।

Kaamadevah kaamapaalah, kaamee kaantah kritaagamah.
Anirdeyavapurvishnuh, veeroananto dhanamjayah।। 70 ।।

Brahmanyo brahmakrit brahmaa, brahma brahmavivardhanah.
Brahmavid braahmano brahmi, brahmajno braahmanapriyah।। 71।।

Mahaakramo mahaakarmaa, mahaateja mahoragah.
Mahaakraturmahaayajvaa, mahaayajno mahaahavih।। 72 ।।

Stavyah stavapriyah, stotram stutih stotaa ranapriyah.
Poornah poornayitaa punyah, punyakeertiranamayah।। 73 ।।

Manojavasteerthakaro, vasuretaa vasupradah.
Vasuprado vaasudevah, vasurvasumanaa havih।। 74 ।।

Sadgatih sakritih sattaa, sadbhootih satparaayanah.
Shooraseno yadushreshthah, sannivaasah suyaamunah।। 75 ।।

Bhootaavaaso vaasudevah, sarvaasunilayo-analah.
Darpahaa darpado drishto, durdharo-athaaparajitah।। 76 ।।

Vishwamoortimahaarmoorti:deeptamoortih amoortimaan.
Anekamoortiravyaktah, shatamoortih shataanana।। 77 ।।

Eko naikah savah kah kim, yat-tat-padmanuttamam.
Lokabandhuh lokanaatho, maadhavo bhaktavatsalah।। 78।।

Suvarnovarno hemaango, varaangah chandanangadi.
Veerahaa vishamah shoonyo, ghritaashireachalah shalah।। 79 ।।

Amaani maanado maanyo, lokaswaamee trilokadhrk.
Sumedhaa medhajo dhanyah, satyamedhaa dharaadharah।। 80 ।।

Tejovrisho dyutidharah sarvashastrabhritam varah।
Praagraho nigraho vyagro naikashringo gadaagrajah।। 81 ।।

Chaturmurti: chaturbaahu:shchaturvyuha:chaturgatih।
Chaturatma chaturbhaav:chaturvedavidekapath।। 82 ।।

Samaavarto-anivritaatmaa durjayo duratikramah।
Durlabho durgamo duro durovaaso duraariha।। 83 ।।

Shubhaango lokasaarangah sutam-tustam-tuvardhanah।
Indrakarmaa mahaakarmaa kritakarmaa kritaagamah।। 84 ।।

Udbhavah sundarah sundo ratnanaabhah sulochanah।
Arko vaajasanah shringi jayantah sarvavij-jayee।। 85 ।।

Suvarnabindurakshobhyah sarvavaageeshvaresvarah।
Mahaahrado mahaagarto mahaabhuto mahaanidhah।। 86 ।।

Kumudah kundarah kundah parjanyah paavano-anilah।
Amritamsho-amritavapuh sarvajnah sarvatomukhah।। 87 ।।

Sulabhah suvratah siddhah shatrujicchatrutapanah।
Nyagrodho audumbaro-ashwathah:chaanuraamdranishoodanah।। 88 ।।

Sahasraarchih saptajivhah saptaidhaah saptavaahanah।
Amoortir anagho-achintyo bhayakrit-bhayanashanah।। 89 ।।

Anu:brhat Krishah sthoolo gunabhrinnirguno mahaan।
Adhritah svadhrithah svaasyah praagvamsho vamshavardhanah।। 90 ।।

Bhaarabhrith-kathito yogee yogeesha: sarvakamadah।
Aashramah shramanah kshaamah suparno vaayuvaahanah।। 91 ।।

Dhanurdharo dhanurvedo damdo damayitaa damah।
Aparaajitah sarvasaho niyantaa niyamo yamah।। 92 ।।

Sattvavaan saattvikah satyah satyadharmaparaayanah।
Abhipraayah priyaarho-arhah priyakrit-preetivardhanah।। 93 ।।

Vihaayasagatirjyotih Suruchirhutabhug vibhuh।
Ravirvirochanah sooryah savitaa ravilochanah।। 94 ।।

Ananto hutabhugbhoktaa sukhado naikajo’agrajah।
Anirvinno sadaamarshee lokadhisthaanamadbhutah।। 95।।

