Shri Narayan Kavach Lyrics: नारायण कवच पाठ

नारायण कवच (Narayan Kavach) को श्रीमदभागवत पुराण से लिया गया है| जिसके भीतर इस सम्पूर्ण संसार के सभी बन्धनों से मुक्त होने का साधन बताया गया है| नारायण कवच (Narayan Kavach) का जाप प्रतिदिन करने से यह हमारी शत्रुओं से रक्षा करने के लिए एक कवच की भांति कार्य करता है| पौराणिक कथाओं के अनुसार यह माना जाता है कि नारायण कवच (Narayan Kavach) पाठ का जाप करने के पश्चात ही इंद्र देव ने अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया था|

नारायण कवच

माना जाता है कि जो भी व्यक्ति नारायण कवच (Narayan Kavach) का पाठ करता है| उस व्यक्ति की आत्मा पूर्ण रूप से पवित्र हो जाती है तथा जो भी व्यक्ति नारायण कवच (Narayan Kavach) का सच्ची श्रद्धा से पाठ करता है| भगवान विष्णु सदैव ही उस व्यक्ति की रक्षा करते है| नारायण कवच (Narayan Kavach) को एक बहुत ही संक्षिप्त स्त्रोत माना गया है| इस नारायण कवच (Narayan Kavach) को पढने में अधिकांश 10 मिनट का समय लगता है|

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Narayan Kavach Lyrics in Hindi – नारायण कवच लिरिक्स इन हिंदी

|| नारायण कवच पाठ ||

ॐ श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ नमो नारायणाय ।

अङ्गन्यासः

ॐ ॐ नमः पादयोः ।
ॐ नं नमः जानुनोः ।
ॐ मों नमः ऊर्वोः ।
ॐ नां नमः उदरे ।
ॐ रां नमः हृदि ।
ॐ यं नमः उरसि ।
ॐ णां नमः मुखे ।
ॐ यं नमः शिरसि ॥

करन्यासः

ॐ ॐ नमः दक्षिणतर्जन्याम् ।
ॐ नं नमः दक्षिणमध्यमायाम् ।
ॐ मों नमः दक्षिणानामिकायाम् ।
ॐ भं नमः दक्षिणकनिष्ठिकायाम् ।
ॐ गं नमः वामकनिष्ठिकायाम् ।
ॐ वं नमः वामानामिकायाम् ।
ॐ तें नमः वाममध्यमायाम् ।
ॐ वां नमः वामतर्जन्याम् ।
ॐ सुं नमः दक्षिणांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि ।
ॐ दें नमः दक्षिणांगुष्ठाय पर्वणि ।
ॐ वां नमः वामांगुष्ठोर्ध्वपर्वणि ।
ॐ यं नमः वामांगुष्ठाय पर्वणि ॥

विष्णुषडक्षरन्यासः

ॐ ॐ नमः हृदये ।
ॐ विं नमः मूर्धनि ।
ॐ षं नमः भ्रुवोर्मध्ये ।
ॐ णं नमः शिखायाम् ।
ॐ वें नमः नेत्रयोः ।
ॐ नं नमः सर्वसन्धिषु ।
ॐ मः अस्त्राय फट् प्राच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् आग्नेयाम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् दक्षिणस्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् नैरृत्ये ।
ॐ मः अस्त्राय फट् प्रतीच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् वायव्ये ।
ॐ मः अस्त्राय फट् उदीच्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् ऐशान्याम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् ऊर्ध्वायाम् ।
ॐ मः अस्त्राय फट् अधरायाम् ॥
अथ श्रीनारायणकवचम् ।

राजोवाच ।

यया गुप्तः सहस्राक्षः सवाहान्रिपुसैनिकान् ।
क्रीडन्निव विनिर्जित्य त्रिलोक्या बुभुजे श्रियम् ॥ १॥

भगवंस्तन्ममाख्याहि वर्म नारायणात्मकम् ।
यथाऽऽततायिनः शत्रून् येन गुप्तोऽजयन्मृधे ॥ २॥

श्रीशुक उवाच ।

वृतः पुरोहितस्त्वाष्ट्रो महेन्द्रायानुपृच्छते ।
नारायणाख्यं वर्माह तदिहैकमनाः शृणु ॥ ३॥

विश्वरूप उवाच ।

धौताण्घ्रिपाणिराचम्य सपवित्र उदण्मुखः ।
कृतस्वाण्गकरन्यासो मन्त्राभ्यां वाग्यतः शुचिः ॥ ४॥

नारायणमयं वर्म सन्नह्येद्भय आगते ।
पादयोर्जानुनोरूर्वोरुदरे हृद्यथोरसि ॥ ५॥

मुखे शिरस्यानुपूर्व्यादोंकारादीनि विन्यसेत् ।
ॐ नमो नारायणायेति विपर्ययमथापि वा ॥ ६॥

करन्यासं ततः कुर्याद्द्वादशाक्षरविद्यया ।
प्रणवादियकारान्तमण्गुल्यण्गुष्ठपर्वसु ॥ ७॥

न्यसेद्धृदय ॐकारं विकारमनु मूर्धनि ।
षकारं तु भ्रुवोर्मध्ये णकारं शिखया दिशेत् ॥ ८॥

वेकारं नेत्रयोर्युण्ज्यान्नकारं सर्वसन्धिषु ।
मकारमस्त्रमुद्दिश्य मन्त्रमूर्तिर्भवेद्बुधः ॥ ९॥

सविसर्गं फडन्तं तत् सर्वदिक्षु विनिर्दिशेत् ।
ॐ विष्णवे नम इति ॥ १०॥

आत्मानं परमं ध्यायेद्ध्येयं षट्शक्तिभिर्युतम् ।
विद्यातेजस्तपोमूर्तिमिमं मन्त्रमुदाहरेत् ॥ ११॥

ॐ हरिर्विदध्यान्मम सर्वरक्षां
न्यस्ताण्घ्रिपद्मः पतगेन्द्रपृष्ठे ।
दरारिचर्मासिगदेषुचाप-
पाशान्दधानोऽष्टगुणोऽष्टबाहुः ॥ १२॥

जलेषु मां रक्षतु मत्स्यमूर्ति-
र्यादोगणेभ्यो वरुणस्य पाशात् ।
स्थलेषु मायावटुवामनोऽव्यात्
त्रिविक्रमः खेऽवतु विश्वरूपः ॥ १३॥

दुर्गेश्वतव्याजिमुखादिषु प्रभुः
पायन्नृसिंहोऽसूरुथपरिः
विमुञ्चतो यस्य महत्तहासं
दिशो विनेदुर्न्यपतंश्च गर्भाः ॥ १४॥

रक्षत्वसौ माध्वनि यज्ञकल्पः
स्वदंष्ट्रयोन्नीतधरो वराहः ।
रामोऽद्रिकूटेष्वथ विप्रवासे
सलक्ष्मणोऽव्याद्भरताग्रजोऽस्मान् ॥ १५॥

मामुग्रधर्मादखिलात्प्रमादा-
न्नारायणः पातु नरश्च हासात् ।
दत्तस्त्वयोगादथ योगनाथः
पायाद्गुणेशः कपिलः कर्मबन्धात् ॥ १६॥

सनत्कुमारोऽवतु कामदेवा-
द्धयशीर्षा मां पथि देवहेलनात् ।
देवर्षिवर्यः पुरुषार्चनान्तरात्
कूर्मो हरिर्मां निरयादशेषात् ॥ १७॥

धन्वन्तरिर्भगवान्पत्वपथ्यत्
दद्वन्द्वद्भयदृषभो निर्जितात्मा
यज्ञश्च लोकादवतञ्जनान्तात्
बलो गणत्क्रोधवाषाधिन्द्रः ॥ १८॥

द्वैपायनो भगवानप्रबोधा-
द्बुद्धस्तु पाखण्डगणप्रमादात् ।
कल्किः कलेः कालमलात्प्रपातु
धर्मावनायोरुकृतावतारः ॥ १९॥

मां केशवो गदया प्रातरव्या-
द्गोविन्द आसण्गवमात्तवेणुः ।
नारायणः प्राह्ण उदात्तशक्ति-
र्मध्यन्दिने विष्णुररीन्द्रपाणिः ॥ २०॥

देवोऽपराह्णे मधुहोग्रधन्वा
सायं त्रिधामावतु माधवो माम् ।
दोषे हृषीकेश उतार्धरात्रे
निशीथ एकोऽवतु पद्मनाभः ॥ २१॥

श्रीवत्सधामापररात्र ईशः
प्रत्युष ईशोऽसिधरो जनार्दनः ।
दामोदरोऽव्यादनुसन्ध्यं प्रभाते
विश्वेश्वरो भगवान् कालमूर्तिः ॥ २२॥

चक्रं युगान्तानलतिग्मनेमि
भ्रमत्समन्ताद्भगवत्प्रयुक्तम् ।
दन्दग्धि दन्दग्ध्यरिसैन्यमाशु
कक्षं यथा वातसखो हुताशः ॥ २३॥

गदेऽशनिस्पर्शनविस्फुलिण्गे
निष्पिण्ढि निष्पिण्ढ्यजितप्रियासि ।
कूष्माण्डवैनायकयक्षरक्षो-
भूतग्रहांश्चूर्णय चूर्णयारीन् ॥ २४॥

