Bhagavad Gita Chapter 11: भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 11) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 11) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय

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Chapter 11 – विश्वरूप दर्शन योग (Vishwarup Darshan Yoga)


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (1 – 2)

अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् ।
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ॥
भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया ।
त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपने जो परम गोपनीय अध्यात्म विषयक वचन अर्थात् उपदेश कहा, उससे मेरा यह अज्ञान नष्ट हो गया| क्योंकि हे कमलनेत्र ! मैंने आपसे भूतों की उत्पत्ति और प्रलय विस्तार पूर्वक सुने है तथा आपकी अविनाशी महिमा भी सुनी है|

English Meaning – Arjun said – In order to show your favour to me, the most secret spiritual words i.e. advice that you gave me, my ignorance was destroyed. Because O lotus eye! I have heard from you in detail the origin and destruction of ghosts and have also heard about your imperishable glory.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (3 – 4)

एवमेतद्यथात्थ त्वमा त्मानं परमेश्वर ।
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ॥
मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो ।
योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ॥

हिंदी अर्थ – हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते है, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम ! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य – रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ| हे प्रभो ! यदि मेरे द्वारा आपका वह देखा जाना शक्य है – ऐसा आप मानते है तो हे योगेश्वर ! उस अविनाशी स्वरुप का मुझे दर्शन कराइए|

English Meaning – O God! It is exactly as you call yourself, but oh great man! I want to see firsthand your opulent form consisting of knowledge, opulence, power, strength, semen and brilliance. Oh, Lord! If it is possible for you to be seen by me – do you believe so then oh Yogeshwar! Show me that imperishable form.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (5 – 6)

श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः ।
नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ॥
पश्यादित्यान्वसून्रुद्रा नश्विनौ मरुतस्तथा ।
बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – हे पार्थ ! अब तू मेरे सैकड़ो – हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृतिवाले आलौकिक रूपों को देख| हे भरतवंशी अर्जुन ! तू मुझमे आदित्यों को अर्थात् अदिति के द्वादश पुत्रो को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और उनचास मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख|

English Meaning – Shri Bhagwan said – O Partha! Now you see my hundreds and thousands of different types of supernatural forms with different colours and different shapes. O Arjun of Bharatvanshi! You see in me the Adityas, that is, the twelve sons of Aditi, the eight Vasus, the eleven Rudras, the two Ashvinikumars and the forty-nine Marudganas and many more wonderful forms not seen before.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (7 – 8)

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् ।
मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद् द्रष्टुमिच्छसि ॥
न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा ।
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! अब इस शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख| परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने नि:संदेह समर्थ नही है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात् आलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख|

English Meaning – Hey Arjun! Now see the entire world including the pastures located at one place in this body and whatever else you want to see, see it. But you are undoubtedly not capable of seeing me with your natural eyes, that is why I give you divine i.e. supernatural eyes, through this, you can see my divine yoga power.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (9-10- 11)

सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन् महायोगेश्वरो हरिः ।
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ॥
अनेकवक्त्रनयनम नेकाद्भुतदर्शनम् ।
अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ॥
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ॥

हिंदी अर्थ – संजय बोले – हे राजन ! महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुन को परम ऐश्वर्य दिव्यस्वरूप दिखलाया| अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुद दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को धारण किये हुए और दिव्य गंध का सारे शरीर लेप किये हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किये हुए विराटस्वरुप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा|

English Meaning – Sanjay said – Hey Rajan! After saying this, Mahayogeshwar and the God who destroys all sins showed Arjun the divine form of ultimate opulence. Having many faces and eyes, having many wonderful visions, having many divine ornaments and wearing many divine weapons and having the whole body coated with divine fragrance, having all kinds of wonders, having no limits and having faces on all sides. Arjun saw the Supreme God in a huge form.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (12 – 13)

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा ।
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ॥

हिंदी अर्थ – आकाश में एक हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित ही हो| पांडूपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक – पृथक सम्पूर्ण जगत को देवो के देव श्री कृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा|

English Meaning – The light produced by the simultaneous rising of a thousand suns in the sky can hardly be similar to the light of that universal form of God. At that time, Pandu’s son Arjun saw the entire world, divided in many ways, situated in one place in the body of Lord Krishna, the God of Gods.

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (14 – 15)

ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः ।
प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ॥
अर्जुन उवाच
पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसंघान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥

हिंदी अर्थ – उसके अनंतर आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा – भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले| अर्जुन बोले – हे देव ! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पो को देखता हूँ|

English Meaning – After that, Arjun, who was astonished and thrilled with his body, bowed with his head to God in the form of light and with devotion, he said with folded hands. Arjun said – Oh God! I see in your body all the gods and many communities of ghosts, Brahma seated on the lotus seat, Mahadev and all the sages and the divine serpents.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (16 – 17)

अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् ।
नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ॥

हिंदी अर्थ – हे सम्पूर्ण के स्वामी ! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनंत रूपों वाला देखता हूँ| हे विश्वरूप ! मैं आपके न अंत को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही| आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरुप देखता हूँ|

English Meaning – O Lord of the whole! I see you having many arms, stomach, mouth and eyes and having infinite forms from all sides. O world form! I see neither your end, nor your middle, nor your beginning. I see you crowned, armed with a mace and discus, a beam of light shining all around, glowing with fire and light like the sun, difficult to see and inexplicable from all sides.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (18 – 19)

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ॥
अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् ।
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ॥

हिंदी अर्थ – आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात् परब्रह्म परमात्मा है| आप ही इस जगत के परम आश्रय है, आप ही अनादि धर्म के रक्षक है और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष है| ऐसा मेरा मत है| आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनंत सामर्थ्य से युक्त, अनंत भुजा वाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता हूँ|

English Meaning – You are the only one worth knowing, i.e. Parabrahma Paramatma. You are the ultimate shelter of this world, you are the protector of the eternal religion and you are the indestructible eternal man. This is my opinion. I see you without beginning, end and middle, having infinite power, having infinite arms, having eyes like the moon and sun, having a mouth like blazing fire and saturating this world with your brilliance.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (20 – 21)

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः ।
दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ॥
अमी हि त्वां सुरसंघा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति ।
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः ॥

हिंदी अर्थ – हे महात्मन् ! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएं एक आपसे ही परिपूर्ण है तथा आपके इस आलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे है| वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते है और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते है तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय ‘कल्याण हो’ ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्त्रोतों द्वारा आपकी स्तुति करते है|

English Meaning – Oh great man! The entire sky between heaven and earth and all the directions are filled with you and seeing this supernatural and terrible form of yours, all the three worlds are in great pain. The same group of deities enter into you and some with fear, with folded hands, chant your name and qualities and the community of Maharshi and Siddhas praise you with the best sources saying ‘May you be well.’


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (22 – 23)

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च ।
गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ॥
रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् ।
बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् ॥

हिंदी अर्थ – जो ग्यारह रूद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय है – वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते है| हे महाबाहो ! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत – सी दाढ़ों के कारण अत्यंत विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे है तथा मैं भी व्याकुल हो रहे है तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ|

English Meaning – The eleven Rudras and the twelve Adityas and the eight Vasus, the Sadhyaganas, the Vishwadevs, the Ashvinikumars and the Marudganas and the community of ancestors and the community of Gandharvas, Yakshas, Rakshasas and Siddhas – they all look at you with astonishment. Oh, great arms! Everyone is getting distressed after seeing your great form with many faces and eyes, many arms, thighs and legs, many stomachs and many molars, and I too am getting distressed.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (24 – 25)

नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् ।
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ॥
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि ।
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि हे विष्णो ! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अंत:करण वाला मैं धीरज और शांति नही पाता हूँ| दाढो के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखो को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ| इसलिए हे देवेश ! हे जगन्निवास ! आप प्रसन्न हो|

English Meaning – Because O Vishno! Seeing you touching the sky, resplendent, multi-coloured, with an outstretched mouth and huge shining eyes, I, with a fearful heart, do not find patience and peace. Looking at your faces which are huge due to beards and burning like the fire of doomsday, I do not know the directions and do not get happiness either. That’s why O Devesh! Oh Jagannivas! You are happy.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (26 – 27)

अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः ।
भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः ॥
वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि ।
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः ॥

हिंदी अर्थ – वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे है और भीष्म पितामह. द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढो के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे है और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिख रहे है|

English Meaning – All of them are entering you including the community of kings, sons of Dhritarashtra and Bhishma Pitamah. All of them, including Dronacharya, Karna and the chief warriors of our side, are running with great speed into the monstrous, terrifying mouths because of your beards, and many of them are seen with their powdered heads stuck between your teeth.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (28 – 29)

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥

हिंदी अर्थ – जैसे नदियों के बहुत – से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुन्द्र के ही सम्मुख दौड़ते है अर्थात् समुद्र में प्रवेश करते है, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे है| जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते है, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे है|

English Meaning – Just as the water flows of many rivers naturally run towards the sea, i.e. enter the sea, in the same way, those heroes of the world are also entering your blazing mouths. Just as kites run with great speed into the blazing fire to get destroyed out of attachment, similarly all these people are also running with great speed into your mouth to get destroyed.

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (30 – 31)

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः ।
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो ॥
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥

हिंदी अर्थ – आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखो द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे है| हे विष्णो ! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है| मुझ बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन है? हे देवो में श्रेष्ठ ! आपको नमस्कार हो| आप प्रसन्न होइए| आदि पुरुष मैं आपको विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता|

English Meaning – You are devouring those entire worlds with your flaming mouths and licking them again and again from all sides. Hey Vishno! Your fiery light is warming the entire world by filling it with radiance. Tell me, who are you in fierce form? O best among gods! Greetings to you. You be happy. Aadi Purusha I want to know you especially because I don’t know your nature.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (32 – 33)

श्रीभगवानुवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः ।
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः ॥
तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् ।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ| इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत हुआ हूँ| इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग है, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा| अतएव तू उठ ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से संपन्न राज्य को भोग| ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए है| हे साव्यसचिन ! तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा|

English Meaning – Shri Bhagwan said – I am the increased Mahakaal who destroys the worlds. At this time I am inclined to destroy these worlds. Therefore, all the warriors in the opponent’s army will not survive even without you, that is, even if you do not fight, they will all be destroyed. So you get up! After gaining fame and conquering the enemies, enjoy a kingdom rich in wealth. All these warriors have already been killed by me. Hey Savyaschin! You just become an instrument.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (34 – 35)

द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् ।
मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ॥
सञ्जय उवाच
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ॥

हिंदी अर्थ – द्रोणाचार्य तथा भीष्म पितामह तथा जयद्रथ और कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीर योद्धाओं को तू मार| भय मत कर| नि:संदेह तू युद्ध में वैरियों को जीतेगा| इसलिए युद्ध कर| संजय बोले – केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर कांपते हुए नमस्कार करके, फिर भी अत्यंत भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गदगद वाणी से बोले|

English Meaning – You kill Dronacharya, Bhishma Pitamah, Jayadratha, Karna and many other brave warriors killed by me. Don’t be afraid. Undoubtedly you will win over your enemies in the war. Therefore wage war. Sanjay said – Hearing these words of Lord Keshav, the crowned Arjuna bowed with folded hands and trembled, and yet being extremely frightened, he bowed to Lord Shri Krishna in an exultant voice.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (36 – 37)

अर्जुन उवाच
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसंघाः ॥
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे अन्तर्यामिन ! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण, और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे है और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे है| हे महात्मन ! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त ! हे देवेश ! हे जगन्निवास ! जो सत, असत और इनसे परे अक्षर अर्थात् सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही है|

English Meaning – Arjun said – O Antaryamin! It is worthy that by chanting your name, qualities and influence the world is becoming very happy and is also receiving love and the frightened demons are running in different directions and all the communities of Siddhaganas are saluting. Hey Mahatman! How can they not pay obeisance to you, the creator of Brahma and the greatest of all, because oh infinite! Hey Devesh! Oh Jagannivas! You are the one who is true, false and beyond these Akshar i.e. Sachchidanandaghan Brahma.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (38 – 39)

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ॥
वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ॥

हिंदी अर्थ – आप आदिदेव और सनातन पुरुष है, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम है| हे अनन्तरूप ! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात् परिपूर्ण है| आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चंद्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के पिता है| आपके लिए हजारों बार नमस्कार ! नमस्कार हो !! आपके लिए फिर भी बार-बार नमस्कार ! नमस्कार !!

English Meaning – You are the Adidev and the eternal man, you are the supreme shelter and knower of this world, knowable and supreme abode. O infinite form! This whole world is filled with you i.e. it is complete. You are the lord of Vayu, Yamraj, Agni, Varun, Moon, people and father of Brahma. Hello to you a thousand times! Hello!! Hail again and again for you! Hello !!


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (40-41- 42)

नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व ।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ॥
सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति ।
अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥
यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु ।
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥

हिंदी अर्थ – हे अनन्त सामर्थ्यवाले ! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार ! हे सर्वात्मन ! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किये हुए है, इससे आप ही सर्वरूप है| आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा है ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने ‘हे कृष्ण !’, ‘हे यादव !’, ‘हे सखे !’ इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ कहा है और हे अच्युत ! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शैय्या, आसन और भोजनादि में अकेले अथवा उन सखाओं के सामने भी अपमानित किये गए है – वह सब अपराध अप्रमेयस्वरुप अर्थात् अचिन्त्य प्रभाव वाले आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ|

English Meaning – O one of infinite power! Greetings to you from front and back too! Oh all-soul! Let there be salutations to you from all sides, because you, the infinite mighty one, pervades the entire world, hence you are the only form of everything. Without knowing about your influence, considering that you are my friend, out of love or even out of carelessness, I have said ‘O Krishna!’, ‘O Yadav!’, ‘O friend!’ thus without thinking and without thinking, O Achyuta! For the sake of humor, you have been insulted by me while walking, in bed, sitting, eating etc., alone or even in front of those friends – I forgive you for all those crimes which are immeasurable i.e. having unimaginable effect.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (43 – 44)

पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् ।
न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ॥
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् ।
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् ॥

हिंदी अर्थ – आप इस चराचर जगत के पिता और सबसे बड़े गुरु एवं अति पूजनीय है| हे अनुपम प्रभाववाले ! तीनों लोकों में आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है, फिर अधिक तो कैसे हो सकता है| अतएव हे प्रभो ! मैं शरीर को भलीभांति चरणों में निवेदित कर, प्रणाम करके, स्तुति करने योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिए प्रार्थना करता हूँ| हे देव ! पिता जैसे पुत्र के, सखा जैसे सखा के और पति जैसे प्रियतमा पत्नी के अपराध सहन करते है – वैसे ही आप भी मेरे अपराध को सहन करने योग्य है|

English Meaning – You are the father of this living world and the greatest mentor and most worshipable. O one of unique influence! There is no one else like you in the three worlds, then how can there be more. Therefore O Lord! I offer my body a proper prayer at your feet, pay obeisance to you and pray to God who is worthy of praise. Hey, God ! Just like a father tolerates the transgressions of his son, like a friend of a friend and like a husband bears the transgressions of his beloved wife – in the same way you too are capable of tolerating my transgressions.