Sanaat-sanaatanatamah kapilah kapiravyayah।
Swastidah swastikrit swasti swastibhuk swastidakshinah।। 96 ।।

Araudrah kundali chakri vikramyoorjitashaasanah।
Shabdaatigah shabdasahah shishirah sharvarikarah।। 97 ।।

Akrurah Peshalo Daksho dakshinah kshaminam varah।
Vidvattamo veetabhayah punyashravanakeertanah।। 98 ।।

Uttaranah dushkritihah punyo duhswapnanashanah।
Veerahaa rakshanah santo jeevanah paryavasthitah।। 99 ।।

Anantarupo-anantashreeh jitamanyuh bhayapahah।
Chaturashro Gambheeraatmaa Vidisho Vyaadisho dishah।। 100 ।।

Anaadirbhoorbhuvo lakshmih suveero ruchiraangadah।
Janano janajanmaadih bheemo bheemaparaakramah।। 101 ।।

Aadhaarnilayo-dhaataa pushpahaasah prajaagarah।
Uurdhvagah satpathaachaarah praanadah pranavah panah।। 102 ।।

Pramaanam praananilayah praanabhrit praanajeevanah।
Tattvam tattvavidekaatmaa janmamrityu jaraatigah।। 103 ।।

Bhoorbhavah svastarustaarh savitaa prapitaamahah।
Yajno yajnapatiryajvaa yajnaango yajnavaahanah।। 104 ।।

Yajnabhrit-yajnakrit-yajnee yajnabhuk-yajnasaadhanah।
Yajnaantakrit-yajnaguhya mannad mannaada eva cha।। 105 ।।

Aatmayonih svayamjaato vaikhaanah saamagaayanah।
Devakinandanah srashta kshiteeshah paapanashanah।। 106 ।।

Shankhabhrinnandakee chakree shaarngadhanvaa gadaadharah।
Rathaangapaanirakshobhyah sarvapraharanaayudhah।। 107 ।।

Sarvapraharanaayudh Om Namah Iti।

Vanamaali gadee shaarngi shankhi chakri cha nandaki।
Shreeman naaraayanoh vishnuh vaasudevohabhirakshatu।

108 Havan Ahuti Mantra: 108 हवन आहुति मंत्र

हवन आहुति मंत्र 108: हिंदू धर्म के अनुसार, कोई भी पूजा, अनुष्ठान, जाप, आदि बिना हवन आहुति मंत्र 108 के अधूरा माना जाता है।

हिंदू धर्म में बहुत ही अनमोल विधियां और अनुष्ठान हैं। प्रत्येक आयोजन के साथ अविश्वसनीय रूप से जटिल लाभकारी प्रक्रियाएं होती हैं।

हिंदू धर्म में किसी भी महत्वपूर्ण पूजा को हवन (Havan Ahuti Mantra 108) के साथ पूरा माना जाता है। पूजा या अनुष्ठान के बाद हवन करने से किसी भी अन्य विधि से अधिक पवित्रता और शुद्धि का भाव उत्पन्न होता है।

हवन आहुति मंत्र

पारंपरिक हिंदू अनुष्ठान जिसे होमा या हवन के रूप में जाना जाता है, में अग्नि में आहुति दी जाती है। हवन आहुति मंत्र 108 के दौरान, पवित्र अग्नि को प्रसाद चढ़ाया जाता है, जिसे आस-पास के क्षेत्र और उसमें रहने वाले व्यक्तियों दोनों को शुद्ध करने के लिए माना जाता है।

हिंदू पूजा के दौरान, किसी भी अवसर पर, जैसे कि जन्मदिन, गृह प्रवेश, शादी या अन्य महत्वपूर्ण अवसर पर, हमेशा हवन समारोह किया जाता है।

यह अनुष्ठान कई वर्षों से हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। आज इस लेख की सहायता से हम “हवन आहुति मंत्र 108” के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे और विस्तार से चर्चा करेंगे उसके लाभ, हवन विधि, और आहुति मंत्र 108 के महत्व के बारे में।

हवन आहुति मंत्र 108 क्या है? – What is Havan Ahuti Mantra 108?

