अच्युतस्याष्टकम् (Achyutam Keshavam Lyrics) मंत्र का जाप भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| अष्टकम शब्द संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है आठ| अच्युतस्याष्टकम् (Achyutam Keshavam Lyrics) एक ऐसा स्तोत्र या मंत्र है जो कि भगवान विष्णु को समर्पित किया जाता है| इस अच्युतस्याष्टकम् (Achyutam Keshavam Lyrics) स्तोत्र की रचना आदि शंकराचार्य जी के द्वारा की गई थी|
भगवान विष्णु की पूजा करने के पश्चात इस अच्युतस्याष्टकम् (Achyutashtakam) स्तोत्र का जाप जातकों के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता है| माना जाता है कि जिन व्यक्तियों को पूर्ण मेहनत के पश्चात भी सफलता प्राप्त नहीं हो रही हो तो उन्हें इस अच्युतस्याष्टकम् (Achyutashtakam) स्तोत्र का पाठ प्रतिदिन करना चाहिए| आइये जानते है अच्युतस्याष्टकम् (Achyutam Keshavam Lyrics) स्तोत्र के लिरिक्स के बारे में|
इसी के साथ यदि आप शिव तांडव स्तोत्रम [Shiv Tandav Stotram], यमुना जी की आरती [Yamuna Ji Aarti], या निर्वाण षट्कम [Nirvana Shatakam] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|
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अच्युतस्याष्टकम् लिरिक्स हिंदी में – Achyutam Keshavam Lyrics in Hindi
हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) का जाप करने से भगवान हनुमान जी अपने भक्तों से बहुत ही प्रसन्न होते है| जैसा कि आप सभी को यह ज्ञात है कि मंगलवार का दिन श्री राम भक्त हनुमान जी को समर्पित किया गया है| मंगलवार के दिन सम्पूर्ण विधि-विधान से उपवास किया जाता है तथा हनुमान जी की पूजा के साथ-साथ हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) का जाप भी किया जाता है|
माना जाता है कि मंगलवार एवं शनिवार के दिन हनुमान जी की पूजा व हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) करने से भक्तों के मन से भय , संकट तथा उन्हें सभी प्रकार के रोग दोषों से मुक्ति प्राप्त होती है| हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) की रचना तुलसीदास के द्वारा की गई थी|
कलयुग के कारण हो रही पीड़ा को दूर करने के लिए तुलसीदास जी ने हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) की रचना की थी| तो आइये जानते है हनुमान बाहुक पाठ (Hanuman Bahuk Lyrics) के लिरिक्स के बारे में जिससे भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते है| हनुमान बाहुक पाठ का जाप करने से रुके हुए कार्य भी जल्दी पूर्ण होते है|
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हनुमान बाहुक पाठ लिरिक्स हिंदी में – Hanuman Bahuk Lyrics in Hindi
भानुसों पढ़न हनुमान गये भानु मन-अनुमानि सिसु-केलि कियो फेरफार सो । पाछिले पगनि गम गगन मगन-मन, क्रम को न भ्रम, कपि बालक बिहार सो ।। कौतुक बिलोकि लोकपाल हरि हर बिधि, लोचननि चकाचौंधी चित्तनि खभार सो। बल कैंधौं बीर-रस धीरज कै, साहस कै, तुलसी सरीर धरे सबनि को सार सो ।।४।।
भारत में पारथ के रथ केथू कपिराज, गाज्यो सुनि कुरुराज दल हल बल भो । कह्यो द्रोन भीषम समीर सुत महाबीर, बीर-रस-बारि-निधि जाको बल जल भो ।। बानर सुभाय बाल केलि भूमि भानु लागि, फलँग फलाँग हूँतें घाटि नभतल भो । नाई-नाई माथ जोरि-जोरि हाथ जोधा जोहैं, हनुमान देखे जगजीवन को फल भो ।।५
गो-पद पयोधि करि होलिका ज्यों लाई लंक, निपट निसंक परपुर गलबल भो । द्रोन-सो पहार लियो ख्याल ही उखारि कर, कंदुक-ज्यों कपि खेल बेल कैसो फल भो ।। संकट समाज असमंजस भो रामराज, काज जुग पूगनि को करतल पल भो । साहसी समत्थ तुलसी को नाह जाकी बाँह, लोकपाल पालन को फिर थिर थल भो ।।६
कमठ की पीठि जाके गोडनि की गाड़ैं मानो, नाप के भाजन भरि जल निधि जल भो । जातुधान-दावन परावन को दुर्ग भयो, महामीन बास तिमि तोमनि को थल भो ।। कुम्भकरन-रावन पयोद-नाद-ईंधन को, तुलसी प्रताप जाको प्रबल अनल भो । भीषम कहत मेरे अनुमान हनुमान, सारिखो त्रिकाल न त्रिलोक महाबल भो ।।७
दूत रामराय को, सपूत पूत पौनको, तू अंजनी को नन्दन प्रताप भूरि भानु सो । सीय-सोच-समन, दुरित दोष दमन, सरन आये अवन, लखन प्रिय प्रान सो ।। दसमुख दुसह दरिद्र दरिबे को भयो, प्रकट तिलोक ओक तुलसी निधान सो । ज्ञान गुनवान बलवान सेवा सावधान, साहेब सुजान उर आनु हनुमान सो ।।८
दवन-दुवन-दल भुवन-बिदित बल, बेद जस गावत बिबुध बंदीछोर को । पाप-ताप-तिमिर तुहिन-विघटन-पटु, सेवक-सरोरुह सुखद भानु भोर को ।। लोक-परलोक तें बिसोक सपने न सोक, तुलसी के हिये है भरोसो एक ओर को । राम को दुलारो दास बामदेव को निवास, नाम कलि-कामतरु केसरी-किसोर को ।।९।।
महाबल-सीम महाभीम महाबान इत, महाबीर बिदित बरायो रघुबीर को । कुलिस-कठोर तनु जोरपरै रोर रन, करुना-कलित मन धारमिक धीर को ।। दुर्जन को कालसो कराल पाल सज्जन को, सुमिरे हरनहार तुलसी की पीर को । सीय-सुख-दायक दुलारो रघुनायक को, सेवक सहायक है साहसी समीर को ।।१०।।
रचिबे को बिधि जैसे, पालिबे को हरि, हर मीच मारिबे को, ज्याईबे को सुधापान भो । धरिबे को धरनि, तरनि तम दलिबे को, सोखिबे कृसानु, पोषिबे को हिम-भानु भो ।। खल-दुःख दोषिबे को, जन-परितोषिबे को, माँगिबो मलीनता को मोदक सुदान भो । आरत की आरति निवारिबे को तिहुँ पुर, तुलसी को साहेब हठीलो हनुमान भो ।।११।।
सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि, सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँक को । देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ, बापुरे बराक कहा और राजा राँक को ।। जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद, ताके जो अनर्थ सो समर्थ एक आँक को । सब दिन रुरो परै पूरो जहाँ-तहाँ ताहि, जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँक को ।।१२।।
