Shri Gayatri Kavacham Lyrics in Hindi: श्री गायत्री कवच

श्री गायत्री कवच का पाठ माता गायत्री की प्रार्थना करने के लिए किया जाता है| इस पवित्र गायत्री कवच की रचना महर्षि वेदव्यास जी ने की थी| इस कवच के बारे में स्वयं भगवान विष्णु ने देवर्षि नारद जी को बताया था| आपको बता दे कि श्री गायत्री कवच के बारे में उल्लेख श्री भागवत पुराण के बारहवें स्कन्ध में मिलता है| इस गायत्री कवच का जाप करने से भक्तों के सभी रोग दूर तथा समस्त पापों का नाश हो जाता है|

इस श्री गायत्री कवच में माता गायत्री की महिमा एवं उनकी शक्तियों के बारे में वर्णन किया गया है| जो भी भक्त इस कवच का नियमित रूप से पाठ करता है, उसे समस्त दुखों, भय तथा संकट से मुक्ति मिल जाती है| तो आइये जानते है श्री गायत्री कवच के बारे में|

गायत्री कवच

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श्री गायत्री कवच हिंदी अर्थ सहित – Gayatri Kavacham Lyrics with Hindi Meaning

|| श्री गायत्री कवचम् ||

विनियोग:

ॐ अस्य श्रीगायत्री – कवचस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्रा ऋषयः, ऋग् यजुः सामाऽथर्वाणि छन्दांसि, परब्रह्म स्वरूपिणी गायत्रीदेवता, भूः बीजम्, भुवः शक्तिः, स्वाहा कीलकम्, श्रीगायत्रीप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।

हिंदी अर्थ – इस गायत्री कवच के ब्रह्मा, विष्णु तथा रूद्र ऋषि है; ऋग, यजु: अथर्व तथा छंद है, परब्रह्मस्वरूपिणी गायत्री देवता है; भू: बीज है, भुव: शक्ति है, माता गायत्री की प्रीति के लिए इसका पाठ करना चाहिए|

ध्यान:

वर्णास्त्रां कुण्डिकाहस्तां शुद्ध निर्मल ज्योतिषीम् ।
सर्वतत्त्वमयीं वन्दे गायत्रीं वेदमातरम् ॥
मुक्ता विद्रुम हेम नील धवलच्छायैर्मुखैस्त्रीक्षणै।
र्युक्तामिन्दु निबद्ध रत्नमुकुटां तत्वार्थ वर्णात्मिकाम्।
गायत्रीं वरदाऽभयाऽङ्कुश कशां शूलं कपालं गुणं।
शङ्ख चक्रमथारविन्दयुगलं हस्तैर्वहन्तीं भजे ॥

हिंदी अर्थ – सभी वर्णों के स्वरूप वाली, कुण्डिका को धारण करने वाली, निर्मल ज्योति स्वरूप वाली, शुद्ध, सम्पूर्ण तत्वों से विराजमान, वेदमाता गायत्री की मैं वंदना करता हूँ| जो स्वर्ण, मोती, मूंगा, नील तथा स्वच्छ छाया वाले मुख से सुशोभित है एवं जो स्त्रियोचित सभी मंगलों से युक्त है, जो रत्नजटित चंद्रकला से सुशोभित है, जो वर्णस्वरुप है| जिनके हाथों में अभय, कशा, वर, अंकुश, कपाल, धनुष, शूल, कमल एवं चक्र सुशोभित है| उन गायत्री देवी का मैं ध्यान करता हूँ|

कवच:

ॐ गायत्री पूर्वतः पातु सावित्री पातु दक्षिणे।
ब्रह्मविद्या च मे पश्चादुत्तरे मां सरस्वती ॥1॥

हिंदी अर्थ – गायत्री जी पूर्व दिशा में, सावित्री दक्षिण दिशा में, महाविद्या पश्चिम दिशा में एवं माता सरस्वती माता उत्तर दिशा में हमारी रक्षा करे|

पावकीं मे दिशं रक्षेत् पावकोज्वलशालिनी।
यातुधानीं दिशं रक्षेद्यातुधान गणार्दिनी ॥2॥

हिंदी अर्थ – अग्नि की भांति प्रकाशपूर्ण देवी अग्निकोण में, यातुधानों का नाश करने वाली दक्षिण-पश्चिम में हमारी रक्षा करें|

पावमानीं दिशं रक्षेत् पवमान विलासिनी।
दिशं रौद्रीमवतु मे रुद्राणी रुद्ररूपिणी ॥3॥
ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा।
एवं दश दिशो रक्षेत् सर्वतो भुवनेश्वरी ॥4॥

हिंदी अर्थ – वायु के समान विलास करने वाली देवी वायव्यकोण में, रूद्र रूपिणी भगवती रुद्राणी उत्तर-पूर्व दिशा में हमारी रक्षा करे| ब्रह्माणी ऊपर एवं वैष्णवी नीचे की ओर हमारी रक्षा करे| इसी भांति सभी देवियाँ दस दिशाओं में रक्षा करें|

ब्रह्मास्त्र स्मरणादेव वाचां सिद्धिः प्रजायते।
ब्रह्मदण्डश्च मे पातु सर्वशस्वाऽस्त्र भक्षकः ॥5॥
ब्रह्मशीर्षस्तथा पातु शत्रूणां वधकारकः ।
सप्तव्याहृतयः पान्तु सर्वदा बिन्दुसंयुताः ॥6॥

हिंदी अर्थ – समस्त शास्त्रों का नाश करने वाले ब्रह्मदंड से हमारी रक्षा करें| शत्रुओं का विनाश करने वाला ब्रह्मशीर्ष हमारी रक्षा करें| विसर्ग के सहित सप्रणव व्याहृतियाँ हमेशा हमारी रक्षा करें|

वेदमाता च मां पातु सरहस्या सदेवता।
देवीसूक्तां सदा पातु सहस्त्राक्षरदेवता ॥7॥

हिंदी अर्थ – स-रहस्या, स-देवता एवं देवमाता हमारी रक्षा करें| जिसके सहस्त्राक्षर देवता है, वह देवी सूक्त हमारी रक्षा करें|

चतुष्षष्टिकलाविद्या दिव्याद्या पातु देवता।
बीजशक्तिश्च मे पातु पातु विक्रमदेवता ॥8॥

हिंदी अर्थ – चतु: षष्टि कला सहित दिव्य विद्या हमारी रक्षा करें| बीज – शक्ति हमारी रक्षा करें| विक्रम देवता हमारी रक्षा करें|

तत्पदं पातु मे पादौ जड्डे मे सवितुः पदम् ।
वरेण्यं कटिदेशं तु नाभिं भर्गस्तथैव च ॥9॥
देवस्य मे तु हृदयं धीमहीति गलं तथा ।
धियो मे पातु जिह्वायां यः पदं पातु लोचने ॥10॥

हिंदी अर्थ – ‘तत्’ पद पैर की रक्षा करें, ‘सवितुः’ पद जांघ की, ‘वरेण्यं’ कटि देश की एवं ‘भर्ग’ पद नाभिस्थान की रक्षा करें| ‘देवस्य’ हृदय की, ‘धीमहि’ गले की, ‘धियो’ जिव्हा की, ‘य:’ पद नेत्र की रक्षा करे|

ललाटे नः पदं पातु मूर्द्धानं मे प्रचोदयात्।
तद्वर्णः पातु मूर्द्धानं सकारः पातु भालकम् ॥11॥

हिंदी अर्थ – ‘न:’ ललाट की, ‘प्रचोदयात’ सिर की रक्षा करें| ‘ततः’ वर्ण मूर्धा की एवं ‘स’ वर्ण भाल की रक्षा करें|

चक्षुषी मे विकारस्तु श्रोत्रं रक्षेत्तु कारकः ।
नासापुटे वकारो मे रेकारस्तु कपोलयोः ॥12॥
णिकारस्त्वधरोष्ठे च यकारस्तूर्ध्व ओष्ठके।
आस्यामध्ये भकारस्तु गोंकारस्तु कपोलयोः ॥13॥

हिंदी अर्थ – ‘वि’ वर्ण दोनो नेत्रों की, ‘तु’ वर्ण कानों की, ‘व’ नासापुटो की, ‘रे’ वर्ण कपोलों की रक्षा करें| ‘ण’ वर्ण अधरोष्ठ की, ‘य’ ऊपर के होंठ की, ‘भ’ वर्ण मुख के मध्य में, ‘र्गो’ दोनों कपोलो की रक्षा करें|

