Shri Badrinath Ji Ki Aarti Lyrics: श्री बद्रीनाथ जी की आरती

श्री बद्रीनाथ जी की आरती (Badrinath Ji Ki Aarti) बद्री नारायण रूपी भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए की जाती है| भगवान बद्रीनाथ जी भक्त वत्सल है तथा उनकी महिमा भी अपार है| माना जाता है कि भगवान बद्रीनाथ जी आरती का गान करने से सभी कष्ट दूर होते है तथा भगवान बद्रीनाथ जी की कृपा भी प्राप्त की जाती है| बद्रिकाश्रम में भगवान बद्रीनाथ जी इस सम्पूर्ण जगत के कल्याण के विराजमान है| आज इस लेख के माध्यम से हम आपको श्री बद्रीनाथ जी की आरती (Badrinath Ji Ki Aarti) के बारे में सम्पूर्ण जानकारी देंगे|

बद्रीनाथ जी की आरती

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श्री बद्रीनाथ जी की आरती लिरिक्स हिंदी में | Badrinath Ji Ki Aarti Lyrics in Hindi

|| बद्रीनाथ जी की आरती ||

पवन मंद सुगंध शीतल,
हेम मंदिर शोभितम् ।
निकट गंगा बहत निर्मल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥

शेष सुमिरन करत निशदिन,
धरत ध्यान महेश्वरम् ।
वेद ब्रह्मा करत स्तुति,
श्री बद्रीनाथ विश्वम्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

शक्ति गौरी गणेश शारद,
नारद मुनि उच्चारणम् ।
जोग ध्यान अपार लीला,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

इंद्र चंद्र कुबेर धुनि कर,
धूप दीप प्रकाशितम् ।
सिद्ध मुनिजन करत जय जय,
बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

यक्ष किन्नर करत कौतुक,
ज्ञान गंधर्व प्रकाशितम् ।
श्री लक्ष्मी कमला चंवरडोल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

कैलाश में एक देव निरंजन,
शैल शिखर महेश्वरम् ।
राजयुधिष्ठिर करत स्तुति,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

श्री बद्रजी के पंच रत्न,
पढ्त पाप विनाशनम् ।
कोटि तीर्थ भवेत पुण्य,
प्राप्यते फलदायकम् ॥
॥ पवन मंद सुगंध शीतल…॥

पवन मंद सुगंध शीतल,
हेम मंदिर शोभितम् ।
निकट गंगा बहत निर्मल,
श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम् ॥

बद्रीनाथ जी की आरती

Badrinath Ji Ki Aarti Lyrics in English | श्री बद्रीनाथ विश्व्म्भरम्

|| Badrinath Ji Ki Aarti ||

Pawan mand sugandh shital,
Hem mandir shobhitam.
Nikat Ganga baht nirmal,
Shri Badrinath Vishvam bharam.

Shesh Sumiran Karat Nishadin,
Dharat dhyan Maheshwaram.
Ved Brahma karat stuti,
Shri Badrinath Vishvambharam.
Pawan mand sugandh shital…

Shakti Gauri Ganesh Sharad,
Narad muni ucharanam.
Jog dhyan apar leela,
Shri Badrinath Vishvambharam.
Pawan mand sugandh shital…

Indra Chandra Kubera dhuni kar,
Dhoop deep prakashitam.
Siddh munijan karat jay jay,
Badrinath Vishvambharam.
Pawan mand sugandh shital…

Yaksh kinnar karat kautuk,
Gyan Gandharv prakashitam.
Shri Lakshmi Kamala chavardol,
Shri Badrinath Vishvambharam.
Pawan mand sugandh shital…

Kailash mein ek dev niranjana,
Shail shikhar Maheshwaram.
Rajyudhishthir karat stuti,
Shri Badrinath Vishvambharam.
Pawan mand sugandh shital…

Shri Badraji ke panch ratna,
Padht pap vinashanam.
Koti tirth bhavet punya,
Prapyate phaladayakam.
Pawan mand sugandh shital…

Pawan mand sugandh shital,
Hem mandir shobhitam.
Nikat Ganga baht nirmal,
Shri Badrinath Vishvambharam.

Parvati Mata Ji Ki Aarti Lyrics: पार्वती जी की आरती

पार्वती जी की आरती (Parvati Ji Ki Aarti) का जाप करने से भक्तों की सभी परेशानियां दूर हो जाती है| माता पार्वती को भगवान शिव की पत्नी के रूप में जाना जाता है| भगवान शिव की पूजा के साथ-साथ माता पार्वती जी की पूजा व पार्वती जी की आरती (Parvati Ji Ki Aarti) का जाप करने से भक्तों को बहुत लाभ होता है| जो महिला प्रतिदिन माता पार्वती जी की आरती (Parvati Ji Ki Aarti) का जाप करती है, उनके पति को लम्बी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है| सावन के समय भगवान शिव के साथ-साथ माता पार्वती जी की आरती (Parvati Ji Ki Aarti) करने का विधान माना जाता है|

पार्वती जी की आरती

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जय पार्वती माता आरती | Parvati Ji Ki Aarti Lyrics in Hindi

|| पार्वती जी की आरती ||

जय पार्वती माता,
जय पार्वती माता
ब्रह्मा सनातन देवी,
शुभ फल की दाता ।
॥ जय पार्वती माता… ॥

अरिकुल कंटक नासनि,
निज सेवक त्राता,
जगजननी जगदम्बा,
हरिहर गुण गाता ।
॥ जय पार्वती माता… ॥

सिंह को वहान साजे,
कुंडल है साथा,
देव वधू जस गावत,
नृत्य करत ता था ।
॥ जय पार्वती माता… ॥

सतयुग रूप शील अतिसुंदर,
नाम सती कहलाता,
हेमाचंल घर जन्मी,
सखियाँ संगराता ।
॥ जय पार्वती माता… ॥

शुम्भ निशुम्भ विदारे,
हेमाचंल स्थाता,
सहस्त्र भुजा तनु धरिके,
चक्र लियो हाथा ।
॥ जय पार्वती माता… ॥

सृष्टि रूप तुही है जननी,
शिव संग रंगराता,
नन्दी भृंगी बीन लही,
सारा जग मदमाता ।
॥ जय पार्वती माता… ॥

देवन अरज करत हम,
चरण ध्यान लाता,
तेरी कृपा रहे तो,
मन नहीं भरमाता ।
॥ जय पार्वती माता… ॥

मैया जी की आरती,
भक्ति भाव से जो नर गाता,
नित्य सुखी रह करके,
सुख संपत्ति पाता ।
॥ जय पार्वती माता… ॥

जय पार्वती माता,
जय पार्वती माता,
ब्रह्मा सनातन देवी,
शुभ फल की दाता ।

जय पार्वती माता,
जय पार्वती माता
ब्रह्मा सनातन देवी,
शुभ फल की दाता ।

पार्वती जी की आरती

Parvati Ji Ki Aarti Lyrics in English | पार्वती माता जी की आरती

|| Parvati Ji Ki Aarti ||

Jai Parvati Mata,
Jai Parvati Mata
Brahma Sanatan Devi,
Shubh Phal ki Data.
|| Jai Parvati Mata… ||

Arikul Kantak Nasani,
Nij Sevak Traata,
Jagjanani Jagdamba,
Harihar Gun Gaata.
|| Jai Parvati Mata… ||

Singh ko vahan saje,
Kundal hai saatha,
Dev Vadhu jas gavat,
Nritya karat tha.
|| Jai Parvati Mata… ||

Satyug Roop Shil atisundar,
Naam Sati kahlata,
Hemachal ghar janmi,
Sakhiyaan sang rata.
|| Jai Parvati Mata… ||

Shumbh Nishumbh vidaare,
Hemachal sthata,
Sahasra bhujaa tanu dharike,
Chakra liyo haatha.
|| Jai Parvati Mata… ||

Srishti Roop tuhi hai Janani,
Shiv sang rangrata,
Nandi bhringi been lahi,
Sara jag madmata.
|| Jai Parvati Mata… ||

Devan araj karat hum,
Charan dhyan laata,
Teri kripa rahe to,
Man nahi bharmata.
|| Jai Parvati Mata… ||

Maiya Ji ki Aarti,
Bhakti bhav se jo nar gaata,
Nitya sukhi rah karke,
Sukh sampatti paata.
|| Jai Parvati Mata… ||
Jai Parvati Mata,
Jai Parvati Mata,
Brahma Sanatan Devi,
Shubh Phal ki Data.