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय

भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (45 – 46)

अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे ।
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ॥
किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव ।
तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ॥

हिंदी अर्थ – मैं पहले न देखे हुए आपके इस आश्चर्यमय रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अति व्याकुल भी हो रहा है, इसलिए आप उस अपने चतुर्भुज विष्णु रूप को ही मुझे दिखलाइए| हे देवेश ! हे जगन्निवास ! प्रसन्न होइए| मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ| इसलिए हे विश्वरूप ! हे सहस्त्रबाहों ! आप उसी चतुर्भुज से प्रकार होइए|

English Meaning – I am happy to see this wondrous form of yours which I have not seen before and my mind is also very disturbed with fear, so please show me that four-armed Vishnu form of yours. Hey Devesh! Oh Jagannivas! Be happy. I want to see you wearing a crown and holding a mace and discus in your hands. That’s why O world form! O thousand arms! You are like that quadrilateral.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (47 – 48)

श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् ।
तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ॥
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः ।
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – हे अर्जुन ! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरे परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट रूप तुझको दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दुसरे किसी ने पहले नहीं देखा था| हे अर्जुन ! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दुसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ|

English Meaning – Shri Bhagwan said – O Arjun! By my grace, with the influence of my power of yoga, I have shown you this most glorious, primal and limitless, vast form of mine, which no one else had seen before except you. Hey Arjun! In the human world, I, having the universal form, cannot be seen by anyone other than you, neither by the study of Vedas and Yagyas, nor by charity, nor by activities, nor by intense penances.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (49 – 50)

मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् ।
व्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ॥
सञ्जय उवाच
इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः ।
आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा ॥

हिंदी अर्थ – मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिए| तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस शंख – चक्र – गदा – पद्मयुक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख| संजय बोले – वासुदेव भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया|

English Meaning – Seeing such a monstrous form of mine, you should not be disturbed nor should you feel foolish. You, being fearless and having a loving mind, look again at this four-armed form of mine with conch, disc, mace and lotus. Sanjay said – After saying this to Arjun, Lord Vasudev again showed his four-armed form in the same way and then Mahatma Shri Krishna, being the embodiment of gentleness, gave patience to this frightened Arjun.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (51 – 52)

अर्जुन उवाच
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ॥
श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम ।
देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे जनार्दन ! आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ| श्री भगवान बोले – मेरा जो चतुर्भुज रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दश है अर्थात् इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ है| देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते है|

English Meaning – Arjun said – O Janardan! Seeing this very peaceful human form of yours, I have now become stable and have attained my natural state. Shri Bhagwan said – The four-armed form of mine that you have seen is Sudurdash, that is, its sighting is very rare. Even the gods always aspire to see this form.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (53 – 54)

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ॥
भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन ।
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप ॥

हिंदी अर्थ – जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है – इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ| परन्तु हे परंतप अर्जुन ! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ|

English Meaning – The way you have seen me – in this way I, having the four-armed form, can be seen neither through the Vedas, nor through penance, nor through charity, nor through yagya. But oh great Arjun! In this way, through undivided devotion, I am capable of seeing the four-armed form directly, knowing it from the elements and also being able to enter into it, that is, to attain it through unity.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय श्लोक (55)

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है (सर्वत्र भगवद्बुद्धि हो जाने से उस पुरुष का अति अपराध करने वाले में भी वैरभाव नहीं होता है, फिर औरों में तो कहना ही क्या है), वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है|

English Meaning – Hey Arjun! The man who performs all his duties only for Me is devoted to Me, is My devotee, is free from attachment and is free from enmity towards all living beings (having God-consciousness everywhere, that man does not have enmity even among those who commit extreme crimes). Then what is there to say about others), only I get that man with unalloyed devotion.


भगवद गीता ग्यारहवां अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 10: भगवद गीता दसवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता दसवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 10) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता दसवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 10) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता दसवाँ अध्याय

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Chapter 10 – विभूति योग (Vibhuti Yoga)


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (1 – 2)

श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः ।
यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ॥
न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः ।
अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – हे महाबाहो ! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिस मैं तुझे अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूँगा| मेरी उत्पत्ति को अर्थात लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते है और न महर्षिजन ही जानते है, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ|

English Meaning – Shri God said – Oh mighty arms! Still, listen to My most secret and effective words. Which I will say with a desire to benefit the one who loves you very much. Neither the gods nor the great sages know about my origin, that is, my appearance through Leela because I am the original cause of the gods and the great sages in every way.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (3-4-5)

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् ।
असंमूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥
बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।
सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ॥
अहिंसा समता तुष्टिस् तपो दानं यशोऽयशः ।
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः ॥

हिंदी अर्थ – जो मुझको अजन्मा अर्थात वास्तव में जन्मरहित, अनादि और लोकों का महान ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान पुरुष सम्पूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है| निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इन्द्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख: दुःख, उत्पत्ति – प्रलय और भय – अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप, दान, कीर्ति, और अपकीर्ति – ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते है|

English Meaning – One who knows Me as the unborn i.e. actually the birthless, the eternal and the great God of the worlds, that wise man among humans becomes free from all sins. Power to decide, accurate knowledge, incomprehensibility, forgiveness, truth, control of senses, control of mind and happiness: sorrow, origin – destruction and fear – fearlessness and non-violence, equality, contentment, austerity, charity, fame and infamy – These creatures have different types of emotions only because of me.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (6 – 7)

महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥
एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः ।
सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः ॥

हिंदी अर्थ – सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु – ये मुझमे भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए है, जिनकी संसार में यह सम्पूर्ण प्रजा है| जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्त्व से जानना है) वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है – इसमें कुछ भी संशय नहीं है|

English Meaning – The seven Maharishis, the four who existed before them, Sanakadi, Swayambhu, etc., the fourteen Manus – all of them who have feelings for me have arisen from my resolution, whose entire subjects are in this world. The person who knows my existence in the form of Parameshwarya and the power of yoga from the principle (all that is visible in the world is an illusion of God and only one Vasudev Lord is perfect everywhere, to know this is to know from the principle) he becomes imbued with steadfast devotion. Yes – There is no doubt about this.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (8 – 9)

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् ।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ॥

हिंदी अर्थ – मैं वासुदेव ही सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते है| निरंतर मुझमे मन लगाने वाले और मुझमे ही प्राणों को अर्पण करने वाले भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते है और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते है|

English Meaning – I am the cause of the origin of the entire world and the whole world strives from Me. Understanding this, intelligent devotees with faith and devotion continuously worship Me, the Supreme Lord. The devotees who constantly concentrate on Me and dedicate their lives to Me, by discussing My devotion, knowing My influence among themselves and speaking about Me along with its qualities and effects, are constantly satisfied and remain constantly happy in Me, Vasudev.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (10 – 11)

तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् ।
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ॥
तेषामेवानुकम्पार्थ महमज्ञानजं तमः ।
नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ॥

हिंदी अर्थ – उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तो को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते है| हे अर्जुन ! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंत: करण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ|

English Meaning – To those devotees who are constantly engaged in meditating etc. and worshipping me with love, I give that yoga in the form of Tatvgyan, through which they attain me only. Hey Arjun! To show favour to them, I, situated in their heart, myself destroy their darkness born of ignorance with the lamp of bright philosophy.

भगवद गीता दसवाँ अध्याय

भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (12 – 13)

अर्जुन उवाच
परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् ।
पुरुषं शाश्वतं दिव्यमा दिदेवमजं विभुम् ॥
आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र है, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्या पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते है| वैसे ही देवर्षि नारद तथा आसित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते है और आप भी मेरे प्रति कहते है|

English Meaning – Arjun said – You are the supreme Brahma, the supreme abode and the supreme holy because all the sages call you eternal, divine man and also the Adidev of the gods, unborn and omnipresent. Similarly, Devarshi Narad and Asit, Deval Rishi and Maharishi Vyas also say and you also say about me.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (14 – 15)

सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव ।
न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः ॥
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ॥

हिंदी अर्थ – हे केशव ! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते है, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ| हे भगवान ! आपके लीलामय स्वरुप को न तो दानव जानते है और न देवता ही| हे भूतों को उत्पन्न करने वाले ! हे भूतों के ईश्वर !  देवों के देव ! जगत के स्वामी ! हे पुरुषोत्तम ! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते है|

English Meaning – Hey Keshav! Whatever you say about me, I consider it all to be true. Oh God ! Neither demons nor gods know your playful form. O creator of ghosts! Hey God of ghosts! O God of gods! Hey Lord of the world! Hey Purushottam! You yourself know yourself.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (16 – 17)

वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
याभिर्विभूतिभिर्लोका निमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ॥
कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् ।
केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ॥

हिंदी अर्थ – इसलिए आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से कहने में समर्थ है, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित है| हे योगेश्वर ! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवान् ! आप किन – किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य है?

English Meaning – Therefore, you are the only one capable of fully describing those divine personalities through which you pervade all these worlds. Oh, Yogeshwar! How can I know you by thinking continuously and oh Lord! In which ways are you worthy of being contemplated by me?


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (18 – 19)

विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन ।
भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ॥
श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः ।
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ॥

हिंदी अर्थ – हे जनार्दन ! अपनी योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात सुनने की उत्कंठा बनी रहती है| श्री भगवान बोले – हे कुरुश्रेष्ठ ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ है, उनको तेरे लिए प्रधानता से कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है|

English Meaning – Hey Janardan! Still tell me about your Yoga Shakti and Vibhuti in detail, because I am not satisfied while listening to your nectar words, that is, the eagerness to listen remains. Shri Bhagwan said – Oh best of Kurus! Now I will give importance to my divine personalities for you; Because there is no end to my expansion.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (20 – 21)

अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
आदित्यानामहं विष्णु र्ज्योतिषां रविरंशुमान् ।
मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ| मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ|

English Meaning – Hey Arjun! I am the soul of all beings located in the heart of all beings and I am also the beginning, middle and end of all beings. I am Vishnu among the twelve sons of Aditi and the Sun with rays among the lights and I am the brightness of the forty-nine air gods and the Moon, the ruler of the constellations.

भगवद गीता दसवाँ अध्याय

भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (22 – 23)

वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः ।
इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ॥
रुद्राणां शंकरश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् ।
वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम् ॥

हिंदी अर्थ – मैं वेदों में सामदेव हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात् जीवन – शक्ति हूँ| मैं एकादश रुद्रो में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ| मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखर वाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ|

English Meaning – I am Samdev in the Vedas, I am Indra among the gods, I am the mind among the senses and I am the consciousness i.e. life force of ghosts. I am Shankar among the eleven Rudras and Kuber, the lord of wealth among the Yakshas and demons. I am Agni among the eight Vasus and I am Mount Sumeru among the peaked mountains.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (24 – 25)

पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् ।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः ॥
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ॥

हिंदी अर्थ – पुरोहितो में मुखिया बृहस्पति मुझको जान| हे पार्थ ! मैं सेनापतियों में स्कन्द और जलाशयों मे समुन्द्र हूँ| मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात् ओंकार हूँ| सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालो में हिमालय पहाड़ हूँ|

English Meaning – Jupiter, the chief among the priests, knows me. Hey Parth! I am Skanda among the generals and the ocean among the reservoirs. I am Bhrigu among Maharshi and one syllable i.e. Omkar among words. Among all types of Yagyas, I am the one who performs Japa and among those who remain stable, I am the Himalayan Mountains.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (26 – 27)

अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः ।
गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः ॥
उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् ।
ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ॥

हिंदी अर्थ – मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धो में कपिल मुनि हूँ| घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोडा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान|

English Meaning – I am the Peepal tree among all the trees, Narada Muni among the Devarshis, Chitrarath among the Gandharvas and Kapil Muni among the Siddhas. Among horses, the horse named Uchchaishrava, was born with nectar, among the best elephants, the elephant named Airavata, and among humans, know me as the king.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (28 – 29)

आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् ।
प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः ॥
अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् ।
पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् ॥

हिंदी अर्थ – मैं शस्त्रों में वज्र और गौओ में कामधेनु हूँ| शास्त्रोक्त रीति से संतान की उत्पत्ति के हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकी हूँ| मैं नागों में शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालो में यमराज मैं हूँ|

English Meaning – I am Vajra among weapons and Kamadhenu among cows. For the birth of a child as per the scriptures, I am Kamadev and among the snakes, I am Vasuki, the serpent king. Among the snakes, I am Sheshnag and Varun, the lord of the aquatics, and among the ancestors, I am the ancestor named Aryama and among those who rule, I am Yamraj.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (30 – 31)

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् ।
मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ॥
पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् ।
झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ॥

हिंदी अर्थ – मैं दैत्यों में प्रहलाद और गणना करने वालो का समय (क्षण, घडी, दिन, पक्ष, मास आदि में जो समय है वह मैं हूँ) हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ| मैं पवित्र करने वालो में वायु और शस्त्रधारियों में श्री राम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ|

English Meaning – I am Prahlad among the demons and the time of those who calculate (I am the time that is in moment, hour, day, side, month etc.) and among the animals I am Mrigraj Singh and among the birds I am Garuda. I am the one who purifies the air, I am Shri Ram among the weapon bearers, I am the crocodile among the fishes and I am Shri Bhagirathi Gangaji among the rivers.

भगवद गीता दसवाँ अध्याय

भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (32 – 33)

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन ।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च ।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ| मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात् ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालो का तत्व – निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ| मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ| अक्षयकाल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराटस्वरुप, सबका धारण – पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ|

English Meaning – Hey Arjun! I am the beginning, the end and the middle of the creations. Among the sciences, I am the spiritual knowledge i.e. Brahmavidya and the essence of those who dispute with each other – the argument made for decision. I am formless in letters and in compound words, I am a compound called duality. Akshaykaal i.e. the great period of time and I am the one who faces everywhere, is a huge form, that sustains and nurtures everything.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (34 – 35)

मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भ वश्च भविष्यताम् ।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा ॥
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् ।
मासानां मार्गशीर्षोऽह मृतूनां कुसुमाकरः ॥

हिंदी अर्थ – मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ| तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ|

English Meaning – I am the destroyer of all, the cause of death and the origin of those who are born, and among women, I am fame, glory, speech, memory, intelligence, fortitude and forgiveness. And among the singable Shrutis I am Brihatsam and among the verses I am Gayatri, among the months I am Margashirsha and among the seasons I am Vasantha.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (36 – 37)

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥
वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनंजयः ।
मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः ॥

हिंदी अर्थ – मैं छल करने वालो में जुआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ| मैं जीतने वालो का विजय हूँ, निश्चय करने वालो का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ| वृष्णिवंशियों में (यादवो के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात् मैं स्वयं तेरा सखा, पांडवों में धनञ्जय अर्थात् तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ|

English Meaning – I am the influence of gambling and influential men among those who deceive. I am the victory of those who conquer, the determination of those who have the determination and the Sattvik feeling of Satvik men. Among the Vrishni dynasty (there was also a Vrishni dynasty under the Yadavas) I am Vasudev i.e. I am your friend, among the Pandavas I am Dhananjay i.e. you, among the sages I am Vedavyas and among the poets I am the poet Shukracharya.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (38 – 39)

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् ।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥
यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन ।
न तदस्ति विना यत्स्यान् मया भूतं चराचरम् ॥

हिंदी अर्थ – मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात् दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानो का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ| और हे अर्जुन ! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो|

English Meaning – I am the punishment for those who oppress, i.e. the power to suppress, I am the policy of those who wish to win, I am the protector of the feelings that deserve to be kept secret, I am silence and I am the philosophy of the wise. And O Arjun! I am also the cause of the origin of all the ghosts because there is no such variable or immovable ghost that is devoid of me.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (40 – 41)

नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप ।
एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूते र्विस्तरो मया ॥
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा ।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥

हिंदी अर्थ – हे परंतप ! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए एकदेश से अर्थात संक्षेप से कहा है| जो – जो भी विभुतियुक्त अर्थात् ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान|

English Meaning – Hey Parantap! There is no end to my divine personality, I have told this expansion of my personality for you in one word i.e. in brief. Whatever is glorious, that is, full of majesty, radiance and power, you should consider it to be the expression of a part of my glory.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय श्लोक (42)

अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमे कांशेन स्थितो जगत् ॥

हिंदी अर्थ – अथवा हे अर्जुन ! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रयोजन है| मैं इस सम्पूर्ण जगत को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ|

English Meaning – Or O Arjun! What is your purpose in knowing this much? I am present holding this entire world with just a fraction of my yoga power.