हवन शब्द संस्कृत के शब्द होमा से आया है, जिसका अर्थ है “अग्नि में डालना, आहुति देना और बलिदान करना।”

हिंदू संस्कृति में हवन को यज्ञ के नाम से भी जाना जाता है। हवन आहुति मंत्र 108 एक हवन समारोह के दौरान 108 बार एक विशिष्ट मंत्र का जाप करने को संदर्भित करता है।

एक हिंदू अनुष्ठान जहां मंत्रों का उच्चारण करते हुए पवित्र अग्नि में आहुतियां दी जाती हैं; इस उद्देश्य के लिए सबसे अधिक इस्तेमाल किया जाने वाला मंत्र “ओम स्वाहा” है जिसका अनिवार्य रूप से अर्थ है “दिव्य अग्नि को अर्पित करना।”

हिंदू धर्म इस बात से पूरी तरह वाकिफ है कि सूर्य प्राथमिक ऊर्जा स्रोत है और अग्नि सूर्य की जीवन शक्ति का प्रतीक है।

परिणामस्वरूप, हिंदू गुरु पवित्र अग्नि, अग्नि देवता का उपयोग करके मंदिरों, घरों और व्यावसायिक स्थानों में हवन के रूप में जाना जाने वाला पवित्र शुद्धिकरण अनुष्ठान करते हैं।

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हवन आहुति मंत्र 108 के बारे में मुख्य बातें:

ओम स्वाहा: यह मूल मंत्र है जिसे हवन के दौरान 108 बार दोहराया जाता है, जो परमात्मा को दी गई भेंट के समर्पण को दर्शाता है।

संख्या 108: हिंदू धर्म में, 108 को पूर्णता का प्रतिनिधित्व करने वाला एक पवित्र अंक माना जाता है और अक्सर मंत्रों को दोहराने के लिए इसका उपयोग किया जाता है।

हवन अनुष्ठान: इस अनुष्ठान में आशीर्वाद प्राप्त करने और वातावरण को शुद्ध करने के लिए मंत्रों का जाप करते हुए आग में घी, अनाज या अन्य वस्तुएं डालना शामिल है।