Jai Parvati Mata,
Jai Parvati Mata
Brahma Sanatan Devi,
Shubh Phal ki Data.

Jaya Ekadashi Vrat Katha: जया एकादशी व्रत कथा

Jaya Ekadashi Vrat Katha: जया एकादशी का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व माना जाता है| प्रत्येक वर्ष समस्त हिन्दू समुदाय के लोगों द्वारा जया एकादशी का व्रत किया जाता है| जया एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूर्ण विधिवत पूजा का विधान है| इस जया एकादशी तिथि के दिन व्रत करने तथा जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) को पढने या सुनने से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है|

जया एकादशी व्रत कथा

जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही महत्व बताया गया है| इस एकादशी के दिन व्रत रखने के साथ-साथ जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करना भी बहुत ही आवश्यक होता है| पद्म पुराण के अनुसार माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को इस जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) की महिमा के बारे में बताया था| तो आइये जानते है क्या बताया गया है जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) में|

इसके अलावा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे सरस्वती पूजा (Saraswati Puja), गृह प्रवेश पूजा (Grha Pravesh Puja), तथा विवाह पूजा (Marriage Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है|यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है| बस आपको “Book a Pandit” विकल्प का चुनाव करना होगा और अपनी सामान्य जानकारी जैसे कि अपना नाम, मेल, पूजा स्थान, समय,और पूजा का चयन के माध्यम से आप अपना पंडित बुक कर सकेंगे|

जया एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance of Jaya Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे माघ महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे षटतालिका एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले है| अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि माघ शुक्ल एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधिपूर्वक बतलाए|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण कहते है कि – हे राजन ! माघ शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को जया एकादशी के नाम से जाना जाता है| इस व्रत को करने से जातक ब्रह्म हत्यादि के पापों को से मुक्त हो जाता है तथा इसके प्रभाव से जीव भूत, पिशाच आदि योनियों से मुक्त हो जाता है| जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही बहुत बड़ा महत्व बताया गया है| जया एकादशी व्रत को विधिपूर्वक करना जातक के लिए बहुत लाभकारी होता है| जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) का वर्णन पद्म पुराण में दिया गया है|

जया एकादशी व्रत कथा – Jaya Ekadashi Vrat Katha

एक समय की बात है कि देवराज इंद्र देव स्वर्ग में राज करते थे तथा अन्य सभी देवतागण भी सुखपूर्वक स्वर्ग में निवास करते थे| इस समय इंद्र देव अपनी इच्छा के अनुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे तथा गान्धर्व गान कर रहे थे| उन गन्धर्वों में सबसे प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उनकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी धर्मपत्नी मालिनी भी उपस्थित थे| साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान तथा उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे|

पुष्पवती गन्धर्व कन्या माल्यवान को देखकर उसपर मोहित हो गई एवं माल्यवान पर काम-बाण का प्रयोग करने लगी| पुष्पवती ने अपने रूप, हावभाव से माल्यवान को अपने वश में कर लिया| वह पुष्पवती बहुत ही सुन्दर थी| इसके पश्चात वे इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए अपना गान शुरू करते है किन्तु एक-दुसरे से मोहित होने के कारण उनका ध्यान भटक गया| इनके इस प्रकार से भ्रमित होने से इंद्र देव को इनमे प्रेम के बारे में ज्ञात हो गया| उन्होंने इस गलती को अपनी बेज्ज़ती माना तथा उन दोनों को श्राप दे दिया कि वह स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करके अपने कर्मों के फल को भोगे|

जया एकादशी व्रत कथा

इंद्र देव के इस भयानक श्राप के कारण के वे दोनों अत्यंत ही दुखी हुए| इसके पश्चात वह दोनों हिमालय पर्वत पर ही अपना जीवन व्यतीत करने लगे| उन्हें गंध,रस तथा स्पर्श के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं था| जिस वजह से उन्हें हिमालय पर्वत पर रहने में बहुत ही कठिनाई होती थी| कभी- कभी तो वह निंद्रा भी नहीं ले पाते थे| उस स्थान पर अत्यंत ही शीत था| जिस वजह से उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता था| शीत के कारण उनके दांत बजते थे| एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि हमने पीछे जन्म क्या बुरे कर्म किये है| जिस कारण से हमे इतना कष्ट सहना पड़ रहा है|

इस दुःख से तो नरक की पीड़ा सहना ही उत्तम है| इसलिए हमे अब किसी भी प्रकार का कोई पाप नहीं करना चाहिए| ऐसे ही विचार करते-करते वह अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे| कुछ समय के पश्चात माघ माह के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी तिथि आ गई| इस दिन उन दोनों ने भोजन नहीं किया एवं पुरे दिन केवल अच्छे-अच्छे कार्य ही किये| इस दिन उन्होंने केवल फल-फूल खाकर ही अपना गुज़ारा किया| शाम के समय दोनों दुखी स्थिति में पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए| उस दिन बहुत ही अधिक ठंड थी, जिस कारण से वह दोनों मृतक के समान ही एक-दुसरे से लिपटे रहे| उस रात्रि को भी उन्हें नींद नहीं आई|

जया एकादशी का व्रत करने के अगले ही उन दोनों को पिशाच योनि से छुटकारा मिल गया| इसके पश्चात वह दोनों अपनी पूर्ण वेशभूषा में स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान कर गए| मार्ग में देवतागणों ने उनका पुष्पवर्षा से स्वागत किया| स्वर्ग लोक में पधारते ही उन्होंने सर्वप्रथम देवराज इंद्र को प्रणाम किया| उन दोनों पुनः अपने रूप में देख कर इंद्र देव आश्चर्यचकित हो गए तथा उनसे पूछा कि हे माल्यवान आप दोनों पिशाच योनि से किस प्रकार मुक्त हुए| इसके बारे में हमे बतलाइये|

इस पर गान्धर्व माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र ! भगवान विष्णु तथा जया एकादशी व्रत के प्रभाव से ही हम पिशाच योनि से मुक्त हो पाए है| इसके पश्चात भगवान इंद्र ने उनसे कहा कि हे माल्यवान ! भगवान विष्णु की कृपा एवं एकादशी व्रत करने से ना केवल आपकी पिशाच योनि छूट गई बल्कि हम भी वन्दनीय हो गए है क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हमने भी पूजनीय है| आप लोग धन्य है| अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो|

Aarti Yugal Kishoreki Kije Lyrics: श्रीकृष्ण जी की आरती

श्रीकृष्ण जी की आरती (Shri Krishna Ji Ki Aarti) का जाप करने से भगवान श्रीकृष्ण अपने भक्तों से बहुत ही प्रसन्न होते है| श्रीकृष्ण जी की आरती (Shri Krishna Ji Ki Aarti) का गान मुख्य रूप से भगवान श्रीकृष्ण के जन्मदिवस अर्थात जन्माष्टमी पर किया जाता है| भगवान श्री कृष्ण इस सम्पूर्ण सृष्टि के रचियता भगवान विष्णु के ही अवतार है| भगवान श्रीकृष्ण की पूजा करने के पश्चात श्रीकृष्ण जी की आरती (Shri Krishna Ji Ki Aarti) का जाप करना अनिवार्य होता है| बिना श्रीकृष्ण जी की आरती (Shri Krishna Ji Ki Aarti) का गान किये भगवान श्रीकृष्ण की पूजा पूर्ण नहीं मानी जाती है| श्रीकृष्ण जी की आरती (Shri Krishna Ji Ki Aarti) का जाप करने से व्यक्ति का मन शांत होता है|

