Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi: सत्यनारायण व्रत कथा समस्त अध्याय

सत्यनारायण व्रत की कथा लोक में प्रचलित है। हिन्दू धर्मावलम्बियों के बीच सबसे प्रतिष्ठित व्रत कथा के रूप में भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की सत्यनारायण व्रत कथा है। कुछ लोग मनौती पूरी होने पर, कुछ अन्य नियमित रूप से इस कथा का आयोजन करते हैं।

सत्यनारायण व्रत कथा के दो भाग हैं, व्रत-पूजा एवं कथा। सत्यनारायण व्रतकथा स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड से संकलित की गई है। सत्य को नारायण (विष्णु जी) के रूप में पूजना ही सत्यनारायण भगवान की पूजा है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि संसार में एकमात्र भगवान नारायण ही सत्य हैं, बाकी सब माया है।

सत्यनारायण व्रत कथा

भगवान की पूजा कई रूपों में की जाती है, उनमें से भगवान का सत्यनारायण स्वरूप इस कथा में बताया गया है। इसके मूल पाठ में पाठान्तर से लगभग 170 श्लोक संस्कृत भाषा में उपलब्ध है जो पाँच अध्यायों में बँटे हुए हैं। इस कथा के दो प्रमुख विषय हैं- जिनमें एक है संकल्प को भूलना और दूसरा है प्रसाद का अपमान।

व्रत कथा के अलग-अलग अध्यायों में छोटी कहानियों के माध्यम से बताया गया है कि सत्य का पालन न करने पर किस प्रकार की समस्या आती है। इसलिए जीवन में सत्य व्रत का पालन पूरी निष्ठा और सुदृढ़ता के साथ करना चाहिए।

ऐसा न करने पर भगवान न केवल नाराज होते हैं अपितु दण्ड स्वरूप सम्पत्ति और बन्धु बान्धवों के सुख से वंचित भी कर देते हैं। इस अर्थ में यह कथा लोक में सच्चाई की प्रतिष्ठा का लोकप्रिय और सर्वमान्य धार्मिक साहित्य हैं। प्रायः पूर्णमासी को इस कथा का परिवार में वाचन किया जाता है।

अन्य पर्वों पर भी इस कथा को विधि विधान से करने का निर्देश दिया गया है। इनकी पूजा में केले के पत्ते व फल के अतिरिक्त पंचामृत, पंचगव्य, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, दूर्वा की आवश्यकता होती जिनसे भगवान की पूजा होती है।

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श्री सत्यनारायण व्रत कथा उद्देश्य

वेदों के अनुसार सत्यनारायण कथा करने से हजारों वर्षों के यज्ञ के बराबर फल मिलता है। सत्यनारायण कथा को सुनने से भी सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार सत्यनारायण कथा को सुनने वाले को उपवास अवश्य करना चाहिए।

ऐसा माना जाता है कि श्री हरि विष्णु इससे जीवन की सभी समस्याओं को दूर करने में सक्षम हैं। स्कंद पुराण के अनुसार सत्यनारायण भगवान विष्णु का स्वरुप है। कहा जाता है कि ऐसी स्थिति में सत्यनारायण कथा सुनने और करने से भगवान विष्णु भक्त पर कृपा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह किसी के जीवन में खुशी और शांति लाता है।

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इस सत्यनारायण व्रत कथा को करने का सबसे मुख्य उद्देश्य ही सत्य की पूजा करना है| मान्यताओ के अनुसार सत्यनारायण व्रत के दिन भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है| इस दिन व्रत करने वाले भक्तों सुबह जल्दी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तत्पश्चात स्नान आदि से मुक्त होकर भगवान सत्यनारायण का ध्यान करना चाहिए| इसके पश्चात सूर्य भगवान को प्रणाम करके व्रत का संकल्प ले|

श्री सत्यनारायण व्रत कथा विधि

सत्यनारायण व्रत कथा पुस्तिका के प्रथम अध्याय में यह बताया गया है कि सत्यनारायण भगवान की पूजा कैसे की जाए। संक्षेप में यह विधि निम्नलिखित है-

जो व्यक्ति सत्यनारायण की पूजा का संकल्प लेते हैं उन्हें दिन भर व्रत रखना चाहिए। पूजन स्थल को गाय के गोबर से पवित्र करके वहां एक अल्पना बनाएँ और उस पर पूजा की चौकी रखें। इस चौकी के चारों पाये के पास केले का वृक्ष लगाएँ।

इस चौकी पर शालिग्राम या ठाकुर जी या श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा करते समय सबसे पहले गणपति की पूजा करें फिर इन्द्रादि दशदिक्पाल की और क्रमश: पंच लोकपाल, सीता सहित राम, लक्ष्मण की, राधा कृष्ण की।

इनकी पूजा के पश्चात ठाकुर जी व सत्यनारायण की पूजा करें। इसके बाद लक्ष्मी माता की और अन्त में महादेव और ब्रह्मा जी की पूजा करें। पूजा के बाद सभी देवों की आरती करें और चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण करे।

श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा

सत्यनारायण व्रत कथा प्रथम अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

सत्यनारायण व्रत कथा का पूरा सन्दर्भ यह है कि पुराकालमें शौनकादिऋषि नैमिषारण्य स्थित महर्षि सूत के आश्रम पर पहुँचे। ऋषिगण महर्षि सूत से प्रश्न करते हैं कि लौकिक कष्टमुक्ति, सांसारिक सुख समृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य की सिद्धि के लिए सरल उपाय क्या है?

महर्षि सूत शौनकादिऋषियों को बताते हैं कि ऐसा ही प्रश्न नारद जी ने भगवान विष्णु से किया था। भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया कि लौकिक क्लेशमुक्ति, सांसारिक सुखसमृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य सिद्धि के लिए एक ही राजमार्ग है, वह है सत्यनारायण व्रत। सत्यनारायण का अर्थ है सत्याचरण, सत्याग्रह, सत्यनिष्ठा। संसार में सुखसमृद्धि की प्राप्ति सत्याचरणद्वारा ही संभव है। सत्य ही ईश्वर है। सत्याचरण का अर्थ है ईश्वराराधन, भगवत्पूजा।

कथा का प्रारम्भ सूत जी द्वारा कथा सुनाने से होता है। नारद जी भगवान श्रीविष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति करते हैं। स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहाँ आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउँगा।

नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो, तो वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। उसे बतायें।

श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूँ, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूँ। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और सन्तान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है।

जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए।

केले के फल, घी, दूध, गेहूँ का चूर्ण अथवा गेहूँ के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए।

बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए।

तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा प्रथम अध्याय सम्पूर्ण ॥

सत्यनारायण व्रत कथा दूसरा अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

श्रीसूतजी बोले – हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भली भाँति विस्तारपूर्वक कहूँगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था।

प्रिय भगवान ने उस दुखी को देखकर वृद्ध का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा – हे ! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं।

बोला – प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र हूँ और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूँ। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये।

वृद्ध बोला – हे देव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

व्रत के विधान को भी यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध रूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूँगा’ – यह सोचते हुए उस को रात में नींद नहीं आयी।

अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया।

इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया।

हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। ! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं? हे मुने! इस पृथ्वी पर उस से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है।

श्री सूत जी बोले – मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ।

इसी बीच एक लकड़हारा वहाँ आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला – प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये।

विप्र ने कहा – यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया।

सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूँगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहाँ धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया।

इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूँ का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया।

उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा द्वितीय अध्याय सम्पूर्ण ॥

सत्यनारायण व्रत कथा तीसरा अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

श्री सूतजी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूँगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी।

राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहाँ आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा। साधु ने कहा – राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूँ।

राजा बोले – हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूँ। राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा – राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूँगा। मुझे भी सन्तति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही सन्तति प्राप्त होगी।’

ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से सन्तति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा – ‘जब मुझे सन्तति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूँगा’ – इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा। एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई।

दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चंद्रमा की भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा – आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं? साधु बोला – ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भाँति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी।

तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ – ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ सन्तुष्ट चित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया।

उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और अपने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोनो राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ – यह शाप दे दिया।

एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहाँ आ गये जहां वह साधु वणिक था।

वहाँ राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बाँधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले – ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बाँधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया।

भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी।

कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी।

माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा – पुत्री ! रात में तू कहाँ रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा – माँ! मैंने एक घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की – ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें।

वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायें।’ इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः सन्तुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा – ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा।’

राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा – ‘दोनों बन्दी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’

राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले – ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके।

राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को सन्तुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया।

पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा – ‘साधो! अब आप अपने घर को जायें।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ – ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा तृतीय अध्याय सम्पूर्ण ॥

सत्यनारायण व्रत कथा चौथा अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

श्रीसूत जी बोले – साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई – ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’

तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हँसते हुए कहा – ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर – ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ – ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये।

दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा – ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’

दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहाँ दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा – आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें – ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया। दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा – ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा।

साधु ने कहा – ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुरा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये।

भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ – ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की।

भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा – ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत को अपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा।

उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’

माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया। इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा – यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये।

तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी।

कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूँगा।

सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा – ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं।

कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’

कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र सन्तुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण ॥

सत्यनारायण व्रत कथा पाँचवाँ अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

श्रीसूत जी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूँगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया।

एक बार वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न ही उसने भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया।

पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ। उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था।

ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ।

श्रीसूत जी कहते हैं – जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है।

दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है – यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं।

कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें।

महान प्रज्ञासम्पन्न सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसरे जन्म में सुदामा हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया।

महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे से चीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर के मोक्ष प्राप्त किया।

महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया। इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा का यह पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा पञ्चम अध्याय सम्पूर्ण ॥

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र. सत्यनारायण व्रत क्यों करते हैं?

उ.श्री सत्यनारायण व्रत अभीष्ट फल प्रदान करने वाला है|

प्र. सत्यानारण भगवान की कथा कब करनी चाहिए?

उ.श्री सत्यनारायण व्रत सांयकाल में किसी भी दिन या शुभ कार्य से पहले किया जा सकता है। सक्राति, पूर्णमासी अमावस्या या एकादशी में सत्यदेव का पूजन अति उत्तम माना गया है।

प्र. सत्यनारण व्रत कथा का उल्लेख किस ग्रथ में मिलता है?

उ.सत्यनारायण व्रत कथा स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड से संकलित की गई है।

प्र. सत्यनारायण व्रत कथा में कितने श्लोक और अध्याय है ?

उ.सत्यनारायण व्रत में 170 श्लोक है जो पाँच अध्यायों में बँटे हुए हैं।


Shri Shyam Stuti Lyrics: श्री श्याम स्तुति – हाथ जोड़ विनती करू

खाटू श्याम जी की महिमा सदा से निराली है| खाटू श्याम जी को हारे तथा निराश लोगों का सहारा माना जाता है| इन्हें प्रसन्न करने के श्री श्याम स्तुति (Shri Shyam Stuti) का जाप किया जाता है| माना जाता है कि यह श्री श्याम स्तुति खाटू श्याम जी को बहुत ही प्रिय है|

श्री श्याम स्तुति (Shri Shyam Stuti) का जाप करने मात्र से ही भक्तों का कल्याण हो जाता है| कहा जाता है कि श्री श्याम स्तुति का जाप करने से खाटू श्याम जी के साथ ही भगवान श्री कृष्ण भी प्रसन्न होते है तो आइये जानते है खाटू श्याम जी को प्रसन्न करने वाली श्री श्याम स्तुति के बारे में|

श्री श्याम स्तुति

इसी के साथ यदि आप हनुमान चालीसा [Hanuman Chalisa], खाटू श्याम जी की आरती [Khatu Shyam Aarti Lyrics], या बजरंग बाण [Bajrang Baan Lyrics] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

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श्री श्याम स्तुति हिंदी में – Shri Shyam Stuti Lyrics in Hindi

|| श्री श्याम स्तुति ||

हाथ जोड़ विनती करू तो सुनियो चित्त लगाये
दस आ गयो शरण में रखियो इसकी लाज
धन्य ढूंढारो देश हे खाटू नगर सुजान
अनुपम छवि श्री श्याम की दर्शन से कल्याण

श्याम श्याम तो में रटूं श्याम हैं जीवन प्राण
श्याम भक्त जग में बड़े उनको करू प्रणाम
खाटू नगर के बीच में बण्यो आपको धाम
फाल्गुन शुक्ल मेला भरे जय जय बाबा श्याम

फाल्गुन शुक्ला द्वादशी उत्सव भरी होए
बाबा के दरबार से खाली जाये न कोए
उमा पति लक्ष्मी पति सीता पति श्री राम
लज्जा सब की रखियो खाटू के बाबा श्याम

पान सुपारी इलायची इत्तर सुगंध भरपूर
सब भक्तो की विनती दर्शन देवो हजूर
आलू सिंह तो प्रेम से धरे श्याम को ध्यान
श्याम भक्त पावे सदा श्याम कृपा से मान

जय श्री श्याम बोलो जय श्री श्याम
खाटू वाले बाबा जय श्री श्याम
लीलो घोड़ो लाल लगाम
जिस पर बैठ्यो बाबो श्याम

॥ॐ श्री श्याम देवाय नमः॥

श्री श्याम स्तुति

Shri Shyam Stuti Lyrics in English – हाथ जोड़ विनती करू

|| Shri Shyam Stuti ||

Hath jod vinati karu to suniyo chitt lagaye
Das aa gayo sharan mein rakhiyo iski laaj
Dhany dhoondharo desh hai Khatu Nagar sujaan
Anupam Chhavi Shri Shyam ki darshan se Kalyan

Shyam Shyam to main ratun Shyam hain jeevan pran
Shyam bhakt jag mein bade unko karu pranam
Khatu Nagar ke beech mein banyo aapko dhaam
Falgun Shukla mela bhare jay jay Baba Shyam

Falgun Shukla Dwadashi utsav bhari hoye
Baba ke darbar se khali jaye na koye
Uma pati Lakshmi pati Sita pati Shri Ram
Lajja sab ki rakhiyo Khatu ke Baba Shyam

Paan supari ilaychi ittar sugandh bharpoor
Sab bhakto ki vinati darshan devo hajoor
Aalu Singh to prem se dhare Shyam ko dhyan
Shyam bhakt paave sada Shyam kripa se maan

Jai Shri Shyam bolo Jai Shri Shyam
Khatu waale Baba Jai Shri Shyam
Leelo ghodo laal lagaam
Jis par baithyo Babo Shyam

