Hanuman Vadvanal Stotra Lyrics in Hindi: श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र

इस हनुमान वडवानल स्तोत्र (Hanuman Vadvanal Stotra Lyrics) का जाप हनुमान जी की स्तुति करने के लिए किया जाता है| माना जाता है कि देवो के अतिरिक्त धरती पर केवल विभीषण ही थे, जिन्होंने हनुमान जी की शरण ली तथा उनकी स्तुति की|

रावण के भाई विभीषण को भी हनुमान जी की भांति ही अमरता का वरदान प्राप्त था अर्थात वे आज भी इस धरती पर निवास करते है| विभीषण जी ने ही श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र की रचना की थी| तो आइये जानते है इस श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र के बारे में|

हनुमान वडवानल स्तोत्र

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Hanuman Vadvanal Stotra Lyrics: मनोजवं मारुततुल्य वेगं जितेन्द्रियं

|| श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र ||

|| विनियोग ||

ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः !
श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं !!
मम समस्त विघ्न-दोष-निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे ॥

सकल-राज-कुल-संमोहनार्थे, मम समस्त-रोग-प्रशमनार्थम् !
आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त-पाप-क्षयार्थं !!
श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये ॥

|| ध्यान ||

मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं !
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम !
सकल-दिङ्मण्डल-यशोवितान-धवलीकृत-जगत-त्रितय ॥

वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र !
उदधि-बंधन दशशिरः कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र ॥

अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार !
सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार-ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद ॥

सर्व-पाप-ग्रह-वारण-सर्व-ज्वरोच्चाटन डाकिनी-शाकिनी-विध्वंसन !
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दुःख निवारणाय ॥

ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन !
भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर ॥

हनुमान वडवानल स्तोत्र

चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर !
माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस !!
भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते !
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हां ॥

ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं !
ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां ॥

शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर !
आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय ॥

शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय !
प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन !
परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु ॥

शिरः-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय !
नागपाशानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोटकालियान् !!
यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते !
राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र ॥

पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय !
नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा ॥

|| इति श्री विभीषणकृतं हनुमद् वडवानल स्तोत्रं सम्पूर्णम ||

Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Ja Lyrics: खुश होंगे हनुमान राम राम किये जा भजन

यह भजन “खुश होंगे हनुमान राम राम किये जा” भगवान हनुमान जी की स्तुति करने के लिए गाया जाता है| आपकी जानकारी के लिए बता दे कि यह हनुमान जी का बहुत ही प्रसिद्ध भजन है| इस भजन को मशहूर भजन गायक लखबीर सिंह लक्खा जी के द्वारा गया है| लखबीर सिंह लक्खा जी ने इसके अतिरिक्त भी अन्य कई भजन गाए है किन्तु यह भजन “खुश होंगे हनुमान राम राम किये जा” उनका सबसे प्रसिद्ध भजन है|

इस भजन में लखबीर सिंह लक्खा जी ने प्रभु श्री राम के प्रति हनुमान जी की भक्ति का वर्णन किया है| तो आइये गान करते है इस अद्भुत भजन “खुश होंगे हनुमान राम राम किये जा” का|

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Hanuman Ji Bhajan Lyrics in Hindi – खुश होंगे हनुमान राम राम किये जा भजन हिंदी में

|| खुश होंगे हनुमान राम राम किये जा ||

सुबह शाम आठो याम
यहीं नाम लिए जा |
खुश होंगे हनुमान
राम राम किए जा ||

लिखा था राम नाम वो
पत्थर भी तर गए |
किए राम से जो बैर
जीते जी वो मर गए ||

बस नाम का रसपान
ए इंसान किए जा |
खुश होंगे हनुमान
राम राम किए जा ||

राम नाम की धुन पे नाचे
हो कर के मतवाला |
बजरंगी सा इस दुनिया में
कोई ना देखा भाला ||

जो भी हनुमत के दर पे आता
उसका संकट टाला |
मुख में राम, तन में राम
जपे राम राम की माला ||

जहाँ राम का कीर्तन
वही हनुमान जति हो |
गोदी में गणपति को लें
शिव पार्वती हो ||

सियाराम की कृपा से
सौ साल जिए जा |
खुश होंगे हनुमान
राम राम किए जा ||

जिसपे दया श्री राम की
बांका ना बाल हो |
उसका सहाई लक्खा
अंजनी का लाल हो ||

राजपाल तू हर हाल में
जयकार किए जा |
खुश होंगे हनुमान
राम राम किए जा ||

सुबह शाम आठो याम
यहीं नाम लिए जा |
खुश होंगे हनुमान
राम राम किए जा ||

खुश होंगे हनुमान राम राम किये जा

Hanuman Ji Bhajan Lyrics in English – हनुमान जी भजन लिरिक्स

|| Khush Honge Hanuman Ram Ram Kiye Ja ||

Subah shaam aatho yaam
Yahi naam liye jaa
Khush honge Hanuman
Ram Ram kiye jaa ||

Likha tha Ram naam wo
Patthar bhi tar gaye
Kiye Ram se jo bair
Jeete ji wo mar gaye ||

Bas naam ka rasapaan
Ae insaan kiye jaa
Khush honge Hanuman
Ram Ram kiye jaa ||

Ram naam ki dhun pe naache
Ho karke matwala
Bajrangi sa is duniya mein
Koi na dekha bhala ||

Jo bhi Hanumat ke dar pe aata
Uska sankat taala
Mukh mein Ram, tan mein Ram
Jape Ram Ram ki mala ||

Jahan Ram ka kirtan
Wahin Hanuman jati ho
Godi mein Ganpati ko le
Shiv Parvati ho ||

Siyaram ki kripa se
Sau saal jiye ja
Khush honge Hanuman
Ram Ram kiye ja ||

Jispe daya Shri Ram ki
Banka na baal ho
Uska sahaayi Lakkh
Anjani ka laal ho ||

Rajpal tu har haal mein
Jaykaar kiye ja
Khush honge Hanuman
Ram Ram kiye ja ||

Subah shaam aatho yaam
Yahi naam liye jaa
Khush honge Hanuman
Ram Ram kiye ja ||

Gajendra Moksha Stotram Lyrics: श्री विष्णु (गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र)

Gajendra Moksha Stotram: गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम एक पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की आराधना के लिए उपयोग किया जाता है और इसे गजेंद्र मोक्ष के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार अलग-अलग मंत्र और स्त्रोत का जाप करते है जिससे उनके घरों में सुख शांति आती है, और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

मन्त्रों और स्तोत्रों का उच्चारण करने से सभी परेशानियों से भी छुटकारा मिलता है। मन्त्रों का जाप वास्तव में मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है और कई पापों से मुक्ति दिलाकर मनोकामनाओं को पूरा भी करता है। जब बात आती है स्तोत्र के जाप की तो कई ऐसे मन्त्र और स्तोत्र गीता में बताए हैं जिनसे घर की आर्थिक समस्या भी सही हो जाती है।

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

इन्ही स्तोत्रों में से एक है गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र यानी हाथी को मुक्ति दिलाने वाला स्त्रोत का जाप करना। हमारे हिंदू पुराणों के अनुसार इस स्तोत्र का नियमित जाप करने से एक व्यक्ति को कर्ज से मुक्ति मिलती है और मन की शांति भी प्राप्त होती है। साथ ही किसी भी संकट से मुक्ति मिलती है।

यह स्रोत हिंदू धर्म के प्रथम ग्रंथ ”श्रीमद्भगवद गीता” के द्वतीय (दूसरे), तृतीय (तीसरे) और चतुर्थ (चौथे) अध्याय में गजेंद्र स्तोत्र को वर्णित किया गया है। इस गजेंद्र मोक्ष स्रोत में कुल 33 श्लोक दिए गए हैं। इस स्तोत्र में हाथी (गजेंद्र) और मगरमच्छ (मकर) के साथ हुए युद्ध का वर्णन किया गया है। आइए जानें गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का जाप करने के फायदों के बारे में।

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गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र की कथा- Story of Gajendra Moksha Stotra

इस स्तोत्र में एक हाथी (गजेंद्र) और मगरमच्छ (मकर) के बीच हुए युद्ध की कहानी है। इस कहानी में एक हाथी अपने संपूर्ण परिवार के साथ जंगल में सेर कर रहा था और जब उसे बहुत प्यास लगने लगती है तब वो सरोवर के किनारे पानी पीने पहुंच जाता है। सरोवर में कमल के फूल देखकर हाथी जल क्रीड़ा करने पहुंच जाता है। इतने में एक मगरमच्छ उस हाथी का पैर पकड़ लेता है और छोड़ता नहीं है।

हाथी के सभी परिवार वाले उसे बाहर निकालने की कोशिश करते हैं और अंत में वहीं छोड़कर चले जाते हैं। हाथी बाहर आने की कोशिश करता है, परंतु मगरमच्छ (मकर) उसका पैर नहीं छोड़ता है। जब हाथी (गजेंद्र) पूरी तरह से डूबने लगता है।

तब उसने परम पूज्य श्रीहरि यानी भगवान विष्णु को पुकारते हुए उनकी जो स्तुति की थी वही गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के नाम से जानी जाती है। इस स्तुति को सुनकर भगवान् विष्णु वहां उस हक़ की रक्षा करने पहुँच गए और गज की रक्षा की। तभी ये ये स्तोत्र सभी तरह के संकटों से मुक्ति के मार्ग दिखाता है।

सरल भाषा में समझा जाये तो गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम की कथा एक हाथी के बारे में है, जो एक सरोवर में रहता था। एक दिन, एक मगरमच्छ ने उस हाथी को पकड़ लिया और उसे अपने पंजे में जकड़ लिया। हाथी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की और उन्हें अपनी स्थिति से बचाने के लिए कहा। भगवान विष्णु ने हाथी की प्रार्थना सुनी और उसे मगरमच्छ के पंजे से मुक्त किया।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र- Gajendra Moksha Stotram Lyrics and Meaning In Hindi

यह स्रोत हिंदू धर्म के प्रथम ग्रंथ ”श्रीमद्भगवद गीता” के द्वतीय (दूसरे), तृतीय (तीसरे) और चतुर्थ (चौथे) अध्याय में गजेंद्र स्तोत्र को वर्णित किया गया है। इस गजेंद्र मोक्ष स्रोत में कुल 33 श्लोक दिए गए हैं। इस स्तोत्र में हाथी और मगरमच्छ के साथ हुए युद्ध का वर्णन किया गया है।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम का अर्थ है “हाथी की मुक्ति”। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की शक्ति और कृपा को दर्शाता है, जो अपने भक्तों को किसी भी संकट से मुक्त करते हैं।

श्रीमद्भागवतान्तर्गतगजेन्द्र कृत भगवान का स्तवन
श्री शुक उवाच
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम॥ 1॥

अर्थ – शुक्र जी ने कहा, बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदयदेश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्वजन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार-बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्रका मन-ही-मन पाठ करने लगा ॥ 1॥

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥ 2 ॥

अर्थ– गजेंद्र ने मन ही मन श्री हरी को ध्यान करते हुए कहा कि, जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतनता को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन की भाँति व्यहार करने लगते हैं (चेतन बन जाते हैं), ॐ ‘ओम्’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सभी शरीरों में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन-ही-मन नमन करते हैं ॥ 2 ॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम॥ 3 ॥

अर्थ– जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे निकला है, जिन्होंने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं- फिर भी जो इस दृश्य जगत्से एवं उसकी कारण भूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने-आप – बिना किसी कारण के बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूँ। ॥3 ॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितंक्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम।
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षतेस आत्ममूलोवतु मां परात्परः॥ 4 ॥

अर्थ– अपनी संकल्प-शक्ति के द्वारा अपने ही रूप में रचे बेस हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र-प्रसिद्ध कार्य-कारण रूप जगत्‌ को जो अकुण्ठित-दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं – उनसे लिप्त नहीं होते. वे चक्षु आदि प्रकाश के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥4॥

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशोलोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु।
तमस्तदाऽऽऽसीद गहनं गभीरंयस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः। ॥ 5 ॥

अर्थ– समय के प्रवाह से संपूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादी लोकपालों के पञ्चभूतों में प्रवेश कर जाने पर तथा पञ्चभूतों से लेकर महत्तत्त्वपर्यन्त सम्पूर्ण कारणों के उनकी परम कारणरूपा प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्जेय तथा अपार अन्धकार रूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अन्धकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान् सब ओर प्रकाशित रहते हैं, वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥ 5 ॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुर्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतोदुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥ 6 ॥

