Jai Ganesh Jai Ganesh Jai Ganesh Deva Lyrics: गणेश जी की आरती

गणेश जी की आरती (Ganesh Ji Ki Aarti) को हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार किसी कार्य या भगवान गणेश जी पूजा को शुरू करने से पूर्व  गाया जाता है|

गणेश जी की आरती (Ganesh Ji Ki Aarti) के बहुत ही सारे संस्करण है| जिनकी रचना अलग – अलग कवियों तथा भक्तों के द्वारा की गई है|

भगवान गणेश जी को विघ्नहर्ता के नाम से भी जाना जाता है| किसी भी प्रकार का कार्य या कोई भी पूजा गणेश जी की आरती (Ganesh Ji Ki Aarti) के बिना अधूरी मानी जाती है|

गणेश जी की आरती

गणेश जी की आरती (Ganesh Ji Ki Aarti) को प्रेम तथा भक्ति के भाव से गाने से यह भक्त को दिव्य आनंद की अनुभूति करवाती है|

प्राचीन समय में ऋषियों का मानना यह था कि उचित अनुष्ठानों के साथ नियमित गणेश जी आरती करने से दिव्य आनंद तथा अध्यात्मिक ज्ञान की प्राप्ति होती है|

पूर्ण भक्ति के साथ भगवान गणेश जी की आरती को करने से व्यक्ति के शरीर में एक अद्भुत कंपन उत्पन्न होता है जो कि व्यक्ति के शरीर में उपस्थित सात चक्रों को सक्रिय करने में सहायता करती है|

गणेश जी की आरती (Ganesh Ji Ki Aarti) करने से हमारे आस – पास का वातावरण सकारात्मक होता है| इस आरती को  गणेश चतुर्थी के दिन गाना बहुत ही शुभ माना जाता है|

अब आगे हम इस लेख के माध्यम से हम आपको 99Pandit के बारे में जानकारी देंगे| 99Pandit एक ऐसा ऑनलाइन प्लेटफार्म है जिसकी सहायता से आप हिन्दू धर्म से संबंधित किसी भी पूजा जैसे – धनतेरस पूजा (Dhanteras Puja), दिवाली पूजा (Diwali Puja) तथा करवा चौथ (Karwa Chauth) के लिए ऑनलाइन पंडित बुक कर सकते है| यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है|

गणेश जी की आरती – Ganesh Ji Ki Aarti Lyrics in Hindi

|| गणेश जी की आरती ||

जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥

एक दंत दयावंत,
चार भुजा धारी ।
माथे सिंदूर सोहे
मूसे की सवारी ॥

जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥

पान चढ़े फल चढ़े,
और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे
संत करें सेवा ॥

जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥

अंधन को आंख देत,
कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत
निर्धन को माया ॥

जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥

‘सूर’ श्याम शरण आए,
सफल कीजे सेवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥

जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥

दीनन की लाज रखो,
शंभु सुतकारी ।
कामना को पूर्ण करो
जाऊं बलिहारी ॥

जय गणेश जय गणेश,
जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती
पिता महादेवा ॥

गणेश जी की आरती

Ganesh Ji Ki Aarti Lyrics in English: जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा

॥ Ganesh Ji Ki Aarti ॥

Jai Ganesh Jai Ganesh,
Jai Ganesh Deva।
Mata Jaki Parvati,
Pita Maha Deva॥

Ek dant daya want
Char bhuja dhari।
Mathe sindur sohe
Muse ki sawari॥

Jai Ganesh Jai Ganesh,
Jai Ganesh Deva।
Mata Jaki Parvati,
Pita Maha Deva॥

Pan chadhe phool chadhe
Aur chadhe Mewa।
Ladduan ka Bhog Lage
Sant kare seva॥

Jai Ganesh Jai Ganesh,
Jai Ganesh Deva।
Mata Jaki Parvati,
Pita Maha Deva॥

Andhan ko aankh det
Kodhin ko kaya।
Banjhan ko putra det
Nirdhan ko maya॥

Jai Ganesh Jai Ganesh,
Jai Ganesh Deva।
Mata Jaki Parvati,
Pita Maha Deva॥

Sur Shyam sharan aaye
Safal kije seva
Mata Jaki Parvati,
Pita Maha Deva॥

Jai Ganesh Jai Ganesh,
Jai Ganesh Deva।
Mata Jaki Parvati,
Pita Maha Deva॥

Deenan ki laaj rakho
Shambhu sutkari।
Kamana ko purn karo
Jaoon balihari॥

Jai Ganesh Jai Ganesh,
Jai Ganesh Deva।
Mata Jaki Parvati,
Pita Maha Deva॥

निष्कर्ष

आज इस लेख में हमने आपको गणेश जी की आरती (Ganesh Ji Ki Aarti Lyrics) के बारे जानकरी दी। साथ ही हमे आपको आरती के लिरिक्स भी बताये। गणेश जी को प्रथम पूज्य देव माना जाता है तथा किसी भी शुभ कार्य करने से पहले उनकी पूजा की जाती है।

इस गणेश जी की आरती का जाप करने से भक्तों को सद्बुद्धि प्राप्त होती है तथा भक्तों के सभी रुके हुए कार्य भी पूर्ण होते है। गणेश जी की पूजा हेतु आप 99Pandit के माध्यम से अनुभवी पंडित बुक कर सकते है।

99Pandit एकमात्र ऐसा भरोसेमंद प्लेटफार्म है, जिसकी सहायता से आप दुनिया में कही से भी सभी प्रकार की पूजा हेतु ऑनलाइन पंडित जी बुक कर सकते है।

Sundarkand Path Lyrics: सम्पूर्ण सुंदरकांड पाठ हिंदी लिरिक्स

सुंदरकांड पाठ: भगवान हनुमान जी कलयुग के देवता है| जिन्हें प्रसन्न करना ज्यादा कठिन कार्य नहीं है| यह थोड़ी – सी पूजा मात्र से ही प्रसन्न हो जाते है| हनुमान जी को प्रसन्न करके उनकी कृपा पाने के लिए लोग अलग – अलग प्रकार के पूजा पाठ करते है|

इन्ही में से एक सुंदरकांड पाठ भी है| जिसका पाठ हनुमान जी को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| सुंदरकांड पाठ को एक बहुत बड़े कार्यक्रम के रूप में भी किया जाता है|

जिसके लिए अनुभवी पंडितों की आवश्यकता भी होती है| 99Pandit सुंदरकांड पाठ के लिए पंडित जी को ऑनलाइन बुक करने का सबसे अच्छा प्लेटफार्म है|

लोगों का अक्सर यही सवाल होता है कि यदि वे ऑनलाइन पंडित जी को बुक करते है ,सुंदरकांड पाठ के लिए पंडित जी की कीमत क्या होगी, क्या पंडित जी उनकी कीमत को लेकर बातचीत करेंगे या नहीं,

सुंदरकांड पाठ के लिए ऑनलाइन या ऑफलाइन पंडित जी को बुक करने की विधि किस प्रकार होगी, क्या 99Pandit आपको हर भाषा में पंडित उपलब्ध करवा सकता है|

कुछ इस प्रकार के ही सवाल लोगों के दिमाग में आते है| इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको हमारी वेबसाइट 99Pandit पर सुंदरकांड पाठ के लिरिक्स के बारे में बताएँगे|

Shree Sundarkand Path Lyrics – जामवंत के बचन सुहाए

।।आसन।।

कथा प्रारम्भ होत है। सुनहुँ वीर हनुमान।।
आसान लीजो प्रेम से। करहुँ सदा कल्याण।।

|| श्लोक ||

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं,
ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्,
रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं,
वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूड़ामणिम् ।।1।।

नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये
सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा।
भक्तिं प्रयच्छ रघुपुङ्गव निर्भरां मे
कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च ।।2।।

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्।
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ।।3।।

जामवंत के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए।।
तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुख कंद मूल फल खाई।।
जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी।।
यह कहि नाइ सबन्हि कहुँ माथा। चलेउ हरषि हियँ धरि रघुनाथा।।
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदि चढ़ेउ ता ऊपर।।
बार बार रघुबीर सँभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी।।
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता।।
जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भाँति चलेउ हनुमाना।।
जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी।।
दो0- हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम।
राम काजु कीन्हें बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ।।1।।

जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुँ बल बुद्धि बिसेषा।।
सुरसा नाम अहिन्ह कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता।।
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा।।
राम काजु करि फिरि मैं आवौं। सीता कइ सुधि प्रभुहि सुनावौं।।
तब तव बदन पैठिहउँ आई। सत्य कहउँ मोहि जान दे माई।।
कबनेहुँ जतन देइ नहिं जाना। ग्रससि न मोहि कहेउ हनुमाना।।
जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा।।
सोरह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तिस भयऊ।।
जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा।।
सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा।।
बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा।।
मोहि सुरन्ह जेहि लागि पठावा। बुधि बल मरमु तोर मै पावा।।
दो0-राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान।
आसिष देह गई सो हरषि चलेउ हनुमान ।।2।।

निसिचरि एक सिंधु महुँ रहई। करि माया नभु के खग गहई।।
जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं।।
गहइ छाहँ सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई।।
सोइ छल हनूमान कहँ कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा।।
ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा।।
तहाँ जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा।।
नाना तरु फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए।।
सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढेउ भय त्यागें।।
उमा न कछु कपि कै अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई।।
गिरि पर चढि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग बिसेषी।।
अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।।
छं=कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना।
चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना।।
गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथिन्ह को गनै।।
बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।।1।।
बन बाग उपबन बाटिका सर कूप बापीं सोहहीं।
नर नाग सुर गंधर्ब कन्या रूप मुनि मन मोहहीं।।
कहुँ माल देह बिसाल सैल समान अतिबल गर्जहीं।
नाना अखारेन्ह भिरहिं बहु बिधि एक एकन्ह तर्जहीं।।2।।
करि जतन भट कोटिन्ह बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं।
कहुँ महिष मानषु धेनु खर अज खल निसाचर भच्छहीं।।
एहि लागि तुलसीदास इन्ह की कथा कछु एक है कही।
रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि त्यागि गति पैहहिं सही।।3।।
दो0-पुर रखवारे देखि बहु कपि मन कीन्ह बिचार।
अति लघु रूप धरौं निसि नगर करौं पइसार।।3।।

मसक समान रूप कपि धरी। लंकहि चलेउ सुमिरि नरहरी।।
नाम लंकिनी एक निसिचरी। सो कह चलेसि मोहि निंदरी।।
जानेहि नहीं मरमु सठ मोरा। मोर अहार जहाँ लगि चोरा।।
मुठिका एक महा कपि हनी। रुधिर बमत धरनीं ढनमनी।।
पुनि संभारि उठि सो लंका। जोरि पानि कर बिनय संसका।।
जब रावनहि ब्रह्म बर दीन्हा। चलत बिरंचि कहा मोहि चीन्हा।।
बिकल होसि तैं कपि कें मारे। तब जानेसु निसिचर संघारे।।
तात मोर अति पुन्य बहूता। देखेउँ नयन राम कर दूता।।
दो0-तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग।।4।।

प्रबिसि नगर कीजे सब काजा। हृदयँ राखि कौसलपुर राजा।।
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
गरुड़ सुमेरु रेनू सम ताही। राम कृपा करि चितवा जाही।।
अति लघु रूप धरेउ हनुमाना। पैठा नगर सुमिरि भगवाना।।
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहँ तहँ अगनित जोधा।।
गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं।।
सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुँ न दीखि बैदेही।।
भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहँ भिन्न बनावा।।
दो0-रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ।
नव तुलसिका बृंद तहँ देखि हरषि कपिराइ ।।5।।

लंका निसिचर निकर निवासा। इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा।।
मन महुँ तरक करै कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा।।
राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा।।
एहि सन हठि करिहउँ पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी।।
बिप्र रुप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहँ आए।।
करि प्रनाम पूँछी कुसलाई। बिप्र कहहु निज कथा बुझाई।।
की तुम्ह हरि दासन्ह महँ कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई।।
की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी।।
दो0-तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम।
सुनत जुगल तन पुलक मन मगन सुमिरि गुन ग्राम।।6।।

सुनहु पवनसुत रहनि हमारी। जिमि दसनन्हि महुँ जीभ बिचारी।।
तात कबहुँ मोहि जानि अनाथा। करिहहिं कृपा भानुकुल नाथा।।
तामस तनु कछु साधन नाहीं। प्रीति न पद सरोज मन माहीं।।
अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता।।
जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा।।
सुनहु बिभीषन प्रभु कै रीती। करहिं सदा सेवक पर प्रीती।।
कहहु कवन मैं परम कुलीना। कपि चंचल सबहीं बिधि हीना।।
प्रात लेइ जो नाम हमारा। तेहि दिन ताहि न मिलै अहारा।।
दो0-अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर।
कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।।7।।

जानतहूँ अस स्वामि बिसारी। फिरहिं ते काहे न होहिं दुखारी।।
एहि बिधि कहत राम गुन ग्रामा। पावा अनिर्बाच्य बिश्रामा।।
पुनि सब कथा बिभीषन कही। जेहि बिधि जनकसुता तहँ रही।।
तब हनुमंत कहा सुनु भ्राता। देखी चहउँ जानकी माता।।
जुगुति बिभीषन सकल सुनाई। चलेउ पवनसुत बिदा कराई।।
करि सोइ रूप गयउ पुनि तहवाँ। बन असोक सीता रह जहवाँ।।
देखि मनहि महुँ कीन्ह प्रनामा। बैठेहिं बीति जात निसि जामा।।
कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपति हृदयँ रघुपति गुन श्रेनी।।
दो0-निज पद नयन दिएँ मन राम पद कमल लीन।
परम दुखी भा पवनसुत देखि जानकी दीन।।8।।

तरु पल्लव महुँ रहा लुकाई। करइ बिचार करौं का भाई।।
तेहि अवसर रावनु तहँ आवा। संग नारि बहु किएँ बनावा।।
बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा।।
कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी।।
तव अनुचरीं करउँ पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा।।
तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही।।
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुँ कि नलिनी करइ बिकासा।।
अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की।।
सठ सूने हरि आनेहि मोहि। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही।।
दो0- आपुहि सुनि खद्योत सम रामहि भानु समान।
परुष बचन सुनि काढ़ि असि बोला अति खिसिआन।।9।।

सीता तैं मम कृत अपमाना। कटिहउँ तव सिर कठिन कृपाना।।
नाहिं त सपदि मानु मम बानी। सुमुखि होति न त जीवन हानी।।
स्याम सरोज दाम सम सुंदर। प्रभु भुज करि कर सम दसकंधर।।
सो भुज कंठ कि तव असि घोरा। सुनु सठ अस प्रवान पन मोरा।।
चंद्रहास हरु मम परितापं। रघुपति बिरह अनल संजातं।।
सीतल निसित बहसि बर धारा। कह सीता हरु मम दुख भारा।।
सुनत बचन पुनि मारन धावा। मयतनयाँ कहि नीति बुझावा।।
कहेसि सकल निसिचरिन्ह बोलाई। सीतहि बहु बिधि त्रासहु जाई।।
मास दिवस महुँ कहा न माना। तौ मैं मारबि काढ़ि कृपाना।।
दो0-भवन गयउ दसकंधर इहाँ पिसाचिनि बृंद।
सीतहि त्रास देखावहि धरहिं रूप बहु मंद।।10।।

सुंदरकांड पाठ

त्रिजटा नाम राच्छसी एका। राम चरन रति निपुन बिबेका।।
सबन्हौ बोलि सुनाएसि सपना। सीतहि सेइ करहु हित अपना।।
सपनें बानर लंका जारी। जातुधान सेना सब मारी।।
खर आरूढ़ नगन दससीसा। मुंडित सिर खंडित भुज बीसा।।
एहि बिधि सो दच्छिन दिसि जाई। लंका मनहुँ बिभीषन पाई।।
नगर फिरी रघुबीर दोहाई। तब प्रभु सीता बोलि पठाई।।
यह सपना में कहउँ पुकारी। होइहि सत्य गएँ दिन चारी।।
तासु बचन सुनि ते सब डरीं। जनकसुता के चरनन्हि परीं।।
दो0-जहँ तहँ गईं सकल तब सीता कर मन सोच।
मास दिवस बीतें मोहि मारिहि निसिचर पोच।।11।।