॥ Om Shri Shyam Devaay Namah ॥

Aarti Shri Ramayan Ji Ki Lyrics: रामायण जी की आरती हिंदी में

हिंदू धर्म में मान्यता है कि जिस स्थान पर भगवान श्री राम की पूजा की जाती है, उस स्थान पर रामायण जी की आरती (Ramayan Ji Ki Aarti) करने से भगवान श्री राम एवं माता सीता के साथ – साथ भगवान हनुमान जी का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है|

महर्षि वाल्मीकि जी के द्वारा रचित रामायण एवं रामचरितमानस का जाप करने से पूर्ण रामायण जी की पूजा व आरती का जाप करना अनिवार्य होता है| कहा जाता है कि रामायण जी की आरती करने से हनुमान जी की विशेष कृपा प्राप्त होती है एवं हृदय को शांति भी मिलती है तो आइये जाप करते है इस रामायण जी की आरती का हिंदी में|

रामायण जी की आरती

इसके अतिरिक्त आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे काल सर्प दोष पूजा (Kaal Sarp Dosh Puja), रुद्राभिषेक पूजा (Rudrabhishek Puja), तथा गृह प्रवेश पूजा (Griha Pravesh Puja) के लिए हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

रामायण जी की आरती – Ramayan Ji Ki Aarti in Hindi

|| रामायण जी की आरती ||

आरती श्री रामायण जी की ।
कीरति कलित ललित सिय पी की ॥
गावत ब्रहमादिक मुनि नारद ।
बाल्मीकि बिग्यान बिसारद ॥
शुक सनकादिक शेष अरु शारद ।
बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥
॥ आरती श्री रामायण जी की..॥

गावत बेद पुरान अष्टदस ।
छओं शास्त्र सब ग्रंथन को रस ॥
मुनि जन धन संतान को सरबस ।
सार अंश सम्मत सब ही की ॥
॥ आरती श्री रामायण जी की..॥

गावत संतत शंभु भवानी ।
अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी ।
कागभुशुंडि गरुड़ के ही की ॥
॥ आरती श्री रामायण जी की..॥

कलिमल हरनि बिषय रस फीकी ।
सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ॥
दलनि रोग भव मूरि अमी की ।
तात मातु सब बिधि तुलसी की ॥

आरती श्री रामायण जी की ।
कीरति कलित ललित सिय पी की ॥

रामायण जी की आरती

Ramayan Ji Ki Aarti in English: आरती श्री रामायण जी की

|| Ramayan Ji Ki Aarti ||

Aarti Shri Ramayan Ji Ki ।
Keerti kalit lalit Sia Pi ki ।।
Gaavat Brahmadik muni Narad ।
Valmiki vigyaan bisarad ।।
Shuk Sanakadik Shesh aru Sharad ।
Barani Pavansut keerti neeki ।।
Aarti Shri Ramayan Ji ki…।।

Gaavat Ved Puran Ashtadas ।
Chhao Shastra sab granthon ko ras ।।
Muni jan dhan santan ko sarbas ।
Saar ansh sammat sab hi ki ।।
Aarti Shri Ramayan Ji ki…।।

Gaavat santat Shambhu Bhavani ।
Aru Ghatsambhav muni vigyaani ।।
Vyas adi kabivarj bakhaani ।
Kagbhushundi Garud ke hi ki ।।
Aarti Shri Ramayan Ji ki…।।

Kalimal harani vishay ras feeki ।
Subhag singar mukti jubati ki ।।

Dalani rog bhav moori ami ki ।
Taat maat sab vidhi Tulsi ki ।।

Aarti Shri Ramayan Ji ki ।
Keerti kalit lalit Sia Pi ki ।।

आदित्य हृदय स्तोत्र: सम्पूर्ण पाठ हिंदी अर्थ सहित

आदित्य हृदय स्तोत्र: सनातन धर्म वर्तमान में सबसे अधिक वृद्धि करने वाला धर्म है| इस धर्म में सभी देवी – देवताओं के साथ ही प्रकृति में उपस्थित सभी चीज़ों को पूजनीय योग्य माना जाता है| इसके अलावा भी हिन्दू धर्म में सभी देवी – देवताओं को प्रसन्न करने के लिए प्रत्येक के लिए कोई ना कोई मंत्र, चालीसा, व अनेक प्रकार के पाठों का निर्माण किया गया|

जैसे कि हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए हनुमान चालीसा और भगवान श्री राम को प्रसन्न करने के रामायण का पाठ किया जाता है| उसी प्रकार जिस स्तोत्र के बारे में हम बात करेंगे| इसे भगवान सूर्य देव को प्रसन्न करने के निर्मित किया गया था| इसका नाम आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ है|

आदित्य हृदय स्तोत्र

हिन्दू धर्म की मान्यता के अनुसार अपनी कुंडली में सूर्य ग्रह को मजबूत करने के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र (Aditya Hridaya Stotra in Hindi) पाठ को सबसे बेहतर माना गया है| इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करने पर यह मनुष्य के जीवन में से सभी नकारात्मक प्रभाव होते है और सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाता है|

इससे जातक के जीवन में पूर्व से भिन्न प्रभाव देखने को मिलते है| इस पाठ करने से भक्तों को बहुत अधिक लाभ होता है| माना जाता है कि यह पाठ वाल्मीकि जी द्वारा लिखी हुई रामायण के युद्धकाण्ड का एक सौ पांचवां सर्ग है|

ऐसा कहा जाता है कि रामायण में जब भगवान श्री राम रावण से युद्ध करने से जा रहे थे| तब वहां उपस्थित ऋषि अगस्त्य ने उन्हें इस स्तोत्र का पाठ करने के लिये कहा| आदित्य हृदय स्तोत्र की रचना ऋषि अगस्त्य के द्वारा ही की गई थी|

भगवान सूर्य देव को समर्पित यह आदित्य हृदय स्तोत्र मनुष्य के भीतर शक्ति, ऊर्जा और बुद्धि का संचार करता है| आदित्य हृदय स्तोत्र के बारे में और अच्छे जानने के लिए इस लेख को पूरा पढ़े| 

आदित्य हृदय स्तोत्र क्या है ?

यह आदित्य हृदय स्तोत्र (Aditya Hridaya Stotra in Hindi) भगवान सूर्य देव को समर्पित किया गया है| हिन्दू धर्म में सूर्य देव को प्रसन्न करने व जातक की कुंडली में से सूर्य देव के प्रभाव को कम करने के लिए किया जाता है| आदित्य हृदय स्तोत्र के बारे में उल्लेख वाल्मीकि जी के द्वारा लिखी रामायण में मिलता है|

जिसमे माना जाता है कि इस स्तोत्र के बारे में ऋषि अगस्त्य ने भगवान श्री राम को बताया था| जिसकी सहायता से वह रावण पर विजय प्राप्त कर पाए| हिन्दू धर्म में आदित्य हृदय स्तोत्र को पढना काफी लाभकारी माना गया है| इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने मात्र से ही मनुष्य के सभी पाप, कष्ट और दुख सभी तुरंत नष्ट हो जाते है|



ज्योतिषशास्त्र में भी आदित्य हृदय स्तोत्र को बहुत ही बड़ा महत्व दिया गया है| माना जाता है कि इस आदित्य हृदय स्तोत्र का सुबह नियमित से पाठ करने से मनुष्य के सभी कष्ट और दर्द दूर हो जाते है| क्योंकि जैसा हमने आपको बताया कि यह आदित्य हृदय स्तोत्र भगवान सूर्य देव को समर्पित किया गया है और सूर्य देव को सभी ग्रहों का राजा या अधिपति के रूप में भी जाना जाता है|