देकारः कण्ठदेशे च वकारः स्कन्धदेशयोः ।
स्यकारो दक्षिणं हस्तं धीकारो वामहस्तकम् ॥14॥
मकारो हृदयं रक्षेद् हिकारो जठरं तथा ।
धिकारो नाभिदेशं तु योकारस्तु कटिद्वयम् ॥15॥

हिंदी अर्थ – ‘दे’ कंठदेश की, ‘व’ स्कंधदेश की, ‘स्य’ दाहिने हाथ की, ‘धी’ बाएँ हाथ की रक्षा करें| ‘मं’ हृदय की, ‘हि’ जठर की, ‘धि’ नाभिस्थान की, ‘यो’ दोनों कटि भाग की रक्षा करें|

गायत्री कवच

गुह्यं रक्षतु योकार ऊरू में नः पदाक्षरम्।
प्रकारो जानुनी रक्षेच्चोकारो जङ्घदेशयोः ॥16॥
दकारो गुल्फदेशं तु यात्कारः पादयुग्मकम् ।
जातवेदेति गायत्री त्र्यम्बकेति दशाक्षरा ॥17॥

हिंदी अर्थ – ‘यो’ गुह्यांग की, ‘न:’ पद व अक्षर दोनों उरू, ‘प्र’ दोनों घुटनों की, ‘चो’ दोनों जंघा की रक्षा करें| ‘द’ गल्फ की, ‘यात’ हमारे दोनों पैरों की रक्षा करें|

सर्वतः सर्वदा पातु आपो ज्योतीति षोडशी।
इदं तु कवचं दिव्यं बाधा शत विनाशकम् ॥18॥
चतुष्षष्टिकलाविद्या सकलैश्वर्य सिद्धिदम् ।
जपारम्भे च हृदयं जपान्ते कवचं पठेत् ॥19॥

हिंदी अर्थ – यह माता गायत्री देवी का कवच कई समस्याओं को नष्ट करने वाला है, चौसठ कलाएँ तथा ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है| गायत्री जाप के प्रारम्भ में गायत्री-हृदय तथा जप के अंत में गायत्री कवच का पाठ करना चाहिए|

स्त्री गो ब्राह्मण मित्रादि द्रोहाद्यखिल पातकैः।
मुच्यते सर्वपापेभ्यः परं ब्रह्माधि गच्छति ॥20॥

हिंदी अर्थ – स्त्री वध, ब्राह्मण वध, मित्रद्रोह तथा गोवध आदि पापों को नष्ट कर देता है| गायत्री कवच का पाठ करने वाला मनुष्य परब्रह्म परमात्मा को प्राप्त हो जाता है|

पुष्पाञ्जलिं च गायत्र्या मूलेनैव पठेत् सकृत्।
शतसाहस्त्र वर्षाणां पूजायाः फलमाप्नुयात् ॥21॥

हिंदी अर्थ – इस गायत्री कवच का सदैव पाठ कर मूल मंत्र से एक बार गायत्री देवी को पुष्पांजलि देने से हजारों वर्षों तक की पूजा का फल प्राप्त होता है|

भूर्जपत्रे लिखित्वैतत् स्वकण्ठे धारयेद् यदि।
शिखायां दक्षिणे बाहौ कण्ठे वा धारयेद् बुधः ॥22॥
त्रैलोक्यं क्षोभयेत् सर्व त्रैलोक्यं दहति क्षणात् ।
पुत्रवान् धनवाञ्छ्रीमान् नानाविद्यानिधिर्भवेत् ॥23॥

हिंदी अर्थ – जो व्यक्ति इस कवच को भोजपत्र पर लिखकर, शिखा, कंठ व दाहिने हाथ में या मणिबंध में धारण करते है, वे क्षण भर में तीनों लोकों का नाश कर सकते है| वे धनवान, पुत्रवान तथा अनेकों विद्याओ के विशेषज्ञ बन जाते है|

ब्रह्मास्त्रादीनि सर्वाणि तदङ्गस्पर्शनात्ततः ।
भवन्ति तस्य तुच्छानि किमन्यत् कथयामि ते ॥24॥

हिंदी अर्थ – गायत्री कवच पाठ के फल को बहुत कहने से क्या? ब्रह्मास्त्रादि भी उसके अंग के स्पर्श से तुच्छ हो जाते है|

न देयं परशिष्येभ्यो ह्यभक्तेभ्यो विशेषतः ।
शिष्येभ्यो भक्तियुक्तेभ्यो ह्यन्यथा मृत्युमाप्नुयात् ॥25॥

हिंदी अर्थ – कहा जाता है कि गायत्री कवच के जप की विधि दुसरे शिष्यों को नहीं देनी चाहिए| तथा जो भक्त न हो, उसे भी नहीं देनी चाहिए| अपने शिष्य तथा भक्त को ही इस विधि के बारे में कहना चाहिए नहीं तो वह मृत्यु को प्राप्त कर लेता है|

इति श्रीअगस्त्यसंहितायां ब्रह्मनारायणसंवादे प्रकृतिखण्डे गायत्रीकवचं सम्पूर्णम् ॥

Bhojan Mantra in Hindi: भोजन मंत्र क्या है एवं भोजन करने के नियम

भोजन मंत्र: हिंदू धर्म की परंपराओं के अनुसार भोजन करने से पहले तथा भोजन करने के बाद कुछ नियमों के बारे में बताया गया है| पौराणिक समय में लोग भोजन करने से पूर्व एवं भोजन करने के बाद इन नियमों का पालन करते थे|

परन्तु आज के समय में भोजन के नियमों का पालन करना तो दूर, लोगों के पास सही समय पर खाना खाने का वक्त भी नहीं होता है| धार्मिक ग्रंथों में इस बारे में बताया गया है कि अन्न में माता अन्नपूर्णा का वास होता है|

इस कारण हमेशा भोजन करने से पहले माता अन्नपूर्णा को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए| इसलिए भोजन करने से पूर्व भोजन मंत्र का जाप करना चाहिए| ऐसा करने से हम माता अन्नपूर्णा के प्रति सम्मान को प्रकट करते है| भोजन करने से पूर्व भोजन मंत्र (Bhojan Mantra Lyrics) का जाप करने से माता अन्नपूर्णा बहुत ही प्रसन्न होती है|

भोजन मंत्र

भोजन मंत्र का जाप करने के पश्चात किया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए भी बहुत लाभदायक होता है| आज इस लेख के माध्यम से हम आपको भोजन मंत्र, भोजन मंत्र का हिंदी अर्थ एवं भोजन के नियमों के बारे में बताएँगे|

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भोजन मंत्र लिरिक्स- Bhojan Mantra Lyrics in Hindi

अन्न ग्रहण करने से पहले
विचार मन मे करना है
किस हेतु से इस शरीर का
रक्षण पोषण करना है
हे परमेश्वर एक प्रार्थना
नित्य तुम्हारे चरणों में
लग जाये तन मन धन मेरा
विश्व धर्म की सेवा में ॥

ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।
ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्म समाधिना।।

ॐ सह नाववतु।
सह नौ भुनक्तु।
सह वीर्यं करवावहै।
तेजस्विनावधीतमस्तु।
मा विद्‌विषावहै॥
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

भोजन मंत्र

Bhojan Mantra Lyrics in Hindi – ॐ सह नाववतु।

Ann grahan karne se pehle
Vichar man me karna hai
Kis hetu se is Shareer ka
Rakshan Poshan karna hai
Hey Parameshwar ek Prarthana
Nitya tumhare charnon mein
Lag jaye tan man dhan mera
Vishva dharm ki seva mein.

Brahmarpanam brahmahavirbrahmagnau brahmana hutam.
Brahmaiva tena gantavyam brahmakarma samadhina.