108 हवन आहुति मंत्र

  1. ॐ गणपते स्वाहा
  2. ॐ ब्रह्मणे स्वाहा
  3. ॐ ईशानाय स्वाहा
  4. ॐ अग्नये स्वाहा
  5. ॐ निऋतये स्वाहा
  6. ॐ वायवे स्वाहा
  7. ॐ अध्वराय स्वाहा
  8. ॐ अदभ्य: स्वाहा
  9. ॐ नलाय स्वाहा
  10. ॐ प्रभासाय स्वाहा
  11. ॐ एकपदे स्वाहा
  12. ॐ विरूपाक्षाय स्वाहा
  13. ॐ रवताय स्वाहा
  14. ॐ दुर्गायै स्वाहा
  15. ॐ सोमाय स्वाहा
  16. ॐ इंद्राय स्वाहा
  17. ॐ यमाय स्वाहा
  18. ॐ वरुणाय स्वाहा
  19. ॐ ध्रुवाय स्वाहा
  20. ॐ प्रजापते स्वाहा
  21. ॐ अनिलाय स्वाहा
  22. ॐ प्रत्युषाय स्वाहा
  23. ॐ अजाय स्वाहा
  24. ॐ अर्हिबुध्न्याय स्वाहा
  25. ॐ रैवताय स्वाहा
  26. ॐ सपाय स्वाहा
  27. ॐ बहुरूपाय स्वाहा
  28. ॐ सवित्रे स्वाहा
  29. ॐ पिनाकिने स्वाहा
  30. ॐ धात्रे स्वाहा
  31. ॐ यमाय स्वाहा
  32. ॐ सूर्याय स्वाहा
  33. ॐ विवस्वते स्वाहा
  34. ॐ सवित्रे स्वाहा
  35. ॐ विष्णवे स्वाहा
  36. ॐ क्रतवे स्वाहा
  37. ॐ वसवे स्वाहा
  38. ॐ कामाय स्वाहा
  39. ॐ रोचनाय स्वाहा
  40. ॐ आर्द्रवाय स्वाहा
  41. ॐ अग्निष्ठाताय स्वाहा
  42. ॐ त्रयंबकाय भूरेश्वराय स्वाहा
  43. ॐ जयंताय स्वाहा
  44. ॐ रुद्राय स्वाहा
  45. ॐ मित्राय स्वाहा
  46. ॐ वरुणाय स्वाहा
  47. ॐ भगाय स्वाहा
  48. ॐ पूष्णे स्वाहा
  49. ॐ त्वषटे स्वाहा
  50. ॐ अशिवभ्यं स्वाहा
  51. ॐ दक्षाय स्वाहा
  52. ॐ फालाय स्वाहा
  53. ॐ अध्वराय स्वाहा
  54. ॐ पिशाचेभ्या: स्वाहा
  55. ॐ पुरूरवसे स्वाहा
  56. ॐ सिद्धेभ्य: स्वाहा
  57. ॐ सोमपाय स्वाहा
  58. ॐ सर्पेभ्या स्वाहा
  59. ॐ वर्हिषदे स्वाहा
  60. ॐ गन्धर्वाय स्वाहा
  61. ॐ सुकालाय स्वाहा
  62. ॐ हुह्वै स्वाहा
  63. ॐ शुद्राय स्वाहा
  64. ॐ एक श्रृंङ्गाय स्वाहा
  65. ॐ कश्यपाय स्वाहा
  66. ॐ सोमाय स्वाहा
  67. ॐ भारद्वाजाय स्वाहा
  68. ॐ अत्रये स्वाहा
  69. ॐ गौतमाय स्वाहा
  70. ॐ विश्वामित्राय स्वाहा
  71. ॐ वशिष्ठाय स्वाहा
  72. ॐ जमदग्नये स्वाहा
  73. ॐ वसुकये स्वाहा
  74. ॐ अनन्ताय स्वाहा
  75. ॐ तक्षकाय स्वाहा
  76. ॐ शेषाय स्वाहा
  77. ॐ पदमाय स्वाहा
  78. ॐ कर्कोटकाय स्वाहा
  79. ॐ शंखपालाय स्वाहा
  80. ॐ महापदमाय स्वाहा
  81. ॐ कंबलाय स्वाहा
  82. ॐ वसुभ्य: स्वाहा
  83. ॐ गुह्यकेभ्य: स्वाहा
  84. ॐ अदभ्य: स्वाहा
  85. ॐ भूतेभ्या स्वाहा
  86. ॐ मारुताय स्वाहा
  87. ॐ विश्वावसवे स्वाहा
  88. ॐ जगत्प्राणाय स्वाहा
  89. ॐ हयायै स्वाहा
  90. ॐ मातरिश्वने स्वाहा
  91. ॐ धृताच्यै स्वाहा
  92. ॐ गंगायै स्वाहा
  93. ॐ मेनकायै स्वाहा
  94. ॐ सरय्यवै स्वाहा
  95. ॐ उर्वस्यै स्वाहा
  96. ॐ रंभायै स्वाहा
  97. ॐ सुकेस्यै स्वाहा
  98. ॐ तिलोत्तमायै स्वाहा
  99. ॐ रुद्रेभ्य: स्वाहा
  100. ॐ मंजुघोषाय स्वाहा
  101. ॐ नन्दीश्वराय स्वाहा
  102. ॐ स्कन्दाय स्वाहा
  103. ॐ महादेवाय स्वाहा
  104. ॐ भूलायै स्वाहा
  105. ॐ मरुदगणाय स्वाहा
  106. ॐ श्रिये स्वाहा
  107. ॐ रोगाय स्वाहा
  108. ॐ पितृभ्या स्वाहा
  109. ॐ मृत्यवे स्वाहा
  110. ॐ दधि समुद्राय स्वाहा
  111. ॐ विघ्नराजाय स्वाहा
  112. ॐ जीवन समुद्राय स्वाहा
  113. ॐ समीराय स्वाहा
  114. ॐ सोमाय स्वाहा
  115. ॐ मरुते स्वाहा
  116. ॐ बुधाय स्वाहा
  117. ॐ समीरणाय स्वाहा
  118. ॐ शनैश्चराय स्वाहा
  119. ॐ मेदिन्यै स्वाहा
  120. ॐ केतवे स्वाहा
  121. ॐ सरस्वतयै स्वाहा
  122. ॐ महेश्वर्य स्वाहा
  123. ॐ कौशिक्यै स्वाहा
  124. ॐ वैष्णव्यै स्वाहा
  125. ॐ वैत्रवत्यै स्वाहा
  126. ॐ इन्द्राण्यै स्वाहा
  127. ॐ ताप्तये स्वाहा
  128. ॐ गोदावर्ये स्वाहा
  129. ॐ कृष्णाय स्वाहा
  130. ॐ रेवायै पयौ दायै स्वाहा
  131. ॐ तुंगभद्रायै स्वाहा
  132. ॐ भीमरथ्यै स्वाहा
  133. ॐ लवण समुद्राय स्वाहा
  134. ॐ क्षुद्रनदीभ्या स्वाहा
  135. ॐ सुरा समुद्राय स्वाहा
  136. ॐ इक्षु समुद्राय स्वाहा
  137. ॐ सर्पि समुद्राय स्वाहा
  138. ॐ वज्राय स्वाहा
  139. ॐ क्षीर समुद्राय स्वाहा
  140. ॐ दण्डार्ये स्वाहा
  141. ॐ आदित्याय स्वाहा
  142. ॐ पाशाय स्वाहा
  143. ॐ भौमाय स्वाहा
  144. ॐ गदायै स्वाहा
  145. ॐ पदमाय स्वाहा
  146. ॐ बृहस्पतये स्वाहा
  147. ॐ महाविष्णवे स्वाहा
  148. ॐ राहवे स्वाहा
  149. ॐ शक्त्ये स्वाहा
  150. ॐ ब्रह्मयै स्वाहा
  151. ॐ खंगाय स्वाहा
  152. ॐ कौमार्ये स्वाहा
  153. ॐ अंकुशाय स्वाहा
  154. ॐ वाराहै स्वाहा
  155. ॐ त्रिशूलाय स्वाहा
  156. ॐ चामुण्डायै स्वाहा
  157. ॐ महाविष्णवे स्वाहा