इसलिए जिस भी व्यक्ति की कुंडली में सूर्य ग्रह का प्रभाव बहुत अधिक है| उन लोगों को इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए| 

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ – Aditya Hridaya Stotra in Hindi

विनियोग:

ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टूपछन्द:, आदित्येहृदयभूतो भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोग: || 

ध्यानम् – 

नमस्सवित्रे जगदेक चक्षुसे,
जगत्प्रसूति स्थिति नाशहेतवे,
त्रयीमयाय त्रिगुणात्म धारिणे,
विरिश्ची नारायण शंकररात्मने ||

|| अथ आदित्य हृदय स्तोत्रम ||

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम् ।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम् ||
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम् ।
उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा ||

अर्थ – इधर भगवान श्री राम थककर चिंता में लीन हुए रणभूमि में खड़े हुए| उसी समय रावण भी युद्ध के लिए रणभूमि में आ गया| यह सब देखकर ऋषि अगस्त्य भगवान श्री राम के समीप गए और ऐसे बोले| 

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम् ।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे ॥
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम् ||

अर्थ – सभी के हृदय में बसने वाले हे महाबाहो श्री राम! यह गोपनीय स्तोत्र सुनो| इस चमत्कारी स्तोत्र के जप करने से तुम अवश्य ही अपने शत्रु पर विजय पा लोगे| यह आदित्य हृदय स्तोत्र सबसे पवित्र और सभी शत्रुओं का नाश करने वाला स्तोत्र है| इसका जप करने से हमेशा ही विजय की प्राप्ति होती है| यह अत्यंत ही कल्याणकारी स्तोत्र है| 

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम् ॥
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम् ।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम् ॥ 

अर्थ – यह स्तोत्र सभी कार्यो में मंगल, पापों का नाश करने वाला है| इसी के साथ यह चिंता और शौक को भी दूर करता है और मनुष्य की आयु में भी वृद्धि करता है| जो कि अनंत किरणों से शोभायमान, नित्य उदय होने वाली, देवों और असुरों के द्वारा नमस्कृत है| तुम इस सम्पूर्ण विश्व में प्रकाश फ़ैलाने वाले संसार के स्वामी भगवान सूर्य देव का पूजन करो| 

सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः ।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः ॥
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः ।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः ॥ 

अर्थ – महर्षि अगस्त्य कहते है कि सभी देवता इनके रूप है| सूर्य देव अपने प्रकाश की किरणों से इस जगत को स्फूर्ति प्रदान करते है| सूर्यदेव ही अपनी ऊर्जा के माध्यम से ही इस सृष्टि में देवतागण और असुरों दोनों का पालन करते है| यही है जो ब्रह्मा, स्कन्द, शिव, इंद्र, कुबेर, प्रजापति, समय, काल, यम, चंद्रमा और वरुण आदि को प्रकट करते है|

आदित्य हृदय स्तोत्र

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः ।
वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः ॥
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान् ।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः॥  

अर्थ – यह पितरों, वसु, साध्य, अश्विनीकुमारों, मरूदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण और ऋतुओं को जन्म देने वाले प्रभा के पुंज है| इनको अलग – अलग नामों से जैसे – आदित्य, सविता(जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य(सर्व व्याप्त), खग, पूषा, गभस्तिमान, भानु, हिरण्येता, दिवाकर और 

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान् ।
तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान् ॥
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः ।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः ॥ 

अर्थ – हरिदश्व, सहस्रार्चि, सप्तसप्ति (सात घोड़ो वाले), मरिचिमान(किरणों से सुशोभित), तिमिरोमन्थन(अंधकार का नाश करने वाले), शम्भू, त्वष्टा, मार्तन्डक, हिरण्यगर्भ, शिशिर(स्वभाव से सुख प्रदान करने वाले), तपन(गर्मी उत्पन्न करने वाले),  भास्कर, रवि, अग्निगर्भ, अदितिपुत्र, शंख, शीत का नाश करने वाले और 

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः ।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥
आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः ।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः ॥ 

अर्थ – व्योमनाथ, तमभेदी, ऋग ,यजु और सामवेद के पारगामी, धन वृष्टि, अपाम मित्र, विन्ध्यावीथिप्लवंग (आकाश में तीव्र गति से चलने वाले), आतपी, मंडली, मृत्यु, पिंगल, सर्वतापन, कवि, विश्व, महातेजस्वी, रक्त, सर्वभवोदभव है|

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः ।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते ॥
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः ।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः ॥  

अर्थ – नक्षत्र, ग्रह और तारों के अधिपति, विश्वभावन (विश्व की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी तेजस्वी और द्वादशात्मा को नमस्कार है| पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरी अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है| ज्योतिर्गणों के स्वामी तथा दिन के अधिपति को नमस्कार है|



जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः ।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः ॥
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः ।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तुते ॥ 

अर्थ – जो जय के रूप है, विजय के रूप है, हरे रंग के घोड़ों से युक्त रथ वाले भगवान को नमस्कार है| सहस्त्रों किरणों से प्रभावान आदित्य को बारम्बार नमस्कार है| उग्र, वीर और सारंग भगवान सूर्यदेव को नमस्कार है| कमलों को विकसित करने वाले प्रचंड तेज वाले मार्तण्ड को नमन है| 

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायदित्यवर्चसे ।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः ॥
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥ 

अर्थ – आप ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के स्वामी है| सूर आपकी संज्ञा है| यह सूर्यमंडल आपका ही तेज है| आप प्रकाश से परिपूर्ण है| सबको स्वाहा: करने वाली अग्नि के स्वरूप है| रौद्र रूप आपको नमस्कार है| अज्ञान, अन्धकार के नाशक, शीत के निवारक तथा शत्रुओं के नाशक आपका रूप अप्रमेय है| 

तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे ।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥
नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः ।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः ॥ 

अर्थ – आपकी प्रभा तप्त वर्ण के समान है| आप ही हरि (अज्ञान को हरने वाले), विश्वकर्मा (संसार की रचना करने वाले), तम या अँधेरे के नाशक, प्रकाशरूप और जगत के साक्षी आपको हमारा नमस्कार है| हे रघुनन्दन, भगवान सूर्य देव ही सभी भूतों के संहार, रचना और पालन करने वाले है| यही अपनी किरणों से गर्मी और वर्षा करते है| 

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः ।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम् ||
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः || 

अर्थ – यह देव सभी भूतों में अंतर्स्थित होकर उन्हें सो जाने पर भी जागते रहते है, यही अग्निहोत्री कहलाते है| यही वेद, यज्ञ और यज्ञ से मिलने वाले फल है| यह देव सम्पूर्ण लोकों की क्रिया का फल देने वाले देव है| 

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव ॥
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम् ।
एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति ॥ 

अर्थ – इसमें महर्षि अगस्त्य भगवान श्री राम से कहते है कि राघव! किसी विपत्ति में, कष्ट में, कठिन मार्ग में तथा किसी भय के समय जो भी सूर्यदेव का कीर्तन या उन्हें याद करता है| उसे किसी भी प्रकार दुःख या पीड़ा सहन नहीं करना पड़ता है| आप एकाग्रचित होकर देवादिदेव सूर्यदेव का पूजन करो, इस आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार लगातार जप करने से आपको युद्ध में अवश्य ही विजय की प्राप्ति होगी| 