Om Sah navavatu.
Sah nau bhunaktu.
Sah veeryam karavavahai.
Tejasvina vadheetamastu.
Ma Vidvishavahai.
Om shanti: shanti: shanti:

भोजन करने के कुछ महत्वपूर्ण नियम – Some Important Rules for Eating

  • सर्वप्रथम भोजन करने से पूर्व शरीर के पांच अंगों (2 हाथ, 2 पैर और मुंह) को धोकर ही भोजन ग्रहण करना चाहिए|
  • भोजन प्रारम्भ करने से पहले अन्नपूर्णा माता का ध्यान करते हुए “सभी भूखों को भोजन प्राप्त हो” ऐसी प्रार्थना करनी चाहिए|
  • जो व्यक्ति भोजन बनाने वाला है उसे स्नान करके शुद्ध मन से एवं मंत्र का जाप करते हुए ही भोजन बनाना चाहिए एवं सबसे पहले 3 रोटियां कुत्ते, गाय और कौवे के अलग निकालकर ही परिजनों को भोजन परोसना चाहिए|
  • भोजन हमेशा परिवार के सभी सदस्यों को साथ मिलकर ही करना चाहिए| कहा जाता है कि अलग – अलग भोजन करने से परिवार के सदस्यों में कभी भी प्रेम एवं एकता बढ़ नही पाती है|
  • भोजन को उत्तर एवं पूर्व दिशा की ओर मुख रखकर ही करना चाहिए| पश्चिम दिशा की ओर मुख रखकर भोजन करने रोगों में वृद्धि होती है तथा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके किया हुआ भोजन प्रेतों को प्राप्त होता है|

निष्कर्ष

हिंदू धर्म के पौराणिक ग्रंथों में बताया गया है कि भोजन करने से पहले भोजन मंत्र का जाप करना मनुष्यों के लिए बहुत ही लाभकारी साबित होता है| भोजन को हमेशा हाथ – मुंह धोकर ही खाना चाहिए|

माना जाता है कि भोजन मंत्र से हमारे शरीर को विभिन्न प्रकार की ऊर्जा प्राप्त होती है| पूर्ण विधि विधान के साथ तथा भोजन मंत्र का जाप करके भोजन करने से हमे इसका दुगना फल प्राप्त होता है|

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Panchmukhi Hanuman Kavach in Hindi: पंचमुखी हनुमान कवच

भगवान हनुमान जी के इस पंचमुखी हनुमान कवच (Panchmukhi Hanuman Kavach) को बहुत ही शक्तिशाली एवं प्रभावशाली माना जाता है| इस पंचमुखी हनुमान कवच का नियमित रूप से पाठ करने से मनुष्य सदा के लिए विजयी हो जाता है|

यह भी माना जाता है कि जो भक्त सच्ची श्रद्धा से इस पंचमुखी हनुमान कवच का जाप करता है, उसे किसी भी प्रकार कि बुरी शक्ति नुकसान नहीं पहुंचा सकती है| इस पंचमुखी हनुमान कवच को धारण करने से जातक पर किसी भी काले जादू एवं तांत्रिक क्रिया का कोई प्रभाव नहीं होता है तो आइये जानते है इस पंचमुखी हनुमान कवच के बारे में|

पंचमुखी हनुमान कवच

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पंचमुखी हनुमान कवच हिंदी में – Shri Panchmukhi Hanuman Kavach in Hindi

श्रीगणेशाय नमः ।
ॐ श्री पञ्चवदनायाञ्जनेयाय नमः … ।

ॐ अस्य श्री
पञ्चमुखहनुमन्मन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः … ।

गायत्रीछन्दः ।
पञ्चमुखविराट् हनुमान्देवता । ह्रीं बीजं … ।

श्रीं शक्तिः ।
क्रौं कीलकं । क्रूं कवचं । क्रैं अस्त्राय फट् … ।
इति दिग्बन्धः … ।

श्री गरुड उवाच ।

अथ ध्यानं प्रवक्ष्यामि श्रृणुसर्वाङ्गसुन्दरि…
यत्कृतं देवदेवेन ध्यानं हनुमतः प्रियम् ।। 1।।

पञ्चवक्त्रं महाभीमं त्रिपञ्चनयनैर्युतम्…
बाहुभिर्दशभिर्युक्तं सर्वकामार्थसिद्धिदम् ।। 2 ।।

पूर्वं तु वानरं वक्त्रं कोटिसूर्यसमप्रभम्…
दन्ष्ट्राकरालवदनं भृकुटीकुटिलेक्षणम् ।। 3 ।।

अस्यैव दक्षिणं वक्त्रं नारसिंहं महाद्भुतम्…
अत्युग्रतेजोवपुषं भीषणं भयनाशनम् ।। 4 ।।

पश्चिमं गारुडं वक्त्रं वक्रतुण्डं महाबलम्…

सर्वनागप्रशमनं विषभूतादिकृन्तनम् ।। 5 ।।

उत्तरं सौकरं वक्त्रं कृष्णं दीप्तं नभोपमम्…
पातालसिंहवेतालज्वररोगादिकृन्तनम् ।। 6 ।।

ऊर्ध्वं हयाननं घोरं दानवान्तकरं परम् …
येन वक्त्रेण विप्रेन्द्र तारकाख्यं महासुरम् ।। 7 ।।

जघान शरणं तत्स्यात्सर्वशत्रुहरं परम् …
ध्यात्वा पञ्चमुखं रुद्रं हनुमन्तं दयानिधिम् ।। 8 ।।

खड्गं त्रिशूलं खट्वाङ्गं पाशमङ्कुशपर्वतम्…
मुष्टिं कौमोदकीं वृक्षं धारयन्तं कमण्डलुम् ।। 9 ।।

भिन्दिपालं ज्ञानमुद्रां दशभिर्मुनिपुङ्गवम् …
एतान्यायुधजालानि धारयन्तं भजाम्यहम् ।। 10 ।।

प्रेतासनोपविष्टं तं सर्वाभरणभूषितम्…
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।। 11 ।।

सर्वाश्चर्यमयं देवं हनुमद्विश्वतोमुखम्
पञ्चास्यमच्युतमनेकविचित्रवर्णवक्त्रं
शशाङ्कशिखरं कपिराजवर्यम
पीताम्बरादिमुकुटैरूपशोभिताङ्गं
पिङ्गाक्षमाद्यमनिशं मनसा स्मरामि ।। 12 ।।

मर्कटेशं महोत्साहं सर्वशत्रुहरं परम् …
शत्रु संहर मां रक्ष श्रीमन्नापदमुद्धर ।। 13 ।।

ॐ हरिमर्कट मर्कट मन्त्रमिदं
परिलिख्यति लिख्यति वामतले…
यदि नश्यति नश्यति शत्रुकुलं
यदि मुञ्चति मुञ्चति वामलता ।। 14 ।।

ॐ हरिमर्कटाय स्वाहा ।
ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय पूर्वकपिमुखाय
सकलशत्रुसंहारकाय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय दक्षिणमुखाय करालवदनाय
नरसिंहाय सकलभूतप्रमथनाय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनाय पश्चिममुखाय गरुडाननाय
सकलविषहराय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनायोत्तरमुखायादिवराहाय
सकलसम्पत्कराय स्वाहा ।

ॐ नमो भगवते पञ्चवदनायोर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय
सकलजनवशङ्कराय स्वाहा ।

ॐ अस्य श्री पञ्चमुखहनुमन्मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र
ऋषिः । अनुष्टुप्छन्दः । पञ्चमुखवीरहनुमान् देवता ।

हनुमानिति बीजम् । वायुपुत्र इति शक्तिः । अञ्जनीसुत इति कीलकम् ।
श्रीरामदूतहनुमत्प्रसादसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।
इति ऋष्यादिकं विन्यसेत् ।

ॐ अञ्जनीसुताय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ वायुपुत्राय मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ अग्निगर्भाय अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ रामदूताय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ पञ्चमुखहनुमते करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
इति करन्यासः ।

ॐ अञ्जनीसुताय हृदयाय नमः ।
ॐ रुद्रमूर्तये शिरसे स्वाहा ।
ॐ वायुपुत्राय शिखायै वषट् ।
ॐ अग्निगर्भाय कवचाय हुम् ।
ॐ रामदूताय नेत्रत्रयाय वौषट् ।
ॐ पञ्चमुखहनुमते अस्त्राय फट् ।
पञ्चमुखहनुमते स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।

पंचमुखी हनुमान कवच

अथ ध्यानम् ।

वन्दे वानरनारसिंहखगराट्क्रोडाश्ववक्त्रान्वितं
दिव्यालङ्करणं त्रिपञ्चनयनं देदीप्यमानं रुचा
हस्ताब्जैरसिखेटपुस्तकसुधाकुम्भाङ्कुशाद्रिं हलं
खट्वाङ्गं फणिभूरुहं दशभुजं सर्वारिवीरापहम् ।

