Mahamaya Ashtakam Lyrics: महामाया अष्टकम हिंदी अर्थ सहित

महामाया अष्टकम (Mahamaya Ashtakam Lyrics) माँ काली को समर्पित भजन है। माँ काली को सभी प्रकार की बुराइयों का नाश करने वाली कहा जाता है – चाहे वह बुरे कर्म करने वाला व्यक्ति हो या नकारात्मक अहंकार जो किसी व्यक्ति की सोचने की क्षमता को बाधित करता है।

इसलिए, महामाया अष्टकम का जाप करने से व्यक्ति अपने मन में आने वाले बुरे विचारों से छुटकारा पा सकता है और माँ काली के आशीर्वाद से आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त कर सकता है।

महामाया अष्टकम

माँ काली पृथ्वी की दिव्य रक्षक हैं जिन्हें हिंदू धर्म में कालिका के नाम से भी जाना जाता है। लेकिन देवी की विनाशकारी शक्ति के कारण, काली को अंधेरी माँ के रूप में भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, काली शब्द संस्कृत शब्द काल से आया है, जिसका अर्थ है समय। इसलिए, देवी काली समय, परिवर्तन, शक्ति, सृजन, संरक्षण और विनाश का प्रतिनिधित्व करती हैं।

आज 99Pandit के इस ब्लॉग के साथ हम माँ काली के महामाया अष्टकम के बारे में जानेंगे, साथ ही उसकी महत्व और महामाया अष्टकम के लाभों के बारे में भी ज्ञान प्राप्त करेंगे। इसके अलावा आप हमारी 99Pandit की वेबसाइट पर जा कर इसी प्रकार के अष्टकम, भजन, आरती आदि को पढ़ सकते हैं। तो बिना किसी देरी के शुरू करते हैं।

महामाया अष्टकम क्या है? – What is Mahamaya Ashtakam?

श्री महामाया अष्टकम एक शक्तिशाली हिंदू भजन/अष्टकम है जो देवी भद्रकाली को समर्पित है, जो देवी काली का एक उग्र और राजसी रूप है। अष्टकम में आठ श्लोक हैं (संस्कृत में अष्टकम का अर्थ है “आठ”) जो माँ काली की शक्ति, सुरक्षा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन की प्रशंसा करते हैं।

श्री महामाया अष्टकम में श्री भद्रकाली की विजयी शक्तियों, बुरी शक्तियों को नष्ट करने की उनकी क्षमता और भक्तों के प्रति उनकी दयालु कृपा की प्रशंसा की गई है। श्री महामाया अष्टकम में उनसे नुकसान से सुरक्षा, नकारात्मक प्रवृत्तियों से मुक्ति और आत्मा की परम मुक्ति की भी प्रार्थना की गई है।

इस महामाया अष्टकम में माँ काली के अलग-अलग रूप का वर्णन किया गया है, साथ ही मां काली से वंदना और नमन किया गया है। ऐसा माना जाता है कि श्री महामाया अष्टकम से माँ काली का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे शत्रुओं और बाधाओं से सुरक्षा मिलती है।

महामाया अष्टकम लिरिक्स – Mahamaya Ashtakam Lyrics in Sanskrit

भद्रकाळि विश्वमाता जगत्स्रोत कारिणि
शिवपत्नि पापहर्त्रि सर्वभूत तारिणि
स्कन्दमाता शिवा शिवा सर्वसृष्टि धारिणि
नमः नमः महामाय़े ! हिमाळय-नन्दिनि || 1

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

शुभ काली देवी मां भद्रकाली,विश्व की माता,जगत रूपी स्रोत का आप कारण हो। शिव पत्नी पापों को हरनेवाली, और सभी प्राणियों की रक्षक, सारे भूतों को तारनेवाली, स्कंद की माता, हे शिवा ब्रह्मांड के समर्थक,आप सारी सृष्टि को धारण किये है, हे हिमालय की पुत्री महामाया आपको वंदन ही,नमन है। ।।१।।

You are the reason for the auspicious Kali Devi Maa Bhadrakali, the mother of the world, the source of the world. Shiva’s wife, the remover of sins, protector of all living beings, destroyer of all ghosts, mother of Skanda, O Shiva, supporter of the universe, you have sustained the entire creation, O Mahamaya, daughter of the Himalayas, I salute you. (1)

नारीणां च शंखिन्यापि हस्तिनि वा चित्रिणि
पद्मगन्धा पुष्परूपा सम्मोहिनि पद्मिनि
मातृ-पुत्री-भग्नि-भार्य़ा सर्वरूपा भवानि
नमः नमः महामाय़े ! भवभय-खण्डिनि || २

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

नारीओ में, हाथो के सुरम्य कमल-सुगंधित फूल-समान,आप ही संखिनी,हस्तिनी, चित्रिणी, पद्म की गंधस्वरूपा,सब को मोहनेवाली पद्मिनी का रुप लेते हो। हे सर्व व्यापी माँ- भवानी आप ही माता बेटी-बहन-पत्नी के रूप में प्रकट होती हो। हे भवसागर के भय को खंडित करने वाली महान शक्ति महामाया आपको वंदन है,नमन है। ।।२।।

Among women, with hands that are like lotus-scented flowers, you take the form of Sankhini, Hastini, Chitrini, the fragrance of Padma, Padmini who captivates everyone. O omnipresent Mother Goddess, you appear as mother, daughter, sister, and wife. O Mahamaya, the great power who destroys the fear of the ocean of existence, I bow down to you. (2)

पाप-ताप-भव-भय़ भूतेश्वरि कामिनि
तव-कृपा-सर्व-क्षय सर्वजना-वन्दिनि
प्रेम-प्रीति-लज्जा-न्याय नारीणां च मोहिनि
नमः नमः महामाय़े ! ॠण्डमाळा-धारिणि || ३

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

हे भूतेश्वरी, ही कामिनी, हे सर्वजन की वंदिनी, आप की कृपा से पाप-मानसिक या शारीरिक पीड़ा-भय- भय सब क्षय हो जाता है। नारी के रुप में सबको मोहनेवाली, प्रेम, स्नेह, लज्जा, न्याय के रुप में प्रकट होनेवाली, रुण्डमाला धारण करनेवाली हे महामाया ! आपको वंदन है,नमन है। ।।३।।

O Bhutheshwari, O Kamini, O worshiper of all, all sin, mental or physical pain, and fear vanish by your grace. Mahamaya is the one who charms everyone in the form of a woman, who appears in the form of love, affection, shame, and justice, who wears a garland of beads! I salute you; I salute you. (3)

खड्ग-चक्र-हस्तेधारि शंखिनि-सुनादिनि
संमोहना-रूपा-नारि हृदय-विदारिणि
अहंकार-कामरूपा-भुवन-विळासिनि
नमः नमः महामाय़े ! जगत-प्रकाशिनि || ४

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

हस्त में खड़ग, चक्र धारण करनेवाली,शंख धारण करनेवाली, नाद स्वरूपा,सबका सम्ममोहन करनेवाली,नारी के रुप में हृदय को छिन्न-भिन्न करने वाली,जोड़ने और तोड़ने वाली- विदार करनेवाली, अहंकार- और कामनाओं के रुप में जगत में विलास करनेवाली,इस जगत को प्रकाश देनेवाली हे महामाया आपको वंदन हे,नमन हे। ।।४।।

One who holds a sword in her hand, a discus, a conch shell, a sound-like person, one who hypnotizes everyone, one who tears hearts apart in the form of a woman, one who joins and breaks – one who separates, one who indulges in the world in the form of ego and desires. O Mahamaya, the one who gives light to this world, I salute you and salute you. (4)

लह्व-लह्व-तव-जिह्वा पापासुर मर्द्धिनि
खण्ड-गण्ड-मुण्ड-स्पृहा शोभाकान्ति वर्द्धिनि
अङ्ग-भङ्ग-रंग-काय़ा माय़ाछन्द छन्दिनि
नमः नमः महामाय़े ! दुःखशोक नाशिनि || ५

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

हे मां। आपकी जिह्वा बाहर निकल के पापी असुरो का लहू अपनी जिह्वा से पी के मर्दन करनेवाली, असुरो का विनाश करते हुए खंड मुंड का माला आपकी शोभाका बर्धन(बढ़ता) कर रही है। और आपके सौंदर्य और चमक को बढ़ाती है,

आप ही संसार में अपने अंग की भंगिमा और अपने रंग से सबको माया के छंद में छंदने वाली है,और दु:ख शोक का नाश करनेवाली, हे महामाया आपको वंदन हे, नमन है। ।।५।।

Hey mother. Your tongue comes out and drinks the blood of sinful demons, which makes you manly while destroying the demons; the garland of Khand Munda increases your beauty and enhances your beauty and glow.

You are the one who makes everyone in the world rhyme with the verses of Maya with the movement of your body and your colour, and the one who destroys sorrow and grief, O Mahamaya, I bow down to you. (5)

धन-जन-तन-मान रूपेण त्वम् संस्थिता
काम-क्रोध-लोभ-मोह-मद वापि मूढता
निद्राहार-काम-भय़ पशुतुल्य़ जीवनात्
नमः नमः महामाय़े ! कुरु मुक्त बन्धनात् || ६

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

आप धन, लोक, शरीर और मान के रूप में स्थित हैं, काम, क्रोध, लोभ, मोह और नशा आदि मूढ़ता में रेहेके निशा,आहार, कामना, भय, ये सब पशु प्रवृति मे लिप्त होके, जीवन में बंधने वाली, कृपा करके ऐसे बंधनों से मुक्त करिए। हे महामाया आपको वंदन हे, नमन हे। ।।६।।

You are situated in the form of money, world, body, and honor, living in foolishness like lust, anger, greed, attachment and intoxication, etc., food, desires, fear, all these are indulged in animal nature, which binds in life, by your grace. Free yourself from such bonds. O Mahamaya, I salute you and salute you. (6)

मैत्री-दय़ा-लक्ष्मी-वृत्ति-अन्ते जीव लक्षणा
लज्जा-छाय़ा-तृष्णा-क्षुधा बन्धनस्य़ कारणा
तुष्टि-बुद्धि-श्रद्धा-भक्ति सदा मुक्ति दाय़ीका
शान्ति-भ्रान्ति-क्ळान्ति-क्षान्ति तव रूपा अनेका
प्रीति-स्मृति-जाति-शक्ति-रूपा माय़ा अभेद्या
नमः नमः महामाय़े ! नमस्त्वम् महाविद्या || ७

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

मित्रता, दया, धन, वृत्ति, जीव में ये सब लगाव उत्पन्न करनेवाली और लज्जा, छाया, प्यास और भूख जो बंधन के कारण है,संतोष, बुद्धि, श्रद्धा और भक्ति जो की सदा मुक्ति का कारण है, शांति, भ्रम, थकान,क्षमा ऐसे आदि अनेक भिन्न भिन्न अवस्था जो मुक्त करती है, फिर प्रेम, स्मृति, जाति,शक्ति आदि अभेद्य भिन्न भिन्न रुप में सभी आपका ही रुप है। हे महाविद्या, हे महामाया आपको वंदन हे,नमन है। ।।७।।

Friendship, kindness, wealth, instincts, all these which generate attachment in the living being, and shyness, shadow, thirst, and hunger are the causes of bondage, contentment, intelligence, faith, and devotion which are always the cause of liberation, Many different states liberate you, like peace, confusion, fatigue, forgiveness, etc., then love, memory, caste, power, etc., are all your forms in different impenetrable forms. O Mahavidya, O Mahamaya, I salute you and salute you. (7)

नवदुर्गा-महाकाळि सर्वाङ्गभूषावृत्ताम्
भुवनेश्वरि-मातङ्गि हन्तु मधुकैटभम्
विमळा-तारा-षोड़शि हस्ते खड्ग धारिणि
धुमावति-मा-बगळा महिषासुर मर्द्धिनि
बाळात्रिपुरासुन्दरि त्रिभुवन मोहिनि
नमः नमः महामाय़े ! सर्वदुःख हारिणि || ८

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

सर्वांग में भूषण पहननेवाली हे नवदुर्गा, महाकाली मधुकैटभ का वध करनेवाली,हस्त में खड़ग धारण करनेवाली, महिषासुर का वध करनेवाली, त्रिभुवन को मोहनेवाली, मां भुवनेश्वरी,मातंगी, विमला तारा, षोडशी, धुमावती, बगला, बालात्रिपुरसुंदरी, सब दुःख हरनेवाली, हे महामाया आपको वंदन है,नमन है। ।।८।।

O Navadurga, who wears all the ornaments, who kills Madhukaitbha, who holds a sword in her hand, who kills Mahishasura, who charms Tribhuvan, Maa Bhuvaneshwari, Matangi, Vimala Tara, Shodashi, Dhumavati, Bagala, Balatripurasundari, who removes all sorrows, O Mahamaya. I salute you, I salute you (8)

मम माता लोके मर्त्त्य़ कृष्णदासः तव भृत्त्य़
य़दा तदा य़था तथा माय़ा छिन्न मोक्ष कथा
सदा सदा तव भिक्षा कृपा दीने भव रक्षा
नमः नमः महामाय़े कृष्णदासे तव दय़ा || 9

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

हे मेरी माँ। इस मृत्युलोक में कृष्णदास आपका सेवक है, दास है,जो की हर जगह, हर प्रकार में माया को छिन्न भिन्न करके मोक्ष्य पाने का चिंतन करता है,ये दीन भिक्षा प्रार्थी हे की हे मां आप दया करके इस भवसागर से रक्षा कर दीजीए और कृष्णदास पे आपकी दया ऐसे ही बनी रहे। हे महामाया, आपको वंदन हे,आपको बारंबार नमन है।।।9।।

O my mother. In this mortal world, Krishnadas is your servant, a slave, who thinks of attaining salvation by disintegrating Maya in every place, in every form; this poor beggar is pleading that, O Mother, please protect me from this ocean of existence and Krishnadas May your kindness continue to remain like this. O Mahamaya, I salute you and bow to you repeatedly. (9)

||इति श्री कृष्णदासः विरचितं महामाय़ा अष्टकम् यः पठति सः भव सागर निस्तरति ||

हिन्दी अर्थ / Meaning in English

जो कृष्णदास द्वारा रचित इस महामाया अष्टकम का निष्काम भाव से पाठ करता है, वह भव के सागर से पार हो जायेगा।

One who selflessly recites this Mahamaya Ashtakam written by Krishnadas will cross the ocean of existence.