भगवद गीता दसवाँ अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 9: भगवद गीता नवां अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता नवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 9) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता नवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 9) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता नवां अध्याय

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Chapter 9 – राज विद्याराज गुह्यः योग (Raja-Vidya-Raja-Guhya Yoga)


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (1 – 2)

श्रीभगवानुवाच इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥
राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ॥

हिंदी अर्थ – श्रीभगवान बोले – तुझ दोषदृष्टिरहित भक्त के लिए इस परम गोपनीय विज्ञान सहित ज्ञान को पुनः भली भांति कहूँगा, जिसको जानकर तू दुःखरूप संसार से मुक्त हो जाएगा| यह विज्ञान सहित ज्ञान सब विद्याओं का राजा, सब गोपनियों का राजा, अति पवित्र, अति उत्तम, प्रत्यक्ष फलवाला, धर्मयुक्त, साधन करने में बड़ा सुगम और अविनाशी है|

English Meaning – Shri Bhagavan said – I will once again explain this knowledge along with this highly confidential science to you, a devotee without any faults, knowing which you will be freed from the world of sorrow. This knowledge including science is the king of all knowledge, the king of all secrets, very pure, very good, bearing visible results, full of religion, very easy to use and indestructible.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (3 – 4)

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥
मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥

हिंदी अर्थ – हे परंतप ! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्यु रूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते है| मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित है, किन्तु वास्तव में मैं उनमे स्थित नहीं हूँ|

English Meaning – Hey Parantap! People without faith in this appropriate religion, without attaining Me, keep roaming in the world cycle in the form of death. This entire world is filled with water and ice like the formless God and all the ghosts are situated within me on the basis of will, but in reality, I am not present in them.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (5 – 6)

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥
यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥

हिंदी अर्थ – वे सब भूत मुझमे स्थित नहीं है, किन्तु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण – पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है| जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से सम्पूर्ण भूत मुझमे स्थित है, ऐसा जान |

English Meaning – All those ghosts are not present in me, but looking at my divine power of yoga, my soul, which sustains and nurtures the ghosts and also creates the ghosts, is not actually present in the ghosts. Just as the great wind which spreads everywhere arising from the sky is always situated in the sky, in the same way, the entire existence is situated in me due to its origin from my will, know this.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (7 – 8)

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ॥
प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
भूतग्राममिमं कृत्स्नम वशं प्रकृतेर्वशात् ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! कल्पों के अंत में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते है अर्थात प्रकृति में लीन होते है और कल्पो के आदि में उनको मैं पुनः रचता हूँ| अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस सम्पूर्ण भूतसमुदाय को बार – बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ|

English Meaning – Hey Arjun! At the end of the Kalpa, all the ghosts attain my nature, that is, they merge into nature and I create them again at the beginning of the Kalpa. By accepting my nature and becoming dependent on the power of nature, I create this entire community of ghosts again and again according to their deeds.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (9 – 10)

न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय ।
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ॥
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश (जिसके संपूर्ण कार्य कर्तत्व भाव के बिना अपने आप सत्ता मात्र ही होते है उसका नाम ‘उदासीन के सदृश है|’) स्थति मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बांधते| हे अर्जुन ! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है|

English Meaning – Hey Arjun! Those actions do not bind me, the Supreme Soul, who is free from attachment and is like an indifferent person (whose entire actions are mere existence on their own, without the feeling of being a doer, his name is like ‘like an indifferent one’). Hey Arjun! With the power of my presence, nature creates the universe along with its creatures and it is for this reason that this world cycle is rotating.

भगवद गीता नवां अध्याय

भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (11 – 12)

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥

हिंदी अर्थ – मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान ईश्वर को तुच्छ समझते है अर्थात अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य जानते है| वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को ही धारण किए रहते है|

English Meaning – The foolish people, who do not know My Supreme Being, consider Me to be the great God of all the ghosts who have assumed a human body, that is, ordinary people consider Me to be the Supreme God who wanders in human form for the salvation of the world through His Yoga Maya. Those confused-minded ignorant people with useless hopes, useless actions and useless knowledge continue to possess demonic, demonic and Mohini nature.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (13 – 14)

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् ॥
सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते ॥

हिंदी अर्थ – परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! दैवी प्रकृति के आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरुप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते है| वे दृढ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते है|

English Meaning – But O son of Kunti! Mahatma who are dependent on the divine nature, considering me to be the eternal cause of all existences and the immortal form of the form, worship me continuously with a dedicated mind. Those strong-willed devotees, constantly chanting My name and qualities, making efforts to attain Me, and paying obeisance to Me again and again, always concentrate on Me and worship Me with infinite love.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (15 – 16)

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥
अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
मन्त्रोऽहमहमेवाज्यम हमग्निरहं हुतम् ॥

हिंदी अर्थ – दुसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण – निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते है और दुसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरुप परमेश्वर की पृथक भाव से उपासना करते है| क्रतु मैं हूँ , यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मन्त्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ|

English Meaning – Other Gyan Yogis worship Me, the formless Brahma, in an integral sense, through the Gyan Yagya, and other human beings worship Me, the Supreme Being, the vast form situated in many ways, in a separate sense. I am Kratu, I am Yagya, I am Swadha, I am medicine, I am mantra, I am ghee, I am fire and I am also the ritual of Havan.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (17 – 18)

पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
वेद्यं पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च ॥
गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥

हिंदी अर्थ – इस सम्पूर्ण जगत का धाता अर्थात धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ| प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण – पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति – प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ|

English Meaning – I am the Dhāta of this entire world i.e. the bearer and the giver of the fruits of one’s actions, the father, the mother, the great grandfather, the knowable, the holy Omkar and also I am the Rigveda, Samveda and Yajurveda. The supreme abode attainable, the one who provides sustenance, the master of all, the seer of good and bad, the abode of all, worthy of taking refuge, the one who does good without seeking retribution, the origin of all – the cause of destruction, the basis of the situation, the foundation and also the imperishable cause. I am the one.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (19 – 20)

तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन ॥
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥

हिंदी अर्थ – मैं ही सुर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसता हूँ| हे अर्जुन ! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत – असत भी मैं ही हूँ| तीनों वेदों में विधान किये हुए सकाम कर्मो को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पापरहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते है, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलस्वरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते है|

English Meaning – I am the one who burns like the sun, attracts the rain and makes it rain. Hey Arjun! I am nectar and death and I am also true and false. Those men who perform fruitful actions as prescribed in the three Vedas, drink Soma Rasa, and are sinless (here, the god that hinders the attainment of heaven should be understood as being pure from sin in the form of debt) wish to attain heaven by worshipping me through Yagyas, those men, through their virtues, As a result of this, one reaches heaven and enjoys the pleasures of the divine gods in heaven.

भगवद गीता नवां अध्याय

भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (21 – 22)

ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

हिंदी अर्थ – वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते है| इस प्रकार स्वर्ग के साधन रूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार – बार आवागमन को प्राप्त होते है, अर्थात पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते है और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते है| जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते है, उन नित्य – निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ|

English Meaning – After enjoying that vast heaven, when their virtues diminish, they reach the world of death. In this way, the people who take refuge in the good deeds as mentioned in the three Vedas as a means to heaven and desire the pleasures, attain repeated transits, that is, due to the influence of virtue, they go to heaven and when their virtue diminishes, they come to the world of death. I myself attain the good fortune of those devoted devotees who constantly think about me and worship me selflessly, who think about me continuously.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (23 – 24)

येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥
अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दुसरे देवताओं को पूजते है, वे भी मुझको ही पूजते है, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात् अज्ञानपूर्वक है| क्योंकि सम्पूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परन्तु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से गिरते है अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते है|

English Meaning – Hey Arjun! Although the true devotees with faith who worship other gods, they also worship me, but their worship is unethical i.e. ignorantly. Because I am the enjoyer and master of all the Yagyas, but they do not know Me, the Supreme Lord, in essence, due to this they fall, that is, they are reborn.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (25 – 26)

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन् यान्ति पितृव्रताः ।
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम् ॥
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

हिंदी अर्थ – देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते है, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते है, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते है और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते है| इसलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता| जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र – पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ|

English Meaning – Those who worship the gods attain the gods, those who worship the ancestors attain the ancestors, those who worship the ghosts attain the ghosts and the devotees who worship me attain Me. That is why my devotees are not reborn. Any devotee who lovingly offers me a letter, flower, fruit, water, etc., that letter – Pushpadi – lovingly offered by that pure-minded selfless loving devotee, I appear in my sagun form and eat it with love.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (27 – 28)

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥
शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! तू जो कर्म करता है, जो खाता है, जो हवन करता है, जो दान देता है और जो ताप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर| इस प्रकार, जिसमे समस्त कर्म मुझ भगवान के अर्पण होते है – ऐसे संन्यासयोग से युक्त चित्तवाला तू शुभाशुभ फलस्वरूप कर्मबंधन से मुक्त हो जाएगा और उनसे मुक्त होकर मुझको ही प्राप्त होगा|

English Meaning – Hey Arjun! Whatever work you do, whatever you eat, whatever you perform, whatever you donate and whatever you do, offer it to me. In this way, in which all the deeds are offered to me, God – you, having a mind with such sannyasa yoga, will be freed from the bondage of good and bad deeds and after getting free from them, you will reach me only.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (29 – 30)

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥

हिंदी अर्थ – मैं सब भूतों में समभाव से व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परन्तु जो भक्त मुझको प्रेम से भजते है, वे मुझमे है और मैं भी उनमे प्रत्यक्ष (जैसे सूक्ष्म रूप से सब जगह व्यापक हुआ भी अग्नि साधनों द्वारा प्रकट करने से ही प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही सब जगह स्थित हुआ भी परमेश्वर भक्ति से भजने वाले के ही अन्तः करण में प्रत्यक्ष रूप से प्रकट होता है|) यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अनन्य भाव से मेरा भक्त होकर मुझको भजता है तो वह साधू ही मानने योग्य है,क्योंकि वह यथार्थ निश्चय वाला है| इसका मतलब उसने भली – भांति यह निश्चय कर लिया है कि परमेश्वर के भजन के समान अन्य कुछ भी नहीं है|

English Meaning – I am equally widespread among all the beings, neither is anyone unpleasant nor dear to me, but the devotees who worship me with love are in me and I too am visible in them (just as I am spread everywhere in a subtle form, I am also revealed through the means of fire). It becomes visible only by doing, similarly, God, who is present everywhere, is directly visible in the heart of the one who worships him with devotion.) If even a very evil person becomes my devotee and worships me with full devotion, then he is a saint. It is acceptable because it has true determination. This means that he has firmly decided that there is nothing else like the praises of God.

भगवद गीता नवां अध्याय

भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (31 – 32)

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रति जानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः ।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥

हिंदी अर्थ – वह शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा रहने वाली परम शांति को प्राप्त होता है| हे अर्जुन ! तू निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता| हे अर्जुन ! स्त्री, वैश्य, शुद्र तथा पापयोनि चांडालादि जो कोई भी हो, वे भी मेरे शरण होकर परमगति को ही प्राप्त होते है|

English Meaning – He soon becomes a righteous soul and attains eternal peace. Hey Arjun! Know the truth with certainty that my devotee never gets destroyed. Hey Arjun! Whoever is a woman, a Vaishya, a Shudra or a sinful person like Chandal, they also attain the ultimate path by taking refuge in me.


भगवद गीता नवां अध्याय श्लोक (33 – 34)

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः ॥

हिंदी अर्थ – फिर इसमें कहना ही क्या है, जो पुण्यशील ब्राह्मण था राजर्षि भक्तजन मेरी शरण होकर परमगति को प्राप्त होते है| इसलिए तू सुखरहित और क्षणभंगुर इस मनुष्य शरीर को प्राप्त होकर निरंतर मेरा ही भजन कर| मुझमे मन वाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो, मुझको प्रणाम कर| इस प्रकार आत्मा को मुझमे नियुक्त करके मेरे परायण होकर तू मुझको ही प्राप्त होगा|

English Meaning – Then what is there to say in this, the devotees of Rajarshi who were virtuous Brahmin attain supreme salvation by taking refuge in me. Therefore, after attaining this pleasureless and fleeting human body, worship me continuously. Be one who has my heart in mind, be my devotee, be one who worships me, pay obeisance to me. In this way, by appointing the soul in me and becoming my devotee, you will attain me only.


भगवद गीता नवां अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 8: भगवद गीता आठवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता आठवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 8) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता आठवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 8) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता आठवाँ अध्याय

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Chapter 8 – अक्षरब्रह्म योग (Akshara Brahma Yoga)


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (1 – 2)

अर्जुन उवाच
किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं कर्म पुरुषोत्तम ।
अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते ॥
अधियज्ञः कथं कोऽत्र देहेऽस्मिन्मधुसूदन ।
प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन ने कहा – हे पुरुषोत्तम ! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते है| हे मधुसूदन ! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते है|

English Meaning – Arjun said – Oh great man! What is that Brahma? What is spirituality? What is Karma? What is said by the name Adhibhuta and who is called Adhidaiva? Hey Madhusudan! Who is Adhiyagya here? And how is he in this body? And how do you come to know in the end time by people with intelligent minds?


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (3 – 4)

श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।
भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥
अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम् ।
अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर ॥

हिंदी अर्थ – श्रीभगवान ने कहा – परम अक्षर ‘ब्रह्म’ है, अपना स्वरुप अर्थात जीवात्मा ‘अध्यात्म’ नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह ‘कर्म’ नाम से कहा गया है| उत्पत्ति – विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत है, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, ब्रह्मा आदि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अंतर्यामी रूप से अधियज्ञ हूँ|

English Meaning – Shri Bhagwan said – The ultimate letter is ‘Brahm’, our own form i.e. the soul is called ‘Adhyatma’ and the renunciation that gives rise to the feeling of ghosts is called ‘Karma’. All things of the origin-destruction religion are possessed, the Hiranyamaya Purusha (who is called Sutratma, Hiranyagarbha, Brahma etc. in the scriptures) is the Adhidaiva and O Arjuna, the best among bodily beings! In this body, I am Vasudev, who is internally adhiyagya.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (5 – 6)

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम् ।
यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ॥
यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् ।
तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरुप को प्राप्त होता है – इसमें कुछ भी संशय नहीं है| हे कुन्ती पुत्र अर्जुन ! यह मनुष्य अन्तकाल में जिस – जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस – उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है|

English Meaning – The man who leaves his body remembering Me even in his last days, attains My true form – there is no doubt in this. Oh Arjun, son of Kunti! Whatever feeling this person remembers when he leaves his body in his last moments, he attains it only because he has always been feeling the same.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (7 – 8)

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च ।
मय्यर्पितमनोबुद्धि र्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥
अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना ।
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन् ॥

हिंदी अर्थ – इसलिए हे अर्जुन ! तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर| इस प्रकार मुझमे अर्पण किये हुए मन – बुद्धि से युक्त होकर तू नि: संदेह मुझको ही प्राप्त होगा| हे पार्थ ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है|

English Meaning – Therefore O Arjun! You remember me constantly at all times and also fight. In this way, with your mind and intellect surrendered to me, you will attain me without any doubt. Hey Parth! This is the rule that a person who continuously meditates with the mind engaged in the practice of meditating on God and not going anywhere else attains the Supreme Light in the form of the Divine Purusha i.e. God Himself.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (9 – 10)

कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः ।
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात् ॥
प्रयाणकाले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव ।
भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक् स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम् ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण – पोषण करने वाले अचिन्त्य – स्वरुप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है| वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल बे भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, उसके पश्चात निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है|

English Meaning – The man who remembers the Supreme Lord, who is the omniscient, eternal, controller of all, more subtle than even the subtle, unthinkable form who sustains and nurtures all, ever conscious light form like the sun and far beyond ignorance, pure Sachchidanandaghan God. Even in the last moments of life, that man with devotion, without the power of yoga, by properly establishing his life in the middle of the forehead and then remembering it with a calm mind, attains that divine form of the Supreme Being, the Supreme Soul.