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि, लोकपाल सकल लखन राम जानकी । लोक परलोक को बिसोक सो तिलोक ताहि, तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ।। केसरी किसोर बन्दीछोर के नेवाजे सब, कीरति बिमल कपि करुनानिधान की । बालक-ज्यों पालिहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको, जाके हिये हुलसति हाँक हनुमान की ।।१३।।
करुनानिधान, बलबुद्धि के निधान मोद-महिमा निधान, गुन-ज्ञान के निधान हौ । बामदेव-रुप भूप राम के सनेही, नाम लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ।। आपने प्रभाव सीताराम के सुभाव सील, लोक-बेद-बिधि के बिदूष हनुमान हौ । मन की बचन की करम की तिहूँ प्रकार, तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ।।१४।।
मन को अगम, तन सुगम किये कपीस, काज महाराज के समाज साज साजे हैं । देव-बंदी छोर रनरोर केसरी किसोर, जुग जुग जग तेरे बिरद बिराजे हैं । बीर बरजोर, घटि जोर तुलसी की ओर, सुनि सकुचाने साधु खल गन गाजे हैं । बिगरी सँवार अंजनी कुमार कीजे मोहिं, जैसे होत आये हनुमान के निवाजे हैं ।।१५।।
|| सवैया ||
जान सिरोमनि हौ हनुमान सदा जन के मन बास तिहारो । ढ़ारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ।। साहेब सेवक नाते तो हातो कियो सो तहाँ तुलसी को न चारो । दोष सुनाये तें आगेहुँ को होशियार ह्वैं हों मन तौ हिय हारो ।।१६।।
तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले । तेरे निवाजे गरीब निवाज बिराजत बैरिन के उर साले ।। संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरी के से जाले । बूढ़ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ।।१७।।
सिंधु तरे, बड़े बीर दले खल, जारे हैं लंक से बंक मवा से । तैं रनि-केहरि केहरि के बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से ।। तोसों समत्थ सुसाहेब सेई सहै तुलसी दुख दोष दवा से । बानर बाज ! बढ़े खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ।।१८।।
अच्छ-विमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो । बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुंजर केहरि-बारो ।। राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीर-दुलारो । पाप-तें साप-तें ताप तिहूँ-तें सदा तुलसी कहँ सो रखवारो ।।१९।।
|| घनाक्षरी ||
जानत जहान हनुमान को निवाज्यौ जन, मन अनुमानि बलि, बोल न बिसारिये । सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी, साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ।। अपराधी जानि कीजै सासति सहस भाँति, मोदक मरै जो ताहि माहुर न मारिये । साहसी समीर के दुलारे रघुबीर जू के, बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ।।२०।।
उथपे थपनथिर थपे उथपनहार, केसरी कुमार बल आपनो सँभारिये । राम के गुलामनि को कामतरु रामदूत, मोसे दीन दूबरे को तकिया तिहारिये ।। साहेब समर्थ तोसों तुलसी के माथे पर, सोऊ अपराध बिनु बीर, बाँधि मारिये । पोखरी बिसाल बाँहु, बलि, बारिचर पीर, मकरी ज्यौं पकरि कै बदन बिदारिये ।।२२।।
राम को सनेह, राम साहस लखन सिय, राम की भगति, सोच संकट निवारिये । मुद-मरकट रोग-बारिनिधि हेरि हारे, जीव-जामवंत को भरोसो तेरो भारिये ।। कूदिये कृपाल तुलसी सुप्रेम-पब्बयतें, सुथल सुबेल भालू बैठि कै बिचारिये । महाबीर बाँकुरे बराकी बाँह-पीर क्यों न, लंकिनी ज्यों लात-घात ही मरोरि मारिये ।।२३।।
लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत, तोसे समरथ चष चारिहूँ निहारिये । कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल, नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ।। खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर, तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये । बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि, उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ।।२४।।
करम-कराल-कंस भूमिपाल के भरोसे, बकी बकभगिनी काहू तें कहा डरैगी । बड़ी बिकराल बाल घातिनी न जात कहि, बाँहूबल बालक छबीले छोटे छरैगी ।। आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख, पाप जाय सबको गुनी के पाले परैगी । पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसी की, बाँहपीर महाबीर तेरे मारे मरैगी ।।२५।।
भालकी कि कालकी कि रोष की त्रिदोष की है, बेदन बिषम पाप ताप छल छाँह की । करमन कूट की कि जन्त्र मन्त्र बूट की, पराहि जाहि पापिनी मलीन मन माँह की ।। पैहहि सजाय, नत कहत बजाय तोहि, बाबरी न होहि बानि जानि कपि नाँह की । आन हनुमान की दुहाई बलवान की, सपथ महाबीर की जो रहै पीर बाँह की ।।२६।।
सिंहिका सँहारि बल, सुरसा सुधारि छल, लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है । लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार, जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ।। तोरि जमकातरि मंदोदरी कढ़ोरि आनी, रावन की रानी मेघनाद महँतारी है । भीर बाँह पीर की निपट राखी महाबीर, कौन के सकोच तुलसी के सोच भारी है ।।२७।।
तेरो बालि केलि बीर सुनि सहमत धीर, भूलत सरीर सुधि सक्र-रबि-राहु की । तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब, तेरो नाम लेत रहै आरति न काहु की ।। साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि, हाथ कपिनाथ ही के चोटी चोर साहु की । आलस अनख परिहास कै सिखावन है, एते दिन रही पीर तुलसी के बाहु की ।।२८।।