अर्थ– भिन्न-भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नहीं जान पाते, उसी प्रकार सत्त्वप्रधान देवता अथवा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नहीं जानते, फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है- वे दुर्गम चरित्रवाले प्रभु मेरी रक्षा करें ।॥ 6 ॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलमविमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वनेभूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः॥ 7 ॥

अर्थ– आसक्ति से सर्वथा छूटे हुए, सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले, सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु-स्वभाव मुनिगण जिनके परम मङ्गलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रहकर अखण्ड ब्रह्मचर्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते है, वे प्रभु ही मेरी गति है। ॥ 7 ॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वान नाम रूपे गुणदोष एव वा।
तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यःस्वमायया तान्युलाकमृच्छति॥ 8 ॥

अर्थ– वह जिनका हमारी जिनका हमारी तरह कर्मवश न तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी जो समय के अनुसार जगत्‌ की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वयं की इच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥ 8 ॥

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेऽनन्तशक्तये।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे॥ 9 ॥

अर्थ– उस अनंत शक्ति वाले परम ब्रह्मा परमेश्वर को नमस्कार है। उन प्राकृत आकार रहित एवं अनेकों आकार वाले अद्भुतकर्मा भगवान्‌ को बार-बार नमस्कार है ॥ 9 ॥

नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि॥10 ॥

अर्थ– स्वयं प्रकाशित सभी साक्ष्य परमेश्वर को मेरा शत् शत् नमन है। वैसे देव जो नम, वाणी और चित्तवृतियों से परे हैं उन्हें मेरा बारंबार नमस्कार है। ॥ 10 ॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥ 11॥

अर्थ– विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुण विशिष्ट निवृत्ति धर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष-सुख के देने वाले तथा मोक्ष-सुख की अनुभूतिरूप प्रभु को नमस्कार है ॥ 11 ॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥ 12 ॥

अर्थ– सभी गुणों के स्वीकार शांत, रजोगुण को स्वीकार करके घोर एवं तमोगुण को अपनाकर मूढ से प्रतीत होने वाले, बिना भेद के और हमेशा सद्भाव से ज्ञानधनी प्रभु को मेरा नमस्कार है। ॥ 12 ॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः॥13 ॥

अर्थ– शरीर, इन्द्रिय आदि के समुदायरूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षीरूप आपको नमस्कार है। सबके अन्तर्यामी, प्रकृति के भी परम कारण, किंतु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥ 13 ॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः॥14 ॥

अर्थ– सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, रामस्त प्रतीतियों के कारणरूप, सम्पूर्ण जड-प्रपञ्च एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥ 14 ॥

नमो नमस्ते खिल कारणायनिष्कारणायद्भुत कारणाय।
सर्वागमान्मायमहार्णवायनमोपवर्गाय परायणाय॥15 ॥

अर्थ– सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है। सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य, मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को निमस्कार है। ॥ 15 ॥

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपायतत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि॥ 16 ॥

अर्थ– जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानमय अग्नि है, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य-वृत्ति जाग्रत् हो जाती है तथा आत्मतत्त्व की भावना के द्वारा विधि-निषेधरूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित रहते हैं, उन प्रभु को मैं नमन करता हूँ ॥ 16 ॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणायमुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥17 ॥

अर्थ– मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीव की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्यधिक दयालु एवं दया करने में कभी आलस्य न करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है। अपने अंश से सम्पूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्वनियन्ता अनन्त परमात्मा आपको नमस्कार है ॥ 17 ॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैर्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभावितायज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय॥18 ॥

अर्थ– जो घर, पुत्र, शरीर ,मित्र, और संपत्ति सहित कुटुंबियों में अशक्त लोगों के द्वारा कठिनाई से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप, सर्वसमर्थ भगवान्‌ को नमस्कार है ॥ 18 ॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामाभजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययंकरोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम॥19 ॥

अर्थ– वह जिन्हें धर्म, अभिलषित भोग, धन और मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं, अपितु जो उन्हें अन्य प्रन्कार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं, वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्तिसे सदाके लिये उबार लें ॥ 19 ॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थवांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलंगायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः॥ 20 ॥

अर्थ– वह जिनके अनन्य भक्त – जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान्‌ के ही शरण हैं – धर्म, अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नहीं चाहते, अपितु उन्होंके परम मङ्गलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्दक समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥ 20 ॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम।
अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥ 21 ॥

अर्थ– उन ब्रह्मादि, सर्वव्यापी, सर्वमान्य,अविनाशी के भी नियामक, अभक्तों के लिए भी हमेशा प्रकट होने वाले, भक्तियोग से प्राप्त, बहुत पास होने पर भी माया के कारण बहुत दूर महसूस होने वाले, इन्द्रियों के द्वारा अगम्य और अत्यंत दुर्विज्ञेय, अंतरहित लेकिन सभी के आदिकारक और सभी तरफ से परिपूर्ण उस भगवान् की मैं स्तुति करता हूँ। ॥ 21 ॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः॥ 22 ॥

अर्थ– वो जो ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा सम्पूर्ण चराचर जीव नाम और आकृतिके भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥ 22 ॥

यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयोनिर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः।
तथा यतोयं गुणसंप्रवाहोबुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥ 23 ॥

अर्थ– जिस प्रकार जलती हुई अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार-बार निकलती हैं और पुनः अपने कारण में लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर – यह गुणमय प्रपञ्च जिन स्वयम्प्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्हीं में लीन हो जाता है ॥ 23 ॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंगन स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासननिषेधशेषो जयतादशेषः॥ 24 ॥

अर्थ– वह भगवान जो भगवान् वास्तव में न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य है न तिर्यक् (मनुष्य से नीची – पशु, पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी हैं। न वे स्त्री हैं न पुरुष और न नपुंसक ही हैं। न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश न हो सके। न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही। सबका निषेध हो जानेपर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है। ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिए आविर्भूत हों। ॥24॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवस्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम॥ 25 ॥

अर्थ– अब मैं इस मगरमच्छ के चंगुल से छूटकर जीवित रहना नहीं चाहता, क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओर से अज्ञान के द्वारा ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है। मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका काल क्रम से अपने-आप नाश नहीं होता, अपितु भगवान्‌ की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥ 25 ॥

सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम॥ 26 ॥

अर्थ– इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मै विश्व के रचयिता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मारूप से अजन्मा, व्याप्त, प्राप्तव्य एवं सर्वव्यापक वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान्‌ को केवल प्रणाम ही करता हूँ – उनकी शरण में हूँ ॥ 26 ॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम॥ 27 ॥

अर्थ– वह जिन्होंने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे बोगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हें प्रकट हुआ देखते है, उन योगेश्वर भगवान्‌ को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ 27 ॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तयेकदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने॥ 28॥

अर्थ– जिनकी सत्त्व-रज-तमरूप (त्रिगुणात्मक) शक्तियों का रागरूप वेग और असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे है, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची-पची रहती हैं- ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असम्भव है, उन शरणागत रक्षक एवं अपार शक्तिशाली आपको बार-बार नमस्कार है ॥ 28 ॥

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम॥ 29 ॥

अर्थ– वह जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नहीं पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान्‌ की मै शरण आया हूँ ॥ 29 ॥

श्री शुकदेव उवाच
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषंब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वाततत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत॥ 30 ॥

अर्थ– श्री शुकदेव जी कहते हैं कि, जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान्‌ के भेदर हित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था, उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नहीं आये, जो भिन्न-भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब साक्षात् श्रीहरि – जो सबके आत्मा होने के कारण दिवस्वरूप हैं- वहाँ परकट हो गये। ॥ 30 ॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासःस्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि:।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमानश्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः॥ 31 ॥

अर्थ– उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुखी देखकर तथा उसके द्वारा पढ़ी हुई स्तुति को सुनकर सुदर्शन चक्रधारी जगदाधार भगवान् इच्छानुरूप वेग वाले गरुड़ जी की पीठ पर सवार हो स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थानपर पहुँच गये, जहाँ वह हाथी था ॥ 31 ॥

सोऽन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छान्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते॥ 32 ॥

अर्थ– सरोवर के अंदर महाबलशाली मगरमच्छ द्वारा जकड़े और दुखी उस हाथी ने आसमान में गरुड़ की पीठ पर बैठे और हाथों में चक्र लिए भगवान् विष्णु को आते हुए अपनी सूँड़ को- जिसमें उसने [पूजाके लिये] कमल का एक फूल ले रक्खा था- ऊपर उठाया और बड़ी ही कठिनता से ‘सर्वपूज्य भगवान् नारायण ! आपको प्रणाम है’, यह वाक्य कहा ॥ 32 ॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्यसग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार।
ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रंसम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम॥ 33 ॥

अर्थ– लाचार हाथी को देखकर श्री हरी विष्णु, गरुड़ से नीचे उतरकर सरोवर में उतर आये और बेहद दुखी होकर ग्राह सहित उस गज को तुरंत ही सरोवर से बहार निकाल आये और देखते ही देखते अपने चक्र से मगरमच्छ के गर्दन को काट दिए और हाथी को उस पीड़ा से बहार निकाल लिया।॥33॥

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम के लाभ- Benefits of Gajendra Moksha Stotra

इस स्तोत्र के नियमित जाप से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम के नियमित जाप से व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
  • इस स्रोत को नियमित करने से संकटों से मुक्ति मिलती है।
  • व्यक्ति को ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होता है।
  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम के नियमित जाप से व्यक्ति का स्वास्थ्य और समृद्धि में वृद्धि होती है।
  • जाप करने से नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है।
  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम के नियमित जाप से घर परिवार में ख़ुशहाली बनी रहती है और सभी परिवारजान भी सुखी रहते है। 
  •  इस स्तोत्र का नियमित जाप करने से एक व्यक्ति को कर्ज से मुक्ति मिलती है और मन की शांति भी प्राप्त होती है। साथ ही किसी भी संकट से मुक्ति मिलती है।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का जाप करने के नियम- Rules Of Chanting Gajendra Moksha Stotra

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम का जाप करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • स्तोत्र का जाप सुबह या शाम को करना चाहिए।
  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का जाप करने से पहले स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र पहनना चाहिए।
  • स्तोत्र का जाप करते समय ध्यान केंद्रित रखना चाहिए और मन को शांत रखना चाहिए।
  • जाप के दौरान भगवान विष्णु की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठना चाहिए।

निष्कर्ष

गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत एक पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करता है। इस स्तोत्र में गजेंद्र ने भगवान की शरण में आकर अपने जीवन को बचाने के लिए प्रार्थना की है।

इस स्तोत्र के माध्यम से, हमें भगवान की महिमा और उनकी शक्ति का पता चलता है। भगवान विष्णु सारे संसार के आधार हैं, जिन्होंने इस संसार को बनाया है और जो प्रकृति का स्वरूप हैं। गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत हमें यह भी सिखाता है कि भगवान की शरण में आकर हम अपने जीवन को बचा सकते हैं। भगवान हमारी रक्षा करते हैं और हमें संकटों से बचाते हैं।

इस स्तोत्र का पाठ करने से हमें भगवान के प्रति श्रद्धा और विश्वास बढ़ता है, और हमें अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन करने में मदद मिलती है। गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत एक पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो हमें भगवान की महिमा का वर्णन करता है और हमें उनकी शरण में आकर अपने जीवन को बचाने के लिए प्रेरित करता है।

Sapta Chiranjeevi Mantra Lyrics: सप्त चिरंजीवी मंत्र हिंदी अर्थ सहित

सप्त चिरंजीवी मंत्र (Sapta Chiranjeevi Mantra) एक शक्तिशाली और पवित्र मंत्र है जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित आठ अमर व्यक्तियों की आराधना के लिए उपयोग किया जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, हम सभी के बीच ऐसे आठ व्यक्ति मौजूद है जो युगों से अभी तक जीवित है।

आपने भी कभी न कभी बड़े बुजुर्गों के मुँह से इन चिरंजीवियों के बारे में सुना होगा और सप्त चिरंजीवी मंत्र भी सुना होगा। तो आज हम जानते है इस सप्त चिरंजीवी मंत्र और उसके पीछे के अर्थ के बारे में। पुराणों के अनुसार पृथ्वी पर ऐसे आठ व्यक्ति हैं, जो चिरंजीवी हैं। यह सब किसी न किसी वरदान या अभिशाप की देंन है और यह सभी चिरंजीवी वचनों से बंधे हुए हैं। यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र

योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियां इनमें विद्यमान है। सनातन धर्म में सप्त चिरंजीवी को पृथ्वी के सात महामानव कहा गया है, क्योंकि इन आठ व्यक्तियों के अलावा किसी भी व्यक्ति के पास अमरता का वरदान नहीं है।

इन आठ व्यक्तियों को सप्त चिरंजीवी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “सात अमर व्यक्ति”।जिसमें अश्वत्थामा, महाबलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, और परशुराम शामिल है। इनके साथ ही आठवें चिरंजीवी के रूप में ऋषि मार्कण्डेय भी शामिल है। इस मंत्र का महत्व यह है कि यह व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है, साथ ही साथ स्वास्थ्य, धन, और समृद्धि भी प्राप्त होती है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र क्या है ?- What is Sapta Chiranjeevi Mantra?

