Mrit Sanjeevani Stotram: मृत संजीवनी स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotram) में भगवान शिव की आराधना की जाती है तथा यह मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) पूर्ण रूप से भगवान शिव को ही समर्पित होता है| मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का अर्थ – मृत्यु से मुक्ति का कवच होता है, जो भी व्यक्ति भगवान शिव की पूजा करते समय इस मृत संजीवनी स्तोत्र का जाप करता है|

उस व्यक्ति को सदा के लिए अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है| इस मृत संजीवनी स्तोत्र की रचना दैत्य गुरु शुक्राचार्य जी के द्वारा युद्ध में मारे गए राक्षसों को पुनर्जीवित करने के लिए की गई थी| मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) को भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र तथा गायत्री मंत्र को मिलाकर बनाया गया था|

Mrit Sanjeevani Stotram

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Mrit Sanjeevani Stotram With Hindi Meaning – मृत संजीवनी स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

|| श्री मृत संजीवनी स्तोत्र ||

एवमारध्य गौरीशं देवं मृत्युञ्जयमेश्वरं।
मृतसञ्जीवनं नाम्ना कवचं प्रजपेत् सदा ॥1॥

हिंदी अर्थ – मृत्यु पर विजय पाने वाले, गौरीपति भगवान शंकर की पूजा करने के पश्चात भक्तों को हमेशा मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का स्पष्ट रूप से पाठ करना चाहिए|

सारात् सारतरं पुण्यं गुह्याद्गुह्यतरं शुभं ।
महादेवस्य कवचं मृतसञ्जीवनामकं ॥ 2॥

हिंदी अर्थ – भगवान शंकर का यह कवच जिसे मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) के नाम से जाना जाता है, बहुत ही पवित्र तथा शुभता प्रदान करने वाला है|

समाहितमना भूत्वा शृणुष्व कवचं शुभं ।
शृत्वैतद्दिव्य कवचं रहस्यं कुरु सर्वदा ॥3॥

हिंदी अर्थ – आचार्य अपने शिष्यों से कहते है – हे वत्स! अपने मन को एकाग्र करके केवल इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का श्रवण करो| यह कवच कल्याणकारी एवं अत्यंत दिव्य है| इसकी गोपनीयता को हमेशा बनाये रखना|

वराभयकरो यज्वा सर्वदेवनिषेवितः ।
मृत्युञ्जयो महादेवः प्राच्यां मां पातु सर्वदा ॥4॥

हिंदी अर्थ – जरा से अभय करने वाले, निरंतर यज्ञ करने वाले तथा सभी देवताओं के द्वारा पूजनीय हे महादेव! आप पार्श्व दिशा से मेरी रक्षा करो|

दधाअनः शक्तिमभयां त्रिमुखं षड्भुजः प्रभुः।
सदाशिवोऽग्निरूपी मामाग्नेय्यां पातु सर्वदा ॥5॥

हिंदी अर्थ – अभय प्रदान करने वाली महान शक्ति को धारण करने वाले, छ: भुजाओं एवं तीन मुख वाले अग्रि रूपी भगवान शंकर अग्रीकोण में मेरी रक्षा करे|

अष्टदसभुजोपेतो दण्डाभयकरो विभुः ।
यमरूपि महादेवो दक्षिणस्यां सदावतु ॥6॥

हिंदी अर्थ – अट्ठारह भुजाओं वाले, हाथों में दंड तथा अभय मुद्रा को धारण करने वाले, सर्वत्र व्यापी महादेव शिव दक्षिण दिशा में मेरी सदा रक्षा करें|

खड्गाभयकरो धीरो रक्षोगणनिषेवितः ।
रक्षोरूपी महेशो मां नैरृत्यां सर्वदावतु ॥7॥

हिंदी अर्थ – हाथों में तलवार तथा अभय मुद्रा धारण करने वाले, राक्षसों के द्वारा आराधित रक्षा रूपी महादेव नैर्ऋत्‍य कोण में मेरी हमेशा रक्षा करें|

पाशाभयभुजः सर्वरत्नाकरनिषेवितः ।
वरुणात्मा महादेवः पश्चिमे मां सदावतु ॥8॥

हिंदी अर्थ – अपने हाथों में पाश धारण करने वाले, सभी रत्नाकरो में सेवित, वरुण स्वरूप भगवान शंकर पश्चिम दिशा में हमेशा मेरी रक्षा करें|

गदाभयकरः प्राणनायकः सर्वदागतिः ।
वायव्यां मारुतात्मा मां शङ्करः पातु सर्वदा ॥9॥

हिंदी अर्थ – हाथों में गदा धारण करने वाले, प्राणों के रक्षक, हमेशा गतिशील भगवान शिव वायव्यकोण में सदा मेरी रक्षा करें|

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शङ्खाभयकरस्थो मां नायकः परमेश्वरः ।
सर्वात्मान्तरदिग्भागे पातु मां शङ्करः प्रभुः ॥10॥

हिंदी अर्थ – हाथों में शंख तथा अभय मुद्रा धारण करने वाले नायक, सर्वव्यापक परमेश्वर महादेव जी समस्त दिशाओं के मध्य मेरी हमेशा रक्षा करें|

शूलाभयकरः सर्वविद्यानमधिनायकः ।
ईशानात्मा तथैशान्यां पातु मां परमेश्वरः ॥11॥

हिंदी अर्थ – हाथों में भाला तथा अभय मुद्रा को धारण करने वाले, सभी विद्याओं के स्वामी भगवान शिव ईशान कोण में मेरी हमेशा रक्षा करें|

ऊर्ध्वभागे ब्रःमरूपी विश्वात्माऽधः सदावतु ।
शिरो मे शङ्करः पातु ललाटं चन्द्रशेखरः॥12॥

हिंदी अर्थ – विश्वात्मस्वरूप भगवान शिव मेरे अधोभाग की एवं ब्रह्मरूपी शिव ऊर्ध्वभाग में मेरी हमेशा रक्षा करें| भगवान शंकर मेरे सिर की तथा चंद्रशेखर मेरे ललाट की रक्षा करें|

भूमध्यं सर्वलोकेशस्त्रिणेत्रो लोचनेऽवतु ।
भ्रूयुग्मं गिरिशः पातु कर्णौ पातु महेश्वरः ॥13॥

हिंदी अर्थ – मेरी भौहों के मध्य मध्य सर्वलोकेश तथा दोनों नेत्रों की त्रिनेत्र भगवान शंकर रक्षा करे| मेरे दोनों भौहों की रक्षा गिरीश तथा दोनों कानों की रक्षा भगवान महेश्वर करें|

नासिकां मे महादेव ओष्ठौ पातु वृषध्वजः ।
जिह्वां मे दक्षिणामूर्तिर्दन्तान्मे गिरिशोऽवतु ॥14॥

हिंदी अर्थ – भगवान महादेव मेरी नासिका एवं वृषभध्वज मेरे होंठों की हमेशा रक्षा करे| दक्षिणामूर्ति मेरी जिव्हा तथा भगवान गिरीश मेरे दांतों की सदा रक्षा करें|

मृतुय्ञ्जयो मुखं पातु कण्ठं मे नागभूषणः।
पिनाकि मत्करौ पातु त्रिशूलि हृदयं मम ॥15॥

हिंदी अर्थ – मृत्युंजय मेरे मुख की तथा नागभूषण भगवान शंकर मेरे कंठ की हमेशा रक्षा करें| पिनाकी मेरे दोनों हाथों की तथा त्रिशूल धारी भगवान शिव मेरे हृदय की रक्षा करें|

पञ्चवक्त्रः स्तनौ पातु उदरं जगदीश्वरः ।
नाभिं पातु विरूपाक्षः पार्श्वौ मे पार्वतीपतिः ॥16॥

हिंदी अर्थ – पञ्चवक्त्र मेरे दोनों स्तनों तथा भगवान जगदीश्वर मेरे उदर की हमेशा रक्षा करें| विरूपाक्ष नाभि की तथा पार्वती पति पार्श्वभाग की रक्षा करें|

कटद्वयं गिरीशौ मे पृष्ठं मे प्रमथाधिपः।
गुह्यं महेश्वरः पातु ममोरू पातु भैरवः ॥17॥

हिंदी अर्थ – गिरीश मेरे दोनों कटिभाग की तथा प्रमथाधिप पृष्टभाग की रक्षा करें| महेश्वर मेरे गुह्य भाग तथा भगवान भैरव मेरे दोनों ऊरुओं की रक्षा करें|

जानुनी मे जगद्दर्ता जङ्घे मे जगदम्बिका ।
पादौ मे सततं पातु लोकवन्द्यः सदाशिवः ॥18॥

हिंदी अर्थ – जगद्धर्ता मेरे घुटनों की, जगदम्बिका मेरे दोनों जांघों की तथा लोक वंदनीय सदाशिव निरंतर मेरे दोनों पैरों की रक्षा करें|

गिरिशः पातु मे भार्यां भवः पातु सुतान्मम ।
मृत्युञ्जयो ममायुष्यं चित्तं मे गणनायकः ॥19॥

हिंदी अर्थ – गिरीश मेरे भार्या की तथा भव मेरे संतानों की रक्षा करे| मृत्युंजय मेरे आयु की तथा गणनायक मेरे चित्त की सदा रक्षा करें|

सर्वाङ्गं मे सदा पातु कालकालः सदाशिवः ।
एतत्ते कवचं पुण्यं देवतानां च दुर्लभम् ॥20॥

हिंदी अर्थ – कालों के काल भगवान शिव हमेशा मेरे सभी अंगों की रक्षा करें| हे वत्स! देवताओं के लिए भी अत्यंत दुर्लभ इस पवित्र कवच का वर्णन मैंने तुमसे किया है|

मृतसञ्जीवनं नाम्ना महादेवेन कीर्तितम् ।
सह्स्रावर्तनं चास्य पुरश्चरणमीरितम् ॥21॥

हिंदी अर्थ – स्वयं महादेव जी ने ही इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) को कहा है| इस स्तोत्र की सहस्त्र आवृत्ति को पुरश्चरण कहा गया है|

Mrit Sanjeevani Stotram

यः पठेच्छृणुयान्नित्यं श्रावयेत्सु समाहितः ।
सकालमृत्युं निर्जित्य सदायुष्यं समश्नुते ॥22॥