त्रिजटा सन बोली कर जोरी। मातु बिपति संगिनि तैं मोरी।।
तजौं देह करु बेगि उपाई। दुसहु बिरहु अब नहिं सहि जाई।।
आनि काठ रचु चिता बनाई। मातु अनल पुनि देहि लगाई।।
सत्य करहि मम प्रीति सयानी। सुनै को श्रवन सूल सम बानी।।
सुनत बचन पद गहि समुझाएसि। प्रभु प्रताप बल सुजसु सुनाएसि।।
निसि न अनल मिल सुनु सुकुमारी। अस कहि सो निज भवन सिधारी।।
कह सीता बिधि भा प्रतिकूला। मिलहि न पावक मिटिहि न सूला।।
देखिअत प्रगट गगन अंगारा। अवनि न आवत एकउ तारा।।
पावकमय ससि स्त्रवत न आगी। मानहुँ मोहि जानि हतभागी।।
सुनहि बिनय मम बिटप असोका। सत्य नाम करु हरु मम सोका।।
नूतन किसलय अनल समाना। देहि अगिनि जनि करहि निदाना।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। सो छन कपिहि कलप सम बीता।।
सो0-कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब।
जनु असोक अंगार दीन्हि हरषि उठि कर गहेउ।।12।।

तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर।।
चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी।।
जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई।।
सीता मन बिचार कर नाना। मधुर बचन बोलेउ हनुमाना।।
रामचंद्र गुन बरनैं लागा। सुनतहिं सीता कर दुख भागा।।
लागीं सुनैं श्रवन मन लाई। आदिहु तें सब कथा सुनाई।।
श्रवनामृत जेहिं कथा सुहाई। कहि सो प्रगट होति किन भाई।।
तब हनुमंत निकट चलि गयऊ। फिरि बैंठीं मन बिसमय भयऊ।।
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की।।
यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहँ सहिदानी।।
नर बानरहि संग कहु कैसें। कहि कथा भइ संगति जैसें।।
दो0-कपि के बचन सप्रेम सुनि उपजा मन बिस्वास।।
जाना मन क्रम बचन यह कृपासिंधु कर दास।।13।।

हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी।।
बूड़त बिरह जलधि हनुमाना। भयउ तात मों कहुँ जलजाना।।
अब कहु कुसल जाउँ बलिहारी। अनुज सहित सुख भवन खरारी।।
कोमलचित कृपाल रघुराई। कपि केहि हेतु धरी निठुराई।।
सहज बानि सेवक सुख दायक। कबहुँक सुरति करत रघुनायक।।
कबहुँ नयन मम सीतल ताता। होइहहि निरखि स्याम मृदु गाता।।
बचनु न आव नयन भरे बारी। अहह नाथ हौं निपट बिसारी।।
देखि परम बिरहाकुल सीता। बोला कपि मृदु बचन बिनीता।।
मातु कुसल प्रभु अनुज समेता। तव दुख दुखी सुकृपा निकेता।।
जनि जननी मानहु जियँ ऊना। तुम्ह ते प्रेमु राम कें दूना।।
दो0-रघुपति कर संदेसु अब सुनु जननी धरि धीर।
अस कहि कपि गद गद भयउ भरे बिलोचन नीर।।14।।

कहेउ राम बियोग तव सीता। मो कहुँ सकल भए बिपरीता।।
नव तरु किसलय मनहुँ कृसानू। कालनिसा सम निसि ससि भानू।।
कुबलय बिपिन कुंत बन सरिसा। बारिद तपत तेल जनु बरिसा।।
जे हित रहे करत तेइ पीरा। उरग स्वास सम त्रिबिध समीरा।।
कहेहू तें कछु दुख घटि होई। काहि कहौं यह जान न कोई।।
तत्व प्रेम कर मम अरु तोरा। जानत प्रिया एकु मनु मोरा।।
सो मनु सदा रहत तोहि पाहीं। जानु प्रीति रसु एतेनहि माहीं।।
प्रभु संदेसु सुनत बैदेही। मगन प्रेम तन सुधि नहिं तेही।।
कह कपि हृदयँ धीर धरु माता। सुमिरु राम सेवक सुखदाता।।
उर आनहु रघुपति प्रभुताई। सुनि मम बचन तजहु कदराई।।
दो0-निसिचर निकर पतंग सम रघुपति बान कृसानु।
जननी हृदयँ धीर धरु जरे निसाचर जानु।।15।।

जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।
कछुक दिवस जननी धरु धीरा। कपिन्ह सहित अइहहिं रघुबीरा।।
निसिचर मारि तोहि लै जैहहिं। तिहुँ पुर नारदादि जसु गैहहिं।।
हैं सुत कपि सब तुम्हहि समाना। जातुधान अति भट बलवाना।।
मोरें हृदय परम संदेहा। सुनि कपि प्रगट कीन्ह निज देहा।।
कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा।।
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ।।
दो0-सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल।
प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल।।16।।

मन संतोष सुनत कपि बानी। भगति प्रताप तेज बल सानी।।
आसिष दीन्हि रामप्रिय जाना। होहु तात बल सील निधाना।।
अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुँ बहुत रघुनायक छोहू।।
करहुँ कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना।।
बार बार नाएसि पद सीसा। बोला बचन जोरि कर कीसा।।
अब कृतकृत्य भयउँ मैं माता। आसिष तव अमोघ बिख्याता।।
सुनहु मातु मोहि अतिसय भूखा। लागि देखि सुंदर फल रूखा।।
सुनु सुत करहिं बिपिन रखवारी। परम सुभट रजनीचर भारी।।
तिन्ह कर भय माता मोहि नाहीं। जौं तुम्ह सुख मानहु मन माहीं।।
दो0-देखि बुद्धि बल निपुन कपि कहेउ जानकीं जाहु।
रघुपति चरन हृदयँ धरि तात मधुर फल खाहु।।17।।

चलेउ नाइ सिरु पैठेउ बागा। फल खाएसि तरु तोरैं लागा।।
रहे तहाँ बहु भट रखवारे। कछु मारेसि कछु जाइ पुकारे।।
नाथ एक आवा कपि भारी। तेहिं असोक बाटिका उजारी।।
खाएसि फल अरु बिटप उपारे। रच्छक मर्दि मर्दि महि डारे।।
सुनि रावन पठए भट नाना। तिन्हहि देखि गर्जेउ हनुमाना।।
सब रजनीचर कपि संघारे। गए पुकारत कछु अधमारे।।
पुनि पठयउ तेहिं अच्छकुमारा। चला संग लै सुभट अपारा।।
आवत देखि बिटप गहि तर्जा। ताहि निपाति महाधुनि गर्जा।।
दो0-कछु मारेसि कछु मर्देसि कछु मिलएसि धरि धूरि।
कछु पुनि जाइ पुकारे प्रभु मर्कट बल भूरि।।18।।

सुनि सुत बध लंकेस रिसाना। पठएसि मेघनाद बलवाना।।
मारसि जनि सुत बांधेसु ताही। देखिअ कपिहि कहाँ कर आही।।
चला इंद्रजित अतुलित जोधा। बंधु निधन सुनि उपजा क्रोधा।।
कपि देखा दारुन भट आवा। कटकटाइ गर्जा अरु धावा।।
अति बिसाल तरु एक उपारा। बिरथ कीन्ह लंकेस कुमारा।।
रहे महाभट ताके संगा। गहि गहि कपि मर्दइ निज अंगा।।
तिन्हहि निपाति ताहि सन बाजा। भिरे जुगल मानहुँ गजराजा।
मुठिका मारि चढ़ा तरु जाई। ताहि एक छन मुरुछा आई।।
उठि बहोरि कीन्हिसि बहु माया। जीति न जाइ प्रभंजन जाया।।
दो0-ब्रह्म अस्त्र तेहिं साँधा कपि मन कीन्ह बिचार।
जौं न ब्रह्मसर मानउँ महिमा मिटइ अपार।।19।।

ब्रह्मबान कपि कहुँ तेहि मारा। परतिहुँ बार कटकु संघारा।।
तेहि देखा कपि मुरुछित भयऊ। नागपास बाँधेसि लै गयऊ।।
जासु नाम जपि सुनहु भवानी। भव बंधन काटहिं नर ग्यानी।।
तासु दूत कि बंध तरु आवा। प्रभु कारज लगि कपिहिं बँधावा।।
कपि बंधन सुनि निसिचर धाए। कौतुक लागि सभाँ सब आए।।
दसमुख सभा दीखि कपि जाई। कहि न जाइ कछु अति प्रभुताई।।
कर जोरें सुर दिसिप बिनीता। भृकुटि बिलोकत सकल सभीता।।
देखि प्रताप न कपि मन संका। जिमि अहिगन महुँ गरुड़ असंका।।
दो0-कपिहि बिलोकि दसानन बिहसा कहि दुर्बाद।
सुत बध सुरति कीन्हि पुनि उपजा हृदयँ बिषाद।।20।।

सुंदरकांड पाठ

कह लंकेस कवन तैं कीसा। केहिं के बल घालेहि बन खीसा।।
की धौं श्रवन सुनेहि नहिं मोही। देखउँ अति असंक सठ तोही।।
मारे निसिचर केहिं अपराधा। कहु सठ तोहि न प्रान कइ बाधा।।
सुन रावन ब्रह्मांड निकाया। पाइ जासु बल बिरचित माया।।
जाकें बल बिरंचि हरि ईसा। पालत सृजत हरत दससीसा।
जा बल सीस धरत सहसानन। अंडकोस समेत गिरि कानन।।
धरइ जो बिबिध देह सुरत्राता। तुम्ह ते सठन्ह सिखावनु दाता।
हर कोदंड कठिन जेहि भंजा। तेहि समेत नृप दल मद गंजा।।
खर दूषन त्रिसिरा अरु बाली। बधे सकल अतुलित बलसाली।।
दो0-जाके बल लवलेस तें जितेहु चराचर झारि।
तासु दूत मैं जा करि हरि आनेहु प्रिय नारि।।21।।

जानउँ मैं तुम्हरि प्रभुताई। सहसबाहु सन परी लराई।।
समर बालि सन करि जसु पावा। सुनि कपि बचन बिहसि बिहरावा।।
खायउँ फल प्रभु लागी भूँखा। कपि सुभाव तें तोरेउँ रूखा।।
सब कें देह परम प्रिय स्वामी। मारहिं मोहि कुमारग गामी।।
जिन्ह मोहि मारा ते मैं मारे। तेहि पर बाँधेउ तनयँ तुम्हारे।।
मोहि न कछु बाँधे कइ लाजा। कीन्ह चहउँ निज प्रभु कर काजा।।
बिनती करउँ जोरि कर रावन। सुनहु मान तजि मोर सिखावन।।
देखहु तुम्ह निज कुलहि बिचारी। भ्रम तजि भजहु भगत भय हारी।।
जाकें डर अति काल डेराई। जो सुर असुर चराचर खाई।।
तासों बयरु कबहुँ नहिं कीजै। मोरे कहें जानकी दीजै।।
दो0-प्रनतपाल रघुनायक करुना सिंधु खरारि।
गएँ सरन प्रभु राखिहैं तव अपराध बिसारि।।22।।

राम चरन पंकज उर धरहू। लंका अचल राज तुम्ह करहू।।
रिषि पुलिस्त जसु बिमल मंयका। तेहि ससि महुँ जनि होहु कलंका।।
राम नाम बिनु गिरा न सोहा। देखु बिचारि त्यागि मद मोहा।।
बसन हीन नहिं सोह सुरारी। सब भूषण भूषित बर नारी।।
राम बिमुख संपति प्रभुताई। जाइ रही पाई बिनु पाई।।
सजल मूल जिन्ह सरितन्ह नाहीं। बरषि गए पुनि तबहिं सुखाहीं।।
सुनु दसकंठ कहउँ पन रोपी। बिमुख राम त्राता नहिं कोपी।।
संकर सहस बिष्नु अज तोही। सकहिं न राखि राम कर द्रोही।।
दो0-मोहमूल बहु सूल प्रद त्यागहु तम अभिमान।
भजहु राम रघुनायक कृपा सिंधु भगवान।।23।।

जदपि कहि कपि अति हित बानी। भगति बिबेक बिरति नय सानी।।
बोला बिहसि महा अभिमानी। मिला हमहि कपि गुर बड़ ग्यानी।।
मृत्यु निकट आई खल तोही। लागेसि अधम सिखावन मोही।।
उलटा होइहि कह हनुमाना। मतिभ्रम तोर प्रगट मैं जाना।।
सुनि कपि बचन बहुत खिसिआना। बेगि न हरहुँ मूढ़ कर प्राना।।
सुनत निसाचर मारन धाए। सचिवन्ह सहित बिभीषनु आए।
नाइ सीस करि बिनय बहूता। नीति बिरोध न मारिअ दूता।।
आन दंड कछु करिअ गोसाँई। सबहीं कहा मंत्र भल भाई।।
सुनत बिहसि बोला दसकंधर। अंग भंग करि पठइअ बंदर।।
दो-कपि कें ममता पूँछ पर सबहि कहउँ समुझाइ।
तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ।।24।।

पूँछहीन बानर तहँ जाइहि। तब सठ निज नाथहि लइ आइहि।।
जिन्ह कै कीन्हसि बहुत बड़ाई। देखेउँûमैं तिन्ह कै प्रभुताई।।
बचन सुनत कपि मन मुसुकाना। भइ सहाय सारद मैं जाना।।
जातुधान सुनि रावन बचना। लागे रचैं मूढ़ सोइ रचना।।
रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला।।
कौतुक कहँ आए पुरबासी। मारहिं चरन करहिं बहु हाँसी।।
बाजहिं ढोल देहिं सब तारी। नगर फेरि पुनि पूँछ प्रजारी।।
पावक जरत देखि हनुमंता। भयउ परम लघु रुप तुरंता।।
निबुकि चढ़ेउ कपि कनक अटारीं। भई सभीत निसाचर नारीं।।
दो0-हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास।
अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग अकास।।25।।

देह बिसाल परम हरुआई। मंदिर तें मंदिर चढ़ धाई।।
जरइ नगर भा लोग बिहाला। झपट लपट बहु कोटि कराला।।
तात मातु हा सुनिअ पुकारा। एहि अवसर को हमहि उबारा।।
हम जो कहा यह कपि नहिं होई। बानर रूप धरें सुर कोई।।
साधु अवग्या कर फलु ऐसा। जरइ नगर अनाथ कर जैसा।।
जारा नगरु निमिष एक माहीं। एक बिभीषन कर गृह नाहीं।।
ता कर दूत अनल जेहिं सिरिजा। जरा न सो तेहि कारन गिरिजा।।
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मझारी।।
दो0-पूँछ बुझाइ खोइ श्रम धरि लघु रूप बहोरि।
जनकसुता के आगें ठाढ़ भयउ कर जोरि।।26।।

मातु मोहि दीजे कछु चीन्हा। जैसें रघुनायक मोहि दीन्हा।।
चूड़ामनि उतारि तब दयऊ। हरष समेत पवनसुत लयऊ।।
कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा।।
दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी।।
तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु।।
मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा।।
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना।।
तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती।।
दो0-जनकसुतहि समुझाइ करि बहु बिधि धीरजु दीन्ह।
चरन कमल सिरु नाइ कपि गवनु राम पहिं कीन्ह।।27।।

चलत महाधुनि गर्जेसि भारी। गर्भ स्त्रवहिं सुनि निसिचर नारी।।
नाघि सिंधु एहि पारहि आवा। सबद किलकिला कपिन्ह सुनावा।।
हरषे सब बिलोकि हनुमाना। नूतन जन्म कपिन्ह तब जाना।।
मुख प्रसन्न तन तेज बिराजा। कीन्हेसि रामचन्द्र कर काजा।।
मिले सकल अति भए सुखारी। तलफत मीन पाव जिमि बारी।।
चले हरषि रघुनायक पासा। पूँछत कहत नवल इतिहासा।।
तब मधुबन भीतर सब आए। अंगद संमत मधु फल खाए।।
रखवारे जब बरजन लागे। मुष्टि प्रहार हनत सब भागे।।
दो0-जाइ पुकारे ते सब बन उजार जुबराज।
सुनि सुग्रीव हरष कपि करि आए प्रभु काज।।28।।