सप्त चिरंजीवी मंत्र एक शक्तिशाली और पवित्र मंत्र है जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित आठ अमर व्यक्तियों की आराधना के लिए उपयोग किया जाता है। यह मंत्र व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति, स्वास्थ्य, धन, और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है। सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित किया जाता है।

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः ।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः ॥1

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम् ।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित ॥2

अर्थ– अश्वत्थामा, महाबलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, और परशुराम – ये सात व्यक्ति अमर हैं, चिरंजीवी हैं। [1]

यदि इन सात महापुरुषों और आठवे ऋषि मार्कण्डेय का प्रतिदिन स्मरण किया जाए तो शरीर के सारे रोग समाप्त हो जाते है और 100 वर्ष की आयु प्राप्त होती है। [2]

इस सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप प्रतिदिन करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति, स्वास्थ्य, धन, और ज्ञान प्राप्त होता है। यह मंत्र व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र जप के लाभ- Benefits of Chanting Sapta Chiranjeevi Mantra

ऐसा माना जाता है कि सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप करने से साधक को कई लाभ मिलते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इससे आध्यात्मिक विकास, आंतरिक शांति और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता बढ़ती है।

इसके अलावा, भक्त अक्सर ईश्वर के साथ गहरे संबंध और जीवन में स्पष्टता और उद्देश्य की बढ़ी हुई भावना का अनुभव करते हैं। मंत्र के कंपन मानस के माध्यम से प्रतिध्वनित होते हैं, जिससे ब्रह्मांड व्यवस्था के साथ एक समाज का भी भला होता है।

जीवन की कठिनाइयों में, जहां नकारात्मकता भरपूर मात्रा में हैं और कठिनाइयां हमारे जीवन में लिये संकल्प की परीक्षा लेती हैं, सप्त चिरंजीवी मंत्र आशा और शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा की किरण के रूप में खड़ा है।

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यह अमर सत्ताओं के कालातीत ज्ञान को समेटे हुए है तथा आध्यात्मिक पथ पर साधकों को सांत्वना और मार्गदर्शन प्रदान करता है।

जैसे-जैसे हम आत्म-खोज और उत्कर्ष की अपनी यात्रा पर आगे बढ़ रहे हैं, आइए हम इस पवित्र मंत्र की परिवर्तनकारी शक्ति का उपयोग करें और अपने भीतर सुप्त दिव्यता को जागृत करें।

यह ध्यान में रखना चाहिए की मंत्र का वास्तविक सार केवल शब्दों का उच्चारण करने में नहीं, बल्कि उसके उच्चारण में निहित है, भक्ति की गहराई और दिल की ईमानदारी में।

प्रत्येक अक्षर की ध्वनि में, हम सप्त चिरंजीवी मंत्रा से सन्निहित शाश्वत सत्यों के साथ एकता प्राप्त करें, तथा उनका आशीर्वाद हमारे ज्ञानोदय के मार्ग को प्रकाशित करे।

सप्त चिरंजीवी मंत्र के जाप करने से एक व्यक्ति को कई लाभ होते हैं, जिनमें से कुछ लाभ इस प्रकार हैं:

  • ध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त होता है।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • धन और समृद्धि प्राप्त होती है।
  • नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित किया जाता है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र के जाप के नियम

इस मंत्र के जाप के नियम लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए –

  • इस मंत्र का जाप हर रोज सुबह और शाम को करना चाहिए।
  • जाप करने से पहले स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र पहनना चाहिए।
  •  जाप करते समय ध्यान केंद्रित रखना चाहिए और मन को शांत रखना चाहिए।
  •  जाप के दौरान भगवान की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठना चाहिए।
  •  जाप करने के बाद प्रार्थना करनी चाहिए और भगवान को धन्यवाद देना चाहिए।

सप्त चिरंजीवी मंत्र में बताये गए चिरंजीवी कौन है?- Who are the Chiranjeevis mentioned in Sapta Chiranjeevi Mantra?

1. अश्वत्थामा

महाभारत का उल्लेख बिना अश्वत्थामा के अधूरा है जो गुरु द्रोण के पुत्र थे। अश्वत्थामा जो 11 रुद्र अवतारों में से एक थे। अश्वत्थामा को भी अमरता का वरदान प्राप्त हुआ था। गुरु द्रोण पुत्र की कामना करते थे और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की, जिन्होंने उन्हें पुत्र प्रदान किया।

अश्वत्थामा के माथे पर एक मणि थी जो उसे मनुष्यों से नीचे की किसी भी प्राणी के से सुरक्षा प्रदान करती थी, और हथियारों, भूख, और बीमारियों से उसे प्रतिरक्षा देती थी। लेकिन जैसे-जैसे अश्वत्थामा बड़े हुए वे दुर्योधन के मित्र बन गए और सत्ता की प्यास से प्रेरित होकर महाभारत में कौरवों का पक्ष लिया। कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान उनकी भावनाओं से प्रेरित होकर की गई कार्यवाहियों के कारण कई ग़लतियां हुई। उन्होंने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा पर आक्रमण किया जो गर्भवती थी

उन्हें दंडित करने के लिए भगवान कृष्ण ने अश्वत्थामा के माथे से मणि को हटा दिया और उन्हें श्राप दिया कि उनकी चोट कभी ठीक नहीं होगी। उनके पूरे शरीर को कोड से ग्रस्त कर दिया, जो मवाद और घावों से भरा रहेगा इसके अलावा भगवान कृष्ण ने आदेश दिया कि अश्वत्थामा अपने जीवन में दुखों से गुज़रेगा और उसकी स्थिति के कारण कोई भी उसे मदद नहीं करेगा या उसे भोजन या आश्रय प्रदान नहीं करेगा।

2. महाबली

महाबली, जिन्हें बली के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में एक प्रसिद्ध दानव रहा है। वे तीन लोकों के शासक है। इन्द्रदेव,जो देवताओं के राजा है, बली की सर्वोच्चता से ईर्ष्यालु और अहंकारी हो गए।

दुखी होकर इन्द्र महाबली को हराने के लिए भगवान विष्णु की शरण ली। इंद्र की प्रार्थना का जवाब देते हुए भगवान विष्णु ने वामन रूप में अवतार लिया। बली के पास पहुंचकर वामन ने विनम्रतापूर्वक 4 कदमों में जितनी भूमि उन्हें मिल सके उतनी भूमि मांगी।

सप्त चिरंजीवी मंत्र

बली ने वामन की क़द-काठी को कम समझते हुए तुरंत सहमति दे दी। केवल 3 कदमों में वामन ने पूरे तीन लोकों को समाहित कर दिया। चूंकि बली ने 4 कदमों का वादा किया था, उसके पास देने के लिए कोई भूमि नहीं बची। जब उनसे चौथे क़दम के बारे में पूछा गया तो बली ने अपनी निष्ठा से अपने सिर को अर्पण कर दिया।

बली की सच्ची निष्ठा से प्रेरित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अमरता का वरदान दिया। हालाँकि उन्हें पाताल लोक में निर्वासित कर दिया गया था। बली को हर साल एक बार अपने प्रजा मिलने का आशीर्वाद मिला, इस मुलाक़ात का त्योहार ओनम के रूप में मनाया जाता है।

3. ऋषि व्यास

हम हर साल गुरु पूर्णिमा मनाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। पराशर और सत्यवती के पुत्र वेदव्यास, जो महाभारत के लेखक हैं बुद्धिमत्ता यान ओ दृष्टि का प्रतिक है। संस्कृत में वेदव्यास का अर्थ है, वह जो वेदों का वर्गीकरण करता है। वेदव्यास को भगवान विष्णु के अवतार में से एक माना जाता है ।

विष्णु पुराण के अनुसार हर युग में वेदों के संकलनकर्ता को वेदव्यास की उपाधि दी जाती है । और महर्षि वेदव्यास 24वे है। ऐसा माना जाता है कि वेदव्यास ने तीन युवकों को देखा है। वे त्रेतायुग के अंत में पैदा हुए थे। द्वापर-युग की पूरी अवधि देखी, और कलियुग के शुरुआती दिनों में जीवित रहे। इस अवधि के बाद उनका भाग्य रहस्यमय हो गया।

कई लोग मानते हैं कि वेदव्यास कभी मरे ही नहीं और अब भी अमर है। कुछ यह भी सुझाव देते हैं कि दुनिया की हिंसा और बुराई से निराश होकर वेदव्यास उत्तरी भारत के एक छोटे से गाँव में चले गए जहाँ वे अब भी निवास करते हैं।

4. हनुमान

जैसे अश्वत्थामा महाभारत के एक महान पात्र हैं, वैसे ही हनुमान रामायण के सबसे बहादुर नायक हैं। भगवान राम के सच्चे भक्त हनुमान का भाग्य था कि वे उनके साथ ही रहे। जब रावण ने माता सीता का अपहरण किया और उन्हें अपने साथ लंका लेके आया, तो भगवान राम बहुत दुखी थे। क्योंकि लंका दूर थी और यात्रा कठिन थी। हालाँकि हनुमान ने अपनी उड़ान की क्षमता के साथ इस कठिन यात्रा को सफलतापूर्वक पूरा किया। और माता सीता को रावण के महल के अशोक वाटिका में पाया।

हनुमान ने कैसे अमरता प्राप्त की इसके बारे में कई सिद्धांत थे, कुछ शास्त्रों के अनुसार जब हनुमान ने माता सीता को ढूंढा और उन्हें बताया कि वह भगवान राम के मित्र हैं, तो माता सीता ने अपनी खुशी और आभार में उन्हें अमरता का वरदान दिया।

इसके अतिरिक्त जब रामायण के पात्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ तो हनुमान ने देवताओं से अनुरोध किया कि वे उन्हें पृथ्वी पर रहने दें जब तक भगवान राम का नाम गाया जाता रहे। इसलिए आज भी जब सच्चे भक्त भगवान राम का नाम जपते हैं तो हनुमान को उपस्थित माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी राम कथा का आयोजन होता है तो हनुमान सबसे पहले पहुँचते हैं, और सबसे और सबसे बाद में जाते हैं।

एक अन्य सिद्धांत के अनुसार रावण को हराने के बाद लोगों ने हनुमान से उनकी भगवान राम के प्रति निष्ठा साबित करने को कहा। जवाब में हनुमान ने अपने सीने को फाड़ कर दिखाया कि भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण उनके दिल में निवास करते हैं। हनुमान के प्रेम और सच्ची निष्ठा से प्रभावित होकर भगवान राम ने उन्हें अमरता का वरदान दिया।

5. विभीषण

क्या आप रामायण के दो प्रसिद्ध भाइयों को जानते हैं, रावण और विभीषण। जहां रावण को सत्ता, लालच, और धोखे ने बर्बाद कर दिया, वहीं विभीषण अपनी ईमानदारी और अच्छाई के कारण अमर हो गए। विभीषण, रावण के छोटेभाई थे।

जब रावण ने माता सीता का अपहरण किया और उसे लंका लाया तो सबसे पहले विभीषण ने आवाज़ उठायी इस कार्य को अनैतिक बताते हुए। हालाँकि रावण ने उनकी सलाह को नज़रअंदाज़ कर दिया। अंततः ईमानदारी की विजय में विश्वास करते हुए विभीषण ने भगवान राम की मदद करने का निर्णय लिया। उन्होंने माता सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भगवान राम और वानर सेना की मदद की । विभीषण ने यह दिखाया कि हमेशा से ही कार्य करने का विकल्प होता है। युद्ध के बाद विभीषण को लंका का राजा बनाया गया। उन्हें अमरता का वरदान दिया गया था कि वे लंका के लोगों को वफ़ादारी, सही आचरण, और धर्म के मामलों में लगातार मार्गदर्शन कर सके।

6. कृपाचार्य

कृपाचार्य, महाभारत के महत्वपूर्ण पात्रों में से एक है और इसके कई कारण हैं। उन्होंने युवा राजकुमारों को युद्ध और युद्धकला की तकनीक सिखायी। कृपाचार्य की विशिष्टता उनकी असाधारण उत्पत्ति में निहित है।