अथ मन्त्रः ।

ॐ श्रीरामदूतायाञ्जनेयाय वायुपुत्राय महाबलपराक्रमाय
सीतादुःखनिवारणाय लङ्कादहनकारणाय महाबलप्रचण्डाय
फाल्गुनसखाय कोलाहलसकलब्रह्माण्डविश्वरूपाय
सप्तसमुद्रनिर्लङ्घनाय पिङ्गलनयनायामितविक्रमाय
सूर्यबिम्बफलसेवनाय दुष्टनिवारणाय दृष्टिनिरालङ्कृताय
सञ्जीविनीसञ्जीविताङ्गदलक्ष्मणमहाकपिसैन्यप्राणदाय
दशकण्ठविध्वंसनाय रामेष्टाय महाफाल्गुनसखाय सीतासहित-
रामवरप्रदाय षट्प्रयोगागमपञ्चमुखवीरहनुमन्मन्त्रजपे विनियोगः ।।

ॐ हरिमर्कटमर्कटाय बंबंबंबंबं वौषट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय फंफंफंफंफं फट् स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय खेंखेंखेंखेंखें मारणाय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय लुंलुंलुंलुंलुं आकर्षितसकलसम्पत्कराय स्वाहा ।
ॐ हरिमर्कटमर्कटाय धंधंधंधंधं शत्रुस्तम्भनाय स्वाहा ।
ॐ टंटंटंटंटं कूर्ममूर्तये पञ्चमुखवीरहनुमते
परयन्त्रपरतन्त्रोच्चाटनाय स्वाहा ।।

ॐ कंखंगंघंङं चंछंजंझंञं टंठंडंढंणं
तंथंदंधंनं पंफंबंभंमं यंरंलंवं शंषंसंहं
ळंक्षं स्वाहा ।
इति दिग्बन्धः ।

ॐ पूर्वकपिमुखाय पञ्चमुखहनुमते टंटंटंटंटं
सकलशत्रुसंहरणाय स्वाहा ।

ॐ दक्षिणमुखाय पञ्चमुखहनुमते करालवदनाय नरसिंहाय
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः सकलभूतप्रेतदमनाय स्वाहा ।
ॐ पश्चिममुखाय गरुडाननाय पञ्चमुखहनुमते मंमंमंमंमं
सकलविषहराय स्वाहा ।

ॐ उत्तरमुखायादिवराहाय लंलंलंलंलं नृसिंहाय नीलकण्ठमूर्तये
पञ्चमुखहनुमते स्वाहा ।

ॐ उर्ध्वमुखाय हयग्रीवाय रुंरुंरुंरुंरुं रुद्रमूर्तये
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय स्वाहा ।

ॐ अञ्जनीसुताय वायुपुत्राय महाबलाय सीताशोकनिवारणाय
श्रीरामचन्द्रकृपापादुकाय महावीर्यप्रमथनाय ब्रह्माण्डनाथाय
कामदाय पञ्चमुखवीरहनुमते स्वाहा ।

भूतप्रेतपिशाचब्रह्मराक्षसशाकिनीडाकिन्यन्तरिक्षग्रह-
परयन्त्रपरतन्त्रोच्चटनाय स्वाहा ।
सकलप्रयोजननिर्वाहकाय पञ्चमुखवीरहनुमते
श्रीरामचन्द्रवरप्रसादाय जंजंजंजंजं स्वाहा ।
इदं कवचं पठित्वा तु महाकवचं पठेन्नरः ।
एकवारं जपेत्स्तोत्रं सर्वशत्रुनिवारणम् ।। 15 ।।

द्विवारं तु पठेन्नित्यं पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ।
त्रिवारं च पठेन्नित्यं सर्वसम्पत्करं शुभम् ।। 16 ।।

चतुर्वारं पठेन्नित्यं सर्वरोगनिवारणम् ।
पञ्चवारं पठेन्नित्यं सर्वलोकवशङ्करम् ।। 17 ।।

षड्वारं च पठेन्नित्यं सर्वदेववशङ्करम् ।
सप्तवारं पठेन्नित्यं सर्वसौभाग्यदायकम् ।। 18 ।।

अष्टवारं पठेन्नित्यमिष्टकामार्थसिद्धिदम् ।
नववारं पठेन्नित्यं राजभोगमवाप्नुयात् ।। 19 ।।

दशवारं पठेन्नित्यं त्रैलोक्यज्ञानदर्शनम् ।
रुद्रावृत्तिं पठेन्नित्यं सर्वसिद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ।। 20 ।।

निर्बलो रोगयुक्तश्च महाव्याध्यादिपीडितः ।
कवचस्मरणेनैव महाबलमवाप्नुयात् ।। 21 ।।

।। इति श्रीसुदर्शनसंहितायां श्रीरामचन्द्रसीताप्रोक्तं
श्रीपञ्चमुखहनुमत्कवचं सम्पूर्णम् ।।

Kaal Bhairav Ashtakam Lyrics: काल भैरव अष्टकम संस्कृत में

भगवान काल भैरव की अराधना करने के लिए इस काल भैरव अष्टकम (Kaal Bhairav Ashtakam) का जाप भक्तों के द्वारा किया जाता है| काल भैरव जी को भगवान शिव का अवतार भी माना जाता है| भगवान काल भैरव को प्रसन्न करने के लिए उनके सभी भक्त सच्ची श्रद्धा के साथ उनकी पूजा तथा साथ ही काल भैरव अष्टकम (Kaal Bhairav Ashtakam) का भी जाप करते है|

जो भी भक्त मार्गशीर्ष महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली काल भैरव जयंती के दिन इस काल भैरव अष्टकम (Kaal Bhairav Ashtakam) का पाठ करते है, उनसे भगवान भैरव जी बहुत ही प्रसन्न होते है तो आइये पाठ करते है इस काल भैरव अष्टकम (Kaal Bhairav Ashtakam) का|

काल भैरव अष्टकम

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काल भैरव अष्टकम संस्कृत में – Kaal Bhairav Ashtakam Lyrics in Sanskrit

|| काल भैरव अष्टकम ||

देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं
व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्।

नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं|
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥1॥

भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं
नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्।

कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥2॥

शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्।

भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥3॥

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।

विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥4॥

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं
कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।

स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥5॥

रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं
नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम्।

मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥6॥

अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं
दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्।

अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥7॥

भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं
काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्।

नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥8॥

काल भैरव अष्टकम

Kaal Bhairav Ashtakam Lyrics in English – देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं

|| Kaal Bhairav Ashtakam ||

Deva raja sevyamaan pavananghri pankajam
Vyaala yajna sutramindu sekharam kripaakaram।

Naradadi yogi vrinda vanditam digamabaram|
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥1॥

Bhaanu koti bhaasvaram bhavaabdhitaarakam param
Neela kanthamipsitartha dayakam trilochanam।

Kaalkaalamambujaakshamakshashoolamaksharam
Kashika puradhinaatha kalabhairavam bhaje॥2॥

Shoola tanka pasa danda panimadi karanam
Shyama kayamadi devamaksharam niramayam।

Bhimavikramam Prabhum Vichitra tandava priyam
Kashika Puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥3॥

Bhukti mukti dayakam prashasta chaaru vigraham
Bhakta vatsalam sthitam samasta loka vigraham।

Vinikvananmanojna hemakingeeni lasatkatiṁ
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥4॥

Dharma setu palakam tvadharma maarga nashakam
Karma paasha mochakam susharma daayakam vibhum।

Swarna varna shesha paasha shobhitaanga mandalam
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥5॥

Ratna paaduka prabhaabhi rama pada yugmakam
Nityamadvitīyamishta daivatam niranjanam।

Mrityu darpa naashanam karala damṣhṭra mokshanam
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥6॥

Atta haasa bhinna padmajaanda kosa santatim
Drishti paata naṣta papajalamugra shasanam।

Ashta siddhi daayakam kapala malika dharam
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥7॥

Bhuta sangha nayakam vishala kirti daayakam
Kasi vaasa loka puṇya paapa shodhakam vibhum।

Neeti marga kovidam puratnam jagatpatim
Kashika puradhinatha kaalbhairavam bhaje॥8॥

Lingashtakam Lyrics in Sanskrit: लिंगाष्टकम – ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगं

लिंगाष्टकम (Lingashtakam Lyrics in Sanskrit) एक ऐसा छ: छंदों वाला मंत्र है, जिसका जाप शिवलिंग की पूजा करते समय किया जाता है| जो भी भगवान शिव का भक्त उनकी पूजा करते समय इस लिंगाष्टकम (Lingashtakam Lyrics in Sanskrit) का जाप करता है तो उसे भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त होता है|