जौं न होति सीता सुधि पाई। मधुबन के फल सकहिं कि खाई।।
एहि बिधि मन बिचार कर राजा। आइ गए कपि सहित समाजा।।
आइ सबन्हि नावा पद सीसा। मिलेउ सबन्हि अति प्रेम कपीसा।।
पूँछी कुसल कुसल पद देखी। राम कृपाँ भा काजु बिसेषी।।
नाथ काजु कीन्हेउ हनुमाना। राखे सकल कपिन्ह के प्राना।।
सुनि सुग्रीव बहुरि तेहि मिलेऊ। कपिन्ह सहित रघुपति पहिं चलेऊ।
राम कपिन्ह जब आवत देखा। किएँ काजु मन हरष बिसेषा।।
फटिक सिला बैठे द्वौ भाई। परे सकल कपि चरनन्हि जाई।।
दो0-प्रीति सहित सब भेटे रघुपति करुना पुंज।
पूँछी कुसल नाथ अब कुसल देखि पद कंज।।29।।

जामवंत कह सुनु रघुराया। जा पर नाथ करहु तुम्ह दाया।।
ताहि सदा सुभ कुसल निरंतर। सुर नर मुनि प्रसन्न ता ऊपर।।
सोइ बिजई बिनई गुन सागर। तासु सुजसु त्रेलोक उजागर।।
प्रभु कीं कृपा भयउ सबु काजू। जन्म हमार सुफल भा आजू।।
नाथ पवनसुत कीन्हि जो करनी। सहसहुँ मुख न जाइ सो बरनी।।
पवनतनय के चरित सुहाए। जामवंत रघुपतिहि सुनाए।।
सुनत कृपानिधि मन अति भाए। पुनि हनुमान हरषि हियँ लाए।।
कहहु तात केहि भाँति जानकी। रहति करति रच्छा स्वप्रान की।।
दो0-नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहिं बाट।।30।।

चलत मोहि चूड़ामनि दीन्ही। रघुपति हृदयँ लाइ सोइ लीन्ही।।
नाथ जुगल लोचन भरि बारी। बचन कहे कछु जनककुमारी।।
अनुज समेत गहेहु प्रभु चरना। दीन बंधु प्रनतारति हरना।।
मन क्रम बचन चरन अनुरागी। केहि अपराध नाथ हौं त्यागी।।
अवगुन एक मोर मैं माना। बिछुरत प्रान न कीन्ह पयाना।।
नाथ सो नयनन्हि को अपराधा। निसरत प्रान करिहिं हठि बाधा।।
बिरह अगिनि तनु तूल समीरा। स्वास जरइ छन माहिं सरीरा।।
नयन स्त्रवहि जलु निज हित लागी। जरैं न पाव देह बिरहागी।
सीता के अति बिपति बिसाला। बिनहिं कहें भलि दीनदयाला।।
दो0-निमिष निमिष करुनानिधि जाहिं कलप सम बीति।
बेगि चलिय प्रभु आनिअ भुज बल खल दल जीति।।31।।

सुनि सीता दुख प्रभु सुख अयना। भरि आए जल राजिव नयना।।
बचन काँय मन मम गति जाही। सपनेहुँ बूझिअ बिपति कि ताही।।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई।।
केतिक बात प्रभु जातुधान की। रिपुहि जीति आनिबी जानकी।।
सुनु कपि तोहि समान उपकारी। नहिं कोउ सुर नर मुनि तनुधारी।।
प्रति उपकार करौं का तोरा। सनमुख होइ न सकत मन मोरा।।
सुनु सुत उरिन मैं नाहीं। देखेउँ करि बिचार मन माहीं।।
पुनि पुनि कपिहि चितव सुरत्राता। लोचन नीर पुलक अति गाता।।
दो0-सुनि प्रभु बचन बिलोकि मुख गात हरषि हनुमंत।
चरन परेउ प्रेमाकुल त्राहि त्राहि भगवंत।।32।।

बार बार प्रभु चहइ उठावा। प्रेम मगन तेहि उठब न भावा।।
प्रभु कर पंकज कपि कें सीसा। सुमिरि सो दसा मगन गौरीसा।।
सावधान मन करि पुनि संकर। लागे कहन कथा अति सुंदर।।
कपि उठाइ प्रभु हृदयँ लगावा। कर गहि परम निकट बैठावा।।
कहु कपि रावन पालित लंका। केहि बिधि दहेउ दुर्ग अति बंका।।
प्रभु प्रसन्न जाना हनुमाना। बोला बचन बिगत अभिमाना।।
साखामृग के बड़ि मनुसाई। साखा तें साखा पर जाई।।
नाघि सिंधु हाटकपुर जारा। निसिचर गन बिधि बिपिन उजारा।
सो सब तव प्रताप रघुराई। नाथ न कछू मोरि प्रभुताई।।
दो0- ता कहुँ प्रभु कछु अगम नहिं जा पर तुम्ह अनुकुल।
तब प्रभावँ बड़वानलहिं जारि सकइ खलु तूल।।33।।

नाथ भगति अति सुखदायनी। देहु कृपा करि अनपायनी।।
सुनि प्रभु परम सरल कपि बानी। एवमस्तु तब कहेउ भवानी।।
उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।
यह संवाद जासु उर आवा। रघुपति चरन भगति सोइ पावा।।
सुनि प्रभु बचन कहहिं कपिबृंदा। जय जय जय कृपाल सुखकंदा।।
तब रघुपति कपिपतिहि बोलावा। कहा चलैं कर करहु बनावा।।
अब बिलंबु केहि कारन कीजे। तुरत कपिन्ह कहुँ आयसु दीजे।।
कौतुक देखि सुमन बहु बरषी। नभ तें भवन चले सुर हरषी।।
दो0-कपिपति बेगि बोलाए आए जूथप जूथ।
नाना बरन अतुल बल बानर भालु बरूथ।।34।।

प्रभु पद पंकज नावहिं सीसा। गरजहिं भालु महाबल कीसा।।
देखी राम सकल कपि सेना। चितइ कृपा करि राजिव नैना।।
राम कृपा बल पाइ कपिंदा। भए पच्छजुत मनहुँ गिरिंदा।।
हरषि राम तब कीन्ह पयाना। सगुन भए सुंदर सुभ नाना।।
जासु सकल मंगलमय कीती। तासु पयान सगुन यह नीती।।
प्रभु पयान जाना बैदेहीं। फरकि बाम अँग जनु कहि देहीं।।
जोइ जोइ सगुन जानकिहि होई। असगुन भयउ रावनहि सोई।।
चला कटकु को बरनैं पारा। गर्जहि बानर भालु अपारा।।
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी।।
केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं।।

छं0-चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे।
मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किन्नर दुख टरे।।
कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं।
जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं।।1।।
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई।
गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई।।
रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी।
जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी।।2।।
दो0-एहि बिधि जाइ कृपानिधि उतरे सागर तीर।
जहँ तहँ लागे खान फल भालु बिपुल कपि बीर।।35।।

उहाँ निसाचर रहहिं ससंका। जब ते जारि गयउ कपि लंका।।
निज निज गृहँ सब करहिं बिचारा। नहिं निसिचर कुल केर उबारा।।
जासु दूत बल बरनि न जाई। तेहि आएँ पुर कवन भलाई।।
दूतन्हि सन सुनि पुरजन बानी। मंदोदरी अधिक अकुलानी।।
रहसि जोरि कर पति पग लागी। बोली बचन नीति रस पागी।।
कंत करष हरि सन परिहरहू। मोर कहा अति हित हियँ धरहु।।
समुझत जासु दूत कइ करनी। स्त्रवहीं गर्भ रजनीचर धरनी।।
तासु नारि निज सचिव बोलाई। पठवहु कंत जो चहहु भलाई।।
तब कुल कमल बिपिन दुखदाई। सीता सीत निसा सम आई।।
सुनहु नाथ सीता बिनु दीन्हें। हित न तुम्हार संभु अज कीन्हें।।
दो0–राम बान अहि गन सरिस निकर निसाचर भेक।
जब लगि ग्रसत न तब लगि जतनु करहु तजि टेक।।36।।

सुंदरकांड पाठ

श्रवन सुनी सठ ता करि बानी। बिहसा जगत बिदित अभिमानी।।
सभय सुभाउ नारि कर साचा। मंगल महुँ भय मन अति काचा।।
जौं आवइ मर्कट कटकाई। जिअहिं बिचारे निसिचर खाई।।
कंपहिं लोकप जाकी त्रासा। तासु नारि सभीत बड़ि हासा।।
अस कहि बिहसि ताहि उर लाई। चलेउ सभाँ ममता अधिकाई।।
मंदोदरी हृदयँ कर चिंता। भयउ कंत पर बिधि बिपरीता।।
बैठेउ सभाँ खबरि असि पाई। सिंधु पार सेना सब आई।।
बूझेसि सचिव उचित मत कहहू। ते सब हँसे मष्ट करि रहहू।।
जितेहु सुरासुर तब श्रम नाहीं। नर बानर केहि लेखे माही।।
दो0-सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस।
राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगिहीं नास।।37।।

सोइ रावन कहुँ बनि सहाई। अस्तुति करहिं सुनाइ सुनाई।।
अवसर जानि बिभीषनु आवा। भ्राता चरन सीसु तेहिं नावा।।
पुनि सिरु नाइ बैठ निज आसन। बोला बचन पाइ अनुसासन।।
जौ कृपाल पूँछिहु मोहि बाता। मति अनुरुप कहउँ हित ताता।।
जो आपन चाहै कल्याना। सुजसु सुमति सुभ गति सुख नाना।।
सो परनारि लिलार गोसाईं। तजउ चउथि के चंद कि नाई।।
चौदह भुवन एक पति होई। भूतद्रोह तिष्टइ नहिं सोई।।
गुन सागर नागर नर जोऊ। अलप लोभ भल कहइ न कोऊ।।
दो0- काम क्रोध मद लोभ सब नाथ नरक के पंथ।
सब परिहरि रघुबीरहि भजहु भजहिं जेहि संत।।38।।

तात राम नहिं नर भूपाला। भुवनेस्वर कालहु कर काला।।
ब्रह्म अनामय अज भगवंता। ब्यापक अजित अनादि अनंता।।
गो द्विज धेनु देव हितकारी। कृपासिंधु मानुष तनुधारी।।
जन रंजन भंजन खल ब्राता। बेद धर्म रच्छक सुनु भ्राता।।
ताहि बयरु तजि नाइअ माथा। प्रनतारति भंजन रघुनाथा।।
देहु नाथ प्रभु कहुँ बैदेही। भजहु राम बिनु हेतु सनेही।।
सरन गएँ प्रभु ताहु न त्यागा। बिस्व द्रोह कृत अघ जेहि लागा।।
जासु नाम त्रय ताप नसावन। सोइ प्रभु प्रगट समुझु जियँ रावन।।
दो0-बार बार पद लागउँ बिनय करउँ दससीस।
परिहरि मान मोह मद भजहु कोसलाधीस।।39(क)।।
मुनि पुलस्ति निज सिष्य सन कहि पठई यह बात।
तुरत सो मैं प्रभु सन कही पाइ सुअवसरु तात।।39(ख)।।

माल्यवंत अति सचिव सयाना। तासु बचन सुनि अति सुख माना।।
तात अनुज तव नीति बिभूषन। सो उर धरहु जो कहत बिभीषन।।
रिपु उतकरष कहत सठ दोऊ। दूरि न करहु इहाँ हइ कोऊ।।
माल्यवंत गृह गयउ बहोरी। कहइ बिभीषनु पुनि कर जोरी।।
सुमति कुमति सब कें उर रहहीं। नाथ पुरान निगम अस कहहीं।।
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना। जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना।।
तव उर कुमति बसी बिपरीता। हित अनहित मानहु रिपु प्रीता।।
कालराति निसिचर कुल केरी। तेहि सीता पर प्रीति घनेरी।।
दो0-तात चरन गहि मागउँ राखहु मोर दुलार।
सीत देहु राम कहुँ अहित न होइ तुम्हार।।40।।

बुध पुरान श्रुति संमत बानी। कही बिभीषन नीति बखानी।।
सुनत दसानन उठा रिसाई। खल तोहि निकट मुत्यु अब आई।।
जिअसि सदा सठ मोर जिआवा। रिपु कर पच्छ मूढ़ तोहि भावा।।
कहसि न खल अस को जग माहीं। भुज बल जाहि जिता मैं नाही।।
मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती। सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती।।
अस कहि कीन्हेसि चरन प्रहारा। अनुज गहे पद बारहिं बारा।।
उमा संत कइ इहइ बड़ाई। मंद करत जो करइ भलाई।।
तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा।।
सचिव संग लै नभ पथ गयऊ। सबहि सुनाइ कहत अस भयऊ।।
दो0=रामु सत्यसंकल्प प्रभु सभा कालबस तोरि।
मै रघुबीर सरन अब जाउँ देहु जनि खोरि।।41।।

अस कहि चला बिभीषनु जबहीं। आयूहीन भए सब तबहीं।।
साधु अवग्या तुरत भवानी। कर कल्यान अखिल कै हानी।।
रावन जबहिं बिभीषन त्यागा। भयउ बिभव बिनु तबहिं अभागा।।
चलेउ हरषि रघुनायक पाहीं। करत मनोरथ बहु मन माहीं।।
देखिहउँ जाइ चरन जलजाता। अरुन मृदुल सेवक सुखदाता।।
जे पद परसि तरी रिषिनारी। दंडक कानन पावनकारी।।
जे पद जनकसुताँ उर लाए। कपट कुरंग संग धर धाए।।
हर उर सर सरोज पद जेई। अहोभाग्य मै देखिहउँ तेई।।
दो0= जिन्ह पायन्ह के पादुकन्हि भरतु रहे मन लाइ।
ते पद आजु बिलोकिहउँ इन्ह नयनन्हि अब जाइ।।42।।

एहि बिधि करत सप्रेम बिचारा। आयउ सपदि सिंधु एहिं पारा।।
कपिन्ह बिभीषनु आवत देखा। जाना कोउ रिपु दूत बिसेषा।।
ताहि राखि कपीस पहिं आए। समाचार सब ताहि सुनाए।।
कह सुग्रीव सुनहु रघुराई। आवा मिलन दसानन भाई।।
कह प्रभु सखा बूझिऐ काहा। कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।
जानि न जाइ निसाचर माया। कामरूप केहि कारन आया।।
भेद हमार लेन सठ आवा। राखिअ बाँधि मोहि अस भावा।।
सखा नीति तुम्ह नीकि बिचारी। मम पन सरनागत भयहारी।।
सुनि प्रभु बचन हरष हनुमाना। सरनागत बच्छल भगवाना।।
दो0=सरनागत कहुँ जे तजहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।।43।।

कोटि बिप्र बध लागहिं जाहू। आएँ सरन तजउँ नहिं ताहू।।
सनमुख होइ जीव मोहि जबहीं। जन्म कोटि अघ नासहिं तबहीं।।
पापवंत कर सहज सुभाऊ। भजनु मोर तेहि भाव न काऊ।।
जौं पै दुष्टहदय सोइ होई। मोरें सनमुख आव कि सोई।।
निर्मल मन जन सो मोहि पावा। मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।
भेद लेन पठवा दससीसा। तबहुँ न कछु भय हानि कपीसा।।
जग महुँ सखा निसाचर जेते। लछिमनु हनइ निमिष महुँ तेते।।
जौं सभीत आवा सरनाई। रखिहउँ ताहि प्रान की नाई।।
दो0=उभय भाँति तेहि आनहु हँसि कह कृपानिकेत।
जय कृपाल कहि चले अंगद हनू समेत।।44।।

सादर तेहि आगें करि बानर। चले जहाँ रघुपति करुनाकर।।
दूरिहि ते देखे द्वौ भ्राता। नयनानंद दान के दाता।।
बहुरि राम छबिधाम बिलोकी। रहेउ ठटुकि एकटक पल रोकी।।
भुज प्रलंब कंजारुन लोचन। स्यामल गात प्रनत भय मोचन।।
सिंघ कंध आयत उर सोहा। आनन अमित मदन मन मोहा।।
नयन नीर पुलकित अति गाता। मन धरि धीर कही मृदु बाता।।
नाथ दसानन कर मैं भ्राता। निसिचर बंस जनम सुरत्राता।।
सहज पापप्रिय तामस देहा। जथा उलूकहि तम पर नेहा।।
दो0-श्रवन सुजसु सुनि आयउँ प्रभु भंजन भव भीर।
त्राहि त्राहि आरति हरन सरन सुखद रघुबीर।।45।।