हिंदी अर्थ – जो भी व्यक्ति अपने मन को एकाग्र करके प्रतिदिन इन स्तोत्र का पाठ करता है, सुनता है या दूसरों को सुनाता है| वह व्यक्ति अकाल मृत्यु को जीतकर पूर्ण आयु को प्राप्त करता है|

हस्तेन वा यदा स्पृष्ट्वा मृतं सञ्जीवयत्यसौ ।
आधयोव्याध्यस्तस्य न भवन्ति कदाचन ॥23॥

हिंदी अर्थ – जो भी व्यक्ति अपने हाथ से मरणासन्न वाले व्यक्ति के शरीर पर स्पर्श करते हुए इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का पाठ करता है, उस मृत प्राणी के भीतर चेतनता आ जाती है|

कालमृयुमपि प्राप्तमसौ जयति सर्वदा ।
अणिमादिगुणैश्वर्यं लभते मानवोत्तमः ॥24॥

हिंदी अर्थ – यह मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) काल के हाथ में गए व्यक्ति को भी जीवन प्रदान कर सकता है| वह अणिमा आदि गुणों से युक्त ऐश्वर्य को भी प्राप्त करता है|

युद्दारम्भे पठित्वेदमष्टाविशतिवारकं ।
युद्दमध्ये स्थितः शत्रुः सद्यः सर्वैर्न दृश्यते ॥25॥

हिंदी अर्थ – युद्ध के प्रारंभ होने से पूर्व ही जो भी इस स्तोत्र का 28 बार पाठ करता है| वह उस समय शत्रुओं से अदृश्य हो जाता है|

न ब्रह्मादीनि चास्त्राणि क्षयं कुर्वन्ति तस्य वै ।
विजयं लभते देवयुद्दमध्येऽपि सर्वदा ॥26॥

हिंदी अर्थ – यदि युद्ध देवताओं के खिलाफ हो तो ब्रह्मास्त्र भी उसे किसी प्रकार की हानि नहीं पंहुचा सकता है| वह विजय को प्राप्त करता है|

प्रातरूत्थाय सततं यः पठेत्कवचं शुभं ।
अक्षय्यं लभते सौख्यमिह लोके परत्र च ॥27॥

हिंदी अर्थ – जो भी भक्त प्रतिदिन सुबह उठकर इस मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) का पाठ करता है तो उस भक्त को इस लोक तथा परलोक में भी अक्षय्य सुख की प्राप्ति होती है|

सर्वव्याधिविनिर्मृक्तः सर्वरोगविवर्जितः ।
अजरामरणो भूत्वा सदा षोडशवार्षिकः ॥28॥

हिंदी अर्थ – वह सम्पूर्ण व्याधियों से मुक्ति प्राप्त कर लेता है तथा सभी रोग उसके शरीर को त्यागकर चले जाते है| वह अजर – अमर होकर पुनः सोलह वर्ष का व्यक्ति बन जाता है|

विचरव्यखिलान् लोकान् प्राप्य भोगांश्च दुर्लभान् ।
तस्मादिदं महागोप्यं कवचम् समुदाहृतम् ॥29॥

हिंदी अर्थ – वह इस लोक के दुर्लभ भोगों को प्राप्त करता हुआ सम्पूर्ण लोकों में विचरण करता रहता है| इसी कारण से इस महागोपनीय कवच को मृत संजीवनी के नाम से जाना जाता है|

मृतसञ्जीवनं नाम्ना देवतैरपि दुर्लभम् ॥30॥

हिंदी अर्थ – यह देवताओं के लिए दुर्लभ है|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.मृत संजीवनी स्तोत्रम किस भगवान को समर्पित किया गया है?

A.यह स्तोत्र देवो के देव महादेव अर्थात भगवान शिव को समर्पित किया गया है|

Q.इस स्तोत्र की रचना किसने तथा क्यों की?

A.इस मृत संजीवनी स्तोत्र की रचना दैत्य गुरु शुक्राचार्य जी के द्वारा युद्ध में मारे गए राक्षसों को पुनर्जीवित करने के लिए की गई थी| मृत संजीवनी स्तोत्र (Mrit Sanjeevani Stotra) को भगवान शिव के महामृत्युंजय मंत्र तथा गायत्री मंत्र को मिलाकर बनाया गया था|

Q.मृतसंजीवनी कवच का पाठ करने से क्या लाभ होता है?

A.जो भी व्यक्ति भगवान शिव की पूजा करते समय इस मृत संजीवनी स्तोत्र का जाप करता है| उस व्यक्ति को सदा के लिए अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है|

Q.इस मृत संजीवनी स्तोत्र का क्या अर्थ है?

A.मृत संजीवनी स्तोत्र का अर्थ – मृत्यु से मुक्ति का कवच होता है|

Chitragupta Chalisa Lyrics: चित्रगुप्त चालीसा हिंदी लिरिक्स

भगवान चित्रगुप्त को प्रसन्न करने के चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) एक बहुत अच्छा मार्ग माना जाता है| इस चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) का जाप करने से भक्तों पर भगवान चित्रगुप्त की कृपा हमेशा बनी रहती है| भगवान चित्रगुप्त यम लोक में निवास करते है| भगवान चित्रगुप्त का कार्य पापों तथा पुण्य का आंकलन करना है|

भगवान चित्रगुप्त की पूजा करने से तथा चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) का पाठ करने से भक्तों को उनके कारोबार में उन्नति प्राप्त होती है| आइये जानते है चित्रगुप्त चालीसा (Chitragupta Chalisa) के लिरिक्स के बारे में|

 चित्रगुप्त चालीसा

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे शिव तांडव स्तोत्रम [Shiv Tandav Stotram], सरस्वती आरती [Saraswati Aarti], या कनकधारा स्तोत्र [Kanakdhara Stotra] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

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चित्रगुप्त चालीसा हिंदी में | Chitragupta Chalisa Lyrics in Hindi

|| दोहा ||

सुमिर चित्रगुप्त ईश को, सतत नवाऊ शीश।
ब्रह्मा विष्णु महेश सह, रिनिहा भए जगदीश॥
करो कृपा करिवर वदन, जो सरशुती सहाय।
चित्रगुप्त जस विमलयश, वंदन गुरूपद लाय॥

|| चौपाई ||

जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर।
जय यमेश दिगंत उजागर॥

अज सहाय अवतरेउ गुसांई।
कीन्हेउ काज ब्रम्ह कीनाई॥

श्रृष्टि सृजनहित अजमन जांचा।
भांति-भांति के जीवन राचा॥

अज की रचना मानव संदर।
मानव मति अज होइ निरूत्तर॥ 4 ॥

भए प्रकट चित्रगुप्त सहाई।
धर्माधर्म गुण ज्ञान कराई॥

राचेउ धरम धरम जग मांही।
धर्म अवतार लेत तुम पांही॥

अहम विवेकइ तुमहि विधाता।
निज सत्ता पा करहिं कुघाता॥

श्रष्टि संतुलन के तुम स्वामी।
त्रय देवन कर शक्ति समानी॥ 8 ॥

पाप मृत्यु जग में तुम लाए।
भयका भूत सकल जग छाए॥

महाकाल के तुम हो साक्षी।
ब्रम्हउ मरन न जान मीनाक्षी॥

धर्म कृष्ण तुम जग उपजायो।
कर्म क्षेत्र गुण ज्ञान करायो॥

राम धर्म हित जग पगु धारे।
मानवगुण सदगुण अति प्यारे॥ 12 ॥

विष्णु चक्र पर तुमहि विराजें।
पालन धर्म करम शुचि साजे॥

महादेव के तुम त्रय लोचन।
प्रेरकशिव अस ताण्डव नर्तन॥

सावित्री पर कृपा निराली।
विद्यानिधि माँ सब जग आली॥

रमा भाल पर कर अति दाया।
श्रीनिधि अगम अकूत अगाया॥ 20 ॥

ऊमा विच शक्ति शुचि राच्यो।
जाकेबिन शिव शव जग बाच्यो॥

गुरू बृहस्पति सुर पति नाथा।
जाके कर्म गहइ तव हाथा॥

रावण कंस सकल मतवारे।
तव प्रताप सब सरग सिधारे॥

प्रथम् पूज्य गणपति महदेवा।
सोउ करत तुम्हारी सेवा॥ 24 ॥

रिद्धि सिद्धि पाय द्वैनारी।
विघ्न हरण शुभ काज संवारी॥

व्यास चहइ रच वेद पुराना।
गणपति लिपिबध हितमन ठाना॥

पोथी मसि शुचि लेखनी दीन्हा।
असवर देय जगत कृत कीन्हा॥

लेखनि मसि सह कागद कोरा।
तव प्रताप अजु जगत मझोरा॥ 28 ॥

विद्या विनय पराक्रम भारी।
तुम आधार जगत आभारी॥

द्वादस पूत जगत अस लाए।
राशी चक्र आधार सुहाए॥

जस पूता तस राशि रचाना।
ज्योतिष केतुम जनक महाना॥

तिथी लगन होरा दिग्दर्शन।
चारि अष्ट चित्रांश सुदर्शन॥ 32 ॥

राशी नखत जो जातक धारे।
धरम करम फल तुमहि अधारे॥

राम कृष्ण गुरूवर गृह जाई।
प्रथम गुरू महिमा गुण गाई॥

श्री गणेश तव बंदन कीना।
कर्म अकर्म तुमहि आधीना॥

देववृत जप तप वृत कीन्हा।
इच्छा मृत्यु परम वर दीन्हा॥ 36 ॥

धर्महीन सौदास कुराजा।
तप तुम्हार बैकुण्ठ विराजा॥

हरि पद दीन्ह धर्म हरि नामा।
कायथ परिजन परम पितामा॥

शुर शुयशमा बन जामाता।
क्षत्रिय विप्र सकल आदाता॥

जय जय चित्रगुप्त गुसांई।
गुरूवर गुरू पद पाय सहाई॥ 40 ॥

जो शत पाठ करइ चालीसा।
जन्ममरण दुःख कटइ कलेसा॥

विनय करैं कुलदीप शुवेशा।
राख पिता सम नेह हमेशा॥

॥ दोहा ॥

ज्ञान कलम, मसि सरस्वती, अंबर है मसिपात्र।
कालचक्र की पुस्तिका, सदा रखे दंडास्त्र॥
पाप पुन्य लेखा करन, धार्यो चित्र स्वरूप।
श्रृष्टिसंतुलन स्वामीसदा, सरग नरक कर भूप॥

॥ इति श्री चित्रगुप्त चालीसा समाप्त॥

 चित्रगुप्त चालीसा

Chitrgupta Chalisa Lyrics in English | जय चित्रगुप्त ज्ञान रत्नाकर

|| Doha ||

Sumir Chitragupta Ish ko, satat navaau sheesh.
Brahma Vishnu Mahesh sah, riniha bhae Jagadish.
Karo kripa karivar vadn, jo Saraswati sahay.
Chitragupt jas vimalyash, vandan gurupad laay.

|| Chaupai ||

Jai Chitragupt gyaan ratnakaar.
Jai Yamesh digant ujaagar.