महामाया अष्टकम का महत्व – Significance of Mahamaya Ashtakam

माँ काली के महामाया अष्टकम का जाप आपके जीवन को और अधिक उज्ज्वल बनाने में मदद करता है। यदि आप नियमित रूप से इन मंत्रों का जाप करते हैं तो आपको सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होगा। ये अष्टकम जातक की वित्तीय स्थिति को बेहतर बनाने और सभी ऋणों को दूर करने में सहायता करते हैं।

प्रेम जीवन के संदर्भ में भी, महामाया अष्टकम का जाप करने से आपके प्रेम जीवन से जुड़ी समस्याओं को सुलझाने में मदद मिल सकती है और आपको हर तरह से सफलता प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।यह सफलता, खुशी, प्रगति और कल्याण प्रदान करता है।

महामाया अष्टकम

महामाया अष्टकम का जाप और उससे निकलने वाले कम्पन आपके स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। महामाया अष्टकम बुरी नजर और किसी भी बुराई को दूर करते हैं जो आपके जीवन में विकास को रोकने का प्रयास करती है।

मंत्र आपको वैवाहिक प्रयोजनों के लिए एक अच्छा साथी खोजने में मदद करते हैं। महामाया अष्टकम का जाप सुनिश्चित करता है कि विवाह में किसी भी तरह की देरी का समाधान हो जाता है। देवी काली अष्टकम का जाप जीवन में स्थिरता लाता है। आप यह तय कर सकते हैं कि आपके जीवन के लिए क्या अच्छा है। आप हमेशा अच्छे निर्णय लेते हैं। यही इस महामाया अष्टकम की महिमा हैं।

महामाया अष्टकम जप के लाभ – Benefits of Chanting Mahamaya Ashtakam

  • महामाया अष्टकम सबसे शक्तिशाली अष्टकम में से एक हैं और इस प्रकार ये आपको बुरी शक्तियों से बचाने की क्षमता रखते हैं।
  • महामाया अष्टकम के जाप से ऐसी तरंगें निकलती हैं जो आपको शांत करती हैं और शांति प्राप्त करने में मदद करती हैं।
  • महामाया अष्टकम का जाप करने से व्यक्ति की आंतरिक चेतना जागृत होती है और इस प्रकार उसके जीवन में स्थिरता आती है।
  • महामाया अष्टकम का जाप करने से आपको अपने परिवार और प्रियजनों के साथ सौहार्दपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाए रखने में मदद मिलती है।
  • यदि आप नियमित रूप से और पूरी श्रद्धा के साथ महामाया अष्टकम का जाप करते हैं, तो देवी आपके सभी कष्टों का अंत कर देंगी।
  • नियमित रूप से मंत्र का जाप करने से जातक को उन आपदाओं से सुरक्षा मिलती है जो उसके स्वास्थ्य, धन और खुशी पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती हैं।
  • महामाया अष्टकम का नियमित जाप आपको शक्ति प्रदान करता है, जिससे आप अपनी समस्याओं से अधिक शक्तिशाली बन जाते हैं।

माँ काली के विनाशकारी रूप के पीछे की कहानी

दारुक नाम का एक कुख्यात असुर था जिसने ब्रह्मा को प्रसन्न करके वरदान प्राप्त किया था। वरदान के अनुसार वह असुर देवताओं और ब्राह्मणों को दुःख पहुँचा सकता था। इतना ही नहीं, दारुक ने स्वर्ग में अपना राज्य भी स्थापित करना शुरू कर दिया। यह देखकर सभी देवता ब्रह्मा और विष्णु के पास पहुँचे, जहाँ उन्हें बताया गया कि दुष्ट दारुक को केवल एक महिला ही मार सकती है।

यह सुनकर सभी देवता स्त्री रूप धारण कर दारुक से युद्ध करने चले गए, लेकिन वे सभी उससे हार गए। पराजय के बाद देवता भगवान शिव से अपना कष्ट साझा करने के लिए कैलाश पर्वत पर पहुंचे। देवताओं की बात सुनकर भगवान शिव ने माता पार्वती की ओर देखा और कहा, “हे कल्याणी, मैं आपसे दुष्ट दारुक का नाश करने और संसार की रक्षा करने की प्रार्थना करता हूं।” यह सुनकर माता पार्वती का एक अंश भगवान शिव में समा गया।

माँ काली का स्वरूप

भगवती माता का वह अंश भगवान शिव के शरीर में प्रवेश कर गया और शिव के गले में विष के कारण भगवती माता एक काली देवी में बदल गईं। भगवान शिव ने उस अंश को अपने अंदर महसूस किया और अपनी तीसरी आंख खोली और भयंकर रूप में देवी काली के रूप में प्रकट हुईं।

शिव की तरह ही माँ काली के पास भी तीसरी आंख और चंद्र रेखा थी। गले में कराल विष का निशान था और वे त्रिशूल धारण करती थीं। माँ काली का रौद्र रूप देखकर देवता और सिद्ध भागने लगे। माँ काली के हुंकार मात्र से दारुक समेत सारी असुर सेना जलकर राख हो गई।

महामाया अष्टकम

फिर भी काली का रौद्र रूप खत्म नहीं हुआ। माँ का क्रोध पूरी दुनिया को जलाने लगा। दुनिया को क्रोध से बचाने के लिए शिव ने बालक का रूप धारण किया और काली के सामने प्रकट हुए।

कैसे हुआ माँ काली का क्रोध शांत?

जब माँ काली ने उस शिशु शिरूपी को देखा तो वह उस रूप पर मोहित हो गईं। उन्होंने शिव को गले लगा लिया और उन्हें अपने स्तनों से दूध पिलाने लगीं। कुछ ही देर में माँ काली बेहोश हो गईं क्योंकि शिवजी ने माँ काली का क्रोध पी लिया था।

देवी को होश में लाने के लिए शिवजी ने शिव तांडव किया। जब माँ काली वापस होश में आईं तो उन्होंने शिव को नृत्य करते देखा और उनके साथ शामिल हो गईं, जिसके कारण उन्हें योगिनी भी कहा गया।

निष्कर्ष

आशा है आपका हमारा लेख महामाया अष्टकम पढ़कर अच्छा महसुस हुआ होगा। सदियों से देवी काली ने धर्म की रक्षा करने और पाप करने वालों का नाश करने के लिए कई रूप धारण किए हैं। मां कालिका हिंदू धर्म में सबसे जागृत देवी हैं और उन्होंने चार रूपों में पृथ्वी पर विचरण किया है – दक्षिणा काली, शमशान काली, मां काली और महाकाली।

इन सभी रूपों ने रक्षा वध से लेकर पृथ्वी और उसके निवासियों के उपचार तक के विभिन्न उद्देश्यों को पूरा किया है।

माँ काली आत्मशक्ति का भंडार हैं। इससे आपका व्यक्तित्व निखरता है और आप उन परिस्थितियों में भी निडर होकर बोलते हैं, जिनका सामना करने से आप पहले डरते थे। माँ काली हमारे जीवन से अशुभ तत्वों को नष्ट करके सुख और संतोष को बढ़ाती हैं।

Shri Narayana Ashtakam Lyrics: श्री नारायण अष्टकम अर्थ सहित

Narayana Ashtakam Lyrics: नारायण अष्टकम भगवान विष्णु को समर्पित श्लोक है। अष्टकम का अर्थ 8 श्लोकों के समूह से होता है, जिसका पाठ करने से भगवान प्रसन्न होते हैं तथा मनोकामना पूर्ण करते हैं। हिंदू धर्म के अनुसार हर देवी-देवता को प्रसन्न करने के लिए अलग-अलग स्तोत्र, अष्टकम, श्लोक आदि लिखे गए हैं, जिनका प्रतिदिन पाठ करने से मानव जीवन की कई समस्याओं का समाधान होता है। और भगवान उनकी मनोकामना पूर्ण करते हैं।

आज के इस लेख में हम जानेंगे एक ऐसे महान अष्टकम के बारे में जो भगवान विष्णु को समर्पित है। नारायण अष्टकम से भगवान विष्णु का अनुसरण किया जाता है तथा अष्टकम का प्रतिदिन पाठ करने से भगवान विष्णु आपको अपनी शरण में लेते हैं। भगवान विष्णु को अनेकों नामों से जाना जाता है जैसे श्री हरि, श्री नारायण, विष्णु, लक्ष्मीनारायण, शेषनारायण, आदि।

श्री नारायण अष्टकम

99Pandit के साथ चलिए जानते हैं श्री नारायण अष्टकम की महिमा साथ ही इसके लाभ, इसका पाठ कब करें, तथा नारायण अष्टकम लिरिक्स (Narayana Ashtakam Lyrics)।

नारायण अष्टकम क्या है?

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री नारायण अष्टकम का नियमित पाठ करने से जीवन की सभी कठिनाइयाँ दूर होती हैं तथा भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है। भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए मनुष्य नारायण अष्टकम का पाठ करता है।

वेदों और पुराणों में भगवान विष्णु को सृष्टि का पालनहार कहा गया है। मानव जीवन से जुड़े सुख-दुख का चक्र श्री नारायण के हाथों में है। भगवान की आराधना में इस अष्टकम का पाठ बहुत महत्वपूर्ण है। इस स्तोत्र में लक्ष्मीपति ने एक हजार नाम बताए हैं।

यह अष्टकम भगवान विष्णु को बहुत प्रिय है तथा बहुत सरल पाठ है, जिससे हर कोई लाभ उठा सकता है। यह भगवान विष्णु के शक्तिशाली अष्टकम में से एक है जिसकी रचना आदि शंकराचार्य ने की थी। अष्टकम का नियमित पाठ करने से सुखी और शांतिपूर्ण जीवन जीने में मदद मिलती है।

नारायण अष्टकम् लिरिक्स – Narayana Ashtakam Lyrics

|| श्री नारायण अष्टकम् ||

वात्सल्यादभयप्रदानसमयादार्तार्तिनिर्वाणा
दौदार्यादघशोषणादगणितश्रेय: पदप्रापणात् ।
सेव्य: श्रीपतिरेक एव जगतामेतेऽभवन्साक्षिण:
प्रहलादश्च विभीषणश्च करिराट् पांचाल्यहल्या ध्रुव” ।।1।।

प्रहलादास्ति यदीश्वरो वद हरि: सर्वत्र मे दर्शय
स्तम्भे चैवमिति ब्रुवन्तमसुरं तत्राविरासीद्धरि: ।
वक्षस्तस्य विदारयन्निजनखैर्वात्सल्यमापाद
यन्नार्तत्राणपरायण: स भगवान्नारायणो मे गति: ।।2।।

श्रीरामात्र विभीषणोऽयमनघो रक्षोभयादागत:
सुग्रीवानय पालयैनमधुना पौलस्त्यमेवागतम् ।
इत्युक्त्वाभयमस्य सर्वविदितं यो राघवो
दत्तवानार्त सभगवान्नारायणो मे गतिः।।3।।

नक्रग्रस्तपदं समुद्धतकरं ब्रह्मादयो भो सुरा:
पाल्यन्तामिति दीनवाक्यकरिणं देवेश्वशक्तेषु य: ।
मा भैषीरिति यस्य नक्रहनने चक्रायुध: श्रीधर ।
आर्तत्राणपरायणः सभगवान्नारायणो मे गतिः ।।4।।

भो कृष्णाच्युत भो कृपालय हरे भो पाण्डवानां सखे
क्वासि क्वासि सुयोधनादपह्रतां भो रक्ष मामातुराम् ।
इत्युक्तोऽक्षयवस्त्रसंभृततनुं योऽपालयद्द्रौपदी
मार्तत्राणपरायणः सभगवान्नारायणो मे गतिः ।।5।।

यत्पादाब्जनखोदकं त्रिजगतां पापौघविध्वंसनं
यन्नामामृतपूरकं च पिबतां संसारसंतारकम् ।
पाषाणोऽपि यद्न्घ्रिपद्मरजसा शापान्मुनेर्मोचित ।
आर्तत्राणपरायणः सभगवान्नारायणो मे गतिः ।।6।।

पित्रा भ्रातरमुत्तमासनगतं चौत्तानपादिर्ध्रुवो दृष्ट्वा
तत्सममारूरुक्षुरधृतो मात्रावमानं गत: ।
यं गत्वा शरणं यदाप तपसा हेमाद्रिसिंहासन
मार्तत्राणपरायणः सभगवान्नारायणो मे गतिः ।।7।।

आर्ता विषन्णा: शिथिलाश्च भीता
घोरेषु च व्याधिषु वर्तमाना: ।
संकीत्र्य नारायणशब्दमात्रं
विमुक्तदु:खा: सुखिनो भवन्ति ।।8।।

॥ इति श्रीनारायणाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

नारायण अष्टकम का हिंदी अर्थ – Narayana Ashtakam Lyrics with Hindi Meaning

अति वात्सल्यमय होने के कारण, भयभीतों को अभयदान देने का स्वभाव होने के कारण, दुःखी पुरुषों का दुःख हरने के कारण, अति उदार और पापनाशक होने के कारण और अन्य अगणित कल्याणमय पदों (श्रेयों) की प्राप्ति करा देने के कारण सारे जगत् के लिये भगवान् लक्ष्मीपति ही सेवनीय हैं; क्योंकि प्रह्लाद, विभीषण, गजराज, द्रौपदी, अहल्या और ध्रुव-ये (क्रम से) इन कार्यों में साक्षी हैं ॥१॥

‘अरे प्रह्लाद ! यदि तू कहता है कि ईश्वर सर्वत्र है तो मुझे खम्भे में दिखा दैत्य हिरण्यकशिपु के ऐसा कहते ही वहाँ भगवान् आविर्भूत हो गये और अपने नखों से उसके वक्षःस्थल को विदीर्ण करके अपना वात्सल्य प्रकट किया। ऐसे दीनरक्षक भगवान् नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं ॥२॥

‘हे श्रीरामजी! यह निष्पाप विभीषण राक्षस रावण के भय से आया है- यह सुनते ही सुग्रीवा उस पुलस्त्य-ऋषि के पौत्र को तुरंत ले आओ और उसकी रक्षा करो-ऐसा कहकर जैसा अभयदान श्रीरघुनाथजी ने उसे दिया वह सबको विदित ही है: वेही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं॥ ३॥

श्री नारायण अष्टकम

ग्राहद्वारा पाँव पकड़ लिये जाने पर सूंड़ उठाकर ‘हे ब्रह्मा आदि देवगण। मेरी रक्षा करो।’- इस प्रकार दीनवाणी से पुकारते हुए गजेन्द्र की रक्षा में देवताओं को असमर्थ देखकर ‘मत डर’ ऐसा कहकर जिन श्रीधर ने ग्राह का वध करने के लिये सुदर्शन चक्र उठा लिया, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं ॥४॥

‘हे कृष्ण!, हे अच्युत!, हे कृपालो!, हे हरे! हे पाण्डवसखे! तुम कहाँ हो? कहाँ हो? दुर्योधन द्वारा लूटी गयी मुझ आतुरा की रक्षा करो! रक्षा करो !! इस प्रकार प्रार्थना करने पर जिसने अक्षयवस्त्र से द्रौपदी का शरीर ढककर उसकी रक्षा की, वह दुःखियों का उद्धार करने में तत्पर भगवान् नारायण मेरी गति हैं॥ ५ ॥

जिनके चरणकमलों के नखों की धोवन श्रीगंगाजी त्रिलोकी के पापसमूह को ध्वंस करने वाली हैं, जिनका नामामृतसमूह पान करने वालों को संसारसागर से पार करने वाला है तथा जिनके पादपद्मों की रज से पाषाण भी मुनिशाप से मुक्त हो गया, वे दीनरक्षक भगवान् नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं॥६॥

अपने भाई को पिता के साथ उत्तम राजसिंहासन पर बैठा देख उत्तानपाद के पुत्र ध्रुव ने जब स्वयं ही उस पर चढ़ना चाहा तो पिता ने उसे अंक में नहीं लिया और विमाता ने भी उसका अनादर किया, उस समय जिनकी शरण जाकर उसने तप के द्वारा सुमेरुगिरि के राजसिंहासन की प्राप्ति की, वे ही दीनरक्षक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति हैं॥७॥

जो पीड़ित हैं, विषादयुक्त हैं, शिथिल (निराश) हैं, भयभीत हैं अथवा किसी भी घोर आपत्ति में पड़े हुए हैं, वे नारायण शब्द के संकीर्तन मात्र से दुःख से मुक्त होकर सुखी हो जाते हैं॥ ८॥

नारायण अष्टकम का पाठ करने की विधि

श्री नारायण अष्टकम का पाठ करने के लिए एक विशेष विधि का पालन किया जाता है। इसका पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है. लेकिन शुभ मुहूर्त में इसका पाठ करना अधिक फलदायी होता है।

दिन

नारायण अष्टकम का पाठ किसी भी दिन किया जा सकता है, लेकिन एकादशी, पूर्णिमा या किसी विशेष त्यौहार के दिन, जैसे वैकुंठ एकादशी, पर इसका पाठ करना अधिक शुभ माना जाता है।

अवधि

नारायण अष्टकम का पाठ नियमित रूप से 41 दिनों तक किया जाता है। इस दौरान सात्विक जीवनशैली का पालन करना चाहिए और पूजा में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए।

शुभ मुहूर्त

प्रातः ब्रह्ममुहूर्त (प्रातः 4:00 बजे से 6:00 बजे तक) में इसका पाठ करना बहुत फलदायी होता है।

नारायण अष्टकम पाठ के लाभ

  1. यह पाठ जीवन के कष्टों और समस्याओं से मुक्ति दिलाने में सहायक है।
  2. नारायण अष्टकम के पाठ प्रतिदिन करने से पापों का नाश होता है।
  3. भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में धन और समृद्धि का आगमन होता है।
  4. यह पाठ भय और चिंता को दूर कर साहस और आत्मविश्वास प्रदान करता है।
  5. श्री नारायण अष्टकम का नियमित पाठ मन को शांति देता है और आपके जीवन से सभी बुराइयों को दूर रखता है और आपको स्वस्थ, समृद्ध और समृद्ध बनाता है।
  6. श्री नारायण अष्टकम का पाठ करने से भक्ति कई गुना बढ़ जाती है। हमें ऐसा महसूस होता है कि हम एक पहाड़ को कदम दर कदम पार कर रहे हैं और वहां से भौतिक दुनिया बहुत अप्रासंगिक लगने लगती है और जप अपने आप में ही अपना उद्देश्य बन जाता है।
  7. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार श्री नारायण अष्टकम का नियमित जाप भगवान विष्णु को प्रसन्न करने और उनका आशीर्वाद पाने का सबसे शक्तिशाली तरीका है।

नारायण अष्टकम का जाप कैसे करें?