श्रीकृष्ण जी की आरती

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आरती युगल किशोर जी की | Shri Krishna Aarti Lyrics in Hindi

|| श्रीकृष्ण जी की आरती ||

आरती युगलकिशोर की कीजै ।
तन मन धन न्योछावर कीजै ॥

गौरश्याम मुख निरखन लीजै ।
हरि का रूप नयन भरि पीजै ॥

रवि शशि कोटि बदन की शोभा ।
ताहि निरखि मेरो मन लोभा ॥

ओढ़े नील पीत पट सारी ।
कुंजबिहारी गिरिवरधारी ॥

फूलन सेज फूल की माला ।
रत्न सिंहासन बैठे नंदलाला ॥

कंचन थार कपूर की बाती ।
हरि आए निर्मल भई छाती ॥

श्री पुरुषोत्तम गिरिवरधारी ।
आरती करें सकल नर नारी ॥

नंदनंदन बृजभान किशोरी ।
परमानंद स्वामी अविचल जोरी ॥

श्रीकृष्ण जी की आरती

Shri Krishna Ji Ki Aarti Lyrics in English | श्रीकृष्ण जी की आरती

|| Shri Krishna Ji Ki Aarti ||

Aarti yugal-kishor ki kijiye,
Tan man dhan nyochhavar kijiye.

Gaurshyam mukh nirkhan lijiye,
Hari ka roop nayan bhari peejiye.

Ravi shashi koti badan ki shobha,
Tahi nirkhi mero man lobha.

Odhe neel peet pat saari,
Kunj-bihari girivar-dhari.

Phoolan sej phool ki mala,
Ratna sinhasan baithe Nandalala.

Kanchan thar kapoor ki baati,
Hari aaye nirmal bhai chaati.

Shri Purushottam Girivar-dhari,
Aarti karein sakal nar-nari.

Nand-nandan brij-bhan kishori,
Paramanand swami avichal jori.

Bhaum Pradosh Vrat Katha: भौम प्रदोष व्रत कथा

हिन्दू धर्म में भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) को सुनने का बहुत ही बड़ा महत्व बताया गया है| हिन्दू धर्म तिथियों का बहुत को बहुत ही महत्वपूर्ण तथा शुभ माना जाता है| मुख्य रूप से प्रदोष तिथि का व्रत तथा प्रदोष व्रत की कथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की जाती है| जब यह प्रदोष व्रत की तिथि मंगलवार के दिन आती है तो इसे भौम प्रदोष व्रत भी कहा जाता है| भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) के बिना यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है| हिन्दू धर्म में भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) को कहना एवं सुनना बहुत ही पुण्यदायी माना गया है|

भौम प्रदोष व्रत कथा

माना जाता है कि जो भी इस भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) को सच्ची श्रद्धा से पढ़ता है तो उस भक्त निश्चित रूप से ही भगवान शंकर का आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा उस व्यक्ति के जीवन सभी प्रकार दुःख व कष्ट दूर हो जाते हैं| भौम प्रदोष व्रत की तिथि के दिन भगवान शिव की पूजा करके भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) का जाप करना चाहिए| तो आइये आज इस लेख के माध्यम से भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) के बारे में जानेंगे|

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भौम प्रदोष व्रत की कथा –

बहुत ही पुराने समय की बात है| किसी गाँव में एक वृद्ध महिला रहती थी| उसका केवल एक ही पुत्र था| वह वृद्ध महिला भगवान हनुमान जी की बहुत बड़ी भक्त थी| वृद्ध महिला प्रत्येक मंगलवार के दिन हनुमान जी के लिए उपवास करती तथा उन्हें भोग भी लगाती थी| इस दिन वह महिला न तो घर को लीपती थी और न ही मिट्टी को खोदती थी| एक बार हनुमान अपनी इस भक्त की परीक्षा लेने का विचार किया| जिसके पश्चात हनुमान जी एक साधु का वेश धारण करके उस वृद्ध महिला की कुटिया के बाहर पहुंचे|

वृद्ध महिला की कुटिया के बाहर जाकर साधु का रूप बनाए हनुमान जी ने बोला – हे कोई ऐसा हनुमान भक्त ! जो हमारी इच्छा को पूर्ण कर सके? जैसे ही साधु की आवाज़ उस वृद्ध महिला के कानों में पड़ी| वह तुरंत ही बाहर चली आई तथा उन साधु को प्रणाम करके बोली – आज्ञा कीजिये महाराज | उस वृद्ध महिला के ऐसा बोलने पर साधु वेशभूषा में स्थित हनुमान जी ने कहा कि हे देवी ! मैं भूखा हूँ, मुझे भोजन करना है| इसलिए मेरे लिए थोड़ी-सी जमीन को लीप दो| साधु के ऐसा कहने पर वृद्ध महिला दुविधा में पैड गयी क्योंकि उस दिन मंगलवार था|

भौम प्रदोष व्रत कथा

वृद्ध महिला ने कहा कि हे महाराज ! लीपने तथा मिट्टी खोदने के अतिरिक्त मुझे कोई अन्य आज्ञा दे| मैं उसे अवश्य ही पूरी करुँगी| वृद्ध महिला से तीन बार प्रतिज्ञा करने के बाद साधु ने कहा – तू अपने बेटे को बुला| मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा| साधु के ऐसा कहते ही वृद्ध महिला घबरा गई किन्तु वह वचनबद्ध थी| महिला ने अपने बेटे को बुलाया व उन साधू सौंप दिया| इसके पश्चात हनुमान जी ने महिला के द्वारा अपने उसके पुत्र को पेट के बल लिटाया तथा उसकी पीठ पर आग जलवाई|

थोड़ी देर के बाद ही साधु ने वृद्ध महिला को बुलाया और कहा कि मेरा भोजन तैयार हो गया है| अपने पुत्र को भी बुला ताकि वो भी भोग लगा ले| इस पर वृद्ध महिला ने कहा कि हे महाराज ! उसका नाम लेकर मुझे कष्ट ना दे| लेकिन साधु के ना मानने पर उसके अपने पुत्र को आवाज़ लगाईं| आवाज़ लगाते ही उसका बेटा उसके पास आ गया| अपने पुत्र को जीवित देखकर वह महिला आश्चर्य में पड़ गयी तथा साधु के चरणों में गिर गयी| उस समय हनुमान जी अपने वास्तविक रूप में आ गए व वृद्ध महिला को उसकी भक्ति के लिए आशीर्वाद दिया|

Ganpati Ji Ki Aarti Lyrics: गणपति जी की आरती

गणपति जी की आरती (Ganpati Ji Ki Aarti) किसी भी प्रकार के शुभ कार्य को प्रारंभ करने से पहले से की जाती है| गणपति जी की आरती (Ganpati Ji Ki Aarti) का जाप करने भगवान गणेश जी महाराज अपने भक्तों से बहुत प्रसन्न होते है| गणपति जी की आरती (Ganpati Ji Ki Aarti) के बहुत ही सारे संस्करण है| जिनकी रचना अलग – अलग कवियों तथा भक्तों के द्वारा की गई है| गणेश जी को विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है| किसी भी प्रकार का कार्य या कोई भी पूजा गणपति जी की आरती (Ganpati Ji Ki Aarti) के बिना अधूरी मानी जाती है| गणपति जी की आरती (Ganpati Ji Ki Aarti) को प्रेम तथा भक्ति के भाव से गाने से यह भक्त को दिव्य आनंद की अनुभूति करवाती है|