Aj sahay avataru gusaanee.
Keenuh kaaj Bramh keenaa.

Shristi srijanahit ajman jaancha.
Bhanti-bhanti ke jeevan raacha.

Aj ki rachna maanav sandar.
Maanav mati aj hoi niruttar.

Bhae prakat Chitragupt sahaayee.
Dharmaadharma gun gyaan karaayee.

Raacheu dharam dharam jag maanhee.
Dharam avataar let tum paanhee.

Aham vivekai tumahi vidhaata.
Nij satta paa karahin kughaata.

Shristi santulan ke tum swaami.
Tray devan kar shakti samaanee.

Paap mrityu jag mein tum laaye.
Bhayaka bhoot sakal jag chhaaye.

Mahaakaal ke tum ho saakshi.
Bramhau marn na jaan meenaakshi.

Dharm Krishna tum jag upajaayo.
Karma kshetra gun gyaan karaayo.

Raam dharam hit jag pagu dhaare.
Maanavgun sadgun ati pyaare.

Vishnu chakra par tumahi viraajein.
Paalan dharam karam shuchi saaje.

Mahaadev ke tum tray lochan.
Prerakshiv as Tandav Nartan.

Savitri par kripa niraalee.
Vidyaanidhi maa sab jag aalee.

Rama bhaal par kar ati daaya.
Shreenidhi agam akoot agaaya.

Ooma vich shakti shuchi raachyo.
Jaake bin Shiv shav jag baachyo.

Guru Brihaspati sur pati naathaa.
Jaake karm gahai tav haathaa.

Raavan kans sakal matvaare.
Tav prataap sab sarg siddhaare.

Pratham poojya Ganpati Mahadeva.
Sou karat tumhaari sevaa.

Riddhi siddhi paay dwainaaaree.
Vighn haran shubh kaaj samvaaree.

Vyaas chahi rach ved puraana.
Ganpati lipibadh hitman thaan.

Pothee masi shuchi lekhani deenhaa.
Asavar dey jagat krit keenhaa.

Lekhani masi sah kaagad kora.
Tav prataap aju jagat majhora.

Vidya vinay paraakram bhaaree.
Tum aadhaar jagat aabhaaree.

Dvaadas poot jagat as laaye.
Raashi chakra aadhaar suhaaye.

Jas poota tas raashi rachanaa.
Jyotish ketum janak mahaanaa.

Tithi lagan hora digdarshan.
Chaari asht chitraansh sudarshan.

Raashi nakhat jo jaatak dhaare.
Dharam karam phal tumahi adhaare.

Ram Krishna Guruvrar grih jaaee.
Pratham guruji mahimaa gun gaayee.

Shree Ganesh tav bandan keenaa.
Karm akarm tumahi aadheena.

Devvrit jap tap vrit keenhaa.
Ichha mrityu param var deenhaa.

Dharmahiin saudaas kuraajaa.
Tap tumhaara baikunth viraajaa.

Hari pad deenha dharam Hari naamaa.
Kaayath parijan param pitaamaa.

Shur shuyashma ban jaamaataa.
Kshatriya vipra sakal aadaataa.

Jai jai Chitragupt gusaanee.
Guruvar guru pad paay sahaaee.

Jo shat paath karai chalisa.
Janmamarn dukh katai kalesa.

Vinay karain kuldeep shweshaa.
Raakh pita sam neha hameshaa.

|| Doha ||

Gyaan kalam, masi Saraswati, ambar hai masipaatra.
Kaalachakr ki pustika, sada rakhe dandastra.
Paap punya lekha karan, dhaaryo Chitr swaroop.
Shristi santulan swami sada, sarg narak kar bhup.

|| Iti Shri Chitragupt Chalisa samaapt ||

Kamada Ekadashi Vrat Katha: जाने कामदा एकादशी व्रत कथा व महत्व

Kamada Ekadashi Vrat Katha: अन्य एकादशी तिथियों की तरह ही कामदा एकादशी का भी हिन्दू धर्म में बहुत ही महत्व है| चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है| कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान होता है| कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तों को भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है|

इस एकादशी के दिन कामदा एकादशी व्रत कथा (Kamada Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करना तथा इसका कथा का श्रवण करना बहुत ही शुभ माना जाता है| इससे भक्तों की सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है| इस तिथि के दिन केवल फलाहार करते हुए कामदा एकादशी का व्रत किया जाता है| आज इस लेख के माध्यम से हम कामदा एकादशी व्रत कथा (Kamada Ekadashi Vrat Katha) के बारे में पढ़ेंगे|

कामदा एकादशी व्रत कथा

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कामदा एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance Of Kamada Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि – हे भगवान! मैं आपको शत – शत नमन करता हूं| आपने मुझे चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी , पापमोचनी एकादशी के बारे में बहुत ही अच्छे प्रकार तथा विस्तार से बताया| इसके पश्चात में आपसे विनती करता हूं – हे माधव! आप मुझे चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में मुझे सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधि पूर्वक बताएं|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे धर्मराज युधिष्ठिर! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि कामदा एकादशी के नाम से जानी जाती है| एक बार यही प्रश्न राजा दिलीप के द्वारा महर्षि वशिष्ठ से किया गया था| इसके बारे में जो भी ऋषि वशिष्ठ ने राजा दिलीप को बताया, वही मैं तुम्हे बतलाता हूं|

कामदा एकादशी व्रत कथा – Kamada Ekadashi Vrat Katha

बहुत ही पुराने समय में एक भोगीपुर नाम का राज्य था| वहां पर एक पुण्डरीक नामक राजा का राज्य था जो कि अनेकों ऐश्वर्यों से युक्त था| इस राज्य में बहुत सारी अप्सराएँ, किन्नर तथा गांधर्व निवास करते थे| उसी स्थान पर एक ललिता तथा ललित नाम के दो स्त्री तथा पुरुष बहुत ही वैभवशाली घर में निवास करते थे|

उन दोनों पति – पत्नी में बहुत ही अधिक स्नेह था| यदि वह दोनों ज्यादा समय के लिए एक दुसरे से अलग हो जाते थे तो दोनों ही बहुत व्याकुल हो जाते थे| एक समय की बात है कि पुण्डरीक की सभा में सभी गंधर्वों के साथ ललित भी गान का कार्यक्रम कर रहा था|

कामदा एकादशी व्रत कथा

गान करते हुए उसे अपनी प्रिय ललिता का स्मरण आ गया| जिस कारण उसका स्वर बिगड़ने से सम्पूर्ण गान का स्वरुप बिगड़ गया| ललित के मन के भाव को जानकार कार्कोट नामक नाग में पद भंग होने के कारण उसने राजा से सम्पूर्ण बात कह दी| इस कारण राजा पुण्डरीक ने क्रोध में उससे कहा कि तु मेरे समक्ष गाते हुए अपनी पत्नी का स्मरण कर रहा है|

इसलिए सजा के रूप में तुझे नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्मों का फल भोगना होगा| राजा पुण्डरीक के द्वारा दिए गए श्राप के कारण उसी समय ललित एक बहुत ही भयानक तथा विशालकाय राक्षस के रूप में परिवर्तित हो गई| उसका मुख बहुत भयंकर, नेत्र सूर्य – चंद्रमा के समान प्रदीप्त तथा उसके मुख से अग्नि भी निकल रही थी|

उसका सम्पूर्ण शरीर भी पर्वत के समान विशालकाय हो गया| इस प्रकार वह राक्षस बनकर अनेकों प्रकार के दुखों को भोगने लगा| यह बात जब ललित की पत्नी को पता लगी तो उसे बहुत ही दुःख हुआ तथा वह अपने पति को इस श्राप से मुक्त करने के मार्ग के बारे में सोचने लगी|

उसका राक्षस रूपी पति वन में रहकर अनेक प्रकार के दुःख सहने लगा| उसकी पत्नी ललिता उसके पीछे जाती तथा विलाप करती| एक बार ललिता अपने पति का पीछा करती हुई विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई| उस पर्वत पर ऋषि श्रृंगी का आश्रम था| ललिता उनके पास गई तथा उनसे प्रार्थना करने लगी|

उसे देखकर ऋषि श्रृंगी ने कहा – हे सुभगे! आप कौन है तथा यहाँ किस लिए आई हो? इस पर ललिता ने कहा कि – हे मुनि! मेरा नाम ललिता है तथा मेरे पति राजा पुण्डरीक के द्वारा दिए गए श्राप के कारण राक्षस बन गए है| उनके उद्धार का कोई उपाय बताइए| इस पर मुनि श्रृंगी ने कहा – हे कन्या! अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसे कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है|

इस उपवास को करने से मनुष्य के सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होते है| यदि तुम इस कामदा एकादशी का व्रत करके उसका पुण्य अपने पति को प्रदान कर दो तो शीघ्र ही तुम्हारे पति को राक्षस योनि से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी|

ऋषि के कहे अनुसार ही ललिता ने चैत्र शुक्ल में आने वाली का व्रत किया तथा द्वादशी तिथि के दिन ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देती हुई भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगी – हे प्रभु! मैंने जो यह व्रत किया है इसका फल मेरे पति देव को प्राप्त हो जिससे उन्हें जल्द ही इस राक्षस से योनि से मुक्त हो जाए| एकादशी उपवास का फल जैसे ही उसके पति को राक्षस योनि से मुक्ति प्राप्त हो गई तथा इसके पश्चात वह दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक की ओर चले गए|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.कामदा एकादशी कब आती है?

A.चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि कामदा एकादशी के नाम से जानी जाती है|

Q.कामदा एकादशी का जाप करने से क्या फायदा है?

A. इस एकादशी का जाप करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होते है तथा राक्षस योनि से मुक्ति भी प्राप्त होती है|

Q.ललित को राक्षस योनि में भटकने का श्राप किसने व क्यों दिया?