हवन आहुति मंत्र 108: हवन विधि

  • सबसे पहले आपको ओम कृष्णाय नमः, ओम माधवये नमः, ॐ नारायणाय नमः बोलते हुए आचमन करना है।
  • उसके बाद थोड़ा सा पानी लेकर अपने हाथ को धोकर शुद्ध कर लेना है।

हवन आहुति मंत्र

  • इसके बाद आपको एक दूब बसे गंगाजल से नीचे दिए गए मंत्र को पढ़ते हुए खुद पर और चारों दिशाओं मे छिड़ककर शुद्ध करना है।

हवन से पहले शुद्धि का मंत्र

ॐ अपवित्रः पवित्रो सर्वावस्थां गतोपिवा यः स्मरेत पुण्डरीकाक्ष सः वाह्यभ्यतरेः शुचिः

  • इसके बाद आपको नीचे दिए गए अग्नि प्रज्वल मंत्र को पढ़ना है और कपूर को जलाकर अग्नि प्रज्वलित कर लेनी है।
  • इसके बाद आपने नीचे दिए हुए अग्नि प्रज्वल करने का मंत्र पढ़ते हुए कपूर से अग्नि को प्रज्वलित कर लेना है।

अग्नि प्रज्वल करने का मंत्र

ॐ चंद्रमा मनसो जातः तच्चक्षोः सूर्यअजायत श्रोताद्वायुप्राणश्च मुखादार्गिनजायत. ॐ

  • इतना करने के बाद आपको हवन चालू करना नीचे दिए गए मंत्रों का जाप करने के साथ-साथ आपको हवन में आहुति देनी है।
  • जैसे ही आप पहला मंत्र बोलेंगे, तो उसके बाद आपको हवन में आहुति देनी है।
  • इसी प्रकार आपको हर मंत्र  के बाद आहुति देनी है।