श्री नारायण अष्टकम का जाप करने से पहले, यहाँ कुछ पारंपरिक अभ्यास दिए गए हैं जिनका पालन करके भक्त अधिक केंद्रित और सार्थक अनुभव के लिए तैयारी कर सकते हैं:

  1. शारीरिक रूप से स्वच्छ महसूस करने के लिए स्नान करें या अपने हाथ और चेहरा धोएँ। यह आंतरिक शुद्धि का भी प्रतीक हो सकता है। 
  2. ध्यान न भटकाने वाली कोई शांत, साफ जगह ढूँढ़ें जहाँ आप जाप पर ध्यान केंद्रित कर सकें। 
  3. आरामदायक और साफ कपड़े पहनें जिससे आप आराम से बैठ सकें। 
  4. भगवान नारायण के प्रति श्रद्धा और भक्ति के साथ जाप करें। अपने जाप के लिए एक इरादा तय करें, चाहे वह सुरक्षा, शांति या आध्यात्मिक विकास की तलाश हो। 
  5. आप जाप करने से पहले भगवान नारायण से एक छोटी प्रार्थना कर सकते हैं, अपना आभार व्यक्त कर सकते हैं और उनका आशीर्वाद मांग सकते हैं।

नारायण अष्टकम का पाठ करते समय सावधानियां

श्री नारायण अष्टकम का पाठ करते समय कुछ सावधानियां बरतनी चाहिए:

  1. सात्विक आहार: पाठ के दौरान शुद्ध और सात्विक भोजन ग्रहण करें। मांसाहारी भोजन और नशीले पदार्थों से दूर रहें। 
  2. ब्रह्मचर्य: पाठ के दौरान ब्रह्मचर्य का पालन करें। 
  3. अधूरी साधनाः साधना को अधूरा न छोड़ें। इसे नियमित रूप से 41 दिनों तक करें। 
  4. समय की पाबंदी: नियमित समय पर पाठ करें ताकि मन एकाग्र रहे।
  5. मन की पवित्रताः पाठ के दौरान अपने मन को शांत और पवित्र रखें, नकारात्मक विचारों से बचें।

भगवान विष्णु के प्रमुख मंत्र – Important Mantras of Lord Vishnu

हिंदू धर्म के अनुरूप, भगवान विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता में से एक माना जाता है। भगवान नारायण को समस्त ब्रह्माण्ड का संरक्षक या रक्षक कहा जाता है।

श्री नारायण अष्टकम

श्री हरि के भक्त उनको प्रसन्न करने तथा उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए मंत्रों का जाप करें। भगवान विष्णु के प्रमुख मंत्र कुछ इस प्रकार है:

1. विष्णु मूल मंत्र

ॐ नमोः नारायणाय॥

Om Namoh Narayanaya॥

2. विष्णु भगवते वासुदेवाय मंत्र

ॐ नमोः भगवते वासुदेवाय॥

Om Namoh Bhagawate Vasudevaya॥

3. विष्णु गायत्री मंत्र

ॐ श्री विष्णुवे च विद्महे वासुदेवाय धीमहि।
तन्नो विष्णुः प्रचोदयात्॥

Om Shri Vishnave Cha Vidmahe Vasudevaya Dhimahi।
Tanno Vishnuh Prachodayat॥

4. विष्णु शांताकारम मंत्र

शान्ताकारम् भुजगशयनम् पद्मनाभम् सुरेशम्
विश्वाधारम् गगनसदृशम् मेघवर्णम् शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तम् कमलनयनम् योगीभिर्ध्यानगम्यम्
वन्दे विष्णुम् भवभयहरम् सर्वलोकैकनाथम्॥

Shantakaram Bhujagashayanam Padmanabham Suresham
Vishvadharam Gaganasadrisham Meghavarnam Shubhangam।
Lakshmikantam Kamalanayanam Yogibhirdhyanagamyam
Vande Vishnum Bhavabhayaharam Sarvalokaikanatham॥

5. मंगलम भगवान विष्णु मंत्र

मंगलम् भगवान विष्णुः, मंगलम् गरुड़ध्वजः।
मंगलम् पुण्डरी कक्षः, मंगलाय तनो हरिः॥

Mangalam Bhagwan Vishnuh, Mangalam Garudadhwajah।
Mangalam Pundari Kakshah, Mangalaya Tano Harih॥

निष्कर्ष – Conclusion

नारायण अष्टकम केवल एक भजन नहीं है, यह एक गहन आध्यात्मिक अभ्यास है जो दुनिया भर में भगवान विष्णु के भक्तों के दिलों को छूता है। बहुत से लोग अपने गुरु ग्रह को मजबूत करने, जीवन में सुख-शांति और समृद्धि के लिए बृहस्पतिवार का व्रत करते हैं।

गुरुवार का व्रत रखते हैं, तो पूरे विधि-विधान से पूजा करें और फिर कथा पढ़ने के बाद नारायण अष्टकम का पाठ करने से मनुष्य को बहुत से लाभ मिलते हैं। हमें आशा है हमारा आज का लेख “नारायण अष्टकम” आपको पढ़कर अच्छा लगा होगा। आगे और भी ऐसे लेख पढ़ने के लिए जुड़े रहें 99Pandit के साथ।

साथ ही 99Pandit के साथ आप हमारी वेबसाइट से पंडित सेवा का भी प्रयोग कर सकते हैं। जहां आपको कुशल और वैदिक स्कूल से शिक्षा प्राप्त पंडित की मदद से किसी भी प्रकार की पूजा करवा सकते हैं। आप घर बैठे ही विवाह पूजा, सत्यनारायण पूजा, लक्ष्मी पूजा, गणेश पूजा, ऑफिस पूजा, आदि करा सकते हैं।

Anjaneya Karya Siddhi Mantra: आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र हिंदी अर्थ सहित

Anjaneya Karya Siddhi Mantra: आंजनेय का अर्थ – अंजना के पुत्र यानि भगवान हनुमान जी से हैं। आज के लेख में हम जानेंगे “आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र” (Anjaneya Karya Siddhi Mantra) के बारे में। हिंदू धर्म में पूजे जाने वाले सबसे अधिक लोकप्रिय और समर्पित देवताओं में से एक हैं संकट मोचन हनुमान।

भगवान हनुमान जी को भगवान श्रीराम के भक्त के रूप में पूजा जाता है और साथ ही उनकी वीरता और दयालु स्वभाव के लिए भी। भगवान हनुमान भगवान श्रीराम की सेनाओं के प्रमुख थे और इस प्रकार उनके जीवन और महाकाव्यों में उनका बहुत महत्व है।

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र

हिंदू ग्रंथो के अनुसार, हनुमान जी को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। मान्यता है कि, जो भी व्यक्ति सही नियम और सच्ची भक्ति के साथ भगवान हनुमान की पूजा अर्चना करता है, वह सभी संकटों से मुक्ति प्राप्त करता है, इसीलिये भगवान हनुमान को संकटमोचन के नाम से भी जाना जाता है। हनुमान जी को प्रसन्न करने का सबसे आसान तरीका है सच्चे मन से भगवान श्री राम का नाम लेना और उनकी आराधना करना।

इसके अतिरिक्त यदि आप किसी भी प्रकार की पूजा जैसे सरस्वती पूजा (Saraswati Puja), विवाह पूजा (Marriage Puja), मंगल दोष पूजा (Mangal Dosh Puja), काल सर्प पूजा (Kaal Sarp Dosh Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit के मदद से कुशल और वैदिक विद्यालय से शिक्षा प्राप्त पंडित को आसान से बुक कर सकते हैं।

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आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र क्या है? – What is Anjaneya Karya Siddhi Mantra?

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र में ‘कार्य’ शब्द का अर्थ है प्रयास और ‘सिद्धि’ का अर्थ है पूर्णता या सफलता। जब आप अपने दिल के किसी प्रिय कार्य में सफल होना चाहते हैं, तो इस मंत्र का जाप आपको सफलता के करीब ले जाएगा।

अगर आपको कोई काम करने का तरीका नहीं सूझ रहा है और आपका कोई काम अटका हुआ है और इसकी वजह आप नहीं हैं (जैसे कोर्ट केस), तो ऐसी स्थिति में भी कार्य सिद्धि हनुमान मंत्र आपके काम आता है।

आंजनेय भगवान हनुमान का दूसरा नाम है, और भगवान हनुमान के इस नाम से जुड़ा एक समर्पित मंत्र है। ज्योतिषियों के अनुसार, आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप करना कामकाजी लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है क्योंकि यह उनकी बुद्धि में रचनात्मकता जोड़ता है।

यह मंत्र आपके लक्ष्यों को स्पष्ट रूप से देखने में भी मदद करता है और आपको उनके अनुसार काम करने के लिए प्रेरित करता है। आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप जीवन में धन और सफलता को आकर्षित करने के लिए किया जाता है। इस मंत्र का जाप करके कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में किसी भी तरह की देरी को रोक सकता है।

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र संस्कृत में

त्वमस्मिन कार्य निर्योगे प्रमाणं हरिसत्तमा |
हनुमान यात्नमास्ताया दु:ख क्षय करोभाव ||

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र इंग्लिश में

Tvamasmin Karya Niryoge Pramanam Hari Sattama।
Hanuman Yatna Masthaya Dukha Kshaya Karo Bhava॥

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र: हिंदी अर्थ

हे वानरों में श्रेष्ठ हनुमान! आप इस कार्य को पूरा करने में सक्षम हैं ।
हे हनुमान! आप मेरे दुर्भाग्य को दूर करने वाले बनो ॥

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र: इंग्लिश अर्थ

Oh Hanuman, the best among monkeys! You are capable of fulfilling this task.
Oh, Hanuman! Become the one who can remove my misfortunes.

भगवान हनुमान जी के अन्य प्रभावी मंत्र

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र के अलावा हनुमान जी के और भी मंत्र हैं जिनका प्रतिदिन जाप करने से व्यक्ति के जीवन की सभी दुविधाएं और परेशानियां दूर हो जाती हैं। हनुमान जी के अन्य प्रभावशाली मंत्र इस प्रकार हैं:

1. The Hanuman Beej Mantra is:

|| ॐ ऐं भ्रीम हनुमते,
श्री राम दूताय नम: ||

Aum Aeem Bhreem Hanumate।
Shree Ram Dootaaya Namaha॥

हिंदी अर्थ – मैं भगवान हनुमान के सामने झुकता हूं, जो भगवान श्री राम के सबसे महान सेवक और दूत हैं।

English Meaning – I bow in front of Lord Hanuman, who is the greatest server and messenger of the Lord Sri Rama.

2. The Hanuman Moola Mantra is:

|| ॐ श्री हनुमते नमः ||

Om Shri Hanumate Namah।

हिंदी अर्थ – मैं भगवान हनुमान के सामने झुकता हूं।

English Meaning – I bow in front of Lord Hanuman.

3. The Hanuman Gayatri Mantra is:

|| ॐ आञ्जनेयाय विद्महे वायुपुत्राय धीमहि।
तन्नो हनुमत् प्रचोदयात् ||

Om Anjaneyaya Vidmahe Vayuputraya Dhimahi।
Tanno Hanumat Prachodayat॥

हिंदी अर्थ – हम देवी अंजनी के पुत्र और पवन पुत्र से प्रार्थना करते हैं। भगवान हनुमान हमारी बुद्धि को बुद्धिमत्ता और ज्ञान की ओर ले जाएं।

English Meaning – We pray to the son of Goddess Anjani and the son of the Wind. May Lord Hanuman guide our minds toward brilliance and learning.

4. The Manojavam Maarutatulyavegam Mantra is:

|| मनोजवम् मारुततुल्यवेगम् जितेन्द्रियम् बुद्धिमताम् वरिष्ठम्।
वातात्मजम् वानरयूथमुख्यम् श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये ||

Manojavam Marutatulyavegam Jitendriyam Buddhimatam Varishtham।
Vatatmajam Vanarayuthamukhyam Shriramadutam Sharanam Prapadye॥

हिंदी अर्थ – हम उनसे प्रार्थना करते हैं जो विचार के समान तेज़ हैं (मनोजवम), जो हवा से भी अधिक शक्तिशाली हैं, जिन्होंने अपनी इंद्रियों पर विजय प्राप्त कर ली है, जो सभी बुद्धिमान प्राणियों में सर्वोच्च हैं, जो पवन देवता के पुत्र हैं। वन प्राणियों की सेना के सेनापति, मुझे भगवान राम के दूत, अतुलनीय भगवान हनुमान की शरण मिलें। कृपया मुझे और मेरी प्रार्थनाओं को अपने चरणों में स्वीकार करें।

English Meaning – We pray to the one who is fast as thought (Manojavam), the one who is stronger than the wind, the one who has overpowered his senses, the one who is leading among all intelligent beings, the son of the wind god (Vayu Dev), the chief of the army of forest creatures, Let me find shelter in Lord Rama’s Messenger, the greatest Lord Hanuman. Please carry me and my prayers at your feet.

5. Anjaneya Mantra

ॐ श्री वज्रदेहाय रामभक्ताय वायुपुत्राय नमोsस्तुते।

Om Shree Vajradehaya Ramabhakthaya Vayuputhraya Namosthuthe।

हिंदी अर्थ – मैं भगवान हनुमान को प्रणाम करता हूं जिनका शरीर वज्र से बना है, जो भगवान राम के भक्त और पवन (वायु) के पुत्र हैं।

English Meaning – I bow before Lord Hanuman who has a body made of the vajra, who is a devotee of Lord Ram and the son of wind (Vayu).

6. Hanuman Bhakta Mantra

अंजनी गर्भ संभूत कपिन्द्र सचिवोत्तम।
राम प्रिया नमस्तुभ्यं हनुमान रक्ष सर्वदा॥

Anjani Garbha Sambhoota Kapeendra Sachivottama।
Rama Priya Namastubhyam Hanuman Raksh Sarvadaa॥

हिंदी अर्थ – मैं हनुमान की शरण लेता हूँ जो माता अंजनी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे और जो राजा सुग्रीव के सबसे श्रेष्ठ मंत्री थे। जो श्री राम को अत्यंत प्रिय हैं; हे हनुमान, मैं आपको प्रणाम करता हूं, कृपया सदैव मेरी रक्षा करें।

English Meaning – I take refuge in Hanuman, who was born from Mother Anjani’s womb and was the most excellent minister of the King of Sugriva. Who is especially dear to Shri Rama; I Bow to You, O Hanuman, Please Watch me Always.

7. Hanuman Mantra

ॐ नमो भगवते आंजनेयाय महाबलाय स्वाहा।

Om Namo Bhagvate Aanjaneyaay Mahaabalaay Swaahaa।

हिंदी अर्थ – मैं भगवान हनुमान को नमन करता हूं और समर्पण करता हूं, वह जो अंजना के पुत्र हैं।

English Meaning – I bow down and surrender to Lord Hanuman, he who is the son of the powerful Anjana.