A.गान करते हुए उसे अपनी प्रिय ललिता का स्मरण आ गया| जिस कारण से उसका स्वर बिगड़ गया, जिससे सम्पूर्ण गान का स्वरुप बिगड़ गया| ललित के मन के भाव को जानकार कार्कोट नामक नाग में पद के कारण राजा से सम्पूर्ण बात कह दी| इस कारण राजा पुण्डरीक ने क्रोध में उससे कहा कि तुम मेरे समक्ष गाते हुए अपनी पत्नी का स्मरण कर रहा है| राजा पुण्डरीक के द्वारा दिए गए श्राप के कारण उसी समय ललित एक बहुत ही भयानक तथा विशालकाय राक्षस के रूप में परिवर्तित हो गई|

Q.ललिता ने अपने पति को श्राप से मुक्त करने के लिए किससे सहायता मांगी?

A.एक बार ललिता अपने पति का पीछा करती हुई विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई| उस पर्वत पर ऋषि श्रृंगी का आश्रम था| ललिता उनके पास गई तथा उनसे प्रार्थना करने लगी|

Santan Gopal Mantra: Meanings, Importance, And Benefits

Santan Gopal Mantra is considered a powerful mantra that eliminates the hurdles and difficulties related to the birth of a healthy child. If you are going through the issue of not having a child, then you do not need to worry about it. Santan Gopal’s mantra is the best method to have a child. Lord Krishna will bless the couple with a child. 

The chanting of the Santan Gopal mantra creates the vibratory energy which will dissolve the difficulties and obstacles that come in the path of begetting a child. Santan Gopal mantra blesses the couple with a child and gives them a mental piece.

The divine energy of the Santan Gopal mantra and the radiations of Yantra nourish the womb of an expectant mother who is protecting her child from all kinds of mishaps.

Santan Gopal Mantra

There are mantras for childbirth that, like everything else, work best when the parents are having trouble getting pregnant. The Santan Gopal Mantra is the most potent mantra of them all. This mantra is held in high regard in several scriptures.

This mantra’s extraordinary powers have long been the subject of discussion and practice. The performer of this mantra dedicated to Lord Krishna is guaranteed to have children who will grow up to be nice people because of its incredibly powerful methods. 

Yet, complete devotion is required while singing this mantra because the effects of this mantra mostly depend on the performer’s level of trust. The Santan Gopal Mantra should be chanted while the person is still sattvic.

If you want to get the best effects, you should be chanting this mantra continuously with full devotion and dedication for the best outcome. Some of the devotees chant the mantra with Havana and other rituals to get blessed with a child.

Santan Gopal Mantra Importance

The importance of the Santan Gopal mantra is mentioned in hindu ancient scriptures. As this mantra is the way to appease Lord Krishan so that he can bless the couple with a healthy child. After marriage, if any couple is having issues conceiving a child and miscarriage, reciting this mantra fulfils their wishes. 

With the recitation of this Santan Gopal mantra, the wishes of the couple get fulfilled soon and achieve good luck. And these days, most don’t begin visiting doctors until one or two years into their marriage. Nonetheless, neither of those marriages is to fault. Some spouses also begin making fun of their family, the community, and other family members.

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They didn’t have kids in their homes up until this point. Yet, sages and sages have created a number of these mantras in our holy texts, which can be used to overcome a variety of problems in your life in addition to children. 

Every new couple hoping to become parents prays for a kid to be born without any issues and wishes for a trouble-free pregnancy. All barriers that could endanger the child or the parents will be removed with the regular recitation of this mantra. A healthy environment is created for the mother and the infant by the positive energy that is released while repeating this mantra.

And individuals can live happy lives. The scriptures claim that attaining a flawless son is a result of diligently chanting the Santan Gopal Mantra. And those who, despite years of medical care, are still unable to conceive do so by following the prescribed procedure when chanting the Santan Gopal Mantra and all impediments to children’s attainment are eliminated for them. And with this mantra’s influence, children are unquestionably attained.

God Of Santan Gopal Mantra

As the name suggests of the mantra santan Gopal mantra, Lord Krishna has been called by Gopala. The devotees dedicate the mantra to Lord Krishna and worship his child form. The worship of Lord Krishna in child form ensures the people who are not having children. The Santan Gopal mantra completely dedicates itself to Bal Gopal (the child form of Lord Krishna), who incarnates as Lord Vishnu.

Lord Krishna, one of the most adored and venerated deities in Hindu mythology, is the god of the Santan Gopal mantra. Everyone is familiar with the legend of how Lord Krishna was born in the prison of Mathura’s palace.

The difficulties that father Vasudev and mother Devki experienced during the birth of Lord Krishna, as well as the way that Vasudev cleared a path for Nanda Dev to receive Lord Krishna to shield him from his uncle Kansa, who wanted to kill him because of a prophecy predicted that the child of his sister would be the reason for his demise.

Santan Gopal Mantra

It is a religious story that has persisted over time. Lord Krishna is the picture of intelligence and beauty; he is dark in colour. It is a religious story that has persisted over time. Lord Krishna is the ideal of beauty and intelligence with his teachings, inspiring generations. He is dark in colour. Pregnant women will feel delighted and protected from any unwelcome difficulties if they worship Lord Krishna.

Santan Gopal Mantra

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।

Om Shreeng Hreeng Kleeng Glaung Devakisut Govind Vasudev Jagatpate Dehi Me Tanayam Krishn Tvaamaham Sharanam Gatah

Benefits of Santan Gopal Mantra

Many such couples already have kids at home, but they only have daughters and desire to have sons. Reciting the Santan Gopal Mantra daily in this circumstance eliminates all kinds of barriers to having a son for you. And the parent gets the child they want. 

And the Santan Gopal Mantra has a positive effect on your having long-lived offspring. is sound. Beautiful, prosperous, and highly intelligent kids are born. This mantra has the effect of sharpening the intellect of the child you bear. However, when reciting this mantra, you must closely follow a few crucial guidelines. This mantra’s favourable outcome is unique to you.

Santan Prapti Mantra

ॐ नमो भगवते जगत्प्रसूतये नमः ।

Om Namo Bhagavate Jagatprasutaye Namah

Benefits of Santan prapti mantra

The progeny mantra serves to drive away any negative energy that could harm the expectant mother. By repeating this mantra, the baby is born healthily and without any issues. Chanting this mantra frequently will maintain good health because many ailments can develop even after the delivery of a healthy kid.

Shri Krishna Mantra For Santan Prapti

ॐ क्लीं गोपालवेषधराय वासुदेवाय हुं फट स्वाहा ।

Om Kleeng Gopalveshadhaaraay Vaasudevaay Hum Phat Swahaa

Benefits Of Shri krishna Mantra for Santan Prapti

The scriptures say that all of these mantras are devoted to Lord Krishna. Many scriptures have spoken about this mantra’s magnificence. The mantra promises success in all endeavors and moral offspring to those who recite it correctly. This resolves every issue that enters the child’s life.

The Method Of Santan Gopal Mantra

The right method to chant the Gopal Mantra should be to start before sunrise from the day when you are going to start this mantra. After waking up, take a bath and wear clean clothes. After then offer water to Lord Surya and to offer the water you should only copper vessel. 

Offer turmeric and roli in the water to Lord Surya, as it removes hurdles and obstacles to having a child. After offering water to Suryadev, you should place an image of Lord Krishna’s kid or Laddu Gopal by placing a yellow cloth on a wooden pillar at the northeast corner of your home.

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Install the Ganeshji statue before Balagopal arrives at the outpost. Every day at the post, you must light a lamp with only pure ghee. Also, keep a copper container with water close to the post. After that, you take a seat by laying one down.

You can also present Chappan Bhog to Gopal Ji if you’d like. Nevertheless, the devotee should chant the Santan Gopal mantra 108 times following the Bhog.

The Santan Gopal mantra chanting process involves following four main steps –

  • To get the best results, the devotee should take a bath in the early morning and wear clean clothes to chant the auspicious mantra and sit in front of the Lord Shri krishna idol.
  • While chanting the mantra the devotee must include tulsi mala to get better benefits from this mantra.
  • You should utilize Swet pushp or peet pushp flowers for the rite.
  • They typically come in blue or yellow, which elegantly symbolizes Lord Krishna.

Overall Benefits Of Santan Gopal Mantra

Lord Krishna is worshipped as a little child in one of the numerous modes and guises. During Janmashtami, people worship Lord Krishna in his infant form. The Santan Gopal mantra and devotion to Krishna will increase your chances of having children.

Reciting the Gopal mantra first thing in the morning is a must for expectant parents who want to have healthy, attractive children. The devotees who include reciting the Santan Gopal mantra into their daily lives will profit by having children who are just like our lord Krishna, who has the face of an angel and the wit to go with it.

Santan Gopal Mantra

Women who desire to become mothers but have underlying illnesses that are preventing them from doing so will gradually see improvements in their health. By reciting this mantra, the pregnant woman’s home will be free of any negative energy and conducive to health.

The mother will be able to concentrate on her and her child’s health by regularly chanting the Mantra, which will clear the chaotic energy from her environment. Couples who have been unable to get pregnant for a long time or who have experienced unanticipated miscarriages can recite these mantras to receive Lord Krishna’s blessings.

Important Links

  1. Kaal Sarp Dosh Puja In Ujjain
  2. Griha Pravesh Puja
  3. Housewarming Invitation
  4. Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi
  5. Ring Ceremony

Final Thoughts

Here we are, chanting the this mantra to bless the couples to get the healthy and best child. The effects of this Santan Gopal mantra remove the problem in the life of a child. It will be useful for people whose children pass away to recite this mantra. They will also gain a lot from this phrase when there has been an abortion. If you’re interested, an astrology consultation can teach you more about all of these mantras.

You can book a pandit to chant the Santan Gopal mantra from 99Pandit and find a Pandit Near Me to get blessed with a healthy and intelligent child.

Frequently Asked Question

Q.What is Santan gopal mantra?

A.Santan Gopal’s mantra is considered a powerful mantra that eliminates the hurdles and difficulties related to the birth of a healthy child. The chanting of Santan Gopal mantra creates the vibratory energy which will dissolve the difficulties and obstacles that come in the path of begetting a child.

Q.Why is the Santan gopal mantra important?

A.The importance of the Santan gopal mantra is mentioned in hindu ancient scriptures. As this mantra is the way to appease Lord Krishan so that he can bless the couple with a healthy child. After marriage, if any couple is having issues conceiving a child and miscarriage, reciting this mantra fulfills their wishes.

Q.What is the mantra for Santan prapti?