त्वं यातुधान प्रमथ प्रेतमातृ-
पिशाचविप्राग्रहघोरदृष्टीं
दरेन्द्र विद्रावय कृष्णपूरितो
भीमस्वनोऽरेहृदयानि कम्पयन् ॥ २५॥

त्वं तिग्मधाराशिवरारिसैन्य-
मिशप्रयुक्तो मम छिन्धि छिन्धि
चक्षौंषि चर्मञ्चत्चन्द्र छादय
द्वेषमघोनां हर पापचक्षुषम् ॥ २६॥

यन्नो भयं ग्रहेभ्योऽभूत्केतुभ्यो नृभ्य एव च ।
सरीसृपेभ्यो दंष्ट्रिभ्यो भूतेभ्योंऽहोभ्य वा ॥ २७ ॥

सर्वाण्येतानि भगवन्नामरूपास्त्रकीर्तनात् ।
प्रयान्तु संक्षयं सद्यो ये नः श्रेयःप्रतीपकाः ॥ २८॥

गरुडो भगवान् स्तोत्रस्तोभश्छन्दोमयः प्रभुः ।
रक्षत्वशेषकृच्छ्रेभ्यो विष्वक्सेनः स्वनामभिः ॥ २९ ॥

सर्वापद्भ्यो हरेर्नामरूपयानायुधानि नः ।
बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान्पान्तु पार्षदभूषणाः ॥ ३०॥

यथा हि भगवानेव वस्तुतः सदसच्च यत् ।
सत्येनानेन नः सर्वे यान्तु नाशमुपद्रवाः ॥ ३१॥

यथैकात्म्यानुभावानां विकल्परहितः स्वयम् ।
भूषणायुधलिण्गाख्या धत्ते शक्तीः स्वमायया ॥ ३२॥

तेनैव सत्यमानेन सर्वज्ञो भगवान् हरिः ।
पातु सर्वैः स्वरूपैर्नः सदा सर्वत्र सर्वगः ॥ ३३॥

विदिक्षु दिक्षौरध्वमधः समन्ता-
दन्तर्बिर्भगवाननरसिंहः
प्रहपायनलोकभ्यं स्वेनेन
सत्जेसा जीतसमस्ततेजाः ॥ ३४॥

मेघवनिदमाख्यातं वर्म नारायणात्मकम्
विजेष्यस्यञ्जसा येन दंशितोऽसूरुथपान ॥ ३५॥

एतद्धारयमाणस्तु यं यं पश्यति चक्षुषा ।
पदा वा संस्पृशेत्सद्यः साध्वसात्स विमुच्यते ॥ ३६॥

न कुतश्चिद्भयं तस्य विद्यां धारयतो भवेत् ।
राजदस्युग्रहादिभ्यो व्याघ्रादिभ्यश्च कर्हिचित् ॥ ३७॥

इमां विद्यां पुरा कश्चित्कौशिको धारयन् द्विजः ।
योगधारणया स्वाण्गं जहौ स मरुधन्वनि ॥ ३८॥

तस्योपरि विमानेन गन्धर्वपतिरेकदा ।
ययौ चित्ररथः स्त्रीभिर्वृतो यत्र द्विजक्षयः ॥ ३९ ॥

गगनान्न्यपतत्सद्यः सविमानो ह्यवाक्षिराः ।
स वालखिल्यवचनादस्थीन्यादाय विस्मितः ।
प्रास्य प्राचीसरस्वत्यां स्नात्वा धाम स्वमन्वगात् ॥ ४०॥

श्रीशुक उवाच ।

य इदं शृणुयात्काले यो धारयति चादृतः ।
तं नमस्यन्ति भूतानि मुच्यते सर्वतो भयात् ॥ ४१॥

एतां विद्यामधिगतो विश्वरूपाच्छतक्रतुः ।
त्रैलोक्यलक्ष्मीं बुभुजे विनिर्जित्य मृधेऽसुरान् ॥ ४२॥

॥ इति श्रीमद्भागवतमहापुराणे पारमहंस्यां संहितायां
षष्ठस्कन्धे नारायणवर्मकथनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥

Bhagavad Gita Chapter 16: भगवद गीता सोलहवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता सोलहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 16) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता सोलहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 16) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

Bhagavad Gita Chapter 16

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Chapter 16 – दैवासुर संपदा विभाग योग (Daivasura Sampad Vibhaga Yoga)


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (1-2)

श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धि र्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥
अहिंसा सत्यमक्रोधस् त्यागः शान्तिरपैशुनम् ।
दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरंतर दृढ स्थिति और सात्त्विक दान, इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अंत:करण की सरलता| मन,वाणी और शरीर से किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण, अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अंत:करण की उपरति, किसी की भी निंदादि न करना लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव|

English Meaning – Shri Bhagwan said – Complete absence of fear, complete purity of conscience, constant steadfastness in meditation and yoga for spiritual knowledge and sattvik charity, suppression of senses, worship of God, deities and Mentors and conduct of good deeds like Agnihotra and the study of Vedas and scriptures. Reading and chanting God’s name and qualities, enduring hardships to follow one’s religion of conscience along with body and senses. Not hurting anyone with mind, speech or body, speaking truthfully and lovingly, not being angry even at those who do you harm, giving up the pride of being a doer in actions, obeying conscience, not criticizing anyone, people and Absence of shame and wasteful efforts in conduct contrary to the scriptures.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (3-4)

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति संपदं दैवीम भिजातस्य भारत ॥
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ संपदमासुरीम् ॥

हिंदी अर्थ – तेज, क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव – ये सब तो हे अर्जुन ! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण है| हे पार्थ ! दंभ, घमंड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी – ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण है|

English Meaning – Sharpness, forgiveness, patience, external purity, absence of enmity towards anyone and absence of pride in one’s own respectability. O Arjun! These are the characteristics of a man born with divine wealth. Hey Parth! Conceit and arrogance as well as anger and ignorance. All these are the characteristics of a man born with demonic wealth.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (5-6)

दैवी संपद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता ।
मा शुचः संपदं दैवीम भिजातोऽसि पाण्डव ॥
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽ स्मिन्दैव आसुर एव च ।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥

हिंदी अर्थ – दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है| इसलिए हे अर्जुन ! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है| हे अर्जुन ! इस लोक में भूतों की सृष्टी यानि मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला| उनमे से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन|

English Meaning – Divine wealth is considered for liberation and demonic wealth is considered for bondage. Therefore O Arjun! Do not mourn, because you were born with divine wealth. Hey Arjun! In this world the human community is of two types, one of divine nature and the other of demonic nature. Among them, those of divine nature were told in detail, now you should listen to me in detail about the human community of demonic nature also.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (7-8)

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः ।
न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते ॥
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥

हिंदी अर्थ – आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृति और निवृति – इन दोनों को ही नहीं जानते| इसलिए उनमे न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है| वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते है कि जगत आश्रयरहित, सर्वथा, असत्य और बिना ईश्वर के, अपने आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है| इसके सिवा और क्या है?

English Meaning – People with a demonic nature do not know both nature and retirement. That is why there is neither inner and outer purity in them nor good conduct nor truthful speech. Those people of demonic nature say that the world is without shelter, completely false and without God, it is created automatically only by the union of man and woman, hence only lust is the reason for it. What else is there besides this?


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (9-10)

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद्‌गृहीत्वासद्ग्राहान् प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥

हिंदी अर्थ – इस मिथ्या ज्ञान को अवलंबन करके जिनका स्वभाव नष्ट हो गया तथा जिनकी बुद्धि मंद है, वे सब अपकार करने वाले क्रूरकर्मी मनुष्य केवल जगट के नाश के लिए ही समर्थ होते है| वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते है|

English Meaning – By relying on this false knowledge, those whose nature has been destroyed and whose intelligence is dull, those cruel people who commit evil are capable only of destroying the world. Those people full of arrogance, pride and pride wander in the world taking refuge in desires that cannot be fulfilled, adopting false principles through ignorance and adopting corrupt practices.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (11-12)

चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोगपरमा एतावदिति निश्चिताः ॥
आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः ।
ईहन्ते कामभोगार्थमन् यायेनार्थसञ्चयान् ॥

हिंदी अर्थ – तथा वे मृत्युपर्यंत रहने वाली असंख्य चिंताओं का आश्रय लेने वाले, विषयभोगों के भोगने में तत्पर रहने वाले और ‘इतना ही सुख है’ इस प्रकार मानने वाले होते है| वे आशा की सैंकड़ों फांसियों से बंधे हुए मनुष्य काम-क्रोध के परायण होकर विषय भोगों के लिए अन्यायपूर्वक धनादि पदार्थों का संग्रह करने की चेष्टा करते है|

English Meaning – And they take shelter from innumerable worries that last till death, are ready to enjoy sensual pleasures and believe in the sense that ‘there is only so much happiness’. Those people, tied with hundreds of nooses of hope, become dependent on lust and anger and try to accumulate wealth etc. unjustly for the sake of sensual pleasures.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (13-14)

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥

हिंदी अर्थ – वे सोचा करते है कि मैंने आज यह प्राप्त कर लिया और अब इस मनोरथ को प्राप्त कर लूँगा| मेरे पास यह इतना धन है और फिर भी यह हो जाएगा| मैंने उस शत्रु को मार डाला है और मैं दूसरों को भी मार डालूँगा| मैं स्वामी हूं, मैं भोक्ता हूं, मैं परिपूर्ण हूं, मैं बलवान और प्रसन्न हूं।

English Meaning – They think that I have achieved this today and now I will achieve this desire. You need to know that I have this much money and yet it will happen. I have killed that enemy and I will kill others too. I am the master and the enjoyer, I am complete, I am strong and happy.