टूकनि को घर-घर डोलत कँगाल बोलि, बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है । कीन्ही है सँभार सार अँजनी कुमार बीर, आपनो बिसारि हैं न मेरेहू भरोसो है ।। इतनो परेखो सब भाँति समरथ आजु, कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है । सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास, चीरी को मरन खेल बालकनि को सो है ।।२९।।
आपने ही पाप तें त्रिपात तें कि साप तें, बढ़ी है बाँह बेदन कही न सहि जाति है । औषध अनेक जन्त्र मन्त्र टोटकादि किये, बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ।। करतार, भरतार, हरतार, कर्म काल, को है जगजाल जो न मानत इताति है । चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो राम दूत, ढील तेरी बीर मोहि पीर तें पिराति है ।।३०।।
दूत राम राय को, सपूत पूत बाय को, समत्व हाथ पाय को सहाय असहाय को । बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत, रावन सो भट भयो मुठिका के घाय को ।। एते बड़े साहेब समर्थ को निवाजो आज, सीदत सुसेवक बचन मन काय को । थोरी बाँह पीर की बड़ी गलानि तुलसी को, कौन पाप कोप, लोप प्रकट प्रभाय को ।।३१।।
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग, छोटे बड़े जीव जेते चेतन अचेत हैं । पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम, राम दूत की रजाइ माथे मानि लेत हैं ।। घोर जन्त्र मन्त्र कूट कपट कुरोग जोग, हनुमान आन सुनि छाड़त निकेत हैं । क्रोध कीजे कर्म को प्रबोध कीजे तुलसी को, सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ।।३२।।
तेरे बल बानर जिताये रन रावन सों, तेरे घाले जातुधान भये घर-घर के । तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज, सकल समाज साज साजे रघुबर के ।। तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत, सजल बिलोचन बिरंचि हरि हर के । तुलसी के माथे पर हाथ फेरो कीसनाथ, देखिये न दास दुखी तोसो कनिगर के ।।३३।।
पालो तेरे टूक को परेहू चूक मूकिये न, कूर कौड़ी दूको हौं आपनी ओर हेरिये । भोरानाथ भोरे ही सरोष होत थोरे दोष, पोषि तोषि थापि आपनी न अवडेरिये ।। अँबु तू हौं अँबुचर, अँबु तू हौं डिंभ सो न, बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये । बालक बिकल जानि पाहि प्रेम पहिचानि, तुलसी की बाँह पर लामी लूम फेरिये ।।३४।।
राम गुलाम तु ही हनुमान गोसाँई सुसाँई सदा अनुकूलो । पाल्यो हौं बाल ज्यों आखर दू पितु मातु सों मंगल मोद समूलो ।। बाँह की बेदन बाँह पगार पुकारत आरत आनँद भूलो । श्री रघुबीर निवारिये पीर रहौं दरबार परो लटि लूलो ।।३६।।
|| घनाक्षरी ||
काल की करालता करम कठिनाई कीधौं, पाप के प्रभाव की सुभाय बाय बावरे । बेदन कुभाँति सो सही न जाति राति दिन, सोई बाँह गही जो गही समीर डाबरे ।। लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि, सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे । भूतनि की आपनी पराये की कृपा निधान, जानियत सबही की रीति राम रावरे ।।३७।।
पाँय पीर पेट पीर बाँह पीर मुँह पीर, जरजर सकल पीर मई है । देव भूत पितर करम खल काल ग्रह, मोहि पर दवरि दमानक सी दई है ।। हौं तो बिनु मोल के बिकानो बलि बारेही तें, ओट राम नाम की ललाट लिखि लई है । कुँभज के किंकर बिकल बूढ़े गोखुरनि, हाय राम राय ऐसी हाल कहूँ भई है ।।३८।।
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि, मुँहपीर केतुजा कुरोग जातुधान हैं । राम नाम जगजाप कियो चहों सानुराग, काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान हैं ।। सुमिरे सहाय राम लखन आखर दोऊ, जिनके समूह साके जागत जहान हैं । तुलसी सँभारि ताड़का सँहारि भारि भट, बेधे बरगद से बनाइ बानवान हैं ।।३९।।
बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो, राम नाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं । परयो लोक-रीति में पुनीत प्रीति राम राय, मोह बस बैठो तोरि तरकि तराक हौं ।। खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो, अंजनी कुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं । तुलसी गुसाँई भयो भोंडे दिन भूल गयो, ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ।।४०।।
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन, देखि दीन दूबरो करै न हाय हाय को । तुलसी अनाथ सो सनाथ रघुनाथ कियो, दियो फल सील सिंधु आपने सुभाय को ।। नीच यहि बीच पति पाइ भरु हाईगो, बिहाइ प्रभु भजन बचन मन काय को । ता तें तनु पेषियत घोर बरतोर मिस, फूटि फूटि निकसत लोन राम राय को ।।४१।।
जीओं जग जानकी जीवन को कहाइ जन, मरिबे को बारानसी बारि सुरसरि को । तुलसी के दुहूँ हाथ मोदक हैं ऐसे ठाँउ, जाके जिये मुये सोच करिहैं न लरि को ।। मोको झूटो साँचो लोग राम को कहत सब, मेरे मन मान है न हर को न हरि को । भारी पीर दुसह सरीर तें बिहाल होत, सोऊ रघुबीर बिनु सकै दूर करि को ।।४२।।
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित, हित उपदेश को महेस मानो गुरु कै । मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय, तुम्हरे भरोसे सुर मैं न जाने सुर कै ।। ब्याधि भूत जनित उपाधि काहु खल की, समाधि कीजे तुलसी को जानि जन फुर कै । कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ, रोग सिंधु क्यों न डारियत गाय खुर कै ।।४३।।
कहों हनुमान सों सुजान राम राय सों, कृपानिधान संकर सों सावधान सुनिये । हरष विषाद राग रोष गुन दोष मई, बिरची बिरञ्ची सब देखियत दुनिये ।। माया जीव काल के करम के सुभाय के, करैया राम बेद कहैं साँची मन गुनिये । तुम्ह तें कहा न होय हा हा सो बुझैये मोहि, हौं हूँ रहों मौनही बयो सो जानि लुनिये ।।४४।।
माना जाता है कि इस निर्वाण षट्कम (Nirvana Shatakam) की श्री आदि शंकराचार्य जी के द्वारा की गई थी| यह निर्वाण षट्कम (Nirvana Shatakam) सबसे शक्तिशाली मंत्रों में से है| जिसका केवल जाप करने मात्र से मनुष्य को मोक्ष एवं आंतरिक शांति की प्राप्ति होती है| यह निर्वाण षट्कम (Nirvana Shatakam) पाठ करने वाले व्यक्ति को संसार के आकर्षण को त्यागने के लिए प्रोत्साहित करता है|