मन की शांति के लिए भी लिंगाष्टकम (Lingashtakam Lyrics) मंत्र का निरंतर जाप बहुत ही लाभदायक होता है| इस मंत्र का जाप करने से मनुष्य की समस्त बुरी आदतें धीरे – धीरे दूर होने लगती है| कई विद्वानों का यह मानना है कि इस लिंगाष्टकम (Lingashtakam Lyrics in Sanskrit) मंत्र का जाप करने से मनुष्य शिवलोक को प्राप्त होता है तो आइये जाप करते है लिंगाष्टकम (Lingashtakam Lyrics in Sanskrit) मंत्र का|

लिंगाष्टकम

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लिंगाष्टकम मंत्र के लिरिक्स संस्कृत में – Lingashtakam Lyrics in Sanskrit

|| लिंगाष्टकम ||

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगं
निर्मलभासित शोभित लिंगम् |
जन्मज दुःख विनाशक लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ‖ 1 ‖

देवमुनि प्रवरार्चित लिंगं
कामदहन करुणाकर लिंगम् |
रावण दर्प विनाशन लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ‖ 2 ‖

सर्व सुगंध सुलेपित लिंगं
बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम् |
सिद्ध सुरासुर वंदित लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ‖ 3 ‖

कनक महामणि भूषित लिंगं
फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् |
दक्षसुयज्ञ विनाशन लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ‖ 4 ‖

कुंकुम चंदन लेपित लिंगं
पंकज हार सुशोभित लिंगम् |
संचित पाप विनाशन लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ‖ 5 ‖

देवगणार्चित सेवित लिंगं
भावै-र्भक्तिभिरेव च लिंगम् |
दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ‖ 6 ‖

अष्टदळोपरिवेष्टित लिंगं
सर्वसमुद्भव कारण लिंगम् |
अष्टदरिद्र विनाशन लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ‖ 7 ‖

सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगं
सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम् |
परमपदं परमात्मक लिंगं
तत्प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ‖ 8 ‖

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेश्शिव सन्निधौ |
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ‖

|| इति श्री लिंगाष्टकम् ||

Lingashtakam Lyrics in Sanskrit

Lingashtakam Lyrics in Englsih – ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगं

|| Lingashtakam ||

Brahmamurari surarchit lingam
Nirmalabhasit shobhit lingam |
Janmaja dukh vinashak lingam
Tatpranamami Sadashiva lingam ‖ 1 ‖

Devamuni pravarachit lingam
Kamdahan karunakara lingam |
Ravana darp vinashan lingam
Tatpranamami Sadashiva lingam ‖ 2 ‖

Sarva sugandh sulepit lingam
Buddhi vivardhan karan lingam |
Siddha surasur vandit lingam
Tatpranamami Sadashiva lingam ‖ 3 ‖

Kanak mahamani bhushit lingam
Phanipati veshtit shobhit lingam |
Dakshasuyajna vinashan lingam
Tatpranamami Sadashiva lingam ‖ 4 ‖

Kunkuma chandan lepit lingam
Pankaja haar sushobhit lingam |
Sanchit paap vinashan lingam
Tatpranamami Sadashiva lingam ‖ 5 ‖

Devaganaarchit sevit lingam
Bhavair-bhaktibhireva ch lingam |
Dinakar koti prabhakar lingam
Tatpranamami Sadashiva lingam ‖ 6 ‖

Ashtadalo pariveshtit lingam
Sarvasamudbhav karan lingam |
Ashtadaridra vinashan lingam
Tatpranamami Sadashiva lingam ‖ 7 ‖

Suraguru survar pujit lingam
Survana pushp sadarchit lingam |
Paramapadam parmaatmak lingam
Tatpranamami Sadashiva lingam ‖ 8 ‖

Lingashtakam idam punyam yah pathet Shiva sannidhau |
Shivalokam avapnoti Shiven sah modate ‖

|| Iti Shree Lingashtakam ||

Guru Paduka Stotram Lyrics in Sanskrit: गुरु पादुका स्तोत्रम

सनातन धर्म के समस्त पवित्र ग्रंथों में गुरु के भगवान से भी बड़ा दर्जा प्रदान किया गया है| इस कारण अपने गुरु देव की उपासना करने हेतु ही गुरु पादुका स्तोत्रम (Guru Paduka Stotram Lyrics) का जाप किया जाता है|

केवल गुरु ही होते है जो किसी व्यक्ति को सत्य का मार्ग दिखाते है| अपने गुरुओं की पूजा तथा उपासना करने हेतु हिन्दू धर्म में बहुत सारे मंत्र तथा स्तोत्र है किन्तु गुरु पादुका स्तोत्रम (Guru Paduka Stotram Lyrics) की एक अलग ही महिमा है|

इस प्रसिद्ध गुरु पादुका स्तोत्रम (Guru Paduka Stotram Lyrics) की रचना धर्म प्रवर्तक श्री आदि शंकराचार्य जी ने की थी| ऐसा माना जाता है कि जो भी इस गुरु पादुका स्तोत्रम (Guru Paduka Stotram Lyrics) का प्रतिदिन नियमित रूप से पाठ करता है, उससे गुरु बहुत ही जल्दी प्रसन्न होते है एवं शिष्यों को आशीर्वाद भी प्रदान करते है|

गुरु पादुका स्तोत्रम

सभी पढ़ाई करने वाले बच्चों को इस गुरु पादुका स्तोत्रम (Guru Paduka Stotram Lyrics) का जाप अवश्य ही करना चाहिए तो आइये जानते है इस गुरु पादुका स्तोत्रम (Guru Paduka Stotram Lyrics) के बारे में|

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Guru Paduka Stotram Lyrics with Hindi Meaning – गुरु पादुका स्तोत्रम हिंदी अर्थ सहित

अनंतसंसार समुद्रतार नौकायिताभ्यां गुरुभक्तिदाभ्याम् ।
वैराग्यसाम्राज्यदपूजनाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 1 ॥

हिंदी अर्थ – मेरे गुरु की चरण पादुकाओं को मेरा नमन, जो कि एक नाव की भांति है| जो मुझे इस जीवन के अनंत सागर को पार करने में सहायता करती है, जो मुझे मेरे गुरु के प्रति समर्पण की भावना प्रदान करती है तथा जिनकी पूजा करने से मुझे त्याग का प्रभुत्व प्राप्त होता है|

कवित्ववाराशिनिशाकराभ्यां दौर्भाग्यदावां बुदमालिकाभ्याम् ।
दूरिकृतानम्र विपत्ततिभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 2 ॥

हिंदी अर्थ – मेरे गुरु देव की पादुकाओं को प्रणाम, जो कि ज्ञान का सागर है| पूर्णिमा के चंद्रमा के समान है, जो जल है, जो कि दुर्भाग्य की अग्नि को बुझा देता है एवं उनके सामने झुकने वाले व्यक्ति के समस्त संकट को दूर कर देते है|

नता ययोः श्रीपतितां समीयुः कदाचिदप्याशु दरिद्रवर्याः।
मूकाश्र्च वाचस्पतितां हि ताभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 3 ॥

हिंदी अर्थ – मेरे गुरुदेव की चरण पादुकाओं को मेरा प्रणाम, जो उसके समक्ष झुकने वाले व्यक्ति को धन का स्वामी बना देती है| भले वह कितने भी गरीब क्यों न हो| यह गूंगे व्यक्ति को भी महान वक्ता बना देती है|

नालीकनीकाश पदाहृताभ्यां नानाविमोहादि निवारिकाभ्यां ।
नमज्जनाभीष्टततिप्रदाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 4 ॥

हिंदी अर्थ – मेरे गुरु की पादुकाओं को नमस्कार, जो हमे हमारे गुरु के कमल समान चरणों की ओर आकर्षित करती है| जो हमे अवांछित इच्छाओं से मुक्ति प्रदान करती है तथा प्रणाम करने वालों की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने में सहायता करती है|

नृपालि मौलिव्रजरत्नकांति सरिद्विराजत् झषकन्यकाभ्यां ।
नृपत्वदाभ्यां नतलोकपंकते: नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 5 ॥

हिंदी अर्थ – जो राजा के मुकुट में स्थित रत्नों की भांति चमकते है, जो मगरमच्छों से भरे झरने में दासी भी भांति प्रतीत होते है और जो भक्तों को राजा का दर्जा प्रदान करवाते है| मेरे गुरु की उन पादुकाओं को मेरा प्रणाम|

गुरु पादुका स्तोत्रम

पापांधकारार्क परंपराभ्यां तापत्रयाहींद्र खगेश्र्वराभ्यां ।
जाड्याब्धि संशोषण वाडवाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 6 ॥