गणपति जी की आरती

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गणपति की सेवा मंगल मेवा | Ganpati Ji Ki Aarti Lyrics in Hindi

|| गणपति जी की आरती ||

गणपति की सेवा मंगल मेवा,सेवा से सब विघ्न टरैं।

तीन लोक के सकल देवता,द्वार खड़े नित अर्ज करैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

रिद्धि-सिद्धि दक्षिण वाम विराजें,अरु आनन्द सों चमर करैं।

धूप-दीप अरू लिए आरतीभक्त खड़े जयकार करैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

गुड़ के मोदक भोग लगत हैंमूषक वाहन चढ्या सरैं।

सौम्य रूप को देख गणपति केविघ्न भाग जा दूर परैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

भादो मास अरु शुक्ल चतुर्थीदिन दोपारा दूर परैं।

लियो जन्म गणपति प्रभु जीदुर्गा मन आनन्द भरैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

अद्भुत बाजा बजा इन्द्र कादेव बंधु सब गान करैं।

श्री शंकर के आनन्द उपज्यानाम सुन्यो सब विघ्न टरैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

आनि विधाता बैठे आसन,इन्द्र अप्सरा नृत्य करैं।

देख वेद ब्रह्मा जी जाकोविघ्न विनाशक नाम धरैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

एकदन्त गजवदन विनायकत्रिनयन रूप अनूप धरैं।

पगथंभा सा उदर पुष्ट हैदेव चन्द्रमा हास्य करैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

दे शराप श्री चन्द्रदेव कोकलाहीन तत्काल करैं।

चौदह लोक में फिरें गणपतितीन लोक में राज्य करैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

उठि प्रभात जप करैंध्यान कोई ताके कारज सर्व सरैं

पूजा काल आरती गावैं।ताके शिर यश छत्र फिरैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

गणपति की पूजा पहले करने सेकाम सभी निर्विघ्न सरैं।

सभी भक्त गणपति जी केहाथ जोड़कर स्तुति करैं॥

गणपति की सेवा मंगल मेवा…॥

गणपति जी की आरती

Ganpati Ji Ki Aarti Lyrics in English | गणपति जी की आरती

|| Ganpati Ji Ki Aarti ||

Ganpati ki seva mangal meva, seva se sab vighn tarain.

Teen lok ke sakal devta, dwar khade nit arj karain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Riddhi-siddhi dakshin vaam viraje, aru anand so chamara karain.

Dhoop-deep aru liye aarti, bhakt khade jaykaar karain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Gud ke modak bhog lagta hai, mooshak vahan chadhya sarain.

Saumya roop ko dekh Ganpati, vighn bhag ja door parain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Bhado maas aru shukla chaturthi, din dopahara door parain.

Liyo janam Ganpati Prabhu ji, Durga man aanand bharain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Adbhut baza baja Indra ka dev, sab gaan karain.

Shri Shankar ke aanand upajyanam, sunyo sab vighn tarain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Aani vidhata baithe aasan, Indra apsara nritya karain.

Dekh Ved Brahma ji, jako vighn vinashak naam dharaain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Ekadant gajvadan Vinayak, trinayan roop anoop dharaain.

Pagthamba sa udar pusht hai, dev chandra-ma hasya karain.

Ganpati ki seva mangal meva…

De shraap Shri Chandradev ko, kalahin tatkal karain.

Chaudah lok mein fire Ganpati, teen lok mein rajya karain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Uthi prabhat jap karain, dhyan koi take kaaraj sarain.

Puja kaal aarti gaavain, take shir yash chatra phirain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Ganpati ki pooja pehle karne se, kaam sabhi nirvighn sarain.

Sabhi bhakt Ganpati ji ke saath jodkar stuti karain.

Ganpati ki seva mangal meva…

Aarti Kije Shri Ramlala Ki Lyrics: रामलला की आरती

रामलला की आरती (Ramlala Ki Aarti) का पाठ करने से भगवान श्री राम प्रसन्न होते है| जैसा आप सभी लोग जानते ही है कि 500 वर्ष के कठोर संघर्ष के पश्चात अयोध्या में हमारे प्रभु श्री राम के मंदिर का उद्घाटन हो चूका है| जिसके चलते सम्पूर्ण भारत देश में भक्ति का माहौल हो गया है| भगवान श्रीराम की उपासना करने के पश्चात उनकी कृपा पाने के लिए रामलला की आरती (Ramlala Ki Aarti) का गान किया जाता है| श्री रामलला की पूजा बिना रामलला की आरती (Ramlala Ki Aarti) के पूर्ण नहीं मानी जाती है|

रामलला की आरती

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श्री रामचंद्र जी की आरती | Ramlala Ki Aarti Lyrics in Hindi

|| रामलला की आरती ||

आरती कीजे श्रीरामलला की ।
पूण निपुण धनुवेद कला की ॥

धनुष वान कर सोहत नीके ।
शोभा कोटि मदन मद फीके ॥

सुभग सिंहासन आप बिराजैं ।
वाम भाग वैदेही राजैं ॥

कर जोरे रिपुहन हनुमाना ।
भरत लखन सेवत बिधि नाना ॥

शिव अज नारद गुन गन गावैं ।
निगम नेति कह पार न पावैं ॥

नाम प्रभाव सकल जग जानैं ।
शेष महेश गनेस बखानैं ॥

भगत कामतरु पूरणकामा ।
दया क्षमा करुना गुन धामा ॥

सुग्रीवहुँ को कपिपति कीन्हा ।
राज विभीषन को प्रभु दीन्हा ॥

खेल खेल महु सिंधु बधाये ।
लोक सकल अनुपम यश छाये ॥

दुर्गम गढ़ लंका पति मारे ।
सुर नर मुनि सबके भय टारे ॥

देवन थापि सुजस विस्तारे ।
कोटिक दीन मलीन उधारे ॥

कपि केवट खग निसचर केरे ।
करि करुना दुःख दोष निवेरे ॥

देत सदा दासन्ह को माना ।
जगतपूज भे कपि हनुमाना ॥

आरत दीन सदा सत्कारे ।
तिहुपुर होत राम जयकारे ॥

कौसल्यादि सकल महतारी ।
दशरथ आदि भगत प्रभु झारी ॥

सुर नर मुनि प्रभु गुन गन गाई ।
आरति करत बहुत सुख पाई ॥

धूप दीप चन्दन नैवेदा ।
मन दृढ़ करि नहि कवनव भेदा ॥

राम लला की आरती गावै ।
राम कृपा अभिमत फल पावै ॥

रामलला की आरती

Shri Ramchandra Aarti Lyrics in English | रामलला जी की आरती

|| Ramlala Aarti ||

Aarti kijiye Shri Ram Lala ki.
Poon nipun dhanurved kala ki.

Dhanush vaan kar sohat neeke.
Shobha koti madan mad feeke.

Subhag sinhasan aap birajein.
Vaam bhag Vaidehi rajein.

Kar jore ripuhan Hanumana.
Bharat Lakhna sevat vidhi nana.

Shiv aj Narad gun gan gaavein.
Nigam neti kah paar na paavein.

Naam prabhav sakal jag jaanein.
Shesh Mahesh Ganesh bakhanein.

Bhagat kamtaru pooran kama.
Daya kshama karuna gun dhaama.

Sugreevahun ko kapipati keenha.
Raj Vibhishan ko Prabhu deenha.

Khel khel mahu Sindhu badhaye.
Lok sakal anupam yash chhaye.

Durgam garh Lanka pati maare.
Sur nar muni sabke bhay taare.

Devan thapi sujas vistaare.
Kotik deen maleen udaare.

Kapi kevat khag nisachar kare.
Kari karuna dukh dosh nivere.

Det sada dasan ko maana.
Jagatpooj bhe kapil Hanumana.