अस कहि करत दंडवत देखा। तुरत उठे प्रभु हरष बिसेषा।।
दीन बचन सुनि प्रभु मन भावा। भुज बिसाल गहि हृदयँ लगावा।।
अनुज सहित मिलि ढिग बैठारी। बोले बचन भगत भयहारी।।
कहु लंकेस सहित परिवारा। कुसल कुठाहर बास तुम्हारा।।
खल मंडलीं बसहु दिनु राती। सखा धरम निबहइ केहि भाँती।।
मैं जानउँ तुम्हारि सब रीती। अति नय निपुन न भाव अनीती।।
बरु भल बास नरक कर ताता। दुष्ट संग जनि देइ बिधाता।।
अब पद देखि कुसल रघुराया। जौं तुम्ह कीन्ह जानि जन दाया।।
दो0-तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन बिश्राम।
जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।।46।।

तब लगि हृदयँ बसत खल नाना। लोभ मोह मच्छर मद माना।।
जब लगि उर न बसत रघुनाथा। धरें चाप सायक कटि भाथा।।
ममता तरुन तमी अँधिआरी। राग द्वेष उलूक सुखकारी।।
तब लगि बसति जीव मन माहीं। जब लगि प्रभु प्रताप रबि नाहीं।।
अब मैं कुसल मिटे भय भारे। देखि राम पद कमल तुम्हारे।।
तुम्ह कृपाल जा पर अनुकूला। ताहि न ब्याप त्रिबिध भव सूला।।
मैं निसिचर अति अधम सुभाऊ। सुभ आचरनु कीन्ह नहिं काऊ।।
जासु रूप मुनि ध्यान न आवा। तेहिं प्रभु हरषि हृदयँ मोहि लावा।।
दो0–अहोभाग्य मम अमित अति राम कृपा सुख पुंज।
देखेउँ नयन बिरंचि सिब सेब्य जुगल पद कंज।।47।।

सुनहु सखा निज कहउँ सुभाऊ। जान भुसुंडि संभु गिरिजाऊ।।
जौं नर होइ चराचर द्रोही। आवे सभय सरन तकि मोही।।
तजि मद मोह कपट छल नाना। करउँ सद्य तेहि साधु समाना।।
जननी जनक बंधु सुत दारा। तनु धनु भवन सुह्रद परिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी। मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
समदरसी इच्छा कछु नाहीं। हरष सोक भय नहिं मन माहीं।।
अस सज्जन मम उर बस कैसें। लोभी हृदयँ बसइ धनु जैसें।।
तुम्ह सारिखे संत प्रिय मोरें। धरउँ देह नहिं आन निहोरें।।
दो0- सगुन उपासक परहित निरत नीति दृढ़ नेम।
ते नर प्रान समान मम जिन्ह कें द्विज पद प्रेम।।48।।

सुनु लंकेस सकल गुन तोरें। तातें तुम्ह अतिसय प्रिय मोरें।।
राम बचन सुनि बानर जूथा। सकल कहहिं जय कृपा बरूथा।।
सुनत बिभीषनु प्रभु कै बानी। नहिं अघात श्रवनामृत जानी।।
पद अंबुज गहि बारहिं बारा। हृदयँ समात न प्रेमु अपारा।।
सुनहु देव सचराचर स्वामी। प्रनतपाल उर अंतरजामी।।
उर कछु प्रथम बासना रही। प्रभु पद प्रीति सरित सो बही।।
अब कृपाल निज भगति पावनी। देहु सदा सिव मन भावनी।।
एवमस्तु कहि प्रभु रनधीरा। मागा तुरत सिंधु कर नीरा।।
जदपि सखा तव इच्छा नाहीं। मोर दरसु अमोघ जग माहीं।।
अस कहि राम तिलक तेहि सारा। सुमन बृष्टि नभ भई अपारा।।
दो0-रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड।
जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।।
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।।
निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।।
पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।।
बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।।
सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।।
संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।।
कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।।
जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।
दो0-प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि।
बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।।
मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।।
नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।।
कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।।
सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।।
अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।।
प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।।
जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।
दो0-सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह।
प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।।
रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।।
कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।।
सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।।
बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।।
जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।।
सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।।
रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।
दो0-कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार।
सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।।
कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।।
बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।।
पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।।
करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।।
पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।।
जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।।
कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।
दो0–की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर।
कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
दो0-द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

सुंदरकांड पाठ

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
दो0–सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर। तव भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
दो0–बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
दो0-बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।।
सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।।
ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।।
क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।।
अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।।
संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।।
मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।।
कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।
दो0-काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच।
बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।।
गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।।
तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।।
प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।।
प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।।
ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।।
प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।।
प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
दो0-सुनत बिनीत बचन अति कह कृपाल मुसुकाइ।
जेहि बिधि उतरै कपि कटकु तात सो कहहु उपाइ।।59।।

नाथ नील नल कपि द्वौ भाई। लरिकाई रिषि आसिष पाई।।
तिन्ह के परस किएँ गिरि भारे। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारे।।
मैं पुनि उर धरि प्रभुताई। करिहउँ बल अनुमान सहाई।।
एहि बिधि नाथ पयोधि बँधाइअ। जेहिं यह सुजसु लोक तिहुँ गाइअ।।
एहि सर मम उत्तर तट बासी। हतहु नाथ खल नर अघ रासी।।
सुनि कृपाल सागर मन पीरा। तुरतहिं हरी राम रनधीरा।।
देखि राम बल पौरुष भारी। हरषि पयोनिधि भयउ सुखारी।।
सकल चरित कहि प्रभुहि सुनावा। चरन बंदि पाथोधि सिधावा।।
छं0-निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ।
यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ।।
सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना।।
तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना।।
दो0-सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान।
सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान।।60।।

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
पञ्चमः सोपानः समाप्तः।
सम्पूर्ण सुन्दरकाण्ड पाठ,

(इति सुन्दरकाण्ड समाप्त)

|| सुन्दरकाण्ड समापन दोहा ||

कथा विसर्जन होत है,
सुनहु वीर हनुमान।
जो जन जहाँ से आत है,
जह तह करो प्रयाण।।
राम लखन सिया जानकी,
सदा करहूँ कल्याण।
रामायण वैकुण्ठ की,
विदा होत हनुमान।।
सियावर रामचंद्र की जय।
पवनसुत हनुमान की जय।

Gayatri Mantra Meaning English – Sanskrit Lyrics, Hindi Translation

Gayatri Mantra Meaning: Gayatri Mantra is one of the most revered and influential Vedic hymns in Hinduism. It is also known as the Savitri mantra and is often chanted for enlightenment and knowledge. 

First recorded in the Rig Veda, an old scripture, holds deep meaning in the life of the Goddess Gayatri devotee. Reversed in its more profound meaning and importance, recitation of this mantra is believed to develop greater union with the divine and bestow numerous advantages on practitioners.

gayatri-mantra-meaning

It is generally chanted in Sanskrit, which is an ancient language of India. Not just that, the vibration generated during its recitation is said to have transformative and purifying effects on the person who recites with absolute devotion. 

With 99Pandit, today we will understand the Gayatri mantra in Sanskrit with its English translation and Hindi meaning. We will also discuss its origin, significance, and how it is chanted. 

Historical Significance and Vedic Origins of the Gayatri Mantra

The Gayatri mantra is said to have originated 3000 years ago. It is mentioned in the Rigveda, precisely in Mandala 3, Sukta 62, Verse 10. The significance of this mantra can also be seen in the Yajurveda. 

According to mythological stories, a Sage named Vishwamitra performed deep meditation and received the Gayatri Mantra as a form of blessing. The mantra is dedicated to Savitr, the solar god who offers the life-giving energies of the Sun. 

Savitr here refers to the divine force that helps life grow and maintain itself. The Gayatri Homam or Mantra is not just a prayer to seek guidance but also an acknowledgement of the inner light and higher awareness that exist in every human being. 

Gayatri Mantra is referred to as the mother of all mantras since it obeys all the Chhandas. Chhanda merely refers to the verse or meter to measure the mantra according to lyrics, grammar, music, etc. 

It is generally recited during the Sandhyavandanam, a sunrise, noon, or sunset prayer. The mantra also plays a key role in Vedic education. For many individuals, reciting the mantra 108 times brings balance in inner harmony and cosmic order. 

Why is the Gayatri Mantra So Powerful?

Gayatri Mantra is not just a simple chant like many others. The mantra is an effective way for people to connect with the divine energies of the universe.

It is believed that whoever recites the Gayatri Mantra enables their higher intellectual energies. They can also focus better, retain knowledge, and be more in sync with the divine.

The mantra is so effective that it represents the summary of all four Vedas, which have been passed down for decades. Dedicated to Savitri, it brings the light of the sun to guide people from the pathway of darkness to righteousness.

Moreover, it is not only beneficial to the person who rectifies it but also creates a positive and calm environment around them. 

Might you have heard of this line from our acharyas: “Gayantam trayate yasmāt, Gāyatrī tyabhidhīyate”. It is a pretty straightforward phrase with a profound meaning; anyone who recites this mantra leads towards the realisation of God. 

In Gurukul (ancient schools), the guru (teacher) taught the Gayatri mantra as the first lesson to students. It is considered the core of knowledge and education. By all this, you might get an idea about the power this mantra holds, leading you towards a better and peaceful life.

Sanskrit Lyrics of the Gayatri Mantra

ॐ भूर्भुवः स्वः ।
तत्सवितुर्वरेण्यं ।
भर्गो देवस्य धीमहि ।
धियो यो नः प्रचोदयात् ॥

Lyrics of Gayatri Mantra in English

Om bhūr bhuvaḥ svaḥ
tat savitur vareṇyaṃ
bhargo devasya dhīmahi
dhiyo yo naḥ prachodayāt

Meaning of Gayatri Mantra in English

In this section, we will explain the English meaning of the Gayatri Mantra. Let’s see: https://dev.99pandit.com/blog/om-meaning-and-chanting-benefits/

1. “ॐ” (Om)

The mantra begins with the holy syllable “” (Om). It is regarded as the original sound of creation and is a fundamental part of meditation.

2. “भूर्भुवः स्वः” (Bhur Bhuvaḥ Swaḥ)

Bhur, Bhunvah, and Swah are the three Vyharitis and cosmic realms. “Bhur” is a material realm, “Bhuvah” means Earth, which represents the life force or the vital energy. In the last, “Swah” means spiritual realm or heaven. 

3. “तत्सवितुर्वरेण्यं” (Tat-savitur Vareṇyaṃ)

“Tat” here refers to the Supreme Divine Person. “Savitur” signifies the Sun or the beginning of life and wisdom. Lastly, “Varenyam” is symbolic of adorable and most excellent. All of them come together, which celebrates the strength of the Supreme Deity and thanks the Sun, which represents knowledge and spiritual awakening. 

4. “भर्गो देवस्य धीमहि” (Bhargo Devasya Dhīmahi)

“Bhéo” is divine light or effulgence, which cleanses and illuminates the mind and soul. “Devasya” is “of the divine one.” “Dhīmahi” is “we meditate on.” Here, the practitioner is concentrating on the divine light and seeking cleansing and spiritual wisdom.

5. “धियो यो नः प्रचोदयात्” (Dhiyo Yo Naḥ Prachodayāt)

The term “Dhiyo” translates to wisdom, perception, and intelligence. “Yo” refers to who, and “Nah” refers to our. Then, it is followed by the word “Prachodayat,” which means may He guide or may He inspire.

The individual who is performing at the conclusion of the mantra is calling the divine with the prayer to call in the hope of directing, revealing, and bestowing wisdom so that one may lead to spiritual illumination and brilliance.

Gayatri Mantra in Hindi with Meaning 

ॐ भूर्भुवः स्वः। तत्सवितुर्वरेण्यं। भर्गो देवस्य धीमहि। धियो यो नः प्रचोदयात्॥

gayatri-mantra-meaning

अर्थ (Meaning):

ॐ: यहाँ “ॐ” सब्द प्रकति की सृजन का प्रतीक है, जो की धरती के अदि रूप है।  यही के वजह है जिसके लिए इसलिए प्राण शक्ति भी खा जाता है। 

भूर्भुवः स्वः : यहाँ तीनो एक व्यह्रतिस है जो कॉस्मिक के तीनो स्तरों को बताती है। “भूर” यहाँ पर धरती का भौतिक सत्तर प्रतिनिथित करता है। वही “भूर” धरती के प्राणिक स्तर (आकाश और वायुमंडल) को दर्शाता है। “स्वः” धरती के आध्यात्मिक स्तर (दिव्य लोक या स्वर्ग) से लोगो का परिचय करता है।

तत्सवितुर्वरेण्यं: “तत्” इस म्नत्र में परमात्मा से प्रतिनिधित्व करता है, जो किए दुनिया की सभी शक्तियों के अधिपति है। “सवितुर” यहाँ तेजस्वी और बुद्धिस्वरूप भगवान सूर्य का प्रतिक है। “वरेण्यं” का मतलब है अच्छा या मान्य ह।  इन सभी से सूर्य देवता की पूजा का ज्ञान होता है। 

भर्गो देवस्य धीमहि : “भर्गो” इस म्नत्र मई तेज और आत्मिक प्रकाश को बताता है, जो हर तरह की बुराइयों का खतम करता है। “देवस्य” यहाँ देवताओं का प्रतीक है , इन्ही से उन दिव्य ज्योति की पूजा की जाती है। “धीमहि” का मतलब है हम सुब उनका ध्यान करते है। 

धियो यो नः प्रचोदयात्: “धियो” भीतर का मन और भुधि का प्रमाण है। “यो” जो है वो  ब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है। “नः” हमारा अर्थात हमारा सूचन हो। “प्रचोदयात्” अर्थात उसका मार्गदर्शन करे, हमें उस दिव्य ज्योति की ओर प्रेरित करें।

Importance of Gayatri Mantra as per Vedic Hinduism

Ever think of why we recite the Gayatri Mantra? What is the significance of the Gayatri Mantra in Hinduism? Then here’s your answer – “Gayatri mantra” words or lyrics give us thoughts and reflection on causation through the different interpretations and translations.

It encourages us to have faith in the cleansing guidance of Divine wisdom, journey to the holy seat, and guidance of senses. Further, it stimulates understanding, advancement, choosing the path that is right for all of us, and imagines the sun within.

gayatri-mantra-meaning

Gayatri mantram suggests Bhoor, which implies existence and suggests Prana, life, or life-breath. The mantra suggests “that,” meaning “that,” giving recognition to Him is to anticipate that no such praise or personal benefits are given in kind or the hope of gain. The mantra, as well as the heavenly word “Om,” is offered to God with pure guidance.

Savitur represents the divine source from which the life of beings starts and to which they return. Bhargo is the purification and cleansing of the mind and thought process.

As metal is purified in the flares, so we are also filtered by words, destroying all misdeeds and hurts. His beauty cleanses us, and we are in solidarity and unity with Him. Union with Him is free from thought contaminations.

Benefits of Chanting The Gayatri Mantra 

Whenever you chant this holy mantra with devotion, it is said to bring various benefits like activating your body’s chakras, improving focus, reducing stress, and many more. Let’s understand each of them in detail:

1. Improves Concentration

When recited, the Gayatri mantra creates such a powerful vibration that it is said to activate the last three chakras of your body. These include the Crown Chakra, the throat chakra, and the third eye chakra. As per Hindu tradition, these Chakras are the central energies that remove distraction and improve focus. 

2. Minimise Stress and Instil Peace

Chanting the Gayatri mantra has peaceful effects on the nervous system. It also lowers anxiety and emotional stress. In short, it makes one’s life peaceful and stable.

3. Connects You with Divine Energy

As we stated earlier, the Gayatri mantra is presented to the Sun God, Savitr, who is embodied as divine light and life force. This potent mantra, when recited, aligns your body energy and integrates you with the divine.

4. Purifies the Soul and Mind 

Similar to the way fire purifies the gold, the mantra is also believed to purify the mind and soul of the person. It removes the negativity, neglects the past karma effects, and leads to a more pure and elevated form of the inner self. 