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप करने के लाभ

  • हनुमान मंत्र का जाप करने से आपको अपनी परेशानियों और समस्याओं पर काबू पाने के लिए मानसिक और शारीरिक दोनों तरह की शक्ति प्राप्त करने में मदद मिलती है।
  • हनुमान मंत्र जातक के लिए सुरक्षा कवच के रूप में कार्य करते हैं और आपके शत्रुओं की किसी भी गलत चाल से लड़ने में आपकी सहायता करते हैं।
  • यदि आप नियमित रूप से हनुमान मंत्रों का जाप करते हैं, तो यह अधिक संभावना है कि आप अपनी अधिकांश कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर लेंगे।
  • हनुमान मंत्र आपको अपने डर का डटकर सामना करने और किसी भी अप्रत्याशित स्थिति से बहादुरी से लड़ने का साहस देता है।
  • हनुमान मंत्रों का जाप करने से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, विशेषकर अवसाद और तनाव से संबंधित समस्याओं में भी सहायता मिलती है।
  • हनुमान मंत्र का जाप करने से जातक के आस-पास से बुरी आत्माओं या भूत-प्रेतों के प्रभाव को दूर करने में मदद मिलती है।
  • कई खिलाड़ी अपनी किसी भी प्रतियोगिता से पहले हनुमान मंत्र या हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं। हनुमान मंत्र उन्हें अपने प्रयास में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए आवश्यक सहनशक्ति, साहस और शक्ति प्रदान करता है।
  • भगवान हनुमान न केवल शारीरिक शक्ति के प्रतीक हैं; वे मानसिक शक्ति के भी प्रतीक हैं।
  • हनुमान मंत्र का जाप करने से जातक को जीवन के सभी पहलुओं में सही निर्णय लेने में मदद मिलती है।
  • भगवान हनुमान एक दाता के रूप में उस जातक के लिए सफलता सुनिश्चित करते हैं जो पूरी ईमानदारी और भक्ति के साथ हनुमान मंत्र का अभ्यास करता है।
  • हनुमान मंत्र का जाप करने से कर्ज या असफल विवाह जैसी समस्याएं भी दूर होती हैं।

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप कैसे करें?

भगवान हनुमान को बहुत सारे नाम से जाना जाता है साथ ही उनकी आराधना करने के लिए कई सारे मंत्र भी हैं। उनमें से प्रत्येक मंत्र का एक निश्चित समय और दिन होता है जब आपको उन्हें पढ़ना चाहिए।

हालाँकि, हनुमान मंत्र पढ़ते समय आपको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इस बारे में नीचे बताया गया है:

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र

  • आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र जाप करने के लिए सबसे अच्छा दिन शनिवार का होता है। हालाँकि, बाकि हनुमान मंत्रों का जाप अन्य दिनों में भी किया जा सकता है।
  • सबसे पहले सुबह जल्दी उठें और स्नान करें।
  • हनुमान जी की मूर्ति को अपने सामने रखें और पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • आपको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि आप जप और ध्यान को बेहतर बनाने के लिए ताजे फूलों और धूपबत्ती का उपयोग करें।
  • हनुमान मंत्र का जाप करते समय जल का बर्तन और कुमकुम रखना भी लाभकारी होगा।
  • सुनिश्चित करें कि आपका मन किसी भी विचार से मुक्त हो, और आप जो पढ़ रहे हैं उस पर ध्यान केंद्रित कर सकें।
  • भगवान हनुमान की पूजा अर्चना करते समय उन्हें गुड़-चने का प्रसाद, नारियल, इमरती चढ़ाएं।

आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप करते समय बरती जाने वाली सावधानियां

1. शांत मन

यदि आपका मन अन्य विचारों में व्यस्त है तो आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र जाप करने के लिए बैठने का कोई मतलब नहीं है। इसके लिए आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आप अपनी ऊर्जा बिना किसी व्यवधान के केवल मंत्र जाप पर केंद्रित करें..!!

2. बहुत ऊंचे स्वर में न बोलें

बहुत से लोग आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप जोर-जोर से करते हैं, लेकिन ऐसा करने का यह कोई आदर्श तरीका नहीं है। मंत्र जाप करने का आदर्श तरीका मंत्र जाप की मात्रा को धीमा करना है ताकि आप केवल इसे सुन सकें।

3. निरंतर बने रहें

शक्तिशाली और शक्तिशाली बनने के लिए कई मंत्रों का कई बार जाप करना पड़ता है। संख्याएँ 7, 9, 51, 108 और 1008 के बीच भिन्न-भिन्न होती हैं। आपको तब तक मंत्र का जाप करते रहना चाहिए जब तक आपको सर्वोत्तम परिणाम दिखाई न देने लगें।

4. जप के दौरान बंद आंखे

वैसे तो आप आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप खुली आंखों से भी कर सकते हैं, लेकिन आंखें बंद करके करने पर इसका प्रभाव अधिक होता है। ऐसा करने से न केवल आपको बेहतर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलेगी बल्कि आपको अपने पूरे शरीर में उस विशेष मंत्र के कंपन को महसूस करने में भी मदद मिलेगी।

5. सही उच्चारण

जब भी आप आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप करें, तो सुनिश्चित करें कि आप सुसंगत और सही शब्दों का उपयोग करके मंत्र का जाप करें। गलत उच्चारण आपको फायदे से ज्यादा नुकसान पहुंचा सकता है। यदि आप कठिन शब्दों को लेकर भ्रमित हैं तो किसी बुजुर्ग से सही उच्चारण में मदद करने के लिए कहें।

निष्कर्ष

ज्योतिष के अनुसार, भगवान हनुमान की पूजा करने के कई तरीके हैं और आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप करना उन तरीकों में से एक है। ऐसा कहा जाता है कि आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप करने से न केवल आपके भीतर की कंपन शांत होती है बल्कि व्यक्ति को अपने भीतर और अपने आस-पास से सभी प्रकार की समस्याओं, भय और नकारात्मक ऊर्जाओं से छुटकारा पाने में भी मदद मिलती है।

यदि आप आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र को विधि और संपूर्ण श्रद्धा के साथ करना चाहते हैं और आपको पता नहीं है कि इसकी शुरुआत कैसे हो तो आप निश्चिंत हो जाएं क्योंकि इसमें आपकी मदद के लिए 99Pandit आपके साथ हैं। 99Pandit की मदद से आप वैदिक पंडित को अपने घर बुला कर विधि पूर्व आंजनेय कार्य सिद्धि मंत्र का जाप कर सकते हैं।

इसी के साथ जुड़े रहिए 99Pandit के साथ क्योंकि हम आगे भी आपके लिए ऐसे ही मंत्र, आरती, और जाप लाते रहेंगे जिससे आपके जीवन में सकारात्मक उर्जा बनी रहे।

Shiva Panchakshara Stotram Lyrics: शिव पंचाक्षर स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित

Shiva Panchakshara Stotram Lyrics: ऊँ नमः शिवाय ! भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है। जो भी भक्त महाकाल यानि भगवान शिव की आराधना करता है उसे जीवन भर अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता न ही उसको जीवन में किसी प्रकार की कठिनाई का सामना करना पड़ता है। यूं तो भगवान शिव के कई मंत्र हैं तथा स्तोत्र हैं, लेकिन शिव पंचाक्षर स्तोत्रम की अलग महिमा है।

इस शिव पंचाक्षर स्तोत्रम (Shiva Panchakshara Stotram Lyrics) से भगवान शिव की शक्ति और उनकी स्तुति की जाती है। माना जाता है कि इसे नियमपूर्वक पढ़ने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं और अपने भक्तों को जीवन के सभी पहलुओं में सफलता प्रदान करते हैं।

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम

आज हम इस लेख के माध्यम से भगवान शिव के प्रमुख स्तोत्र शिव पंचाक्षर स्तोत्र (Shiva Panchakshara Stotram Lyrics) के बारे में जानेंगे। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का महत्व, लाभ, या स्तोत्र करने का सही तरीका भी जानेंगे।

इसके साथ ही अगर आपको अपने घर, कार्यालय, और मंदिर में किसी भी प्रकार की पूजा के लिए पंडित की जरूरत है तो आप हमारी 99Pandit की वेबसाइट से सत्यनारायण पूजा, गृह प्रवेश पूजा, नवग्रह शांति पूजा, आदि के लिए पंडित बुक कर सकते हैं।

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम् क्या है? – What is Shiva Panchakshara Stotram?

भगवान शिव की आराधना के लिए पवित्र शब्द मंत्र पांच अक्षरों से बना है और इसे लोकप्रिय रूप से शिव पंचाक्षर मंत्र कहा जाता है- “न मा सि वा या”। शिव पंचाक्षर स्तोत्र जगतगुरु आदि शंकराचार्य द्वारा रचित भगवान शिव पर एक सुंदर स्तोत्र है। पंचाक्षरी मंत्र [नमः शिवाय] वेदों के ठीक मध्य में आता है।

पंचाक्षर- न, म, शि, वा, और य। हिंदू परंपराओं के अनुसार, मानव शरीर को पांच तत्वों से बना माना जाता है और ये पवित्र अक्षर इन तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। ना पृथ्वी तत्व (पृथ्वी तत्व) को सक्रिय करता है, मा जल तत्व (जल कारक) के साथ भी ऐसा ही करता है, शि अग्नि तत्व (अग्नि तत्व) को सक्रिय करता है, वा वायु तत्व (वायु कारक) को सक्रिय करता है और अंत में हां आकाश तत्व (आकाश/अंतरिक्ष तत्व) को सक्रिय करता है।

इस लोकप्रिय स्तोत्र में, इनमें से प्रत्येक पवित्र अक्षर को शिव का प्रतिनिधित्व करने वाला माना जाता है और इस स्तोत्र में भगवान शिव के महान गुणों की प्रशंसा की जाती है। शिव पंचाक्षर मंत्र का भक्ति के साथ जप करने से इसकी दिव्य ऊर्जा अधिक बढ़ जाती है। इस मंत्र का जाप करने से आशीर्वाद मिलता है, उपचार होता है और सकारात्मक परिणाम मिलते हैं।

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम् संस्कृत में – Shiva Panchakshar Stotram in Sanskrit

|| शिव पंचाक्षर स्तोत्रम् ||

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय
तस्मै नकाराय नमः शिवाय

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय
नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय ।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय

शिवाय गौरीवदनाब्जबृंदा
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय

वशिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्यमूनीन्द्र देवार्चिता शेखराय ।
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय
तस्मै वकाराय नमः शिवाय

यज्ञस्वरूपाय जटाधराय
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय
तस्मै यकाराय नमः शिवाय

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसंनिधौ ।
शिवलोकमावाप्नोति शिवेन सह मोदते

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम् इंग्लिश में – Shiva Panchakshar Stotram in English

|| Shiva Panchakshar Stotram ||

Nagendraharaya Trilochanaya
Bhasmangaragaya Mahesvaraya
Nityaya Suddhaya Digambaraya
Tasmai Na Karaya Namah Shivaya

Mandakini Salila Chandana Charchitaya
Nandisvara Pramathanatha Mahesvaraya
Mandara Pushpa Bahupushpa Supujitaya
Tasmai Ma Maraya Namah Shivaya

Shivaya Gauri Vadanabja Brnda
Suryaya Dakshadhvara Nashakaya
Sri Nilakanthaya Vrshadhvajaya
Tasmai Shi Karaya Namah Shivaya

Vashistha Kumbhodbhava Gautamarya
Munindra Devarchita Shekharaya
Chandrarka Vaishvanara Lochanaya
Tasmai Va Karaya Namah Shivaya

Yagna Svarupaya Jatadharaya
Pinaka Hastaya Sanatanaya
Divyaya Devaya Digambaraya
Tasmai Ya Karaya Namah Shivaya

Panchaksharamidam Punyam Yah Pathechchiva
Sannidhau Shivalokamavapnoti Sivena Saha Modate

शिव पंचाक्षर स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित – Shiva Panchakshar Stotram Meaning in Hindi

भगवान शिव को नमस्कार,
जो साँपों के स्वामी नागेन्द्र को अपने गले में धारण करता है;
तीन आंखों वाले भगवान, जिनका शरीर पवित्र राख से सुशोभित है;
शुद्ध एक; वह शाश्वत प्रभु जो आकाश को अपने वस्त्र के रूप में धारण करता है।
मैं भगवान शिव को नमस्कार करता हूं, जो ‘न’ शब्द का रूप धारण करते हैं।

प्रभु को नमस्कार,
जिसके शरीर पर गंगाजल और चंदन का लेप लगा हो;
जो नंदी, दिव्य बैल के भगवान हैं, और जिनके परिचारक प्रमथ हैं;
जिनकी पूजा मंदार वृक्ष सहित असंख्य फूलों से की जाती है।
मैं भगवान शिव को नमस्कार करता हूँ, जो ‘म’ शब्द का रूप धारण करते हैं।

भगवान शिव को नमस्कार,
सूर्य जो गौरी के उज्ज्वल चेहरे को कमल के बगीचे की तरह खिलता है;
दक्ष के यज्ञ का विध्वंसक;
दीप्तिमान नीले गले वाला व्यक्ति जिसके ध्वज पर बैल का चिह्न अंकित है।
मैं भगवान शिव को नमस्कार करता हूं, जो ‘शि’ शब्द का रूप धारण करते हैं।

देवों के देव को नमस्कार है,
जिनकी पूजा भगवान इंद्र और अन्य देवताओं के साथ-साथ महान ऋषि वशिष्ठ, अगस्त्य और गौतम द्वारा की जाती है;
जिनकी आंखें सूर्य, चंद्रमा और अग्नि हैं।
मैं भगवान शिव को नमस्कार करता हूं, जो ‘वा’ अक्षर का रूप धारण करते हैं।

प्रभु को नमस्कार है
जिसने यक्ष का रूप धारण किया था;
जिसके बाल लंबे और उलझे हुए हैं और जो हाथ में त्रिशूल पकड़ता है;
शाश्वत और दिव्य एक के लिए, आकाश में लिपटा हुआ।
मैं भगवान शिव को नमस्कार करता हूं, जो ‘य’ शब्द का रूप धारण करते हैं।

जो कोई भी भगवान शिव की उपस्थिति में इस मेधावी पंचाक्षरी मंत्र का पाठ करता है, वह उनके लोक को प्राप्त करेगा और भगवान के साथ वहां आनंद मनाएगा।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का इंग्लिश में अर्थ – Shiva Panchakshar Stotram Meaning in English

Salutations to Lord Shiva,
Who carries Nagendra, the lord of snakes, around his neck;
The three-eyed Lord, whose body is adorned with holy ash;
The pure one; the eternal Lord who wears the sky as his garment.
I offer my salutations to Lord Shiva, who takes the form of the syllable na.

Salutations to the Lord,
Whose body is anointed with water from the Ganges and sandalwood paste;
Who is the Lord of Nandi, the divine bull, and whose attendants are the Pramathas;
Who is worshipped with innumerable flowers, including those from the Mandara tree.
I offer my salutations to Lord Shiva, who takes the form of the syllable ma.

Salutations to Lord Shiva,
The sun, which makes the radiant face of Gauri blossom like a garden of lotuses;
The destroyer of Daksha’s sacrifice;
The radiant blue-throated one whose flag bears the emblem of a bull.
I offer my salutations to Lord Shiva, who takes the form of the syllable śi.

Salutations to the God of the gods,
Who is worshipped by Lord Indra and the other deities, as well as the noble sages Vasishtha, Agastya, and Gautama;
Whose eyes are the sun, moon, and fire?
I offer my salutations to Lord Shiva, who takes the form of the syllable va.

Salutations to the Lord
Who adopted the form of a yaksha;
Whose hair is long and matted and who clasps a trident in his hand;
To the eternal and divine One, robed in the sky.
I offer my salutations to Lord Shiva, who takes the form of the syllable ya.