Aarat deen sada satkaare.
Tihupur hot Ram Jayakare.

Kausalayaadi sakal mahataari.
Dasharath aadi bhagat Prabhu jhaari.

Sur nar muni Prabhu gun gan gaai.
Aarti karat bahu sukh paai.

Dhoop deep chandan naiveda.
Man dridh kari nahi kavan bheda.

Ram Lala ki aarti gaavai.
Ram kripa abhimat phal paavai

Bhagavad Gita Chapter 18: भगवद गीता अठारहवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता अठारहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 18) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता अठारहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 18) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

Bhagavad Gita Chapter 18

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Chapter 18 – मोक्षसंन्यासयोगः (The Perfection of Renunciation)


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (1-2)

अर्जुन उवाच
संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ।
त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥
श्रीभगवानुवाच काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन कहते है – हे महाबाहो ! हे अन्तर्यामिन ! हे वासुदेव ! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को अलग-अलग जानना चाहता हूँ| श्री भगवान कहते है – कुछ कवि (विद्वान) तो काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास समझते है पर दुसरे विचारक सभी कर्मों में फल-त्याग को त्याग कहते है|

English Meaning – Arjun says – O mighty one! O Antaryamin! Hey Vasudev! I want to know the essence of renunciation and renunciation separately. Shri Bhagwan says that some poets (scholars) consider renunciation of lustful deeds as renunciation, but other thinkers call renunciation of the fruits of all actions.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (3-4)

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः ।
यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥
निश्चयं शृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।
त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः संप्रकीर्तितः ॥

हिंदी अर्थ – कुछ मनीषी कहते है कि सभी कर्म दोषयुक्त है, इसलिए त्यागने योग्य है और दुसरे कहते है कि यज्ञ, दान और तप जैसे रूपी कर्म त्यागने योग्य नहीं है| हे भारतश्रेष्ठ अर्जुन ! इस विषय में त्याग के सम्बन्ध में मेरा निश्चय सुनो| हे पुरुषसिंह त्याग तीन (सात्त्विक, राजस और तामस) प्रकार का कहा गया है|

English Meaning – Some sages say that all the deeds are flawed and hence deserve to be renounced and others say that deeds like Yagya, charity and penance are not worth giving up. O great Arjun of India! Listen to my determination regarding renunciation in this matter. O Purushasingha, renunciation has been said to be of three types (Sattvik, Rajasic and Tamasic).


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (5-6)

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् ।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥

हिंदी अर्थ – यज्ञ, दान और तप रूपी कर्म त्याग करने के योग्य नहीं है, वे तो अवश्य करने चाहिए क्योंकि यज्ञ, दान आयर तप मनीषियों को भी पवित्र करने वाले है| इसलिए हे पार्थ ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है|

English Meaning – Yagya, charity and penance are not worth renouncing, they must be done because yagya, charity and penance purify even the wise people. That’s why O Parth! These sacrifices, donations, penances and all other duties must be performed by renouncing attachment and fruits, this is my firm opinion.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (7-8)

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते ।
मोहात्तस्य परित्यागस् तामसः परिकीर्तितः ॥
दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत् ।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥

हिंदी अर्थ – स्वरुप से त्याग करना उचित नहीं है| इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है| जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है – ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता|

English Meaning – It is not right to sacrifice one’s form. Therefore, giving up attachment due to attachment is called Tamasic renunciation. Whatever action there is, it is all a form of sorrow – if someone gives up his duties due to the fear of physical suffering, then he does not get the fruit of such rajasic renunciation in any way.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (9-10)

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन ।
सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ॥
न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥

हिंदी अर्थ – हे अर्जुन ! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है – इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है – वही सात्त्विक त्याग माना गया है| जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता – वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है|

English Meaning – Hey Arjun! Doing the work as per the scriptures, which is done in the same spirit by renouncing attachment and results, is considered as Sattvik renunciation. The man who does not hate unskilled work and is not attached to skilled work – that man with pure Sattva Guna is free from doubt, intelligent and a true renunciate.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (11-12)

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥
अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम् ।
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु संन्यासिनां क्वचित् ॥

हिंदी अर्थ – क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा संपूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है – यह कहा जाता है| कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ – ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नही होता|

English Meaning – Because it is not possible for any human being with a body to completely renounce all the actions, hence it is said that one who has renounced the results of the actions. The deeds of people who do not give up the results of their actions have three types of results – good, bad and mixed – after death, but the deeds of people who give up the results of their actions do not get results even in any period of time.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (13-14)

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ॥
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम् ।
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥

हिंदी अर्थ – हे महाबाहो ! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पांच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य – शास्त्र में कहे गए है, उनको तू मुझसे भलीभांति जान| इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पांचवां हेतु देव है|

English Meaning – O great-armed one! These five reasons for the accomplishment of all the deeds have been mentioned in the Sankhya Shastra which tells the remedies for ending the deeds, you should know them very well from me. In this matter i.e. in the accomplishment of the deeds, there is the establishment and the doer and different types of causes and different types of efforts and similarly, the fifth reason is God.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (15-16)

शरीरवाङ्‌मनोभिर्यत् कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ॥
तत्रैवं सति कर्तारमात् मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान् न स पश्यति दुर्मतिः ॥

हिंदी अर्थ – मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है – उसके ये पाँचों कारण है| परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्धि बुद्धि होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरुप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता|

English Meaning – Whatever action a man does with his mind, speech and body as per the scriptures or against it – these are the five reasons for it. But even if this happens, the person who, due to his impure intellect, considers only the pure soul as the doer in that matter i.e. in the happening of the deeds, that ignorant person with impure intellect does not understand the reality.

Bhagavad Gita Chapter 18

Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (17-18)

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसंग्रहः ॥

हिंदी अर्थ – जिस पुरुष के अन्तःकरण में ‘मैं करता हूँ’ ऐसा भाव नहीं आता है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मरता है और न पाप से बंधता है| ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय – ये तीनों प्रकार की कर्म-प्रेरणा है और कर्ता, करण तथा क्रिया – ये तीनों प्रकार का कर्म – संग्रह है|

English Meaning – The person who does not have the feeling of ‘I do’ in his heart and whose mind is not absorbed in worldly things and actions, that person neither actually dies nor gets bound by sin even after killing all these worlds. Knower, knowledge and known – these are the three types of action-inspiration and doer, action and action – these are the three types of action-collection.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (19-20)

ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः ।
प्रोच्यते गुणसंख्याने यथावच्छृणु तान्यपि ॥
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते ।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥

हिंदी अर्थ – गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए है, उनको भी तू मुझसे भलीभांति सुन| जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान|

English Meaning – In the scriptures that enumerate the qualities, only three types have been said, different from the qualities of knowledge, action and doer, listen to them very well from me. The knowledge by which man sees the one imperishable divine spirit present in all separate beings with equanimity without division, consider that knowledge as Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (21-22)

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान् ।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन् कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थ – किन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावो को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान| परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है – वह तामस कहा गया है|

English Meaning – But that knowledge, that is, the knowledge through which man knows the different types of emotions in all the beings, you should consider that knowledge as Rajas. But the knowledge which is attached to the body as a function and which is devoid of logic, devoid of metaphysical meaning and insignificant, is called Tamasic.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (23-24)

नियतं सङ्गरहितम रागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहंकारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थ – जों कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो – वह सात्त्विक कहा जाता है| परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है|

English Meaning – The work which is prescribed by the scriptures and is free from the pride of being a doer and is done by a person who does not want the fruit, without attachment or hatred, is called Sattvik. But the work which involves a lot of hard work and is done by a person desirous of pleasures or by a person full of ego, that work is called Rajasic.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (25-26)

अनुबन्धं क्षयं हिंसा मनवेक्ष्य च पौरुषम् ।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः ।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥

हिंदी अर्थ – जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरम्भ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है| जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाले, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष – शोकादि विकारो से रहित है – वह सात्त्विक कहा जाता है|

English Meaning – The action which is started only out of ignorance without considering the consequences, harm, violence and potency is called Tamas. The doer who is free from attachments, does not speak words of ego, has patience and enthusiasm and is free from the joys and sorrows when the work is accomplished or not – he is called Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (27-28)

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः ।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥
अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोऽलसः ।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥

हिंदी अर्थ – जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है| जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री है| वह तामस कहा जाता है|

English Meaning – The doer who is greedy and desirous of the fruits of his actions with attachment and has a nature of causing pain to others, is impure and indulges in joy and sorrow is called Rajas. The doer who is illiterate, devoid of education, arrogant, cunning, who destroys the livelihood of others and is a mourner, lazy and long-winded. That is called tamas.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (29-30)

बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं शृणु ।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय ॥
प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये ।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थ – हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा संपूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन| हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृतिमार्ग और निवृति मार्ग को, कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है – वह बुद्धि सात्त्विकी है|

English Meaning – Hey Dhananjay! Now listen to me explaining in detail the three types of intelligence and wisdom as per their qualities. Hey Parth! The intellect which accurately knows the path of practice and the path of retirement, duty and non-duty, fear and fearlessness, bondage and salvation – that intellect is Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (31-32)

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च ।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है| हे अर्जुन ! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी ‘यह धर्म’ ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है|

English Meaning – Hey Parth! The intellect by which a human being does not accurately know righteousness and unrighteousness, as well as duty and non-duty, is a royal intellect. Hey Arjun! The intellect which is surrounded by Tamasic nature and considers unrighteousness as ‘this religion’ and similarly considers all other things as opposite, that intellect is tamasic.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (33-34)

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥
यया तु धर्मकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन ।
प्रसङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इन्द्रियों की क्रियाओं को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है| परन्तु हे पृथापुत्र अर्जुन ! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है|

English Meaning – Hey Parth! The power of unadulterated retention by which a human being absorbs the activities of mind, life and senses through meditation and yoga is called Dhriti Sattviki. But O Arjun, son of Pritha! The power of retention by which a person desirous of getting results, with utmost attachment, holds on to religion, wealth and works, that power of retention is royal.

Bhagavad Gita Chapter 18

Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (35-36-37)

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।
न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी ॥
सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ ।
अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥
यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् ।
तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् ॥

हिंदी अर्थ – हे पार्थ ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दुःख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किये र्रेहता है – वह धारण शक्ति तामसी है| हे भरतश्रेष्ठ ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन| जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुखो के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है|

English Meaning – Hey Parth! The power of retention by which a person with evil mind does not leave sleep, fear, worry, sorrow and even madness, i.e. keeps holding it – that power of retention is Tamasic. Oh great Bharat! Now listen to me about three types of happiness also. The happiness in which a seeker rejoices through the practice of bhajan, meditation and service etc. and which leads to the end of suffering, is such happiness that, although it appears like poison in the beginning, but in the end it is like nectar. Therefore, the happiness arising from the offerings of the intellect related to God has been called Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (38-39-40)

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्त दग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥
यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः ।
निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम् ॥
न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥

हिंदी अर्थ – जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से होता है, वह पहले – भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य है इसलिए वह सुख राजस काहा गया है| जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निंद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है| पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कही भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो|

English Meaning – The happiness that occurs due to the combination of objects and senses, although it appears to be like nectar in the first period of enjoyment, yet in the end it is like poison, hence that happiness is called Rajas. The pleasure which fascinates the soul during enjoyment as well as in its outcome is called Tamasic, the pleasure arising from sleep, laziness and carelessness. There is no such entity in the earth or in the sky or among the gods or anywhere else, which is devoid of these three qualities arising from nature.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (41-42)

ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥
शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च ।
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥

हिंदी अर्थ – हे परंतप ! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए है| अंत:करण का निग्रह करना, इन्द्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना – ये सब के सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म है|

English Meaning – Hey Parantap! The actions of Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas and Shudras are divided according to the qualities arising from nature. Controlling the conscience, suppressing the senses, enduring hardships for the sake of following the Dharma, remaining pure inside and out, forgiving the transgressions of others, keeping the mind, senses and body simple – all these are the natural actions of a Brahmin.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (43-44)

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥
कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥

हिंदी अर्थ – शूरवीर, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव – ये सब के सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म है| खेती, गोलापन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार – ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म है तथा सब वर्णों की सेवा करना शुद्र का भी स्वाभाविक कर्म है|

English Meaning – Bravery, swiftness, patience, cleverness, not running away from battle, giving charity and possessiveness – all these are the natural deeds of a Kshatriya. Farming, circularity and correct behavior in the form of buying and selling – these are the natural duties of a Vaishya and serving all the varnas is also the natural duty of a Shudra.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (45-46)

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः ।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

हिंदी अर्थ – अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है| अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन| जिस परमेश्वर से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत व्याप्त है| उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है|

English Meaning – A person who is diligently engaged in his natural activities attains ultimate perfection in the form of God-realization. Listen to the method by which a person engaged in his natural work attains supreme success by doing such work. The God from whom all living beings have originated and from whom this entire world is pervaded. By worshiping that God through his natural actions, man attains supreme perfection.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (47-48)

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥
सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥

हिंदी अर्थ – अच्छे प्रकार आचरण किये हुए दुसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता| अतएव हे कुन्तीपुत्र ! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म को नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धुंए से अग्नि की भांति सभी कर्म किसी न किसी दोष से युक्त है|

English Meaning – One’s own religion, even if it is well-conducted and devoid of any virtues, is superior to the religion of others, because while doing the work of one’s own religion as determined by nature, a person does not commit sin. Therefore O son of Kunti! Sahaj Karma should not be abandoned even if it is flawed, because like smoke and fire, all actions are tainted with some flaw or the other.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (49-50)

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।
नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां संन्यासेनाधिगच्छति ॥
सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।
समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा ॥

हिंदी अर्थ – सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंत:करण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है| जो कि ज्ञान की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुंतीपुत्र ! तू संक्षेप मे ही मुझसे जान|

English Meaning – A person with an intellect free from attachment everywhere, without desires and with a living conscience, attains the supreme accomplishment of renunciation through Sankhyayoga. O son of Kunti, the way a man attains Brahma by attaining that selfless accomplishment which is the ultimate devotion to knowledge! You know me briefly.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (51-52-53)

बुद्ध्या विशुद्ध्या युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
अहंकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥

हिंदी अर्थ – विशुद्धि बुद्धि से युक्त तथा हल्का, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के द्वारा अंत:करण और इन्द्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभांति दृढ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है|

English Meaning – One who has pure intellect and eats light, sattvik and regular food, gives up words etc. and enjoys solitude and pure country, controls the mind, speech and body by controlling the conscience and senses through sattvik dharna power. One who completely destroys attachment and hatred and takes shelter of well-established renunciation and who renounces ego, power, pride, lust, anger and attachment and remains devoted to constant meditation, a man free from attachment and peaceful, who is integrally situated in Sachchidanandaghan Brahma.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (54-55)

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः ।
ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥

हिंदी अर्थ – फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है| ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला योगी मेरी पराभक्ति को प्राप्त होता है| उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा का वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमे प्रविष्ट हो जाता है|

English Meaning – Then, that yogi with a happy mind, established in unity with Sachchidanandaghan Brahma, neither mourns for anyone nor aspires for anyone. A yogi who has equanimity among all living beings attains supreme devotion towards me. Through that devotion, he knows me, the Supreme Soul, exactly as I am and as much as I am, and through that devotion, knowing me from the essence, he immediately enters into me.