Bhagavad Gita Chapter 16

Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (15-16)

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥

हिंदी अर्थ – मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुंब वाला हूँ| मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान करूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा| इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यंत आसक्त आसुरलोग महान अपवित्र नरक में गिरते है|

English Meaning – I am very rich and have a big family. Who else is like me? I will perform yagya, donate and have fun. In this way, the demonic people, who are deluded by ignorance and have confused minds in many ways, entangled in the web of illusion and extremely attached to sensual pleasures, fall into the great impure hell.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (17-18)

आत्मसंभाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः ।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं च संश्रिताः ।
मामात्मपरदेहेषु प्रद्विषन्तोऽभ्यसूयकाः ॥

हिंदी अर्थ – वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमंडी पुरुष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते है| वे अहंकार, बल, घमंड, कामना और क्रोधादि के परायण और दूसरों की निंदा करने वाले पुरुष अपने और दूसरों के शरीर में स्थित मुझ अन्तर्यामी से द्वेष करने वाले होते है|

English Meaning – Those arrogant men, who consider themselves superior and are intoxicated with wealth and honour, hypocritically perform yagyas without the scriptures through nominal yagyas. Those people who are addicted to ego, force, pride, desire and anger etc. and who criticize others are the ones who hate the inner self present in their own and others’ bodies.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (19-20)

तानहं द्विषतः क्रुरान् संसारेषु नराधमान् ।
क्षिपाम्यजस्रमशुभाना सुरीष्वेव योनिषु ॥
आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम् ॥

हिंदी अर्थ – उन द्वेष करने वाले पापचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ| हे अर्जुन ! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते है, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते है अर्थात घोर नरकों में पड़ते है|

English Meaning – I repeatedly put those malicious, sinful and cruel people in the world into demonic species. Hey Arjun! Those fools, without attaining Me, attain demonic birth in every birth. then attain even lower levels, that is, they fall into severe hells.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (21-22)

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस् तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥
एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः ।
आचरत्यात्मनः श्रेयस् ततो याति परां गतिम् ॥

हिंदी अर्थ – काम, क्रोध तथा लोभ – ये तीन प्रकार के नरक के द्वार आत्मा का नाश करने वाले अर्थात उसको अधोगति में ले जाने वाले है| अतएव इन तीनों को त्याग देना चाहिए| हे अर्जुन ! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है| इससे वह परमगति को जाता है अर्थात मुझको प्राप्त हो जाता है|

English Meaning – Lust, anger and greed – these three types of gates of hell destroy the soul i.e. take it to degradation. Therefore these three should be abandoned. Hey Arjun! The man freed from these three gates of hell pursues his welfare. By this he goes to the ultimate goal i.e. he attains me.


Bhagavad Gita Chapter 16 Verse (23-24)

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः ।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् ॥
तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही| इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है| ऐसा जानकार तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है|

English Meaning – The person who abandons the scriptures and behaves as per his wish, neither attains success, nor attains the supreme path, nor attains happiness. Therefore, for you the scriptures are the only proof in this system of duties and non-duties. Knowing this, you are capable of doing only the work prescribed by the scriptures.


भगवद गीता सोलहवाँ अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 15: भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 15) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 15) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय

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Chapter 15 – पुरुषोत्तम योग (Purushottama Yoga)


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (1-2)

श्रीभगवानुवाच ऊर्ध्वमूलमधःशाखम श्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥
अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मा रूप मुख्य शाखा वाले जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी कहते है तथा वेद जिसके पत्ते कहे गए है, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व को जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है| उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली देव, मनुष्य और तिर्यक् आदि योनिरूप शाखाएँ नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई है तथा मनुष्य लोक में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़े भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही है|

English Meaning – Shri Bhagwan said – The world form the Peepal tree which is called imperishable and whose leaves are called Vedas, having the origin in the form of Adipurusha God and the main branch in the form of Brahma, the one who knows the essence of Sattva along with the Purusha root, can understand the meaning of the Vedas. I am going to know. The branches of that world tree, which have grown through water in the form of three gunas and have buds in the form of sensual pleasures, gods, human beings and oblique etc., are spread everywhere below and above, and the roots in the form of ego, attachment and lust, which bind the human world according to their deeds, are also below. And above it is spreading all over the world.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (3-4)

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च संप्रतिष्ठा ।
अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ॥
ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः ।
तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी ॥

हिंदी अर्थ – इस संसार रूपी वृक्ष का स्वरुप जैसा बताया गया है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता है|क्योंकि न तो इसका आदि है और न अंत है तथा न इसकी अच्छी प्रकार की स्थिति है| इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ वैराग्य रूप शास्त्र द्वारा काटकर उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभांति खोजना चाहिए, जिसमे गए हुए पुरुष पुनः इस संसार में लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ – इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए|

English Meaning – The form of the tree of this world as described here is not found in the time of thought because it neither has a beginning nor an end nor does it have a good state. Therefore, this Peepal tree of the world, which has very strong roots in the form of egoism, attachment and lust, should be cut down through the scriptures in the form of strong dispassion and after that one should thoroughly search for that supreme form of God, in whom the men who have gone do not come back to this world again and in whom The tendency of this ancient world tree to expand has been received from God, I take refuge in the same Adipurush Narayana – in this way, with a strong determination, one should meditate and meditate on that God.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (5-6)

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥
न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥

हिंदी अर्थ – जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है| जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरुप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएं पूर्ण रूप से नष्ट हो गई है – वे सुख-दुःख नामक से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते है| जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चंद्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है|

English Meaning – Whose respect and attachment have been destroyed. Those who have conquered the defect of attachment, who have a constant state in the form of God and whose desires have been completely destroyed – those knowledgeable people who are free from the so-called pleasures and pains, attain that imperishable supreme state. Neither the sun, nor the moon, nor even fire can illuminate that supreme state, the light of which humans do not return to this world, that is my ultimate abode.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (7-8)

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
गृहित्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥

हिंदी अर्थ – इस शरीर में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पांचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है| वायु गंध के स्थान से गंध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है – उसमे जाता है|

English Meaning – This soul in this body is my eternal part and it attracts the mind and the five senses located in this nature. Just as the air absorbs the smell from the place of smell, in the same way, the physical master soul also absorbs the senses along with the mind from the body which it leaves and then goes into the body which it receives.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (9-10)

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ॥
उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ॥

हिंदी अर्थ – यह जीवात्मा श्रोत, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके – अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है| शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते है|

English Meaning – This living soul consumes the objects by taking shelter of the source, eyes and skin and with the help of taste, smell and mind – that is, with the help of all these. Ignorant people do not know the one leaving the body or the one present in the body or the one enjoying the objects. Thus, even the ignorant people do not know the one having all three qualities; only the discriminating knowledgeable ones with the eyes of knowledge know it from the element.

भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय

भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (11-12)

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः ॥
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥

हिंदी अर्थ – यत्न करने वाले योगीजन भी अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को तत्त्व से जानते है, किन्तु जिन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया है, ऐसे अज्ञानीजन तो यत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं जानते है| सूर्य में स्थित जो तेज सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करता है तथा जो तेज चंद्रमा में है और जो अग्नि में है – उसको तू मेरा ही तेज जान|

English Meaning – Yogis who make efforts also know this soul present in their heart in principle, but those who have not purified their conscience, such ignorant people do not know this soul even after making efforts. The glory that is present in the Sun illuminates the whole world, the glory that is in the Moon and the glory that is in the fire – you know that to be my glory.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (13-14)

गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः ॥
अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ॥

हिंदी अर्थ – और मैं ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति में सब भूतों को धारण करता हूँ और रस्स्वरूप अर्थात अमृतमय चंद्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को अर्थात वनस्पतियों को पुष्ट करता हूँ| मैं ही सब प्राणियों के शरीर में स्थित रहने वाला प्राण और अपान से संयुक्त वैश्वानर अग्निरूप होकर चार प्रकार के अन्न को पचाता हूँ|

English Meaning – And I, entering the earth, hold all the ghosts under my power and in the form of essence i.e. nectar-filled moon, I nourish all the medicines i.e. plants. I am the one present in the bodies of all living beings, combined with Prana and Apana, in the form of Vaishwanar Agni, who digests the four types of food.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (15-16)

सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

हिंदी अर्थ – मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ| इस संसार में नाशवान और अविनाशी भी ये दो प्रकार के पुरुष है| इनमे सम्पूर्ण भूतप्राणियों के शरीर तो नाशवान और जीवात्मा अविनाशी कहा जाता है|

English Meaning – I am the one who is present internally in the heart of all living beings and it is from me that memory, knowledge and education take place and I am the only one capable of being known through all the Vedas and I am the doer of Vedanta and the knower of the Vedas. There are two types of men in this world, perishable and immortal. In these, the bodies of all the living beings are said to be perishable and the soul is said to be indestructible.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (17-18)

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ॥
यस्मात्क्षरमतीतो ऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प् रथितः पुरुषोत्तमः ॥

हिंदी अर्थ – इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा – इस प्रकार कहा गया है| क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग – क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ|

English Meaning – There is someone else who is better than these two, who enters all three worlds and sustains everyone and is the imperishable God and Supreme Soul – it has been said thus. Because I am completely beyond the perishable material world and am better than the immortal soul, hence I am famous in the world and in the Vedas by the name Purushottam.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय श्लोक (19-20)

यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ॥
इति गुह्यतमं शास्त्र मिदमुक्तं मयानघ ।
एतद्‌बुद्ध्वा बुद्धिमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥

हिंदी अर्थ – भारत ! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरंतर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है| हे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्त्व से जानकार मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है|

English Meaning – Bharat ! The knowledgeable person who knows me to be the Supreme Being by nature, that omniscient person continuously worships me, Lord Vasudev, in every way. O sinless Arjun! I have told this very mysterious confidential scripture in such a way that a person who knows it in principle becomes knowledgeable and fruitful.