वे मानव गर्भ से भी जन्मे थे। आश्चर्यजनक रूप से उनके जन्म का कारण उनके पिता के वीर्यं का धरती पर गिरना था, जिससे वे महाभारत के एक अद्वितीय और उल्लेखनीय पात्र बने। हालाँकि महाभारत में अन्य पात्र भी असामान्य जन्म लेते हैं।

कृपाचार्य की विशेषता उनके चरित्र और सिद्धांतों में निहित है। कृपाचार्य अपनी निष्पक्षता और निष्ठा के लिए जाने जाते थे। और किसी भी प्रकार के पक्षपात को नापसंद करते थे। कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरवों के पक्ष के निरर्थकता को समझते हुए भी वे उनके प्रति वफ़ादार बने रहे।

यह वफ़ादारी कोरवों के प्रति उनके आभार से उत्पन्न हुई जिन्होंने उन्हें जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान की थी। उनकी निष्पक्ष और धर्मयुद्ध प्रवृत्ति ने भगवान कृष्ण को प्रभावित किया जिन्होंने उन्हें अमरता का वरदान दिया।

7. भगवान परशुराम

भगवान परशुराम, भगवान विष्णु के छठे अवतार, को सबसे विनाशकारी अवतारों में से एक माना जाता है। वे अत्यधिक कुशल योद्धा है। और सभी अस्त्रों शस्त्रों और दिव्य हथियारों में पारंगत है। ब्राह्मण परिवार में जन्में परशुराम को संसार से सभी बुराईयों को हटाने के लिए प्रेरित माना जाता है ।

यह भी माना जाता है कि परशुराम अमर है और अब भी इस संसार में मौजूद हैं। कल्कि पुराण के अनुसार, कलियुग के अंत में भगवान विष्णु कल्कि के रूप में अवतरित होंगे और परशुराम एक गुरु के रूप में पुनः उभरेंगे। इस भूमिका में भी कल्कि अवतार को अस्त्रों, शस्त्रों, और दिन में हथियारों के उपयोग में मार्गदर्शन करेंगे जिस इससे वे संसार से सभी बुराइयों का उन्मूलन कर सके।

8. ऋषि मार्कण्डेय

शिव और विष्णु दोनों के भक्त, ऋषि मृकंडु, भृगु वंश के थे। मृकंदु और उनकी पत्नी मरुदमती ने शिव से पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा। उन्हें विकल्प दिया गया था कि या तो उन्हें अल्पायु पुत्र का आशीर्वाद दिया जाए, या कम बुद्धि वाले लंबे जीवन वाले बच्चे का आशीर्वाद दिया जाए। मृकंदु ने पहले विकल्प को चुना और उन्हें एक अनुकरणीय पुत्र मार्कंडेय का आशीर्वाद मिला, जिनकी 16 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई।

मार्कण्डेय शिव के बहुत बड़े भक्त थे। अपनी मृत्यु के दिन भी वह शिवलिंग की पूजा करते रहे। शिव के प्रति समर्पण के कारण, ‘मृत्यु के देवता’ यम के पास मार्कंडेय के जीवन को लेने का दिल नहीं था। तब यमराज, मार्कंडेय के प्राण लेने के लिए स्वयं आए, और युवा ऋषि के गले में अपना फंदा डाल दिया। फंदा गलती से शिवलिंग के चारों ओर उतर गया, शिव क्रोध में उभरे और यम पर हमला किया।

बाद में, शिव ने यम को पुनर्जीवित किया और उन्हें अमरता का आशीर्वाद दिया। इसलिए, शिव को कालान्तक, मृत्यु का विनाशक, के नाम से जाना जाता था। साथ ही भगवान शिव ने ऋषि मार्कंडेय को सदा ही जीवित रहने का वरदान प्रदान किया। “महामृत्युंजय मंत्र” की रचना भी ऋषि मार्कंडेय ने स्वयं ही की थी।

निष्कर्ष

सप्त चिरंजीवी मंत्र एक शक्तिशाली और पवित्र मंत्र है जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित आठ अमर व्यक्तियों की आराधना के लिए उपयोग किया जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में आठ व्यक्तियों का वर्णन है जो अमर हैं और पृथ्वी पर रहते हैं। ये व्यक्ति विभिन्न वरदानों, शापों और वचनों से बंधे हुए हैं और दिव्य शक्तियों से संपन्न हैं।

यह मंत्र व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति, स्वास्थ्य, धन, और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है। सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित किया जाता है।

इस मंत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति को अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त हो सकती है। अतः, सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए लाभदायक हो सकता है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र की महिमा और शक्ति को समझने से हमें अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद मिल सकती है। अतः, हमें इस मंत्र का नियमित जाप करना चाहिए और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

Siddha Kunjika Stotram in Hindi: माँ दुर्गा का चमत्कारी सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

माँ दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram in Hindi) का जाप करना बहुत ही लाभकारी माना जाता है| अक्टूबर के माह में नवरात्रि प्रारम्भ हो जाएगी| नवरात्रि के नौ दिनों को बहुत ही पवित्र माना जाता है इसलिए इन दिनों में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का जाप करने से भक्तों को मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है| सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को अति कल्याणकारी माना जाता है|

पौराणिक मान्यता है कि इस सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का जाप करने से मनुष्य को जीवन में चल रही समस्त परेशानियां तथा कष्टों से मुक्ति मिल जाती है| इस मंत्र में बीज समावेश होते है एवं बीज किसी भी मंत्र की शक्ति माने जाते है| कहा जाता है कि यदि आपको दुर्गा सप्तशती का पाठ करना कठिन लग रहा हो तो आप सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ कर सकते है|

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

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नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि – Siddh Kunjika Mantra Lyrics in Sanskrit

॥ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

॥ शिव उवाच ॥

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥1॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥

॥ अथ मन्त्रः ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालयज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वलहं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥

॥ इति मन्त्रः ॥

नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥2॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥5॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥6॥

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं।
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥7॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥8॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुञ्जिकाया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥

Akshay Amar Katha Lyrics: दादाजी के चमत्कारों की अक्षय अमर कथा

इस अक्षय अमर कथा का पाठ दादाजी (संत अखारामजी) की स्तुति करने के लिए किया जाता है| अक्षय अमर कथा को सुनने व इसका जाप करने से भक्तों को दादाजी का आशीर्वाद प्राप्त होता है| इस अक्षय अमर कथा में दादाजी (संत अखारामजी) के जन्म से लेकर वर्तमान तक के सभी चमत्कारों के बारे में विस्तार से बताया गया है तो आइये पाठ करते है इस अक्षय अमर कथा का|

इसी के साथ यदि आप दादाजी चालीसा [Dadaji Chalisa Lyrics], खाटू श्याम जी की आरती [Khatu Shyam Aarti Lyrics], या बजरंग बाण [Bajrang Baan Lyrics] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

अक्षय अमर कथा

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अक्षय अमर कथा हिंदी में – Akshay Amar Katha Lyrics in Hindi

|| अक्षय अमर कथा ||

श्रीगणेशजी, सरस्वतीजी, बालाजी, दादाजी, माताजी

|| सोरठा ||

प्रमथनाथ गणनाथ,प्रथम सुमिर पूजन करूं।
रिद्धि सिद्धि संगाथ, नेत्र तीन शोभा अधिक ।।

आसुतोष शिव भाल,चंद गंग संग गौरज्या।
गल मुंडन की माल,मंगलकारी सर्वदा ।।

लक्ष्मीकंत अनंत, सदा क्षीर सागर बसै।
शारद श्रीहनुमंत, कुलदेवी जगदंबिकै ।।

हे हरजी के नंद, अक्षय अमर कथा कहूं।
सब मिल करो आनंद, गुरु चरणन वंदन करूं ।।

|| मुखड़ा ||

मरुधर पावन पुण्य धाम की महिमा कहतें हैं
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को हरते हैं
पावन दादाजी नाम,जय जय परसाणा धाम

|| अंतरा ||

परसनेऊ चूरू मंडल का,एक छोटा सा ग्राम ।
ऊंचे धोरै वहां बिराजै, संत रतन अखाराम ।।

पहले धोक और दरसन है,महाबली हनुमान।
फिर दरसन दादाजी के हैं, दादा संत सुजान ।।

बदरी पीपल और खेजङी,सनमुख उगतो भान।
ऊंचे ऊंचे शिखर बने हैं, लाल सफेद निशान ।।

सांझ सबेरे आरती के शुभ, घंटे बजते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को ।।1।।

सदियों पहले इसी ग्राम में, रहते विप्र सुजान।
सदगृहस्थी संतों का सतसंग, करते थे सनमान।।

गऊ साधु सेवा में तत्पर, इष्ट राम हनुमान।
दधीचि वंश के कुलदीपक थे, श्री हरजी था नाम।।

गुणवंती लक्ष्मी सी पत्नी, शील धीर गुणवान।
गऊ ब्राह्मण निरधन दीनों को, देती वस्त्र अन्नदान।।

रघुनाथ हनुमान विप्र पर किरपा करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।2।।

भादौ कृष्ण पंचमी के दिन, उगियो सुवरण भान।
बाल रुदन तब सुणके जननी, करवाया पय पान।।

दुग्धपान करते करते ही, मुख पर थी मुसकान।
आंचल की तब ओट छुपाये, और न ले कोई जान।।

निरख निरख नित मात हरषती, कैसे करूं बखाण।
हे हनुमंता रक्षा करना, आप बङे बलवान।।

तुमने दिया है तुझ सेवा मे,अरपण करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों।।3।।

हरजी के घर पुत्र जनम, पुरवासी सुनते हैं।
परिजन पुरजन आपस मे मिल,सहज हरषतें हैं।।

मंगल गान सर्व मंगल हो,हर जन कहतें हैं।
मंगल गीत गा रहे गायक,जय जय करतें हैं।।

बंटे बधाई द्वार पिता के,झोली भरते हैं।
अन्नधन वस्त्र रजत सुवरण, पितु आज बरसते हैं।।

बुला बुला सम्मान सभी को, जी भर देते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों।।4।।

राम कृपा से श्री हरजी ने, पाई दो संतान।
पति पत्नी दोनों प्रसन्न थे, मुख पर थी मुसकान।।

नियत समय पर वेद रीत से,संस्कारों का दान।
दिया पिता ने पुत्ररत्न को, शुभ संस्कार महान।।

नामकरण संस्कार करण को,आये विप्र सुजान।
राशी नखतर सूर्य चंद्र सब,ग्रह रहे बलवान।।

बहन बेटियां परिजन पुरजन, आषिश करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।5।।

पंडितजी पंचांग देख कर ,नाम सुनाते हैं।
अक्षय नाम अमर हो जग में, यूं बतलाते हैं।।

अखाराम शुभ नाम सरल है,यह समझाते हैं।
अखा सखा हो गौवंशों का,आनंद पाते हैं।।

घुटनों के बल दौड़ दौड़, मुख मोङ दिखाते हैं।
आ महतारी गोद बैठ,जननी बहलाते हैं।।

अब रूनझुन घुंघरू की सुनने को,पैर ठुमकते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।6।।

रूनझुन की धुन सुन आंगन में, खूब विहरते हैं।
माता ने बुलवाया तो वो,दौङ निकलते हैं।।

पकङ न पाये महतारी ये,लीला रचते हैं।
झुगल्या टोपी पग पैंजनियां,हर मन जंचते हैं।।

ठुमक ठुमक चलतें हैं, नजरें तिरछी करतें हैं।
लाल लाल ओठों की शोभा, देव तरसते हैं।।

तुतलाती बोली में,जब वो राम कहतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।7।।

आठ साल के भये जनेऊ,कंधे पहनाया।
भिक्षा ले झोली भर ली,मित्रों को छिनवाया।।

पढने गये गुरु गृह गुरु ने,पढना सिखलाया।
इनका मन था राम नाम में, बाकी भुलवाया।।

राम राम मेरा मंत्र राम, हृदय में लिखवाया।
शिक्षा मेरी राम रटूं, गुरु समझ नहीं पाया।।

बङा विलक्षण बालक है,गुरु अचरज करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।8।।

त्यागी गुरुकुल की शिक्षा सब,धेनु चराते हैं।
डोली मे ले जाकर गऊयें,बंशी बजाते हैं।।

खुद ब खुद गायें चरती, सब काम भुलाते हैं।
राम राम हनुमान ध्यान की,लगन लगाते हैं।।

संग सखाओं के भोजन कर,भजन सुनाते हैं।
सांझ भये गायों को लेकर,घर लौटाते हैं।।

मंदिर मे दरसन को जाकर,सुमिरन करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।9।।