5. Spiritual Protection 

The holy vibrations of the mantra form a divine barrier around the one reciting the mantra. It keeps people away from the evil forces, demon spirits, and even the inner doubts.

6. Spreads Positivity in the Environment

The sacred vibration of the Gayatri mantra not only infuses positive energy inside the individual but also around them. It cleanses the environment, promotes peace, and sets up a healing ambience at the location where it is chanted.

7. Health and well-being

Most thought that repeating the mantra might have a beneficial effect on the physical well-being of the practitioner as well as on their general health.

How to Chant the Gayatri Mantra Correctly?

Chanting the Gayatri mantra is one of the many spiritual practices in Hinduism. The mantra can be recited at any time, but doing it in the morning is considered more effective. Plus, chanting it 108 times a day with “Rudraksha mala” (Jaap beads) can double its benefits. 

gayatri-mantra-meaning

However, its positive effects can only be realised when done correctly. These are the steps that you should follow:

  1. Sit comfortably towards the east direction and prefer a quiet area.
  2. Close your eyes and breathe deeply to compose your mind.
  3. Now, slowly and consistently, begin chanting the mantra “Om Bhur Bhuvah Swah, Tat Savitur Varenyam, Bhargo Devasya Dheemahi, Dhiyo Yo Nah Prachodayat.”
  4. While reciting, please pay close attention to each of the words and their meanings.
  5. Imagine a sacred light shining from your mind and spirit, purifying and inspiring you.
  6. Repeat the Gayatri mantra 108 times on the Rudraksha mala.
  7. Finally, conclude the practice by performing 5 5-minute meditation periods, basking in the peaceful ambience.

When Should You Chant the Gayatri Mantra?

Since the Gayatri mantra can be chanted at any time during the day, certain times are deemed to be even more effective and positive. The following are some of them:

gayatri-mantra-meaning

  • Morning: Early morning time, particularly sunrise, is the best time to chant the Gayatri Mantra. The peaceful environment during the morning enhances the religious power of the Vedic chant.
  • Pre-Study or Work: Reciting the mantra before studying or any creative work sharpens the mind and helps you better focus on your work. 
  • In Times of Dilemma: When you are facing trouble or confusion in life, the Gayatri mantra fills your mind with positivity and gives you clarity in your mind. 
  • At Mediation: Reciting the Gayatri mantra during the meditation improves concentration and provides you with inner vision. 
  • During Sunset: Chanting the sacred mantra close to the end of the day helps a person prepare their mind for peaceful sleep. 

Using the Gayatri Mantra in your daily life can bring spiritual development, mental clarity, and a greater connection with the divine. By reciting the mantra in faith and devotion, one can change one’s life with wisdom, peace, and enlightenment.

Conclusion

In this article, we have provided you with the Gayatri mantra meaning in Hindi and English. We have also discussed its origin, benefits, how one should chant it, and the ideal timing.

Moreover, Gayatri Mantra is not just a Vedic chant but a pathway that connects you with spirituality and divine energy. Chanting it regularly sharpens the mind and brings positivity and clarity to the mind. 

If you are looking to perform any Gayatri-associated puja or Homan like Gayatri Jaap, then you can book an experienced pandit with a platform like 99 Pandit.

A well-trusted platform that provides you with a pandit directly at your doorstep. So why wait? Book a pandit online now at 99Pandit and bring the blessing of goddess Gayatri into your house and life.

Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi: शिव तांडव स्तोत्रम हिंदी अर्थ सहित

शिव तांडव स्तोत्रम (Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi) का जाप भगवान शिव को प्रसन्न करने का बहुत ही अच्छा साधन माना जाता है

कहा जाता है कि भगवान शिव अपने भक्तों से बहुत ही जल्दी प्रसन्न हो जाते है जो भी शिव भक्त इस शिव तांडव स्तोत्रम का जाप करता है भगवान शिव उसके जीवन समस्त विपदाओं को दूर कर देते है

शिव तांडव स्तोत्रम

शिव तांडव स्तोत्रम भगवान शंकर को बहुत ही प्रिय है पौराणिक कथाओं के अनुसार इस शिव तांडव स्तोत्रम की रचना लंकापति रावण के द्वारा की गई थी

शिव तांडव स्तोत्रम (Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi) पाठ के द्वारा मनुष्य अपनी किसी भी समस्या से छुटकारा पा सकता है आइये जानते है क्या है भगवान शिव के प्रिय शिव तांडव स्तोत्रम का हिंदी अर्थ

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे Sankat Mochan Hanumanashtak, Sita Mata Aarti, या सफला एकादशी व्रत कथा आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है

इसके अलावा आप हमारे एप 99Pandit For Users पर भी आरतियाँ व अन्य कथाओं को पढ़ सकते है इस एप में सम्पूर्ण भगवद गीता के सभी अध्यायों को हिंदी अर्थ समझाया गया है

शिव तांडव स्तोत्रम हिंदी अर्थ सहित – Shiv Tandav Stotram Lyrics in Hindi With Meaning

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥1॥

हिंदी अर्थ – भगवान शिव के बालों के बहने वाले जल के कारण उनका कंठ अत्यंत पवित्र है| उनके गले में जो सर्प है, वह सदैव हार की भांति उनके गले में लटका रहता है एवं उनके डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है| भगवान शंकर शुभ तांडव नृत्य कर रहे है, वह हमे संपन्नता प्रदान करें|

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥2॥

हिंदी अर्थ – मेरी भगवान शिव में बहुत ही गहरी रूचि है| जिनका मस्तक अलौकिक गंगा नदी की बहती पवित्र धाराओं से सुशोभित है| जो उनके बालों की उलझी हुई जटाओं से उमड़ रही है| जिनके मस्तक पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित रहती है तथा जो अपने सर पर आभूषण के रूप में अर्ध-चंद्रमा को धारण किये हुए है|

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥3॥

हिंदी अर्थ – मैं अपने मन की ख़ुशी भगवान शिव में खोज रहा हूँ| इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सभी प्राणी जिनके मन में वास करते है| जिनकी धर्मपत्नी पर्वत राज की पुत्री माता पार्वती है| जो अपनी करुणामयी दृष्टि से असाधारण समस्याओं को नियंत्रित करते है| जो इन दिव्य लोकों को अपनी पोशाक के रूप में धारण करते है|

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।
मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥4॥

हिंदी अर्थ – जो सम्पूर्ण जीवन के रक्षक है, मुझे उन भगवान शिव में अद्भुद सुख प्राप्त होता है| उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा रंग का है व उसकी मणि भी चमक रही है| यह समस्त दिशाओं की देवियों पर विभिन्न रंगों को बिखेर रहा है एवं जो एक हाथी की खाल से बने दुशाले से ढंका हुआ है|

सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।
भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥5॥

हिंदी अर्थ – जिनका मुकुट चंद्रमा है, वह भगवान शिव हमे संपन्नता प्रदान करे| जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हुए है| जिनका पायदान फूलों की धुल बहने के कारण गहरे रंग का हो गया है जो कि विष्णु, इंद्र तथा समस्त देवताओं के सिर से गिरती है|

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥6॥

हिंदी अर्थ – भगवान शिव की उलझी हुई जटाओं से हम सिद्धि रूपी दौलत को प्राप्त करें| जिन्होंने अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिंगारी मात्र से ही कामदेव को नष्ट कर दिया था| जो समस्त दैवीय लोकों के स्वामियों के द्वारा आदरणीय है तथा जो अर्ध-चंद्रमा से सुसज्जित है|

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।
धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥7॥

हिंदी अर्थ – जिनके तीन नेत्र है, मेरी रूचि उन भगवान शिव में है| जिनके द्वारा शक्तिशाली कामदेव को अग्नि देव को समर्पित किया गया था| उनके मस्तक की सतह डगद् डगद् की ध्वनि के समान जलती है| वह एकमात्र ऐसे कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती (यहाँ पार्वती प्रकृति हैं, तथा चित्रकारी सृजन है) के स्तन की नोंक पर सजावटी रेखाएं खींचने में सक्षम है|

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥8॥

हिंदी अर्थ – भगवान शिव ही इस सम्पूर्ण संसार का भार उठाते है| जिनकी शोभा चंद्रमा के समान है| जिनके समक्ष आलौकिक गंगा नदी है| जिनकी गर्दन बादलों की परतो से ढकी अमावस्या की अर्धरात्रि के समान काली है|

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥9॥

हिंदी अर्थ – मैं भगवान शिव से प्रार्थना करता हूँ , जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा हुआ है| पूर्ण रूप से खिले हुए नीले कमलो की गरिमा से लटका हुआ है| जो इस ब्रह्माण्ड की कालिमा सा प्रतीत होता है| जो कामदेव को मारने वाले है तथा जिन्होंने त्रिपुर का अंत हुआ था| जिनके द्वारा सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया गया| जिन्होंने बलि की प्रथा का अंत किया| जिन्होंने अंधक नामक दैत्य का वध किया| जिन्होंने मृत्यु के देवता को परास्त किया था|

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥10॥

हिंदी अर्थ – जो कल्याणमयी, समस्त कलाओं के रस का आस्वादन करने वाले है, जो कामदेव को भस्म करने वाले है| त्रिपुरासुर तथा गजासुर के संहारक तथा स्वयं यमराज के लिए भी यमस्वरूप है| मैं उन शिव को भजता हूँ|

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥11॥

हिंदी अर्थ – अत्यंत तीव्र गति से भ्रमण कर रहे सर्पों की फुफकार से क्रमश: मस्तक में बढ़ी हुई प्रचंड आग के मध्य मृदंग की मंगलकारी उच्च धिम-धिम की ध्वनि के साथ में लीन शिव जी सर्व प्रकार से सुशोभित हो रहे है|

दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥12॥

हिंदी अर्थ – कठोर पत्थर व कोमल शय्या, सर्प व मोतियों की माला, बहुमूल्य रत्न व मिट्टी के टुकड़े, कमल तथा तिनको पर समान दृष्टि रखने वाले शिव को मैं भजता हूँ|

शिव तांडव स्तोत्रम

कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥13॥

हिंदी अर्थ – कब मैं गंगा जी के कछारगुञ में निवास करता हुआ, निष्कपट हो, अपने सिर पर अंजलि धारण कर चंचल नेत्रों वाले शिव जी का मंत्रोच्चार करते हुए अक्षय सुख को प्राप्त करूँगा|

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥14॥

हिंदी अर्थ – देवांगनाओं के सिर में गुंथे पुष्पों की मालाओं से झड़ते हुए सुगंधमय राग से मनोहर परम शोभा के धाम महादेव जी के अंगों की सुन्दरता परम आनंद युक्त हमारे मन की प्रसन्नता को हमेशा बढाती है|

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥15॥

हिंदी अर्थ – प्रचंड वडवानल की ही भांति पापों को भस्म करने में स्त्री स्वरूपिणी अष्टमहासिद्धियों तथा चंचल नेत्रों वाली कन्याओं से शिव विवाह समय गान की मंगल ध्वनि सभी मंत्रों में से सबसे श्रेष्ठ शिव जी के मंत्र से पूरित, संसारिक दुखों पर विजय पाए|

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥16॥

हिंदी अर्थ – इस शिव तांडव स्तोत्रम (Shiv Tandav Stotram) जो भी व्यक्ति पढता है, याद करता है तथा सुनाता है| वह सदैव के लिए ही पवित्र हो जाता है तथा भगवान शिव की भक्ति पाता है| इस भक्ति का कोई अन्य उपाय नहीं है| केवल भगवान शिव का विचार इस भ्रम को दूर कर देता है|

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनपरम् पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मिंं सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥17॥

हिंदी अर्थ – प्रदोष काल में शिवपूजन के अंतिम समय में इस रावणकृत शिव तांडव स्तोत्रम (Shiv Tandav Stotram) के गान से लक्ष्मी स्थिर रहती है| तथा वो भक्त सदैव ही रथ, गज, घोड़े आदि से सर्वदा युक्त होता है|

॥ इति श्रीरावणकृतं शिव ताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

Satyanarayan Aarti Lyrics: सत्यनारायण आरती – ॐ जय लक्ष्मी रमणा

सत्यनारायण आरती (Satyanarayan Aarti Lyrics) भगवान विष्णु के रूप भगवान सत्यनारायण को समर्पित मानी जाती है। यदि आप घर में भगवान सत्यनारायण कथा का आयोजन करते है तो आपको कथा के पूर्ण होने के पश्चात सत्यनारायण आरती का जाप अवश्य करना चाहिए।

बिना सत्यनारायण आरती के सत्यनारायण कथा को अधुरा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सत्यनारायण आरती का पूर्ण भक्ति के साथ जाप करने से जीवन की परेशानियां, संकट व दुःख दूर हो जाते है। साथ ही इस सत्यनारायण आरती का जाप करने से घर में हमेशा ही सुख-शांति बनी रहती है।

सत्यनारायण आरती

भगवान सत्यनारायण की विशेष कृपा पाने के लिए पूर्णिमा तिथि के दिन भगवान सत्यनारायण की पूजा करने के पश्चात सत्यनारायण आरती का गान करने से भगवान सत्यनारायण बहुत प्रसन्न होते है तथा अपने भक्तों को सुख – समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करते है।

शास्त्रों में बताया गया है कि सत्यनारायण आरती (Satyanarayan Aarti Lyrics) का जाप घर में करने से घर के वास्तु दोष दूर हो जाते है। भगवान सत्यनारायण की इस आरती को प्रतिदिन भी गाया जा सकता है लेकिन इसका भगवान सत्यनारायण पूजा के पश्चात जाप करना शुभ माना जाता है।

सत्यनारायण आरती हिंदी में – Satyanarayan Ji Ki Aarti in Hindi

|| सत्यनारायण आरती ||

जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
सत्यनारायण स्वामी,
जन पातक हरणा ॥

ॐ जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।

रत्‍‌न जड़ित सिंहासन,
अद्भुत छवि राजै ।
नारद करत निराजन,
घण्टा ध्वनि बाजै ॥

ॐ जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।

प्रकट भये कलि कारण,
द्विज को दर्श दियो ।
बूढ़ा ब्राह्मण बनकर,
कंचन महल कियो ॥

ॐ जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।

दुर्बल भील कठारो,
जिन पर कृपा करी ।
चन्द्रचूड़ एक राजा,
तिनकी विपत्ति हरी ॥

ॐ जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।

वैश्य मनोरथ पायो,
श्रद्धा तज दीन्ही ।
सो फल भोग्यो प्रभुजी,
फिर-स्तुति कीन्हीं ॥

ॐ जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।

भाव भक्ति के कारण,
छिन-छिन रूप धरयो ।
श्रद्धा धारण कीन्हीं,
तिनको काज सरयो ॥

ॐ जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।

ग्वाल-बाल संग राजा,
वन में भक्ति करी ।
मनवांछित फल दीन्हों,
दीनदयाल हरी ॥

ॐ जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।

चढ़त प्रसाद सवायो,
कदली फल, मेवा ।
धूप दीप तुलसी से,
राजी सत्यदेवा ॥

ॐ जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।

श्री सत्यनारायण जी की आरती,
जो कोई नर गावै ।
ऋद्धि-सिद्ध सुख-संपत्ति,
सहज रूप पावे ॥

जय लक्ष्मी रमणा,
स्वामी जय लक्ष्मी रमणा ।
सत्यनारायण स्वामी,
जन पातक हरणा ॥

सत्यनारायण आरती

Satyanarayan Aarti Lyrics In English |  Om Jai Lakshmi Ramna

|| Satyanarayan Aarti ||

Jai Lakshmi Ramna,
Swami Jai Lakshmi Ramna |
Satyanarayan Swami,
Jan Paatak Harana ||

Om Jai Lakshmi Ramna,
Swami Jai Lakshmi Ramna |

Ratna Jadit Singhasan,
Adbhut Chhavi Raaje |
Naarad Karat Nirajan,
Ghanta Dhwani Baaje ||

Om Jai Lakshmi Ramna,
Swami Jai Lakshmi Ramna |

Prakat Bhaye Kali Kaaran,
Dwij Ko Darsh Diyo |
Budha Brahman Bankar,
Kanchan Mahal Kiyo ||

Om Jai Lakshmi Ramna,
Swami Jai Lakshmi Ramna |

Durbal Bheel Kathaaro,
Jin Par Kripa Kari |
Chandrachud Ek Raja,
Tinki Vipatti Hari ||

Om Jai Lakshmi Ramna,
Swami Jai Lakshmi Ramna |

Vaishya Manorath Paayo,
Shraddha Taj Dinhi |
Sau Phal Bhogyo Prabhuji,
Phir- Stuti Kinhi ||

Om Jai Lakshmi Ramna,
Swami Jai Lakshmi Ramna |

Bhaav Bhakti Ke Kaaran,
Chhin-Chhin Roop Dharayo |
Shraddha Dhaaran Kinhi,
Tinko Kaaj Sarayo ||

Om Jai Lakshmi Ramna,
Swami Jai Lakshmi Ramna |

Gwal-Bal Sang Raja,
Van Me Bhakti Kari |
Manvanchhit Phal Dinho,
Deendayal Hari ||

Om Jai Lakshmi Ramna,
Swami Jai Lakshmi Ramna |

Chadhat Prasad Savayo,
Kadali Phal, Meva |
Dhup Deep Tulsi Se,
Raaji Satyadeva ||

Om Jai Lakshmi Ramana,
Swami Jai Lakshmi Ramana.