भगवद गीता पंद्रहवाँ अध्याय समाप्त


Utpanna Ekadashi Vrat Katha: उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा: हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है| पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| मान्यताओं के अनुसार इस एकादशी में भगवान विष्णु के साथ ही देवी एकादशी की पूजा भी की जाती है| यह उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत तथा पूजन भगवान श्री विष्णु को समर्पित माना जाता है|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

इस उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के बारे में एक मान्यता है जो कि काफी पुराने समय से चली आ रही है कि मार्गशीर्ष महीने के 11 वे दिन भगवान विष्णु के शरीर से एक देवी उत्पन्न हुई थी| इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| आज हम लेख के माध्यम से आपको उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के महत्व एवं उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा (Utpanna Ekadashi Vrat Katha) के बारे में आपको बताएँगे|

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उत्पन्ना एकादशी का महत्व – Importance Of Utpanna Ekadashi

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे भगवन ! मैंने कार्तिक शुक्ल एकादशी जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण बोले कि मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| शंखोद्धार तीर्थ स्थान में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, वह उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत करने के समान होता है| माना जाता है कि उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत करने वाले व्यक्ति को चोर, निंदक अथवा झूठ बोलने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए| इस उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा (Utpanna Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही महत्व बताया है| जिसे अब मैं तुमसे कहूंगा|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा – Utpanna Ekadashi Vrat Katha

सतयुग काल में एक मुर नाम का राक्षस उत्पन्न हुआ| वह इतना शक्तिशाली था कि दैत्य इंद्र, आदित्य, वसु, वायु तथा अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित कर दिया था| उसके राक्षस के आतंक से परेशान होकर सभी देवतागण भगवान शिव के पास गए तथा उन्हें पूरा वृतांत बताते हुए कहा कि हे महादेव ! मुर दैत्य से भयभीत होकर देवता मृत्यु लोक में फिर रहे है| इस भगवान शिव ने कहा – हे देवताओं ! आप सभी इस सृष्टि के पालनहार, अपने भक्तों के दुखों को दूर करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ|

इसमें वह आपकी सहायता अवश्य करेंगे| भगवान शिव के कहने पर सभी देवता भगवान विष्णु के पास सहायता के लिए पहुंचे| भगवान विष्णु को शयन करते हुए देखकर सभी देवतागण उनकी स्तुति करने लग गए तथा उनसे कहा कि हे देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन ! आपको नमस्कार है| कृपया आप हमारी रक्षा करे| हम सभी देवता मुर राक्षस से भयभीत होकर आपकी शरण में आये है| आप ही इस सम्पूर्ण जगत के पालनकर्ता तथा संहार करने वाले है| आप ही सभी जीवो को शांति प्रदान करते है| आकाश और पाताल भी आप ही है| आप बिना एक संसार में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है|

हे प्रभु ! राक्षसों ने हमे पराजित करके स्वर्ग से बाहर भगा दिया है| हम सभी देवता उन असुरों से भयभीत होकर इधर-उधर भागते फिर रहे है| कृपया उनसे हमारी रक्षा करे| इंद्र देव को भयभीत देखकर भगवान विष्णु ने उनसे पूछा कि हे इन्द्रदेव ! ऐसा कौन मायावी राक्षस आया है जिसने सभी देवताओं को पराजित कर दिया, वह कितना बलशाली है, कहाँ है तथा किसकी शरण में है| यह सब मुझे बताओ| भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर इंद्रदेव ने कहा हे भगवन ! प्राचीन काल में एक नाडीजंघ नामक राक्षस था| यह राक्षस उसी का पुत्र है तथा इसका नाम मुर है|

इसने सभी देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से बाहर निकल दिया तथा अब स्वयं स्वर्ग लोक पर अपना अधिकार करके बैठा है| उसने इंद्र, अग्नि, यम, वायु, चंद्रमा, आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है| वह स्वयं ही सूर्य बनकर प्रकाश कर रहा है व स्वयं ही मेघ बना हुआ है| हे प्रभु ! हम सभी आपसे विनती करते है कि राक्षस का वध करके देवताओं को अजेय बनाइये|

देवताओं द्वारा यह वचन सुनकर भगवान विष्णु ने कहा – हे देवताओं ! मैं अतिशीघ्र ही उस असुर का संहार करूँगा| तुम सभी चन्द्रावती नगर जाओं| इसी के साथ भगवान विष्णु के सहित सभी देवताओं में चन्द्रावती नगर की ओर प्रस्थान किया| जब सभी देवता भगवान विष्णु के साथ वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राक्षस मुर सेना सहित उनकी प्रतीक्षा कर रहा था| युद्धभूमि में उस असुर मुर की गर्जना से सभी देवता भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे| जब भगवान विष्णु युद्धभूमि में आए तो सभी राक्षस उन पर भी आक्रमण करने लग गए|

किन्तु भगवान विष्णु ने सर्प की भांति उन सभी असुरों को अपने बाणों से मार दिया| युद्ध में बहुत सारे दैत्य मारे गए लेकिन मुर बच रहा| वह अविचल भाव से भगवान से युद्ध कर रहा था| भगवान विष्णु के द्वारा चलाए गए बाणों से पूरा शरीर छिन्न- भिन्न हो गया किन्तु इसके पश्चात भी यह युद्ध करता रहा| भगवान विष्णु तथा राक्षस मुर का युद्ध 10 हज़ार वर्षों तक चलता रहा लेकिन फिर भी वह राक्षस नहीं हारा| इतने समय तक मुर से युद्ध करने की वजह से भगवान विष्णु थककर बद्रिकाश्रम चले गए|

उस स्थान पर एक हेमवती नामक बहुत ही सुन्दर गुफा स्थित थी| माना जाता है कि यह गुफा लगभग 12 योजन लम्बी तथा केवल इसका एक ही द्वार था| भगवान विष्णु उस गुफा में जाकर योगनिद्रा की गोद में जाकर सो गए| वह मुर राक्षस भी भगवान विष्णु के पीछे-पीछे उस गुफा में आ गया| भगवान विष्णु को सोया हुआ देख वह राक्षस भगवान को मारने के उद्यत हुआ| उसी क्षण भगवान विष्णु के शरीर से कांतिमय रूप वाली एक देवी प्रकट हुई| देवी ने उस असुर को ललकारा तथा उससे युद्ध करके उसे तत्काल ही मार दिया|

जब भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागे तो सारी बातें जानने के पश्चात भगवान विष्णु ने उन देवी से कहा कि आपने एकादशी के दिन जन्म लिया है अतः आप इस सम्पूर्ण संसार में उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से पूजित होंगी तथा जो मेरे भक्त होंगे, वह आपके भी भक्त होंगे|

Bhagavad Gita Chapter 14: भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय अर्थ सहित

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भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय

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Chapter 14 – गुणत्रय विभाग योग (Gunatraya VibhagYog)


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (1-2)

श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ॥
इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः ।
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए है| इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते|

English Meaning – Shri Bhagwan said – I will again tell you about that ultimate knowledge which is the best among all the knowledges, knowing which all the sages have become free from this world and have attained the supreme accomplishment. By taking shelter of this knowledge i.e. by imbibing it, the people who attain my form are not reborn in the beginning of creation and do not get troubled even in the time of destruction.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (3-4)

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥
सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! मेरी महत-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधीन का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ| उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति होती है| हे अर्जुन ! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते है, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ|

English Meaning – Hey Arjun! My Mahat-Brahma form basic nature is the vagina of all the beings, that is, the place of the pregnant and I establish the womb in the form of a conscious community in that vagina. All the ghosts are born from the combination of that inanimate and animate. Hey Arjun! Nature is the mother who conceives all the idols i.e. embodied beings that are born in different types of species and I am the father who plants the seeds.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (5-6)

सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ॥
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात् प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण – ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बांधते है| हे निष्पाप ! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बांधता है|

English Meaning – Hey Arjun! Sattva Guna, Rajo Guna and Tamo Guna – these three qualities generated by nature bind the indestructible soul in the body. O innocent one! Among those three qualities, Sattva Guna, being pure, is illuminating and free from disorders, it binds us in the relationship of happiness and in the relationship of knowledge, that is, in its pride.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (7-8)

रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्गसमुद्भवम् ।
तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्गेन देहिनम् ॥
तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम् ।
प्रमादालस्यनिद्राभिस् तन्निबध्नाति भारत ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान| वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध में बांधता है| हे अर्जुन ! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान| वह इस जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निंद्रा द्वारा बांधता है|

English Meaning – Hey Arjun! Know that Rajogun, the form of passion, is born out of desire and attachment. He binds this soul in relation to his actions and their results. Hey Arjun! The Tamo Guna, which fascinates all body-conscious people, is known to be born out of ignorance. He binds this soul through carelessness, laziness and sleep.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (9-10)

सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत ।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत ॥
रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत ।
रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाना है| हे अर्जुन ! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है|

English Meaning – Hey Arjun! Sattva guna is used in happiness and Rajogun in action and Tamo guna has to be used in carelessness even after covering the knowledge. Hey Arjun! By suppressing Rajogun and Tamogun, Sattvagun is formed, by suppressing Sattvagun and Tamogun, Rajogun, similarly by suppressing Satvagun and Rajogun, Tamogun is formed i.e. increases.