इस निर्वाण षट्कम (Nirvana Shatakam) का पाठ भगवान शिव का स्मरण करके किया जाता है अर्थात यह मंत्र भगवान शिव को समर्पित है| प्रतिदिन इस मंत्र का जाप करने से मनुष्य के आस-पास एक सकारात्मक ऊर्जा उत्पन्न होती है| आज इस लेख के माध्यम से हम आपको निर्वाण षट्कम (Nirvana Shatakam) के हिंदी अर्थ के बारे में बताएँगे|
इसी के साथ यदि आप शिव तांडव स्तोत्रम [Shiv Tandav Stotram], खाटूश्याम जी की आरती [Khatu Shyam Aarti Lyrics], या कनकधारा स्तोत्र [Kanakdhara Stotra] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|
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निर्वाण षट्कम मंत्र – Nirvana Shatakam Lyrics With Hindi Meaning
मनोबुद्धयहंकारचित्तानि नाहम् न च श्रोत्र जिह्वे न च घ्राण नेत्रे
न च व्योम भूमिर्न तेजॊ न वायु: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्
हिंदी अर्थ – मैं न तो मन हूँ, न बुद्धि हूँ, न अहंकार हूँ, न ही चित्त हूँ
मैं न तो कान हूँ, न जीभ हूँ, न नासिका हूँ, न ही नेत्र हूँ
मैं न तो आकाश हूँ, न धरती हूँ, न अग्नि हूँ और न ही वायु हूँ
मैं तो शुद्ध चेतना हूँ, अनादि, अनंत शिव हूँ|
न च प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायु: न वा सप्तधातुर्न वा पञ्चकोश:
न वाक्पाणिपादौ न चोपस्थपायू चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम्
हिंदी अर्थ – मैं न तो प्राण हूँ और न ही पंच वायु हूँ
मैं न सात धातुं हूँ,
और न ही पांच कोश हूँ
मैं न वाणी हूँ, न पैर हूँ, न हाथ हूँ और न ही उत्सर्जन की इन्द्रियां हूँ
मैं तो शुद्ध चेतना हूँ, अनादि, अनंत शिव हूँ|
न मे द्वेष रागौ न मे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्य भाव:
न धर्मो न चार्थो न कामो ना मोक्ष: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्
हिंदी अर्थ – न मुझमे घृणा है, न ही लगाव है, न मुझे लोभ है और न ही मोह
न मुझे अभिमान है और न ही ईर्ष्या
मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूँ
मैं तो शुद्ध चेतना हूँ, अनादि, अनंत शिव हूँ|
न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दु:खम् न मन्त्रो न तीर्थं न वेदार् न यज्ञा:
अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूप:शिवोऽहम् शिवोऽहम्
हिंदी अर्थ – मैं पुण्य, पाप, सुख और से भिन्न हूँ
मैं न मंत्र हूँ, न ही तीर्थ हूँ, न ज्ञान हूँ और न ही यज्ञ हूँ
न मैं भोगने की वस्तु हूँ, न ही भोग का अनुभव हूँ, और न ही भोक्ता हूँ
मैं तो शुद्ध चेतना हूँ, अनादि, अनंत शिव हूँ|
न मे मृत्यु शंका न मे जातिभेद:पिता नैव मे नैव माता न जन्म:
न बन्धुर्न मित्रं गुरुर्नैव शिष्य: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्
हिंदी अर्थ – मुझे न तो मृत्यु का भय है, न ही किसी जाती से भेदभाव है
मेरा न तो कोई पिता है और न ही माता, न ही मैं कभी जन्मा
मेरा न तो कोई भाई है, न मित्र, न शिष्य और न ही गुरु
मैं तो शुद्ध चेतना हूँ, अनादि, अनंत शिव हूँ|
अहं निर्विकल्पॊ निराकार रूपॊ विभुत्वाच्च सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्
न चासंगतं नैव मुक्तिर्न मेय: चिदानन्द रूप: शिवोऽहम् शिवोऽहम्
हिंदी अर्थ – मैं निर्विकल्प हूँ, मैं निराकार हूँ
मैं चैतन्य के रूप में प्रत्येक स्थान पर व्याप्त हूँ, सभी इन्द्रियों में मैं हूँ
मुझे न किसी चीज़ में आसक्ति है और न ही मैं उससे मुक्त हूँ
मैं तो शुद्ध चेतना हूँ, अनादि, अनंत शिव हूँ|
Nirvana Shatakam Lyrics in English – निर्वाण षट्कम मंत्र
|| Nirvana Shatakam Mantra ||
Mano Buddhi ahankara chittani naaham, na cha shrotravjihve na cha ghraana netre Na cha vyoma bhoomir na tejoo na vaayuhu, chidanand rupah shivo’ham, shivo’ham
Na cha prana sangyo na vai pancha vayuhu, Na va sapta dhatur na va panch koshah Na vak pani padam na chopastha payu, Chidananda rupah shivo’ham, shivo’ham
Na me dvesha ragau na me lobh mohau, Na me vai mado naiva matsarya bhavah Na dharmo na chartho na kamo naa mokshaha, Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
Na punyam na papam na saukhyam na dukham, Na mantro na tirtham na veda na yajnah Aham bhojanam naiva bhojyam na bhokta, Chidananda rupah shivo’ham shivo’ham
Na me mrityu shanka na me jaati bhedaha, pita naiva me naiva mata na janmah Na Bandhur na Mitram gurur naiva shishyaha, Chidananda rupah shivoham shivoham
Aham nirvikalpo nirakara rupo, Vibhut vatcha sarvatra sarvendriyaanam Na cha sangatham naiva muktir na meyaha, Chidananda rupah shivoham, shivoham
दादाजी चालीसा का जाप प्रतिदिन लाखों भक्तों के द्वारा किया जाता है| दादाजी हिन्दू धर्म के दाधिच समाज में पूजे जाने वाले बहुत ही प्रसिद्ध देवता है| माना जाता है कि दादाजी हनुमान जी के बहुत ही बड़े भक्त थे| दादाजी का जन्म राजस्थान के चुरू जिले में दाधिच ब्राह्मण श्री हरजीराम जी के घर में हुआ था| इनका नाम अखाराम जी था|
कहा जाता था कि इनके चिमटे के स्पर्श करने तथा इनकी धुनी की भभूती मिलाने से जो कलवानी तैयार होती है| उसे अमृत के समान माना जाता है| इस दादाजी चालीसा का जाप करने दादाजी अखाराम जी अपने भक्तों से बहुत प्रसन्न होते है तो आइये पढ़ते है दादाजी अखाराम जी यह पवित्र चालीसा |
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Dadaji Chalisa Lyrics In Hindi | दादाजी अखाराम जी चालीसा