खेलन की थी उम्र सखा सब,हांक लगाते थे।
दङी गेडिया छुङा उन्हें भी,भजन सिखाते थे।।

राम ही गैंद राम ही डंडा,राम रमाते थे।
देखे राम रूप जग सारा, और मुसकाते थे।।

भोजन छोङ भजन सतसंगत, नित्य कराते थे।
जिवू बाई छोटी बहना को,कथा सुनाते थे।।

संग संग रंग भजन का,बहना को भी रंगते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।10।।

माता की आज्ञा ले अक्षय, साधु बाना धार लिया।
दिक्षा ले भगवंत गुरु से,त्याग पूरा घरबार दिया।।

डोली मे जाकर तप करते, धूणा एक धुकाय दिया।
भोजन भजन दोनों ही निशदिन,लंगर एक लगाय दिया।।

आप भजन मे मस्त रहे, भूखों को राम जिमाय रैया।
आवै सो अन्नजल पा जावै,राम रोट सब खाय रैया।।

भरा रहे भंडार धान सब,अचरज करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।11।।

डोली मे जा करी तपस्या, भूल गये घरबार।
धूप छांव सरदी गरमी चाहे,मेघ हो मूसलधार।।

भूख प्यास बिसराये मन से,वायु थी आधार।
तन तिनका सा सूख चला, पर सुध बुध दयी बिसार।।

तन परवाह कभी नहीं की थी, मन में थे करतार।
काम और क्रोध लोभ मद छोङा,त्यागा अहंकार।।

राम नाम मय तन मन होगया, राम सुमिरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।12।।

एक दिन एक संत आये थे, देखन मे बलकारी।
अलख जगाई आ धूणे पर,और करी किलकारी।।

तेज पुंज सूरज सा मुखङा, वाणी शीतल प्यारी।
बोले तुम संग भजन करेंगे, करलो तुम तैयारी।।

रैण नैण एक पलक नींद नहीं, भजन बना था भारी।
सुबह हुई सुजान संत के, चलने की तैयारी।।

बोले अखाराम मैं जाऊं, हम फिर मिलतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।13।।

इसी तरह से चला सिलसिला, नित प्रति मिलने का।
सतसंग भजन व कथा राम की,नेम न टलने का।।

रात मे रहें सुबह चले जायें, संत बङे मस्तान।
जाते कहां कहां से आते, पङी नहीं पहचान।।

बरसों बीत गये बातों में, न रहा वक्त का ज्ञान।
जटाजूट तापस काया ना,रहा देह अभिमान।।

समता भाव सुभाव मे,सुख दुख एक समझते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।14।।

अक्षय अमर कथा

एक दिन आये संत भजन कर,किया जरा विश्राम।
निकट बुलाया फिर बैठाया, सुन प्यारे अखाराम।।

तुम हो सच्चे राम भक्त और,भोले संत सुजान।
मैं प्रसन्न तुम पर हूं अक्षय, प्रकट करूं पहचान।।

रामदूत मैं पवनपूत सुन,नाम मेरा हनुमान।
प्रकट किया निज रूप कपि ने,तेज पुंज ज्यूं भान।।

इष्ट देव को देख तन मन,सुधी बिसरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।15।।

परमानंद मगन हो अक्षय, सुध बुध खो बैठे।
कभी हंसते कभी रो पङते, कभी चरण पकङ बैठे।।

कभी चलते कभी रुक रुक चलते,कभी-कभी गिर बैठे।
दौड़ दौड़ परिकम्मा करते,जय जय कर बैठे।।

बिखरी जटा ज्यूं शिव हो वस्त्र का,भान भूला बैठे।
एक लंगोटी गले जनेऊ,कपि चरणों में लेटे।।

प्रेमा भक्ति देख कपि, बाहों मे भरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।16।।

मिले हृदय से हृदय दोय जब ,सेवक स्वामी का।
बजरंगी पहचान गये घर,अवध निवासी का।।

जिस घट मे श्रीराम बिराजै, घर अविनाशी का।
मैं भी रहूं राम संग घट है,हृढ विश्वासी का।।

ज्यूं रहते शिव सदा कृपालु, वास है काशी का।
एसे वास करूं तेरे घट मे,घट सुखरासी का।।

अखाराम तेरे संग रहूंगा, वादा करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।17।।

एक अरज है मालिक मेरी, किरपा कर देना।
सगुण रूप मूरत बन सेवा, चरणों की देना।।

नित्य सबेरे सांझ आरती, एसा मन देना।
खीर चूरमा राम रोट का,भोग लगा लेना।।

तुलसी दल अर्पण करदूं, जलपान करा लेना।
संत भगत गौ पक्षी आवै,उदर पूरा देना।।

संत हृदय की इच्छा को कपि, पूरण करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।18।।

परहित सेवा की अरजी सुन, हनुमत हरषायै।
अति प्रसन्न बोले बजरंगी, मांग जो मन चाहे।।

मांग मांग वर मांग भगत, किंचित ना शरमाये।
हर इच्छा को पूरण करूंगा, हनुमत बतलाये।।

जिसको आप का दरस हुआ,क्या इच्छा रह जाये।
अष्ट सिद्धि नवनिधि वरदायक, दाता कहलाये।।

एसे मालिक आप कमी क्या, अक्षय कहते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।19।।

फिर भी आप दे रहे मालिक, दास अरज करते।
मरूधरा धोरों में स्वामी, विषधर बहुत बसते।।

किरसा ग्वाल पथिक जन खेतों में, विचरण करते।
बिच्छू सांप गोहिरा बांडी, जब चाहे डसते।।

सांझ सबेरे मुंह अंधेरे, सोते और जगते।
बना रहे भय काल सर्प का, मौत बिना मरते।।

विषधर के भय से अभय करो, ये अरजी करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।20।।

कलवाणी की कला दई,जो विष की हारक है।
जल मे खोल चिमटा, भभूती कष्ट निवारक है।।

रक्षा सूत्र में सात गांठ, तांती हितकारक है।
हृढ विश्वास राख कर बांधे, प्राण उबारक है।।

तेरा सुमिरन मेरे सुमिरन सा,फलदायक है।
दूं संकलाई अभी तुझे,हर जन सुखदायक है।।

महाबली बजरंगी शक्ति तुझमे भरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।21।।

शक्ति भारी दीन्ह कपि तब,अंतर्ध्यान हुये।
श्री विग्रह की करे प्रतीक्षा, बहु दिन बीत गये।।

एक दिन एक बलद गाडै में, मूरत एक आई।
धणीं पधारै परसाणै, मन मे खुशियां छाई।।

पूछा कौन कहां से आये, कहां मूरत पाई।
गांव बेनाथा की रोही से, बातें बतलाई।।

परसाणै पंहुचा दो मुझे, सपनें में कहतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।22।।

शुभ दिन शुभ घङी वार मुहूर्त में, स्थापित कपी हुये।
जिस पल आप पधारे गांव में, सुन्दर सगुन हुये।।

उदय अस्त आरती होवे, झालर शंख बजै।
गहरे शब्द नगारा गाजै, सेवक चंवर ढुलै।।

जय जयकार भजन किरतन की, जागण सदा सजै।
खीर चूरमा भोग लगे ,सब चलता राम रजै।।

दुखिया भी दरसन करके मन ,खुशियां भरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।23।।

पीपल और खेजङी बदरी, निज कर लगवाये।
ऊंचा मिंदर लाल धणीं का,झंडा लहराये।।

गांव गांव चरचा संकलाई, की करते बातें ।
सुन सुन दुखी दीन जन बातें, दरसन को आते।।

निरधनियां धन पाते, रोगी शक्ति पा जाते।
निसंतान दया से प्रभु की,गोदी सुख पाते।।

खाली झोली करुण भाव से,खुशियां भरते हैं
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।24।।

सर्प दंश भय दूर हुआ, महिमा सबने जानी।
एक औषधि रामबाण हुई, तांती कलवाणी ।।

कोई फूंक झाङ नहीं मंतर, ना ओझा भोपा।
अमृत बना कुंड निरमल जल,संग भभूती का।।

चिमटा खोल बणा कलवाणी, जिसको पिला दिया।
चमत्कार एसा होता, मुरदों को जिला दिया।।

रोही जंगल मे सुबह शाम, निर्भय विचरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।25।।

विपदा दूर करे जन जन की, बरसों बीत गये।
चमत्कार सुनने में आते,नित नित नये नये।।

संत महंत साधु सिद्धों ने, माया रचवाई।
फैला दिये पग पग पर विषधर, राह न रहपाई।।

बुला लिया बस्ती के बाहर,अक्षय समझाई।
सोचा लैण परीक्षा आये,देखो संकलाई।।

पहन खङाऊ उडण भरी, आकाश मे चलते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।26।।

आकर बहु सनमान सहित, संतों से मिलन हुआ।
भगत भगत पहचान गये, आपस मे धन्य कहा।।

धन्य धन्य तुम धन्य अखा, तेरे धन्य पिता माता।
धन्य धरा मरुधरा दधीचि कुल,धन्य बहन भ्राता ।।

धन्य हमारे श्रवण आज और,धन्य हुई वाणी।
धन्य हमारा समय पा गये, पावन अन्नपाणी।।

अमर नाम अक्षय ध्रुव जैसा,संत उचरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।27।।

अखारामजी वृद्ध भये, दादाजी नाम पङा।
यही नाम सबके मन भाये,छोटा हो या बङा।।

दादाजी एक बार पास के, गांव में थे आये।
दिन भर भजन संगत संतों की, वक्त ना लख पाये।।

अस्तांचल आ पंहुचे दिनकर,तब कुछ भान हुआ।
सांझ आरती समय हुआ, एक भक्त ने एसे कहा।।

दोनों वक्त आरती नित, दादाजी करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।28।।

चुपके से एक भगत उठे, दादा ने जान लिया।
हो असवार अश्व काठी पर,अश्व को ऐङ दिया।।

घङी पाव मे पंहुचें मंदिर, दरसन जाय किया।
दादाजी कर रहे आरती, यह क्या कैसे हुआ।।

मेरी घोङी पवनवेग से ,मुझको ले आई।
दादाजी वहां बैठे छोङे, मति मेरी भरमाई।।

आरूढ पुनः हो आये वहीं, दादा राम सुमिरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।29।।

हाथ जोड़कर चरण पकङ, वो भगत वहां बोला।
सिद्ध संत हैं दादाजी, फरक न इक तोला।।

एक दादाजी भजन करें यहां, एक मंदिर के मांय।
दो दो रूप धार कर बैठे, मन संशय कछु नांय।।

दादाजी मुसकाय कहे तुम, भजन करो भाई।
भगती त्याग तपस्या सेवा, खुश हो कपिराई।।

सेवा परम धरम करलो तुम,शुभ फल मिलते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।30।।

शत आयु जब पार हुई तो,करनें लगे विचार।
काल धरम हर तन व्यापत है, चाहे हो अवतार।।

आज्ञा लेकर रामदूत से, गांव लिया बुलवाय।
जीवित समाधि मे बैठूंगा, पक्की दो चुनवाय।।

टप टप नीर नैण से टपके, मच गया हाहाकार।
रुदन करे अरदास ग्राम जन,अब किसका आधार।।

शोक करो ना यहीं रहूंगा, ये पण करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।31।।

अक्षय अमर कथा

उसी समाधि पर भगतों ने,मंदिर बनवाया।
छङी चीमटा और खङाऊ, सिगङी पुजवाया।।

पूजा करे पुजारी हर दिन ,ज्योत हूवै भारी।
गौघृत श्रीफल धूप गुग्गुल सब,होमे नर नारी।।

भोग लगै नित खीर चूरमा, दरसन बलिहारी।
जो मांगे दादा से मिलता, एसी दातारी।।

कृष्ण पक्ष की पांचम शुभ दिन, मेले भरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।32।।

रतनगढ़ के सेठ चौधरी, भगत बङे भारी।
दरसन को आते रहते, संग रहते परिवारी।।

विश्राम रैन के साधन की एक,कमी बङी भारी।
धरमशाल दिखणादे पासे,बणा दई प्यारी।।

दूर दूर गावों से संत नित, आते संसारी।
कुंड पक्का निरमाण किया,जल पावै नर नारी।।

इसी तरह से भगत कई,रचनायें रचते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।33।।

कुछ परिवार रहे परसाणै, बंडवा जाय बसै।
गये धीरदेसर कुछ परिजन, छापर आय बसै।।

दादा की किरपा से परिजन, पुरजन सभी फलै।
सेवक पोता और संबंधी, एक से एक भलै।।

जात पात सम भाव वर्ण, दादा ना भेद करे।
दीन दुखी रोगी निरधनियां, सबका कष्ट हरे।।

उनका हो जाता दादा, जो सुमिरन करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।34।।