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (11-12)

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन् प्रकाश उपजायते ।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्वि वृद्धं सत्त्वमित्युत ॥
लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥

हिंदी अर्थ – जिस समय इस देह में तथा अंत:करण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है,उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है| हे अर्जुन ! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशांति और विषय भोगों की लालसा – ये सब उत्पन्न होते है|

English Meaning – At the time when consciousness and discrimination power arises in the body, conscience and senses, at that time it should be known that the Sattva Guna has increased. Hey Arjun! With the increase of Rajogun, greed, tendency to selfishness, initiation of actions with a sense of purpose, restlessness and craving for sensual pleasures – all these arise.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (13-14)

अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च ।
तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन ॥
यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत् ।
तदोत्तमविदां लोकान मलान्प्रतिपद्यते ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! तमोगुण के बढ़ने पर अन्त:करण और इन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृति और प्रमाद अर्थात् व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्त:करण की मोहिनी वृत्तियाँ – ये सब ही उत्पन्न होते है| जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालो के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है|

English Meaning – Hey Arjun! With the increase of Tamoguna, darkness in the conscience and senses, disinterest in duties and carelessness i.e. useless efforts and sleep etc., all these arise. When this man dies in the growth of Sattva Guna, then those who do good deeds reach the pure divine heavenly worlds.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (15-16)

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥
कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम् ।
रजसस्तु फलं दुःखम ज्ञानं तमसः फलम् ॥

हिंदी अर्थ – रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है| श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात सुख,ज्ञान और वैराग्यादी निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है|

English Meaning – With the increase of Rajoguna, after attaining death, it is born in humans who are attached to deeds and with the increase of Tamoguna, a dead person is born in the worlds of insects, animals etc. The result of good deeds is called sattvik i.e. happiness, knowledge and the pure result of detachment, the result of rajasic deeds is sorrow and the result of tamasic deeds is ignorance.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (17-18)

सत्त्वात्संजायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च ।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥
ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः ।
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः ॥

हिंदी अर्थ – सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से नि:संदेह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद और मोह उत्पन्न होते है और अज्ञान भी होता है| सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते है, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते है और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते है|

English Meaning – Knowledge arises from Sattva Guna and undoubtedly greed arises from Rajo Guna and ignorance and delusion arise from Tamo Guna and also ignorance. The men situated in Sattva Guna go to the higher worlds like heaven, the Rajas men situated in Rajo Guna remain in the middle i.e., the human world only and the Tamasic men situated in the form of sleep, carelessness and laziness etc. in Tamo Guna go to the lower worlds i.e. to the lower worlds like insects, animals etc. and hells. are received.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (19-20)

नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति ।
गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति ॥
गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान् ।
जन्ममृत्युजरादुःखै र्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥

हिंदी अर्थ – जिस समय दृष्टातीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यंत परे सच्चिदानन्दघनस्वरुप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है| यह पुरुष शरीर की उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है|

English Meaning – When the doer does not see anyone other than the three gunas and knows me as the Supreme Being in the true form beyond all three gunas, at that time he attains my form. By violating these three qualities which are the reason for the origin of the male body, he attains bliss and becomes free from birth, death, old age and all kinds of sorrows.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (21-22)

अर्जुन उवाच
कैर्लिङ्गैस्त्रीन्गुणाने तानतीतो भवति प्रभो ।
किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन् गुणानतिवर्तते ॥
श्रीभगवानुवाच प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव ।
न द्वेष्टि संप्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्क्षति ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो ! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? श्री भगवान बोले – हे अर्जुन ! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह को भी न प्रवृत होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत होने पर उनकी आकांक्षा करता है|

English Meaning – Arjun said – What are the characteristics of a person who is beyond these three qualities and what kind of behaviour does he have? O Lord! By what means does a human being transcend these three qualities? Shri Bhagwan said – O Arjun! The man who neither hates the light in the form of sattva guna, the tendency in the form of Rajo guna nor the attachment in the form of tamo guna when they are active nor hates them when they are retired nor aspires for them when they are retired.

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय

भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (23-24)

उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते ।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्गते ॥
समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः ।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस् तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥

हिंदी अर्थ – जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते है – ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता| जो निरंतर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निंदा स्तुति में भी समान भाव वाला है|

English Meaning – The one who is situated like a witness cannot be disturbed by the qualities and understands that the qualities are the qualities – the one who remains united in the true God and never deviates from that state. One who is constantly situated in the sense of self, who considers sorrow and happiness equally, who has equal feelings towards soil, stone and gold, who is wise, considers the beloved and the unpleasant equally and who has equal feelings even in his praise and criticism.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (25-26)

मानापमानयोस् तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः ।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥
मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते ।
स गुणान्समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

हिंदी अर्थ – जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है| और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग द्वारा मुझको निरंतर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभांति लांघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है|

English Meaning – The person who is equal in respect and insult, is equal in favour of friend and foe and is free from the pride of being a doer in all the beginnings, that person is called Gunatit. And the person who continuously worships me through unadulterated bhakti yoga also becomes eligible to attain Sachchidanandaghan Brahma by transcending these three qualities.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय श्लोक (27)

ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम मृतस्याव्ययस्य च ।
शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च ॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखंड एकरस आनंद का आश्रय मैं हूँ|

English Meaning – Because I am the shelter of that imperishable Supreme Brahma and of nectar and of eternal religion and unbroken and constant bliss.


भगवद गीता चौदहवाँ अध्याय समाप्त


Bhagavad Gita Chapter 13: भगवद गीता तेरहवां अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता तेरहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 13) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता तेरहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 13) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता तेरहवां अध्याय

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Chapter 13 – क्षेत्र – क्षेत्रज्ञविभागयोग (Ksetra-Ksetrajnay VibhagYog)


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (1-2)

श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते ।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ॥
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज् ज्ञानं मतं मम ॥

हिंदी अर्थ – श्री भगवान बोले – हे अर्जुन ! यह शरीर ‘क्षेत्र’ (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजो का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम ‘क्षेत्र’ ऐसा कहा है) इस नाम से कहा जाता है और इसके बारे में जो जानता है, उसको ‘क्षेत्रज्ञ’ इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते है| हे अर्जुन ! तू सभी क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से जानना है, वह ज्ञान है – यह मेरा मत है|

English Meaning – Shri Bhagwan said – O Arjun! This body is ‘Kshetra’ (just as the corresponding fruits of the seeds sown in the field appear at the right time, in the same way, the results of the seeds in the form of rituals sown in it appear at the time, hence its name ‘Kshetra’ is said to be like this) It is called by this name and the one who knows about it is called ‘Kshetragya’, the knowledgeable person who knows its element by this name. Hey Arjun! In all areas, the field of life, that is, I want to know the life and field, that is, the element of nature and man with disorder is knowledge – this is my opinion.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (3-4)

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ॥
ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुम द्भिर्विनिश्चितैः ॥

हिंदी अर्थ – वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है – वह सब संक्षेप में मुझसे सुन| यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमंत्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभांति निश्चय किए हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है|

English Meaning – The field which is like that and the disorders it has and the reason for whatever has happened and also the field expert and the effect it has – hear all that from me in brief. This element of Kshetra and Kshetragya has been said in many ways by the sages and has also been said in detail through various Veda mantras and has also been said in the well-decided verses of the Brahma Sutra.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (5-6)

महाभूतान्यहंकारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं संघातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थ – पांच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पांच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना और धृति – इस प्रकार विकारों के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया|

English Meaning – Five great elements, ego, intellect and basic nature as well as ten senses, one mind and objects of five senses i.e. sound, touch, form, taste and smell and desire, hatred, happiness, sorrow, the mass of the physical body, consciousness and awareness – thus This area including disorders was briefly stated.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (7-8)

अमानित्वमदम्भित्व महिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यम नहंकार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधि दुःखदोषानुदर्शनम् ॥

हिंदी अर्थ – श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अंत:करण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना

English Meaning – Absence of pride of superiority, absence of arrogance, not torturing any living being in any way, forgiving spirit, simplicity of mind, speech etc., service to Mentor with devotion and devotion, purity of inside and outside, stability of conscience and mind. – Control over the body including the senses, lack of attachment to all the pleasures of this world and the next world and also lack of ego, repeatedly thinking about the sorrows and faults in birth, death, old age and disease etc.