A.The Santan gopal mantra is

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ।

Om Shreeng Hreeng Kleeng Glaung Devakisut Govind Vasudev Jagatpate Dehi Me Tanayam Krishn Tvaamaham Sharanam Gatah

Q.Who is the deity of the Santan gopal mantra?

A.Lord Krishna, one of the most adored and venerated deities in Hindu mythology, is the god of the Santan Gopal mantra. The mantra is dedicated to Lord Krishna and worshipping his child form.

Q.How should we chant the Santan gopal mantra?

A.To get the best results, the devotee should take a bath in the early morning and wear clean clothes to chant the auspicious mantra and sit in front of the Lord Shri krishna idol. While chanting the mantra the devotee must include tulsi mala to get better benefits from this mantra.

Swet pushp or peet pushp flowers should be utilized for the rite. They typically come in blue or yellow, which elegantly symbolizes Lord Krishna.

Amalaki Ekadashi Vrat Katha: आमलकी एकादशी व्रत कथा

Amalaki Ekadashi Vrat Katha: हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही महत्व माना जाता है| एकादशी तिथि का दिन भगवान विष्णु को समर्पित किया जाता है| हिन्दू धर्म के अनुसार फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आमलकी एकादशी के रूप में मनाया जाता है| इस आमलकी एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ – साथ आंवले के पेड़ की भी पूजा की जाती है| इस व्रत का पूर्ण रूप से फल पाने के लिए आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करना चाहिए|

आमलकी एकादशी व्रत कथा

आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का जाप तथा उपवास करने से 100 गाय दान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है तो आइये जानते है कि आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का महत्व तथा आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) के बारे में|

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे खाटू श्याम चालीसा [Khatu Shyam Chalisa], सरस्वती आरती [Saraswati Aarti], या जया एकादशी व्रत कथा [Jaya Ekadashi Vrat Katha] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है| इसके अलावा आप हमारे एप 99Pandit For Users पर भी आरतियाँ व अन्य कथाओं को पढ़ सकते है| इस एप में सम्पूर्ण भगवद गीता के सभी अध्यायों को हिंदी अर्थ समझाया गया है|

आमलकी एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance of Amalaki Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन! आपने मुझसे फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे विजया एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधि पूर्वक बताएं|

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भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि – हे राजन! फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को आमलकी एकादशी कहा जाता है| जो भी व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है तथा आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करता है, उस व्यक्ति के जीवन के सभी पाप नष्ट हो जाते है| एक एकादशी के व्रत करने से एक हज़ार गायों का दान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है| हे राजन, अब मैं आपको उस कथा के बारे में कहूँगा जो महर्षि वशिष्ठ ने राजा मांधाता को सुनाई थी|

आमलकी एकादशी व्रत कथा – Amalaki Ekadashi Vrat Katha

राजा मान्धाता ने ऋषि वशिष्ठ जी से कहा कि – हे ऋषिवर! कृपया मुझ पर कृपा करके एक ऐसी व्रत कथा कहिये, जिसको केवल सुनने मात्र से ही मेरा उद्धार हो जावे| इस पर ऋषि वशिष्ठ से कहा – हे मान्यवर! सभी व्रतों में से सबसे उत्तम तथा अंत में मोक्ष प्रदान करने वाली केवल आमलकी एकादशी ही है|

यह एकादशी फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की तिथि को आती है| एक वैदिश नाम का राज्य था| उस राज्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र चारों वर्णों के लोग बहुत ही आनंद के साथ रहते थे| उस नगरी में हमेशा केवल वेदों की ध्वनि ही सुनाई देती थी तथा पाप, द्वेष आदि उस राज्य में कुछ नहीं था|

आमलकी एकादशी व्रत कथा

उस राज्य के शासक का नाम चैतरथ था| वह राजा बहुत ही विद्वान तथा धर्मी था| उस राज्य में कोई भी व्यक्ति गरीब या कंजूस नहीं था| वहां की एक बात बहुत ही अद्भुत थी कि उस नगर के सम्पूर्ण लोग केवल भगवान विष्णु के भक्त थे तथा सभी लोग एकादशी तिथि का उपवास करते थे|

एक बार जब फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई तो उस राज्य के राजा, उनकी प्रजा तथा सभी लोगों के द्वारा इस एकादशी का बहुत ही उत्साह के साथ उपवास किया गया| इसके पश्चात राजा अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ मंदिर गये व मंदिर जाकर कुंभ स्थापित करके धूप, नैवेद्य, पंचरत्न इत्यादि से आंवले के पौधे का पूजन करने लगे|

इसके बाद इस प्रकार से स्तुति करने लगे – हे धात्री! आप ब्रह्मस्वरूप हो, आप ब्रह्माजी के द्वारा उत्पन्न हुए हो तथा समस्त पापों का नाश करने वाले हो| कृपा करके मेरा अर्घ्य को स्वीकार करे| आप भगवान अहरी रामचंद्र जी के द्वारा समर्पित है|

मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरे सभी पापों को नष्ट कर दे| इसके पश्चात सभी नगरवासियों ने उस मंदिर में रात्रि को जागरण किया| रात के उस मंदिर में एक बहेलिया आया, जो की बहुत पापी तथा दुराचारी प्रवृत्ति का था| भूख तथा प्यास से परेशान होकर वह बहेलिया मंदिर में जागरण होता हुआ देख एक कोने में जाकर बैठ गया|

जागरण में वह बहेलिया भगवान विष्णु की आमलकी एकादशी के महात्म्य को सुनाने लगा| इस प्रकार उसने सभी लोगों की तरह सारी रात जागकर ही बिता दी| सुबह होने के पश्चात जब सभी लोग अपने – अपने घर चले गए तो वह बहेलिया भी अपने घर की ओर चला गया| घर पहुँच कर उसने भोजन किया तथा कुछ समय के पश्चात ही उस बहेलिये की मृत्यु हो गई|

किन्तु आमलकी एकादशी का महात्म्य सुनने तथा सारी रात जागरण करने के कारण उसे राजा विदूरथ के घर में जन्म लिया एवं उसका नाम वसुरथ रखा गया| जब वह युवा हुआ तो वह उसकी चतुरंगिनी सेना के साथ तथा धन – धान्य से युक्त होकर 10 हज़ार गाँवों का पालन – पोषण करने लगा| उसका तेज सूर्य से समान था, कांति में वह चंद्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु की भांति एवं क्षमा में पृथ्वी के समान था| वह बहुत ही धार्मिक, कर्मवीर तथा भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था|

वह उसकी प्रजा समान रूप से भरण – पोषण करता था| एक दिन राजा शिकार करने के लिए गया| देवयोग के कारण वह अपना मार्ग भटक गया तथा दिशा के बारे पता न होने के कारण वह एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा| कुछ समय के पश्चात उस स्थान पहाड़ी म्लेच्छ आ गये तथा राजा को अकेला पाकर मारो, मारों तेज आवाज़ में बोलते हुए राजा की दौड़े| म्लेच्छ कहने लगे कि यह वही राजा ने जिसने हमारे परिवार के सदस्यों का वध किया है तथा उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया| इस कारण इसे निश्चित रूप मारना चाहिए|

उन्होंने राजा को मारने के लिए कई सारे अस्त्र-शस्त्र राजा की ओर फेंके, लेकिन उस शस्त्रों से राजा को किसी भी प्रकार की कोई हानि नहीं हुई बल्कि वह सभी अस्त्र राजा पर फूल बनकर गिरने लगे| इसके बाद उन अस्त्रों से म्लेच्छों के अस्त्र स्वयं उन पर ही आक्रमण कर लगे जिस कारण सभी कई म्लेच्छ मूर्छित हो गए| कुछ समय बाद राजा के शरीर से एक बहुत ही सुन्दर देवी प्रकट हुई| उन्होंने उन सभी म्लेच्छों का वध कर दिया|

जब राजा उठा तो उसने सभी म्लेच्छों को मरा हुआ पाया तथा वह कहने लगा कि इस वन में मेरा ऐसा कौनसा हितेषी है जिसने मेरी सहायता की| वह ऐसा विचार कर ही रहा था कि कुछ समय के बाद आकाशवाणी हुई – हे राजा! इस संसार में भगवान विष्णु के अलावा और कौन है जो तेरी सहायता कर सकता है| यह आकाशवाणी सुनकर राजा अपने राज्य लौट गया तथा सुख के साथ अपना राज्य करने लगा|

Varuthini Ekadashi Vrat Katha: पाठ करे वरूथिनी एकादशी व्रत कथा का

Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन वरूथिनी एकादशी का उपवास किया जाता है| वरूथिनी एकादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तथा वरूथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) का श्रवण भी किया जाता है| वरूथिनी एकादशी के दिन वरूथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करने से जातको को शुभ फल की प्राप्ति होती है|

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

सभी एकादशी तिथि का एक अलग महत्व है| वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से जातक को शारीरिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है| इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात मुक्ति भी मिल जाती है| आइये जानते है वरूथिनी एकादशी तथा वरूथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) के बारे में|

इसके अलावा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे गृह प्रवेश पूजा (Griha Pravesh Puja), सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja), तथा विवाह पूजा (Marriage Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है|

यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है| बस आपको “Book a Pandit” विकल्प का चुनाव करना होगा और अपनी सामान्य जानकारी जैसे कि अपना नाम, मेल, पूजा स्थान, समय,और पूजा का चयन के माध्यम से आप अपना पंडित बुक कर सकेंगे|

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance of Varuthini Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे कामदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले है|

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अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि वैशाख माह शुक्ल एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका कथा क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधि पूर्वक बताएं|

इस पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा – हे राजन! वैशाख माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि वरूथिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| यह वरूथिनी एकादशी व्रत कथा का प्रभाव सौभाग्य प्रदान करने वाली, समस्त पापों को नष्ट करने वाला तथा अंत के समय में मोक्ष प्रदान करने वाला है| इस वरूथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) के बारे में अब मैं तुमसे कहने वाला हूँ|

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा – Varuthini Ekadashi Vrat Katha

पौराणिक काल में नर्मदा नदी के किनारे पर एक मान्धाता नामक एक राजा राज था| कहा जाता है कि वह राजा बहुत ही तपस्वी तथा दानवीर थे| एक समय की बात है कि वह राजा जंगल के बीच में अपनी तपस्या में लीन थे| कुछ समय पश्चात वहां पर एक जंगली भालू आ गया तथा तपस्या में लीन राजा के पैर को चबाने लगा| कुछ देर के बाद वह भालू राजा का पैर चबाता हुआ उन्हें घसीट कर जंगल में ले गया|