|| दादाजी चालीसा ||
|| दोहा ||
अक्षय तेरा कोष है, अक्षय तेरा नाम। अक्षय पलकें खोल दे, अक्षय दे वरदान।
|| चौपाई ||
जय अक्षय हरजी सुत देवा। शीश नवायें, करते सेवा।। जय मारुति सेवक सुखदायक। जय जय जय अंजनि सुत पायक।। जय जय संत शिरोमणि दाता। जय जीवू बाई के भ्राता।। जय हरजी सुत कीरति पावन। त्रिभुवन यश सब शोक नसावन।। जय हनुमत चरणों के दासा। पूर्ण करो सब मन की आशा।। जय तुम कींकर महावीर का। सरजीवन है किया नीर का।। जय तुम पौत्रवंश सुखदायक। महावीर सेवक कुलनायक।। संवत पन्द्रह सौ पचास में। भादव बदी पंचमी प्रात: में ।। परसाणें से नाम ग्राम में । जन्मे प्रभुजी धरा धाम में।। कृष्ण पक्ष शुभ घड़ी लग्न में। लियो जन्म हरजी आंगन में ।। नाम दिया पिता ने अक्षा। सुमिरन से करते हो रक्षा।। सरल नाम तव अखाराम है। करते सुमिरन सुबह शाम है।। दिव्य ललाट केशर का टीका । कटी पीताम्बर सोहे निका।। हाथ छड़ी गल माला सोहे। पंचरंग पाग भक्त मन मोहे।। सुन्दर राजे गले जनेऊ। रेशम जामा, पगां खड़ाऊँ ।। छड़ी चिमटा है विष हर्ता। दुखित जनों के पालन कर्ता ।। तांती और भभूति नीकी। दलन रोग भव मुरि अमीसी ।। डेरी माँई गऊ चराई। घूणी पर नभ वाणी सुनाई ।। तपबल से कपि दर्शन पाया। मूरत ले परसाणे आया ।। भानु दिशा मुख बजरंग कीन्हा। ध्रुव दिश देवल तुमको दीन्हा ।। सन्मुख पीपल है बजरंग के। हरे खेजड़ी अवगुण चित्त के ।। बेरी तरु की महिमा भारी। कफ दोषन को टारनहारी ।। पोल एक पुरब मुख सोहे। मंदिर छवि भक्तन मन मोहे ।। अमृत कुण्ड और धर्मशाल है। शुभ सुन्दर मन्दिर विशाल है ।। पूनम, मंगल, शनिवार है। मंदिर दर्शन की बहार है ।। रात्रि जागरण भजन सुनावै। जो सेवक मांगे सो ही पावै ।। पौत्र, प्रपौत्र, बहू सब आते। कर दर्शन सब मंगल गाते ।। श्री फल लड्डू भोग चढ़वे। मनवाँछित फल सो नर पावै ।। द्वार पितामह के जो आवे । बिन मांगे सब कुछ पा जावे ।। कृष्ण पक्ष पंचमी का मेला। कोई युगल भक्त अकेला।। दादा तेरा अमर नाम है। प्रतिपल मुख पर राम राम है ।। हुकमचंद सुत रामबगस के। विषधर गया पैर में डसके ।। रोम रोम विष मूँजा फूटा। व्याकुल भए, धीरज मन छूटा ।। जब कलवाणी दी तत्काला। जैसे तेल दिये बीच डाला ।। ऐसे काज अनेकों सारे। ते मम ते नहीं जाये उचारे ।। बैंडवा में भी आज बिराजे। अगणी गुमटी छापर राजे ।। प्रात: सांय सिगड़ी के दर्शन। तापर लक्ष्मी होती परसन ।। कर दे दादा वरद हस्त अब। अभय दान दीजे अक्षय तब ।। कीड़ कांट प्रभु रक्षा करते । भूत-प्रेत भय व्याधा हरते ।। देश विदेश जहाँ जो ध्यावे । चम्पा सुखद परम पद पावे ।।
|| दोहा ||
तुम हो दया निधान प्रभु, मैं मूरख अज्ञान। भूल चूक सब क्षमा करो, पौत्र वंश तव जान।।
Dadaji Chalisa Lyrics In English | जय अक्षय हरजी सुत देवा
|| Dadaji Chalisa ||
|| Doha ||
Akshay tera kosh hai, Akshay tera naam. Akshay palkein khol de, Akshay de varadan
|| Chaupai ||
Jay Akshay Harji Sut Deva | Sheesh Navaye, Karte Seva. Jai Maruti Sevak Sukhdaayak | Jai Jai Jai Anjani Sut Paayak. Jay Jai Sant Shiromani Data | Jai Jeevoo Baare Ke Bhrata. Jai Harji Sut Keerti Pavan | Tribhuvan Yash Sab Shok Nasaavan. Jay Hanumat Charanon Ke Daasa | Purn Karo Sab Man Ki Aasha. Jai Tum Kinkar Mahaveer Ka | Sarjeevan Hai Kiya Neer Ka. Jay Tum Pautravansh Sukhdaayak | Mahaveer Sevak Kulnaayak. Sanvat Pandrah Sau Pachaas Mein | Bhadav Badi Panchami Praatah Mein. Parasaane Se Naam Gram Mein | Janme Prabhuji Dhara Dhaam Mein. Krishna Paksh Shubh Ghadi Lagn Mein | Liyo Janm Harji Aangan Mein. Naam Diya Pita Ne Aksha | Smiran Se Karte Ho Raksha. Saral Naam Tav Akharam Hai | Karte Smiran Subah Shaam Hai. Divya Lalaat Keshar Ka Teeka | Kati Peetambar Sohe Nika. Haath Chhadi Gale Maala Sohe | Panchrang Paag Bhakt Man Mohe. Sundar Raaje Gale Janeu | Resham Jama, Pagaan Khadaaun. Chhadi Chimta Hai Vish Harta | Dukhit Janon Ke Palan Karta. Taanti Aur Bhavuti Neeki | Dalan Rog Bhav Muri Ameesi. Deri Maai Gau Charaai | Ghooni Par Nabhi Vaani Sunaai. Tapbal Se Kapi Darshan Paaya | Moorti Le Parasane Aaya. Bhanu Disha Mukh Bajrang Keenha | Dhruv Disha Deval Tumko Deenha. Sanmukh Peepal Hai Bajrang Ke | Hare Khejadi Avgun Chitt Ke. Beri Taru Ki Mahima Bhari | Kaph Doshan Ko Taaranhaari. Pol Ek Purab Mukh Sohe | Mandir Chhavi Bhakton Man Mohe. Amrit Kund Aur Dharmashal Hai | Shubh Sundar Mandir Vishal Hai. Poonam, Mangal, Shanivaar Hai | Mandir Darshan Ki Bahaar Hai. Ratri Jaagran Bhajan Sunaave | Jo Sevak Maange Soi Paave. Pautr, Prapautr, Bahu Sab Aate | Kar Darshan Sab Mangal Gaate. Shri Phal Laddu Bhog Chadhave | Manvaanchhit Phal So Nar Paave. Dwaar Pitamah Ke Jo Aave | Bin Maange Sab Kuch Pa Jaave. Krishna Paksh Panchami Ka Mela | Koi Yugala Bhakt Akela. Dada Tera Amar Naam Hai | Pratipal Mukh Par Raam Raam Hai. Hukamchand Sut Raambaksh Ke | Vishadhar Gaya Pair Mein Daskhe. Rom Rom Vish Munja Phoota | Vyaakul Bhaaye, Dheeraj Man Chhoota. Jab Kalvaani Di Tatkaala | Jaise Tel Diye Beech Daala. Aise Kaaj Aneko Saare | Te Mam Te Nahi Jaaye Uchaare. Bandwa Mein Bhi Aaj Biraaje | Agni Gumti Chaapar Raaje. Pratah Saanjh Sigdi Ke Darshan | Taapar Lakshmi Hoti Parasan. Kar De Dada Varad Hast Ab | Abhay Daan Deeje Akshay Tab. Keed Kaant Prabhu Raksha Karte | Bhoot-pret Bhay Vyadha Harate. Desh Videsh Jahan Jo Dhyaave | Champa Sukhad Param Pad Paave.