भगवद गीता तेरहवां अध्याय

भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (9-10)

असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्व मिष्टानिष्टोपपत्तिषु ॥
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्व मरतिर्जनसंसदि ॥

हिंदी अर्थ – पुत्र, स्त्री, घर और धन आदि में आसक्ति का अभाव, ममता क न होना तथा प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही चित्त का सम रहना| मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकांत और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना|

English Meaning – Lack of attachment to son, wife, home and wealth etc., absence of affection and always remaining equanimous in attaining the beloved and the unloved. I have unadulterated devotion through exclusive yoga to God and the nature of living in a secluded and pure country and not having love in the company of sensual people.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (11-12)

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्त मज्ञानं यदतोऽन्यथा ॥
ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते ।
अनादि मत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ॥

हिंदी अर्थ – अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना – यह सब ज्ञान है तथा जो भी इसके विपरीत है वह अज्ञान है – ऐसा कहा है| जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकार मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभांति कहूँगा| वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत ही कहा जाता है, न असत ही|

English Meaning – It is said that in spiritual knowledge, seeing only God as the meaning of eternal state and Tatvgyan – all this is knowledge and whatever is contrary to it is ignorance. I will tell you clearly what is worth knowing and when a person knows it, he attains bliss. That eternal Supreme Brahma is said to be neither true nor false.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (13-14)

सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् ।
सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च ॥

हिंदी अर्थ – वह सब ओर हाथ – पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है| (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है|

English Meaning – He has arms and legs everywhere, eyes, head and mouth everywhere and ears because He is present in the world pervading everyone. (Just as the sky, being the causal form of air, fire, water and earth, pervades them, in the same way, God, being the causal form of all, pervades the entire living world) He is the knower of all the objects of the senses, But in reality, He is devoid of all senses and despite being free from attachment, He is the one who sustains everything and despite being devoid of qualities, He is the one who enjoys the qualities.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (15-16)

बहिरन्तश्च भूतानाम चरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥
अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम् ।
भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च ॥

हिंदी अर्थ – वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है| और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में और दूर में भी स्थित वही है| वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है|

English Meaning – That moving being is perfect within and outside all the ghosts and the moving and moving things are also the same. And due to being subtle, it is undetectable (just as the water situated in the rays of the sun is not known to ordinary people due to its subtle nature, in the same way, the omnipresent God is also not known to ordinary people due to being subtle) and is very close and The same is located even in the distance. That God, despite being perfect like the sky without divisions, appears to be divided into all living beings and that knowable God is the one who sustains and nourishes the ghosts in the form of Vishnu, the destroyer in the form of Rudra and the one who creates everyone in the form of Brahma.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (17-18)

ज्योतिषामपि तज्ज्योति स्तमसः परमुच्यते ।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम् ॥
इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥

हिंदी अर्थ – वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति एवं माया से अत्यंत परे कहा जाता है| वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप में स्थित है| इस प्रकार क्षेत्र तथा ज्ञान और जानने योग्य परमात्मा का स्वरुप संक्षेप में कहा गया है| मेरा भक्त इसको तत्व से जानकर मेरे स्वरुप को प्राप्त होता है|

English Meaning – Parabrahma of lights is also said to be extremely beyond light and illusion. That God is in the form of understanding, knowable and attainable through Tatvgyan and is situated in a special form in everyone’s heart. In this way, the scope, knowledge and nature of the knowable God have been stated in brief. My devotee, knowing this from its essence, attains my form.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (19-20)

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसंभवान् ॥
कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥

हिंदी अर्थ – प्रकृति और पुरुष – इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान| कार्य और करण को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है|

English Meaning – Prakriti and Purusha – consider both of them as eternal and consider the vices of attachment and aversion and all the threefold things as originating from Prakriti only. Prakriti is said to be the cause in producing actions and deeds and the soul is said to be the cause in being an enjoyer of pleasures and sorrows.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (21-22)

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‌क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ॥
उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥

हिंदी अर्थ – प्रकृति में स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थो को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है| इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है| वह साक्षी होने से उपद्रष्टा द्रिशौर यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा – ऐसा कहा गया है|

English Meaning – The man situated in nature enjoys the threefold substances produced by nature and the association of these qualities is the reason for this soul to be born in good and bad species. This soul present in this body is actually God. It has been said that he is a witness by being the sub-inspector, Drishaur, by being a giver of accurate advice, a permitter by being the sustainer of all, a enjoyer by the form of a living being, Maheshwar by being the master of Brahma etc. and a Supreme Soul by being pure Sachchidanandghan – it has been said.

भगवद गीता तेरहवां अध्याय

भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (23-24)

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ॥
ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ॥

हिंदी अर्थ – इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सही प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है (दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से क्षणभंगुर, नाशवान, जड़ और अनित्य है तथा जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ही सनातन अंश है, इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थो के संग का सर्वथा त्याग करके परम पुरुष परमात्मा में ही एकीभाव से नित्य स्थित रहने का नाम उनको ‘तत्व से जानना’ है) वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता| उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान द्वारा हृदय में देखते है, अन्य कितने ही ज्ञानयोग द्वारा और दुसरे कितने ही कर्मयोग द्वारा देखते है अर्थात प्राप्त करते है|

English Meaning – In this way, the true nature of the Purusha and the qualities which man knows from the element (the entire visible world being the work of Maya is transitory, perishable, inert and impermanent and the living soul is eternal, conscious, disorderless and indestructible and pure, the form of understanding, of Sachchidanandaghan Paramatma. He is the eternal part, understanding it in this way and completely renouncing the company of all the worldly objects and constantly remaining united with the Supreme Soul, the name of knowing Him from the essence is that even after doing all the duties, one is not born again. Some people see that God in the heart through meditation with purified subtle intellect, some others see it through Gyan Yoga and still others see it i.e. attain it through Karma Yoga.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (25-26)

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते ।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ॥
यावत्संजायते किंचित् सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगा त्तद्विद्धि भरतर्षभ ॥

हिंदी अर्थ – परन्तु इनसे दुसरे अर्थात जो मंद्बुद्धिवाले पुरुष है, वे इस प्रकार न जानते हुए दुसरे से अर्थात तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते है और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार-सागर को नि:संदेह तर जाते है| हे अर्जुन ! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते है, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान|

English Meaning – But others, i.e. those who are dull-witted, without knowing in this way, they worship accordingly only after hearing from others, i.e. from the men who know the elements, and those men who are devoted to hearing, also cross the world-ocean of death without any doubt. Hey Arjun! Yavan, all the living and movable creatures that are born, know them to be born only from the combination of the field and the expert in the field.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (27-28)

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ॥
समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम् ।
न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम् ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है वही यथार्थ देखता है| क्योंकि जो पुरुष सब में समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है|

English Meaning – The person who sees God as immortal and equanimous in all perishable living beings, only he sees reality. Because the person who does not destroy himself by seeing God as equal in everything, attains the ultimate goal.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (29-30)

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।
यः पश्यति तथात्मान मकर्तारं स पश्यति ॥
यदा भूतपृथग्भावमे कस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा ॥

हिंदी अर्थ – और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है तथा आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है| जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है|

English Meaning – And the person who sees all the actions being done by nature in all respects and sees the soul as the non-doer, only he sees the reality. The moment this man sees the separate feelings of the ghosts located in one God and the expansion of all the ghosts from that God, at that very moment he attains Sachchidanandaghan Brahma.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (31-32)

अनादित्वान्निर्गुणत्वात् परमात्मायमव्ययः ।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥
यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न ही लिप्त होता है| जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता|

English Meaning – Hey Arjun! Being eternal and having no qualities, this indestructible God, despite being present in the body, neither actually does anything nor gets involved. Just as the everywhere-pervading sky does not get attached because it is subtle, similarly the soul present everywhere in the body does not get attached to the qualities of the body because it is devoid of any qualities.

भगवद गीता तेरहवां अध्याय

भगवद गीता तेरहवां अध्याय श्लोक (33-34)

यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत ॥
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है| इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते है, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते है|

English Meaning – Hey Arjun! Just as one sun illuminates the entire universe, similarly one soul illuminates the entire region. In this way, those men who know the difference between the field and the expert and to be free from nature along with the work through the eyes of knowledge, attain the Supreme Brahma Supreme Soul.