One who recites this meritorious five-syllable mantra in the presence of Lord Shiva will attain his realm and rejoice there with the Lord.

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम के लाभ – Benefits of Shiva Panchakshar Stotram

सफलता और समृद्धि के लिए

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम एक बहुत ही फलदायी मंत्र है जो भक्तों को जीवन में सफलता और समृद्धि प्राप्त करने के लिए सही मार्ग या दिशा खोजने में सहायता प्रदान करता है। जब भी कोई व्यक्ति अटका हुआ महसूस करता है, तो उसे मानसिक रुकावट को दूर करने और सही रास्ते पर आने के लिए इस मंत्र का जाप अवश्य करना चाहिए।

तनाव और परेशानी पर काबू पाएं

यह मंत्र एक बहुत शक्तिशाली मंत्र है जो किसी के दिल और दिमाग को शांत करने में मदद करने के लिए जाना जाता है। इसलिए, जब कोई व्यक्ति तनावग्रस्त और चिंतित होता है तो यह मंत्र उसके लिए बहुत मददगार होता है। यह उस व्यक्ति को सकारात्मक और आरामदेह एहसास देता है।

यह खोई हुई आंतरिक ऊर्जा को बहाल करने और नए सिरे से शुरुआत करने में भी मदद करता है। प्राचीन युग के ऋषियों का मानना ​​है कि इस मंत्र के पवित्र अक्षरों का जाप शरीर और मन के लिए ध्वनि चिकित्सा और आत्मा के लिए अमृत की तरह है।

व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त करता है

यह मंत्र आस-पास सकारात्मकता लाता है और भक्तों को बुरी नज़र या नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है। यह मंत्र मुश्किल समय में लोगों के लिए उम्मीद का स्रोत भी बनता है। यह व्यक्ति को हार मानने से रोकता है और अधिक प्रयास करने के लिए आत्मविश्वास बढ़ाता है।

सभी मनोकामनाओं की पूर्ति

अक्सर कहा जाता है कि भगवान शिव की दिव्य कृपा प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन पंचाक्षर स्तोत्रम मंत्र का जाप करना सबसे अच्छा तरीका है। इसमें भक्तों को भगवान शिव को प्रसन्न करके उनकी सभी इच्छाओं और सपनों को पूरा करने की शक्ति है।

मोक्ष प्राप्ति

इस स्तोत्र का जाप करने से व्यक्ति की भक्ति भावना बढ़ती है और भक्तों को भगवान शिव के निवास तक एक सुंदर आध्यात्मिक यात्रा करने में मदद मिलती है। यह भक्तों को जीवन और मृत्यु के चक्र से भी मुक्त करता है और मोक्ष या मुक्ति की प्राप्ति में मदद करता है।

स्थिरता और कल्याण

इस स्तोत्र का जाप करने से व्यक्ति के कार्य और व्यवहार पवित्र होते हैं और उसमें जीवंत ऊर्जा आती है। यह हमारे मानस को भी बेहतर बनाता है और हमारे शरीर में कुछ चक्रों (ऊर्जा केंद्रों) को सक्रिय करता है जो हमारी चेतना को उत्तेजित करने में मदद करते हैं। यह बदले में व्यक्ति को शांत, स्थिर रखने में मदद करता है और व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक भलाई भी सुनिश्चित करता है।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का जाप करने से पहले या करते समय बरती जाने वाली सावधानियां

  • अपने शरीर को साफ़ व नहाने के बाद इस मंत्र का जाप करें।
  • इस मंत्र का जाप करने से पहले मांसाहारी भोजन या शराब का सेवन करने से बचें। 
  • इस मंत्र का जाप करते समय दूसरों का बुरा न चाहें, अन्यथा इसका उल्टा असर हो सकता है।
  • सर्वोत्तम परिणाम पाने के लिए प्रत्येक शब्द का सही उच्चारण करने का प्रयास करें।

शिव पंचाक्षर स्तोत्र का जाप करने का सही तरीका

इस शिव पंचाक्षर स्तोत्रम (Shiva Panchakshara Stotram Lyrics) का जाप करना एक गहन आध्यात्मिक अभ्यास है, और इसे घर पर करने से इस अभ्यास से आपका जुड़ाव बढ़ता है। मंत्रों का प्रभावी ढंग से जाप करने में आपकी मदद करने के लिए यहां कुछ दिशानिर्देश दिए गए हैं:

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम

1. शांत स्थान चुनें

अपने घर में एक शांतिपूर्ण जगह खोजें जहाँ आपको कोई परेशान न करे। यह एक समर्पित ध्यान स्थान, आपके कमरे का एक कोना या यहाँ तक कि बाहर भी हो सकता है।

2. माहौल तैयार करें

आप चाहें तो मोमबत्ती या धूपबत्ती जला सकते हैं, हल्का संगीत बजा सकते हैं या शांत वातावरण बनाने के लिए सिंगिंग बाउल का इस्तेमाल कर सकते हैं। इससे आपको ध्यान केंद्रित करने और अपने अभ्यास के लिए मूड सेट करने में मदद मिल सकती है।

3. आसन

आराम से ऐसी स्थिति में बैठें जिससे आप तनावमुक्त होने के साथ-साथ सतर्क भी रहें। आम मुद्राओं में फर्श पर, कुशन पर या कुर्सी पर पैर मोड़कर बैठना शामिल है, जिसमें आपके पैर ज़मीन पर सपाट हों।

4. सांस पर ध्यान केंद्रित करें

मंत्रोच्चार शुरू करने से पहले, कुछ देर गहरी सांस लें। अपनी नाक से सांस लें, कुछ देर के लिए रोककर रखें और मुंह से सांस छोड़ें। इससे आपके मन को केंद्रित करने और मंत्रोच्चार के लिए तैयार होने में मदद मिलती है।

5. जप तकनीक

  • उच्चारण : मंत्र के सही उच्चारण पर ध्यान दें। इससे उसका प्रभाव बढ़ सकता है।
  • आवाज़ : आप अपनी सुविधा और वातावरण के अनुसार, धीरे से, या ऊंची आवाज़ में जप कर सकते हैं।
  • पुनरावृत्ति : मंत्र को एक निश्चित संख्या में दोहराएं (जैसे, 108 बार, अक्सर माला के साथ) या एक निश्चित अवधि के लिए दोहराएं।

6. नियमित अभ्यास

निरंतरता महत्वपूर्ण है। समय के साथ अपने अभ्यास और जुड़ाव को गहरा करने के लिए मंत्र जप को अपनी दैनिक या साप्ताहिक दिनचर्या में शामिल करने का प्रयास करें।

इन दिशानिर्देशों का पालन करके आप घर पर ही एक सार्थक और समृद्ध शिव पंचाक्षर स्तोत्रम जप अभ्यास बना सकते हैं।

निष्कर्ष – Conclusion

मुझे आशा है आपको हमारा ये लेख “Shiva Panchakshara Stotram Lyrics” पसंद आया होगा। यह मंत्र भगवान शिव को समझने और उनके महत्व को जानने के लिए है, खासकर भक्तों के लिए। ऐसा कहा जाता है कि शिव पंचाक्षर स्तोत्रम भक्तों में भक्ति भावना को बढ़ाने में मदद करता है और उन्हें भगवान शिव के करीब ले जाता है।

ऋषियों का भी मानना ​​है कि यह मंत्र आपको परम प्रकृति में ले जाता है और इसके शब्द मूलतः आत्मा, मन और शरीर के लिए ध्वनि चिकित्सा है। शिव पंचाक्षर स्तोत्रम मंत्र मानव जाति के लिए सबसे शक्तिशाली उपहार हैं और वे इतने शक्तिशाली हैं कि वे आपके जीवन के वर्तमान परिदृश्य को बदलने और आपके सभी दुखों को दूर करने की क्षमता रखते हैं।

ये शिव पंचाक्षर स्तोत्रम इतना दिव्य और जादुई है और इसे भजन या प्रार्थना के रूप में गाया जा सकता है। अगर आप भी भगवान शिव का आशीर्वाद पाना चाहते हैं तो आपको पूरी श्रद्धा के साथ इसका पाठ करना चाहिए।

शिव पंचाक्षर स्तोत्रम आपको आशीर्वाद देने, आपको ठीक करने और महादेव की कृपा से जो कुछ भी आप चाहते हैं उसे पाने के लिए जाना जाता है। क्या आपने इस मंत्र का जप करने की कोशिश की है? दिव्य मंत्रों और उनके वास्तविक अर्थों के बारे में अधिक जानने के लिए जुड़े रहे 99Pandit के साथ।

Mangal Chandika Stotram: मंगल चंडिका स्तोत्रम् संस्कृत में

Mangal Chandika Stotram: मंगल चंडिका स्तोत्रम् की सहायता से विवाह और कार्य बाधा दूर करने के लिए लाभकारी है। यह स्तोत्रम् मांगलिक लोगों के लिए मंगल के कारण उनके विवाह, कार्य संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए एक अच्छा उपाय है।

मंगल चंडिका स्तोत्रम् का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है। यह स्तोत्रम् पूर्णतः संस्कृत भाषा में लिखा गया है। मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति इस स्तोत्र का एक लाख बार जाप करता है, उस व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। चंडिका देवी महात्म्य की अधिष्ठात्री देवी मानी गई है। दुर्गा सप्तशती में चंडिका देवी को चामुंडा या माता दुर्गा कहा गया है।

Mangal Chandika Stotram

चंडिका देवी महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती का सम्मिलित रूप हैं। जो व्यक्ति नियमित रूप से मंगल चंडिका स्तोत्रम् का जाप करता है, उसे धन, व्यापार, आवास आदि की समस्या नहीं होती है। जिस व्यक्ति के विवाह में समस्या आ रही हो, कहा जाता है कि नियमित रूप से इस स्तोत्र का जाप करने से विवाह संबंधी परेशानी दूर होती है।

इस लेख में मंगल चंडिका स्तोत्रम् के बारे से हम विस्तार से जानेंगे और आपको बताएँगे स्तोत्रम् का उच्चारण करने की विधि और महत्व के बारे में। आख़िर क्यों है ये स्तोत्रम् इतना ख़ास? और इस स्तोत्रम् का जाप करने से क्या लाभ मिलता है? आइये विस्तार से जाने।

मंगल चंडिका स्तोत्रम् क्या है? What is Mangal Chandika Stotram?

मंगल चंडिका स्तोत्रम् सबसे पवित्र हिंदू धार्मिक रचना है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसका पाठ कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ने मां देवी चंडिका या चंडी देवी की पूजा करने तथा उनसे सहायता और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए किया था।

मंगल चंडिका स्तोत्रम् का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।यह स्तोत्रम् पूर्णतः संस्कृत भाषा में लिखा गया है। मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति इस स्तोत्रम् का एक लाख बार जाप करता है, उस व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

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इस छोटी सी रचना में अपार दिव्य शक्तियां निहित हैं और इसे कभी-कभी सर्व-आवश्यकताओं को पूरा करने वाला मंत्र भी कहा जाता है। मंगल चंडिका स्तोत्रम् का पाठ करने से अपार लाभ होता है। मंगल चंडिका स्तोत्रम् विशेष रूप से मांगलिक दोष को दूर करने में प्रभावी है, जो विवाह योग्य आयु के किसी भी लड़के या लड़की के लिए उपयुक्त वर खोजने में गंभीर बाधा उत्पन्न करता है।

मंगल चंडिका स्तोत्रम् अर्थ – Mangal Chandika Stotram with Meaning

मंगल चंडिका स्तोत्रम् का वर्णन ब्रह्मवैवर्त पुराण में मिलता है।यह स्तोत्रम् पूर्णतः संस्कृत भाषा में लिखा गया है। मान्यता के अनुसार जो व्यक्ति इस स्तोत्रम् का एक लाख बार जाप करता है, उस व्यक्ति की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

देवीभागवत,नवम स्कन्ध, अध्याय 47 के अनुसार मन्त्र इस प्रकार है –

मंत्र-

॥ ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं सर्व-पूज्ये देवि मंगल-चण्डिके। हूं हूं फट् स्वाहा॥

ध्यान –

देवीं षोड्शवष यां शश्वत्सुस्थिरयौवनाम्।
सर्वरुपगुणाढ्यां च कोमलांगीं मनोहराम्॥

श्वेतचम्पकवर्णाभा चन्द्रकोटि-समप्रभाम्।
वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नभूषणभूषिताम्॥

बिभ्रतीं कवरीभारं मल्लिकामाल्यभूषितम्।
विम्बोष्ठीं सुदतीं शुद्धां शरत्पद्मनिभाननाम्॥

ईषद्धास्यप्रसन्नास्यां सुनीलोत्पललोचनाम्।
जगद्धात्रीं च दात्रीं च सर्वेभ्यः सर्वसम्पदाम्॥

संसारसागरे घोरे पोतरुपां वरां भजे॥
देव्याश्च द्यानमित्येवं स्तवनं श्रूयतां मुने।
प्रयतः संकटग्रस्तो येन तुष्टाव शंकरः॥

अर्थ– सुस्थिर यौवना भगवती मंगल-चंडिका हमेशा सोलह वर्ष की ही जान पड़ती है। ये सम्पूर्ण रुप-गुण से सम्पन्न, कोमलांगी एवं मन को हर लेने वाली हैं। सफ़ेद चम्पा के समान इनका गौरवर्ण तथा करोड़ों चन्द्रमाओं के तुल्य इनकी मनोहर कान्ति है। ये अग्नि-शुद्ध दिव्य वस्त्र धारण किये रत्नमय आभूषणों से विभूषित है। मल्लिका पुष्पों से समलंकृत केशपाश धारण करती हैं।

बिम्बसदृश लाल ओठ, सुन्दर दन्त-पंक्ति तथा शरत्काल के प्रफुल्ल कमल की भाँति शोभायमान मुखवाली मंगल-चंडिका के प्रसन्न वदनारविन्द पर मन्द मुस्कान की छटा छा रही है। इनके दोनों नेत्र सुन्दर खिले हुए नीलकमल के समान मनोहर जान पड़ते हैं। इनकी दोनों आँखे सुन्दर खिले हुए नीलकमल के समान मनोहर जान पड़ते हैं। सबको सम्पूर्ण सम्पदा देने वाली ये जगदम्बा घोर संसार-सागर से उबारने में जहाज का काम करती हैं। मैं हमेशा इनका भजन करता हूँ।

शंकर उवाच

रक्ष रक्ष जगन्मातर्देवि मंगलचण्डिके।
हारिके विपदां राशेर्हर्ष-मंगल-कारिके॥

हर्ष –मंगल –दक्षे चहर्ष-मंगल-चण्डिके।
शुभे मंगल-दक्षे च शुभ-मंगल-चण्डिके॥

मंगले मंगलार्हे चसर्व-मंगल-मंगले।
सतां मंगलदे देवि सर्वेषां मंगलालये॥

पूज्या मंगलवारे च मंगलाभीष्ट-दैवते।
पूज्ये मंगल-भूपस्य मनुवंशस्य संततम्॥

मंगलाधिष्ठातृदेविमंगलानां च मंगले।
संसार-मंगलाधारे मोक्ष –मंगल -दायिनी॥

सारे च मंगलाधारे पारे च सर्वकर्मणाम्।
प्रतिमंगलवारे च पूज्ये च मंगलप्रदे॥

स्तोत्रेणानेनशम्भुश्चस्तुत्वा मंगलचंडिका म्।
प्रतिमंगलवारे च पूजां कृत्वा गतः शिवः॥

देव्याश्च मंगल-स्तोत्रं यं श्रृणोति समाहितः।
तन्मंगलं भवेच्छश्वन्न भवेत्तदमंगलम्॥