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

जब वह भालू राजा को घसीट कर ले जा रहा था| तब राजा बहुत घबरा रहे थे किन्तु तापस धर्म की पालना करते हुए उन्होंने क्रोध तथा हिंसा न करके वह भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगा व करुणा भाव से उन्हें पुकारने लगा| राजा की पुकार सुनकर भगवान विष्णु उसकी सहायता हेतु प्रकट हुए| जिसके पश्चात भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उस भालू का वध कर दिया किंतु तब तक वह भालू राजा का पूरा पैर खा चुका था|

अपने पैर को गवाने के कारण राजा मान्धाता विलाप कर रहे थे| जिसे देख भगवान विष्णु को बहुत ही दुःख हुआ तथा उन्होंने राजा से कहा – हे वत्स! तुम इसका शोक मत करो| इस भालू ने जो तुम्हारा हाल किया है, यह तुम्हारे पिछले जन्म का अपराध है| इसकी पूर्ति के लिए तुम मथुरा में जाओ तथा वहां जाकर मेरे वराह अवतार की पूजा करो तथा वरूथिनी एकादशी व्रत करो| वरूथिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से तुम पुनः सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे|

भगवान विष्णु के कहे अनुसार राजा मान्धाता मथुरा नगरी में गए तथा पूर्ण श्रद्धा के साथ वरूथिनी एकादशी व्रत को किया| इस एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा का शरीर पुनः सुदृढ़ अंगों वाला हो गया तथा इस वरूथिनी एकादशी का व्रत करने के कारण राजा को स्वर्ग की प्राप्ति हुई| इसलिए जो भी व्यक्ति भय से पीड़ित हो, उसे वरूथिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.वरुथिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के किस अवतार की पूजा होती है?

A.इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा की जाती है|

Q.वरुथिनी एकादशी व्रत कथा का क्या महत्व है?

A.यह वरूथिनी एकादशी तिथि सौभाग्य प्रदान करने वाली, समस्त पापों को नष्ट करने वाली तथा अंत के समय में मोक्ष प्रदान करने वाली है|

Q.वरूथिनी एकादशी कब आती है?

A.वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन वरूथिनी एकादशी का उपवास किया जाता है|

Q.राजा मान्धाता को भगवान विष्णु ने उनके सुदृढ़ अंगों को पुनः पाने के लिए क्या मार्ग बताया?

A.भगवान विष्णु बोले – इस भालू ने जो तुम्हारा हाल किया है, यह तुम्हारे पिछले जन्म का अपराध है| इसकी पूर्ति के लिए तुम मथुरा में जाओ तथा वहां जाकर मेरे वराह अवतार की पूजा करो तथा वरूथिनी एकादशी का व्रत करो| वरूथिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से तुम पुनः सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे|

Parvati Chalisa in Hindi: पार्वती चालीसा पाठ

पार्वती चालीसा (Parvati Chalisa) का पाठ माता पार्वती को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| नवरात्रि के पांचवे दिन माता पार्वती के निमित्त उपवास तथा उनकी पूजा भी की जाती है| पौराणिक ग्रंथों में माता पार्वती को स्कंदमाता के नाम से भी जाना जाता है| इस दिन माता पार्वती की पूजा के साथ-साथ माँ पार्वती चालीसा (Parvati Chalisa) का जाप करने से भक्तों को शुभ फल की प्राप्ति होती है|

माना जाता है कि जो भी व्यक्ति नवरात्रि के पांचवे दिन स्कंदमाता की पूजा तथा पार्वती चालीसा (Parvati Chalisa) का पाठ करता है, उस व्यक्ति पर माता पार्वती के साथ भगवान शिव की भी अपार कृपा बरसती है| भगवान शिव तथा माता पार्वती की कृपा से जातक की सभी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है तथा उसके घर में सुख समृद्धि प्राप्त होती है|

पार्वती चालीसा

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माँ पार्वती चालीसा पाठ हिंदी में | Parvati Chalisa Lyrics in Hindi

|| पार्वती चालीसा ||

|| दोहा ||

जय गिरी तनये दक्षजे
शम्भू प्रिये गुणखानि ।
गणपति जननी पार्वती
अम्बे! शक्ति! भवानि ॥

|| चालीसा ||

ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे ।
पंच बदन नित तुमको ध्यावे ॥

षड्मुख कहि न सकत यश तेरो ।
सहसबदन श्रम करत घनेरो ॥

तेऊ पार न पावत माता ।
स्थित रक्षा लय हिय सजाता ॥

अधर प्रवाल सदृश अरुणारे ।
अति कमनीय नयन कजरारे ॥

ललित ललाट विलेपित केशर ।
कुंकुंम अक्षत शोभा मनहर ॥

कनक बसन कंचुकि सजाए ।
कटी मेखला दिव्य लहराए ॥

कंठ मदार हार की शोभा ।
जाहि देखि सहजहि मन लोभा ॥

बालारुण अनंत छबि धारी ।
आभूषण की शोभा प्यारी ॥

नाना रत्न जड़ित सिंहासन ।
तापर राजति हरि चतुरानन ॥

इन्द्रादिक परिवार पूजित ।
जग मृग नाग यक्ष रव कूजित ॥
गिर कैलास निवासिनी जय जय ।
कोटिक प्रभा विकासिनी जय जय ॥

त्रिभुवन सकल कुटुंब तिहारी ।
अणु अणु महं तुम्हारी उजियारी ॥

हैं महेश प्राणेश तुम्हारे ।
त्रिभुवन के जो नित रखवारे ॥

उनसो पति तुम प्राप्त कीन्ह जब ।
सुकृत पुरातन उदित भए तब ॥

बूढ़ा बैल सवारी जिनकी ।
महिमा का गावे कोउ तिनकी ॥

सदा श्मशान बिहारी शंकर ।
आभूषण हैं भुजंग भयंकर ॥

कण्ठ हलाहल को छबि छायी ।
नीलकण्ठ की पदवी पायी ॥

देव मगन के हित अस किन्हो ।
विष लै आपु तिनहि अमि दिन्हो ॥

ताकी तुम पत्नी छवि धारिणी ।
दुरित विदारिणी मंगल कारिणी ॥

देखि परम सौंदर्य तिहारो ।
त्रिभुवन चकित बनावन हारो ॥

भय भीता सो माता गंगा ।
लज्जा मय है सलिल तरंगा ॥

सौत समान शम्भू पहआयी ।
विष्णु पदाब्ज छोड़ि सो धायी ॥

तेहि कों कमल बदन मुरझायो ।
लखी सत्वर शिव शीश चढ़ायो ॥

नित्यानंद करी बरदायिनी ।
अभय भक्त कर नित अनपायिनी ॥

अखिल पाप त्रयताप निकन्दिनी ।
माहेश्वरी हिमालय नन्दिनी ॥

काशी पुरी सदा मन भायी ।
सिद्ध पीठ तेहि आपु बनायी ॥

भगवती प्रतिदिन भिक्षा दात्री ।
कृपा प्रमोद सनेह विधात्री ॥

रिपुक्षय कारिणी जय जय अम्बे ।
वाचा सिद्ध करि अवलम्बे ॥

गौरी उमा शंकरी काली ।
अन्नपूर्णा जग प्रतिपाली ॥

सब जन की ईश्वरी भगवती ।
पतिप्राणा परमेश्वरी सती ॥

तुमने कठिन तपस्या कीनी ।
नारद सों जब शिक्षा लीनी ॥

अन्न न नीर न वायु अहारा ।
अस्थि मात्रतन भयउ तुम्हारा ॥

पत्र घास को खाद्य न भायउ ।
उमा नाम तब तुमने पायउ ॥

तप बिलोकी ऋषि सात पधारे ।
लगे डिगावन डिगी न हारे ॥

तब तब जय जय जय उच्चारेउ ।
सप्तऋषि निज गेह सिद्धारेउ ॥

सुर विधि विष्णु पास तब आए ।
वर देने के वचन सुनाए ॥

मांगे उमा वर पति तुम तिनसों ।
चाहत जग त्रिभुवन निधि जिनसों ॥

एवमस्तु कही ते दोऊ गए ।
सुफल मनोरथ तुमने लए ॥

करि विवाह शिव सों भामा ।
पुनः कहाई हर की बामा ॥

जो पढ़िहै जन यह चालीसा ।
धन जन सुख देइहै तेहि ईसा ॥

|| दोहा ||

कूटि चंद्रिका सुभग शिर,
जयति जयति सुख खा‍नि
पार्वती निज भक्त हित,
रहहु सदा वरदानि ।

॥ इति श्री पार्वती चालीसा ॥

पार्वती चालीसा

Parvati Chalisa Lyrics in English | ब्रह्मा भेद न तुम्हरो पावे

|| Parvati Chalisa ||

|| Doha ||

Jai giri tanaye dakshaje,
Shambhu priye gunakhaani.
Ganpati janani Parvati,
Ambe! Shakti! Bhavani.

|| Chalisa ||

Brahma bhed na tumharo paave,
Panch badan nit tumko dhyaave.

Shadmukh kahi na sakat yash tero,
Sahasbadan shram karat ghanero.

Teeru paar na paavat maata,
Sthit raksha lay hiya sajaata.

Adhar praval sadrish arunaare,
Ati kamniya nayan kajraare.

Lalit Lalat vilepit Keshar,
Kumkum Akshat shobha manahar.

Kanak basan kanchuki sajaaye,
Kati mekhla divya lahraaye.

Kanth madaar haar ki shobha,
Jaahi dekhi sahajahi man lobha.

Baalarun anant chhabi dhaari,
Aabhooshan ki shobha pyaari.

Nana ratna jadit sinhaasan,
Taapar rajati hari chaturanan.

Indraadik parivaar poojit,
Jag mrig naag yaksh rav koojit.

Gir Kailaas nivaasini jai jai,
Kotik prabha vikaasini jai jai.

Tribhuvan sakal kutumb tihaari,
Anu anu maham tumhaari ujiyaari.

Hain Mahesh praanesh tumhaare,
Tribhuvan ke jo nit rakhwaare.

Unaso pati tum praapt keenh jab,
Sukrit puratan udit bhae tab.

Boodha bail sawaari jinki,
Mahima ka gaave kou tinki.

Sadaa shmashaan bihaari Shankar,
Aabhooshan hain bhujang bhayankar.