हवन आहुति मंत्र 108: हवन सामग्री

“108 हवन आहुति मंत्र” हवन करने के लिए सबसे पहले हवन कुंड की आवश्यकता होती है। इसके लिए आप ईंटों से बने हवन कुंड या बाजार में उपलब्ध लोहे या तांबे आदि किसी भी धातु के हवन कुंड का उपयोग कर सकते हैं, जिसमें हवन करने के लिए द्रव्यों को अर्पित किया जाता है।

हवन सामग्री –

  • पान,
  • सुपारी,
  • लौंग,
  • इलायची,
  • जायफल,
  • गट्टा,
  • सिंदूर,
  • रोली,
  • मौली,
  • सरसों,
  • शहद,
  • नारियल,
  • गोला,
  • गिलोय,
  • आम-पीपल-बेर-बरगद-आक-गूलर-समी-चिड़चिड़ा-खैर-पलास की लकड़ी,
  • सराई,
  • आम के पत्ते,
  • दूबी (हरी घास),
  • दिया,
  • चावल आटा,
  • हल्दी,
  • दूध,
  • तेल,
  • कपूर,
  • केले,
  • सेव,
  • मिठाई,
  • लाल कपड़ा,
  • चुन्नी,
  • केसर,
  • सफ़ेद चंदन,
  • चंदन,
  • घी,
  • जौ,
  • चावल,
  • तिल आदि।

अग्नि: अग्नि को जलाने के लिए दीपक या अन्य उपकरण।
मंत्र: हवन के लिए उच्चारित किए जाने वाले हवन आहुति मंत्र।

हवन आहुति मंत्र 108 का महत्व – Significance of Havan Ahuti Mantra 108

हमारे हिंदू धर्म के धार्मिक ग्रंथों में यह दावा किया गया है कि यज्ञ और हवन अनुष्ठान आदिकाल से ही किए जा रहे हैं। हवन आहुति मंत्र 108 को आज भी उतना ही सौभाग्यशाली माना जाता है।

कोई भी हवन हवन आहुति मंत्र 108 के बिना अधूरा होता है इसलिए हर पूजा, अनुष्ठान और जाप में पूर्णाहुति का प्रावधान है।

हिंदू धर्म के अनुसर, ऐसा माना जाता है कि हवन और यज्ञ के बिना कोई भी पूजा या मंत्रोच्चार नहीं किया जा सकता।

यज्ञ और हवन की परंपराएं सनातन काल से चली आ रही हैं। हिंदू धर्म में हवन को शुद्धिकरण के समारोह के रूप में देखा जाता है।

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आहुति मंत्र 108 हवन क्षेत्र में बुरी आत्माओं के प्रभाव को खत्म करने में मदद करता है। हवन एक अनुष्ठानिक सेटिंग में आग पर देवता को भोजन (हवि) चढ़ाने का कार्य है। हवा को शुद्ध करने के लिए हवन या यज्ञ करने का दावा किया जाता है।

इसके अतिरिक्त, अच्छे स्वास्थ्य और धन के लिए हवन किया जाता है। औषधीय लकड़ी और केवल शुद्ध गाय के घी से बनी आग जलाने से भी जीवन में खुशियाँ आती हैं।

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प्रचलित मान्यता के अनुसार, हवन के धुएं का पर्यावरण पर लंबे समय तक प्रभाव रहता है, जिससे खतरनाक सूक्ष्मजीवों की वृद्धि रुक ​​जाती है। घर के दरवाजे में वास्तु दोष होने पर सूर्य के मंत्र से हवन करना भी सौभाग्यशाली माना जाता है।

इस धार्मिक समारोह के बारे में अधिक और गहराई से जानने के लिए आप ऑनलाइन 99Pandit से पूजा सेवाएँ बुक करा सकते हैं।

99Pandit एक पूजा और पंडित-संबंधी सेवा प्राप्त कराता है। इसकी मदद से आप घर बैठे ही बिना अधिक मेहनत के पंडित बुक कर सकते हैं।

आप सरस्वती पूजा (Saraswati Puja) , सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja), दुर्गा पूजा, ऑफिस पूजा, जन्मदिन पूजा , विवाह पूजा, आदि के लिए पंडित आसन से बुक करा सकते हैं। तो बिना किसी देरी के 99Pandit के माध्यम से पंडित बुक करें।