भगवद गीता तेरहवां अध्याय समाप्त


Mokshada Ekadashi Vrat Katha: मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा: मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के रूप में जाना जाता है| जैसा कि आप सभी लोगों को ज्ञात है कि हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही बड़ा महत्त्व बताया गया है| लगभग हर एकादशी तिथि में भगवान श्री विष्णु की पूजा की जाती है| मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के दिन भगवान विष्णु की पूर्ण विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए|

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

माना जाता है कि मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तो को अपार सुख-समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है| इस दिन मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha) को पढने तथा सुनने का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है| आज हम इस लेख की सहायता से आपको मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के महत्व तथा मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बताएँगे|

इसके आलवा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे मंगल भात पूजा (Mangal Bhat Puja), ऋण मुक्ति पूजा (Rin Mukti Puja), तथा रुद्राभिषेक पूजा (Rudrabhishek Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

मोक्षदा एकादशी का महत्व – Importance of Mokshada Ekadashi

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे भगवन ! मैंने मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी जिसे मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे  मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है|

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इस पर भगवान श्रीकृष्ण बोले – हे युधिष्ठिर मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) कहा जाता है| माना जाता है कि मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) व्रत को करने मोक्ष की प्राप्ति एवं चिंतामणि की भांति ही सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है| इसकी मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) व्रत की सहायता आप अपने पितरों के सभी दुखों को भी खत्म कर सकते है| अब मैं तुम्हे मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बताऊंगा| जिसको मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के दिन पढ़ना बहुत ही शुभ माना जाता है|

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा – Mokshada Ekadashi Vrat Katha

बहुत ही पुराने समय की बात है एक गोकुल नामक शहर में वैखानस नाम के राजा का शासन था| माना जाता है कि उस राजा के राज्य में चारों वेदों के बहुत बड़े ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे| वह राजा अपनी प्रजा के प्रति बहुत ही दयालु था एवं उनका पुत्रवत पालन करता है| एक बार रात्रि के समय राजा को एक स्वप्न आया| जिसमे राजा ने यह देखा कि उनके पिता नरक में है| यह देखकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ| सुबह होते ही राजा अपने विद्वान ब्राह्मणों के साथ गया तथा उन्हें अपने स्वप्न के बारे में बताया|

राजा ने ब्राह्मणों से कहा कि उन्होंने अपने पिता को नरक में कष्ट सहते हुए देखा तथा उन्होंने मुझसे कहा है कि हे पुत्र ! मैं नरक में हूँ| मुझे यहाँ से मुक्त करवाओ| जिस समय मैंने अपने पिता के द्वारा यह सुना उस समय से ही में बहुत परेशान हो रहा हूँ| मेरे मन भी अशांत है| उस स्वप्न के बाद से ही मुझे इस राज्य, पुत्र, स्त्री, हाथी, घोड़े, धन आदि कहीं पर भी सुख प्रतीत नहीं हो रहा है| कृपया मुझे बताइए मैं क्या करूँ? राजा ने उन सभी से कहा कि हे ब्राह्मण देवताओं ! इस दुःख के कारण मेरा सम्पूर्ण शरीर भीतर से जल रहा है| मुझ पर कृपा करके तप, व्रत, दान आदि कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल सके|

राजा ने कहा कि ऐसे पुत्रों का जीवन पूर्ण रूप से व्यर्थ है जो अपने माता-पिता का उद्धार नहीं कर सकते है| जिस प्रकार एक चंद्रमा सम्पूर्ण जगत में प्रकाश कर देता है, उसी प्रकार एक सर्वोत्तम पुत्र जो कि अपने माता पिता का उद्धार कर सकता है, वह हजारों मूर्ख पुत्रों से बेहतर है| ब्राह्मणों ने राजा कहा कि हे मान्यवर ! यहाँ पास ही भूत,वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है| वह आपकी समस्या को हल करने में आपकी सहायता अवश्य करेंगे|

ब्राह्मणों के कहने पर राजा उन मुनि के आश्रम में पहुंचे| उस आश्रम बहुत सारे ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे थे| उसी स्थान पर पर्वत ऋषि भी विराजमान थे| राजा ने पर्वत ऋषि को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया| ऋषि ने राजा से उनकी कुशलता के बारे में पूछा| जिसका उत्तर देते हुए राजा ने कहा कि आपकी कृपा से राज्य में सब कुछ कुशल मंगल है किन्तु कुछ समय से मेरे मन में अशांति हो रही है| राजा के इतना कहने पर पर्वत मुनि ने अपनी आँखे बंद की तथा भूतकाल को विचारने लगे|

कुछ ही समय के पश्चात पर्वत ऋषि ने कहा – हे राजन ! मैंने अपनी योगशक्ति के बल पर तुम्हारे पिताजी के द्वारा किये गए कर्मों के बारे में पता लगाया है| उन्होंने अपने पिछले जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति प्रदान की किन्तु सौत के कहने पर दूसरी पत्नी को ऋतुदान मांगने पर भी नहीं दिया| उनके द्वारा किये गए इसी पापकर्म के कारण ही उन्हें नरकलोक में जाना पड़ा| पर्वत मुनि के ऐसा कहने पर राजा ने उनसे इसका समाधान बताने के लिए कहा| तब मुनि ने कहा – हे राजन ! आपको अपने पिता की नरक से मुक्ति कराने के लिए मार्गशीर्ष एकादशी का व्रत करना चाहिए| 

इस एकादशी व्रत के प्रभाव से आपके पिता को नरक से मुक्ति अवश्य मिल जाएगी| पर्वत मुनि के कहने पर वह राजा अपने महल आया एवं उनके कहे अनुसार ही अपने पूरे परिवार के साथ मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) का व्रत किया तथा उसका सम्पूर्ण पुण्य अपने पिताजी को समर्पित कर दिया| इस मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) व्रत को करने उसके पिता को मुक्ति मिल गयी और स्वर्ग जाते हुए अपने पुत्र से कहने लगे – हे पुत्र तेरा कल्याण हो| यह कहकर स्वर्ग की चले गए|

Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा

पौष माह में आने वाली एकादशी को सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के नाम से जाना जाता है| सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है| इस वर्ष 2024 सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) 7 जनवरी को है| रविवार के दिन पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की जाएगी| हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है|

सफला एकादशी व्रत कथा

सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के दिन भगवान विष्णु की पूर्ण श्रद्धा से पूजा करने पर भक्तों की समस्त परेशानियां दूर होती है| सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के दिन सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) बहुत महत्व बताया गया है| आज हम आपको इस लेख के माध्यम से आपको सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के महत्व तथा सफला एकादशी व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बताएँगे|

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सफला एकादशी का महत्व – Importance of Saphala Ekadashi

भगवान श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिर के बीच हो रहे संवाद में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे जनार्दन ! मैंने मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी जिसे मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे पौष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है|

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इस पर भगवान श्रीकृष्ण बोले – पौष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)कहा जाता है| इस सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) के दिन भगवान श्री विष्णु की पूजा की जाती है| पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) व्रत को विधि-पूर्वक करना चाहिए| जिस प्रकार पक्षियों में गरुड़, नागों में शेषनाग, सभी ग्रहों में चंद्रमा तथा देवो में सबसे श्रेष्ठ भगवान श्रीनारायण है| उसी प्रकार व्रतों में सर्वश्रेष्ठ एकादशी व्रत को माना जाता है| जो भी व्यक्ति सदैव एकादशी का व्रत करता है, वह व्यक्ति मुझे प्रिय होता है|

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि हे धर्मराज ! मैं तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण तुम्हे यह बताता हूँ कि एकादशी व्रत के अलावा मैं किसी भी अधिक से अधिक दक्षिणा प्राप्त होने वाले यज्ञ से भी प्रसन्न नहीं होता हूँ| इसलिए इस एकादशी व्रत को पूर्ण भक्ति के साथ करना चाहिए| इसी के साथ मैं तुम्हे सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के महात्म्य या सफला एकादशी व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बताऊंगा| सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के दिन सफला एकादशी व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) करने का बहुत ही अच्छा विधान है|

सफला एकादशी व्रत कथा- Saphala Ekadashi Vrat Katha

कथा के अनुसार यह बताया गया है कि चम्पावती नामक एक नगरी में महिष्मान नामक एक राजा का शासक था| जिसके चार पुत्र थे| उन सभी पुत्रों में से सबसे बड़ा पुत्र जिसका नाम लुम्पक था, वह बहुत ही बड़ा महापापी था| वह पापी सदैव वैश्यगमन, परस्त्री तथा अन्य बुरे कार्यों में अपने पिता का धन व्यर्थ ही खर्च करता था| इसके अलावा वह सदैव ही ब्राह्मणों, वैष्णवों तथा देवताओं की निंदा करता रहता है| जैसे ही राजा महिष्मान को उनके ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक के दुष्कर्मों के बारे में ज्ञात हुआ| उसी समय राजा ने उसे दण्ड स्वरुप अपने राज्य से बाहर निकाल दिया|

अपने पिता के द्वारा राज्य से निकाल देने पर वह यह विचार करने लगा कि अब आगे क्या किया जाए | थोड़ी देर सोचने के पश्चात उसने चोरी करने का फैसला किया| अब वह दोपहर के समय वन निवास करता तथ रात्रि के समय अपने पिता के राज्य में ही लोगों का सामान चोरी करता, उन्हें परेशान करता तथा कभी-कभी तो उनकी हत्या भी कर देता था| उसके इस कुकर्म के कारण सम्पूर्ण गाँव वाले बहुत ही भयभीत रहने लगे| अब वह जंगल में रहकर पशुओ को मारकर खाने लग गया| उसे कई बार गाँव के लोगों तथा राज्य के कर्मचारियों का द्वारा पकड़ा गया किन्तु राजा के भय के कारण उसे छोड़ दिया जाता था|

सफला एकादशी व्रत कथा

जिस वन में वह निवास करता था उसे देवताओं की क्रीडास्थली के रूप में जाना जाता था| उस वन में एक बहुत ही प्राचीन पीपल का पेड़ था| जिसकी गाँव के लोग देवता के समान पूजा करते थे| वह महापापी उसी पेड़ के नीचे निवास करता था| कुछ ही समय के बाद में पौष माह में कृष्ण पक्षमी की दशमी तिथि को वस्त्रहीन होने के वजह से शीत लहर के चलते वह पूरी रात भर नहीं सो पाया| सर्दी होने के कारण उसका पूरा शरीर अकड़ गया था| सुबह होते हुए वह मूर्छित हो गया| इसके पश्चात दोपहर के समय सूर्य की किरणे पड़ने से उसकी मूर्छा दूर हुई|