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम् ॥
एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा ।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान् ॥  

अर्थ – हे महाबाहो इस क्षण आप रावण का वध कर पायेंगे| इस प्रकार ऋषि अगस्त्य आये थे उसी प्रकार वपिस लौट गए| उस समय ऋषि अगस्त्य का यह उपदेश सुनकर महातेजस्वी भगवान श्री राम के सभी शोक दूर हो गई| प्रसन्न और प्रयत्नशील होकर |

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान् ।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान् ॥
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत् ।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत् || 

अर्थ – परम हर्षित और शुद्धचित्त होकर भगवान श्री राम ने सूर्य देव की तरफ देखा और तीन बार आदित्य हृदय स्तोत्र का जप किया| उसके पश्चात श्री राम जी ने धनुष उठाकर युद्ध के लिए आये हुए रावण को देखा और उससे युद्ध करने का निश्चय किया| 

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः ।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति || 

अर्थ – तब सभी देवताओं के बीच में खड़े भगवान सूर्य देव ने प्रसन्न होकर भगवान श्री राम की तरफ देखा और राक्षस रावण का अंत का समय निकट जानकार प्रसन्नता पूर्वक कहा “अब जल्दी करो” 

|| इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मिकिये आदिकाव्ये युद्धकाण्डे पस्चाधिक शततम सर्ग: || 

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ की विधि

  • सूर्यदेव की पूजा करने के लिए सूर्योदय से पहले उठकर स्नान आदि करें| इसके बाद भगवान सूर्य देव के दर्शन करते हुए ॐ घृणि सूर्याय नमः, इस मंत्र का जप करते – करते भगवान सूर्य देव को जल अर्पित करना चाहिए| 
  • सूर्य देव को जल चढ़ाते समय गायत्री मंत्र का भी जाप किया जा सकता है और इसके अलावा सूर्यदेव के समीप आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए| 
  • इस पाठ को शुक्ल पक्ष के रविवार को पढना अत्यंत शुभ माना जाता है| इस दिन यह पाठ करने भक्तों की सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है| 
  • इसका पाठ का सम्पूर्ण लाभ पाने के लिए आपको यह पाठ नित्य रूप से सूर्योदय के समय ही करना अच्छा माना गया है|

आदित्य हृदय स्तोत्र

  • इस पाठ के समाप्त होने के पश्चात आपको भगवान सूर्य देव का ध्यान करना चाहिए और उनसे प्रार्थना करनी चाहिए| 
  • अगर यह पाठ किसी जातक के लिए प्रतिदिन करना संभव नहीं है तो वह इस पाठ को प्रत्येक रविवार के दिन पढ़ सकते है| 
  • आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करते समय इस बात का ध्यान रखें कि जब भी आप यह पाठ करे तो उस दिन मांसाहारी भोजन व तेल से बना भोजन खाने से बचे| अगर हो सके तो इस दिन नमक का सेवन करने से भी बचना चाहिए|

आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ से लाभ

  • जो भी व्यक्ति आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ नियमित रूप से जाप करता है तो उस व्यक्ति के आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और वह व्यक्ति अपने कार्यक्षेत्र में भी अच्छा प्रदर्शन करता है| 
  • यदि किसी भी व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी है तो उस व्यक्ति को आदित्य हृदय स्तोत्र का नियमित रूप से या प्रत्येक रविवार को पाठ करना चाहिए|
  • आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने लोगों के मन से भय दूर होता है और सभी प्रकार के नकारात्मक विचारों से मुक्ति मिलती है|
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  • सरकारी विवादों के मामले में भी आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से बहुत ही जल्दी लाभ मिलता है| और प्रशासनिक अधिकारियों का सहयोग भी मिलता है| 
  • भगवान सूर्य देव को पिता का कारक भी माना गया है| आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ करने से पुत्र और पिता के संबंध अच्छे होते है| 

निष्कर्ष

किसी भी तरह की पूजा करने के लिए हमें बहुत सारी तैयारियां करनी होती है| गावों में पूजा आसानी से हो जाती है लेकिन शहरों में लोगों के पास समय की कमी होती है| जिस वजह से वह लोग पूजा नहीं करवा पाते है तो उनकी इस समस्या का समाधान हम लेकर आये है 99Pandit के साथ| यह सबसे बेहतरीन प्लेटफार्म है जिससे आप किसी पूजा के लिए ऑनलाइन पंडित जी को बुक कर सकते है|



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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ करने से क्या होता है ?

A.इस आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ नियमित रूप से करने पर यह मनुष्य के जीवन में से सभी नकारात्मक प्रभाव होते है और सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाता है|

Q.आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कब करना चाहिए ?

A.इस पाठ को शुक्ल पक्ष के रविवार को पढना अत्यंत शुभ माना जाता है| इस दिन यह पाठ करने भक्तों की सभी मनोकामनाए पूर्ण होती है|

Q.आदित्य हृदय स्तोत्र किसने दिया था?

A.आदित्य हृदय स्तोत्र की रचना ऋषि अगस्त्य के द्वारा ही की गई थी| 

Q.आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ कितनी बार करना चाहिए ?

A.इस पाठ को प्रतिदिन 1 बार अवश्य करना चाहिए| इससे सूर्य देव का आशीर्वाद मिलता है|

Bhojan Mantra in Hindi: भोजन मंत्र क्या है एवं भोजन करने के नियम

भोजन मंत्र: हिंदू धर्म की परंपराओं के अनुसार भोजन करने से पहले तथा भोजन करने के बाद कुछ नियमों के बारे में बताया गया है| पौराणिक समय में लोग भोजन करने से पूर्व एवं भोजन करने के बाद इन नियमों का पालन करते थे|

परन्तु आज के समय में भोजन के नियमों का पालन करना तो दूर, लोगों के पास सही समय पर खाना खाने का वक्त भी नहीं होता है| धार्मिक ग्रंथों में इस बारे में बताया गया है कि अन्न में माता अन्नपूर्णा का वास होता है|

इस कारण हमेशा भोजन करने से पहले माता अन्नपूर्णा को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए| इसलिए भोजन करने से पूर्व भोजन मंत्र का जाप करना चाहिए| ऐसा करने से हम माता अन्नपूर्णा के प्रति सम्मान को प्रकट करते है| भोजन करने से पूर्व भोजन मंत्र (Bhojan Mantra Lyrics) का जाप करने से माता अन्नपूर्णा बहुत ही प्रसन्न होती है|

भोजन मंत्र

भोजन मंत्र का जाप करने के पश्चात किया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक होता है| आज इस लेख के माध्यम से हम आपको भोजन मंत्र, भोजन मंत्र का हिंदी अर्थ एवं भोजन के नियमों के बारे में बताएँगे|

इसके अतिरिक्त आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे रुद्राभिषेक पूजा (Rudrabhishek Puja), विवाह पूजा (Marriage Puja), तथा ऋण मुक्ति पूजा (Rin Mukti Puja) के लिए हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

भोजन मंत्र लिरिक्स- Bhojan Mantra Lyrics in Hindi

अन्न ग्रहण करने से पहले
विचार मन मे करना है
किस हेतु से इस शरीर का
रक्षण पोषण करना है
हे परमेश्वर एक प्रार्थना
नित्य तुम्हारे चरणों में
लग जाये तन मन धन मेरा
विश्व धर्म की सेवा में ॥

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना।।

ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु।
मा विद्‌विषावहै॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

भोजन मंत्र

Bhojan Mantra Lyrics in Hindi – ॐ सह नाववतु।

Ann grahan karne se pehle
Vichar man me karna hai
Kis hetu se is Shareer ka
Rakshan Poshan karna hai
Hey Parameshwar ek Prarthana
Nitya tumhare charnon mein
Lag jaye tan man dhan mera
Vishva dharm ki seva mein.