महादेवजी ने कहा –

‘जगन्माता भगवती मंगल-चण्डिके! तुम सम्पूर्ण विपत्तियों का विध्वंस करने वाली हो एवं हर्ष तथा मंगल प्रदान करने को सदा प्रस्तुत रहती हो। मेरी रक्षा करो, रक्षा करो। खुले हाथ हर्ष और मंगल देनेवाली हर्ष-मंगल-चण्डिके! तुम शुभा, मंगलदक्षा, शुभमंगल-चंडिका , मंगला, मंगला तथा सर्व-मंगल-मंगला कहलाती हो।

देवि ! साधु-पुरुषों को साधु-पुरुषों को मंगल प्रदान करना आपका स्वाभाविक गुण है। आप सभी लोगो के लिये मंगल का आश्रय हो। देवि! आप मंगलग्रह की इष्ट-देवी हो। मंगलवार के दिन आपकी पूजा होनी चाहिए। मनुवंश में उत्पन्न राजा मंगल की पूजनीया देवी हो। मंगलाधिष्ठात्री देवि! आप मंगलों के लिए भी मंगल हो। विश्व के सभी मंगल आप पर आश्रित हैं।

आप समस्तजन को मोक्षमय मंगल प्रदान करती हो। मंगलवार के दिन आपकी पूजा होने पर मंगलमय सुख-सम्पति प्रदान करने वाली देवि! तुम संसार की सारभूता मंगलधारा तथा समस्त कर्मों से परे हो।’इस स्तोत्रम् से स्तुति करके भगवान् शंकर ने देवी मंगल-चंडिका की उपासना की।

वे प्रति मंगलवार के दिन उनका पूजन करके चले जाते हैं। यूँही यह भगवती सर्व मंगल करने वाली सर्वप्रथम भगवान् शंकर से पूजित हुई। उनके दूसरे उपासक मंगल ग्रह हैं। तीसरी बार राजा मंगल ने तथा चौथी बार मंगलवार के दिन सुन्दर स्त्रियों ने इनकी पूजा की।

पाँचवीं बार मंगल कामना रखने वाले बहुसंख्यक मनुष्यों ने मंगलचंडिका का पूजन किया। फिर तो विश्वेश शंकर से सुपूजित ये देवी प्रत्येक विश्व में सदा पूजित होने लगी। मुने ! इसके पश्चात देवी-देवता, ऋषि, मुनि, मनु और मानव – सभी सर्वत्र इन परमेश्वरी की पूजा करने लगे।

जो पुरुष मन को एकाग्र करके भगवती मंगल-चंडिका के इस मंगलमय स्तोत्रम् का पाठ करता है, उसे हमेशा मंगल प्राप्त होता है। अमंगल उसके पास नहीं आ सकता। उसके पुत्र और पौत्रों में वृद्धि होती है तथा उसे प्रतिदिन मंगल ही दृष्टिगोचर होता है।

मंगल चंडिका स्तोत्रम् का जाप करते समय शीर्ष 7 गलतियों से बचें

1. कभी भी बिना स्नान किए मंत्र का जाप न करें

मंत्र जाप एक आध्यात्मिक गतिविधि है और कुछ आध्यात्मिक गतिविधि शुरू करते समय लोगों को सावधान रहना चाहिए। सफाई पूरी होने के बाद लोगों को मंत्रों का जाप करना चाहिए। मंत्र जाप से पहले स्नान करना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह आपके मन और शरीर को शुद्ध करता है।

2. नंगे फर्श पर न बैठें

जो लोग मंत्र जाप करने के इच्छुक हैं उन्हें कोई भी आध्यात्मिक गतिविधि करते समय कभी भी नंगे फर्श पर नहीं बैठना चाहिए। सीधे फर्श पर बैठने से आपकी सारी सकारात्मक ऊर्जा खत्म हो जाती है और हमें कुंडलिनी शक्ति को ऊपर की ओर ले जाना चाहिए न कि नीचे की ओर।

3. कुशा का आसन लें

लोगों को पहले कुशा घास से बना एक आसन लेना चाहिए और फिर उसे रेशम, ऊन, कपास, मखमल आदि से बने दूसरे आसन से ढक देना चाहिए। कुशा आसन हमें पर्यावरण की प्रतिकूल परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना मन की उस शांत स्थिति को बनाए रखने की अनुमति देता है।

4. मंत्र का जाप कैसे करें

जप करते समय लोगों को कभी भी अपना सिर या गर्दन नहीं हिलाना चाहिए। मंत्र के अक्षरों और पूरे मंत्र के अर्थ पर ध्यान करें। बिना उसका अर्थ जाने उस मन्त्र के जाप से इच्छित लक्ष्य की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती।

5. माला अवश्य है

मंत्र जाप करते समय हमेशा माला का प्रयोग करें। रुद्राक्ष, स्फटिक, चंदन, हल्दी और तुलसी जैसी मालाएं कई प्रकार की होती हैं। प्रत्येक मंत्र एक-एक माला का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए हमेशा मंत्र के अनुसार ही माला का चयन करना चाहिए।

6. अनुचित उच्चारण

मंत्र का उच्चारण सही ढंग से करना चाहिए अन्यथा यह प्रतिकूल प्रभाव दे सकता है। लोगों के लिए जप का उचित तरीका बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि जप में गलतियाँ बहुत सारी समस्याओं का कारण बन सकती हैं। इसलिए कोई भी गलती होने पर हम अंत में क्षमा मांग ही लेते हैं।

7. ऊंचे स्वर में जप न करें

लोगों को कभी भी मंत्र का जाप ऊंची आवाज में नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा माना जाता है कि मंत्र जाप हमेशा मन में चुपचाप करते हुए प्रत्येक शब्द के अर्थ और पूरे मंत्र के अर्थ को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए।

मंगल चंडिका से सम्बंधित पौराणिक कथा – Mythology related to Mangal Chandika

देवी मंगल चंडिका के बारे में कई पौराणिक कथाए प्रचलित है। चलिए जानते है माता मंगल चंडिका के अस्तित्व के बारे में। पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार माँ पार्वती ने हिमालय के राजा दक्ष की पुत्री के रूप में जन्म लिया था।

जब माता पार्वती बड़ी हुए तो उन्होंने भगवान शिव को अपने पति के रूप में चुना। लेकिन हिमालय के राजा नहीं चाहते थे कि उनकी राजकुमारी का विवाह भगवान शिव से हो और माता पार्वती कैलाश में बसे। दक्ष नहीं चाहते थे कि उनकी पुत्री एक कैलाश के बसने वाले और फक्कड़ जीवन जीने वाले तथा अघोरी जैसे दिखने वाले शिव से विवाह करे।

Mangal Chandika Stotram

राजा दक्ष ने माँ पार्वती और भगवान शिव के विवाह का बहुत विरोध किया लेकिन माता पार्वती तो भगवान शिव को ही अपना पति मान चुकी थी और अपने पिता दक्ष की एक बात ना सुनी। पिता दक्ष के विरोध करने के बाद भी माता पार्वती ने भगवान शिव से विवाह कर लिया। राजा दक्ष का क्रोध माँ पार्वती और भगवान शिव पर बढ़ता ही चला गया।

एक बार की बात है रहा दक्ष ने एक विशाल और महत्वपूर्ण यज्ञ का आयोजन किया जिसके पूरे ब्रह्मांड से सभी देवी-देवताओं को आमंत्रित किया। राजा दक्ष ने जानबूझकर माता सती और उनके पति भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया।

शिव तांडव की वजह

यज्ञ की बात सुनकर माता पार्वती ने यज्ञ में सम्मिलित होने की इच्छा जतायी लेकिन भगवान शिव भी जाने के लिए मना किया। माता पार्वती ने भगवान शिव की एक ना सुनी और यज्ञ में सम्मिलित होने बिना शिव के चली गई।

जब सती यज्ञ में पहुँची तो राजा दक्ष ने भगवान शिव की निंदा की और अपमानजनक टिप्पणी करने लगे। माता सती अपने पति की निंदा ना सह सकी और क्रोधित होकर महायज्ञ के जवान कुंड में कूद गई। जब भगवान शिव को माँ सती के बारे में पता चला तो भगवान शिव बहुत क्रोधित हुए और अपने रुद्र रूप में प्रकट हुए।

भगवान शिव ने माता सती को अपने हाथों में लेकर तांडव करना शुरू कर दिया। जिससे धरती पर हाहाकार मच गया और ब्रह्मांड भी काँपने लगा।

शक्तिपीठ

तब भगवान विष्णु ने शिव का क्रोध शांत करने के लिए अपने सुदर्शन चक्र के जरिए सती के शरीर के 51 टुकड़े कर दिए। माता सती के ये 51 टुकड़े पृथ्वी लोक पर जहां-जहां गिरे थे वहां-वहां पर माता सती के नाम के शक्तिपीठ स्थापित हुए।

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और इन सभी 51 शक्तिपीठों में भैरव रूप में ख़ुद भगवान शिव स्थापित हो गये। जिस स्थान पर माता सती की दाहिनी कलाई गिरी थी उस स्थान को आज हम मंगल चंडिका शक्तिपीठ के नाम से जानते है। इस शक्तिपीठ पर माता सती मंगल चंडिका के रूप में पूजी जाती है।

मंगल चंडिका स्तोत्रम् के लाभ – Benefits of Mangal Chandika Stotram

मंगल चंडिका स्तोत्रम् का पाठ करने से अपार लाभ होता है, मुख्य लाभ नीचे दिए गए हैं:

  • यह स्तोत्रम् मांगलिक लोगों के लिए बहुत उपयोगी है और मंगल चंडिका स्तोत्रम् के प्रयोग से मंगल के कारण विवाह और कार्य बाधा दूर होती है।
  • स्तोत्रम् का जप करने से कर्ज से मुक्ति पाने के लिए या कर्ज के जाल में फंसने से बचने के लिए।
  • जो व्यक्ति भक्ति भाव से जप करता है उस व्यक्ति को पैसों की कमी का सामना नहीं करना पड़ता।
  • भौतिक कष्टों का सामना किए बिना संतुष्ट और सुखी जीवन जीने के लिए मंगल चंडिका स्रोत का जाप करना चाहिए।
  • इस स्तोत्रम् के लाभ से लक्ष्मी स्थिर रहती है और अपनी आर्थिक स्थिति भी स्थिर रहती है।
  • इससे घर में कलह, झगड़े, मतभेद और परिवार में मतभेद दूर होते हैं।
  • पति-पत्नी के बीच किसी भी तरह के विवाद को दूर करने में मंगल चंडिका स्तोत्रम् बहुत कारगर है।
  • मकान, जमीन और संपत्ति से संबंधित किसी भी विवाद को टालने के लिये यह स्तोत्रम् उच्चतम माना जाता है।
  • वास्तु दोष को दूर करने और घर से अन्य हानिकारक और बुरी ऊर्जाओं को बाहर निकालने और घर के माहौल को खुशहाल और समृद्ध बनाने के लिए मंगल चंडिका स्तोत्रम् का जाप करना चाहिए।
  • इस स्तोत्रम् से विवाह में बाधा या देरी करने वाली किसी भी बाधा या समस्या को दूर करें।
  • मंगल चंडिका स्तोत्रम् विशेष रूप से मांगलिक दोष को दूर करने में प्रभावी है, जो विवाह योग्य आयु के किसी भी लड़के या लड़की के लिए उपयुक्त वर को समाप्त करने में गंभीर बाधा उत्पन्न करता है।
  • पारंपरिक भारतीय और वैदिक ज्योतिष के अनुसार, किसी व्यक्ति की कुंडली में अशुभ मंगल के हानिकारक प्रभावों को दूर करने के लिए मंगल चंडिका स्तोत्रम् की उपासना सबसे अधिक लाभकारी होती है।

निष्कर्ष – Conclusion

मंगल चंडिका स्तोत्रम् सबसे पवित्र हिंदू धार्मिक रचना है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे कोई और नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव ने देवी मां चंडिका या चंडी देवी की पूजा करने और उनकी सहायता और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए गाया था

महाकवि कालिदास के अनुसार विश्व में ऐसा कोई प्राणी नहीं है जो स्तुति से प्रसन्न ना किया जा सके। इसीलिए विभिन्न देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए हमारे हिंदू पौराणिक किताबों में कई स्तोत्रम् व स्तुति का वर्णन किया गया है। अनेक भक्तों द्वारा अपने इष्ठ देव को प्रसन्न करने के लिए इन मंत्रों और स्तोत्रों का उपयोग किया जाता है।

इन्ही स्तोत्रम् में से एक है मंगल चंडिका स्तोत्र। इस स्तोत्रम् का जाप करने से एक व्यक्ति के जीवन में चल रही अनेक बाधाओं को दूर किया जा सकता है। आर्थिक समस्याओं, व्यापारिक, गृह क्लेश, विद्याप्ति के साथ साथ मांगलिक दोष के कारण दांपत्य जीवन में उपस्थित समस्याओं के निवारण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है।

अगर आपको भी किसी प्रकार की पूजा, पाठ, जाप, हवन आदि के लिए पंडित जी की जरुरत है और आपको नहीं पता की पंडित जी से कैसे पूजा करवाए? तो 99Pandit पर पूजा और जाप के लिए पंडित जी की बुकिंग करके इन लाभों का अनुभव करें। 99Pandit पर आपको मिलते है अनुभवी और वैदिक पाठशाला से पढ़े हुए पंडित और पुरोहित।

Hanuman Vadvanal Stotra Lyrics in Hindi: श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र

इस हनुमान वडवानल स्तोत्र (Hanuman Vadvanal Stotra Lyrics) का जाप हनुमान जी की स्तुति करने के लिए किया जाता है| माना जाता है कि देवो के अतिरिक्त धरती पर केवल विभीषण ही थे, जिन्होंने हनुमान जी की शरण ली तथा उनकी स्तुति की|

रावण के भाई विभीषण को भी हनुमान जी की भांति ही अमरता का वरदान प्राप्त था अर्थात वे आज भी इस धरती पर निवास करते है| विभीषण जी ने ही श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र की रचना की थी| तो आइये जानते है इस श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र के बारे में|

हनुमान वडवानल स्तोत्र

इसी के साथ यदि आप हनुमान चालीसा [Hanuman Chalisa], खाटू श्याम जी की आरती [Khatu Shyam Aarti Lyrics], या बजरंग बाण [Bajrang Baan Lyrics] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

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Hanuman Vadvanal Stotra Lyrics: मनोजवं मारुततुल्य वेगं जितेन्द्रियं

|| श्री हनुमान वडवानल स्तोत्र ||

|| विनियोग ||

ॐ अस्य श्री हनुमान् वडवानल-स्तोत्र-मन्त्रस्य श्रीरामचन्द्र ऋषिः !
श्रीहनुमान् वडवानल देवता, ह्रां बीजम्, ह्रीं शक्तिं, सौं कीलकं !!
मम समस्त विघ्न-दोष-निवारणार्थे, सर्व-शत्रुक्षयार्थे ॥

सकल-राज-कुल-संमोहनार्थे, मम समस्त-रोग-प्रशमनार्थम् !
आयुरारोग्यैश्वर्याऽभिवृद्धयर्थं समस्त-पाप-क्षयार्थं !!
श्रीसीतारामचन्द्र-प्रीत्यर्थं च हनुमद् वडवानल-स्तोत्र जपमहं करिष्ये ॥

|| ध्यान ||

मनोजवं मारुत-तुल्य-वेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठं !
वातात्मजं वानर-यूथ-मुख्यं श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्ये ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते प्रकट-पराक्रम !
सकल-दिङ्मण्डल-यशोवितान-धवलीकृत-जगत-त्रितय ॥

वज्र-देह रुद्रावतार लंकापुरीदहय उमा-अर्गल-मंत्र !
उदधि-बंधन दशशिरः कृतान्तक सीताश्वसन वायु-पुत्र ॥

अञ्जनी-गर्भ-सम्भूत श्रीराम-लक्ष्मणानन्दकर कपि-सैन्य-प्राकार !
सुग्रीव-साह्यकरण पर्वतोत्पाटन कुमार-ब्रह्मचारिन् गंभीरनाद ॥