भगवद गीता आठवाँ अध्याय

भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (11 – 12)

यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः ।
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च ।
मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम् ॥

हिंदी अर्थ – वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघन परम पद को अविनाश कहते है| आसक्ति रहित यत्नशील सन्यासी महात्माजन, जिसमे प्रवेश करते है और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते है, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा| सब इन्द्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश्य में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन के द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष ‘ॐ’ इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष गति को प्राप्त होता है|

English Meaning – The scholars who know the Vedas call the supreme position Sachchidanandaghan as indestructible. I will briefly describe for you the supreme state into which the ascetics who strive without attachment enter and the celibates who desire the supreme state practice celibacy. By closing the doors of all the senses and by fixing the mind in the heart, then by establishing the Prana in the head through that winning mind, and being situated in the yoga-dharana of God, the person who pronounces this one-syllable form of Brahma ‘Om’ and his The person who contemplates on me as the formless Brahman and leaves his body, attains the spiritual state.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (13 – 14)

ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् ।
यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम् ॥
अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः ।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष ‘ॐ’ इस एक अक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और मेरा स्मरण करता हुआ अपने शरीर का त्याग करता है, वह मनुष्य सदैव परम गति को प्राप्त होता है| हे अर्जुन ! जो पुरुष मुझमे अनन्य – चित्त होकर सदा ही निरंतर मुझ पुरुषोत्तम को स्मरण करता है, उस नित्य – निरंतर मुझमे युक्त हुए योगी के लिए मैं सुलभ हूँ अर्थात उसे सहज ही प्राप्त हो जाता हूँ|

English Meaning – The person who leaves his body while reciting this one syllable Brahma and remembering me, ‘Om’, that person always attains the supreme state. Hey Arjun! I am easily accessible to the yogi who always remembers Me, the Supreme Being, with a constant mind in Me, that is, I can be easily attained by him.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (15 – 16)

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम् ।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥
आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन ।
मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥

हिंदी अर्थ – परम सिद्धि को प्राप्त महात्माजन मुझको प्राप्त होकर दु:खो के घर एवं क्षणभंगुर पुनर्जन्म को नहीं प्राप्त होंगे| हे अर्जुन ! ब्रह्मलोकपर्यंत सब लोक पुनरावर्ती है, परन्तु हे कुन्तीपुत्र ! मुझको प्राप्त होकर पुनर्जन्म नहीं होता, क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य है|

English Meaning – The great souls who have attained supreme success, after attaining me, will not go to the house of sorrows and fleeting rebirth. Hey Arjun! All the worlds are recurring till Brahmaloka, but oh son of Kunti! There is no rebirth after attaining me because I am timeless and all these are impermanent due to being limited by the worldly time of Brahmadi.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (17 – 18)

सहस्रयुगपर्यन्त महर्यद्ब्रह्मणो विदुः ।
रात्रिं युगसहस्रान्तां तेऽहोरात्रविदो जनाः ॥
अव्यक्ताद्व्यक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।
रात्र्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके ॥

हिंदी अर्थ – ब्रह्मा का जो एक दिन है, उसको एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला और रात्रि को भी एक हजार चतुर्युगी तक की अवधि वाला जो पुरुष तत्व से जानते है, वे योगीजन काल के तत्व को जानने वाले है| सम्पूर्ण चराचर भूतगण ब्रह्मा के दिन के प्रवेश काल में अव्यक्त से अर्थात ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर से उत्पन्न होते है और ब्रह्मा की रात्रि के प्रवेशकाल में उस अव्यक्त नामक ब्रह्मा के सूक्ष्म शरीर में ही लीन हो जाते है|

English Meaning – Those who know the essence of Brahma’s day, which lasts for one thousand Chaturyugas and the night also lasts for one thousand Chaturyugas, are the Yogis who know the essence of Kaal. All living beings are born from the subtle body of Brahma during the entry of Brahma’s day and merge into the subtle body of Brahma called Avyakt during the entry of Brahma’s night.

भगवद गीता आठवाँ अध्याय

भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (19 – 20)

भूतग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते ।
रात्र्यागमेऽवशः पार्थ प्रभवत्यहरागमे ॥
परस्तस्मात्तु भावोऽन्यो ऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
यः स सर्वेषु भूतेषु नश्यत्सु न विनश्यति ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! वही यह भूतसमुदाय उत्पन्न होकर प्रकृति वश में हुआ रात्रि के प्रवेश काल में लीन होता है और दिन के प्रवेश काल में फिर उत्पन्न होता है| उस अव्यक्त से भी अति परे दूसरा अर्थात विलक्षण जो सनातन अव्यक्त भाव है, वह परम दिव्य पुरुष सब भूतों के नष्ट होने पर भी नष्ट नही होता|

English Meaning – Hey Parth! This ghost group, after being born under the control of nature, gets absorbed at the time of the entry of night and is born again at the time of the entry of the day. Beyond that unmanifested person, the other i.e. unique eternal unmanifested feeling, that supreme divine man, does not get destroyed even after the destruction of all the ghosts.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (21 – 22)

अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस् तमाहुः परमां गतिम् ।
यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥
पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥

हिंदी अर्थ – जो अव्यक्त ‘अक्षर’ इस नाम से कहा गया है, उसी अक्षर नामक अव्यक्त भाव को परमगति कहते है तथा जिस सनातन अव्यक्त भाव को प्राप्त होकर मनुष्य वापस नही आते, वह मेरा परम धाम है| हे पार्थ ! जिस परमात्मा के अंतर्गत सर्वभूत है और जिस सच्चिदानन्दघन परमात्मा से यह समस्त जगत परिपूर्ण है, वह सनातन अव्यक्त परम पुरुष तो अनन्य भक्ति से ही प्राप्त होने योग्य है|

English Meaning – The unexpressed ‘letter’ which is called by this name, the unexpressed feeling called the same letter is called Paramgati and the eternal unexpressed feeling after attaining which humans do not return, is my supreme abode. Hey Parth! The God under whom everything exists and with whom the entire world is filled with the true God, that eternal unmanifested Supreme Being is attainable only through undivided devotion.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (23 – 24)

यत्र काले त्वनावृत्ति मावृत्तिं चैव योगिनः ।
प्रयाता यान्ति तं कालं वक्ष्यामि भरतर्षभ ॥
अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जिस काल में शरीर त्यागकर गए हुए योगीजन तो वापस न लौटने वाली गति को और जिस काल में गए हुए वापिस लौटने वाली गति को ही प्राप्त होते है, उस काल को अर्थात दोनों मार्गों को कहूँगा| जिस मार्ग में ज्योतिर्मय अग्नि – अभिमानी देवता है, दिन का अभिमानी देवता है, शुक्ल पक्ष का अभिमानी देवता है और उत्तरायण के छ: महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गए हुए ब्रह्मवेत्ता योगीजन उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले जाए जाकर ब्रह्म को प्राप्त होते है|

English Meaning – Hey Arjun! The period in which the yogis who have left their body attain the path of no return and the period in which the departed attain only the path of return, that is, I will call both the paths. On the path in which there is a proud deity of the light of fire, a proud deity of the day, a proud deity of the Shukla Paksha and a proud deity of the six months of Uttarayan, the Brahmaveta yogis who died on that path are taken to Brahma in sequence by the appropriate deities. are received.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (25 – 26)

धूमो रात्रिस्तथा कृष्णः षण्मासा दक्षिणायनम् ।
तत्र चान्द्रमसं ज्योतिर्योगी प्राप्य निवर्तते ॥
शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्ति मन्ययावर्तते पुनः ॥

हिंदी अर्थ – जिस मार्ग धूमाभिमानी देवता है, रात्रि अभिमानी देवता है तथा कृष्ण पक्ष का अभिमानी देवता है और दक्षिणायन के छ: महीनों का अभिमानी देवता है, उस मार्ग में मरकर गया हुआ सकाम कर्म करने वाला योगी उपयुक्त देवताओं द्वारा क्रम से ले गया हुआ चंद्रमा की ज्योत को प्राप्त होकर स्वर्ग में अपने शुभ कर्मों का फल भोगकर वापिस आता है| क्योंकि जगत के ये दो प्रकार के – शुक्ल और कृष्ण अर्थात देवयान और पितृयान मार्ग सनातन माने गए है| इनमे एक द्वारा गया हुआ – जिससे वापस नहीं लौटना पड़ता, उस परमगति को प्राप्त होता है और दूसरे के द्वारा गया हुआ पुनः वापस है अर्थात जन्म – मृत्यु को प्राप्त होता है|

English Meaning – On the path in which there is a proud god of smoke, a proud god of night, a proud god of Krishna Paksha and a proud god of the six months of Dakshinayan, the yogi who performed fruitful deeds after dying in that path, is carried by the appropriate deities in order of the light of the moon. After achieving this, he returns to heaven after enjoying the fruits of his good deeds. Because these two types of world – Shukla and Krishna i.e. Devyaan and Pitriyan paths are considered eternal. Among these, one who has gone through one – from which there is no need to return, attains the supreme state and one who has gone through the other one has to return again, that is, one attains birth and death.

भगवद गीता आठवाँ अध्याय

भगवद गीता आठवाँ अध्याय श्लोक (27 – 28)

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन ।
तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन ॥
वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत् पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।
अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! इस प्रकार इन दोनों मार्गों को तत्त्व से जानकर कोई भी योगी मोहित नहीं होता| इस कारण हे अर्जुन ! तू सब काल में समबुद्धि रूप से योग से युक्त हो अर्थात निरंतर मेरी प्राप्ति के लिए साधन करने वाला हो| योगी पुरुष इस रहस्य को तत्त्व से जानकर वेदों के पढने में तथा यज्ञ, तप और दानादि के करने में जो पुण्यफल कहा है, उन सबको नि:संदेह उल्लंघन कर जाता है और सनातन परम पद को प्राप्त होता है|

English Meaning – Hey Parth! In this way, no yogi gets deluded by knowing these two paths from their essence. For this reason O Arjun! You should be equanimous in yoga at all times, that is, you should be constantly making efforts for my attainment. Knowing this secret from its essence, a yogi person undoubtedly violates all the virtuous results mentioned in reading the Vedas and doing yagya, penance charity etc. and attains the eternal supreme position.


भगवद गीता आठवाँ अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 7: भगवद गीता सातवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे|

जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता सातवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 7) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी|

आज हम भगवद गीता सातवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 7) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता सातवाँ अध्याय

इसके आलवा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja), विवाह पूजा (Marriage Puja), तथा ऑफिस उद्घाटन पूजा (Office Opening Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

Chapter 7 – ज्ञानविज्ञान योग (The Yoga of Knowledge and Realization)


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (1 – 2)

श्रीभगवानुवाच मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः ।
असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ॥
ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः ।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥

हिंदी अर्थ – श्रीभगवान बोले – हे पार्थ ! अनन्य प्रेम से मुझमे आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगे हुए तुम जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादी गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानोगे, उसको सुनो| मैं तुम्हारे लिए इस विज्ञान सहित तत्व ज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता|

English Meaning – Lord Shri said – O Partha! Listen to the way you, with your mind attached to me with unalloyed love and devoted to me with unalloyed feelings, engaged in yoga, will know me without any doubt as the soul of all, full of all glory, power and opulent qualities. I will tell you the complete knowledge of elements including this science, knowing that nothing else is left worth knowing in the world.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (3 – 4)

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

हिंदी अर्थ – हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप में जानता है| पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार – इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है| यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा अर्थात मेरी जड़ प्रकृति है और हे महाबाहो ! इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति जानों|

English Meaning – Among thousands of human beings, one strives to attain me and among those yogis who strive, one becomes devoted to me and knows me in essence i.e. in its true form. Earth, water, fire, air, sky, mind, intellect and ego – this is my nature divided into eight types. This is the Apara i.e. my inanimate nature with eight types of secrets and O mighty-armed one! Know the second one from whom this entire world is sustained, my living form Para i.e. conscious nature.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (5 – 6)

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥

हिंदी अर्थ – यह अपरा (प्रकृति) है; परन्तु हे महाबाहो, तुम इससे भिन्न मेरी श्रेष्ठ प्रकृति, उसी प्राण को जानो, जिसके द्वारा यह ब्रह्माण्ड कायम है। हे अर्जुन ! तुम ऐसा समझो कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले है और मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात सम्पूर्ण जगत का मूल कारण हूँ|

English Meaning – This is Apara (nature); But oh mighty-armed one, know my superior nature other than this, the same Prana by which this universe exists. Hey Arjun! You should understand that the entire existence is going to arise from these two natures only and I am the origin and destruction of the entire world, that is, I am the root cause of the entire world.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (7 – 8)

मत्तः परतरं नान्य त्किंचिदस्ति धनंजय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः ।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥

हिंदी अर्थ – हे धनंजय ! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है| यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों सदृश मुझमे गुंथा हुआ है| हे अर्जुन ! मैं जल मे रस हूँ, चंद्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द तथा पुरुषों में पुरुषत्व हूँ|

English Meaning – Hey Dhananjay! There is no ultimate cause other than me. This entire world is woven into me like the beads of a sutra. Hey Arjun! I am juice in water, light in the moon and sun, Omkar in the entire Vedas, sound in the sky and manhood in men.

भगवद गीता सातवाँ अध्याय

भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (9 – 10)

पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ ।
जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु ॥
बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम् ।
बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् ॥

हिंदी अर्थ – मैं पृथ्वी में पवित्र (शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, से इस प्रसंग में इनके कारण रूप तन्मात्राओं का ग्रहण है, इस बात को स्पष्ट करने के लिए उनके साथ पवित्र शब्द जोड़ा गया है|) गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ| हे अर्जुन ! तुम सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जानो| मैं बुद्धिमानो की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ|

English Meaning – I am holy in the earth (from a word, touch, form, taste, smell, in this context the reason for this is the eclipse of forms and Tanmatras, the word holy has been added to them to make this clear) I am sharp in smell and fire and I am their life in all the ghosts and I am their penance in the ascetics. Hey Arjun! You know me only as the eternal seed of all beings. I am the wisdom of the intelligent and the brilliance of the brilliant.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (11 – 12)

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम् ।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥
ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्च ये ।
मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि ॥

हिंदी अर्थ – हे भरतश्रेष्ठ ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूँ और सब भूतों के धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र के अनुकूल काम हूँ| और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव है और जो रजो गुण से होने वाले भाव है, उन सबको तुम ‘मुझसे ही होने वाले है’ ऐसा जानो, परन्तु वास्तव में उनमे मैं और वे मुझमे नहीं है|

English Meaning – Oh great Bharat! I am the strength, that is, the power, of the strong, free from attachment and desires, and my work is according to the religion of all the ghosts, that is, according to the scriptures. Moreover, the feelings arising from Sattva guna and the feelings arising from Rajo guna, you should know all of them as ‘coming from me only’, but in reality, I am not in them and they are not in me.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (13 – 14)

त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत् ।
मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम् ॥
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥

हिंदी अर्थ – गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस – इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार – प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता क्योंकि यह आलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते है, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते है अर्थात संसार से तर जाते है|

English Meaning – The whole world – the living community – is fascinated by these three types of emotions – Sattvik, Rajas and Tamas, the working forms of the Gunas; therefore, beyond these three Gunas, they do not know the imperishable Me because this supernatural i.e. very wonderful threefold Maya of mine is very difficult, But those people who continuously worship only Me, they violate this illusion, that is, they escape from the world.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (15 – 16)

न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः ।
माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः ॥
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥

हिंदी अर्थ – माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर – स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते| हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम करने वाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी – ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते है|

English Meaning – Those whose knowledge has been defeated by Maya, those possessing demonic nature, those foolish people who perform mean and impure actions among human beings, do not worship me. O Arjun, the best of the Bharatas! Those who do good, the well-meaning, the art, the curious and the knowledgeable – such four types of devotees worship me.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (17 – 18)

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते ।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् ।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥

हिंदी अर्थ – उनमे नित्य मुझमे एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्त्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यंत प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझ अत्यंत प्रिय है| ये सभी उदार है, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात् मेरा स्वरुप ही है – ऐसा मेरा मत है क्योंकि वह मद्गत मन – बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमे ही अच्छी प्रकार स्थित है|

English Meaning – Among them, the knowledgeable devotee who is constantly united with Me and has undivided love and devotion is the best because I am very dear to the knowledgeable person who knows Me in essence and that knowledgeable devotee is very dear to Me. All of them are generous, but the knowledgeable person is actually my form – this is my opinion because that knowledgeable devotee with an intoxicated mind and intellect is well established in me in the form of the best form of movement.