Brahmarpanam brahmahavirbrahmagnau brahmana hutam.
Brahmaiva tena gantavyam brahmakarma samadhina.

Om Sah navavatu.
Sah nau bhunaktu.
Sah veeryam karavavahai.
Tejasvina vadheetamastu.
Ma Vidvishavahai.
Om shanti: shanti: shanti:

भोजन करने के कुछ महत्वपूर्ण नियम – Some Important Rules for Eating

  • सर्वप्रथम भोजन करने से पूर्व शरीर के पांच अंगों (2 हाथ, 2 पैर और मुंह) को धोकर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए|
  • भोजन प्रारम्भ करने से पहले अन्नपूर्णा माता का ध्यान करते हुए “सभी भूखों को भोजन प्राप्त हो” ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए|
  • जो व्यक्ति भोजन बनाने वाला है उसे स्नान करके शुद्ध मन से एवं मंत्र का जाप करते हुए ही भोजन बनाना चाहिए एवं सबसे पहले 3 रोटियां कुत्ते, गाय और कौवे के अलग निकालकर ही परिजनों को भोजन परोसना चाहिए|
  • भोजन हमेशा परिवार के सभी सदस्यों को साथ मिलकर ही करना चाहिए| कहा जाता है कि अलग – अलग भोजन करने से परिवार के सदस्यों में कभी भी प्रेम एवं एकता बढ़ नही पाती है|
  • भोजन को उत्तर एवं पूर्व दिशा की ओर मुख रखकर ही करना चाहिए| पश्चिम दिशा की ओर मुख रखकर भोजन करने रोगों में वृद्धि होती है तथा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया हुआ भोजन प्रेतों को प्राप्त होता है|

निष्कर्ष

हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि भोजन करने से पहले भोजन मंत्र का जाप करना मनुष्यों के लिए बहुत ही लाभकारी साबित होता है| भोजन को हमेशा हाथ – मुंह धोकर ही खाना चाहिए|

माना जाता है कि भोजन मंत्र से हमारे शरीर को विभिन्न प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है| पूर्ण विधि विधान के साथ तथा भोजन मंत्र का जाप करके भोजन करने से हमे इसका दुगना फल प्राप्त होता है|

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Veer Hanumana Ati Balwana Bhajan: वीर हनुमाना अति बलवाना भजन

वीर हनुमाना अति बलवाना भजन (Veer Hanumana Ati Balwana) हनुमान जी का सबसे प्रिय और बहुत अधिक गाया जाने वाला भजन है| इस वीर हनुमाना अति बलवाना भजन का गान करने से भगवान हनुमान जी अपने भक्तों से प्रसन्न होते है एवं भक्तों की सभी परेशानियों को दूर करके उन्हें अपना आशीर्वाद प्रदान करते है|

वीर हनुमाना अति बलवाना एक बहुत ही अद्भूत एवं मनमोहक भजन है| इस भजन के माध्यम से भगवान हनुमान जी की वीरता तथा प्रभु श्री राम के प्रति उनकी भक्ति को दर्शाया गया है तो आइये गान करते है वीर हनुमाना अति बलवाना लिखित भजन का|

वीर हनुमाना अति बलवाना

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वीर हनुमाना अति बलवाना भजन हिंदी में – Veer Hanumana Ati Balwana Bhajan in Hindi

वीर हनुमाना अति बलवाना,
राम नाम रसियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
वीर हनुमाना अति बलवाना,
राम नाम रसियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।

जो कोई आवे, अरज लगावे,
सबकी सुनियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
जो कोई आवे, अरज लगावे,
सबकी सुनियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
॥ वीर हनुमाना अति बलवाना…॥

बजरंग बाला फेरू थारी माला,
संकट हरियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
बजरंग बाला फेरू थारी माला,
संकट हरियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
॥ वीर हनुमाना अति बलवाना…॥

ना कोई संगी, हाथ की तंगी,
जल्दी हरियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
ना कोई सांगी, हांत की तंगी,
जल्दी हरियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
॥ वीर हनुमाना अति बलवाना…॥

अर्जी हमारी, मर्ज़ी तुम्हारी,
कृपा करियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
अर्जी हमारी, मर्ज़ी तुम्हारी,
कृपा करियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
॥ वीर हनुमाना अति बलवाना…॥

रामजी का प्यारा, सिया का दुलारा,
संकट हरियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
रामजी का प्यारा, सिया का दुलारा,
संकट हरियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
॥ वीर हनुमाना अति बलवाना…॥

वीर हनुमाना अति बलवाना,
राम नाम रसियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।
वीर हनुमाना अति बलवाना,
राम नाम रसियो रे,
प्रभु मन बसियो रे ।

वीर हनुमाना अति बलवाना

Veer Hanumana Ati Balwana Bhajan in English – वीर हनुमाना अति बलवाना

Veer Hanumana ati balvana,
Ram naam rasiyo re,
Prabhu man basiyo re.
Veer Hanumana ati balvana,
Ram naam rasiyo re,
Prabhu man basiyo re.

Jo koi aave, arj lagaave,
Sabki suniyo re,
Prabhu man basiyo re.
Jo koi aave, arj lagaave,
Sabki suniyo re,
Prabhu man basiyo re.
॥ Veer Hanumana ati balvana ॥

Bajrang bala feru thaari mala,
Sankat hariyo re,
Prabhu man basiyo re.
Bajrang bala feru thaari mala,
Sankat hariyo re,
Prabhu man basiyo re.
॥ Veer Hanumana ati balvana ॥

Na koi sangi, haath ki tangi,
Jaldi hariyo re,
Prabhu man basiyo re.
Na koi saangi, haant ki tangi,
Jaldi hariyo re,
Prabhu man basiyo re.
॥ Veer Hanumana ati balvana ॥

Arzi hamaari, marzi tumhaari,
Kripa kariyo re,
Prabhu man basiyo re.
Arzi hamaari, marzi tumhaari,
Kripa kariyo re,
Prabhu man basiyo re.
॥ Veer Hanumana ati balvana ॥

Ramji ka pyara, Siya ka dulaara,
Sankat hariyo re,
Prabhu man basiyo re.
Ramji ka pyara, Siya ka dulaara,
Sankat hariyo re,
Prabhu man basiyo re.
॥ Veer Hanumana ati balvana ॥

Veer Hanumana ati balvana,
Ram naam rasiyo re,
Prabhu man basiyo re.
Veer Hanumana ati balvana,
Ram naam rasiyo re,
Prabhu man basiyo re.