सर्व-पाप-ग्रह-वारण-सर्व-ज्वरोच्चाटन डाकिनी-शाकिनी-विध्वंसन !
ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महावीर-वीराय सर्व-दुःख निवारणाय ॥

ग्रह-मण्डल सर्व-भूत-मण्डल सर्व-पिशाच-मण्डलोच्चाटन !
भूत-ज्वर-एकाहिक-ज्वर, द्वयाहिक-ज्वर, त्र्याहिक-ज्वर ॥

हनुमान वडवानल स्तोत्र

चातुर्थिक-ज्वर, संताप-ज्वर, विषम-ज्वर, ताप-ज्वर !
माहेश्वर-वैष्णव-ज्वरान् छिन्दि-छिन्दि यक्ष ब्रह्म-राक्षस !!
भूत-प्रेत-पिशाचान् उच्चाटय-उच्चाटय स्वाहा ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते !
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः आं हां हां हां हां ॥

ॐ सौं एहि एहि ॐ हं ॐ हं ॐ हं ॐ हं !
ॐ नमो भगवते श्रीमहा-हनुमते श्रवण-चक्षुर्भूतानां ॥

शाकिनी डाकिनीनां विषम-दुष्टानां सर्व-विषं हर हर !
आकाश-भुवनं भेदय भेदय छेदय छेदय मारय मारय ॥

शोषय शोषय मोहय मोहय ज्वालय ज्वालय !
प्रहारय प्रहारय शकल-मायां भेदय भेदय स्वाहा ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते सर्व-ग्रहोच्चाटन !
परबलं क्षोभय क्षोभय सकल-बंधन मोक्षणं कुर-कुरु ॥

शिरः-शूल गुल्म-शूल सर्व-शूलान्निर्मूलय निर्मूलय !
नागपाशानन्त-वासुकि-तक्षक-कर्कोटकालियान् !!
यक्ष-कुल-जगत-रात्रिञ्चर-दिवाचर-सर्पान्निर्विषं कुरु-कुरु स्वाहा ॥

ॐ ह्रां ह्रीं ॐ नमो भगवते महा-हनुमते !
राजभय चोरभय पर-मन्त्र-पर-यन्त्र-पर-तन्त्र ॥

पर-विद्याश्छेदय छेदय सर्व-शत्रून्नासय !
नाशय असाध्यं साधय साधय हुं फट् स्वाहा ॥

|| इति श्री विभीषणकृतं हनुमद् वडवानल स्तोत्रं सम्पूर्णम ||

Gajendra Moksha Stotram Lyrics: श्री विष्णु (गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र)

Gajendra Moksha Stotram: गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम एक पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित है। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की आराधना के लिए उपयोग किया जाता है और इसे गजेंद्र मोक्ष के नाम से जाना जाता है। हिन्दू धर्म के अनुसार अलग-अलग मंत्र और स्त्रोत का जाप करते है जिससे उनके घरों में सुख शांति आती है, और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।

मन्त्रों और स्तोत्रों का उच्चारण करने से सभी परेशानियों से भी छुटकारा मिलता है। मन्त्रों का जाप वास्तव में मस्तिष्क को शांति प्रदान करता है और कई पापों से मुक्ति दिलाकर मनोकामनाओं को पूरा भी करता है। जब बात आती है स्तोत्र के जाप की तो कई ऐसे मन्त्र और स्तोत्र गीता में बताए हैं जिनसे घर की आर्थिक समस्या भी सही हो जाती है।

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

इन्ही स्तोत्रों में से एक है गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र यानी हाथी को मुक्ति दिलाने वाला स्त्रोत का जाप करना। हमारे हिंदू पुराणों के अनुसार इस स्तोत्र का नियमित जाप करने से एक व्यक्ति को कर्ज से मुक्ति मिलती है और मन की शांति भी प्राप्त होती है। साथ ही किसी भी संकट से मुक्ति मिलती है।

यह स्रोत हिंदू धर्म के प्रथम ग्रंथ ”श्रीमद्भगवद गीता” के द्वतीय (दूसरे), तृतीय (तीसरे) और चतुर्थ (चौथे) अध्याय में गजेंद्र स्तोत्र को वर्णित किया गया है। इस गजेंद्र मोक्ष स्रोत में कुल 33 श्लोक दिए गए हैं। इस स्तोत्र में हाथी (गजेंद्र) और मगरमच्छ (मकर) के साथ हुए युद्ध का वर्णन किया गया है। आइए जानें गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का जाप करने के फायदों के बारे में।

किसी भी प्रकार की पूजा, हवन, पाथ, गृह प्रवेश पूजा के लिए वेरिफ़ाइड और अनुभवी पंडित पाने के लिए आप 99Pandit की वेबसाइट पर जा कर संपर्क कर सकते है। 99Pandit आपको किसी भी प्रकार की पूजा के लिए आपकी अपनी भाषा में पंडित और पुरोहित उपलब्ध कराता है।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र की कथा- Story of Gajendra Moksha Stotra

इस स्तोत्र में एक हाथी (गजेंद्र) और मगरमच्छ (मकर) के बीच हुए युद्ध की कहानी है। इस कहानी में एक हाथी अपने संपूर्ण परिवार के साथ जंगल में सेर कर रहा था और जब उसे बहुत प्यास लगने लगती है तब वो सरोवर के किनारे पानी पीने पहुंच जाता है। सरोवर में कमल के फूल देखकर हाथी जल क्रीड़ा करने पहुंच जाता है। इतने में एक मगरमच्छ उस हाथी का पैर पकड़ लेता है और छोड़ता नहीं है।

हाथी के सभी परिवार वाले उसे बाहर निकालने की कोशिश करते हैं और अंत में वहीं छोड़कर चले जाते हैं। हाथी बाहर आने की कोशिश करता है, परंतु मगरमच्छ (मकर) उसका पैर नहीं छोड़ता है। जब हाथी (गजेंद्र) पूरी तरह से डूबने लगता है।

तब उसने परम पूज्य श्रीहरि यानी भगवान विष्णु को पुकारते हुए उनकी जो स्तुति की थी वही गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र के नाम से जानी जाती है। इस स्तुति को सुनकर भगवान् विष्णु वहां उस हक़ की रक्षा करने पहुँच गए और गज की रक्षा की। तभी ये ये स्तोत्र सभी तरह के संकटों से मुक्ति के मार्ग दिखाता है।

सरल भाषा में समझा जाये तो गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम की कथा एक हाथी के बारे में है, जो एक सरोवर में रहता था। एक दिन, एक मगरमच्छ ने उस हाथी को पकड़ लिया और उसे अपने पंजे में जकड़ लिया। हाथी ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की और उन्हें अपनी स्थिति से बचाने के लिए कहा। भगवान विष्णु ने हाथी की प्रार्थना सुनी और उसे मगरमच्छ के पंजे से मुक्त किया।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र- Gajendra Moksha Stotram Lyrics and Meaning In Hindi

यह स्रोत हिंदू धर्म के प्रथम ग्रंथ ”श्रीमद्भगवद गीता” के द्वतीय (दूसरे), तृतीय (तीसरे) और चतुर्थ (चौथे) अध्याय में गजेंद्र स्तोत्र को वर्णित किया गया है। इस गजेंद्र मोक्ष स्रोत में कुल 33 श्लोक दिए गए हैं। इस स्तोत्र में हाथी और मगरमच्छ के साथ हुए युद्ध का वर्णन किया गया है।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम का अर्थ है “हाथी की मुक्ति”। यह स्तोत्र भगवान विष्णु की शक्ति और कृपा को दर्शाता है, जो अपने भक्तों को किसी भी संकट से मुक्त करते हैं।

श्रीमद्भागवतान्तर्गतगजेन्द्र कृत भगवान का स्तवन
श्री शुक उवाच
एवं व्यवसितो बुद्ध्या समाधाय मनो हृदि।
जजाप परमं जाप्यं प्राग्जन्मन्यनुशिक्षितम॥ 1॥

अर्थ – शुक्र जी ने कहा, बुद्धि के द्वारा पिछले अध्याय में वर्णित रीति से निश्चय करके तथा मन को हृदयदेश में स्थिर करके वह गजराज अपने पूर्वजन्म में सीखकर कण्ठस्थ किये हुए सर्वश्रेष्ठ एवं बार-बार दोहराने योग्य निम्नलिखित स्तोत्रका मन-ही-मन पाठ करने लगा ॥ 1॥

ॐ नमो भगवते तस्मै यत एतच्चिदात्मकम।
पुरुषायादिबीजाय परेशायाभिधीमहि॥ 2 ॥

अर्थ– गजेंद्र ने मन ही मन श्री हरी को ध्यान करते हुए कहा कि, जिनके प्रवेश करने पर (जिनकी चेतनता को पाकर) ये जड शरीर और मन आदि भी चेतन की भाँति व्यहार करने लगते हैं (चेतन बन जाते हैं), ॐ ‘ओम्’ शब्द के द्वारा लक्षित तथा सभी शरीरों में प्रकृति एवं पुरुष रूप से प्रविष्ट हुए उन सर्व समर्थ परमेश्वर को हम मन-ही-मन नमन करते हैं ॥ 2 ॥

यस्मिन्निदं यतश्चेदं येनेदं य इदं स्वयं।
योस्मात्परस्माच्च परस्तं प्रपद्ये स्वयम्भुवम॥ 3 ॥

अर्थ– जिनके सहारे यह विश्व टिका है, जिनसे निकला है, जिन्होंने इसकी रचना की है और जो स्वयं ही इसके रूप में प्रकट हैं- फिर भी जो इस दृश्य जगत्से एवं उसकी कारण भूता प्रकृति से सर्वथा परे (विलक्षण) एवं श्रेष्ठ हैं – उन अपने-आप – बिना किसी कारण के बने हुए भगवान की मैं शरण लेता हूँ। ॥3 ॥

यः स्वात्मनीदं निजमाययार्पितंक्कचिद्विभातं क्क च तत्तिरोहितम।
अविद्धदृक साक्ष्युभयं तदीक्षतेस आत्ममूलोवतु मां परात्परः॥ 4 ॥

अर्थ– अपनी संकल्प-शक्ति के द्वारा अपने ही रूप में रचे बेस हुए और इसीलिये सृष्टिकाल में प्रकट और प्रलयकाल में उसी प्रकार अप्रकट रहने वाले इस शास्त्र-प्रसिद्ध कार्य-कारण रूप जगत्‌ को जो अकुण्ठित-दृष्टि होने के कारण साक्षी रूप से देखते रहते हैं – उनसे लिप्त नहीं होते. वे चक्षु आदि प्रकाश के भी परम प्रकाशक प्रभु मेरी रक्षा करें ॥4॥

कालेन पंचत्वमितेषु कृत्स्नशोलोकेषु पालेषु च सर्व हेतुषु।
तमस्तदाऽऽऽसीद गहनं गभीरंयस्तस्य पारेऽभिविराजते विभुः। ॥ 5 ॥

अर्थ– समय के प्रवाह से संपूर्ण लोकों के एवं ब्रह्मादी लोकपालों के पञ्चभूतों में प्रवेश कर जाने पर तथा पञ्चभूतों से लेकर महत्तत्त्वपर्यन्त सम्पूर्ण कारणों के उनकी परम कारणरूपा प्रकृति में लीन हो जाने पर उस समय दुर्जेय तथा अपार अन्धकार रूप प्रकृति ही बच रही थी। उस अन्धकार के परे अपने परम धाम में जो सर्वव्यापक भगवान् सब ओर प्रकाशित रहते हैं, वे प्रभु मेरी रक्षा करें ॥ 5 ॥

न यस्य देवा ऋषयः पदं विदुर्जन्तुः पुनः कोऽर्हति गन्तुमीरितुम।
यथा नटस्याकृतिभिर्विचेष्टतोदुरत्ययानुक्रमणः स मावतु॥ 6 ॥

अर्थ– भिन्न-भिन्न रूपों में नाट्य करने वाले अभिनेता के वास्तविक स्वरूप को जिस प्रकार साधारण दर्शक नहीं जान पाते, उसी प्रकार सत्त्वप्रधान देवता अथवा ऋषि भी जिनके स्वरूप को नहीं जानते, फिर दूसरा साधारण जीव तो कौन जान अथवा वर्णन कर सकता है- वे दुर्गम चरित्रवाले प्रभु मेरी रक्षा करें ।॥ 6 ॥

दिदृक्षवो यस्य पदं सुमंगलमविमुक्त संगा मुनयः सुसाधवः।
चरन्त्यलोकव्रतमव्रणं वनेभूतत्मभूता सुहृदः स मे गतिः॥ 7 ॥

अर्थ– आसक्ति से सर्वथा छूटे हुए, सम्पूर्ण प्राणियों में आत्मबुद्धि रखने वाले, सबके अकारण हितू एवं अतिशय साधु-स्वभाव मुनिगण जिनके परम मङ्गलमय स्वरूप का साक्षात्कार करने की इच्छा से वन में रहकर अखण्ड ब्रह्मचर्य आदि अलौकिक व्रतों का पालन करते है, वे प्रभु ही मेरी गति है। ॥ 7 ॥

न विद्यते यस्य न जन्म कर्म वान नाम रूपे गुणदोष एव वा।
तथापि लोकाप्ययाम्भवाय यःस्वमायया तान्युलाकमृच्छति॥ 8 ॥

अर्थ– वह जिनका हमारी जिनका हमारी तरह कर्मवश न तो जन्म होता है और न जिनके द्वारा अहंकार प्रेरित कर्म ही होते हैं, जिनके निर्गुण स्वरूप का न तो कोई नाम है न रूप ही, फिर भी जो समय के अनुसार जगत्‌ की सृष्टि एवं प्रलय (संहार) के लिये स्वयं की इच्छा से जन्म आदि को स्वीकार करते हैं ॥ 8 ॥

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

तस्मै नमः परेशाय ब्राह्मणेऽनन्तशक्तये।
अरूपायोरुरूपाय नम आश्चर्य कर्मणे॥ 9 ॥

अर्थ– उस अनंत शक्ति वाले परम ब्रह्मा परमेश्वर को नमस्कार है। उन प्राकृत आकार रहित एवं अनेकों आकार वाले अद्भुतकर्मा भगवान्‌ को बार-बार नमस्कार है ॥ 9 ॥

नम आत्म प्रदीपाय साक्षिणे परमात्मने।
नमो गिरां विदूराय मनसश्चेतसामपि॥10 ॥

अर्थ– स्वयं प्रकाशित सभी साक्ष्य परमेश्वर को मेरा शत् शत् नमन है। वैसे देव जो नम, वाणी और चित्तवृतियों से परे हैं उन्हें मेरा बारंबार नमस्कार है। ॥ 10 ॥

सत्त्वेन प्रतिलभ्याय नैष्कर्म्येण विपश्चिता।
नमः केवल्यनाथाय निर्वाणसुखसंविदे॥ 11॥

अर्थ– विवेकी पुरुष के द्वारा सत्त्वगुण विशिष्ट निवृत्ति धर्म के आचरण से प्राप्त होने योग्य, मोक्ष-सुख के देने वाले तथा मोक्ष-सुख की अनुभूतिरूप प्रभु को नमस्कार है ॥ 11 ॥

नमः शान्ताय घोराय मूढाय गुण धर्मिणे।
निर्विशेषाय साम्याय नमो ज्ञानघनाय च॥ 12 ॥

अर्थ– सभी गुणों के स्वीकार शांत, रजोगुण को स्वीकार करके घोर एवं तमोगुण को अपनाकर मूढ से प्रतीत होने वाले, बिना भेद के और हमेशा सद्भाव से ज्ञानधनी प्रभु को मेरा नमस्कार है। ॥ 12 ॥

क्षेत्रज्ञाय नमस्तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय साक्षिणे।
पुरुषायात्ममूलय मूलप्रकृतये नमः॥13 ॥

अर्थ– शरीर, इन्द्रिय आदि के समुदायरूप सम्पूर्ण पिण्डों के ज्ञाता, सबके स्वामी एवं साक्षीरूप आपको नमस्कार है। सबके अन्तर्यामी, प्रकृति के भी परम कारण, किंतु स्वयं कारण रहित प्रभु को नमस्कार है ॥ 13 ॥