भगवद गीता सातवाँ अध्याय

भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (19 – 20)

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥
कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः ।
तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया ॥

हिंदी अर्थ – बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही है – इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यंत दुर्लभ है| उन – उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस – उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते है अर्थात पूजते है|

English Meaning – The man who has attained the knowledge of elements in the last birth of many births, everything is Vasudev – he worships me in this way, that Mahatma is extremely rare. Those people whose knowledge has been defeated by the desire of those pleasures, inspired by their nature, follow those rules and worship other gods.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (21 – 22)

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति ।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते ।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् ॥

हिंदी अर्थ – जो – जो सकाम भक्त जिस – जिस देवता के स्वरुप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस – उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ| वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को नि:संदेह प्राप्त करता है|

English Meaning – Whichever form of deity the Sakam devotee wants to worship with devotion, I establish the faith of that devotee towards that deity. That man, filled with that faith, worships that deity and without any doubt, receives from that deity the desired pleasures prescribed by me.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (23 – 24)

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम् ।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥

हिंदी अर्थ – परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान होता है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते है और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजे, अंत में वे मुझको ही प्राप्त होते है| बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन – इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानंदघन परमात्मा को मनुष्य की भांति जन्म कर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते है|

English Meaning – But the fruit of those people with less intelligence is perishable and they are obtained by the gods who worship the gods and no matter how my devotees worship, in the end, they are obtained by me only. The unintelligent people, not knowing about my supreme imperishable Supreme Being, believe that I, the Sachchidanandaghan Supreme Soul, who is beyond the mind and senses, have attained the individual form by being born like a human being.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (25 – 26)

नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ।
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ॥
वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन ।
भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन ॥

हिंदी अर्थ – अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने – मरने वाला समझता है| हे अर्जुन ! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा – भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता|

English Meaning – I, hidden from my Yogamaya, am not visible to everyone, that is why this ignorant community does not know me as the birthless, imperishable God, that is, they consider me to be one who takes birth and dies. Hey Arjun! I know all the past and present and future ghosts, but no man without faith knows me.

भगवद गीता सातवाँ अध्याय

भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (27 – 28)

इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत ।
सर्वभूतानि संमोहं सर्गे यान्ति परन्तप ॥
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥

हिंदी अर्थ – हे भरतवंशी अर्जुन ! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख – दुखादि द्वंद्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे है| परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे रोग – द्वेषजनित द्वंद्व रूप मोह से मुक्त दृढनिश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते है|

English Meaning – O Arjun of Bharatvanshi! In this world, due to the attachment to the duality of happiness and sorrow arising from desire and hatred, all living beings are falling into extreme ignorance. But those people who have selflessly performed noble deeds and whose sins have been destroyed, those determined devotees who are free from attachment, disease and hatred, worship me in every way.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय श्लोक (29 – 30)

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥
साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः ।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः ॥

हिंदी अर्थ – जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते है, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते है| जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव सहित तथा अधियज्ञ सहित मुझे अन्तकाल में भी जानते है, वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते है अर्थात प्राप्त हो जाते है|

English Meaning – Those who take refuge in me and try to escape from death, those people know that Brahma, complete spirituality, complete action. Those men who know me along with Adhibhuta and Adhidaiva and also in the end times along with Adhiyagya, those men with yukta mind know me i.e. they attain me.


भगवद गीता सातवाँ अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 6: भगवद गीता छठवां अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे|

जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता छठवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 6) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी|

आज हम भगवद गीता छठवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 6) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

Bhagavad Gita Chapter 6

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Chapter 6 – आत्मसंयम योग (The Yoga Of Meditation)


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (1 – 2)

श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥
यं संन्यासमिति प्राहु र्योगं तं विद्धि पाण्डव।
न ह्यसंन्यस्तसंकल्पो योगी भवति कश्चन॥

हिंदी अर्थ – भगवान श्रीकृष्ण कहते है – जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह सन्यासी और योगी है न कि अग्नि या क्रियाओं का त्याग करने वाला| हे अर्जुन ! जिसको संन्यास कहते है, उसी को तुम योग जानो क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता|

English Meaning – Lord Shri Krishna says – The man who does worthy deeds without taking recourse to the fruits of his actions is a Sanyasi and a Yogi and not one who renounces fire or actions. Hey Arjun! You should know that it is called Sannyasa Yoga because no person who does not give up his resolutions is a Yogi.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (3 – 4)

आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥
यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते।
सर्वसंकल्पसंन्यासी योगारूढस्तदोच्यते॥

हिंदी अर्थ – योग में स्थित होने की इच्छा वाले मुनि के लिए योग की प्राप्ति में कर्म करना ही कारण कहा जाता है और योग में स्थित हो जाने पर उन संकल्पों का शांत हो जाना ही उसके कल्याण में कारण कहा जाता है| जिस काल में वह न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सभी संकल्पों के त्यागी पुरुष को योग में स्थित कहा जाता है|

English Meaning – For a sage who wishes to be established in Yoga, performing actions to attain Yoga is said to be the reason and after becoming established in Yoga, the calming of those resolutions is said to be the reason for his welfare. During the period when he is neither attached to the pleasures of the senses nor to the actions, a person who has renounced all resolutions is said to be situated in Yoga.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (5 – 6)

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धु रात्मैव रिपुरात्मनः॥
बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्॥

हिंदी अर्थ – अपने विवेक युक्त मन द्वारा अपना उद्धार करे और अपने को अधोगति ने न डाले क्योंकि यह मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है| जिस जीवात्मा द्वारा स्वयं को जीता हुआ, वह जीवात्मा स्वयं का मित्र है और जिसके द्वारा अपना मन नही जीता गया है, उसके लिए वह शत्रु के सदृश ही आचरण करता है|

English Meaning – Save yourself with your wise mind and do not let yourself fall into degradation because this man is his own friend and his own enemy. The soul by which it has conquered itself is its own friend and for the one whose mind has not been conquered, it behaves like an enemy.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (7 – 8)

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः॥

हिंदी अर्थ – सर्दी – गर्मी, सुख – दुःख और मान – अपमान में जिसने स्वयं को जीता हुआ है, ऐसा पुरुष परमात्मा में सम्यक प्रकार से स्थित है| जो ज्ञान आत्म अनुभव रूपी विज्ञान से तृप्त है, विकाररहित है, इन्द्रियों को जीत चुका है और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण समान है, ऐसे योगी को युक्त कहा जाता है|

English Meaning – The person who has conquered himself in cold-heat, happiness-sorrow and honour-insult, such a person is properly situated in God. The yogi who is satisfied with the knowledge of self-experience, is free from disorders, has conquered the senses and for whom soil, stone and gold are equal, such a yogi is called Yukt.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (9 – 10)

सुहृन्मित्रार्युदासीन मध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
योगी युञ्जीत सततमा त्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥

हिंदी अर्थ – सुहृद, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य, बन्धु, धर्मात्मा और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यंत श्रेष्ठ है| मन को अपने वश में रखते हुए, आशा और संग्रह रहित होकर योगी अकेले ही मन को स्वयं में लगाए|

English Meaning – The one who has equal feelings among benefactors, friends, enemies, indifferent, mediator, haters, friends, righteous people and sinners is extremely superior. Keeping the mind under his control, without hope and accumulation, the Yogi concentrates his mind on himself alone.

Bhagavad Gita Chapter 6

Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (11 – 12)

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्॥
तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्या द्योगमात्मविशुद्धये॥

हिंदी अर्थ – पवित्र स्थान से, क्रमशः कुशा, मृगचर्म और वस्त्र से बने स्थिर आसन की स्थापना कर, जो न अधिक ऊँचा है और न ही अधिक नीचा| वहां मन को एकाग्र करके, चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए आसन पर बैठे और अंत:करण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे|

English Meaning – From the sacred place, establish a stable seat made of Kusha, deerskin and cloth respectively, which is neither too high nor too low. There, concentrating the mind, keeping the activities of the mind and senses under control, sitting on the asana and practice yoga to purify the conscience.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (13 – 14)

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्॥
प्रशान्तात्मा विगतभी र्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः।
मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥

हिंदी अर्थ – शरीर, सर और गले को सीधा और स्थिर रखते हुए, अपनी नासिका के अग्रभाग को देखते हुए व अन्य दिशाओं को न देखते हुए| शांत मन वाला, भयरहित, ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित , मन को संयम में रखते हुए योगी मुझ में चित्त वाला होकर स्थित रहे|

English Meaning – Keeping the body, head and neck straight and steady, looking at the tip of your nose and not looking at other directions. The yogi with a calm mind, without fear, in the vow of celibacy, keeping the mind under control, should remain focused on me.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (15 – 16)

युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥

हिंदी अर्थ – नियंत्रित मन वाला योगी इस प्रकार मन को निरंतर मुझ में लगाता हुआ परम आनंद रूपी शांति को प्राप्त होता है| हे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खाने वाले का, न बिल्कुल न खाने वाले का, न अधिक शयन करने वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है|

English Meaning – A Yogi with a controlled mind, thus continuously concentrating his mind on Me, attains peace in the form of supreme bliss. Hey Arjun! This yoga is proved neither for the one who eats too much, nor for the one who does not eat at all, nor for the one who sleeps too much, nor for the one who is always awake.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (17 – 18)

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥
यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते।
निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥

हिंदी अर्थ – दुखों का नाश करने वाला यह योग सम्यक आहार – विहार करने वाले का, कर्मों में सम्यक चेष्टा करने वाले का और सम्यक प्रकार से सोने और जागने वाले का ही सिद्ध होता है| जब नियंत्रित किया हुआ चित्त आत्मा में ही स्थिर हो जाता है, तब सभी भोगों में इच्छा से रहित पुरुष को योगयुक्त कहा जाता है|

English Meaning – This yoga that destroys sorrows is achieved only by the one who eats right, makes the right efforts in his actions and sleeps and wakes up in the right way. When the controlled mind becomes fixed in the soul itself, then the man who is free from desire in all enjoyments is said to be in Yogayukt.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (19 – 20)

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥
यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥

हिंदी अर्थ – जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखे दीपक की ज्योति अचल रहती है, वैसी ही उपमा आत्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के नियंत्रित चित्त की कही गई है| योग के अभ्यास से नियंत्रित चित्त जिस स्थिति में शांत हो जाता है और आत्मा के ध्यान द्वारा आत्मा को देखता हुआ स्वयं में ही संतुष्ट रहता है|

English Meaning – Just as the light of a lamp kept in an airless place remains stable, the same analogy has been given of the controlled mind of a yogi engaged in meditation on the soul. The state in which the controlled mind becomes calm through the practice of Yoga remains satisfied with itself while looking at the soul through meditation on the soul.

Bhagavad Gita Chapter 6

Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (21 – 22)

सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥

हिंदी अर्थ – इन्द्रियों से परे, केवल शुद्ध व सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य अनन्त आनंद को अनुभव कर यह योगी आत्मा के स्वरुप से विचलित नहीं होता है| जिस लाभ को प्राप्त होकर उससे अधिक दूसरा कोई लाभ नहीं मानता और जिस स्थिति में योगी बड़े से बड़े दुःख से भी दुखी नहीं होता|

English Meaning – Experiencing infinite bliss beyond the senses, capable of being grasped only by the pure and subtle intellect, this Yogi does not deviate from the nature of the soul. The benefit which one attains is not considered greater than any other benefit and in such a situation the Yogi does not feel sad even with the biggest sorrow.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (23 – 24)

तं विद्याद्‌दुःखसंयोग वियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥
संकल्पप्रभवान् कामांस् त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥

हिंदी अर्थ – जिसे जानकर दुःख रूपी संसार से वियोग हो जाता है, उस योग नाम वाली स्थिति को जानना चाहिए| वह योग उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करने योग्य है| संकल्प से उत्पन्न होने वाली सभी कामनाओं को पूरी तरह से छोड़कर, मन द्वारा इन्द्रिय समूह को सम्यक् प्रकार से रोककर |

English Meaning – Knowing which one gets separated from the world of sorrow, one should know that state called Yoga. That yoga is worth doing with determination with an enthusiastic mind. By completely giving up all the desires arising from the will, by properly restraining the group of senses through the mind.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (25 – 26)

शनैः शनैरुपरमेद्‌ बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्॥
यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदा त्मन्येव वशं नयेत्॥

हिंदी अर्थ – धीरे – धीरे बुद्धि को शांत करते हुए, धैर्य पूर्वक मन को आत्मा में स्थित करते हुए कुछ भी विचार न करे| स्थिर न रहने वाला, यह चंचल मन जिस – जिस शब्दादि विषय में विचरता है, उस – उस विषय से इसे हटाकर बार – बार आत्मा में ही स्थित करे|

English Meaning – Slowly calm the mind, patiently settle the mind in the soul and do not think about anything. This fickle mind, which does not remain stable, should remove it from every wordy subject on which it wanders, and place it in the soul again and again.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (27 – 28)

प्रशान्तमनसं ह्येनं योगिनं सुखमुत्तमम्।
उपैति शान्तरजसं ब्रह्मभूतमकल्मषम्॥
युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी विगतकल्मषः।
सुखेन ब्रह्मसंस्पर्शम त्यन्तं सुखमश्नुते॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि जिसका मन सम्यक रूप से शांत है, जो पाप से रहित है और जिसका रजोगुण शांत हो गया है, ऐसा योगी ब्रह्म के साथ एकत्व अनुभव कर उत्तम आनंद को प्राप्त होता है| वह निष्पाप योगी इस प्रकार मन को निरंतर आत्मा में लगाते हुए सुख से परब्रह्म की अनुभूति करते हुए अति आनंद प्राप्त करता है|

English Meaning – Because the yogi whose mind is properly calm, who is free from sin and whose passion has calmed down, experiences oneness with Brahma and attains supreme bliss. That sinless yogi thus continuously concentrating his mind on the soul, experiences the Supreme Being with pleasure and attains extreme happiness.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (29 – 30)

सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
यो मां पश्यति सर्वत्र सर्वं च मयि पश्यति।
तस्याहं न प्रणश्यामि स च मे न प्रणश्यति॥

हिंदी अर्थ – सर्वत्र समान भाव वाला और योग से युक्त आत्मा वाला योगी आत्मा को सभी भूतों में स्थित और सभी भूतों को आत्मा में देखता है| जो पुरुष सभी भूतों में मुझे (वासुदेव को) व्यापक देखता है और सभी भूतों को मुझमे देखता है, उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता और वह मेरे लिए अदृश्य नहीं होता|

English Meaning – A yogi with equal feelings everywhere and a soul full of yoga sees the soul present in all beings and all the beings in the soul. The man who sees me (Vasudev) as omnipresent in all the ghosts and sees all the ghosts in me, I am not invisible to him and he is not invisible to me.