|| Doha ||
Tum ho daya nidhan Prabhu, main moorkh agyaan. Bhool chook sab kshama karo, pautra vansh tav jaan.
भगवान श्री कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए श्री कृष्णाष्टकम् (Shri Krishnashtakam) एक बहुत ही अच्छा मंत्र माना जाता है| श्री कृष्णाष्टकम् (Shri Krishnashtakam) का जाप करने से भक्तों को श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है| वसुदेव सुतं देवंकंस भगवान श्री कृष्ण का सबसे प्रसिद्ध है|
इस श्री कृष्णाष्टकम् (Shri Krishnashtakam) का जाप प्रतिदिन किया जा सकता है किन्तु कृष्ण जन्माष्टमी के शुभ अवसर पर इसका जाप करना जातक के लिए बहुत लाभदायक होता है| भगवान श्री कृष्ण के कई मंदिरों में इस श्री कृष्णाष्टकम् (Shri Krishnashtakam) का पाठ किया जाता है तो आइये जानते है श्री कृष्णाष्टकम् (Shri Krishnashtakam) के लिरिक्स के बारे में|
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श्री कृष्णाष्टकम् संस्कृत में – Shri Krishnashtakam Lyrics in Sanskrit
मोहिनी एकादशी व्रत कथा: एकादशी तिथि हिन्दू धर्म में बहुत ही महत्व रखती है| एकादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तों को सौभाग्य की प्राप्ति होती है| वैशाख के महीने में आने वाली एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| हिन्दू धर्म के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की सम्पूर्ण विधि – विधान से पूजा की जाती है|
भगवान विष्णु की पूजा तब तक पूर्ण नहीं होती है, जब तक मोहिनी एकादशी व्रत कथा का जाप नहीं किया जाए| पौराणिक कथाओं के अनुसार जब समुन्द्र मंथन में अमृत का कलश निकला था तो अमृत कलश को दानवों से दूर रखने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का अवतार धारण किया था|
इस कारण भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की पूजा के साथ – साथ मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) को भी पढ़ा जाता है| जो भी भक्त इस इस एकादशी के दिन मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) पढता या सुनता है, उसे एक हजार को गायों को दान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है|
साथ ही पूर्ण श्रद्धा से भगवान विष्णु भगवान की पूजा करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते है| आइये जानते है मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) के बारे में|
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मोहिनी एकादशी व्रत का महत्व – Importance of Mohini Ekadashi Vrat Katha
युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे भगवन ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ| मैंने आपके द्वारा वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे वरूथिनी एकादशी भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से क्या फल प्राप्त होता है?
इस पर भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि – हे धर्मराज ! वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| इस एकादशी का व्रत करने से भक्तों को सम्पूर्ण पापों एवं दुखों से छुटकारा प्राप्त होता है|
हे युधिष्ठिर ! मैं तुम्हे बता दूँ कि इस एकादशी के दिन मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का बहुत ही महत्व है| इसके सन्दर्भ में जो कथा मैं बताने वाला हूँ| वह कथा महर्षि वशिष्ठ जी ने श्री राम को सुनाई थी|
मोहिनी एकादशी व्रत कथा – Mohini Ekadashi Vrat Katha
एक समय की बात है भगवान श्री राम में महर्षि वशिष्ठ जी से कहा कि – हे गुरुदेव ! मैंने सीता जी के वियोग में कई सारे दुखों को भोग है| अतः मुझे ऐसे व्रत के बारे में बताइए जिससे समस्त पाप और दुःख नष्ट हो जाए| इस पर महर्षि वशिष्ठ जी ने भगवान श्री राम से कहा – हे राम ! आपके द्वारा पूछा गया प्रश्न बहुत ही अच्छा है| आपकी बुद्धि अत्यंत ही पवित्र है| आपका नाम लेने मात्र से ही भक्तों की आत्मा पवित्र हो जाती है|
वैशाख माह के शुक्ल में आने वाली एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है| जो भी मनुष्य मोहिनी एकादशी का व्रत करता है| उस मनुष्य के जीवन से समस्त दुःख व पाप नष्ट हो जाते है| मैं अब इसकी कथा कहता हूँ| इस ध्यानपूर्वक सुनो|
प्राचीन समय में सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नामक राज्य में द्युतिमान नामक राजा का शासन था| उस राज्य में ही धन – धान्य से संपन्न धनपाल नाम का एक वैश्य भी रहता था| वह भगवान विष्णु का बहुत ही बड़ा भक्त था| उसने सम्पूर्ण भद्रावती नगरी कई सारे कुँए, धर्मशाला, भोजनालय, सरोवर, प्याऊ आदि का निर्माण एवं सड़कों पर आम, नीम, जामुन इत्यादि विभिन्न प्रकार के कई पेड़ भी लगवाये थे|
धनपाल के पांच पुत्र थे – सुमना, मेधावी, सद्बुद्धि, धृष्टबुद्धि एवं सुकृति| इन्हें धृष्टबुद्धि नामक पुत्र बहुत ही पापी था| धृष्टबुद्धि पितरों को नहीं मानता था| इसके अलावा वह गलत संगतियों में रहकर जुआ खेलता, पर – स्त्री के भोग विलास करता एवं मांस – मदिरा का भी सेवन करता था|
इसी प्रकार गलत कर्मों में वह अपने पिता के धन को नष्ट कर रहा था| जब पिता को इन सब के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने परेशान होकर धृष्टबुद्धि को घर से निकाल दिया|