Shri Satyanarayan Ji Ki Aarti,
Jo Koi Nar Gaave.
Riddhi-Siddh Sukh-Sampatti,
Sahaj Roop Paave.

Jai Lakshmi Ramana,
Swami Jai Lakshmi Ramana.
Satyanarayan Swami,
Jan Paatak Harana

निष्कर्ष

आज इस लेख में हमने सत्यनारायण आरती (Satyanarayan Aarti Lyrics) के बारे में पढ़ा। यह आरती भगवान विष्णु के रूप सत्यनारायण भगवान की उपासना गाई जाती है। भगवान विष्णु को सम्पूर्ण जगत के पालनकर्ता के रूप में भी जाना जाता है।

आपको बता दे कि हिंदू धर्म में एकादशी का दिन भगवान विष्णु को ही समर्पित होता है। इस दिन भक्तों के द्वारा भगवान सत्यनारायण को प्रसन्न करने के लिए व्रत किया जाता है। इसी के साथ सत्यनारायण व्रत कथा व आरती भी की जाती है।

इसी के साथ यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja), रुद्राभिषेक पूजा (Rudrabhishek Puja), महालक्ष्मी पूजा के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित (Online Pandit Booking) बहुत आसानी से बुक कर सकते है।

Shri Shani Stotra in Hindi: श्री शनि स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित

Shri Shani Stotra in Hindi: श्री शनि स्तोत्र का जाप करने से भक्तों को शनि देव की असीम कृपा प्राप्त होती है। आपको बता दे कि श्री शनि स्तोत्र एक ऐसा संस्कृत मंत्र है जो कि भगवान शनिदेव की शक्तियों, महिमा तथा उनके गुणों के बारे में व्याख्या करता है।

माना जाता है कि श्री शनि स्तोत्र का जाप करने से भगवान शनिदेव का प्रकोप कम होता है तथा उनका आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। शनि ग्रह का अच्छा प्रभाव पाने के लिए भी श्री शनि स्तोत्र का पाठ किया जाता है।

Shri Shani Stotra in Hindi

शनि ग्रह के अशुभ प्रभावों तथा शनि दोषों का निवारण करने में भी श्री शनि स्तोत्र का जाप बहुत सहायक होता है।

इस स्तोत्र का जाप करने से मनुष्य को आत्म-विकास, तथा मानसिक शांति की भी प्राप्ति होती है। तो आइये पाठ करते है इस अद्भुत श्री शनि स्तोत्र का हिंदी अर्थ सहित।

इसके अतिरिक्त आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे अंगारक दोष पूजा (Angarak Dosh Puja), विवाह पूजा (Marriage Puja), तथा गृह प्रवेश पूजा (Griha Pravesh Puja) के लिए हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है। इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी संपर्क कर सकते है।

श्री शनि स्तोत्र पाठ हिंदी अर्थ सहित – Shri Shani Stotra Lyrics with Hindi Meaning

|| श्री शनि स्तोत्र ||

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च।
नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम:॥

अर्थ – जिनका शरीर भगवान शंकर के समान कृष्ण तथा नीले रंग का है। उन शनि देव को मेरा प्रणाम है। इस सम्पूर्ण संसार के लिए कालाग्नि तथा कृतांत रूप श्री शनैश्चर को मेरा पुनः पुनः प्रणाम है।

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च।
नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते॥

अर्थ – जिनका शरीर कंकाल के समान मांस-हीन एवं जटाएं व दाढ़ी-मूंछ बड़ी हुई है। उन शनिदेव को मेरा प्रणाम है। जिनके नेत्र बड़े-बड़े, पीठ से सटा हुआ पेट एवं भयानक आकार वाले भगवान शनि देव को मेरा प्रणाम है।

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम:।
नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते॥

अर्थ – जिनका शरीर दीर्घ है, रोएँ मोटे है, जो लम्बे-चौड़े लेकिन जर्जर शरीर वाले है एवं जिनकी दाढे कालरूप है। उन भगवान शनि देव को मेरा पुनः पुनः प्रणाम है।

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम:।
नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने॥

अर्थ – हे भगवान शनि देव ! आपके नयन कोटर की भांति गहरे है, आपकी ओर देखना बहुत ही कठिन है, आपका रूप भीषण, रौद्र तथा बहुत ही विकराल है। आपको मेरा प्रणाम है।

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते।
सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च॥

अर्थ – अभय प्रदान करने वाले देवता, भास्कर पुत्र, सूर्यनंदन, आप सब कुछ भक्षण करने वाले है। ऐसे भगवान शनि देव को मेरा प्रणाम है।

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते।
नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते॥

अर्थ – आपकी दृष्टि अधोमुखी है, आप मंद गति से चलने वाले एवं जिसका प्रतीक तलवार के समान है। उन भगवान शनि देव को मेरा पुनः पुनः प्रणाम है।

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च।
नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम:॥

अर्थ – आपने तपस्या के माध्यम से अपने शरीर को दग्ध कर लिया है, आप हमेशा योगाभ्यास में तत्पर, भूख से आतुर व अतृप्त रहते है। आपको सदा मेरा प्रणाम है।

Shri Shani Stotra in Hindi

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे।
तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात्॥

अर्थ – जिनके नेत्र ही ज्ञान है, काश्यपनंदन सूर्य पुत्र शनि देव को मेरा प्रणाम है। आप जिस व्यक्ति से संतुष्ट हो उसे राज्य दे देते है एवं रुष्ट होने पर उसे क्षीण भी लेते है।

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा:।
त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत:॥

अर्थ – मनुष्य, देवता, असुर, विद्याधर, सिद्ध एवं नाग – यह सब आपकी दृष्टि पड़ने मात्र से ही नष्ट हो जाते है। ऐसे भगवान शनि देव को मेरा प्रणाम है।

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे।
एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल:॥

अर्थ – आप मुझपर प्रसन्न होए। मैं वर पाने के योग्य हूँ तथा आपकी शरण में आया हूँ।

॥ इति श्री शनि स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

Shani Chalisa Lyrics in Hindi: शनि चालीसा – जयति जयति शनिदेव दयाला

हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) के पाठ को शनिवार के दिन करना बहुत ही शुभ माना जाता है।

शनि देव की पूजा करने के बाद शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करने से शनिदेव अपने भक्तों से बहुत ही प्रसन्न होते है।

इस शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करने से भक्तों के सभी कष्ट व परेशानियां दूर होती है।

शनि चालीसा

ऐसा माना जाता है कि जिन लोगों पर शनि देव की साढ़ेसाती या ढैय्या चल रही हो, उन्हें इससे मुक्ति पाने व शनि देव को प्रसन्न करने के लिए शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करना चाहिए जैसा आप सभी जानते है कि शनि देव को न्याय के देवता के रूप में भी जाना जाता है

शनि अमावस्या के दिन शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करने व्यक्ति को पितृ दोष में भी राहत मिलती है शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ कभी भी किया जा सकता है

यदि आप शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ प्रारंभ करना चाहते है तो शनिवार इसके लिए सबसे शुभ दिन माना जाता है

शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ बहुत अधिक लाभकारी होता है, जब इसका जाप शनि देव के मंदिर में किया जाए

शनि देव की विशेष कृपा पाने के लिए पीपल के पेड़ के नीचे शनि चालीसा (Shani Chalisa Lyrics in Hindi) का पाठ करना चाहिए

अब हम आपको 99Pandit के बारे में जानकारी देंगे| 99Pandit एक ऐसा ऑनलाइन प्लेटफार्म है जिसकी सहायता से आप हिन्दू धर्म से संबंधित किसी भी पूजा जैसे – दिवाली पूजा [Diwali Puja], तथा  धनतेरस पूजा [Dhanteras Puja] के लिए ऑनलाइन पंडित बुक कर सकते है|

यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है बस आपको “Book a Pandit” विकल्प का चुनाव करना होगा

शनि चालीसा पाठ – Shani Chalisa Lyrics in Hindi 

|| शनि चालीसा ||

|| दोहा ||

जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल ।
दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल ॥

जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज ।
करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज ॥

|| चौपाई ||

जयति जयति शनिदेव दयाला ।
करत सदा भक्तन प्रतिपाला ॥

चारि भुजा, तनु श्याम विराजै ।
माथे रतन मुकुट छबि छाजै ॥

परम विशाल मनोहर भाला ।
टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला ॥

कुण्डल श्रवण चमाचम चमके ।
हिय माल मुक्तन मणि दमकै ॥

कर में गदा त्रिशूल कुठारा ।
पल बिच करैं अरिहिं संहारा ॥

पिंगल, कृष्णों, छाया नन्दन ।
यम, कोणस्थ, रौद्र, दुखभंजन ॥

सौरी, मन्द, शनी, दश नामा ।
भानु पुत्र पूजहिं सब कामा ॥

जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं ।
रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं ॥

पर्वतहू तृण होई निहारत ।
तृणहू को पर्वत करि डारत ॥

राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो ।
कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो ॥

बनहूँ में मृग कपट दिखाई ।
मातु जानकी गई चुराई ॥

लखनहिं शक्ति विकल करिडारा ।
मचिगा दल में हाहाकारा ॥

रावण की गतिमति बौराई ।
रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई ॥

दियो कीट करि कंचन लंका ।
बजि बजरंग बीर की डंका ॥

नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा ।
चित्र मयूर निगलि गै हारा ॥

हार नौलखा लाग्यो चोरी ।
हाथ पैर डरवाय तोरी ॥

भारी दशा निकृष्ट दिखायो ।
तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो ॥

विनय राग दीपक महं कीन्हयों ।
तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों ॥

हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी ।
आपहुं भरे डोम घर पानी ॥

तैसे नल पर दशा सिरानी ।
भूंजीमीन कूद गई पानी ॥

श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई ।
पारवती को सती कराई ॥

तनिक विलोकत ही करि रीसा ।
नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा ॥

पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी ।
बची द्रौपदी होति उघारी ॥

कौरव के भी गति मति मारयो ।
युद्ध महाभारत करि डारयो ॥

रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला ।
लेकर कूदि परयो पाताला ॥

शेष देवलखि विनती लाई ।
रवि को मुख ते दियो छुड़ाई ॥

वाहन प्रभु के सात सजाना ।
जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना ॥

जम्बुक सिंह आदि नख धारी ।
सो फल ज्योतिष कहत पुकारी ॥

गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं ।
हय ते सुख सम्पति उपजावैं ॥

गर्दभ हानि करै बहु काजा ।
सिंह सिद्धकर राज समाजा ॥

जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै ।
मृग दे कष्ट प्राण संहारै ॥

जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी ।
चोरी आदि होय डर भारी ॥

तैसहि चारि चरण यह नामा ।
स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा ॥

लौह चरण पर जब प्रभु आवैं ।
धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं ॥

समता ताम्र रजत शुभकारी ।
स्वर्ण सर्व सर्व सुख मंगल भारी ॥

जो यह शनि चरित्र नित गावै ।
कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै ॥

अद्भुत नाथ दिखावैं लीला ।
करैं शत्रु के नशि बलि ढीला ॥

जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई ।
विधिवत शनि ग्रह शांति कराई ॥

पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत ।
दीप दान दै बहु सुख पावत ॥

कहत राम सुन्दर प्रभु दासा ।
शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा ॥

|| दोहा ||

पाठ शनिश्चर देव को, की हों भक्त तैयार ।
करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार ॥

शनि चालीसा

Shani Chalisa Lyrics in English – जयति जयति शनिदेव दयाला

|| Shani Chalisa ||

|| Doha ||

Jai Ganesh Girija Suvan, Mangal karan Kripal |
Dinan Ke Dukh Dur Kari, Kije Nath Nihaal ||

Jai Jai Shree Shanidev Prabhu, Sunahu Vinay Maharaj |
Karahu Kripa He Ravi Tanay, Raakhhu Jan Ki Laaj ||

|| Chaupai ||

Jayati Jayati Shanidev Dayala |
Karan Sada Bhaktan Pratipala ||

Chaari Bhuja, Tanu Shyam Viraaje |
Maathe Ratan Mukut Chhabi Chhaje ||

Param Vishal Manohar Bhala |
Tedhi Drishti Bhrikuti Vikrala ||

Kundal Sharavan Chamacham Chamke |
Hiya Maal Muktan Mani Damke ||

Kar Me Gada Trishul Kuthara |
Pal Bich Kare Arihi Sanhara ||

Pingal, Krishano, Chhaya Nandan |
Yam, Konstha, Raudra, Dukhbhanjan ||

Sauri, Mand, Shani, Dash Nama |
Bhaanu Putra Pujanhi Sab Kama ||

Jaa Par Prabhu Prasann He Jaanhi |
Rankhun Raav Kare Kshan Maahin ||

Parvathu Trin Hoe Niharat |
Trinhu Ko Parvat Kari Daarat ||

Raaj Milat Ban Ramhin Dinhon |
Kaikeihun Ki Mati Hari Linhyo ||

Banahun Me Mrig Kapat Dikhayi |
Maatu Jaanki Gai Churai ||

Lakanhi Shakti Vikal Karidara |
Machiga Dal Me Hahakar ||

Ravan Ki Gatimati Baurai |
Ramchandra Sau Bair Badhai ||

Diyo Kit Kari Kanchan Lanka |
Baji Bajrang Bir Ki Danka ||

Nrip Vikram Par Tuhi Pagu Dhara |
Chitr Mayur Nigali Gai Hara ||

Haar Naulakha Laagyo Chauri |
Haath Pair Darvaay Tori ||

Bhari Dasha Nikrisht Dikhayo |
Telihin Ghar Kolhu Chalvaayo ||

Vinay Rag Deepak Maham Kinhayo |
Tab Prasann Prabhu Haiv Sukh Dinhayo ||

Harischandra Nrip Naari Bikaani |
Apahun Bhare Dom Ghar Paani ||

Taise Nal Par Dasha Sirani |
Bhunjimin Kud Gai Paani ||

Shree Shankarhin Gahyo Jaai |
Parvati Ko Sati Karai ||

Tanik Vilokat Hi Kari Risa |
Nabh Udi Gayo Gaurisut ||

Paandav Par Bhe Dasha Tumhari |
Bachi Draupadi Hoti Ughaari ||

Kaurav Ke Bhi Gati Mati Maaryo |
Yuddha Mahabharat Kari Daaryo ||

Ravi Kahn Mukh Mahn Tatkala |
Lekar Kudi Paryo Patala ||

Shesh Devlakhi Vinati Laai |
RAvi Ko Mukh Te Diyo Chhudai ||

Vahan Prabhu Ke Saat Sajaanna |
Jag Digaaj Gardabh Mrig Swana ||

Jambuk Singh Aadi Nakh Dhaari |
So Fal Jyotish Kahat Pukari ||

Gaj Vahan Laxmi Gruh Aave |
Haya Te Sukh Sampati Upjaave ||

Gardabh Haani Kare Bahu Kaja |
Singh Siddhkar Raj Samaja ||

Jambuk Buddhi Nashth Kar Daare |
Mrig De Kashth Praan Sanhaare ||

Jab Aavahin Prabhu Swaan Sawari |
Chori Aadi Hoya Dar Bhaari ||

Taisahi Chaari Charan Yah Nama |
Swarn Lauha Chandi Aru Tama ||

Lauha Charan Par Jab Prabhu Aave |
Dhan Jan Sampatti Nashth Karave ||

Samta Taamr Rajat Shubhkari |
Swarn Sarv Sarv Sukh Mangal Bhari ||

Jo Yah Shani Charitra Nit Gaave |
Kabahun Na Dasha Nikrashth ||

Adbhut Nath Dikhaave Leela |
Kare Shatru Ke Nashi Bali Dhila ||

Jo Pandit Suyogya Bulvaae |
Vidhivat Shani Grah Shanti Karai ||

Pipal Jal Shani Divas Chadhavat |
Deep Dan De Bahu Sukh Paavat ||

Kahat Ram Sundar Prabhu Dasa |
Shani Sumirat Sukh Hot Prakasha ||

|| Doha ||

Paath Shanischar Dev Ko, Ki Ho Bhakt Taiyaar |
Karat Paath Chalish Din, Ho Bhavsagar Paar ||