हिंदी अर्थ – जो सूर्य की श्रृंखला के समान है व अंधकारमय समस्त पापों को दूर कर रही है| जो बाजों के राजा की भांति है, जो दुखों के नागों को दूर कर रहे है और जो अग्नि के समान अज्ञान के सागर को सुखा रहे है| मेरे गुरु के ऐसे चरण पादुकाओं को मेरा नमस्कार|

शमादिषट्क प्रदवैभवाभ्यां समाधिदान व्रतदीक्षिताभ्यां ।
रमाधवांध्रिस्थिरभक्तिदाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 7 ॥

हिंदी अर्थ – जो हमें शम की भांति छ: गुणों से संपन्न करती है| जो छात्रों को शाश्वत समाधि में जाने की क्षमता प्रदान करती है तथा जो भगवान विष्णु के चरणों में भक्ति प्राप्त करने में सहायता करती है| मेरे गुरु की चरण पादुकाओं को मेरा नमन है|

स्वार्चापराणां अखिलेष्टदाभ्यां स्वाहासहायाक्षधुरंधराभ्यां ।
स्वांताच्छभावप्रदपूजनाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 8 ॥

हिंदी अर्थ – मेरे गुरु की चरण पादुकाओं को नमस्कार है जो सेवा हेतु शिष्यों की सभी इच्छाएं पूर्ण करती है| जो सदा सेवा का बोझ उठाने में शामिल होती है एवं साधकों को प्राप्ति स्थिति में मदद करती है|

कामादिसर्प व्रजगारुडाभ्यां विवेकवैराग्य निधिप्रदाभ्यां ।
बोधप्रदाभ्यां दृतमोक्षदाभ्यां नमो नमः श्रीगुरुपादुकाभ्याम् ॥ 9 ॥

हिंदी अर्थ – जो गरुड़ है, जो जूनून के सांप को दूर भगाती है| जो ज्ञान एवं त्याग का खजाना प्राप्त करते है| जो व्यक्ति को प्रबुद्ध ज्ञान का आशीर्वाद प्रदान करते है| मेरे गुरु की ऐसी पादुकाओं को मेरा प्रणाम है|

Annapoorna Stotram Lyrics: पाठ करे अन्नपूर्णा स्तोत्र का संस्कृत में

अन्नपूर्णा स्तोत्र (Annapoorna Stotram) का जाप अन्नपूर्णा माता को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है| अन्नपूर्णा माता को माँ जगदम्बा का ही एक एक रूप माना जाता है, जो भी भक्त माता अन्नपूर्णा की सच्ची श्रद्धा के साथ पूजा करता है एवं इस अन्नपूर्णा स्तोत्र (Annapoorna Stotram) का जाप करता है|

उसे सदा माता अन्नपूर्णा का आशीर्वाद प्राप्त होता है| हिन्दू धर्म में बताया गया है कि माता अन्नपूर्णा ही इस सम्पूर्ण संसार का भरण – पोषण करती है| इस अन्नपूर्णा स्तोत्र (Annapoorna Stotram) की रचना गुरु आदि शंकराचार्य जी के द्वारा की गई थी| आइये जानते है अन्नपूर्णा स्तोत्र (Annapoorna Stotram) के लिरिक्स के बारे में|

अन्नपूर्णा स्तोत्र

इसी के साथ यदि आप शिव तांडव स्तोत्रम [Shiv Tandav Stotram], सरस्वती जी की आरती [Saraswati Aarti], या कनकधारा स्तोत्र [Kanakdhara Stotra] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

इसके अलावा आप हमारे एप 99Pandit For Users पर भी आरतियाँ व अन्य कथाओं को पढ़ सकते है| इस एप में भगवद गीता के सभी अध्यायों को हिंदी अर्थ समझाया गया है|

माता अन्नपूर्णा स्तोत्र संस्कृत में – Annapoorna Stotram Lyrics in Sanskrit

|| अन्नपूर्णा स्तोत्र ||

नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी
निर्धूताखिलघोरपावनकरी प्रत्यक्षमाहेश्वरी ।
प्रालेयाचलवंशपावनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१॥

नानारत्नविचित्रभूषणकरी हेमाम्बराडम्बरी
मुक्ताहारविलम्बमानविलसद्वक्षोजकुम्भान्तरी ।
काश्मीरागरुवासिताङ्गरुचिरे काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥२॥

योगानन्दकरी रिपुक्षयकरी धर्मार्थनिष्ठाकरी
चन्द्रार्कानलभासमानलहरी त्रैलोक्यरक्षाकरी ।
सर्वैश्वर्यसमस्तवाञ्छितकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥३॥

कैलासाचलकन्दरालयकरी गौरी उमा शङ्करी
कौमारी निगमार्थगोचरकरी ओङ्कारबीजाक्षरी ।
मोक्षद्वारकपाटपाटनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥४॥

दृश्यादृश्यविभूतिवाहनकरी ब्रह्माण्डभाण्डोदरी
लीलानाटकसूत्रभेदनकरी विज्ञानदीपाङ्कुरी ।
श्रीविश्वेशमनःप्रसादनकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥५॥

उर्वीसर्वजनेश्वरी भगवती मातान्नपूर्णेश्वरी
वेणीनीलसमानकुन्तलहरी नित्यान्नदानेश्वरी ।
सर्वानन्दकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥६॥

आदिक्षान्तसमस्तवर्णनकरी शम्भोस्त्रिभावाकरी
काश्मीरात्रिजलेश्वरी त्रिलहरी नित्याङ्कुरा शर्वरी ।
कामाकाङ्क्षकरी जनोदयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥७॥

देवी सर्वविचित्ररत्नरचिता दाक्षायणी सुन्दरी
वामं स्वादुपयोधरप्रियकरी सौभाग्यमाहेश्वरी ।
भक्ताभीष्टकरी सदा शुभकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥८॥

चन्द्रार्कानलकोटिकोटिसदृशा चन्द्रांशुबिम्बाधरी
चन्द्रार्काग्निसमानकुन्तलधरी चन्द्रार्कवर्णेश्वरी ।
मालापुस्तकपाशासाङ्कुशधरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥९॥

क्षत्रत्राणकरी महाऽभयकरी माता कृपासागरी
साक्षान्मोक्षकरी सदा शिवकरी विश्वेश्वरश्रीधरी ।
दक्षाक्रन्दकरी निरामयकरी काशीपुराधीश्वरी
भिक्षां देहि कृपावलम्बनकरी मातान्नपूर्णेश्वरी ॥१०॥

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।
ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥११॥

माता च पार्वती देवी पिता देवो महेश्वरः ।
बान्धवाः शिवभक्ताश्च स्वदेशो भुवनत्रयम् ॥१२॥

श्री शङ्कराचार्य कृतं

अन्नपूर्णा स्तोत्र

Annapoorna Stotram Lyrics in English – नित्यानन्दकरी वराभयकरी सौन्दर्यरत्नाकरी

|| Annapoorna Stotram ||

Nitya nandakari vara bhayakari saundarya ratnakari
Nirdhoot akhil Ghora Pavankari Pratyakshamaheeshwari.
Praleyachalvamshapavankari kashipuradhishwari
Bhikshaam Dehi kripa Avalambana Kari Maata annapoorneshwari॥1॥

Naanaa ratna vichitra bhushanakari hema ambara dambhari
Muktaa haara vilambamaana vilasad vakshoja kumbha antari.
Kaashmira agaru vaasita angaruchire kashi pura adhishwari
Bhikshaam dehi kripa avalam banakari maata annapoorneshwari॥2॥

Yogaa nandakari ripu kshayakari dharm artha nishtaakari
Chandra arka anala bhaasamaana lahrari trailokya rakshaakari.
Sarvaishvarya Samasta Vaanchhitakari kashi pura adhishwari
Bhikshaam dehi kripa avalambanakari maata annapoorneshwari॥3॥

Kailaas achala kandaara layakari gauri uma shankari
Kaumaari nigama artha gocharakari omkaara beeja akshari.
Moksha dvaara kapaata paatankari kashipura adhishwari
Bhikshaam dehi kripa avalambanakari maata annapoorneshwari॥4॥

Drishya adrishya vibhooti vaahanakari brahmaanda bhaandodari
Leelaa naataka sootra bhedaanakari vijnaana deepa ankuri.
Shrivishweshamanahprasaadnakari kashipuradhishwari
Bhikshaam dehi kripaavalambanakari maataannapoorneshwari॥5॥

Urvi Sharva Janeswari Bhagavati Maata Annapoorneshwari
Veeni Neela samaana Kunta lahari Nitya annaadaaneshwari.
Sarvaa nandakari sadaa shubhakari kashipuradhishwari
Bhikshaam dehi kripa avalambanakari maata annapoorneshwari॥6॥