Bhagavad Gita Chapter 18

Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (56-57)

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥
चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥

हिंदी अर्थ – मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो सम्पूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है| सब कर्मों को मन से मुझमे अर्पण करके तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमे चित्तवाला हो|

English Meaning – A Karmayogi who becomes devoted to me, while always performing all the deeds, attains the eternal, imperishable supreme state by my grace. By offering all your actions to Me wholeheartedly and by relying on Yoga in the form of equanimity, you should become devoted to Me and always remain mindful of Me.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (58-59)

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।
अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥
यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥

हिंदी अर्थ – उर्पयुक्त प्रकार में मुझमे चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा| जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबरदस्ती युद्ध में लगा देगा|

English Meaning – By having your mind in Me in the above-mentioned manner, you will easily overcome all difficulties by My grace and if you do not listen to My words due to ego, you will be destroyed, that is, you will be corrupted by charity. If you are taking refuge in ego and believing that ‘I will not fight’, then this determination of yours is false, because your nature will force you to engage in war.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (60-61)

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात् करिष्यस्यवशोऽपि तत् ॥
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

हिंदी अर्थ – हे कुंतीपुत्र ! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बंधा हुआ परवश होकर करेगा| हे अर्जुन ! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को अंतर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है|

English Meaning – O son of Kunti! The work which you do not want to do due to attachment, you will also do it under the influence of your previous natural karma. Hey Arjun! The inner God, who is present in the body as a device, guides all the living beings through His Maya according to their deeds and is situated in the heart of all the living beings.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (62-63)

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‌गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥

हिंदी अर्थ – हे भारत ! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में जा| उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परम धाम को प्राप्त होगा| इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया| अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भली भांति विचार कर, जैसे तू चाहता है वैसे ही कर|

English Meaning – Hey Bharat! You take refuge in that God in every way. Only by the grace of that God will you attain ultimate peace and the eternal supreme abode. In this way I have told you this most confidential knowledge. Now consider this mysterious knowledge thoroughly and do as you wish.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (64-65)

सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।
इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥

हिंदी अर्थ – सम्पूर्ण गोपनियों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन| तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा| हे अर्जुन ! तू मुझमे मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर| ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है|

English Meaning – You still listen to my most secret word, which is the most secret of all secrets. You are very dear to me, hence I will tell you these very beneficial words. Hey Arjun! You should be interested in me, become my devotee, worship me and pay obeisance to me. By doing this you will get me only, I make this true promise to you because you are very dear to me.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (66-67)

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।
न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥

हिंदी अर्थ – सम्पूर्ण धर्मों को अर्थात सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमे त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण में आ जा| मैं तुझे सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूंगा, तू शोक मत कर| तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमे दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए|

English Meaning – Abandoning all the religions i.e. all the duties and responsibilities in me, you surrender yourself only to me the almighty God. I will free you from all sins, do not grieve. At any time, you should not tell this mysterious sermon in the form of a song, neither to a person devoid of penance, nor to a person without devotion, nor to anyone without the desire to listen, and you should never say it to someone who has a negative view of me.

Bhagavad Gita Chapter 18

Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (68-69-70)

य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मा दन्यः प्रियतरो भुवि ॥
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥

हिंदी अर्थ – जो पुरुष मुझमे परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा – इसमें कोई संदेह नहीं है| उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं| जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊंगा – ऐसा मेरा मत है|

English Meaning – The person who, with utmost love for me, will speak this most mysterious Geeta Shastra among my devotees, will be blessed by me only – there is no doubt about it. There is no one among humans who does work more dear to me than him and in the future there will be no one more dear to me on earth than him. I believe that the man who will read the Gita Shastra in this religious form of dialogue between us, will also be worshiped by him through the Gyan Yagya.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (71-72)

श्रद्धावाननसूयश्च शृणुया दपि यो नरः ।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान् प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥
कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।
कच्चिदज्ञानसंमोहः प्रनष्टस्ते धनंजय ॥

हिंदी अर्थ – जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालो के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा| हे पार्थ ! क्या इस गीताशास्त्र को तूने एकाग्रचित भाव से श्रवण किया? और हे धनंजय ! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया?

English Meaning – The person who listens to this Gita Shastra with faith and without any evil eye, will also be free from sins and will reach the best worlds of those who do good deeds. Hey Parth! Did you listen to this Gita Shastra with concentration? And O Dhananjay! Has your attachment born of ignorance been destroyed?


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (73-74)

अर्जुन उवाच
नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥
सञ्जय उवाच
इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।
संवादमिममश्रौष मद्भुतं रोमहर्षणम् ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे अच्युत ! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा| संजय बोले – इस प्रकार मैं श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना|

English Meaning – Arjun said – O Achyut! By your grace my attachment has been destroyed. I have regained my memory, now I am free from doubt and stable, hence I will follow your orders. Sanjay said – This is how I heard this wonderful, mysterious and thrilling conversation between Shri Vasudev and Mahatma Arjun.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (75-76)

व्यासप्रसादाच्छ्रुत वानेतद्गुह्यमहं परम् ।
योगं योगेश्वरात्कृष्णात् साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥
राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।
केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥

हिंदी अर्थ – श्री व्यासजी की कृपा से दिव्य दृष्टी पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना| हे राजन ! भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन के इस रहस्ययुक्त, कल्याणकारक और अद्भुत संवाद को पुनः स्मरण करके मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ|

English Meaning – Having received divine vision by the grace of Shri Vyasji, I heard this highly confidential yoga being said to Arjun directly from Yogeshwar Lord Shri Krishna himself. Hey king! I feel happy again and again remembering this mysterious, beneficial and wonderful conversation between Lord Krishna and Arjun.


Bhagavad Gita Chapter 18 Shlok (77-78)

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।
विस्मयो मे महान् राजन् हृष्यामि च पुनः पुनः ॥
यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥

हिंदी अर्थ – हे राजन ! श्रीहरि के उस अत्यंत विलक्षण रूप को भी पुनः स्मरण करके मेरे चित्त में महान आश्चर्य होता है और मैं बार-बार हर्षित हो रहा हूँ| हे राजन ! जहाँ योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण है और जहाँ गांडीव-धनुषधारी अर्जुन है, वही पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है – ऐसा मेरा मत है|

English Meaning – Hey king! Remembering that very unique form of Sri Hari. there is great surprise in my mind and I am feeling happy again and again. Hey king! Where Yogeshwar is Lord Shri Krishna and where Gandiva-bow-wielding Arjun is there, there is Shri, Vijay, Vibhuti and Achal Niti – this is my opinion.


|| भगवद गीता अठारहवाँ अध्याय समाप्त ||

Bhagavad Gita Chapter 17: भगवद गीता सत्रहवाँ अध्याय अर्थ सहित

क्या आपने कभी भी अपने जीवन में श्री भगवद गीता का पाठ किया है? यदि नहीं तो हम आपके लिए एक नयी सीरीज प्रारंभ करने जा रहे है| जिसमे हम आपको गीता के प्रत्येक अध्याय में उपस्थित सभी श्लोकों के हिंदी अथवा अंग्रेजी अर्थ बतायेंगे| जिसकी सहायता से आप इस भगवद गीता सत्रहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 17) को बहुत ही अच्छे से समझ पायेंगे, जिसमे भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कई ज्ञान की बातें बताई है| इस पवित्र ग्रन्थ की रचना पहली सहस्राब्दी ईसा पूर्व महर्षि वेदव्यास जी के द्वारा की गई थी| आज हम भगवद गीता सत्रहवाँ अध्याय (Bhagavad Gita Chapter 17) को हिंदी तथा अंग्रेजी अर्थ सहित आपको समझाएंगे|

Bhagavad Gita Chapter 17

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Chapter 17 – श्रद्धा त्रय विभाग योग (The Divisions of Faith)


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (1-2)

अर्जुन उवाच
ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥
श्रीभगवानुवाच त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥

हिंदी अर्थ – अर्जुन बोले – हे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते है, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी किंवा तामसी? श्री भगवान् बोले – मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी – ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है| उसको तू मुझसे सुन|

English Meaning – Arjun said – O Krishna! What is the condition of those people who abandon the scriptures and worship Goddess Devadika with faith? Is it sattvik or rajasi or tamasi? Shri Bhagwan said that the faith of human beings which is devoid of the classical sanskaras and arises only from nature, is of three types – sattvik, rajasic and tamasic. You hear it from me.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (3-4)

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥
यजन्ते सात्त्विका देवान् यक्षरक्षांसि राजसाः ।
प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः ॥

हिंदी अर्थ – हे भारत ! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्त:करण के अनुरूप होती है| यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है,वह स्वयं भी वही है| सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते है, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य है, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते है|

English Meaning – Hey Bharat! The faith of all human beings is according to their conscience. This man has faith, hence the one who has faith like the man, himself is the same. Sattvik people worship gods, Rajasic people worship Yakshas and demons and other Tamasic people worship ghosts and ghosts.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (5-6)

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥

हिंदी अर्थ – जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मन:कल्पित घोर तप को तपते है तथा दंभ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त है| जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्त:करण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले है| उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान|

English Meaning – Those people who practice severe penance only in their mind and are devoid of the scriptures and are full of arrogance and ego and are also full of desire, attachment and pride of power. Which is going to destroy the ghost community present in the body, the Supreme Soul present in the heart. You consider those ignorant people to be of a demonic nature.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (7-8)

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृणु ॥
आयुःसत्त्वबलारोग्य सुखप्रीतिविवर्धनाः ।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥

हिंदी अर्थ – भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है| वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते है| उनके इस पृथक-पृथक भेद को तू मुझसे सुन| आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रति को बढाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय – ऐसे आहार अर्थात भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते है|

English Meaning – Everyone likes three types of food according to their nature. Similarly, Yagya, penance and charity are also of three types. You listen to me about their different secrets. A Sattvik man likes such food items which increase life span, intelligence, strength, health, happiness and energy, which are juicy, smooth and stable and are dear to the mind by nature.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (9-10)

कट्‌वम्ललवणात्युष्ण तीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
आहारा राजसस्येष्टा-दुःखशोकामयप्रदाः ॥
यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥

हिंदी अर्थ – कडवे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिंता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात् भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते है| जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है|

English Meaning – Food items that are bitter, sour, salty, very hot, pungent, dry, inflammatory and cause sorrow, anxiety and diseases are loved by a Rajas man. The food which is half-cooked, tasteless, foul-smelling, stale and unhygienic and which is also impure, is liked by a tamasic person.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (11-12)

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ॥
अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ॥

हिंदी अर्थ – जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है – इस प्रकार मन का समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है| परन्तु हे अर्जुन ! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान|

English Meaning – It is the duty to perform Yagya as prescribed by the scriptures – this is done by people who satisfy their mind and do not want any result, it is Sattvik. But oh Arjun! The yagya that is performed only for the sake of arrogance or keeping the results in mind, consider that yagya as rajasic.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (13-14)

विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते ॥
देवद्विजगुरुप्राज्ञ पूजनं शौचमार्जवम् ।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थ – शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मंत्रों के, बिना किसी दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते है| देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा – यह शरीर – संबंधी तप कहा जाता है|

English Meaning – The Yagya which is performed inferior to the scriptures, without food donation, without mantras, without any Dakshina and without reverence is called Tamas Yagya. Worship of Gods, Brahmins, Teachers and learned people, purity, simplicity, celibacy and non-violence – these are called penances related to the body.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (15-16)

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥
मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥

हिंदी अर्थ – जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है – वही वाणी – संबंधी तप कहा जाता है| मन की प्रसन्नता, शांतभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का विग्रह और अंत:करण के भावों को भलीभांति पवित्रता, इस प्रकार यह मन संबंधी तप कहा जाता है|

English Meaning – The speech which is free from irritation, sweet, beneficial and correct and which is the practice of reading the Vedas and chanting the name of God, is called penance related to speech. Happiness of the mind, peaceful feeling, nature of thinking about God, separation of the mind and complete purity of the feelings of conscience, thus this is called penance related to the mind.

Bhagavad Gita Chapter 17

Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (17-18)

श्रद्धया परया तप्तं तपस् तत्त्रिविधं नरैः ।
अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते ॥
सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥

हिंदी अर्थ – फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों के द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते है| जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है|

English Meaning – The three types of penances mentioned above, performed with utmost devotion by yogis who do not desire results, are called Sattvik. The penance which is done out of nature or hypocrisy for the sake of respect, honor and worship . That penance which has uncertain and momentary results is called Rajas here.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (19-20)

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥
दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे ।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थ – जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दुसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है – वह तप तामस कहा गया है| दान देना ही कर्तव्य है – ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल और पात्र के प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है|

English Meaning – The penance which is done foolishly, out of stubbornness, with pain of mind, speech and body or to cause harm to others – that penance is called Tamasic. One should give charity in such a spirit towards the country, the time, and the person who does not do any favor at the time of receiving it, and it is said to be Sattvik.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (21-22)

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥
अदेशकाले यद्दानम पात्रेभ्यश्च दीयते ।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थ – किन्तु जो दान क्लेश्पूर्वक तथा प्रत्युपचुर के प्रयोजन से अथवा किसी प्रकार के फल को दृष्टि मर रखकर किया जाता है| वह दान राजस कहलाता है| जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है|

English Meaning – But the donation which is made out of pain and for the purpose of retribution or without any kind of result in mind. The charity is called Rajasic. People call the charity which is given without respect or contemptuously in an unworthy place and time and towards a deserving person, tamas.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (23-24)

ॐतत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः ।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् ॥

हिंदी अर्थ – ॐ, तत, सत-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम बताया गया है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए| इसलिए वेदमंत्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएं सदा ‘ॐ’ इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती है|

English Meaning – Om, Tat, Sat – these three types of Sachchidanandaghan Brahma have been described as names, from which Brahmins, Vedas and Yajnadis were created in the beginning of creation. Therefore, the yagya, charity and penance activities prescribed by the scriptures of the great men who recite the Veda mantras always begin by chanting the name of God ‘Om’.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (25-26)

तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
दानक्रियाश्च विविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः ॥
सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते ॥

हिंदी अर्थ – तत अर्थात् तत नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही सब है – इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएं तथा दानरूप क्रियाएं की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती है| सत – इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्याभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ ! उत्तम कर्म में भी ‘सत’ शब्द का प्रयोग किया जाता है|

English Meaning – Tat i.e. everything belongs to the God who is called by the name Tat – in this sense. The people who have the desire of not getting the result perform various types of Yagya, penance activities, and charity activities. Sat – In this way this name of God is used in the sense of truth and in the sense of superiority and O Partha! People also use the word ‘Sat’ in good deeds.


Bhagavad Gita Chapter 17 Shlok (27-28)

यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥
अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस् तप्तं कृतं च यत् ।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥

हिंदी अर्थ – तथा यज्ञ, ताप और दान में जो स्थिति है, वह भी ‘सत’ इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत – ऐसे कहा जाता है| हे अर्जुन ! बिना श्रद्धा से किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है – वह समस्त ‘असत’ – इस प्रकार कहा जाता है इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही|

English Meaning – And the state of Yagya, penance and charity is also called ‘Sat’.  The work done for God is definitely called Sat. Hey Arjun! The havan performed without faith, the charity given, the penance performed and whatever auspicious work done is all ‘Asat’. This is called like this, so it is neither beneficial in this world nor even after death.


|| भगवद गीता सत्रहवाँ अध्याय समाप्त ||