इसके पश्चात वह गिरता-पड़ता हुआ भोजन की तलाश में वन में निकला किन्तु ज्यादा थका हुआ होने की वजह से वह शिकार करने में सक्षम नहीं था| इसके पश्चात वह पेड़ों से गिरे हुए फलों को उठाकर पुनः उस पीपल के वृक्ष के नीचे आ गया| अब उसने उन फलों को वृक्ष के नीचे रख कर कहा कि हे भगवान ! यह फल में आपको ही अर्पित करता हूँ| आप ही इन फलों से तृप्त हो जाइए| उस रात्रि को भी दुःख के कारण लम्पुक को नींद नहीं आई| उसके द्वारा किये गए इस उपवास तथा जागरण की वजह से भगवान भी उससे प्रसन्न हो गए तथा सम्पूर्ण जीवन में किये गए उसके सभी पाप भी नष्ट हो गए|

अगले दिन सुबह एक बहुत ही सुन्दर घोड़ा विभिन्न प्रकार की सुन्दर वस्तुओं से सजा हुआ उनके सामने आकर प्रकट हो गया| उसी समय एक आकाशवाणी हुई कि हे पुत्र ! भगवान श्री नारायण की कृपा से तुम्हारे द्वारा किये गए सभी पापों को नष्ट कर दिया गया है| अब तुम अपने पिताजी के पास जाकर राज्य प्राप्त करो| यह बात सुनते ही लम्पुक बहुत ही खुश हो गया| और तुरंत ही अपने पिता के पास चला गया| उसके पिता ने उसे सम्पूर्ण राज्य संभला दिया व स्वयं वन की ओर प्रस्थान कर गए|

अब लम्पुक भी शास्त्रों के अनुसार राज्य को संभालने लग गया| उसका सम्पूर्ण परिवार भी भगवान श्री नारायण की पूजा करने लग गया| वृद्ध होने पर उसने अपना समस्त राज्य अपने पुत्रों को सौंप दिया तथा वन में तपस्या करने के लिए चला गया तथा अंत में वैकुंठ को प्राप्त हो गया| अतः जो भी मनुष्य सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)व्रत को करता है उसे अंत में मुक्ति प्राप्त होती है| ग्रंथों की मान्यता के अनुसार इस सफला एकादशी व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ने तथा सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है|

Bhagavad Gita Chapter 12: भगवद गीता बारहवां अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता बारहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 12) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता बारहवां अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 12) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

भगवद गीता बारहवां अध्याय

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Chapter 12 – भक्ति योग (Bhakti Yoga)


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (1 – 2)

अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्ता स्त्वां पर्युपासते ।
ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥
श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते ।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरंतर आपके भजन – ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दुसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते है – उन दोनों प्रकार के उपासको में अति उत्तम योग्वेत्ता कौन है? श्री भगवान बोले – मुझमे मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन – ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते है, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य है|

English Meaning – Arjun said – Those devoted loving devotees who are continuously engaged in your worship and meditation in the manner mentioned above and those who worship only the imperishable Sachchidanandaghan formless Brahma with great devotion, who is the best Yogvetta among those two types of devotees? Shri Bhagwan said – Those devotees who concentrate their mind on me and are continuously engaged in my bhajans and meditations, with great faith and worship me in the form of God, I consider them to be the best yogis among the yogis.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (3 – 4)

ये त्वक्षरमनिर्देश्यम व्यक्तं पर्युपासते ।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥

हिंदी अर्थ – परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरुप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकर, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरंतर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते है, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और समान भाव वाले योगी मुझको ही प्राप्त होते है|

English Meaning – But those men who, having well controlled the community of senses, worship Brahma, who is beyond the mind and intellect, omnipresent, unspeakable and always constant, eternal, immovable, formless, imperishable, Sachchidanandaghan Brahma, with constant concentration, they attain complete perfection. Only those yogis who are interested in the welfare of ghosts and have equal feelings are found by me.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (5 – 6)

क्लेशोऽधिकतरस्तेषा मव्यक्तासक्तचेतसाम् ।
अव्यक्ता हि गति र्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते ॥
ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥

हिंदी अर्थ – उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है| परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमे अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरंतर चिंतन करते हुए भजते है|

English Meaning – Those people whose minds are attached to that Sachchidanandaghan formless Brahman achieve unmanifested movement with pain because they are conscious of the body. But those devotees who remain devoted to me, offer all their deeds to me and worship only God in the form of me, continuously thinking about me with exclusive devotion.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (7 – 8)

तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय ।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! उन मुझमे चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ| मुझमे मन को लगा और मुझमे ही बुद्धि को लगा, इसके उपरांत तू मुझमे ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है|

English Meaning – Hey Arjun! I will soon save those loving devotees who concentrate on me from the world and ocean of death. The mind felt in me and the intellect felt in me, after this, you will reside in me only, there is no doubt in this.

भगवद गीता बारहवां अध्याय

भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (9 – 10)

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम् ।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनंजय ॥
अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव ।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि ॥

हिंदी अर्थ – यदि तू मन को मुझमे अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो है अर्जुन ! अभ्यासरूप (भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन, मनन तथा श्र्वास द्वारा जप और भगवत्प्राप्तिविषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादि चेष्टाएँ भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम ‘अभ्यास’ है) योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर| यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण हो जा| इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा|

English Meaning – If you are not capable of making your mind stable in me, then you are Arjun! In the form of practice (listening to the name and qualities of God, chanting kirtan, meditation and chanting through breathing and reading the scriptures related to attaining God, etc., the name of making the efforts to attain God repeatedly is called ‘abhyas’) wish to attain me through yoga. If you are unable to even do the above-mentioned exercises, then become devoted to doing work only for me. In this way, while doing deeds for my sake, you will only attain my attainment in the form of Siddhi.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (11 – 12)

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥
श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज् ज्ञानाद्ध्यानं विशिष्यते ।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस् त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् ॥

हिंदी अर्थ – यदि मेरी प्राप्ति योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में असमर्थ हूँ, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर| मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरुप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शांति होती है|

English Meaning – If I am unable to do the above-mentioned means by relying on Yoga for my attainment, then become one who has victory over the mind, intellect etc. and give up the fruits of all the deeds. Knowledge is better than practice done without knowing the essence, meditation in the form of I, the Supreme Lord, is better than knowledge and renunciation of the fruits of all actions is better than meditation because renunciation immediately brings ultimate peace.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (13 – 14)

अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च ।
निर्ममो निरहंकारः समदुःखसुखः क्षमी ॥
संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढनिश्चयः ।
मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात् अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तथा जो योगी निरंतर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमे दृढ निश्चय वाला है – वह मुझमे अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है|

English Meaning – The man who is free from malice among all beings, selfless, loving to all and kind without any motive, free from affection, free from ego, equal in happiness and sorrow and forgiving, that is, he is the one who gives fearlessness even to the one who commits crime and who The yogi is constantly satisfied, has controlled the body along with the mind and senses and has firm resolve in me – that devotee of mine with his mind and intellect surrendered to me is dear to me.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (15 – 16)

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः ।
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः ॥
अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः ।
सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः ॥

हिंदी अर्थ – जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव के उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, (दुसरे व्यक्ति की उन्नति को देखकर संताप होने का नाम ‘अमर्ष’ है), भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है| जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध, चतुर, पक्षपात से रहित और दुखों से छुटा हुआ है – वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है|

English Meaning – The devotee who does not cause any living being to get agitated and who himself does not get agitated by any living being and who is free from joy, (the name of being sad after seeing the progress of another person is ‘Amarsha’), fear and anxiety etc. is that devotee. I love him. The man who is free from desires, pure inside and out, intelligent, free from prejudice and free from sorrows – that devotee of mine who has renounced all beginnings is dear to me.

भगवद गीता बारहवां अध्याय

भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (17 – 18)

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति ।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः ।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥

हिंदी अर्थ – जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है – वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है| जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुखादि द्वंद्वो में सम है और आसक्ति से रहित है|

English Meaning – One who never rejoices, never hates, never mourns, never desires and who renounces all actions, auspicious and inauspicious – that man of devotion is dear to me. Who is equal between enemy and friend, honour and insult and is equal in the dualities of cold, heat and happiness and sorrow and is free from attachment.


भगवद गीता बारहवां अध्याय श्लोक (19 – 20)

तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित् ।
अनिकेतः स्थिरमति र्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते ।
श्रद्दधाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः ॥

हिंदी अर्थ – जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है – वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है| परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम ‘श्रद्धा’ है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते है, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय है|

English Meaning – The one who considers praise and criticism equally, is contemplative and is always satisfied with the way his body is maintained and is free from affection and attachment to the place of his residence – that man with a stable intellect and devotion is dear to me. But those devotees who are devoted to me and consume the sacred nectar mentioned above with selfless love (the name of faith is ‘Shraddha’) as per the faith in the Vedas, Shastras, Mahatmas and Mentors and in the direct words of God, those devotees consider me extremely great. They are exceedingly dear to me.


भगवद गीता बारहवां अध्याय समाप्त