Aadiksha anta samasta varnanakari shambho strivibhaa vakari
Kaashmiraa trijaleshwari trilahari nityaankura sharvari.
Kaamaa kaankshakari janodayakari kashipura adhishwari
Bhikshaam dehi kripa avalambanakari maata annapoorneshwari॥7॥

Devi sarva vichitra ratna rachitaa daakshaayanee sundari
Vaamam svaadu payo dhara priyakari saubhaagya maaheshwari.
Bhakta abheeshṭakari sadaa shubhakari kashipura adhishwari
Bhikshaam dehi kripa avalambanakari maata annapoorneshwari॥8॥

Chandra arka anala koti koti sadrusha chandra amshubimba adhari
Chandra arka agni samaana kuntaladhari chandra arka varneshwari.
Maalaa pustaka paashaas ankushadhari kashipura adhishwari
Bhikshaam dehi kripa avalambanakari maata annapoorneshwari॥9॥

Kshatra traanakari maha’bhyakari maata kripaasaagari
Saakshaan mokshakari sadaa shivakari vishweshwara shreedhari.
Dakshaa krandakari niraamayakari kashipura adhishwari
Bhikshaam Dehi Kripaavalam Banakari Maata annapoorneshwari॥10॥

Annapoorne Sadaa Poorne shankara Praana vallabhe।
Gyaana vairaagya siddhyartham bhikshaam dehi cha paarvati॥11॥

Maata cha Parvati devi Pitaa devo maheshwarah।
Baandhavaah Shiva Bhaktaashcha Swadesho bhuvanatrayam॥12॥

Shree Shankaracharya Krutam

Narasimha Kavacham Lyrics: श्री नरसिम्हा कवच मंत्र

नरसिम्हा कवच मंत्र (Narasimha Kavacham Lyrics) का पाठ भगवान नरसिम्हा से प्रार्थना करने के लिए किया जाता है| भगवान नरसिम्हा को विष्णु जी का अवतार माना जाता है| साथ ही भगवान नरसिम्हा को विष्णु जी के सभी अवतारों में सबसे शक्तिशाली अवतार माना जाता था| जिनका आधा शरीर सिंह का तथा आधा शरीर मनुष्य था|

नरसिम्हा कवच मंत्र (Narasimha Kavacham Lyrics) का जाप करने से मनुष्य सभी संकट दूर हो जाते है| नरसिम्हा कवच जाप करने जातक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच बना देता है| इस नरसिम्हा कवच (Narasimha Kavacham Lyrics) का जाप करने नकारात्मकता दूर होती है|

Narasimha Kavacham Lyrics

साथ ही जो भी भक्त नरसिम्हा कवच मंत्र (Narasimha Kavacham Lyrics) का जाप प्रतिदिन करता है, उसे भगवान नरसिम्हा की आशीर्वाद प्राप्त होता है तो आइये जानते है श्री नरसिम्हा कवच मंत्र (Narasimha Kavacham Lyrics) के बारे में|

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श्री नरसिम्हा कवच मंत्र लिरिक्स हिंदी में – Narasimha Kavacham Lyrics in Hindi

|| नरसिम्हा कवच मंत्र ||

नृसिंह कवचम वक्ष्येऽ प्रह्लादनोदितं पुरा ।
सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनं ॥
सर्वसंपत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम ।
ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितं॥

विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिंदुसमप्रभं ।
लक्ष्म्यालिंगितवामांगम विभूतिभिरुपाश्रितं ॥

चतुर्भुजं कोमलांगम स्वर्णकुण्डलशोभितं ।
ऊरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितं ॥

तप्तकांचनसंकाशं पीतनिर्मलवासनं ।
इंद्रादिसुरमौलिस्थस्फुरन्माणिक्यदीप्तिभि: ॥

विराजितपदद्वंद्वं शंखचक्रादिहेतिभि:।
गरुत्मता च विनयात स्तूयमानं मुदान्वितं ॥

स्वहृतकमलसंवासम कृत्वा तु कवचम पठेत
नृसिंहो मे शिर: पातु लोकरक्षात्मसंभव:।
सर्वगोऽपि स्तंभवास: फालं मे रक्षतु ध्वनन ।
नरसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचन: ॥

शृती मे पातु नरहरिर्मुनिवर्यस्तुतिप्रिय: ।
नासां मे सिंहनासास्तु मुखं लक्ष्मिमुखप्रिय: ॥

सर्वविद्याधिप: पातु नृसिंहो रसनां मम ।
वक्त्रं पात्विंदुवदन: सदा प्रह्लादवंदित:॥

नृसिंह: पातु मे कण्ठं स्कंधौ भूभरणांतकृत ।
दिव्यास्त्रशोभितभुजो नृसिंह: पातु मे भुजौ ॥

करौ मे देववरदो नृसिंह: पातु सर्वत: ।
हृदयं योगिसाध्यश्च निवासं पातु मे हरि: ॥

मध्यं पातु हिरण्याक्षवक्ष:कुक्षिविदारण: ।
नाभिं मे पातु नृहरि: स्वनाभिब्रह्मसंस्तुत: ॥

ब्रह्माण्डकोटय: कट्यां यस्यासौ पातु मे कटिं ।
गुह्यं मे पातु गुह्यानां मंत्राणां गुह्यरुपधृत ॥

ऊरु मनोभव: पातु जानुनी नररूपधृत ।
जंघे पातु धराभारहर्ता योऽसौ नृकेसरी ॥

सुरराज्यप्रद: पातु पादौ मे नृहरीश्वर: ।
सहस्रशीर्षा पुरुष: पातु मे सर्वशस्तनुं ॥

महोग्र: पूर्वत: पातु महावीराग्रजोऽग्नित:।
महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वालस्तु निर्रुतौ ॥

पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुख: ।
नृसिंह: पातु वायव्यां सौम्यां भूषणविग्रह: ॥

ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमंगलदायक: ।
संसारभयद: पातु मृत्यूर्मृत्युर्नृकेसरी ॥

इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमंडितं ।
भक्तिमान्य: पठेन्नित्यं सर्वपापै: प्रमुच्यते ॥

पुत्रवान धनवान लोके दीर्घायुर्उपजायते ।
यंयं कामयते कामं तंतं प्रप्नोत्यसंशयं ॥

सर्वत्र जयवाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत ।
भुम्यंतरिक्षदिवानां ग्रहाणां विनिवारणं ॥

वृश्चिकोरगसंभूतविषापहरणं परं ।
ब्रह्मराक्षसयक्षाणां दूरोत्सारणकारणं ॥

भूर्जे वा तालपत्रे वा कवचं लिखितं शुभं ।
करमूले धृतं येन सिद्ध्येयु: कर्मसिद्धय: ॥

देवासुरमनुष्येशु स्वं स्वमेव जयं लभेत ।
एकसंध्यं त्रिसंध्यं वा य: पठेन्नियतो नर: ॥

सर्वमंगलमांगल्यंभुक्तिं मुक्तिं च विंदति ।
द्वात्रिंशतिसहस्राणि पाठाच्छुद्धात्मभिर्नृभि: ।
कवचस्यास्य मंत्रस्य मंत्रसिद्धि: प्रजायते।
आनेन मंत्रराजेन कृत्वा भस्माभिमंत्रणम ॥

तिलकं बिभृयाद्यस्तु तस्य गृहभयं हरेत।
त्रिवारं जपमानस्तु दत्तं वार्यभिमंत्र्य च ॥

प्राशयेद्यं नरं मंत्रं नृसिंहध्यानमाचरेत ।
तस्य रोगा: प्रणश्यंति ये च स्यु: कुक्षिसंभवा: ॥

किमत्र बहुनोक्तेन नृसिंहसदृशो भवेत ।
मनसा चिंतितं यस्तु स तच्चाऽप्नोत्यसंशयं ॥

गर्जंतं गर्जयंतं निजभुजपटलं स्फोटयंतं
हरंतं दीप्यंतं तापयंतं दिवि भुवि दितिजं क्षेपयंतं रसंतं ।
कृंदंतं रोषयंतं दिशिदिशि सततं संभरंतं हरंतं ।
विक्षंतं घूर्णयंतं करनिकरशतैर्दिव्यसिंहं नमामि ॥

॥ इति प्रह्लादप्रोक्तं नरसिंहकवचं संपूर्णंम ॥

Narasimha Kavacham Lyrics

Narasimha Kavacham Lyrics in English – नृसिंह कवचम वक्ष्येऽ प्रह्लादनोदितं पुरा

|| Narasimha Kavacham Lyrics ||

Narasingha Kavacham vakshye prahladanoditam pura.
Sarvarakshakaram punyam sarvopadravanashanam.
Sarvasampatkaram chaiv svargamokshapradayakam.
Dhyatva Narasimham Devesham Hema-Singhasanasthitam.