पिता के द्वारा घर से निकलने के पश्चात उसने कुछ समय तक अपने वस्त्र एवं गहनों को बेचकर अपना जीवन यापन किया| किन्तु जब उसके पास धन समाप्त हो गया तो उसके सभी दुराचारी साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया| इसके बाद वह भूख – प्यास से परेशान हो गया|
कोई मार्ग ना दिखने पर धृष्टबुद्धि ने चोरी करना प्रारम्भ कर दिया| जब प्रथम बार वह चोरी करता हुआ पकड़ा गया तो लोगों ने वैश्य का पुत्र जानकार उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया| लेकिन जब वह दूसरी बार चोरी करता पकड़ा गया तो राजा की आज्ञा के अनुसार उसे कारागार में डाल दिया गया|
धृष्टबुद्धि को कारागार में बहुत यातनाएं दी गयी| इसके पश्चात राजा ने उसे राज्य से निकाल दिया| इसके पश्चात के वह जंगल की ओर चला गया और वहां पशु – पक्षियों को मारकर खाने लगा| कुछ समय के बाद में वह बहेलिया बन गया| वह धनुष – बाण लेकर पशु – पक्षियों का शिकार करके उन्हें खाता था|
एक दिन की बात है वह भोजन की तलाश में इधर – उधर भटक रहा था| भोजन की तलाश करते हुए वह ऋषि कौण्डिन्य के आश्रम में पहुँच गए| कौण्डिन्य ऋषि गंगा स्नान करके आ रहे थे तो उनके गीले कपड़ों से गंगा जल के छींटे उस पर भी गिरे| जिससे उसे सद्बुद्धि प्राप्त हुई|
इसके बाद में धृष्टबुद्धि ने कौण्डिन्य ऋषि के पास जाकर हाथ जोड़ते हुए कहा – हे महामुनि ! मैंने अपने जीवन में कई सारे पाप किये है| कृपया आप मुझे इन सभी पापों से मुक्ति पाने के लिए बिना धन का उपाय बताइए| धृष्टबुद्धि के ऐसे वचन सुनकर कौण्डिन्य ऋषि उससे प्रसन्न हुए और उससे कहा कि तुम वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली मोहिनी एकादशी का व्रत करो| इस व्रत को करने से मनुष्य के पर्वत के समान पाप भी नष्ट हो जाते है|
ऋषि कौण्डिन्य के मुख से यह बात सुनकर वह बहुत ही प्रसन्न हुआ और उनके द्वारा बताई गई विधि के अनुसार उसने मोहिनी एकादशी के व्रत को किया| हे राम ! मोहिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ जी पर बैठकर विष्णुलोक को गया|
इस व्रत को करने से सभी प्रकार के मोह से छुटकारा मिलता है| इस व्रत कथा के महात्म्य को पढने अथवा सुनने से एक हजार गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है|
भगवान कार्तिकेय को प्रसन्न करने के लिए कार्तिकेय आरती (Kartikeya Aarti) का जाप किया जाता है| भगवान कार्तिकेय को मुरगन स्वामी के नाम से भी जाना जाता है| कार्तिकेय जी भगवान शंकर एवं माता पार्वती के बड़े पुत्र है|
कार्तिकेय भगवान की पूजा एवं कार्तिकेय आरती (Kartikeya Aarti) का जाप सभी भक्तों के द्वारा किया जाता है लेकिन इनकी सर्वाधिक पूजा दक्षिणी भारत में की जाती है| भारत के लगभग सभी दक्षिणी राज्यों मुख्यत तमिलनाडु में भगवान कार्तिकेय की पूजा व कार्तिकेय आरती (Kartikeya Aarti) पुरे विधि – विधान से की जाती है|
भगवान कार्तिकेय को तमिलनाडु का रक्षक देव भी माना जाता है| भगवान कार्तिकेय को स्कन्द देव भी कहा है इसलिए स्कन्द षष्ठी के कार्तिकेय भगवान की पूजा व आरती का जाप करने से भक्तों सौभाग्य की प्राप्ति होती है|
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कार्तिकेय भगवान की आरती हिंदी में | Kartikeya Bhagwan ki Aarti in Hindi
|| कार्तिकेय आरती ||
जय जय आरती वेणु गोपाला वेणु गोपाला वेणु लोला
पाप विदुरा नवनीत चोरा जय जय आरती वेंकटरमणा वेंकटरमणा संकटहरणा सीता राम राधे श्याम
जय जय आरती गौरी मनोहर गौरी मनोहर भवानी शंकर सदाशिव उमा महेश्वर
जय जय आरती राज राजेश्वरि राज राजेश्वरि त्रिपुरसुन्दरि
महा सरस्वती महा लक्ष्मी महा काली महा लक्ष्मी
जय जय आरती आन्जनेय आन्जनेय हनुमन्ता
जय जय आरति दत्तात्रेय दत्तात्रेय त्रिमुर्ति अवतार
जय जय आरती सिद्धि विनायक सिद्धि विनायक श्री गणेश
जय जय आरती सुब्रह्मण्य सुब्रह्मण्य कार्तिकेय
Kartikeya Aarti Lyrics in English | जय जय आरती वेणु गोपाला
|| Kartikeya Aarti ||
Jay Jay Aarti Venugopala Venugopala Venulola
Paap Vidura Navneet Chora Jay Jay Aarti Venkatramana Venkatramana Sankat Harana Sita Ram Radhe Shyam
Jay Jay Aarti Gauri Manohar Gauri Manohar Bhawani Shankar Sada Shiva Uma Maheshwar
Jay Jay Aarti Raj Rajeshwari Raj Rajeshwari Tripura Sundari
Maha Saraswati Maha Lakshmi Maha Kali Maha Lakshmi
Jay Jay Aarti Anjaniye Anjaniye Hanumanta
Jay Jay Aarti Dattatreya Dattatreya Trimurti Avatar
Jay Jay Aarti Siddhi Vinayak Siddhi Vinayak Shri Ganesh
माता लक्ष्मी जी को प्रसन्न करने के लिए महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam) का पाठ किया जाता है| महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam) का नियमित रूप से पाठ करने से भक्तों को माता लक्ष्मी की असीम कृपा प्राप्त होती है| पद्म पुराण से लिया गया यह पवित्र महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam) माता लक्ष्मी जी को समर्पित किया जाता है|
हिन्दू धर्म में माता लक्ष्मी को भगवान विष्णु की धर्म – पत्नी के रूप में भी जाना जाता है| ऐसे तो महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam) का पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है, लेकिन दिवाली के समय महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam ) का जाप करने से माता लक्ष्मी जी अपने भक्तों से प्रसन्न होकर उनपर धन की वर्षा करती है| तो आइये जानते है इस महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam ) के बारे में|