Shiv Stuti Lyrics in Hindi: शिव स्तुति हिंदी अर्थ सहित

Shiv Stuti Lyrics in Hindi: ‘शिव स्तुति – आशुतोष शशांक शेखर’ भगवान शिव के विभिन्न गुणों और रूपों की प्रशंसा करने वाला एक भक्ति भजन है। भगवान शिव हिंदू धर्म के तीन प्रमुख देवताओं में से एक है। उन्हें हिंदू धर्म में सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा जाता है।

जिस प्रकार भगवान ब्रह्मा को ब्रह्मांड के निर्माता कहा जाता है, भगवान विष्णु को ब्रह्मांड के संरक्षक कहा जाता है, उसी प्रकार भगवान शिव को ब्रह्मांड के विनाशक कहा जाता है। उच्चतम स्तर पर, शिव को निराकार, असीम, पारलौकिक और अपरिवर्तनीय माना जाता है।

भगवान शिव के नाम का अर्थ है “शुभ व्यक्ति“। भगवान शिव के कई दयालु और डरावने चित्रण है। देवों के देव महादेव को योग, ध्यान और कलाओं का संरक्षक देवता भी माना जाता है। भगवान शिव को पशुपति, भैरव, विश्वनाथ, भोले नाथ, शंभू और शंकर जैसे कई नामो से जाना जाता है।

शिव स्तुति

आज इस ब्लॉग के माध्यम से हम भगवान शिव की सबसे प्रमुख स्तुति (Shiv Stuti Lyrics in Hindi) के बारे में जानेंगे।

इसके साथ ही इस स्तुति का प्रतिदिन पाठ करने से इसके मनुष्य पर क्या सकारात्मक प्रभाव पड़ता है उसके बारे में भी बात करेंगे। तो चलिए बिना किसी देरी के 99Pandit के साथ भगवान शिव की भक्ति में लीन हो जाते हैं।

शिव स्तुति का महत्व क्या है? – What is the Significance of Shiv Stuti?

भगवान शिव एक ही समय में विनाश और सृजन के देवता हैं और दया और कृपा के प्रतीक हैं। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करने के कई तरीके हैं और भगवान शिव को प्रसन्न करना और उनका आशीर्वाद प्राप्त करना बहुत आसान है।

उनके लिए समर्पित ‘शिव स्तुति – आशुतोष शशांक शेखर‘, कुछ अनुष्ठान, और पूजाएँ आयोजित की जाती हैं, जिनमें विभिन्न मंत्रों का जाप शामिल होता है, जिसके माध्यम से भक्त जीवन में सफल होते हैं।

‘शिव स्तुति – आशुतोष शशांक शेखर’, भक्ति पूजा, आह्वान, प्रार्थना, स्तुति, आराधना, ध्यान और प्रत्यक्ष, अनुभवात्मक संवाद का एक रूप है।

शिव स्तुति

शिव स्तुति के नियमित जाप से व्यक्ति अंदर से बेहद मजबूत हो जाता है और उसकी आत्मा लोहे की मुट्ठी की तरह बन जाती है, जिसे कोई भी दुर्घटना तोड़ नहीं सकती।

जो लोग शुद्ध आत्मा के साथ शिव मंत्रों का जाप करते हैं, वे जीवन में किसी भी परेशानियों से लड़ सकते हैं और एक बेहतर और मजबूत व्यक्ति बनकर बाहर आ सकते हैं।

ये मंत्र व्यक्ति के अंदर या उसके आस-पास मौजूद किसी भी नकारात्मक ऊर्जा को शरीर और आत्मा से शुद्ध करने में भी मदद करते हैं और उनके जीवन को सकारात्मक ऊर्जा से भर देते हैं।

शिव ब्रह्मांडीय नर्तक हैं और उन्हें नटराज, नर्तकों के देवता के रूप में भी जाना जाता है। हिंदू भगवान शिव को शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।

शिव स्तुति लिरिक्स इन हिंदी – Shiv Stuti Lyrics in Hindi

आशुतोष शशांक शेखर,
चन्द्र मौली चिदंबरा,
कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,
कोटि नमन दिगम्बरा।।

निर्विकार ओमकार अविनाशी,
तुम्ही देवाधि देव,
जगत सर्जक प्रलय करता,
शिवम सत्यम सुंदरा।।

निरंकार स्वरूप कालेश्वर,
महा योगीश्वरा,
दयानिधि दानिश्वर जय,
जटाधार अभयंकरा।।

शूल पानी त्रिशूल धारी,
औगड़ी बाघम्बरी,
जय महेश त्रिलोचनाय,
विश्वनाथ विशम्भरा।।

नाथ नागेश्वर हरो हर,
पाप साप अभिशाप तम,
महादेव महान भोले,
सदा शिव शिव संकरा।।

जगत पति अनुरकती भक्ति,
सदैव तेरे चरण हो,
क्षमा हो अपराध सब,
जय जयति जगदीश्वरा।।

जनम जीवन जगत का,
संताप ताप मिटे सभी,
ओम नमः शिवाय मन,
जपता रहे पञ्चाक्षरा।।

आशुतोष शशांक शेखर,
चन्द्र मौली चिदंबरा,
कोटि कोटि प्रणाम शम्भू,
कोटि नमन दिगम्बरा ।।

कोटि नमन दिगम्बरा..
कोटि नमन दिगम्बरा..
कोटि नमन दिगम्बरा..

शिव स्तुति लिरिक्स इन इंग्लिश – Shiv Stuti Lyrics in English

Ashutosh Shashank Shekhar,
Chandra Mauli Chidambara,
Koti Koti Pranam Shambhu.
Koti Naman Digambara II

Nirvikar Omkar Avinashi,
Tumhi Devadhi Dev,
Jagat Sarjak Pralay Karta,
Shivam Satyam Sundara II

Nirankar Swaroop Kaleshwar,
Maha Yogeeshwara,
Dayanidhi Danishwar Jay,
Jatadhar Abhayankara II

Shool Pani Trishul Dhari,
Augadi Baghambari,
Jay Mahesh Trilochanay,
Vishwanath Vishambhara II

Nath Nageshwar Haro Har,
Paap Saap Abhishaap Tam,
Mahadev Mahan Bhole,
Sada Shiv Shiv Shankara

Jagat Pati Anurakati Bhakti,
Sadaiv Tere Charan Ho.
Kshama Ho Aparadh Sab,
Jay Jayati Jagadishwara II

Janam Jeevan Jagat Ka,
Santaap Taap Mite Sabhi,
Om Namah Shivaay Man,
Japta Rahe Panchakshara II
Ashutosh Shashank Shekhar,
Chandra Mauli Chidambara,
Koti Koti Pranaam Shambhoo.
Koti Naman Digambara II

Koti Naman Digambara….
Koti Naman Digambara…..
Koti Naman Digambara….

शिव स्तुति

शिव स्तुति का हिंदी अर्थ – Shiv Stuti Meaning in Hindi

आशुतोष शशांक शेखर
चंद्र मौली चिदंबरा
शंभू कोटि कोटि प्रणाम
दिगंबरा को कोटि प्रणाम

आप निर्विकार (अपरिवर्तनशील),
ओंकार (आदि ध्वनि) और अविनाशी हैं
आप सभी देवताओं के स्वामी हैं

दुनिया के निर्माता और संहारक
शिव परम सत्य और सुंदरता के अवतार हैं

निराकार, काल के स्वरूप,
महान योगी,
करुणा के सागर और वरदान देने वाले,
जटाधारी और निर्भयता के स्रोत, आपकी जय हो।

त्रिशूल धारण करने वाला,
बाघ की खाल से सुशोभित,
तीन नेत्रों वाले महेश की जय,

ब्रह्मांड का स्वामी, सर्वव्यापी
हे नागों (सर्पों) के स्वामी,
पापों और शापों को दूर करने वाले
महान ईश्वर, दयालु और सरल,
सनातन शिव, मंगलमय, सदा शिव, कल्याणकारी!

हे जगत के स्वामी, जो भक्ति के स्रोत हैं,
सदैव आपके चरणों में, मैं सभी अपराधों के लिए क्षमा मांगता हूं,
जगत के स्वामी की जय हो, जय हो
इस जीवन और संसार में,
सभी दुख और कष्ट दूर हो जाएं

ओम नमः शिवाय
पंचाक्षर (पांच अक्षर वाला मंत्र) का सदैव जाप किया जाए

आशुतोष शशांक शेखर
चंद्र मौली चिदंबरा
शंभु को कोटि-कोटि प्रणाम
दिगंबरा
को कोटि-कोटि प्रणाम
दिगंबरा को कोटि-कोटि प्रणाम

शिव स्तुति के जाप के लाभ – Benefits of Chanting Shiv Stuti

माना जाता है कि शिव स्तुति या भगवान शिव की प्रार्थना से मानसिक शांति, नकारात्मक ऊर्जाओं से सुरक्षा और आध्यात्मिक विकास सहित कई लाभ मिलते हैं। शिव स्तुति का पाठ करने के निम्नलिखित लाभ हैं:

  1. इन मंत्रों का नियमित जाप करने से सद्भाव और खुशहाली की भावना पैदा हो सकती है, साथ ही तनाव, चिंता और शारीरिक बीमारियों से राहत मिल सकती है।
  2. शिव मंत्रों का जाप करने से अधिक सकारात्मक और सामंजस्यपूर्ण वातावरण बनता है, जिससे मन की शांति और खुशहाली की भावना बढ़ती है।
  3. नियमित जाप करने से तनाव और चिंता कम करने में मदद मिल सकती है, जिससे मन शांत और संतुलित रहता है।
  4. शिव मंत्र व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जाओं और बुरे प्रभावों से बचाते हैं।
  5. कुछ लोगों का मानना ​​है कि शिव स्तुति का जाप करने से व्यक्ति को पिछले पापों और नकारात्मक कर्मों से छुटकारा मिल सकता है, जिससे आध्यात्मिक मुक्ति मिलती है।
  6. भगवान शिव की पूजा करने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
  7. कुछ पारंपरिक मान्यताएँ बताती हैं कि शिव मंत्र कुछ बीमारियों को कम करने और उपचार को बढ़ावा देने में मदद कर सकते हैं।
  8. शिव स्तुति से भक्त भगवान शिव को नमन करते हैं। यहाँ शिव सर्वोच्च वास्तविकता या आंतरिक आत्मा हैं। इसलिए इस मंत्र का जाप आंतरिक आत्मा को प्रदान करना और उसके लिए प्रार्थना करना है।
  9. जो लोग अपना आत्मविश्वास बढ़ाना चाहते हैं और अपना नाम बनाना चाहते हैं, उन्हें ‘शिव स्तुति – आशुतोष शशांक शेखर’ का जाप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप करने से आंतरिक क्षमता और शक्ति बढ़ती है।
  10. अगर कोई व्यक्ति अपने आस-पास के माहौल को लेकर असुरक्षित महसूस कर रहा है और सुरक्षा चाहता है, तो इस मंत्र का जाप करने से उसे सुरक्षा का अहसास होगा। व्यक्ति सकारात्मक ऊर्जा से घिरा रहेगा।

शिव स्तुति का पाठ कैसे करें? – How to recite Shiv Stuti

  1. अधिकांश मंत्रों की तरह शिव स्तुति मंत्रों का जाप भी सुबह जल्दी उठकर स्नान करके साफ कपड़े पहनकर करना चाहिए।
  2. शिव स्तुति का जाप दिन में किसी भी समय किया जा सकता है, लेकिन सूर्योदय और सूर्यास्त के समय शिव मंत्रों का जाप करना सर्वोत्तम होता है।
  3. अगर कोई शिव स्तुति जप करने का सही समय भूल भी जाता है, तो ऐसा माना जाता है कि शिव मंत्रों का जप दिन के किसी भी प्रहर या समय में किया जा सकता है।
  4. सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित है और इस दिन शिव स्तुति मंत्रों का जाप और प्रार्थना करना बहुत लाभकारी होता है, क्योंकि सोमवार के दिन भगवान शिव आसानी से प्रसन्न होते हैं।
  5. सर्वोत्तम परिणामों के लिए शिव स्तुति का जाप भगवान शिव की पूजा करने तथा उन्हें प्रार्थना अर्पित करने के बाद शुरू करना चाहिए।
  6. शिव मंत्रों का एक बार में 108 बार जाप करना सबसे अच्छा तरीका माना जाता है क्योंकि इससे सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त होते हैं। शिव मंत्रों का जाप जोर से या मन में किया जा सकता है।

निष्कर्ष

‘शिव स्तुति – आशुतोष शशांक शेखर’, भक्ति पूजा, आह्वान, प्रार्थना, स्तुति, आराधना, ध्यान और प्रत्यक्ष, अनुभवात्मक संवाद का एक रूप है। भगवान शिव को सनातन धर्म में सृष्टि के संघारक के रूप में जाना और पूजा जाता है।

यूं तो भगवान शिव के कई नाम हैं परंतु ज्ञान और सभी प्रकार की विधाओं का सृजन होने से भगवान शिव का एक नाम आदियोगी भी है।

ऐसा माना जाता है भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठिन तप करने की आवश्यकता नहीं होती, भगवान शिव अपने भक्तों द्वारा जल और बेलपत्र चढ़ाने से ही प्रसन्न हो जाते हैं।

इसके अलावा, भगवान शिव अर्थार्थ देवों के देव महादेव की उपासना करने के लिए यह शिव स्तुति- आशुतोष शशांक शेखर भी बहुत उपयोगी मानी जाती है।

शिव स्तुति का जाप करने से हर मनोकामना पूरी होती है, क्योंकि भगवान शिव हिंदू धर्म के सबसे दयालु देवता माने जाते हैं और उन्हें प्रसन्न करना बहुत आसान है।

इन मंत्रों का जाप करने से आस-पास की सारी नकारात्मक ऊर्जा समाप्त हो जाती है और बाहर और भीतर सब कुछ शांत और मौन हो जाता है। यह आत्मा को शांत करता है और आंतरिक चेतना को खोलता है।

आशा है आपका यह ब्लॉग पढ़कर अच्छा लगेगा। आगे और भी ऐसे लेख पढ़ने के लिए जुड़े रहें 99Pandit के साथ। 99Pandit पर आप अपने घर, मंदिर, या कार्यालय पूजा के लिए पंडित आसानी से बुक कर सकते हैं।

Parvati Vallabha Ashtakam: पार्वती वल्लभ अष्टकम का पाठ और महत्व

पार्वती वल्लभ अष्टकम भगवान शिव को समर्पित है, जो माँ पार्वती के पति हैं। माँ पार्वती को हिंदू धर्म में एक देवी के रूप में पूजा जाता है। माँ पार्वती पर्वतराज हिमाचल और रानी मैना की पुत्री हैं। पर्वतराज की पुत्री होने के कारण उनका नाम पार्वती पड़ा।

यह पार्वती अष्टकम 8 छंदों की एक काव्य रचना है। इस अष्टकम का पाठ करके भक्त पार्वती पति, भगवान शिव को नमन करते हैं।

इसमें शिव के विभिन्न गुणों का वर्णन किया गया है, जिन्हें ऋषियों और वेदों द्वारा प्रोत्साहित किया जाता है और जिन्हें आशीर्वाद के देवता के रूप में भी जाना जाता है, जिन्हें शैतानों और भूतों के साथ-साथ सबसे सुंदर प्राणी के रूप में वर्णित किया जाता है।