चमत्कार तो लाखों हैं, कैसे मैं कह पाऊं।
मति अनुसार एक दो वरणूं, थोङे मे समझाऊं।।

गुलजी गंगा डूब गये,चिमटे से उबार लिया।
रामबगस के पुत्र हुकम का,विष भी हरण किया।।

गोली चली धनराज बचे,एक दुष्ट ने वार किया।
फिसल सामने वापस आ,उस दुष्ट को जख्म दिया।।

ऐसे सच्चे कथन बहुत, जन जन से सुनते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।35।।

संवत दो हजार छत्तीस मे,जीर्णोद्धार हुआ।
सपना देखा था भगतों ने,सपना सफल हुआ।।

पांच दिवस श्रीराम यज्ञ था,किरतन खूब हुआ।
सुबह शाम भंडारा चलता, भोजन नया नया।।

परसाणै ग्राम जनों उत्सव हित,भारी काम किया।
छत्री जाट कुंभार ग्राम जन, तन श्रम बहुत किया।।

कारीगर छापर के चांदजी, चेजा करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।36।।

दो हजार छत्तीस की संवत, पौष मास आया।
कृष्ण पक्ष की पांचम थी, शुभ मुहूर्त बली पाया।।

पंडित गोविंदराम भाव से, पूजा करवाई।
हुकमचंद यजमान बने,पत्नी काली बाई।।

सुन्दर मूरत दादाजी की, स्थापित आज हुई।
जय जयकार करे सब सेवक, खुशियां बहुत हुई।।

सौनजी गंगाधर रामेसर, पूजा करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।37।।

जीर्णोद्धार एक हुआ पुनः, मंदिर का अति भारी।
शिखर विशाल विशाल भवन की,रचना है न्यारी।।

सौम्य रूप गुणशील भूप, दादा परसाणै सोहै।
पचरंग पाग केसरी जामा,धारण नये नये।।

मोतियन माल भाल पर केसर,चंदन तिलक किये।
पगां खङाऊ चंदन की, और चिमटा रतन जङै।।

दादा के दरबार मे आ सब मन की कहतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।38।।

कृष्ण पक्ष भादौ की पांचम, जनम दिवस आये।
भगतों के मन आनंद भर कर,खुशियां लहरायें।।

देश विदेश जहां जो बसते, दरसन को आये।
चढ चढ वाहन पांव पियादे, मारग भर जावै।।

कोई युगल कोई भक्त अकेला, परिजन संग आवै।
खाली झोली भर ले जावै,मनवांछित पावै।।

दादा हमें बुलाना जल्दी, यह सब कहते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।39।।

मैं मतिमंद निपट अज्ञानी, कविता क्या गाऊं।
सुना सुनाया अनुभव पाया,तुमको सुनवाऊं।।

भाषा भूल माफ कर देना,जो मैं लिख पाऊं।
किरपा क्षमा बनाये रखना, पुनि पुनि दोहराऊं ।।

वन जन गगन अगन जल मे,मैं निकट तुम्हें पाऊं।
तेरे हाथ हजारों की नित,रक्षा मैं पाऊं।।

चंपा अक्षय अमर कथा, चरणों में धरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को हरते हैं।।40।।

श्री बालाजी दादाजी माताजी की जय जय जय

।।सम्पूर्ण।।

Shri Gayatri Kavacham Lyrics in Hindi: श्री गायत्री कवच

श्री गायत्री कवच का पाठ माता गायत्री की प्रार्थना करने के लिए किया जाता है| इस पवित्र गायत्री कवच की रचना महर्षि वेदव्यास जी ने की थी| इस कवच के बारे में स्वयं भगवान विष्णु ने देवर्षि नारद जी को बताया था| आपको बता दे कि श्री गायत्री कवच के बारे में उल्लेख श्री भागवत पुराण के बारहवें स्कन्ध में मिलता है| इस गायत्री कवच का जाप करने से भक्तों के सभी रोग दूर तथा समस्त पापों का नाश हो जाता है|

इस श्री गायत्री कवच में माता गायत्री की महिमा एवं उनकी शक्तियों के बारे में वर्णन किया गया है| जो भी भक्त इस कवच का नियमित रूप से पाठ करता है, उसे समस्त दुखों, भय तथा संकट से मुक्ति मिल जाती है| तो आइये जानते है श्री गायत्री कवच के बारे में|

गायत्री कवच

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श्री गायत्री कवच हिंदी अर्थ सहित – Gayatri Kavacham Lyrics with Hindi Meaning

|| श्री गायत्री कवचम् ||

विनियोग:

ॐ अस्य श्रीगायत्री – कवचस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्रा ऋषयः, ऋग् यजुः सामाऽथर्वाणि छन्दांसि, परब्रह्म स्वरूपिणी गायत्रीदेवता, भूः बीजम्, भुवः शक्तिः, स्वाहा कीलकम्, श्रीगायत्रीप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

हिंदी अर्थ – इस गायत्री कवच के ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र ऋषि है; ऋग, यजु: अथर्व तथा छंद है, परब्रह्मस्वरूपिणी गायत्री देवता है; भू: बीज है, भुव: शक्ति है, माता गायत्री की प्रीति के लिए इसका पाठ करना चाहिए|

ध्यान:

वर्णास्त्रां कुण्डिकाहस्तां शुद्ध निर्मल ज्योतिषीम् ।
सर्वतत्त्वमयीं वन्दे गायत्रीं वेदमातरम् ॥
मुक्ता विद्रुम हेम नील धवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै।
र्युक्तामिन्दु निबद्ध रत्नमुकुटां तत्वार्थ वर्णात्मिकाम्।
गायत्रीं वरदाऽभयाऽङ्कुश कशां शूलं कपालं गुणं।
शङ्ख चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे ॥

हिंदी अर्थ – सभी वर्णों के स्वरूप वाली, कुण्डिका को धारण करने वाली, निर्मल ज्योति स्वरूप वाली, शुद्ध, सम्पूर्ण तत्वों से विराजमान, वेदमाता गायत्री की मैं वंदना करता हूँ| जो स्वर्ण, मोती, मूंगा, नील तथा स्वच्छ छाया वाले मुख से सुशोभित है एवं जो स्त्रियोचित सभी मंगलों से युक्त है, जो रत्नजटित चंद्रकला से सुशोभित है, जो वर्णस्वरुप है| जिनके हाथों में अभय, कशा, वर, अंकुश, कपाल, धनुष, शूल, कमल एवं चक्र सुशोभित है| उन गायत्री देवी का मैं ध्यान करता हूँ|

कवच:

ॐ गायत्री पूर्वतः पातु सावित्री पातु दक्षिणे।
ब्रह्मविद्या च मे पश्चादुत्तरे मां सरस्वती ॥1॥

हिंदी अर्थ – गायत्री जी पूर्व दिशा में, सावित्री दक्षिण दिशा में, महाविद्या पश्चिम दिशा में एवं माता सरस्वती माता उत्तर दिशा में हमारी रक्षा करे|

पावकीं मे दिशं रक्षेत् पावकोज्वलशालिनी।
यातुधानीं दिशं रक्षेद्यातुधान गणार्दिनी ॥2॥

हिंदी अर्थ – अग्नि की भांति प्रकाशपूर्ण देवी अग्निकोण में, यातुधानों का नाश करने वाली दक्षिण-पश्चिम में हमारी रक्षा करें|

पावमानीं दिशं रक्षेत् पवमान विलासिनी।
दिशं रौद्रीमवतु मे रुद्राणी रुद्ररूपिणी ॥3॥
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा।
एवं दश दिशो रक्षेत् सर्वतो भुवनेश्वरी ॥4॥

हिंदी अर्थ – वायु के समान विलास करने वाली देवी वायव्यकोण में, रूद्र रूपिणी भगवती रुद्राणी उत्तर-पूर्व दिशा में हमारी रक्षा करे| ब्रह्माणी ऊपर एवं वैष्णवी नीचे की ओर हमारी रक्षा करे| इसी भांति सभी देवियाँ दस दिशाओं में रक्षा करें|

ब्रह्मास्त्र स्मरणादेव वाचां सिद्धिः प्रजायते।
ब्रह्मदण्डश्च मे पातु सर्वशस्वाऽस्त्र भक्षकः ॥5॥
ब्रह्मशीर्षस्तथा पातु शत्रूणां वधकारकः ।
सप्तव्याहृतयः पान्तु सर्वदा बिन्दुसंयुताः ॥6॥

हिंदी अर्थ – समस्त शास्त्रों का नाश करने वाले ब्रह्मदंड से हमारी रक्षा करें| शत्रुओं का विनाश करने वाला ब्रह्मशीर्ष हमारी रक्षा करें| विसर्ग के सहित सप्रणव व्याहृतियाँ हमेशा हमारी रक्षा करें|

वेदमाता च मां पातु सरहस्या सदेवता।
देवीसूक्तां सदा पातु सहस्त्राक्षरदेवता ॥7॥

हिंदी अर्थ – स-रहस्या, स-देवता एवं देवमाता हमारी रक्षा करें| जिसके सहस्त्राक्षर देवता है, वह देवी सूक्त हमारी रक्षा करें|

चतुष्षष्टिकलाविद्या दिव्याद्या पातु देवता।
बीजशक्तिश्च मे पातु पातु विक्रमदेवता ॥8॥

हिंदी अर्थ – चतु: षष्टि कला सहित दिव्य विद्या हमारी रक्षा करें| बीज – शक्ति हमारी रक्षा करें| विक्रम देवता हमारी रक्षा करें|

तत्पदं पातु मे पादौ जड्डे मे सवितुः पदम् ।
वरेण्यं कटिदेशं तु नाभिं भर्गस्तथैव च ॥9॥
देवस्य मे तु हृदयं धीमहीति गलं तथा ।
धियो मे पातु जिह्वायां यः पदं पातु लोचने ॥10॥

हिंदी अर्थ – ‘तत्’ पद पैर की रक्षा करें, ‘सवितुः’ पद जांघ की, ‘वरेण्यं’ कटि देश की एवं ‘भर्ग’ पद नाभिस्थान की रक्षा करें| ‘देवस्य’ हृदय की, ‘धीमहि’ गले की, ‘धियो’ जिव्हा की, ‘य:’ पद नेत्र की रक्षा करे|

ललाटे नः पदं पातु मूर्द्धानं मे प्रचोदयात्।
तद्वर्णः पातु मूर्द्धानं सकारः पातु भालकम् ॥11॥

हिंदी अर्थ – ‘न:’ ललाट की, ‘प्रचोदयात’ सिर की रक्षा करें| ‘ततः’ वर्ण मूर्धा की एवं ‘स’ वर्ण भाल की रक्षा करें|

चक्षुषी मे विकारस्तु श्रोत्रं रक्षेत्तु कारकः ।
नासापुटे वकारो मे रेकारस्तु कपोलयोः ॥12॥
णिकारस्त्वधरोष्ठे च यकारस्तूर्ध्व ओष्ठके।
आस्यामध्ये भकारस्तु गोंकारस्तु कपोलयोः ॥13॥

हिंदी अर्थ – ‘वि’ वर्ण दोनो नेत्रों की, ‘तु’ वर्ण कानों की, ‘व’ नासापुटो की, ‘रे’ वर्ण कपोलों की रक्षा करें| ‘ण’ वर्ण अधरोष्ठ की, ‘य’ ऊपर के होंठ की, ‘भ’ वर्ण मुख के मध्य में, ‘र्गो’ दोनों कपोलो की रक्षा करें|

देकारः कण्ठदेशे च वकारः स्कन्धदेशयोः ।
स्यकारो दक्षिणं हस्तं धीकारो वामहस्तकम् ॥14॥
मकारो हृदयं रक्षेद् हिकारो जठरं तथा ।
धिकारो नाभिदेशं तु योकारस्तु कटिद्वयम् ॥15॥

हिंदी अर्थ – ‘दे’ कंठदेश की, ‘व’ स्कंधदेश की, ‘स्य’ दाहिने हाथ की, ‘धी’ बाएँ हाथ की रक्षा करें| ‘मं’ हृदय की, ‘हि’ जठर की, ‘धि’ नाभिस्थान की, ‘यो’ दोनों कटि भाग की रक्षा करें|

गायत्री कवच

गुह्यं रक्षतु योकार ऊरू में नः पदाक्षरम्।
प्रकारो जानुनी रक्षेच्चोकारो जङ्घदेशयोः ॥16॥
दकारो गुल्फदेशं तु यात्कारः पादयुग्मकम् ।
जातवेदेति गायत्री त्र्यम्बकेति दशाक्षरा ॥17॥

हिंदी अर्थ – ‘यो’ गुह्यांग की, ‘न:’ पद व अक्षर दोनों उरू, ‘प्र’ दोनों घुटनों की, ‘चो’ दोनों जंघा की रक्षा करें| ‘द’ गल्फ की, ‘यात’ हमारे दोनों पैरों की रक्षा करें|