Vivritasyam trinayanam sharadindusamaprabham.
Lakshmyalingitavamangam vibhutibhirupashritam.

Chaturbhujam komalamgam svarnakundalashobhitam.
Urojashobhitoraskam ratnakeyuramuditam.

Taptakanchanasankasham pitanirmalavasanam.
Indradsuramaulisthasphuranmanikyadiptibhih.

Virajitapadadvandvam shankhachakradihetibhih.
Garutmata cha vinayat stuoyamanam mudanvitam.

Svahritakamalasamvasam kritva tu kavacham pathet.
Narasingho me shirah patu Lokarakshatmasambhavah.
Sarvago’pi Stambhavasah Phalam me Rakshatu dhvanan.
Narasimho me Drishau patu somasuryagnilocanah.

Shriti me patu narhari munivaryastutipriyah.
Nasam me sinhinasastu mukham lakshmimukhapriyah.

Sarvavidyadhipah patu Narasimho rasanam mama.
Vaktram patvinduvadanah sada prahladavanditah.

Narasimho patu me kantham skandhau bhuharanantakrit.
Divyashtrashobhitabhujo narasimho patu me Bhujau.

Karau me devavarado narasimho patu sarvatah.
Hridayam Yogisadhyastr Nivasam patu me hari.

Madhyam patu hiranyakshavakshakukshividarana.
Nabhim me patu nrihari svanabhivramhasamstutah.

Brahmandakotayeh katyam yasyasau patu me katim.
Guhyam me patu guhyanam mantranam guhyarupadhrut.

Uru manobhavah patu januni nararupadhrut.
Janghe patu dharabharaharta yo’sau nrikesari.

Surarajyapradah patu padau me nriharieshvarah.
Sahasrasirsha purushah patu me sarvashastanum.

Mahograhpurvatah patu Mahaviragrajo’gnitah.
Mahavishnurdakshine tu mahajwalastu nirrutau.

Paschime patu sarvesho dishi me Sarvatomukhah.
Narasimho patu Vayavyam Saumyam Bhushanavigrahah.

Ishanyam patu bhadro me sarvamangaladayakah.
Samsarabhayadah patu mrityurmrityurnrikesari.

Idam narasimhakavacham prahladamukhamanditam.
Bhaktimanyah pathennityam sarvapapaipramuchyate.

Putravan dhanavan loke dirghayurupajayate.
Yamyam kamayate kamam tamtam prapnotyasanshayam.

Sarvatra Jayavapnoti Sarvatra Vijayibhavet.
Bhuvyantarikshadivanam grahanam vinivarana.

Vrishchikoragasambhutavishapaharanam param.
Brahmarakshasayakshanam durotsaranakaranam.

Bhurje va talapatreve kavacham likhitam shubham.
Karamoole dhrutam yena siddhyet karmasiddhayah.

Devasuramanushyeshu svam Svameva Jayam labheth.
Ekasandhyam trisandhyam va yah pathenniyato narah.

Sarvamangalamangalyam bhuktin muktin cha vindati.
Dvatrimsatisahasrani pathachchuddhatmabhirnribhih.

Kavachasyasya mantrasya mantrasiddhih prajayate.
Anena mantrarajena kritva bhasmabhimantranam.

Tilakam bibhriyad yastu tasya grihabhayam haret.
Trivaram Japamanastu dattam Varyabhimantrya cha.

Prashayed yam Naram Mantram Narasimhadhyanamacharet.
Tasya rogaah pranashyanti ye cha syuh kukshisambhavah.

Kimatra bahunoktena narasimhasadrisho bhavet.
Manasa chintitam yastu sa tachchapnotyasan shayam.

Garjantam garjayantam nijabhujapatalam sphotayantam
Harantam deepyantam tapayantam divi bhuvam diti jankshepayantam rasantam
Krindantam roshayantam dishidishi satatam sambharantam harantam
Vikshantam ghurnayantam karanikarashatairdivyasingham namami.

|| Iti Prahladaprokta Narasimhakavacham Sampurnam ||

Chandi Dhwaja Stotram: श्री चंडी ध्वजा स्तोत्रम हिंदी में

माँ दुर्गा के विभिन्न रूपों में एक रूप माता चंडी का भी है| चंडी ध्वजा स्तोत्रम (Chandi Dhwaja Stotram) का जाप माता चंडी को प्रसन्न करने तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया जाता है| जैसा कि आप सभी को ज्ञात है माता चंडी की पूजा उग्र रूप में की जाती है| माँ चण्डी की पूजा करने तथा श्री चंडी ध्वजा स्तोत्रम (Chandi Dhwaja Stotram) का जाप करने से भक्तों को उनकी कृपा प्राप्त होती है|

मुख्यतः इस चंडी ध्वजा स्तोत्रम (Chandi Dhwaja Stotram) का जाप नवरात्रि के समय माँ चंडी की पूजा के बाद किया जाता है| माता चंडी के श्री चंडी ध्वजा स्तोत्रम (Chandi Dhwaja Stotram) पाठ भक्तों सभी प्रकार के दुःख तथा संकटों से मुक्ति प्रदान करता है तो आइये पढ़ते है इस अत्यंत प्रभावशाली चंडी ध्वजा स्तोत्रम (Chandi Dhwaja Stotram) के बारे में|

चंडी ध्वजा स्तोत्रम

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चंडी ध्वजा स्तोत्रम लिरिक्स हिंदी में – Chandi Dhwaja Stotram Lyrics in Hindi

|| चंडी ध्वजा स्तोत्रम ||

॥ विनियोग ॥

अस्य श्री चण्डी-ध्वज स्तोत्र मन्त्रस्य मार्कण्डेय ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रां बीजं, श्रीं शक्तिः,
श्रूं कीलकं मम वाञ्छितार्थ फल सिद्धयर्थे विनियोगः.

॥ अंगन्यास ॥

श्रां, श्रीं, श्रूं, श्रैं, श्रौं, श्रः ।

॥ मूल पाठ ॥

ॐ श्रीं नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै भूत्त्यै नमो नमः ।
परमानन्दरुपिण्यै नित्यायै सततं नमः॥१॥

नमस्तेऽस्तु महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥२॥

रक्ष मां शरण्ये देवि धन-धान्य-प्रदायिनि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥३॥

नमस्तेऽस्तु महाकाली पर-ब्रह्म-स्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥४॥

नमस्तेऽस्तु महालक्ष्मी परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥५॥

नमस्तेऽस्तु महासरस्वती परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा॥६॥

नमस्तेऽस्तु ब्राह्मी परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥७॥

नमस्तेऽस्तु माहेश्वरी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥८॥

नमस्तेऽस्तु च कौमारी परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥९॥

नमस्ते वैष्णवी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१०॥

नमस्तेऽस्तु च वाराही परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥११॥

नारसिंही नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१२॥

नमो नमस्ते इन्द्राणी परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१३॥

नमो नमस्ते चामुण्डे परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१४॥

नमो नमस्ते नन्दायै परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१५॥

रक्तदन्ते नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१६॥

नमस्तेऽस्तु महादुर्गे परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१७॥

चंडी ध्वजा स्तोत्रम

शाकम्भरी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१८॥

शिवदूति नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥१९॥

नमस्ते भ्रामरी देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२०॥

नमो नवग्रहरुपे परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२१॥

नवकूट महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२२॥

स्वर्णपूर्णे नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२३॥

श्रीसुन्दरी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२४॥

नमो भगवती देवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२५॥

दिव्ययोगिनी नमस्ते परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२६॥

नमस्तेऽस्तु महादेवि परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२७॥

नमो नमस्ते सावित्री परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२८॥

जयलक्ष्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥२९॥

मोक्षलक्ष्मी नमस्तेऽस्तु परब्रह्मस्वरुपिणि ।
राज्यं देहि धनं देहि साम्राज्यं देहि मे सदा ॥३०॥

चण्डीध्वजमिदं स्तोत्रं सर्वकामफलप्रदम् ।
राजते सर्वजन्तूनां वशीकरण साधनम् ॥३१॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते॥