पार्वती वल्लभ अष्टकम

श्री पार्वती वल्लभ अष्टकम। इसे देवी पार्वती की पत्नी के रूप में भगवान शिव की एक प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है। भगवान शिव और पार्वती की कृपा के लिए भक्त भक्ति भाव से इस अष्टकम का जाप करते हैं।

आज इस ब्लॉग के माध्यम से हम श्री पार्वती वल्लभ अष्टकम पाठ के महत्व के साथ-साथ इसके लिरिक्स भी जानेंगे। इतना ही नहीं, हम 99Pandit से यह भी जानेंगे कि इस पाठ पर को करने से व्यक्ति को क्या लाभ मिलता है।

Parvati Vallabha Ashtakam Lyrics in Hindi – पार्वती वल्लभ अष्टकम लिरिक्स हिंदी में

नमो भूतनाथं नमो देवदेवं
नमः कालकालं नमो दिव्यतेजः । (दिव्यतेजम्)
नमः कामभस्मं नमश्शान्तशीलं
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ १॥

सदा तीर्थसिद्धं सदा भक्तरक्षं
सदा शैवपूज्यं सदा शुभ्रभस्मम् ।
सदा ध्यानयुक्तं सदा ज्ञानतल्पं
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ २॥

श्मशाने शयानं महास्थानवासं (श्मशानं भयानं)
शरीरं गजानं सदा चर्मवेष्टम् ।
पिशाचादिनाथं पशूनां प्रतिष्ठं (पिशाचं निशोचं पशूनां)
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ३॥

फणीनागकण्ठे भुजङ्गाद्यनेकं (फणीनागकण्ठं, भुजङ्गाङ्गभूषं)
गले रुण्डमालं महावीर शूरम् ।
कटिव्याघ्रचर्मं चिताभस्मलेपं
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ४॥

शिरश्शुद्धगङ्गा शिवावामभागं
बृहद्दीर्घकेशं सदा मां त्रिनेत्रम् । (वियद्दीर्घकेशं, बृहद्दिव्यकेशं सहोमं)
फणीनागकर्णं सदा भालचन्द्रं (बालचन्द्रं)
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ५॥

करे शूलधारं महाकष्टनाशं
सुरेशं परेशं महेशं जनेशम् । (वरेशं महेशं)
धनेशस्तुतेशं ध्वजेशं गिरीशं (धने चारु ईशं, धनेशस्य मित्रं)
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ६॥

उदानं सुदासं सुकैलासवासं (उदासं)
धरा निर्धरं संस्थितं ह्यादिदेवम् । (धरानिर्झरे)
अजं हेमकल्पद्रुमं कल्पसेव्यं
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ७॥

मुनीनां वरेण्यं गुणं रूपवर्णं
द्विजानं पठन्तं शिवं वेदशास्त्रम् । (द्विजा सम्पठन्तं, द्विजैः स्तूयमानं, वेदशात्रैः)
अहो दीनवत्सं कृपालुं शिवं तं (शिवं हि)
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ८॥

सदा भावनाथं सदा सेव्यमानं
सदा भक्तिदेवं सदा पूज्यमानम् ।
मया तीर्थवासं सदा सेव्यमेकं (महातीर्थवासम्)
भजे पार्वतीवल्लभं नीलकण्ठम् ॥ ९॥

इति पार्वतीवल्लभनीलकण्ठाष्टकं सम्पूर्णम् ।

Parvati Vallabha Ashtakam Meaning in Hindi – पार्वती वल्लभ अष्टकम हिंदी अर्थ

समस्त प्राणियों के स्वामी भगवान शिव को नमस्कार है, देवों के देव महादेव को नमस्कार है, मृत्यु के देवता महाकाल को नमस्कार है, महान ज्योति को नमस्कार है, उनको नमस्कार है जिन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया, उनको नमस्कार है जो स्वभाव से शांत हैं, पार्वती के वल्लभ अर्थात प्रिय, नीलकंठ को नमस्कार है।

सदैव तीर्थों में सिद्धि प्रदान करने वाले, अपने भक्तों के पक्ष में सदैव उपस्थित, शैवों द्वारा पूजित, पवित्र भस्म धारण करने वाले, सदैव ध्यान की मुद्रा में रहने वाले, ज्ञान में सदैव रुचि रखने वाले, सदैव ज्ञान सैय्या पर शयन करने वाले नीलकंठ पार्वती वल्लभ को नमस्कार है।

जो अत्यन्त भयंकर श्मशान भूमि में निवास करता है , जो सदैव हाथी की खाल से अपना शरीर ढका रहता है, पिशाच, भूत प्रेत, पशुओं, आदि के स्वामी नीली गर्दन वाले पार्वती-वल्लभ को नमस्कार है।

जिसने अपने गले में अनेकों विषधर सर्पों को धारण किये है, वह मुंडों की माला पहनता है और वह महान पराक्रमी है, वह मरे हुए व्याघ्र की खाल पहनता है और अपने शरीर पर दाह की भस्मलगाने वाले, नीलकंठ पार्वती-वल्लभ को मैं नमस्कार करता हूं।

जिनके सिर पर शुद्ध गंगा और बाईं ओर पार्वती विराजती हैं, उनके सिर पर बड़ी जटाएं हैं और उनकी तीन आंखें हैं, वे अपने कानों पर फन वाला सांप पहनते हैं और हमेशा युवा चंद्रमा को अपने पास रखते हैं। ऐसे ​नीलकंठ पार्वती-वल्लभ को मैं नमस्कार करता हूं।

उनके हाथों में त्रिशूल है, वे भक्तों के संकटों का नाश करते हैं, वे देवों के स्वामी हैं, वर प्रदान करने वाले, महेश, मनुष्यों के स्वामी, वे सुंदर हमारे शरीर के भगवान हैं, ध्वजाओं के स्वामी और पहाड़ों के स्वामी हैं, नीलकंठ पार्वती-वल्लभ को मैं नमस्कार करता हूं।

वह अपने रूप के प्रति बहुत विशेष नहीं है, उसके महान सेवक हैं, वह महान कैलास में वास करते हैं,, वह अतीत को नियंत्रित करने वाला महान देवता है, उसकी सेवा अजेय स्वर्णिम इच्छा देने वाले वृक्ष द्वारा की जाती है और साथ ही कल्पों द्वारा भी की जाती है, नीलकंठ पार्वती-वल्लभ को मैं नमस्कार करता हूं।

वे चरित्र, रूप और शिष्टता के कारण महान ऋषियों द्वारा पूजे जाते हैं, वे द्विजों का उचित मार्गदर्शन करते हैं, वे वेदों के शिव हैं , वे दीन-दुखियों से प्रेम करते हैं तथा दया और शांति के भंडार हैं, जिनकी गर्दन नीली है, उन पार्वती-वल्लभ को मैं नमस्कार करता हूं।

वे सदैव जन्म और मृत्यु के स्वामी हैं, वे सदैव सभी के द्वारा सेवित हैं, वे सदैव अपने सभी भक्तों के स्वामी हैं, वे पूजनीय भगवान हैं, मेरे द्वारा सभी देवताओं में पूज्य, नीलकंठ पार्वती-वल्लभ को मैं नमस्कार करता हूं।

Parvati Vallabha Ashtakam Lyrics in English – पार्वती वल्लभ अष्टकम इंग्लिश लिरिक्स

Namo Bhoothanadham Namo Deva Devam,
Nama Kala Kalam Namo Divya Thejam,
Nama Kama Asmam, Nama Santha Seelam,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

Sada Theerthasidham, Sadha Bhakta Paksham,
Sada Shaiva Poojyam, Sada Shura Bhasmam,
Sada Dhyana Yuktham, Sada Jnana Dalpam,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

Smasanam Bhayanam Maha Sthaana Vasam,
Sareeram Gajaanaam Sada Charma Veshtam,
Pisacham Nisesa Sama Pasoonaam Prathishtam,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

Phani Naga Kande, Bhjuangahd Anekam,
Gale Runda Malam, Maha Veera Sooram,
Kadi Vyagra Sarmam., Chitha Basma Lepam,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

Siraad Shuddha Ganga, Shiva Vama Bhagam,
Viyad Deerga Kesam Sadaa Maam Trinetram,
Phanee Naga Karnaam Sada Bala Chandram,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

Kare Soola Dharam Maha Kashta Nasam,
Suresam Varesam Mahesam Janesam,
Thane Charueesam, Dwajesam, Gireesam,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

Udhasam Sudhasam, Sukailasa Vasam,
Dara Nirdhram Sasmsidhi Tham Hyathi Devam,
Aja Hema Kalpadhruma Kalpa Sevyam,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

Munenam Varenyam, Gunam Roopa Varnam,
Dwija Sampadastham Shivam Veda Sasthram,
Aho Dheena Vathsam Krupalum Shivam,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

Sada Bhava Nadham, Sada Sevya Manam,
Sada Bhakthi Devam, Sada Poojyamanam,
Maya Theertha Vasam, Sada Sevyamekham,
Bhaje Parvati Vallabham Neelakantham.

पार्वती वल्लभ अष्टकम

Parvati Vallabha Ashtakam Meaning in English – पार्वती वल्लभ अष्टकम इंग्लिश अर्थ

Salutations to Lord Shiva, the master of all living beings, salutations to Mahadev, the God of gods, salutations to Mahakaal, the time of times, salutations to the divine brilliance, salutations to the one who burnt down Kamadeva, salutations to the calm and gentle form of Shiva, salutations to Parvati’s beloved, Neelkanth.

Salutations to Neelkanth Parvati Vallabh, who always provides siddhi in pilgrimages, always protects the devotees, always worshipped by Shiva devotees, always coated with white ashes, always engrossed in meditation and always sleeps on the bed of knowledge.

I salute Neelkanth Parvati-vallabh, who sleeps in the crematorium, rules the great place, i.e. Kailash, always wears elephant skin, and is the lord of ghosts, spirits, animals, etc.

I salute Neelkanth Parvati-vallabh, who has many poisonous snakes in his throat, who wears a garland of skulls around his neck, who is a great warrior and who wears tiger skin around his waist and who applies the ashes of the funeral pyre on his body.

I salute the Neelkanth Parvati-vallabh, on whose head there is Ganga and on whose left side Shiva, i.e., Parvati sits, whose hair has long matted locks, who has three eyes, whose ears are adorned with poisonous snakes, whose head is always adorned with the moon.

I salute the one who holds the trident in his hands, who takes away the sufferings of his devotees, who is the best among gods, who bestows boons, Mahesh, the lord of men, the lord of wealth, the lord of flags, the lord of mountains, Neelkanth Parvati-vallabh.

I salute Neelkanth Parvati-vallabh, who is the servant of his devotees, who resides in Kailash, due to whom this universe exists, who is the primordial god, self-created divine, who is worshipped for thousands of years.

I salute the one who is worthy of worship for the sages, whose form, qualities, colours, etc. are praised by the Dwijas, and who has been mentioned in the Vedas, the kind and merciful, Mahesh, Neelkanth, Parvati-vallabh.

I salute the Lord of all living beings, the one who is always to be served, the one who is to be worshipped, the one whom I worship among all the gods, Neelkanth Parvati-vallabh.

Importance of Parvati Vallabha Ashtakam – पार्वती वल्लभ अष्टकम का महत्व

श्री पार्वती वल्लभ अष्टकम में भगवान शिव के गुणों का वर्णन करने वाले नौ श्लोक हैं। पार्वती वल्लभ अष्टकम माता पार्वती और उनके भगवान शिव को श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

इसमें भगवान शिव की विभिन्न विशेषताओं का वर्णन है। यह सारा संसार शिव की क्रीड़ास्थली है और वेद भी उनका गुणगान करते नहीं थकते। जो भगवान शिव विष को पचा सकते हैं और भूत-प्रेत आदि के भी स्वामी हैं, उनकी कृपा से क्या नहीं हो सकता।

यह पार्वती वल्लभ अष्टकम भक्त तो सही मार्ग दिखाने और नकारात्मक विचार त्यागने में महत्वपूर्ण है। इस अष्टकम में माता पार्वती, और भगवान शिव को नमन किया गया है।

पार्वती वल्लभ अष्टकम

पार्वती वल्लभ अष्टकम में देवों के देव महादेव की विविध खसियत तथा उनके रूप के बारे में वर्णन किया गया है।

भगवान शिव का गुनगान साधारण मनुष्य के साथ बाकी देवता भी करते हैं। भगवान शिव की आराधना को उनके आशीर्वाद के समान जाना जाता है।

Benefits of Chanting Parvati Vallabha Ashtakam – पार्वती वल्लभ अष्टकम का जाप करने के लाभ

पार्वती वल्लभ अष्टकम प्राचीन ऋषि आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक भजन है, जिसमें देवी पार्वती के पति भगवान शिव की स्तुति की गई है। ऐसा माना जाता है कि इस भजन को पढ़ने या सुनने से भक्तों को कई लाभ मिलते हैं:

1. दैवीय सुरक्षा: ऐसा माना जाता है कि यह भजन इसे गाने या सुनने वालों को बाधाओं, नकारात्मक ऊर्जाओं और प्रतिकूलताओं से दैवीय सुरक्षा प्रदान करता है।

2. आंतरिक शांति: भजन में व्यक्त लयबद्ध छंद और हार्दिक भक्ति मन और हृदय पर शांत प्रभाव डालती है, तथा आंतरिक शांति, स्थिरता और भावनात्मक कल्याण को बढ़ावा देती है।

3. दिव्य प्रेम का आशीर्वाद: यह भजन भगवान शिव और देवी पार्वती के बीच प्रेम का गुणगान करता है, तथा भक्तों को दिव्य स्नेह और साहचर्य का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए अपने रिश्तों में प्रेम, भक्ति और सद्भाव विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करता है।

4. आध्यात्मिक उत्थान: “पार्वती वल्लभ अष्टकम” एक आध्यात्मिक ग्रन्थ है जिसका उपयोग भक्तों द्वारा ईश्वर के साथ अपने संबंध को बढ़ाने तथा अपने आध्यात्मिक विकास और आत्म-साक्षात्कार में सहायता के लिए किया जाता है।

5. पापों और नकारात्मकता का निवारण: ऐसा माना जाता है कि इस स्तोत्र के पाठ से भक्तों पर शुद्धिकरण प्रभाव पड़ता है, उन्हें पिछले पापों, नकारात्मक कर्मों और अशुद्धियों से मुक्त होने में मदद मिलती है, तथा उन्हें आध्यात्मिक शुद्धता और मुक्ति की ओर मार्गदर्शन मिलता है।

6. इच्छाओं की पूर्ति: भक्तजन अक्सर इस स्तोत्र का जाप करते हुए भगवान शिव और देवी पार्वती से भक्तिपूर्वक प्रार्थना करते हैं तथा अपनी इच्छाओं, आकांक्षाओं और महान प्रयासों की पूर्ति के लिए उनका आशीर्वाद मांगते हैं।

7. पार्वती वल्लभ अष्टकम का नियमित पाठ करने से व्यक्ति के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है।

Conclusion

संक्षेप में, श्री पार्वती वल्लभ अष्टकम ऋषि आदि शंकराचार्य द्वारा रचित एक भजन है। इस अष्टकम का पाठ प्रतिदिन करने से मन को शांति, धन, समृद्धि और यश में वृद्धि होती है।

ऐसा माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से इस अष्टकम का पाठ करता है, तो उसके दुख और समस्याएं समाप्त हो जाती हैं।

यह भी कहा जाता है कि इस दिव्य स्तोत्र का पाठ करने से देवी पार्वती और भगवान शिव की दिव्य कृपा प्राप्त होती है।

अगर आप घर में सुख-समृद्धि बनाए रखना चाहते हैं, तो रोजाना पाठ करना बेहद फायदेमंद साबित हो सकता है। इससे मानसिक और आध्यात्मिक शक्ति का विकास होता है, जो जीवन में सकारात्मक बदलाव लाती है।

श्री पार्वती वल्लभ अष्टकम देवी पार्वती के पति के रूप में भगवान शिव की एक प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है। भगवान शिव और पार्वती की कृपा के लिए भक्त भक्ति भाव से इस अष्टकम का जाप करते हैं।

इसे दिव्य कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने, आध्यात्मिक उत्थान लाने और भक्तों के जीवन को शांति, प्रेम और आध्यात्मिक पूर्णता से समृद्ध करने की क्षमता के लिए जाना जाता है।