सर्वतः सर्वदा पातु आपो ज्योतीति षोडशी।
इदं तु कवचं दिव्यं बाधा शत विनाशकम् ॥18॥
चतुष्षष्टिकलाविद्या सकलैश्वर्य सिद्धिदम् ।
जपारम्भे च हृदयं जपान्ते कवचं पठेत् ॥19॥

हिंदी अर्थ – यह माता गायत्री देवी का कवच कई समस्याओं को नष्ट करने वाला है, चौसठ कलाएँ तथा ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है| गायत्री जाप के प्रारम्भ में गायत्री-हृदय तथा जप के अंत में गायत्री कवच का पाठ करना चाहिए|

स्त्री गो ब्राह्मण मित्रादि द्रोहाद्यखिल पातकैः।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः परं ब्रह्माधि गच्छति ॥20॥

हिंदी अर्थ – स्त्री वध, ब्राह्मण वध, मित्रद्रोह तथा गोवध आदि पापों को नष्ट कर देता है| गायत्री कवच का पाठ करने वाला मनुष्य परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो जाता है|

पुष्पाञ्जलिं च गायत्र्या मूलेनैव पठेत् सकृत्।
शतसाहस्त्र वर्षाणां पूजायाः फलमाप्नुयात् ॥21॥

हिंदी अर्थ – इस गायत्री कवच का सदैव पाठ कर मूल मंत्र से एक बार गायत्री देवी को पुष्पांजलि देने से हजारों वर्षों तक की पूजा का फल प्राप्त होता है|

भूर्जपत्रे लिखित्वैतत् स्वकण्ठे धारयेद् यदि।
शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा धारयेद् बुधः ॥22॥
त्रैलोक्यं क्षोभयेत् सर्व त्रैलोक्यं दहति क्षणात् ।
पुत्रवान् धनवाञ्छ्रीमान् नानाविद्यानिधिर्भवेत् ॥23॥

हिंदी अर्थ – जो व्यक्ति इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर, शिखा, कंठ व दाहिने हाथ में या मणिबंध में धारण करते है, वे क्षण भर में तीनों लोकों का नाश कर सकते है| वे धनवान, पुत्रवान तथा अनेकों विद्याओ के विशेषज्ञ बन जाते है|

ब्रह्मास्त्रादीनि सर्वाणि तदङ्गस्पर्शनात्ततः ।
भवन्ति तस्य तुच्छानि किमन्यत् कथयामि ते ॥24॥

हिंदी अर्थ – गायत्री कवच पाठ के फल को बहुत कहने से क्या? ब्रह्मास्त्रादि भी उसके अंग के स्पर्श से तुच्छ हो जाते है|

न देयं परशिष्येभ्यो ह्यभक्तेभ्यो विशेषतः ।
शिष्येभ्यो भक्तियुक्तेभ्यो ह्यन्यथा मृत्युमाप्नुयात् ॥25॥

हिंदी अर्थ – कहा जाता है कि गायत्री कवच के जप की विधि दुसरे शिष्यों को नहीं देनी चाहिए| तथा जो भक्त न हो, उसे भी नहीं देनी चाहिए| अपने शिष्य तथा भक्त को ही इस विधि के बारे में कहना चाहिए नहीं तो वह मृत्यु को प्राप्त कर लेता है|

इति श्रीअगस्त्यसंहितायां ब्रह्मनारायणसंवादे प्रकृतिखण्डे गायत्रीकवचं सम्पूर्णम् ॥

Chandra Shekhar Ashtakam: चन्द्रशेखर अष्टकम के बारे में हिंदी अर्थ सहित

यह चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) एक ऐसी प्रार्थना है जो भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की जाती है| जैसे कि हम सभी जानते है कि हिन्दू धर्म में प्रत्येक दिन किसी ना किसी भगवान को समर्पित किया जाता है| यदि हम बात करे सोमवार के दिन की तो यह दिन भगवान शिव को समर्पित किया गया है, जिनकी उपासना के लिए चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) का पाठ किया जाता है|

इस दिन भगवान शिव के भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए बहुत सारी चीज़े करते है| भगवान शिव के बारे में यह माना जाता है कि यह केवल एक लौटा जल चढाने से ही प्रसन्न हो जाते है| भगवान शंकर की पूजा करने से भक्तों से सभी प्रकार की परेशानियां दूर होती है तथा सौभाग्य की प्राप्ति होती है|

चन्द्रशेखर अष्टकम

आज हम इस लेख के माध्यम से आपको चन्द्रशेखर अष्टकम के बारे में बतायेंगे| इस चन्द्रशेखर अष्टकम का पाठ प्रतिदिन नियमित रूप से करने पर यह जातक के प्रति बहुत ही सकारात्मक प्रभाव दिखाता है| चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) पाठ प्रत्येक सोमवार को पाठ करने से व्यक्ति को मानसिक तनाव से छुटकारा मिलता है तथा भगवन शिव का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है|

इसी के साथ धन की बचत करने के कई सारे भी मार्ग आपको नज़र आयेंगे| सोमवार के दिन चन्द्र देव की पूजा करने का विधान माना जाता है| चन्द्र देव भगवान शिव के सिर पर विराजमान है| व्यक्ति की कुंडली में चन्द्र देव के अशुभ होने मानसिक तनाव तथा जीवन में अशांति बढती है|

तो आइये इस लेख के द्वारा जानते है चन्द्रशेखर अष्टकम के बारे में हिंदी अर्थ के साथ| इस चन्द्रशेखर अष्टकम के साथ ही हम आपको बताते है 99Pandit के बारे में| यदि आप हिन्दू धर्म से संबंधित किसी भी तरह की पूजा जैसे  त्रिपिंडी श्राद्ध, नवरात्रि  की पूजा करवाना चाहते है तो 99Pandit आपके लिए एक बहुत ही अच्छा विकल्प होगा|

श्री चन्द्रशेखर अष्टकम हिंदी अर्थ सहित – Chandrashekhar Ashtakam with Hindi Meaning

चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहिमाम् |
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ‖1

अर्थ – हे चन्द्रशेखर (भगवान जिनका मुकुट चंद्रमा है), कृपया मेरी रक्षा करें|
हे चन्द्रशेखर (भगवान जिनका मुकुट चंद्रमा है), कृपया मुझे बचाएं| 

रत्नसानु शरासनं रजताद्रि शृङ्ग निकेतनं
शिञ्जिनीकृत पन्नगेश्वर मच्युतानल सायकम् |
क्षिप्रदग्द पुरत्रयं त्रिदशालयै रभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ‖ 2

अर्थ – ऐसे भगवान जिन्होंने बहुमूल्य पत्थरों से भरे पर्वत (मेरु पर्वत) को अपना धनुष , जो स्वयं चांदी के पर्वत पर निवास करते है, जिन्होंने नागों के राजा (वासुकी) को अपने धनुष की प्रत्यंचा बनाया था, जिन्होंने भगवान विष्णु को तीर के रूप में इस्तेमाल किया था, जिन्हें तीनो लोकों में सभी प्रणाम करे| मै उन भगवान चंद्रशेखर की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

पञ्चपादप पुष्पगन्ध पदाम्बुज द्वयशोभितं
फाललोचन जातपावक दग्ध मन्मध विग्रहं |
भस्मदिग्द कलेबरं भवनाशनं भव मव्ययं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ‖ 3 ‖

अर्थ – जिनके पैर पांच दिव्य वृक्षों के फूलों तथा गंध से चमक रहे है, जिन्होंने अपने माथे पर मौजूद आँख की आग से प्रेम के भगवान, मनमदा को जला दिया| जिनके शरीर पर पवित्र राख या भस्म लगी हुई है, जो दुखों का नाश करने वाले है, जो अनंत काल तक जीवित है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

मत्तवारणमुख्यचर्मकॄतोत्तरीयमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपूजितांघ्रिसरोरुहम ।
देवसिन्धुतरङ्गसीकर सिक्तशुभ्रजटाधरं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥ 4॥ 

अर्थ – जो अपनी भुजाओं पर बड़े ओजस्वी हाथी की खाल को वस्त्र के रूप में धारण करते है, जो मंत्रमुग्ध दिखाई देते है, जिनके कमल के समान चरणों की पूजा स्वयं सृष्टि के रचियता ब्रह्मा जी करते है, जो अधिकतर पंकजासन पर विराजमान रहते है| जिनके उलझे हुए बाल आकाश गंगा की लहरों से आने वाली बूंदों से साफ़ हो जाते है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेबरम ।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥5॥ 

अर्थ – ऐसे भगवान जो कुबेर के निकट है, जो नागों को आभूषण के रूप में धारण करते है| जिनके शरीर का बायाँ भाग पर्वतो की पुत्री देवी पार्वती के शरीर से सुशोभित है| जिनका कंठ नीला है| जिनके हाथ शास्त्र के रूप में कुल्हाड़ी से सुशोभित है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

चन्द्रशेखर अष्टकम

कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वर कुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम ।
अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥6॥ 

अर्थ – जिनके कानों में कुंडलित सर्प है, जिनका वाहन बैल है| जिनके महानता की प्रसन्नता नारद जी तथा अन्य ऋषि – मुनियों के द्वारा की जाती है| वह सभी लोगों के स्वामी माने जाते है| जिन्होंने अंधक के घमंड को नष्ट किया| मै जिनकी शरणागत के लिए कामना करता हूँ| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञविनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम ।
भुक्तिमुक्तिफलप्रदं सकलाघसंघनिबर्हणं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥7॥

अर्थ – जो दुखी व्यक्ति के जीवन में एक औषधि के रूप में कार्य करते है, सभी कष्टों और बाधाओं को दूर करने वाले, दक्ष यज्ञ के विध्वंसक, तीन नेत्रों वाले, भक्ति, मोक्ष  तथा अन्य इच्छाओं के दाता| मै सभी पापों का नाश करने वाले उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

भक्तवत्सलमर्चितं निधिक्षयं हरिदंबरं
सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनुत्तमम ।
सोमवारिदभूहुताशनसोमपानिलखाकृतिं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥8॥ 

अर्थ – जो अपने सभी भक्तों का ध्यान रखते , जिनकी सभी लोग पूजा करते है, जो अपने भक्तों के लिए किसी खजाने के समान है, जो इस सम्पूर्ण दुनिया के परे है, जिनकी तुलना किसी के साथ नहीं की जा सकती है, जो विधिपूर्वक सोमपान करने वाले के रूप में विद्यमान है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमपि प्रपञ्चमशेषलोकनिवासिनम ।
कीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमन्वितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः॥9॥

अर्थ – जो भगवान इस सृष्टि की रचना करते है, जो सृष्टि के पालन पोषण में हमेशा तैयार रहते है| जो उचित समय पर सृष्टि का विनाश भी कर सकते है| जिन्होंने इस संसार में असंख्य लोगों के निवास का स्थान बनाया है| जो हर दिन चंचल रहते है तथा रात्रि गणों के मुखिया है, जो उन गणों में से एक की भांति ही व्यवहार करते है| मै उन चंद्रशेखर भगवान की शरण लेता हूँ तो यम मेरा क्या कर सकते है?