Bhagavad Gita Chapter 6

Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (31 – 32)

सर्वभूतस्थितं यो मां भजत्येकत्वमास्थितः।
सर्वथा वर्तमानोऽपि स योगी मयि वर्तते॥
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन ।
सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष एकत्व में स्थित होकर सभी भूतों में आत्मरूप से स्थित मुझ वासुदेव को भजता है, वह योगी सब प्रकार से कर्म करता हुआ भी मुझमे ही विद्यमान है| हे अर्जुन ! जो योगी अपनी आत्मा जैसे सभी भूतों को समान देखता है और सुख या दुःख को भी सभी भूतों में समान देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है|

English Meaning – The man who worships me, Vasudev, who is situated in oneness and is present in the form of my soul in all the beings, is a yogi who is present in me even while doing all kinds of work. Hey Arjun! The yogi who sees all the beings like his soul as equal and also sees happiness or sorrow as equal in all the beings, is considered to be the best yogi.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (33 – 34)

अर्जुन उवाच
योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
एतस्याहं न पश्यामि चञ्चलत्वात्स्थितिं स्थिराम्॥
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्‌दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम्॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन कहते है – हे मधुसूदन ! जो यह योग आपने सम भाव से कहा, मन के चंचल होने से मैं इसकी नित्य स्थिति को नहीं देखता हूँ| क्योंकि हे श्रीकृष्ण ! यह मन बड़ा चंचल, क्षोभ युक्त स्वभाव वाला, बड़ा दृढ और बलवान है, इसलिए उसको वश में करना मैं वायु को रोकने की भांति अत्यंत कठिन मानता हूँ|

English Meaning – Arjun says – O Madhusudan! You said this Yoga with equanimity, due to my fickle mind I do not see its daily state. Because O Shri Krishna! This mind is very fickle, short-tempered, very determined and strong, hence I consider it to be extremely difficult to control it, like controlling the wind.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (35 – 36)

श्रीभगवानुवाच असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥
असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान कहते है – हे महाबाहो ! नि:संदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है परन्तु हे कुंतीपुत्र अर्जुन ! यह अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है| जिसका मन वश में किया हुआ नहीं है, ऐसे पुरुष द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है और वश में किए हुए मन वाले प्रयत्नशील पुरुष द्वारा उसका प्राप्त होना सहज है – यह मेरा मत है|

English Meaning – Shri Bhagwan says – O mighty-armed one! Undoubtedly the mind is fickle and difficult to control, but O Arjun, son of Kunti! It is controlled by practice and renunciation. It is difficult for a man whose mind is not under control to attain Yoga and it is easy for a man who makes efforts and has a controlled mind to attain it – this is my opinion.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (37 – 38)

अर्जुन उवाच
अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति॥
कच्चिन्नोभयविभ्रष्ट श्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन कहते है – हे श्रीकृष्ण ! जो योग में श्रद्धा रखने वाला है, किन्तु उसके अभ्यास से रहित है, इस कारण योग में विचलित मन वाला साधक योग की सिद्धि न प्राप्त होकर किस गति को प्राप्त होता है? हे महाबाहो ! भगवत्प्राप्ति के मार्ग के मोह वाला वह आश्रयरहित पुरुष कहीं छिन्न – भिन्न बादल की भांति दोनों ओर से भ्रष्ट होकर नष्ट तो नही हो जाता?

English Meaning – Arjun says – O Shri Krishna! A seeker who has faith in Yoga but is devoid of its practice, hence whose mind is distracted in Yoga, does not attain the Siddhi of Yoga, what speed does he attain? O great-armed one! Doesn’t that shelterless man, who is attached to the path of attaining God, get corrupted from both sides like a scattered cloud and gets destroyed?


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (39 – 40)

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते॥
श्रीभगवानुवाच पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
न हि कल्याणकृत्कश्चिद्‌ दुर्गतिं तात गच्छति॥

हिंदी अर्थ – हे श्रीकृष्ण ! मेरे इस संशय को पूरी तरह से दूर करने में आप योग्य है क्योंकि आपके अतिरिक्त दूसरा कोई इस संशय को दूर करने में समर्थ नहीं है| श्री भगवान कहते है – हे पार्थ ! उस पुरुष का न तो इस लोक में नाश होता है और न परलोक में ही| क्योंकि हे प्रिय ! आत्मोद्धार के लिए कर्म करने वाला कोई भी मनुष्य दुर्गति को प्राप्त नहीं होता|

English Meaning – Hey Shri Krishna! You are capable of completely removing this doubt of mine because no one else except you is capable of removing this doubt. Shri Bhagwan says – O Partha! That man neither perishes in this world nor in the next world. Because oh dear! Any person who works for self-liberation does not attain misery.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (41 – 42)

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानु षित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते॥
अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥

हिंदी अर्थ – योगभ्रष्ट पुरुष पुण्यवानों के लोकों को प्राप्त होकर, उनमे बहुत वर्षों तक निवास करके फिर शुद्ध आचरण वाले श्रीमान पुरुषों के घर में जन्म लेता है अथवा वैराग्यवान पुरुष उन लोकों में न जाकर योगियों के ही कुल में जन्म लेता है, परन्तु इस प्रकार का जन्म संसार में नि:संदेह अत्यंत दुर्लभ हैं|

English Meaning – A man who has lost his yoga after reaching the worlds of virtuous people, resides in them for many years and then takes birth in the family of virtuous people or a man who is recluse, instead of going to those worlds, takes birth in a family of yogis only, but this type of birth is not in the world. are undoubtedly extremely rare.

Bhagavad Gita Chapter 6

Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (43 – 44)

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन॥
पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥

हिंदी अर्थ – वहां उस पहले शरीर में अर्जित की हुई बुद्धि के योग को अनायास ही प्राप्त हो जाता है और हे कुरुनन्दन ! उसके प्रभाव से वह सिद्धि के लिए पहले से भी बढ़कर प्रयत्न करता है| वह (योगभ्रष्ट) पराधीन हुआ सा उस पहले के अभ्यास से ही नि:संदेह योग की ओर आकर्षित किया जाता है| योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए कर्मों के फल को पार कर जाता है|

English Meaning – There the yoga of intelligence acquired in that first body is attained effortlessly and O Kurunandan! Due to its influence, he tries harder than before to achieve success. It is as if he (the corrupt person of Yoga) has become enslaved and is undoubtedly attracted towards Yoga because of that earlier practice. An aspirant of Yoga also transcends the consequences of his actions as stated in the Vedas.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (45 – 46)

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम्॥
तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः।
कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन॥

हिंदी अर्थ – प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी पिछले अनेक जन्मों के संस्कारों से इसी जन्म में संसिद्ध हो, सभी पापों से रहित होकर शीघ्र ही परमगति को प्राप्त हो जाता है| योगी तपस्वियों से श्रेष्ठ है, शास्त्रज्ञानियों से भी श्रेष्ठ माना गया है और कर्म करने वालों से भी योगी श्रेष्ठ है| इसलिए हे अर्जुन ! तुम योगी हो जाओ|

English Meaning – A Yogi who practices diligently becomes perfect in this very birth through the sanskars of many previous births, becomes free from all sins and soon attains the supreme state. Yogi is superior to the ascetics, he is considered superior to the scholars of scriptures and he is superior to the people who do good deeds. Therefore O Arjun! You become a yogi.


Bhagavad Gita Chapter 6 Shlok (47)

योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना।
श्रद्धावान् भजते यो मां स मे युक्ततमो मतः॥

हिंदी अर्थ – सभी योगियों में भी जो श्रद्धावान योगी मुझमे लगे हुए अंतरात्मा से मुझको निरंतर भजता है, वह योगी मुझे श्रेष्ठतम मान्य है|

English Meaning – Among all the yogis, the devout yogi who continuously worships me with his inner soul engaged in me, I consider him to be the best.


भगवद गीता छठवां अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 5: भगवद गीता पांचवा अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता पांचवा अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 5) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता पांचवा अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 5) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता पांचवा अध्याय

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Chapter 5 – कर्म – संन्यास योग (Yoga Of Renunciation from Action)


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (1 – 2)

अर्जुन उवाच
संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्॥
श्रीभगवानुवाच संन्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ।
तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन कहते है – हे कृष्ण ! पहले आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मों से योग की प्रशंसा करते है| इन दोनों में से श्रेष्ठतर, कल्याणकारक और निश्चित साधन को मुझसे कहिये| भगवान श्रीकृष्ण है – कर्म संन्यास और कर्मयोग – यह दोनों ही परम कल्याण के कराने वाले है, पर इन दोनों में भी कर्मयोग कर्म – संन्यास से श्रेष्ठ है|

English Meaning – Arjun says – O Krishna! First, you praise the renunciation of actions and then yoga through actions. Tell me which of these two is better, more beneficial and more certain. Lord Shri Krishna is – Karma Sannyasa and Karmayoga – both of them bring ultimate welfare, but in both of them, Karmayoga is superior to Karmayoga.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (3 – 4)

ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥
सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः।
एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्॥

हिंदी अर्थ – हे वीर अर्जुन ! जो न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, उस कर्मयोगी को सदा सन्यासी ही जानना चाहिए क्योंकि राग – द्वेष आदि द्वंदों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार – बंधन से मुक्त हो जाता है| कर्म – संन्यास और कर्मयोग को अज्ञानी ही अलग – अलग फल देने वाले कहते है न कि ज्ञानी जन, क्योंकि दोनों में से एक में भी ठीक प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के ही फलस्वरुप परमात्मा को प्राप्त होता है|

English Meaning – O brave Arjun! A Karmayogi who neither hates anyone nor aspires for anyone should always be considered a Sanyasi because a person who is free from conflicts like love and hatred etc. is happily freed from the bondage of the world. Karma-Sanyas and Karmayoga are said to give different results only by the ignorant and not by the knowledgeable people, because a person properly situated in either of them attains God as a result of both.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (5 – 6)

यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते।
एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स: पश्यति॥
संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः।
योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति॥

हिंदी अर्थ – ज्ञानयोगियों द्वारा जो गति प्राप्त की जाती है, कर्मयोगियो द्वारा भी वही प्राप्त की जाती है इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को एक समान देखता है, वही ठीक देखता है, परन्तु हे वीर अर्जुन ! कर्मयोग के बिना कर्म – संन्यास कठिन है और कर्मयोग में स्थित मुनि परब्रह्म को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है|

English Meaning – The same progress that is achieved by Gyan Yogis is also achieved by Karma Yogis, therefore the person who sees Gyan Yoga and Karma Yoga as equal, sees it right, but O brave Arjun! Without Karmayoga, renunciation of work is difficult and the sage situated in Karmayoga soon attains Parabrahma.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (7 – 8)

योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः।
सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते
नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्‌ गच्छन्स्वपञ्श्वसन्॥

हिंदी अर्थ – अपने मन को वश में करने वाला, जितेन्द्रिय, विशुद्ध अंत:करण वाला और सभी प्राणियों को अपना आत्मरूप मानने वाला कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी उससे लिप्त नहीं होता है| तत्त्व को जानने वाला यह माने कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ| देखते हुए, सुनते हुए, स्पर्श करते हुए, सूंघते हुए, खाते हुए, चलते हुए, साँस लेते हुए|

English Meaning – A Karma Yogi, who has control over his mind, has good senses, has a pure conscience and considers all living beings as his self, does not get attached to it even while doing work. The one who knows the principle should believe that I do not do anything. Seeing, hearing, touching, smelling, eating, walking, breathing.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (9 – 10)

प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मि-षन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्॥
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥

हिंदी अर्थ – बोलते हुए, त्यागते हुए, ग्रहण करते हुए तथा आँखों को खोलते – बंद करते हुए भी, सब इन्द्रियाँ ही अपने – अपने कार्यों में लगी है, ऐसा धारण करे| जो पुरुष आसक्ति रहित होकर सब कर्मों को ब्रह्म द्वारा होने वाला जानकर करता है, वह पाप से उसी प्रकार लिप्त नहीं होता जैसे जल से कमल का पत्ता|

English Meaning – While speaking, relinquishing, accepting and even while opening and closing the eyes, remember that all the senses are engaged in their respective functions. The man who is free from attachment and performs all his actions considering them to be done by Brahma, does not get indulged in sins in the same way as a lotus leaf gets indulged in water.

भगवद गीता पांचवा अध्याय

भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (11 – 12)

कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि।
योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ॥
युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥

हिंदी अर्थ – कर्मयोगी आसक्ति को त्याग कर, केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी अंत:करण की शुद्धि के लिए कर्म करते है| कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके सदा रहने वाली शान्ति को प्राप्त होता है और सकाम पुरुष कामना करने के कारण उस कर्म के फल में आसक्त होकर बंधता है|

English Meaning – A Karmayogi abandons attachment and works only through senses, mind, intellect and body to purify the conscience. A Karma Yogi attains everlasting peace by renouncing the fruits of his actions and a successful man gets attached to the fruits of his actions due to his desires.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (13 – 14)

सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्॥
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते॥

हिंदी अर्थ – अंत:करण को अपने वश में करके, सब कर्मों को मन से त्याग कर, न उन्हें करता हुआ और न करवाते हुए ही, नौ द्वारों वाले शरीर रूपी घर में योगी सुख पूर्वक रहे| आत्मा मनुष्य के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करता है, किन्तु इसमें स्वभाव ही कारण है|

English Meaning – By controlling the conscience, renouncing all actions from the mind, neither doing them nor getting them done, the Yogi should live happily in the house of the body with nine doors. The soul neither creates the doer, nor the actions, nor the combination of the results of the human being, but nature itself is the reason for it.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (15 – 16)

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥
ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः।
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्॥

हिंदी अर्थ – सर्वव्यापी आत्मा न किसी के पाप कर्म को ग्रहण करता है और न किसी के शुभकर्म को ही, पर ज्ञान के अज्ञान द्वारा ढके होने से सब मनुष्य उस अज्ञान से मोहित हो रहे है| परन्तु जिनका वह अज्ञान आत्मा के वास्तविक ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस आत्मा को तुरंत प्रकाशित का देता है|

English Meaning – The omnipresent soul neither accepts anyone’s sinful deeds nor anyone’s good deeds, but due to knowledge being covered by ignorance, all human beings are getting fascinated by that ignorance. But those whose ignorance has been destroyed by the real knowledge of the soul, that knowledge immediately illuminates the soul like the sun.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (17 – 18)

तद्‌बुद्धयस्तदात्मानस् तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥
विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥

हिंदी अर्थ – जिनका मन तत (ब्रह्म या आत्म) रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तत् (ब्रह्म) रूप हो रही है और जो निरंतर तत् (ब्रह्म) में ही निष्ठा वाले है, ऐसे ज्ञान द्वारा निष्पाप हुए पुरुष अपुनरावृत्ति को प्राप्त करते है| ऐसे ज्ञानी जन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में, गाय में, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल को समान देखते है|

English Meaning – Those whose mind is in the form of that (Brahm or Self), whose intellect is in the form of that (Brahm) and who have constant faith in that (Brahm), those persons who have become sinless through such knowledge attain non-repetition. Such knowledgeable people see the same in a learned and humble Brahmin, a cow, an elephant, a dog and a Chandala.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (19 – 20)

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः॥
न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः॥

हिंदी अर्थ – जिनका मन सम भाव में स्थित है, उनके द्वारा यहाँ संसार में ही लय (मुक्ति) को प्राप्त कर लिया गया है, क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिए वे ब्रह्म में ही स्थित है| जो प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न नहीं होता, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्म को जानने वाला पुरुष परब्रह्म में नित्य स्थित है|

English Meaning – Those whose mind is situated in equanimity, have attained Laya (liberation) here in the world, because Brahma is flawless and even, hence they are situated in Brahma only. The one who does not become happy after receiving what he loves and does not get upset after receiving what he dislikes, that man with a stable intellect, without doubts, who knows Brahma, is eternally situated in Parabrahman.