Panchmukhi Hanuman Kavach in Hindi: पंचमुखी हनुमान कवच

भगवान हनुमान जी के इस पंचमुखी हनुमान कवच (Panchmukhi Hanuman Kavach) को बहुत ही शक्तिशाली एवं प्रभावशाली माना जाता है| इस पंचमुखी हनुमान कवच का नियमित रूप से पाठ करने से मनुष्य सदा के लिए विजयी हो जाता है|

यह भी माना जाता है कि जो भक्त सच्ची श्रद्धा से इस पंचमुखी हनुमान कवच का जाप करता है, उसे किसी भी प्रकार कि बुरी शक्ति नुकसान नहीं पहुंचा सकती है| इस पंचमुखी हनुमान कवच को धारण करने से जातक पर किसी भी काले जादू एवं तांत्रिक क्रिया का कोई प्रभाव नहीं होता है तो आइये जानते है इस पंचमुखी हनुमान कवच के बारे में|

पंचमुखी हनुमान कवच

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पंचमुखी हनुमान कवच हिंदी में – Shri Panchmukhi Hanuman Kavach in Hindi

श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ श्री पञ्चवदनायाञ्जनेयाय नमः … ।

ॐ अस्य श्री
पञ्चमुखहनुमन्मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः … ।

गायत्रीछन्दः ।
पञ्चमुखविराट् हनुमान्देवता । ह्रीं बीजं … ।

श्रीं शक्तिः ।
क्रौं कीलकं । क्रूं कवचं । क्रैं अस्त्राय फट् … ।
इति दिग्बन्धः … ।

श्री गरुड उवाच ।

अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रृणुसर्वाङ्गसुन्दरि…
यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम् ।। 1।।

पञ्चवक्त्रं महाभीमं त्रिपञ्चनयनैर्युतम्…
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम् ।। 2 ।।

पूर्वं तु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम्…
दन्ष्ट्राकरालवदनं भृकुटीकुटिलेक्षणम् ।। 3 ।।

अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्…
अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम् ।। 4 ।।

पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम्…

सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम् ।। 5 ।।

उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम्…
पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम् ।। 6 ।।

ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम् …
येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यं महासुरम् ।। 7 ।।

जघान शरणं तत्स्यात्सर्वशत्रुहरं परम् …
ध्यात्वा पञ्चमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम् ।। 8 ।।

खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशमङ्कुशपर्वतम्…
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम् ।। 9 ।।

भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुङ्गवम् …
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम् ।। 10 ।।

प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम्…
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।। 11 ।।

सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद्विश्वतोमुखम्
पञ्चास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं
शशाङ्कशिखरं कपिराजवर्यम
पीताम्बरादिमुकुटैरूपशोभिताङ्गं
पिङ्गाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ।। 12 ।।

मर्कटेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम् …
शत्रु संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ।। 13 ।।

ॐ हरिमर्कट मर्कट मन्त्रमिदं
परिलिख्यति लिख्यति वामतले…
यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं
यदि मुञ्चति मुञ्चति वामलता ।। 14 ।।

ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय पूर्वकपिमुखाय
सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय
नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय पश्चिममुखाय गरुडाननाय
सकलविषहराय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनायोत्तरमुखायादिवराहाय
सकलसम्पत्कराय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनायोर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय
सकलजनवशङ्कराय स्वाहा ।

ॐ अस्य श्री पञ्चमुखहनुमन्मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र
ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । पञ्चमुखवीरहनुमान् देवता ।

हनुमानिति बीजम् । वायुपुत्र इति शक्तिः । अञ्जनीसुत इति कीलकम् ।
श्रीरामदूतहनुमत्प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
इति ऋष्यादिकं विन्यसेत् ।

ॐ अञ्जनीसुताय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ अग्निगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ पञ्चमुखहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ।

ॐ अञ्जनीसुताय हृदयाय नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुपुत्राय शिखायै वषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय कवचाय हुम् ।
ॐ रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ पञ्चमुखहनुमते अस्त्राय फट् ।
पञ्चमुखहनुमते स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।

पंचमुखी हनुमान कवच

अथ ध्यानम् ।

वन्दे वानरनारसिंहखगराट्क्रोडाश्ववक्त्रान्वितं
दिव्यालङ्करणं त्रिपञ्चनयनं देदीप्यमानं रुचा
हस्ताब्जैरसिखेटपुस्तकसुधाकुम्भाङ्कुशाद्रिं हलं
खट्वाङ्गं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिवीरापहम् ।

अथ मन्त्रः ।

ॐ श्रीरामदूतायाञ्जनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्रमाय
सीतादुःखनिवारणाय लङ्कादहनकारणाय महाबलप्रचण्डाय
फाल्गुनसखाय कोलाहलसकलब्रह्माण्डविश्वरूपाय
सप्तसमुद्रनिर्लङ्घनाय पिङ्गलनयनायामितविक्रमाय
सूर्यबिम्बफलसेवनाय दुष्टनिवारणाय दृष्टिनिरालङ्कृताय
सञ्जीविनीसञ्जीविताङ्गदलक्ष्मणमहाकपिसैन्यप्राणदाय
दशकण्ठविध्वंसनाय रामेष्टाय महाफाल्गुनसखाय सीतासहित-
रामवरप्रदाय षट्प्रयोगागमपञ्चमुखवीरहनुमन्मन्त्रजपे विनियोगः ।।

ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बंबंबंबंबं वौषट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फंफंफंफंफं फट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेंखेंखेंखेंखें मारणाय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धंधंधंधंधं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा ।
ॐ टंटंटंटंटं कूर्ममूर्तये पञ्चमुखवीरहनुमते
परयन्त्रपरतन्त्रोच्चाटनाय स्वाहा ।।

ॐ कंखंगंघंङं चंछंजंझंञं टंठंडंढंणं
तंथंदंधंनं पंफंबंभंमं यंरंलंवं शंषंसंहं
ळंक्षं स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।

ॐ पूर्वकपिमुखाय पञ्चमुखहनुमते टंटंटंटंटं
सकलशत्रुसंहरणाय स्वाहा ।

ॐ दक्षिणमुखाय पञ्चमुखहनुमते करालवदनाय नरसिंहाय
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः सकलभूतप्रेतदमनाय स्वाहा ।
ॐ पश्चिममुखाय गरुडाननाय पञ्चमुखहनुमते मंमंमंमंमं
सकलविषहराय स्वाहा ।

ॐ उत्तरमुखायादिवराहाय लंलंलंलंलं नृसिंहाय नीलकण्ठमूर्तये
पञ्चमुखहनुमते स्वाहा ।

ॐ उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुंरुंरुंरुंरुं रुद्रमूर्तये
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ।

ॐ अञ्जनीसुताय वायुपुत्राय महाबलाय सीताशोकनिवारणाय
श्रीरामचन्द्रकृपापादुकाय महावीर्यप्रमथनाय ब्रह्माण्डनाथाय
कामदाय पञ्चमुखवीरहनुमते स्वाहा ।

भूतप्रेतपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिन्यन्तरिक्षग्रह-
परयन्त्रपरतन्त्रोच्चटनाय स्वाहा ।
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय पञ्चमुखवीरहनुमते
श्रीरामचन्द्रवरप्रसादाय जंजंजंजंजं स्वाहा ।
इदं कवचं पठित्वा तु महाकवचं पठेन्नरः ।
एकवारं जपेत्स्तोत्रं सर्वशत्रुनिवारणम् ।। 15 ।।

द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ।
त्रिवारं च पठेन्नित्यं सर्वसम्पत्करं शुभम् ।। 16 ।।

चतुर्वारं पठेन्नित्यं सर्वरोगनिवारणम् ।
पञ्चवारं पठेन्नित्यं सर्वलोकवशङ्करम् ।। 17 ।।