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महालक्ष्मी अष्टकम हिंदी अर्थ सहित | Maha Lakshmi Ashtakam Lyrics with Hindi Meaning
हिंदी अर्थ – देवराज इंद्र बोले – श्रीपीठ पर स्थित एवं समस्त देवताओं द्वारा पूजनीय हे महामाये ! आपको नमस्कार है| अपने हाथों में चक्र, शंख एवं गदा धारण करने वाली हे महालक्ष्मी ! आपको प्रणाम है|
नमस्ते गरूडारूढे कोलासूर भयंकरी । सर्व पाप हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥2॥
हिंदी अर्थ – पक्षियों के राजा गरुड़ जिनके वाहन है| भयानक से भयानक राक्षस भी जिनसे कांपते है| सभी पापों को हर लेने वाली देवी महालक्ष्मी आपको प्रणाम है|
सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्ट भयंकरी । सर्व दुःख हरे देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥3॥
हिंदी अर्थ – देवराज इंद्र बोले: मैं उन देवी की पूजा करता हूँ, जिन्हें सबकुछ ज्ञात है| सबको वरदान देने वाली, सभी के दुखों को दूर करने वाली है| हे देवी महालक्ष्मी ! आपको प्रणाम है|
सिद्धीबुद्धूीप्रदे देवी भुक्तिमुक्ति प्रदायिनी । मंत्रमूर्ते सदा देवी महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥ 4 ॥
हिंदी अर्थ – बुद्धि, सिद्धि, भोग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली हे मंत्रपूत भगवती महालक्ष्मी ! आपको सदा नमन है|
हिंदी अर्थ – हे माता ! आप आप सूक्ष्म, स्थूल तथा महारौद्ररूपिणी हो, आप बड़े – बड़े पापों का नाश करने वाली हो| हे देवी महालक्ष्मी ! आपको नमस्कार है|
पद्मासनस्थिते देवी परब्रम्हस्वरूपिणी । परमेशि जगन्मातर्र महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥7॥
हिंदी अर्थ – हे कमल के आसन पर विराजमान परमब्रह्म स्वरूपिणी देवी ! हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की माता ! हे महालक्ष्मी ! आपको मेरा प्रणाम है|
श्वेतांबरधरे देवी नानालंकार भूषिते । जगत्स्थिते जगन्मार्त महालक्ष्मी नमोस्तूते ॥8॥
हिंदी अर्थ – हे माता ! आप श्वेत वस्त्र धारण करने वाली तथा भिन्न – भिन्न प्रकार के आभूषण धारण करने वाली है| आप सम्पूर्ण जगत में व्याप्त तथा अखिल संसार को जन्म देने वाली हो, हे महालक्ष्मी ! आपको मेरा प्रणाम है|
हिंदी अर्थ – जो भी मनुष्य पूर्ण भक्ति भाव से महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam) का पाठ करता है| वह सम्पूर्ण सिद्धियों एवं राज्य वैभव को प्राप्त करता है|
हिंदी अर्थ – महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam ) का प्रतिदिन एक बार जाप करने से भक्तों सभी पाप नष्ट हो जाते है| यदि कोई भक्त महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam ) का प्रतिदिन दो बार पाठ करता है तो उसे धन – धान्य की प्राप्ति होती है|
हिंदी अर्थ – प्रतिदिन तीनों कालों में इस महालक्ष्मी अष्टकम (Mahalakshmi Ashtakam ) स्तोत्र का पाठ करने से सभी शत्रुओं का नाश होता है एवं उन भक्तों से कल्याणकारी देवी महालक्ष्मी हमेशा प्रसन्न रहती है| माता लक्ष्मी के आशीर्वाद से उनके सभी भक्तों के हर कार्य सिद्ध होते है|
यमुना जी की आरती (Yamuna Ji Aarti) का जाप माता यमुना को प्रसन्न करने तथा माता यमुना का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है| इस यमुना जी की आरती (Yamuna Ji Aarti) का जाप करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर होते है| आमतौर पर यमुना जी की आरती (Yamuna Ji Aarti) का जाप किसी भी दिन किया जा सकता है किन्तु भाई दूज के शुभ अवसर पर यमुना जी की आरती (Yamuna Ji Aarti) करने जातक को बहुत लाभ होता है|
इस आरती को केवल सुनने मात्र से ही भगवान श्री कृष्ण का आशीर्वाद प्राप्त होता है| जो भी व्यक्ति इस आरती (Yamuna Ji Aarti) का जाप करता है, उस व्यक्ति को यम का भय नहीं रहता है| तो आइये जानते है यमुना जी की आरती (Yamuna Ji Aarti) के लिरिक्स के बारे में|
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माता यमुना जी की आरती हिंदी में | Yamuna Ji Aarti Lyrics in Hindi
|| यमुना जी की आरती ||
ॐ जय यमुना माता, हरि जय यमुना माता ।
जो नहावे फल पावे सुख दुःख की दाता ।। ॐ जय यमुना माता
पावन श्रीयमुना जल अगम बहै धारा ।
जो जन शरण में आया कर दिया निस्तारा ।। ॐ जय यमुना माता
जो जन प्रातः ही उठकर नित्य स्नान करे ।
यम के त्रास न पावे जो नित्य ध्यान करे ।। ॐ जय यमुना माता
कलिकाल में महिमा तुम्हारी अटल रही ।
तुम्हारा बड़ा महातम चारो वेद कही ।। ॐ जय यमुना माता
आन तुम्हारे माता प्रभु अवतार लियो ।
नित्य निर्मल जल पीकर कंस को मार दियो ।। ॐ जय यमुना माता
नमो मात भय हरणी शुभ मंगल करणी ।
मन बेचैन भया हैं तुम बिन वैतरणी ।। ॐ जय यमुना माता
Maa Yamuna Ji Aarti Lyrics in English | ॐ जय यमुना माता
|| Yamuna Ji Aarti ||
Om Jai Yamuna Mata, Hari Jai Yamuna Mata
Jo nahaave phal paave sukh dukh ki daata Om Jai Yamuna Mata
Paavan Shri Yamuna jal agam bahai dhaara,
Jo jan sharan mein aaya kar diya nistaara Om Jai Yamuna Mata
Jo jan praatah hi uthkar nitya snaan kare,
Yam ke traas na paave jo nitya dhyaan kare Om Jai Yamuna Mata
Kaliyug mein mahima tumhaari atal rahi,
Tumhaara bada mahaatam charo ved kahi Om Jai Yamuna Mata
Aan tumhaare maata, Prabhu avataar liyo,
Nitya nirmal jal peekar kans ko maar diyo Om Jai Yamuna Mata
Namo maat bhay harani, shubh mangal karani,
Man bechain bhaya hain tum bin vaitarani Om Jai Yamuna Mata