भगवद गीता पांचवा अध्याय

भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (21 – 22)

बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत् सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥
ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः॥

हिंदी अर्थ – बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अंत:करण वाला साधक आत्मा में स्ठित सात्विक आनंद को प्राप्त होता है, फिर वह परब्रह्म के योग में स्थित पुरुष अक्षय आनंद को प्राप्त करता है| इन्द्रिय तथा विषयों के संयोग से उत्पन्न होने वाले सभी भोग दुःख उत्पन्न करने वाली ही है| इसलिए हे अर्जुन ! इन आदि – अंत वाले भोगों में, बुद्धिमान पुरुष नहीं लिप्त होते है|

English Meaning – A seeker with a conscience free from attachment to external objects attains the sattvik bliss situated in the soul, then he attains the pure eternal bliss situated in the yoga of Parabrahma. All the pleasures arising from the combination of senses and objects are bound to cause sorrow. Therefore O Arjun! Intelligent people do not indulge in these beginning and end pleasures.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (23 – 24)

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥
योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस् तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति॥

हिंदी अर्थ – जो मनुष्य इस शरीर का नाश होने से पूर्व ही काम – क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही योगी है और वही सुखी है| जो योगी अंतरात्मा में ही सुख वाला है, आत्मा में ही रमण करने वाला है और जो आत्मा में ही प्रकाश (ज्ञान) वाला है, वह ब्रह्म होकर शांत परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है|

English Meaning – The man who is able to bear the impulses arising from lust and anger even before the destruction of this body, is a yogi and is happy. The Yogi who is happy in his inner self, who has joy in his soul and who has light (knowledge) in his soul, he becomes Brahma and attains the peaceful Supreme Brahma.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (25 – 26)

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम्।
अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम्॥

हिंदी अर्थ – निष्पाप ऋषि, जिनके सब संशय ज्ञान द्वारा निवृत्त हो गए है, जो सभी प्राणियों के हित में रत है और जो अपनी आत्मा में स्थित है, वे शांत ब्रह्म को प्राप्त होते है| काम – क्रोध से रहित, जीते हुए चित्त वाले, आत्म – साक्षात्कार किए हुए योगियों के लिए सब ओर से शांत परब्रह्म ही परिपूर्ण है|

English Meaning – The sinless sage, whose doubts have been dispelled by knowledge, who is engaged in the welfare of all beings and who is situated in his own soul, attains the peaceful Brahman. For Yogis who are free from lust and anger, have a victorious mind and have realized the Self, only Parabraham, who is calm from all sides, is perfect.

भगवद गीता पांचवा अध्याय

भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (27 – 28)

स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश् चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः।
प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ॥
यतेन्द्रियमनोबुद्धि र्मुनिर्मोक्षपरायणः।
विगतेच्छाभयक्रोधो यः सदा मुक्त एव सः॥

हिंदी अर्थ – बाहर के विषयों को न अनुभव करते, नेत्रों की दृष्टि को दोनों भोहों के बीच में स्थिर कर और नासिका में विचरने वाले प्राण और अपान वायु को सम करके, जीते हुए मन, बुद्धि और इन्द्रियों वाला मोक्षपरायण मुनि, जो इच्छा, भय और क्रोध से रहित हो गया है, वह सदा मुक्त ही है|

English Meaning – Not experiencing external objects, having fixed the gaze of the eyes between the eyebrows and having equalized the prana and apana vayu circulating in the nostrils, a saint devoted to salvation with a living mind, intellect and senses, who is free from desire, fear and anger. Has become free, he is always free.


भगवद गीता पांचवा अध्याय श्लोक (29)

भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति॥

हिंदी अर्थ – मेरा भक्त मुझे सब यज्ञ और तपों का भोगने वाला, सभी लोकों के ईश्वरों का भी ईश्वर और सभी प्राणियों का सुहृद् जानकर शान्ति को प्राप्त होता है|

English Meaning – My devotee attains peace by knowing that I am the enjoyer of all sacrifices and penances, the God of the gods of all the worlds and the friend of all living beings.


भगवद गीता पांचवा अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 4: भगवद गीता चतुर्थ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे|

जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता चतुर्थ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 4) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी|

आज हम भगवद गीता चतुर्थ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 4) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय

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Chapter 4 –  ज्ञान कर्मसंन्यास योग (Yoga Of Knowledge and Renunciation from Action)


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (1 – 2)

श्रीभगवानुवाच इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्॥
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप॥

हिंदी अर्थ – भगवान श्री कृष्णा कहते है – पहले मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा | हे परन्तप अर्जुन ! इस प्रकार परंपरा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना, किन्तु बहुत काल बीतने के बाद वह योग – परम्परा (पृथ्वी से) लुप्त हो गयी|

English Meaning – Lord Shri Krishna says – Earlier I told this imperishable yoga to Surya, Surya told it to his son Vaivaswat Manu and Manu told it to his son King Ikshvaku. O blessed Arjun! In this way, the royal sages came to know this yoga received from the tradition, but after a long time, that yoga tradition disappeared (from the earth).


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (3 – 4)

स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः।
भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम्॥
अर्जुन उवाच
अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः।
कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति॥

हिंदी अर्थ – वही यह पुरातन योग आज मैंने तुमसे कहा है क्योंकि तुम मेरे भक्त और प्रिय सखा हो| यह बड़ा ही उत्तम रहस्य है| अर्जुन बोले – आपका जन्म तो अभी हाल का है और सूर्य का जन्म बहुत पुराना है तब मैं इस बात को कैसे समझूँ कि आप ने ही (कल्प के) पूर्व में सूर्य से यह योग कहा था?

English Meaning – I have told you this ancient yoga today because you are my devotee and dear friend. This is a very good secret. Arjun said – Your birth is very recent and the birth of the Sun is very old, then how can I understand that you yourself had said this yoga to the Sun in the past (Kalpa)?


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (5 – 6)

श्रीभगवानुवाच बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन।
तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप॥
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – हे परंतप अर्जुन ! मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके है तुम उन सबकों नहीं जानते, परन्तु मैं जानता हूँ| अजन्मा, अविनाशी और सभी प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी मैं, अपनी प्रकृति को अधीन करके अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ|

English Meaning – The Lord says – O great Arjun! You and I have had many births, you don’t know them all, but I know. Despite being unborn, indestructible and the God of all living beings, I, after subduing my nature, appear through my Yogamaya.


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (7 – 8)

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

हिंदी अर्थ – हे भारत ! जब – जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब – तब मैं अपने (साकार) रूप को रचता हूँ | साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालो का विनाश करने के लिए और धर्म की यथार्थ करने के लिए मैं युग – युग में प्रकट हुआ करता हूँ|

English Meaning – O Bharat! Whenever there is a loss of righteousness and an increase of unrighteousness, then I create my (real) form. I appear in every age to save the saints, to destroy those who commit sins and to correct the religion.


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (9 – 10)

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः।
बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जो मनुष्य मेरे जन्म और कर्म को तत्त्व से दिव्य जान लेता है, वह शरीर त्याग कर फिर जन्म नहीं लेता, किन्तु मुझे ही प्राप्त होता है| नष्ट आसक्ति, भय और क्रोध वाले, मुझसे अनन्य प्रेम करने वाले और मेरे आश्रित रहने वाले बहुत से भक्त ज्ञान रूपी तप से पवित्र होकर (पहले भी) मेरे स्वरुप को प्राप्त हो चुके है|

English Meaning – Hey Arjun! The person who considers my birth and actions as divine by essence, does not take birth again after leaving his body, but only attains me. Many devotees who have destroyed attachment, fear and anger, who love me unconditionally and who are dependent on me, have (already) attained my form by becoming pure through penance in the form of knowledge.


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (11 – 12)

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥
 काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः।
क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा॥

हिंदी अर्थ – जो भक्त मुझे जिस प्रकार से भजते है, मैं भी उनको उसी प्रकार से भजता हूँ| हे अर्जुन ! ऐसे सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते है| इस मनुष्य लोक में कर्मों के फल को चाहने वाले देवताओं का पूजन करते है क्योंकि उससे कर्मों द्वारा होने वाली सिद्धि  उनको शीघ्र मिल जाती है|

English Meaning – As my devotees worship me, I also worship them in the same way. Hey Arjun! All such people follow my path in every way. In this human world, those who want the fruits of their deeds worship the gods because through them they get the success achieved through their deeds quickly.


 

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (13 – 14)

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्॥
न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा।
इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते॥

हिंदी अर्थ – चारों वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र) को उनके गुण और कर्मों के विभाग पूर्वक मेरे द्वारा रचा गया है| उस सृष्टि – रचनादि कर्म का कर्ता होने पर भी मुझ अविनाशी को तुम अकर्ता ही जानों | मुझे कर्मों के फल की कामना नहीं है इसलिए कर्म मुझे लिप्त नहीं करते| इस प्रकार जो तत्त्व से मुझे जान लेता है, वह भी कर्मों से नहीं बंधता|

English Meaning – The four varnas (Brahmin, Kshatriya, Vaishya and Shudra) have been created by me with divisions of their qualities and actions. Even though I am the doer of that creation and creation, you should consider me as the imperishable and not the doer. I do not desire the fruits of my actions, therefore actions do not indulge me. In this way, the one who knows me in principle is also not bound by deeds.

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (15 – 16)

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः।
कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्॥
किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्॥

हिंदी अर्थ – पहले भी मोक्ष की इच्छा वाले मनुष्यों ने इस प्रकार जानकर ही कर्म किये है इसलिए तुम भी पूर्वजों जैसे ही सदा से किये जाने वाले कर्मों को ही करों | कर्म क्या है? अकर्म क्या है? इसका निर्णय करने में बुद्धिमान भी मोहित हो जाते है| इसलिए मैं तुमसे वह कर्म कहूँगा जिसे जानकर तुम अशुभ (कर्म – बंधन) से मुक्त हो जाते है|

English Meaning – Even in the past, people who desired salvation have done their deeds after knowing this, hence you too should do the same deeds which you have always done like your ancestors. What is Karma? What is non-action? Even intelligent people get tempted to decide this. Therefore, I will tell you that karma, knowing which you become free from inauspicious (karma-bondage).


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (17 – 18)

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः।
अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः॥
कर्मण्यकर्म यः पश्येद कर्मणि च कर्म यः।
स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत्॥

हिंदी अर्थ – कर्म का स्वरुप भी जानना चाहिए और विकर्म का स्वरुप भी जानना चाहिए तथा अकर्म का स्वरुप भी जानना चाहिए क्योंकि कर्मों की गति गहन है, जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखते है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है और वह योगी सभी कर्मों को करने वाला है|

English Meaning – One should know the nature of karma and one should also know the nature of vice and one should also know the nature of non-action because the speed of actions is deep, the one who sees non-action in action and action in non-action is the wisest among humans and that yogi is able to perform all the actions. is gonna.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (19 – 20)

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः।
ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः॥
त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः।
कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः॥

हिंदी अर्थ – जिसके सभी कर्मों के आरम्भ बिना कामना और संकल्प के होते है और जिसके सभी कर्म ज्ञान रूपी अग्नि द्वारा जल चुके है, उसको ज्ञानी लोग भी पंडित कहते है, जो सभी कर्मों और उनके फल में आसक्ति का त्याग करके स्वयं में नित्य संतुष्ट है और संसार के आश्रय से रहित हो गया है, वह कर्म करता हुआ भी कुछ भी नहीं करता|

English Meaning – The one whose all actions begin without desire and resolution and whose actions have been burnt by the fire of knowledge, the knowledgeable people also call him a Pandit, the one who has given up attachment to all actions and their results and is eternally satisfied with himself and the world. He has become devoid of the shelter of God, he does nothing even while doing work.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (21 – 22)

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्॥
यदृच्छालाभसंतुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते॥

हिंदी अर्थ – आशारहित, जीते हुए अंत:करण वाला और सभी संग्रहों का त्याग करने वाला मनुष्य केवल शरीर – निर्वाह संबंधी कर्म करता हुआ भी पाप को प्राप्त नहीं होता | जो स्वत: प्राप्त वस्तु से संतुष्ट, द्वंद्वो (हर्ष-शोक आदि) से अतीत, ईर्ष्या रहित और सफलता – असफलता में समान रहने वाला हो, वह कर्मों को करता हुआ भी उनसे नहीं बंधता है|

English Meaning – A person without hope, with a living conscience and renouncing all wealth does not commit sin even while performing activities related only to the subsistence of the body. The one who is satisfied with what he gets automatically, is free from conflicts (joy-sorrow etc.), is free from jealousy and remains equal in success and failure, he is not bound by the deeds even while doing them.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (23 – 24)

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः।
यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते॥
ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥

हिंदी अर्थ – जिसकी आसक्ति नष्ट हो गई है, जिसका चित्त निरंतर मुक्ति के ज्ञान में स्थित है – केवल यज्ञ संपादन के लिए कर्म करने वाले उस मनुष्य के सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते है| जिस यज्ञ में अर्पित पदार्थ भी ब्रह्म है और हवन किए जाने योग्य द्रव्य भी ब्रह्म है तथा ब्रह्म रूपी कर्ता द्वारा ब्रह्म रूपी आहुति रूपी क्रिया भी ब्रह्म है – उस ब्रह्म रूपी कर्म में स्थित रहने वाले के द्वारा प्राप्त किए जाने योग्य फल भी ब्रह्म ही है|

English Meaning – Whose attachment has been destroyed, whose mind is constantly fixed in the knowledge of liberation – the entire karma of that person, who works only for the performance of Yagya, dissolves. In the Yagya the object offered is also Brahma and the substance capable of being sacrificed is also Brahma and the action of the sacrifice in the form of Brahma by the doer in the form of Brahma is also Brahma – the result attainable by the person who remains engaged in that action in the form of Brahma is also Brahma.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (25 – 26)

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते।
ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति॥
श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति।
शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति॥

हिंदी अर्थ – दुसरे मनुष्य देव – उपासना रूपी यज्ञ का ही भली – भांति करते है और अन्य ब्रह्म रूपी अग्नि में (अभेद दर्शन द्वारा आत्म रूपी) यज्ञ का हवन करते है| अन्य योगी श्रोत्र आदि सभी इन्द्रियों का संयम रूपी अग्नियों में हवन करते है और दुसरे योगी शब्दादि सभी विषयों का इन्द्रिय रूपी अग्नियों में हवन करते है|

English Meaning – Other people perform the Yagya in the form of worship of Gods very well and others perform the Yagya in the fire of Brahma (the self in the form of Abheda Darshan). Other yogis offer oblations of all the senses like hearing etc. in the fires of restraint and other yogis offer oblations of all objects like words etc. in the fires of the senses.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (27 – 28)

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे।
आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते॥
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे ।
स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः॥

हिंदी अर्थ – दुसरे योगी इन्द्रियों और प्राणों की सभी क्रियाओं को ज्ञान से प्रकाशित आत्म – संयम योग की अग्नि में हवन करते है| कुछ मनुष्य द्रव्य से यज्ञ करने वाले है और कुछ तपस्या रूपी यज्ञ करने वाले है तथा दुसरे कितने ही योग समान यज्ञ करने वाले है| कुछ यत्नशील मनुष्य अहिंसादि व्रतों से युक्त स्वाध्याय रूपी ज्ञानयज्ञ करने वाले है|

English Meaning – Other yogis sacrifice all the functions of the senses and the vital force in the fire of self-control yoga illuminated by knowledge. Some human beings are going to perform Yagya using liquid and some are going to perform Yagya in the form of penance and many others are going to perform Yagya similar to Yoga. Some diligent people are going to perform the Yagya of knowledge in the form of self-study along with non-violent vows.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (29 – 30)

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः॥

हिंदी अर्थ – कुछ योगी अपान वायु में प्राण वायु का हवन करते है और दुसरे प्राण वायु में अपान वायु का हवन करते है| कुछ अन्य प्राणायाम परायण योगी प्राण और अपान की गति को रोककर नियमित आहार द्वारा प्राणों में ही हवन करते है| ये सभी साधक यज्ञों द्वारा पापों का नाश करने वाले और यज्ञों को जानने वाले है|

English Meaning – Some yogis perform Havan of Prana Vayu in Apana Vayu and others perform Havan of Apana Vayu in Prana Vayu. Some other Yogis practising Pranayam stop the movement of Prana and Apana and perform Havan in Prana through a regular diet. All these seekers are the ones who destroy sins through Yagyas and know about Yagyas.