षड्वारं च पठेन्नित्यं सर्वदेववशङ्करम् ।
सप्तवारं पठेन्नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम् ।। 18 ।।

अष्टवारं पठेन्नित्यमिष्टकामार्थसिद्धिदम् ।
नववारं पठेन्नित्यं राजभोगमवाप्नुयात् ।। 19 ।।

दशवारं पठेन्नित्यं त्रैलोक्यज्ञानदर्शनम् ।
रुद्रावृत्तिं पठेन्नित्यं सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ।। 20 ।।

निर्बलो रोगयुक्तश्च महाव्याध्यादिपीडितः ।
कवचस्मरणेनैव महाबलमवाप्नुयात् ।। 21 ।।

।। इति श्रीसुदर्शनसंहितायां श्रीरामचन्द्रसीताप्रोक्तं
श्रीपञ्चमुखहनुमत्कवचं सम्पूर्णम् ।।

Hey Dukh Bhanjan Lyrics: भजन – हे दुःख भंजन, मारुती नंदन

हे दुःख भंजन (Hey Dukh Bhanjan Lyrics) भजन का गान पवन पुत्र श्री हनुमान जी को प्रसन्न करने के एवं उनकी स्तुति करने के लिए किया जाता है| इस भजन (हे दुःख भंजन) का गान करने से भगवान हनुमान जी अपने भक्तों से प्रसन्न होते है एवं उन्हें आशीर्वाद भी देते है|

हे दुःख भंजन भजन पूर्ण रूप से भगवान हनुमान जी को ही समर्पित किया जाता है जो भी भक्त सच्चे दिल से इस भजन को गाते है, हनुमान जी उनके जीवन की बाधाओं को दूर कर उनकी समस्त मनोकामनाएं पूर्ण करते है| तो आइये गान करते है इस हनुमान जी के भजन का|

हे दुःख भंजन भजन

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हे दुःख भंजन, मारुती नंदन भजन हिंदी में – Hey Dukh Bhanjan Lyrics in Hindi

हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन,
सुन लो मेरी पुकार ।
पवनसुत विनती बारम्बार ॥

हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन,
सुन लो मेरी पुकार ।
पवनसुत विनती बारम्बार ॥

अष्ट सिद्धि, नव निधि के दाता,
दुखिओं के तुम भाग्यविधाता ।
सियाराम के काज सवारे,
मेरा करो उद्धार ॥
पवनसुत विनती बारम्बार ।

हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन,
सुन लो मेरी पुकार ।
पवनसुत विनती बारम्बार ॥

अपरम्पार है शक्ति तुम्हारी,
तुम पर रीझे अवधबिहारी ।
भक्तिभाव से ध्याऊं तोहे,
कर दुखों से पार ॥
पवनसुत विनती बारम्बार ।

हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन,
सुन लो मेरी पुकार ।
पवनसुत विनती बारम्बार ॥

जपूँ निरंतर नाम तिहरा,
अब नहीं छोडूं तेरा द्वारा ।
रामभक्त मोहे शरण मे लीजे,
भाव सागर से तार ॥
पवनसुत विनती बारम्बार ।

हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन,
सुन लो मेरी पुकार ।
पवनसुत विनती बारम्बार ॥

हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन,
सुन लो मेरी पुकार ।
पवनसुत विनती बारम्बार ॥

हे दुःख भंजन

Hey Dukh Bhanjan Lyrics in English – हे दुःख भन्जन, मारुती नंदन

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan,
Sun lo meri pukar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan,
Sun lo meri pukar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Asht Sidhi, Nav Nidhi ke data,
Dukhiyon ke tum bhagyavidhata
Siya-Ram ke kaaj saware,
Mera karo uddhar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan,
Sun lo meri pukar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Aprampar hai shakti tumhari,
Tum par rijhe awadh-bihari
Bhakti Bhav se dhyaun tohe,
Kar dukhon se paar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan,
Sun lo meri pukar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Japun nirantar naam tihaara,
Ab nahi chhodoon tera dwaara
Ram-bhakt mohe sharan me leejey,
Bhav sagar se taar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan,
Sun lo meri pukar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Hey Dukh Bhanjan, Maruti Nandan,
Sun lo meri pukar
Pavan-sut vinati baarmbaar

Kaal Bhairav Ashtakam Lyrics: काल भैरव अष्टकम संस्कृत में

भगवान काल भैरव की अराधना करने के लिए इस काल भैरव अष्टकम (Kaal Bhairav Ashtakam) का जाप भक्तों के द्वारा किया जाता है| काल भैरव जी को भगवान शिव का अवतार भी माना जाता है| भगवान काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए उनके सभी भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ उनकी पूजा तथा साथ ही काल भैरव अष्टकम (Kaal Bhairav Ashtakam) का भी जाप करते है|

जो भी भक्त मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली काल भैरव जयंती के दिन इस काल भैरव अष्टकम (Kaal Bhairav Ashtakam) का पाठ करते है, उनसे भगवान भैरव जी बहुत ही प्रसन्न होते है तो आइये पाठ करते है इस काल भैरव अष्टकम (Kaal Bhairav Ashtakam) का|

काल भैरव अष्टकम

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काल भैरव अष्टकम संस्कृत में – Kaal Bhairav Ashtakam Lyrics in Sanskrit

|| काल भैरव अष्टकम ||

देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं
व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।

नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं|
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥1॥

भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं
नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्।

कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥2॥

शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्।

भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥3॥

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।

विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥4॥

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं
कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।

स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥5॥

रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं
नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम्।

मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥6॥

अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं
दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्।

अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥7॥

भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं
काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्।

नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥8॥

काल भैरव अष्टकम

Kaal Bhairav Ashtakam Lyrics in English – देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं

|| Kaal Bhairav Ashtakam ||

Deva raja sevyamaan pavananghri pankajam
Vyaala yajna sutramindu sekharam kripaakaram।

Naradadi yogi vrinda vanditam digamabaram|
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥1॥

Bhaanu koti bhaasvaram bhavaabdhitaarakam param
Neela kanthamipsitartha dayakam trilochanam।

Kaalkaalamambujaakshamakshashoolamaksharam
Kashika puradhinaatha kalabhairavam bhaje॥2॥

Shoola tanka pasa danda panimadi karanam
Shyama kayamadi devamaksharam niramayam।

Bhimavikramam Prabhum Vichitra tandava priyam
Kashika Puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥3॥

Bhukti mukti dayakam prashasta chaaru vigraham
Bhakta vatsalam sthitam samasta loka vigraham।

Vinikvananmanojna hemakingeeni lasatkatiṁ
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥4॥

Dharma setu palakam tvadharma maarga nashakam
Karma paasha mochakam susharma daayakam vibhum।

Swarna varna shesha paasha shobhitaanga mandalam
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥5॥

Ratna paaduka prabhaabhi rama pada yugmakam
Nityamadvitīyamishta daivatam niranjanam।

Mrityu darpa naashanam karala damṣhṭra mokshanam
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥6॥

Atta haasa bhinna padmajaanda kosa santatim
Drishti paata naṣta papajalamugra shasanam।

Ashta siddhi daayakam kapala malika dharam
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥7॥

Bhuta sangha nayakam vishala kirti daayakam
Kasi vaasa loka puṇya paapa shodhakam vibhum।

Neeti marga kovidam puratnam jagatpatim
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥8॥