Kanth Halaahal ko Chhavi Chhaayi,
Neelkanth ki padvi paayi.

Dev magn ke hit as kinho,
Vish lai aapu tinhi ami dinho.

Taaki tum patni chhavi dhaarin,
Durit vidaarin mangal kaarin.

Dekhi param saundarya tihaaro,
Tribhuvan chakit banaavan haaro.

Bhay bhita so maata Ganga,
Lajja may hai salil taranga.

Saut saman Shambhu pahaayi,
Vishnu padaabj chhodi so dhaayi.

Tehein komal badan murjhaayo,
Lakhi Satwar Shiv sheesh Chadhayo.

Nityanand kari bardaayini,
Abhay bhakt kar nit anapaayini.

Akhil paap trayatap nikandini,
Maaheshwari Himalay nandini.

Kaashi puri sadaa man bhaayi,
Siddh peeth tehi aap banaayi.

Bhagwati pratidin bhiksha daatri,
Kripa pramod sneh vidhaatri.

Ripukshay kaarini jai jai Ambe,
Vaacha siddh kari avalambe.

Gauri Uma Shankari Kaali,
Annapurna jag pratipali.

Sab Jan ki Ishwari Bhagwati,
Patiprana Parmeshwari Sati.

Tumne kathin tapasya kini,
Narad so jabb shiksha leeni.

Ann na neer na vaayu ahaara,
Asthi maatrat tan bhayau tumhaara.

Patra ghaas ko khadya na bhayau,
Uma naam tab tumne paayau.

Tap biloki rishi saath padhaare,
Lage digavaan digi na haare.

Tab tab jai jai jai ucharaayo,
Saptarishi nij geh siddhaaraayo.

Sur vidhi Vishnu paas tab aaye,
Var dene ke vachan sunaaye.

Maange Uma var pati tum tinaso,
Chaahat jag tribhuvan nidhi jinaso.

Evamastu kahi te doo gaye,
Sufal Manorath Tumne laaye.

Kari vivaah Shiv so bhaama,
Punah kahai Hari ki baama.

Jo padh hai jan yah chaalisa,
Dhan jan sukh deihai tehi eesa.

|| Doha ||

Kooti chandrika subhag shir,
Jayati jayati sukh khaani.
Parvati nij bhakt hit,
Rahahu sadaa vardani.

|| Iti Shri Parvati Chalisa ||

Vijaya Ekadashi Vrat Katha: विजया एकादशी व्रत कथा

Vijaya Ekadashi Vrat Katha: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन महीने में आने वाली एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है| भगवान विष्णु जी की कृपा पाने के लिए एकादशी के व्रत का बहुत ही महत्व है| विजया एकादशी का व्रत तथा विजया एकादशी व्रत कथा (Vijaya Ekadashi Vrat Katha) का जाप करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है तथा विजया एकादशी का उपवास करने से भक्तों को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है|

विजया एकादशी व्रत कथा

किसी भी एकादशी व्रत को उसकी व्रत कथा का जाप किये बिना अधूरा माना जाता है| इसी कारण आज इस लेख के माध्यम से हम आपको विजया एकादशी व्रत कथा (Vijaya Ekadashi Vrat Katha) बताने जा रहे है जो भी भक्त फाल्गुन माह में आने वाली एकादशी का व्रत करता है| उसे इस विजया एकादशी व्रत कथा का जाप जरूर करना चाहिए|

प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी का व्रत किया जाता है| इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान होता है| इस दिन सम्पूर्ण विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा तथा विजया एकादशी का उपवास करने से भक्तों को शुभ फल की प्राप्ति होती है|

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे खाटू श्याम जी की आरती [Khatu Shyam ji Ki Aarti], कनकधारा स्तोत्र  [Kanakdhara Stotra], या पापमोचनी एकादशी व्रत कथा [Papmochani Ekadashi Vrat Katha] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

इसके अलावा आप हमारे एप 99Pandit For Users पर भी आरतियाँ व अन्य कथाओं को पढ़ सकते है| इस एप में सम्पूर्ण भगवद गीता के सभी अध्यायों को हिंदी अर्थ समझाया गया है|

विजया एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance of Vijaya Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे माघ महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे जया एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले है|

अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधि पूर्वक बताएं|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण ने बोला – हे राजन! फाल्गुन मास में आने वाली एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है| जो भी भक्त विजया एकादशी का उपवास करता है, उसे हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है| भगवान श्री कृष्ण कहते है कि इस एकादशी के दिन विजया एकादशी व्रत कथा (Vijaya Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ना अथवा सुनना मनुष्य के सभी पापों को नष्ट कर देता है|

यदि आप किसी ऐसी परिस्थिति में हो, जिसमें चारों ओर से शत्रुओं से घिरे हुए हो, आपका विजय होना संभव न हो| उस समय विजया एकादशी व्रत आपको हर कार्य में विजयी बनाने की क्षमता रखता है|

विजया एकादशी व्रत कथा – Vijaya Ekadashi Vrat Katha

बहुत ही पुराने समय की बात है एक बार भगवान नारद जी ने इस जगत के सृजनकर्ता (जगत पिता) ब्रह्मा जी से कहा – हे प्रभु! आप मुझसे फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली विजया एकादशी के विधान के बारे में कहिये|

इस पर ब्रह्मा जी ने कहा कि – हे नारद देवता! विजया एकादशी का व्रत करने सभी कालों के पापों का नाश होता है| विजया एकादशी की विधि के बारे में अभी तक मैंने किसी को भी नहीं बताया है| विजया एकादशी का विधि पूर्ण उपवास करना जातक को किसी भी परिस्थिति में विजयी बना सकता है|

विजया एकादशी व्रत कथा

त्रेता युग के समय भगवान विष्णु के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी को चौदह वर्ष के लिए जब वनवास जाना पड़ा था| तब वह अपने छोटे भाई श्री लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी माता सीता के साथ पंचवटी वन की ओर निकल गए तथा वही पर ही निवास करने लगे|

उसी समय दुष्ट रावण ने माता सीता का छल से हरण कर लिया| इसकी सूचना जब भगवान श्री राम तथा लक्ष्मण जी को ज्ञात हुई तो वह अत्यंत व्याकुलता के साथ माता सीता की खोज ने निकल पड़े| माता सीता की खोज करते हुए उन्हें मार्ग में जटायु मरणासन्न की स्थिति में मिले|

जटायु जी ने उन्हें सीता माता हुआ सम्पूर्ण वृत्तांत बता दिया तथा अंत में स्वर्गलोक पधार गए| जटायु जी के कहे अनुसार भगवान श्री राम वानर राज सुग्रीव के पास पहुंचे तथा उनसे मित्रता की| सुग्रीव की सहायता हेतु भगवान श्री राम ने सुग्रीव के भाई बाली का भी वध किया| इसके पश्चात हनुमान जी ने लंका जाकर माता सीता को प्रभु श्री राम तथा सुग्रीव की मित्रता तथा अन्य बातों के बारे में बताया| वहां से लौटने के पश्चात हनुमान जी ने प्रभु श्री राम को सम्पूर्ण समाचार दे दिया|

इसके बाद भगवान श्री राम ने सुग्रीव तथा उनकी सम्पूर्ण वानर सेना के साथ लंका की ओर प्रस्थान किया| जब भगवान श्री राम किनारे पर पहुंचे तो वहां पर मगरमच्छों से युक्त उस अनंत सागर को देख उन्होंने लक्ष्मण जी से कहा कि हम इस सागर को किस प्रकार पार करेंगे| इस पर श्री लक्ष्मण – हे भ्राता! आप आदिपुरुष है व सब कुछ जानते है| यहाँ से कुछ ही दूरी पर कुमारी द्वीप पर ऋषि वकदाल्भ्य रहते है| इस संदर्भ में वह हमारी सहायता अवश्य करेंगे|

लक्ष्मण की बात सुनकर भगवान श्री राम मुनि वकदाल्भ्य के आश्रम में पहुंचे तथा उन्हें प्रणाम करके उनके समीप बैठ गए| इसके पश्चात मुनि ने उनसे पूछा – हे राम! आपका यहाँ आना कैसे हुआ? इस पर भगवान श्री राम ने उनसे कहा कि – हे महात्मा! मैं अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ राक्षसों के अंत करने के लिए लंका जा रहा हूँ| आप कृपा करके हमें इस विशाल समुद्र को पार करने का कोई मार्ग बताइए| मैं इस कारणवश आपके पास आया हूँ|

इस पर ऋषि वकदाल्भ्य ने उनसे कहा कि फाल्गुन माह में आने वाली एकादशी तिथि का विधिपूर्वक व्रत करने आपको निश्चित ही विजय की प्राप्ति होगी तथा यह आपको समुन्द्र पार करने में अवश्य सहायता करेगा| इस व्रत की विधि यह है कि दशमी तिथि के दिन सोना, चांदी, तांबा या मिट्टी का एक घड़ा बनाए|

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उस घड़े में जल भरकर तथा पांच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करे| उस घड़े के ऊपर सतनजा तथा जौ रखे| इसके पश्चात भगवान विष्णु की स्वर्ण की मूर्ति को स्थापित करे| एकादशी तिथि के दिन स्नान आदि से निवृत होकर नैवेद्य, धूप, दीप नारियल आदि से भगवान श्रीनारायण की पूजा करे|

इसके पश्चात उस मूर्ति के सामने बैठकर ही अपना सम्पूर्ण दिन व्यतीत करना है तथा रात्रि में उसी भांति जागरण करना है| अगले दिन नित्य कार्यों से निवृत होकर उस घड़े को किसी ब्राह्मण को दे देवे| हे राम! यदि आप इस व्रत को अपने सभी सेनापतियों के साथ करते है तो युद्ध में अवश्य ही विजय प्राप्त होगी| भगवान श्री राम ने ऋषि वकदाल्भ्य के कहे अनुसार व्रत किया तथा युद्ध में विजय प्राप्त की|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.विजया एकादशी कब आती है?

A.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन महीने में आने वाली एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है|

Q.विजया एकादशी के दिन किस देवता की पूजा की जाती है?

A.समस्त एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित की जाती है| इसी कारण पापमोचनी एकादशी के दिन भी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है|

Q.भगवान श्री राम को विजया एकादशी व्रत करने के लिए किसने कहा था?