108 हवन आहुति मंत्र के लाभ – Benefits of 108 Havan Ahuti Mantra

108 हवन आहुति मंत्र का उच्चारण कर हवन करने से पर्यावरण के साथ-साथ हमारे शरीर, मन और आत्मा को भी कई तरह के लाभ मिलते हैं। हमारे हिंदू धर्म में हवन, पूजा-पाठ, और अनुष्ठान को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।

हवन आहुति मंत्र

हमारे पूर्वजों द्वारा बनाए गए ये रीति-रिवाज जो आज भी उतने ही महान माने जाते हैं उनमें एक हवन करना है।

हवन आहुति मंत्र 108 से हवन करने के निम्नलिखित महत्वपूर्ण लाभ हैं:

  • यह हवा को साफ करने के अलावा हमारे शरीर और मन से प्रदूषकों को भी बाहर निकालता है।
  • इस प्रक्रिया के माध्यम से परिवार और समुदाय की शांति और एकजुटता भी बनी रहती है।
  • इस हवन आहुति मंत्र 108 दिव्य मंत्र का निरंतर जाप करने से सभी विचलित करने वाले और अस्थिर विचार हवन अग्नि में बुझ जाएंगे, जिससे एकाग्रता और शांति प्राप्त होगी।
  • हवन आपके मार्ग में सफलता और समृद्धि लाने में मदद करता है।
  • हवन का सकारात्मक प्रभाव व्यापारिक घाटे को ठीक करने में भी मदद करता है।
  • हवन करने से व्यक्ति के जीवन में वित्तीय स्थिरता और विकास लाने में भी मदद मिलती है।
  • इससे शैक्षणिक स्तर में सुधार करने और किसी भी गंभीर बीमारी से उबरने में मदद मिलती है।

निष्कर्ष

ऐसा माना जाता है कि यह 108 हवन आहुति मंत्र के साथ हवन अनुष्ठान करने से यह आपको सीधा स्वर्ग की ओर ले जाता है और चढ़ाए गए प्रसाद को भगवान ग्रहण करते हैं। इस प्रकार ये प्रसाद हमें उनके और आध्यात्मिकता के करीब लाते हैं।

108 हवन आहुति मंत्र को एक तरह के अनुष्ठान के रूप में करने के अलावा, इसका आध्यात्मिक महत्व भी है।

आप ईश्वर और अपने साथी मनुष्यों के साथ एकता की भावना महसूस कर सकते हैं और इस तरह, जीवन नामक इस यात्रा में सहज महसूस कर सकते हैं।

हवन को अधिक बार आयोजित करने की सलाह दी जाती है क्योंकि यह एक अनुष्ठान के रूप में कार्य करने के अलावा कई लाभ भी देता है।

हवन को अपनी सामान्य पूजा में शामिल करने का प्रयास करें। हवन घर पर ही एक छोटे से हवन कुंड में मंत्रों और छोटी-छोटी आहुतियों के साथ किया जा सकता है।

99Pandit के हमारे वैदिक पंडित, पुरोहित, और गुरु जी आपकी पूरी कुंडली की जाँच कर सकते हैं और उसके अनुसार सबसे उपयुक्त हवन की सलाह दे सकते हैं।

Khatu Shyam Ji Ki Aarti Lyrics: खाटू श्याम जी की आरती

खाटू श्याम जी की आरती (Khatu Shyam Ji Ki Aarti) का जाप करने से भगवान खाटू श्याम जिन्हें हारे का सहारा भी कहा जाता है, वह अपने भक्तों से प्रसन्न होकर उनकी सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करते है|

इनके भक्त खाटू श्याम जी की आरती (Khatu Shyam Ji Ki Aarti) का जाप करके खाटू श्याम जी से अपने जीवन में सुख – समृद्धि बनाए रखने की कामना करते है|

Khatu Shyam Ji Ki Aarti Lyrics

इस कलयुग के समय में सभी भक्त अपनी समस्याओं को दूर करने के लिए भगवान खाटू श्याम जी से प्रार्थना करते है तथा उन्हें प्रसन्न करने के लिए खाटू श्याम जी की आरती (Khatu Shyam Ji Ki Aarti) का भी जाप करते हैं|