मृत्युभीतमृकण्डुसूनुकृतस्तवं शिवसन्निधौ
यत्र कुत्र च यः पठेन्न हि तस्य मृत्युभयं भवेत ।
पूर्णमायुररोगतामखिलार्थसंपदमादरात
चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः॥10॥

अर्थ – जो भी मृत्यु से भयभीत व्यक्ति मृकुंद के पुत्र द्वारा लिखी इस चन्द्रशेखर अष्टकम(Chandra Shekhar Ashtakam) को भगवान शिव के मंदिर में पढता है तो इसके माध्यम से उस व्यक्ति के मन से मृत्यु का भय खत्म हो जाता है| उस पूर्ण रूप से स्वस्थ जीवन की प्राप्ति होती है| जब कोई मुक्ति पाने का प्रयास करता है तो चंद्रमा के शिखर भगवान शिव उसे सम्पूर्ण जीवन धन तथा अच्छा स्वास्थ्य प्रदान करते है|

॥ इति श्रीचन्द्रशेखराष्टकस्तोत्रं संपूर्णम ॥ 

चन्द्रशेखर अष्टकम का महत्व – Importance of Chandrashekhar Ashtakam

इस चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) को सुनना या उसका ध्यान करना व्यक्ति के सुखद जीवन जीने में बहुत ही काम आ सकता है| इस अष्टकम में भगवान शिव को चंद्रशेखर (चंद्र – चंद्रमा, शेखर – मुकुट) के रूप में बताया गया है| इसका अर्थ है जो अपने मुकुट को चंद्रमा से सुशोभित करते है|

यह चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) मार्कंडेय ऋषि के द्वारा लिखा गया है| इस बारे में एक कथा काफी पुराने काल से चली आ रही है कि किस प्रकार भगवान शिव ने भगवान यम से मार्कंडेय ऋषि के प्राण किस प्रकार बचाएं थे| आज हम इस लेख के माध्यम से इस कथा के बारे में जानेंगे|

पौराणिक कथा – Mythology

मृकंडु ऋषि तथा उनकी पत्नी मरूदमती ने पुत्र प्राप्ति के हेतु भगवान शिव की प्रार्थना की| उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और दम्पति को पुत्र के दो विकल्प प्रदान किये| जिसमे एक विकल्प था कि जिसमे उन्हें एक धर्मी पुत्र की प्राप्ति होगी किन्तु उसकी आयु क्षीण होगी| वही दूसरा विकल्प यह था उनके पुत्र की आयु सौ वर्ष होगी किन्तु वह मुर्ख होगा| मृकंडु ऋषि ने पहले विकल्प का चुनाव किया| जिससे उन्हें एक धर्मी पुत्र मार्कंडेय की प्राप्ति हुई| जिसकी आयु 16 वर्ष तक होनी निश्चित थी| 

ऋषि मार्कंडेय बड़े होकर बहुत ही बड़े शिव भक्त बने| अपने मृत्यु वाले दिन भी ऋषि मार्कंडेय ने मंदिर में भगवान शिव की पूजा जारी रखी| पूजा जारी रखने की वजह से यम दूत ऋषि मार्कंडेय को ले जाने में असमर्थ थे| इस वजह से यमराज को ऋषि मार्कंडेय के प्राण लेने स्वयं ही आना पड़ा| यमराज ने ऋषि मार्कंडेय के गले फंदा डाल दिया| अपने मंदिर में अपने भक्त के साथ ऐसा होते देखकर भगवान शिव को क्रोध आ गया है|

चन्द्रशेखर अष्टकम

इसके पश्चात यमराज तथा भगवान शिव के मध्य भयंकर युद्ध हुआ| भगवान शिव यमराज को मृत्यु की स्थिति तक हराने के पश्चात उन्हें पुनर्जीवित इस शर्त के तहत किया कि धर्मनिष्ठ व्यक्ति हमेशा जीवित रहेगा| इस समय से भगवान शिव को कालांतक(मृत्यु का अंत) के नाम से भी जाना जाने लगा| इसके पश्चात ऋषि मार्कंडेय ने भगवान शिव की स्तुति के रूप में चन्द्रशेखर अष्टकम (Chandra Shekhar Ashtakam) गाया था| 

चन्द्रशेखर अष्टकम पूजा की कीमत – Chandrashekhar Ashtakam Puja Cost

  1. 551 पाठों के साथ: पुजारियों की संख्या: 5; INR – 11,000; अवधि – 1 दिन 
  2. 1,100 पाठों के साथ : पुजारियों की संख्या: 11; INR – 21,000; अवधि – 1 दिन 
  3. 2,100 पाठों के साथ: पुजारियों की संख्या: 21; INR – 35,000; अवधि – 1 दिन 

निष्कर्ष

किसी भी तरह की पूजा करने के लिए हमें बहुत सारी तैयारियां करनी होती है| गावों में पूजा आसानी से हो जाती है लेकिन शहरों में लोगों के पास समय की कमी होती है| जिस वजह से वह लोग पूजा नहीं करवा पाते है तो उनकी इस समस्या का समाधान हम लेकर आये है 99Pandit के साथ|

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हालांकि, किसी भी समय भगवान की पूजा करना आपको कठिनाइयों, समस्याओं, तनाव और नकारात्मक ऊर्जाओं से हमेंशा बचाता है। जैसा कि आपने चन्द्रशेखर अष्टकम पाठ के हिंदी अर्थ तथा महत्व के बारे में जाना|

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.चन्द्रशेखर अष्टकम किसके द्वारा लिखा गया है?

A.ऋषि मार्कंडेय ने भगवान शिव की स्तुति के रूप में चन्द्रशेखर अष्टकम गाया था|

Q.प्रत्येक सोमवार को चन्द्रशेखर अष्टकम का पाठ करने से क्या होता है?

A.प्रत्येक सोमवार के दिन चन्द्रशेखर अष्टकम का पाठ करने से कुंडली में चन्द्र देव का नकारात्मक प्रभाव कम होता है|

Q.चंद्रशेखर का मतलब क्या होता है?

A.इस अष्टकम में भगवान शिव को चंद्रशेखर (चंद्र – चंद्रमा, शेखर – मुकुट) के रूप में बताया गया है| इसका अर्थ है जो अपने मुकुट को चंद्रमा से सुशोभित करते है|

Q.भगवान शिव को कालांतक क्यों कहा जाता है?

A.यमराज तथा भगवान शिव के मध्य भयंकर युद्ध हुआ| भगवान शिव यमराज को मृत्यु की स्थिति तक हराने के पश्चात उन्हें पुनः जीवित इस शर्त के तहत किया कि धर्मनिष्ठ व्यक्ति हमेशा जीवित रहेगा| इस समय से भगवान शिव को कालांतक (मृत्यु का अंत) के नाम से भी जाना जाने लगा|

Dadhimati Mata ka Chhand: दधिमथी माता जी का छंद

यह दधिमथी माता जी का छंद (Dadhimati Mata ka Chhand) बहुत प्रसिद्ध माना जाता है| इस दधिमथी माता जी का छंद का गान ब्राह्मणों की कुलदेवी दधिमथी माता जी को प्रसन्न करने तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए की जाती है|

दधिमथी माता का मंदिर नागौर जिले की जायल नामक तहसील में जिला मुख्यालय से करीब 40 कि.मी दूर उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है| अनेक समाजों में श्री दधिमथी माता को कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है| तो आइये जानते है इस दधिमथी माता जी के छंद के गाने के बारे में|

दधिमथी माता जी का छंद

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दधिमथी माता जी का छंद हिंदी में – Dadhimati Mata ka Chhand Lyrics in Hindi

छन्द गुण दधमथ का गाता, सकल की स्हाय करो माता। टेर।

दधिमथी मोटी महा माई, महर कर गोठ नगर आई।

गवाल्यो चरा रह्यो गाई, कह्यो तुम बोलो मत भाई।

अभी मैं बाहिर जो आऊँ, लोक में सम्पत बपराऊँ।

दधिमथी बाहर नीसरी, धुन्ध भई दिन रैन।

हुई आवाज सिंह की, भिड़क भाग गई धेन।

गवालो गऊ घेर लाता, सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

गवालो! ‘हो हो’ कर रयो, बचन देवी का भूल गयो।

देवी तब बाहर नहीं आई, गुप्त तब मस्तक पुजवाई।

दधमथ की सेवा करे, जो कोई नर नार।

निश्चय होकर ध्यान, तो बेड़ा करदे पार।

दुख दारिद्र दूर जाता, सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

गोठ एक मांगलोद मांई, बिराजे दधिमथी महामाई।

जंगल में देवल असमानी, उसी को जाणे सब प्राणी।

छत्र बिराजे सोहनो, चार भुजा गल हार।

कानां कुंडल झिल मिले, आप सिंह असवार।

नोपतां बज रही दिन राता, सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

परचो साहुकार पायो, मात को देवल चिणवायो।

पोल ईक सूरज के सामी, कुंड का अमृत है पानी।

अधर खम्भ ऐसो बण्यो, जाणत सब है जान।

कलयुग में छिप जावसी, कोई सतयुग को सेनाण।

कलयुग करत लोग बातां, सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

परचो इक पायो राणो, उदयपुर मेवाड़ी जाणो।

कारज उसका सिद्ध कीनों वचन से पुत्र देय दीनो।

सूतां सपनो आइयो, जाग सके तो जाग।

देऊँ गढ़ चित्तोड़ को, मेटूँ दिल का दाग।

द्रव्य ईक जूना भी पाता, सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

रातका राणोजी जाग्यो, मात के पावां उठ लाग्यो।

मातको अखी वचन पाऊँ, देश में देवल चिनवाऊँ।

जब देवी का हुकम सूँ, आयो देश दिवाण।

मंदिर चिणवा भूप सूं ऊँचा किया निर्माण।

कुंड के पेड़ी बंधवाता, सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

सेवक नित सेवा ही करता, ध्यान श्री दधिमत का धरता।

जोगण्या निरत करत भैरूँ डमक डम बाजत है डमरूँ।

मारवाड़ के मायने प्रकट भई है गोठ।

आपो आप बिराजे जननी, बाहर निकली जोत।

जातरी रात-दिवस आता, सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

सम्वत् उन्नीसो दस में, छन्द गुण गायो रंग रस में।

चौथ सुद श्रावण के मासा, सकल की पूरो मन आशा।

दसरावो मेलो भरे, चैत्र आसोजां मांस।

देश देश का जातरी, पूरे मन की आश।

अन्न-धन दीजोजी माता, सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

ब्राह्मण दायमो गाता, खींवसर नगरी मं रहता।

मात को नन्द छन्द गायो, मात के चरणां चित लायो।

जो जन गावे अरू सुणे, निश दिन धरे जो ध्यान।

गुरू बड़ा गुणवान है, ‘मूलचन्द’ महाराज।

जोड़कर ‘जेठूमल’ गाता सकल की स्हाय करो माता। छन्द।

दधिमथी माता जी का छंद

Dadhimati Mata ka Chhand Lyrics in English – छन्द गुण दधमथ का गाता

Chhand gun dadhamath ka gaata, sakal ki shay karo mata। Ter।

Dadhimathi moti maha maai, mahar kar goth nagar aayi.

Gawalyo chara rahyo gaai, kahyo tum bolo mat bhai.

Abhi main bahir jo aaun, lok mein sampat baparaaun.

Dadhimathi bahar nisari, dhundh bhai din rain.

Hui aawaaz singh ki, bhidak bhag gayi dhen.

Gawalo gau gher laata, sakal ki shay karo mata। Chhand।

Gawalo! ‘Ho ho’ kar rayo, bachan devi ka bhool gayo.

Devi tab bahar nahi aayi, gupt tab mastak pujwai.

Dadhamath ki seva kare, jo koi nar naar.

Nishchay hokar dhyaan, to beda karde paar.

Dukh daaridr door jaata, sakal ki shay karo mata। Chhand।

Goth ek mangalod maai, biraje dadhimathi mahamaai.

Jangal mein deval asamaani, usi ko jaane sab prani.

Chatra biraje sohno, char bhuja gal haar.

Kanan kundal jhil mile, aap singh asvaar.

Nopatan baj rahi din raata, sakal ki shay karo mata। Chhand।

Parcho sahukaar paayo, maat ko deval chinvaayo.

Pol ik suraj ke saami, kund ka amrit hai paani.

Adhar khambh aiso banyo, jaanat sab hai jaan.

Kalyug mein chip jawaasi, koi satyug ko senaani.

Kalyug karat log baataan, sakal ki shay karo mata। Chhand।

Parcho ik paayo raano, udayapur mevaadi jaano.

Kaary uska siddh keeno vachan se putr dey deeno.

Sootan sapno aaiyo, jaag sake to jaag.

Deun gadh chittor ko, metun dil ka daag.

Dravy ik joona bhi paata, sakal ki shay karo mata। Chhand।

Ratka raanoji jaagyo, maat ke paavan uth laagyo.

Maatko akhi vachan paun, desh mein deval chinvaun.

Jab devi ka hukam sun, aayo desh divaan.

Mandir chinva bhup soon, ooncha kiya nirmaan.

Kund ke pedi bandhwata, sakal ki shay karo mata। Chhand।

Sevak nit seva hi karta, dhyaan shree dadhimat ka dharta.

Jogan nya nirat karta bhairun, damak dam baajat hai damruun.

Marwar ke mayne prakat bhai hai goth.

Aapo aap biraje janni, bahar nikli jot.

Jaatri raat-din aata, sakal ki shay karo mata। Chhand।

Samvat unnis das mein, chhand gun gayo rang ras mein.

Chauth sud shravan ke maasa, sakal ki poora man aasha.

Dasravo melo bhare, chaitra asojan maans.

Desh desh ka jaatri, poore man ki aash.

Ann-dhan deejogi maata, sakal ki shay karo mata। Chhand।

Brahman dayamo gaata, khinvasar nagari mann rahata.

Maat ko nand chhand gayo, maat ke charanam chit layo.

Jo jan gaave aru sune, nish din dhare jo dhyaan.

Guru bada gunwaan hai, ‘Moolchand’ maharaj.

Jodakar ‘Jethumal’ gaata, sakal ki shay karo mata। Chhand।