A.ऋषि वकदाल्भ्य ने प्रभु श्री राम से कहा कि फाल्गुन माह में आने वाली एकादशी तिथि का विधिपूर्वक व्रत करने आपको निश्चित ही विजय की प्राप्ति होगी तथा यह आपको समुन्द्र पार करने में अवश्य सहायता करेगा|

Q.विजया एकादशी का व्रत करने से क्या लाभ है?

A.इस एकादशी के दिन विजया एकादशी व्रत कथा को पढ़ना अथवा सुनना मनुष्य के सभी पापों को नष्ट कर देता है| यदि आप किसी ऐसी परिस्थिति में हो, जिसमें चारों ओर से शत्रुओं से घिरे हुए हो, आपका विजय होना संभव न हो| उस समय विजया एकादशी व्रत आपको हर कार्य में विजयी बनाने के क्षमता रखता है|

Papmochani Ekadashi Vrat Katha: पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

Papmochani Ekadashi Vrat Katha: हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाले एकदशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा पापमोचनी एकादशी का व्रत किया जाता है| एकादशी तिथि का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है| पापमोचनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है| इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने भक्तों को सभी प्रकार भी परेशानियों से रहत मिलती है|

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

इसी के साथ पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) का जाप करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि पापमोचनी एकादशी का उपवास करने तथा पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) का सच्ची श्रद्धा से जाप करने से सभी पापों से मुक्ति प्राप्त होती है तथा जीवन में आ रहे उतार-चढ़ाव भी कम होते है| इस एकादशी के दिन पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) का पाठ बहुत ही शुभ माना जाता है| आइये जानते है पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) के बारे में|

इसके अलावा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे रुद्राभिषेक पूजा (Rudrabhishek Puja), सरस्वती पूजा (Saraswati Puja), तथा गृह प्रवेश पूजा (Griha Pravesh Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है|यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है| बस आपको “Book a Pandit” विकल्प का चुनाव करना होगा और अपनी सामान्य जानकारी जैसे कि अपना नाम, मेल, पूजा स्थान, समय,और पूजा का चयन के माध्यम से आप अपना पंडित बुक कर सकेंगे|

पापमोचनी एकादशी का महत्व – Importance of Papmochani Ekadashi

अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे माघ शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे जया एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले है| अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि चैत्र माह के कृष्ण पक्ष मे आने वाली एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधिपूर्वक बतलाए|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा – हे पार्थ! चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| एक समय की बात है कि पृथ्वीपति राजा मान्धाता ने लोमश ऋषि से यही प्रश्न किया था, जो कि तुम्हारे द्वारा मुझसे किया गया है| उसके पश्चात जो भी लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को बताया, वही मैं अब तुम्हे बताने जा रहा हूँ| राजा मान्धाता ने महर्षि लोमश जी से पूछा कि – हे ऋषिदेव! मनुष्य द्वारा किये गए पापों का मोचन किस प्रकार संभव है? कृपा करके हमे कोई ऐसा मार्ग बताये, जिससे सभी लोगों सरलता से अपने पापों से मुक्ति मिल जाए|

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा – Papmochani Ekadashi Vrat Katha

महर्षि लोमश ने कहा – हे राजन! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य सभी पाप नष्ट हो जाते है| अब मैं तुम्हे पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बता रहा हूँ जिसे तुम ध्यानपूर्वक सुनना| पौराणिक काल में चैत्ररथ नामक एक जंगल था| उस वन में अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार करती थी| उस स्थान पर हमेशा ही वसंत का मौसम रहता था| इसका अर्थ यह है कि उस स्थान हमेशा अलग-अलग प्रकार के पुष्प खिले हुए रहते थे| उस वन कभी गन्धर्व कन्याएं विहार किया करती थी, तो कभी भगवान इंद्र अन्य देवताओं के साथ वहां क्रीडाएं करते थे|

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

उसी वन में मेधावी नामक एक ऋषि भी अपनी तपस्या में लीन थे| वह भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे| एक दिन बात है जब एक अप्सरा जिसका नाम मञ्जुघोषा था, ने मेधावी ऋषि को मोहित करके उनकी निकटता का लाभ उठाने का सोचा, इसलिए वह ऋषि मेधावी से कुछ दूरी पर बैठ कर वीणा का वादन करने लगी| उसी समय कामदेव भी शिव भक्त ऋषि मेधावी को जीतने का प्रयास करने लगे| कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू को धनुष बनाया| कटाक्ष को उस धनुष की प्रत्यंचा बनायी तथा नेत्रो को मञ्जुघोषा का सेना पति बनाकर कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने के लिए तैयार हुआ|

उस समय शिव भक्त ऋषि मेधावी युवावस्था में ही थे| उन्होंने यज्ञोपवित तथा दण्ड धारण कर रखा था| उस समय ऋषि मेधावी दूसरे कामदेव की भांति प्रतीत हो रहे थे| उन मुनि को देखकर कामदेव के वश में हो मञ्जुघोषा ने वीणा पर मधुर स्वर में गाना शुरू किया| जिससे ऋषि मेधावी उनके मीठे स्वर तथा उनके सौन्दर्य पर मोहित हो गए| ऋषि मेधावी उस अप्सरा के सौदर्य में मोहित होकर शिव रहस्य के बारे में भूल गए तथा काम के वश में होकर मञ्जुघोषा के साथ में रमण करने लगे| काम के वश में होने के कारण महर्षि मेधावी को दिन तथा रात के बारे में कुछ भी ज्ञात ना रहा तथा बहुत ही समय तक वह उस अप्सरा के साथ रमण करते रहे|

इसके पश्चात मञ्जुघोषा ने ऋषि मेधावी से कहा कि हे मुनि! अब मुझे बहुत समय हो गया है| अत: मुझे अब स्वर्ग जाने की आज्ञा देवे| अप्सरा की बात को सुनकर ऋषि मेधावी ने उनसे कहा कि हे मोहिनी! संध्या को तो आयी हो, प्रात:काल होने पर चली जाना| ऋषि मेधावी के यह वचन सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी| इस प्रकार दोनों ने बहुत अधिक समय एक दुसरे के साथ में व्यतीत किया| अप्सरा ने एक दिन मेधावी ऋषि से कहा कि हे ऋषिवर! अब मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए|

इस बात पर मुनि ने वही कहा कि – हे रूपसी! अभी कुछ ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और रुको| मुनि की बात सुनकर मञ्जुघोषा ने कहा कि हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत ही ज्यादा लम्बी है| आप स्वयं ही इस बारे में विचार कीजिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया| अब मेरा यहाँ और अधिक ठहरना क्या सही है? मञ्जुघोषा की बात सुनने के पश्चात मुनि को समय का बोध हुआ तथा वह गंभीरता से इसके बारे में सोचने लगे| जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते हुए 57 वर्ष हो चुके है तो मञ्जुघोषा को ऋषि मेधावी काल का रूप समझने लगे|

इतना अधिक समय भोग-विलास में व्यर्थ करने के कारण ऋषि मेधावी को बहुत अधिक क्रोध आया| अब वह भयंकर क्रोध में उनके ताप का नाश करने वाली उस मञ्जुघोषा अप्सरा की ओर देखने लगे| अत्यधिक क्रोध की वजह से उनकी समस्त इन्द्रियाँ बेकाबू हो गयी| क्रोध से थरथराते स्वर में ऋषि ने अप्सरा से कहा: मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महापापिन तथा बहुत दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है| अब तू मेरे श्राप से पिशाचिनी बन जा| ऋषि मेधावी के क्रोध युक्त श्राप के कारण वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई|

यह सब देखकर वह व्यथित होकर बोली – हे ऋषिवर! अब मुझपर क्रोध को त्यागकर प्रसन्न होइए तथा कृपा करके मुझे इस श्राप से मुक्ति पाने का कोई उपाय भी बताये| विद्वानों द्वारा कहा गया है कि साधुओं की संगत अच्छा फल प्रदान करने वाली होती है एवं आपके साथ तो मैंने बहुत वर्ष व्यतीत किये है| अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाए अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहकर भी मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा| इसके पश्चात ऋषि मेधावी ने पिशाचिनी बनी हुई मञ्जुघोषा से कहा कि तूने मेरा बहुत बुरा किया है फिर भी मैं तुझे इस श्राप से मुक्ति पाने का उपाय बताता हूँ| चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है उसे पापमोचनी के नाम से जाना जाता है|

इस एकादशी का उपवास करने से तुझे इस पिशाचिनी के देह से मुक्ति मिल जाएगी| इतना कहकर ऋषि मेधावी ने मञ्जुघोषा को व्रत का सम्पूर्ण विधान समझा दिया| इसके पश्चात वह अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए अपने च्यवन ऋषि के पास चले गए|

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च्यवन ऋषि ने जब अपने पुत्र को देखा और कहा – हे पुत्र तुमने ऐसा क्या कर्म किया जिस कारण तुम्हारे सभी तप नष्ट हो गए है? जिससे तुम्हारा समस्त तप मलिन हो गया है? मेधावी ऋषि ने शर्म से अपना सिर झुकाकर कहा – पिताजी! मेने एक अप्सरा के साथ रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है| इसी कारणवश मेरा समस्त तप तथा तेज नष्ट हो गया है| कृपा करके आप मुझे इस पाप से मुक्ति का उपाय बताइए| ऋषि ने कहा – हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का विधि पूर्वक उपवास करो| इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे|

अपने पिता की बात को सुनकर मेधावी ऋषि ने पापमोचनी एकादशी का श्रद्धापूर्वक उपवास किया| जिसके प्रभाव से ऋषि मेधावी सम्पूर्ण के पाप नष्ट हो गए| वही दूसरी ओर मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचनी एकादशी का उपवास करने से उसे पिशाचिनी के देह से भी मुक्ति मिल गई तथा पुनः अपना सुन्दर रूप धारण करके स्वर्गलोक चली गयी|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.पापमोचनी एकादशी कब आती है?

A.हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है|

Q.पापमोचनी एकादशी के दिन किस देवता की पूजा होती है?

A.समस्त एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित की जाती है| इसी कारण पापमोचनी एकादशी के दिन भी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है|

Q.पापमोचनी एकादशी व्रत करने से क्या लाभ होता है?

A.पापमोचनी एकादशी का उपवास करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है तथा समस्त पापों से मुक्ति मिलती है|

Q.च्यवन ऋषि कौन थे?

A.ऋषि च्यवन मुनि मेधावी के पिताजी थे|