निरंतर भगवान खाटू श्याम जी का नाम जपने से भक्त के मन में सकारात्मक भाव उत्पन्न होते है| खाटू श्याम जी की आरती (Khatu Shyam Ji Ki Aarti) का पाठ करने से भक्त मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है|

खाटू श्याम जी की आरती (Khatu Shyam Ji Ki Aarti) का नियमित रूप से जाप करने से व्यक्ति प्रत्येक जगह पर सफलता मिलने लगती है| अब हम आपको 99Pandit के बारे में जानकारी देंगे|

99Pandit एक ऐसा ऑनलाइन प्लेटफार्म है जिसकी सहायता से आप हिन्दू धर्म से संबंधित किसी भी पूजा जैसे – काली पूजा (Kali Puja), तथा महालक्ष्मी पूजा (Mahalakshmi Puja) के लिए ऑनलाइन पंडित बुक कर सकते है|

यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है| इसके लिए बस आपको “बुक ए पंडित” [Book A Pandit] विकल्प का चुनाव करना होगा और अपनी सामान्य जानकारी जैसे कि अपना नाम, मेल, पूजन स्थान, समय,और पूजा का चयन के माध्यम से आप अपना पंडित बुक कर सकेंगे|

खाटूश्याम जी की आरती – Khatu Shyam Ji Ki Aarti Lyrics in Hindi

|| खाटू श्याम आरती ||

ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।
खाटू धाम विराजत,
अनुपम रूप धरे॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

रतन जड़ित सिंहासन,
सिर पर चंवर ढुरे।
तन केसरिया बागो,
कुण्डल श्रवण पड़े॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

गल पुष्पों की माला,
सिर पार मुकुट धरे।
खेवत धूप अग्नि पर,
दीपक ज्योति जले॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

मोदक खीर चूरमा,
सुवरण थाल भरे।
सेवक भोग लगावत,
सेवा नित्य करे॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

झांझ कटोरा और घडियावल,
शंख मृदंग घुरे।
भक्त आरती गावे,
जय-जयकार करे॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

जो ध्यावे फल पावे,
सब दुःख से उबरे।
सेवक जन निज मुख से,
श्री श्याम-श्याम उचरे॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

श्री श्याम बिहारी जी की आरती,
जो कोई नर गावे।
कहत भक्त-जन,
मनवांछित फल पावे॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

जय श्री श्याम हरे,
बाबा जी श्री श्याम हरे।
निज भक्तों के तुमने,
पूरण काज करे॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।
खाटू धाम विराजत,
अनुपम रूप धरे॥
ॐ जय श्री श्याम हरे,
बाबा जय श्री श्याम हरे।

Khatu Shyam Ji Ki Aarti Lyrics

Khatu Shyam Ji Ki Aarti Lyrics in English – ॐ जय श्री श्याम हरे

|| Khatu Shyam Aarti ||

Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|
Khatu Dham Virajat,
Anupam Roop Dhare||
Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|

Rajat Jadit Singhasan,
Sir Par Chanvar Dhure|
Tan Kesariya Baago,
Kundal Shravan Pade||
Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|

Gal Pushpon Ki Mala,
Sir Par Mukut Dhare|
Khevat Dhup Agni Par,
Deepak Jyoti Jale||
Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|

Modak Kheer Churma,
Suvarn Thaal Bhare|
Sevak Bhog Lagavat,
Seva Nitya Kare||
Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare |

Jhaanjh Katora Aur Ghadiyaal,
Shankh Mridang Ghure|
Bhakt Aarti Gaave,
Jai – Jaikar Kare||
Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|

Jo Dhyave Fal Paave,
Sab Dukh Se Ubare|
Sevak Jan Nij Mukh Se,
Shree Shyam Shyam Uchare||
Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|

Shree Shyam Bihari Ji Ki Aarti,
Jo Koi Nar Gaave|
Kahat Bhakt – Jan,
Manovanchit Fal Paave||
Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|

Jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|
Nij Bhakto Ke Tumne,
Puran Kaaj Kare||
Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|

Om jai shree shyam hare,
Baba jai shree shyam hare|