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (31 – 32)

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम॥
एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे।
कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे॥

हिंदी अर्थ – हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन ! यज्ञ से बचे हुए अमृत का अनुभव करने वाले योगी सनातन परब्रह्म को प्राप्त होते है| यज्ञ न करने वाले मनुष्य के लिए तो यह पृथ्वी भी सुखदायक नहीं है, फिर परलोक कैसे सुखदायक हो सकता है? इस प्रकार यज्ञ, बहुत तरह से ब्रह्मा के मुख से (वेदों में) विस्तार से कहे गए है| उन सबको तुम (मन, इन्द्रिय और शरीर की) क्रिया द्वारा सम्पन्न होने वाले जानकर और उनके अनुष्ठान द्वारा कर्म – बंधन से मुक्त हो जाओ|

English Meaning – O best of the Kurus, Arjuna! Yogis who experience the nectar left over from Yagya attain the eternal Supreme Brahma. Even if this earth is not pleasant for a person who does not perform Yagya, then how can the next world be pleasant? Thus Yagya has been described in detail in many ways from the mouth of Brahma (in the Vedas). By knowing them all to be accomplished by the actions (of the mind, senses and body) and by performing their rituals, they become free from the bondage of karma.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (33 – 34)

श्रेयान्द्रव्यमयाद्य ज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते॥
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥

हिंदी अर्थ – हे परंतप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञान यज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि सम्पूर्ण कर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते है| उस ज्ञान को तुम तत्त्वदर्शी ज्ञानियों के पास जाकर जानो | उनको दण्डवत् प्रणाम करने से, सेवा करने से और सरलतापूर्वक प्रश्न करने से वे तुम्हे उसका उपदेश करेंगे|

English Meaning – Oh great Arjun! Yagya of knowledge is better than material yagya because all actions end in knowledge. Learn that knowledge by going to knowledgeable wise people. By paying obeisance to him, by serving him and by asking simple questions, he will teach you the same.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (35 – 36)

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि॥
अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जिसको जानकर फिर तुम इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे| जिस ज्ञान द्वारा तुम सम्पूर्ण भूतों को पहले अपने में और फिर मुझ (परमात्मा) में देखोगे| यदि तुम अन्य सभी पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो, तो भी इस ज्ञान रूपी नाव द्वारा नि:संदेह पाप – समुद्र को पार कर लोगे|

English Meaning – Hey Arjun! Knowing this, you will no longer be tempted like this. Through this knowledge you will see all the beings first in yourself and then in me (God). Even if you are more sinful than all other sinners, you will undoubtedly cross the ocean of sins with this boat of knowledge.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (37 – 38)

यथैधांसि समिद्धोऽग्नि र्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा॥
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जिस प्रकार अग्नि लकड़ियों को जला देती है, उसी प्रकार ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को जला देती है| इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ भी नहीं है| उस ज्ञान को कर्म योग के द्वारा सिद्ध हुआ मनुष्य, कुछ समय पश्चात अपने आप में ही पा लेता है|

English Meaning – Hey Arjun! Just as fire burns wood, similarly the fire of knowledge burns all the deeds. There is nothing in this world that purifies like knowledge. A man who has attained perfection through Karma Yoga attains that knowledge within himself after some time.


 

गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (39 – 40)

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम चिरेणाधिगच्छति॥
अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः॥

हिंदी अर्थ – निरंतर प्रयत्न करने वाला, इन्द्रिय संयम करने वाला और श्रद्धा से युक्त मनुष्य ज्ञान को प्राप्त होता है| ज्ञान को प्राप्त होकर वह शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है| विवेकहीन, श्रद्धारहित और संशययुक्त मनुष्य परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है| उसके लिए न यह लोक सुखप्रद है और न ही परलोक|

English Meaning – A person who makes continuous efforts, controls his senses and has faith attains knowledge. After attaining knowledge he soon attains supreme peace. A man without a conscience, without faith and full of doubt gets corrupted by charity. Neither this world nor the next world is pleasant for him.

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय

भगवद गीता चतुर्थ अध्याय श्लोक (41 – 42)

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनंजय॥
तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमा तिष्ठोत्तिष्ठ भारत॥

हिंदी अर्थ – हे धनंजय ! कर्म योग से सभी कर्मों को परमात्मा में अर्पण करने वाले, विवेक द्वारा समस्त संशयो का नाश करने वाले और अपने वश में किये हुए अंत:करण वाले मनुष्य को कर्म नहीं बांधते | इसलिए हे भरतवंशी अर्जुन ! तुम हृदय में स्थित, अपने इस अज्ञानजनित संशय का, ज्ञान रूपी तलवार द्वारा छेदन करके कर्म योग में स्थित हो कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ|

English Meaning – Hey Dhananjay! Karma does not bind the person who offers all his actions to God through Karma Yoga, who destroys all doubts through conscience and who has his conscience under his control. Therefore, O Arjun of Bharatvansh! You pierce this ignorance-born doubt of yours in your heart with the sword of knowledge and stand in Karma Yoga for the battle.


 

| भगवद गीता चतुर्थ अध्याय समाप्त |


Sheetala Mata Chalisa Lyrics: शीतला माता चालीसा पाठ

शीतला माता चालीसा का पाठ माता शीतला को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| शीतला माता को हिन्दू धर्म की सबसे प्रसिद्ध देवी के रूप जाना जाता है| इस देवी की महिमा हिन्दू धर्म में बहुत ही प्राचीन काल से चली आ रही है| पौराणिक ग्रंथों के आधार पर शीतला माता का वाहन गधा बताया गया है| शीतला माता को चेचक आदि कई रोगों की देवी भी माना जाता है| शीतला चालीसा का यह पाठ दुर्बल व्यक्तियों को बलवान तथा मुर्ख व्यक्तियों को ज्ञानी बनाता है| इस शीतला माता चालीसा का जाप करने से भक्तों को माता शीतला की छत्रछाया प्राप्त होती है| तो आइये जानते है शीतला माता चालीसा के लिरिक्स के बारे में|

शीतला माता चालीसा

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माता शीतला चालीसा पाठ | Sheetala Mata Chalisa Lyrics in Hindi

|| शीतला माता चालीसा ||

|| दोहा ||

जय जय माता शीतला ,
तुमहिं धरै जो ध्यान ।
होय विमल शीतल हृदय,
विकसै बुद्धी बल ज्ञान ॥

घट-घट वासी शीतला,
शीतल प्रभा तुम्हार ।
शीतल छइयां में झुलई,
मइयां पलना डार ॥

|| चौपाई ||

जय-जय-जय श्री शीतला भवानी ।
जय जग जननि सकल गुणधानी ॥

गृह-गृह शक्ति तुम्हारी राजित ।
पूरण शरदचंद्र समसाजित ॥

विस्फोटक से जलत शरीरा ।
शीतल करत हरत सब पीड़ा ॥

मात शीतला तव शुभनामा ।
सबके गाढे आवहिं कामा ॥4॥

शोक हरी शंकरी भवानी ।
बाल-प्राणक्षरी सुख दानी ॥

शुचि मार्जनी कलश करराजै ।
मस्तक तेज सूर्य सम साजै ॥

चौसठ योगिन संग में गावैं ।
वीणा ताल मृदंग बजावै ॥

नृत्य नाथ भैरौं दिखलावैं ।
सहज शेष शिव पार ना पावैं ॥8॥

धन्य धन्य धात्री महारानी ।
सुरनर मुनि तब सुयश बखानी ॥

ज्वाला रूप महा बलकारी ।
दैत्य एक विस्फोटक भारी ॥

घर घर प्रविशत कोई न रक्षत ।
रोग रूप धरी बालक भक्षत ॥

हाहाकार मच्यो जगभारी ।
सक्यो न जब संकट टारी ॥12॥

तब मैंय्या धरि अद्भुत रूपा ।
कर में लिये मार्जनी सूपा ॥

विस्फोटकहिं पकड़ि कर लीन्हो ।
मूसल प्रमाण बहुविधि कीन्हो ॥

बहुत प्रकार वह विनती कीन्हा ।
मैय्या नहीं भल मैं कछु कीन्हा ॥

अबनहिं मातु काहुगृह जइहौं ।
जहँ अपवित्र वही घर रहि हो ॥16॥

अब भगतन शीतल भय जइहौं ।
विस्फोटक भय घोर नसइहौं ॥

श्री शीतलहिं भजे कल्याना ।
वचन सत्य भाषे भगवाना ॥

पूजन पाठ मातु जब करी है ।
भय आनंद सकल दुःख हरी है ॥

विस्फोटक भय जिहि गृह भाई ।
भजै देवि कहँ यही उपाई ॥20॥

कलश शीतलाका सजवावै ।
द्विज से विधीवत पाठ करावै ॥

तुम्हीं शीतला, जगकी माता ।
तुम्हीं पिता जग की सुखदाता ॥

तुम्हीं जगद्धात्री सुखसेवी ।
नमो नमामी शीतले देवी ॥

नमो सुखकरनी दु:खहरणी ।
नमो- नमो जगतारणि धरणी ॥24॥

नमो नमो त्रलोक्य वंदिनी ।
दुखदारिद्रक निकंदिनी ॥

श्री शीतला , शेढ़ला, महला ।
रुणलीहृणनी मातृ मंदला ॥

हो तुम दिगम्बर तनुधारी ।
शोभित पंचनाम असवारी ॥

रासभ, खर , बैसाख सुनंदन ।
गर्दभ दुर्वाकंद निकंदन ॥28॥

सुमिरत संग शीतला माई,
जाही सकल सुख दूर पराई ॥

गलका, गलगन्डादि जुहोई ।
ताकर मंत्र न औषधि कोई ॥

एक मातु जी का आराधन ।
और नहिं कोई है साधन ॥

निश्चय मातु शरण जो आवै ।
निर्भय मन इच्छित फल पावै ॥32॥

कोढी, निर्मल काया धारै ।
अंधा, दृग निज दृष्टि निहारै ॥

बंध्या नारी पुत्र को पावै ।
जन्म दरिद्र धनी होइ जावै ॥

मातु शीतला के गुण गावत ।
लखा मूक को छंद बनावत ॥

यामे कोई करै जनि शंका ।
जग मे मैया का ही डंका ॥36॥

भगत ‘कमल’ प्रभुदासा ।
तट प्रयाग से पूरब पासा ॥

ग्राम तिवारी पूर मम बासा ।
ककरा गंगा तट दुर्वासा ॥

अब विलंब मैं तोहि पुकारत ।
मातृ कृपा कौ बाट निहारत ॥

पड़ा द्वार सब आस लगाई ।
अब सुधि लेत शीतला माई ॥40॥

॥ दोहा ॥

यह चालीसा शीतला,
पाठ करे जो कोय ।
सपनें दुख व्यापे नही,
नित सब मंगल होय ॥

बुझे सहस्र विक्रमी शुक्ल,
भाल भल किंतू ।
जग जननी का ये चरित,
रचित भक्ति रस बिंतू ॥

॥ इति श्री शीतला चालीसा ॥

शीतला माता चालीसा

Sheetala Mata Chalisa Lyrics In English | जय जय माता शीतला

|| Sheetala Mata Chalisa ||

|| Doha ||

Jai Jai Mata Sheetala,
Tumhin dhare jo dhyan.
Hoye vimal Sheetala hriday,
Vikasai buddhi, bal, gyaan.

Ghat-ghat vaasi Sheetala,
Sheetal prabha tumhaara.
Sheetal chhaya mein jhulai,
Maiyaan palna daar.

|| Chaupai ||

Jai-Jai-Jai Shri Sheetala Bhavani,
Jai Jag Janani Sakal Gunadhani.

Grih-Grih Shakti Tumhari Rajit,
Puran Sharadchandra Samasajit.

Visphotak Se Jalat Shareera,
Sheetal Karat Harat Sab Peeda.

Maa Sheetala Tav Shubh Naama,
Sabke Gaadhe Aavahin Kaama.

Shok Hari Shankari Bhavani,
Bal-Pranakshari Sukh Daani.

Shuchi Marjani Kalash Kararajai,
Mastak Tej Surya Sam Sajai.

Chausath Yogini Sang Mein Gaavain,
Veena Taal Mrudang Bajaavain.

Nritya Nath Bhairon Dikhlavain,
Sahaj Shesh Shiv Paar Na Paavain.

Dhany Dhany Dhaatri Maharani,
Sur Nar Muni Tab Suyash Bakhaani.

Jwala Roop Maha Balakaari,
Daitya Ek Visphotak Bhari.

Ghar Ghar Pravishat Koi Na Rakshat,
Rog Roop Dhari Baalak Bhakshat.

Haahakaar Machyo Jagabhaari,
Sakyo Na Jab Sankat Taari.

Tab Mainyya Dhar Adbhut Roopa,
Kar Mein Liye Marjani Soopa.

Visphotakhin Pakad Kar Leenho,
Musal Pramaan Bahut Vidhi Keenho.

Bahut Prakar Vah Vinati Kiinha,
Maiyya Nahi Bhal Main Kuch Kiinha.

Abnahi Maa Tu Kahugrih Jaihau,
Jahan Apavitr Vahi Ghar Rahi Ho.

Ab Bhakatan Sheetal Bhay Jaihau,
Visphotak Bhay Ghor Nasiyau.

Shri Sheetalahin Bhaje Kalyaana,
Vachan Satya Bhaashe Bhagwaana.

Poojan Paath Maatu Jab Kari Hai,
Bhaya Anand Sakal Dukh Hari Hai.

Visphotak Bhay Jihi Grih Bhaai,
Bhajai Devi Kahan Yehi Upaai.

Kalash Sheetalaka Sajavaai,
Dwij Se Vidhivat Paath Karaavai.

Tumhi Sheetala, Jag Ki Maata,
Tumhi Pita Jag Ki Sukhdaata.

Tumhi Jagadhaatri Sukhasevi,
Namo Namaami Sheetale Devi.

Namo Sukhakarni Dukhharni,
Namo Namo Jagtaran Dharani.

Namo Namo Trilokya Vandini,
Dukhdaridrak Nikandini.

Shri Sheetala, Shedhala, Mahala,
Runleehrinani Maatru Mandal.

Ho Tum Digambar Tanudhaari,
Shobhit Panchanaam Asvaari.

Raasabh, Khar, Baisakh Sunandan,
Gardabh Durvaakand Nikandan.

Sumirat Sang Sheetala Mai,
Jahi Sakal Sukh Door Parai.

Galaka, Galgandadi Juhoyi,
Takar Mantra Na Aushadhi Koi.

Ek Maatu Ji Ka Aaraadhan,
Aur Nahi Koi Hai Saadhan.

Nischay Maatu Sharan Jo Aavai,
Nirbhay Man Ichhit Phal Paavai.

Kodhi, Nirmal Kaaya Dhaari,
Andha, Drig Nij Drishti Nihaari.

Bandhya Naari Putra Ko Paavai,
Janma Daridra Dhani Hoi Jaavai.

Maa Sheetala Ke Gun Gaavat,
Lakha Mook Ko Chand Banaavat.

Yame Koi Karai Jani Shanka,
Jag Mein Maiya Ka Hi Danka.

Bhagat ‘Kamal’ Prabhudasa,
Tat Prayag Se Poorab Paasa.

Graam Tivari Poor Mam Baasa,
Kakra Ganga Tat Durvaasa.

Ab Vilamb Mein Tohi Pukaarat,
Maatru Kripa Ko Baat Niharat.

Pada Dwaar Sab Aas Lagaai,
Ab Sudhi Let Sheetala Mai.

|| Doha ||

Yeh Chaalisa Sheetala,
Path Kare Jo Koi.
Sapne Dukh Vyape Nahi,
Nitya Sab Mangal Hoye.

Bujhe Sahasra Vikrami Shukl,
Bhaal Bhal Kintu.
Jag Janani Ka Ye Charit,
Rachit Bhakti Ras Bintu.

|| Iti Shri Sheetala Chaalisa ||