सर्वेन्द्रियगुणद्रष्ट्रे सर्वप्रत्ययहेतवे।
असताच्छाययोक्ताय सदाभासय ते नमः॥14 ॥

अर्थ– सम्पूर्ण इन्द्रियों एवं उनके विषयों के ज्ञाता, रामस्त प्रतीतियों के कारणरूप, सम्पूर्ण जड-प्रपञ्च एवं सबकी मूलभूता अविद्या के द्वारा सूचित होने वाले तथा सम्पूर्ण विषयों में अविद्यारूप से भासने वाले आपको नमस्कार है ॥ 14 ॥

नमो नमस्ते खिल कारणायनिष्कारणायद्भुत कारणाय।
सर्वागमान्मायमहार्णवायनमोपवर्गाय परायणाय॥15 ॥

अर्थ– सबके कारण किंतु स्वयं कारण रहित तथा कारण होने पर भी परिणाम रहित होने के कारण अन्य कारणों से विलक्षण कारण आपको बारम्बार नमस्कार है। सम्पूर्ण वेदों एवं शास्त्रों के परम तात्पर्य, मोक्षरूप एवं श्रेष्ठ पुरुषों की परम गति भगवान को निमस्कार है। ॥ 15 ॥

गुणारणिच्छन्न चिदूष्मपायतत्क्षोभविस्फूर्जित मान्साय।
नैष्कर्म्यभावेन विवर्जितागम-स्वयंप्रकाशाय नमस्करोमि॥ 16 ॥

अर्थ– जो त्रिगुणरूप काष्ठों में छिपे हुए ज्ञानमय अग्नि है, उक्त गुणों में हलचल होने पर जिनके मन में सृष्टि रचने की बाह्य-वृत्ति जाग्रत् हो जाती है तथा आत्मतत्त्व की भावना के द्वारा विधि-निषेधरूप शास्त्र से ऊपर उठे हुए ज्ञानी महात्माओं में जो स्वयं प्रकाशित रहते हैं, उन प्रभु को मैं नमन करता हूँ ॥ 16 ॥

मादृक्प्रपन्नपशुपाशविमोक्षणायमुक्ताय भूरिकरुणाय नमोऽलयाय।
स्वांशेन सर्वतनुभृन्मनसि प्रतीत प्रत्यग्दृशे भगवते बृहते नमस्ते॥17 ॥

अर्थ– मुझ जैसे शरणागत पशुतुल्य (अविद्याग्रस्त) जीव की अविद्यारूप फाँसी को सदा के लिये पूर्णरूप से काट देने वाले अत्यधिक दयालु एवं दया करने में कभी आलस्य न करने वाले नित्यमुक्त प्रभु को नमस्कार है। अपने अंश से सम्पूर्ण जीवों के मन में अन्तर्यामी रूप से प्रकट रहने वाले सर्वनियन्ता अनन्त परमात्मा आपको नमस्कार है ॥ 17 ॥

आत्मात्मजाप्तगृहवित्तजनेषु सक्तैर्दुष्प्रापणाय गुणसंगविवर्जिताय।
मुक्तात्मभिः स्वहृदये परिभावितायज्ञानात्मने भगवते नम ईश्वराय॥18 ॥

अर्थ– जो घर, पुत्र, शरीर ,मित्र, और संपत्ति सहित कुटुंबियों में अशक्त लोगों के द्वारा कठिनाई से प्राप्त होने वाले तथा मुक्त पुरुषों के द्वारा अपने हृदय में निरन्तर चिन्तित ज्ञानस्वरूप, सर्वसमर्थ भगवान्‌ को नमस्कार है ॥ 18 ॥

यं धर्मकामार्थविमुक्तिकामाभजन्त इष्टां गतिमाप्नुवन्ति।
किं त्वाशिषो रात्यपि देहमव्ययंकरोतु मेदभ्रदयो विमोक्षणम॥19 ॥

अर्थ– वह जिन्हें धर्म, अभिलषित भोग, धन और मोक्ष की कामना से भजने वाले लोग अपनी मनचाही गति पा लेते हैं, अपितु जो उन्हें अन्य प्रन्कार के अयाचित भोग एवं अविनाशी पार्षद शरीर भी देते हैं, वे अतिशय दयालु प्रभु मुझे इस विपत्तिसे सदाके लिये उबार लें ॥ 19 ॥

एकान्तिनो यस्य न कंचनार्थवांछन्ति ये वै भगवत्प्रपन्नाः।
अत्यद्भुतं तच्चरितं सुमंगलंगायन्त आनन्न्द समुद्रमग्नाः॥ 20 ॥

अर्थ– वह जिनके अनन्य भक्त – जो वस्तुतः एकमात्र उन भगवान्‌ के ही शरण हैं – धर्म, अर्थ आदि किसी भी पदार्थ को नहीं चाहते, अपितु उन्होंके परम मङ्गलमय एवं अत्यन्त विलक्षण चरित्रों का गान करते हुए आनन्दक समुद्र में गोते लगाते रहते हैं ॥ 20 ॥

तमक्षरं ब्रह्म परं परेश-मव्यक्तमाध्यात्मिकयोगगम्यम।
अतीन्द्रियं सूक्षममिवातिदूर-मनन्तमाद्यं परिपूर्णमीडे॥ 21 ॥

अर्थ– उन ब्रह्मादि, सर्वव्यापी, सर्वमान्य,अविनाशी के भी नियामक, अभक्तों के लिए भी हमेशा प्रकट होने वाले, भक्तियोग से प्राप्त, बहुत पास होने पर भी माया के कारण बहुत दूर महसूस होने वाले, इन्द्रियों के द्वारा अगम्य और अत्यंत दुर्विज्ञेय, अंतरहित लेकिन सभी के आदिकारक और सभी तरफ से परिपूर्ण उस भगवान् की मैं स्तुति करता हूँ। ॥ 21 ॥

यस्य ब्रह्मादयो देवा वेदा लोकाश्चराचराः।
नामरूपविभेदेन फल्ग्व्या च कलया कृताः॥ 22 ॥

अर्थ– वो जो ब्रह्मादि समस्त देवता, चारों वेद तथा सम्पूर्ण चराचर जीव नाम और आकृतिके भेद से जिनके अत्यन्त क्षुद्र अंश के द्वारा रचे गये हैं ॥ 22 ॥

यथार्चिषोग्नेः सवितुर्गभस्तयोनिर्यान्ति संयान्त्यसकृत स्वरोचिषः।
तथा यतोयं गुणसंप्रवाहोबुद्धिर्मनः खानि शरीरसर्गाः॥ 23 ॥

अर्थ– जिस प्रकार जलती हुई अग्नि से लपटें तथा सूर्य से किरणें बार-बार निकलती हैं और पुनः अपने कारण में लीन हो जाती हैं, उसी प्रकार बुद्धि, मन, इन्द्रियाँ और नाना योनियों के शरीर – यह गुणमय प्रपञ्च जिन स्वयम्प्रकाश परमात्मा से प्रकट होता है और पुनः उन्हीं में लीन हो जाता है ॥ 23 ॥

स वै न देवासुरमर्त्यतिर्यंगन स्त्री न षण्डो न पुमान न जन्तुः।
नायं गुणः कर्म न सन्न चासननिषेधशेषो जयतादशेषः॥ 24 ॥

अर्थ– वह भगवान जो भगवान् वास्तव में न तो देवता हैं न असुर, न मनुष्य है न तिर्यक् (मनुष्य से नीची – पशु, पक्षी आदि किसी) योनि के प्राणी हैं। न वे स्त्री हैं न पुरुष और न नपुंसक ही हैं। न वे ऐसे कोई जीव हैं, जिनका इन तीनों ही श्रेणियों में समावेश न हो सके। न वे गुण हैं न कर्म, न कार्य हैं न तो कारण ही। सबका निषेध हो जानेपर जो कुछ बच रहता है, वही उनका स्वरूप है और वे ही सब कुछ है। ऐसे भगवान मेरे उद्धार के लिए आविर्भूत हों। ॥24॥

जिजीविषे नाहमिहामुया कि मन्तर्बहिश्चावृतयेभयोन्या।
इच्छामि कालेन न यस्य विप्लवस्तस्यात्मलोकावरणस्य मोक्षम॥ 25 ॥

अर्थ– अब मैं इस मगरमच्छ के चंगुल से छूटकर जीवित रहना नहीं चाहता, क्योंकि भीतर और बाहर – सब ओर से अज्ञान के द्वारा ढके हुए इस हाथी के शरीर से मुझे क्या लेना है। मैं तो आत्मा के प्रकाश को ढक देने वाले उस अज्ञान की निवृत्ति चाहता हूँ, जिसका काल क्रम से अपने-आप नाश नहीं होता, अपितु भगवान्‌ की दया से अथवा ज्ञान के उदय से होता है ॥ 25 ॥

सोऽहं विश्वसृजं विश्वमविश्वं विश्ववेदसम।
विश्वात्मानमजं ब्रह्म प्रणतोस्मि परं पदम॥ 26 ॥

अर्थ– इस प्रकार मोक्ष का अभिलाषी मै विश्व के रचयिता, स्वयं विश्व के रूप में प्रकट तथा विश्व से सर्वथा परे, विश्व को खिलौना बनाकर खेलने वाले, विश्व में आत्मारूप से अजन्मा, व्याप्त, प्राप्तव्य एवं सर्वव्यापक वस्तुओं में सर्वश्रेष्ठ श्रीभगवान्‌ को केवल प्रणाम ही करता हूँ – उनकी शरण में हूँ ॥ 26 ॥

योगरन्धित कर्माणो हृदि योगविभाविते।
योगिनो यं प्रपश्यन्ति योगेशं तं नतोऽस्म्यहम॥ 27 ॥

अर्थ– वह जिन्होंने भगवद्भक्ति रूप योग के द्वारा कर्मों को जला डाला है, वे बोगी लोग उसी योग के द्वारा शुद्ध किये हुए अपने हृदय में जिन्हें प्रकट हुआ देखते है, उन योगेश्वर भगवान्‌ को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ 27 ॥

नमो नमस्तुभ्यमसह्यवेग-शक्तित्रयायाखिलधीगुणाय।
प्रपन्नपालाय दुरन्तशक्तयेकदिन्द्रियाणामनवाप्यवर्त्मने॥ 28॥

अर्थ– जिनकी सत्त्व-रज-तमरूप (त्रिगुणात्मक) शक्तियों का रागरूप वेग और असह्य है, जो सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयरूप में प्रतीत हो रहे है, तथापि जिनकी इन्द्रियाँ विषयों में ही रची-पची रहती हैं- ऐसे लोगों को जिनका मार्ग भी मिलना असम्भव है, उन शरणागत रक्षक एवं अपार शक्तिशाली आपको बार-बार नमस्कार है ॥ 28 ॥

गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र

नायं वेद स्वमात्मानं यच्छ्क्त्याहंधिया हतम।
तं दुरत्ययमाहात्म्यं भगवन्तमितोऽस्म्यहम॥ 29 ॥

अर्थ– वह जिनकी अविद्या नामक शक्ति के कार्यरूप अहंकार से ढके हुए अपने स्वरूप को यह जीव जान नहीं पाता, उन अपार महिमा वाले भगवान्‌ की मै शरण आया हूँ ॥ 29 ॥

श्री शुकदेव उवाच
एवं गजेन्द्रमुपवर्णितनिर्विशेषंब्रह्मादयो विविधलिंगभिदाभिमानाः।
नैते यदोपससृपुर्निखिलात्मकत्वाततत्राखिलामर्मयो हरिराविरासीत॥ 30 ॥

अर्थ– श्री शुकदेव जी कहते हैं कि, जिसने पूर्वोक्त प्रकार से भगवान्‌ के भेदर हित निराकार स्वरूप का वर्णन किया था, उस गजराज के समीप जब ब्रह्मा आदि कोई भी देवता नहीं आये, जो भिन्न-भिन्न प्रकार के विशिष्ट विग्रहों को ही अपना स्वरूप मानते हैं, तब साक्षात् श्रीहरि – जो सबके आत्मा होने के कारण दिवस्वरूप हैं- वहाँ परकट हो गये। ॥ 30 ॥

तं तद्वदार्त्तमुपलभ्य जगन्निवासःस्तोत्रं निशम्य दिविजैः सह संस्तुवद्भि:।
छन्दोमयेन गरुडेन समुह्यमानश्चक्रायुधोऽभ्यगमदाशु यतो गजेन्द्रः॥ 31 ॥

अर्थ– उपर्युक्त गजराज को उस प्रकार दुखी देखकर तथा उसके द्वारा पढ़ी हुई स्तुति को सुनकर सुदर्शन चक्रधारी जगदाधार भगवान् इच्छानुरूप वेग वाले गरुड़ जी की पीठ पर सवार हो स्तवन करते हुए देवताओं के साथ तत्काल उस स्थानपर पहुँच गये, जहाँ वह हाथी था ॥ 31 ॥

सोऽन्तस्सरस्युरुबलेन गृहीत आर्त्तो दृष्ट्वा गरुत्मति हरि ख उपात्तचक्रम।
उत्क्षिप्य साम्बुजकरं गिरमाह कृच्छान्नारायण्खिलगुरो भगवान नम्स्ते॥ 32 ॥

अर्थ– सरोवर के अंदर महाबलशाली मगरमच्छ द्वारा जकड़े और दुखी उस हाथी ने आसमान में गरुड़ की पीठ पर बैठे और हाथों में चक्र लिए भगवान् विष्णु को आते हुए अपनी सूँड़ को- जिसमें उसने [पूजाके लिये] कमल का एक फूल ले रक्खा था- ऊपर उठाया और बड़ी ही कठिनता से ‘सर्वपूज्य भगवान् नारायण ! आपको प्रणाम है’, यह वाक्य कहा ॥ 32 ॥

तं वीक्ष्य पीडितमजः सहसावतीर्यसग्राहमाशु सरसः कृपयोज्जहार।
ग्राहाद विपाटितमुखादरिणा गजेन्द्रंसम्पश्यतां हरिरमूमुचदुस्त्रियाणाम॥ 33 ॥

अर्थ– लाचार हाथी को देखकर श्री हरी विष्णु, गरुड़ से नीचे उतरकर सरोवर में उतर आये और बेहद दुखी होकर ग्राह सहित उस गज को तुरंत ही सरोवर से बहार निकाल आये और देखते ही देखते अपने चक्र से मगरमच्छ के गर्दन को काट दिए और हाथी को उस पीड़ा से बहार निकाल लिया।॥33॥

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम के लाभ- Benefits of Gajendra Moksha Stotra

इस स्तोत्र के नियमित जाप से व्यक्ति को कई लाभ होते हैं, जिनमें से कुछ निम्नलिखित हैं:

  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम के नियमित जाप से व्यक्ति को भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।
  • इस स्रोत को नियमित करने से संकटों से मुक्ति मिलती है।
  • व्यक्ति को ज्ञान और आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होता है।
  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम के नियमित जाप से व्यक्ति का स्वास्थ्य और समृद्धि में वृद्धि होती है।
  • जाप करने से नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है।
  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम के नियमित जाप से घर परिवार में ख़ुशहाली बनी रहती है और सभी परिवारजान भी सुखी रहते है। 
  •  इस स्तोत्र का नियमित जाप करने से एक व्यक्ति को कर्ज से मुक्ति मिलती है और मन की शांति भी प्राप्त होती है। साथ ही किसी भी संकट से मुक्ति मिलती है।

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का जाप करने के नियम- Rules Of Chanting Gajendra Moksha Stotra

गजेंद्र मोक्ष स्तोत्रम का जाप करने के लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए:

  • स्तोत्र का जाप सुबह या शाम को करना चाहिए।
  • गजेंद्र मोक्ष स्तोत्र का जाप करने से पहले स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र पहनना चाहिए।
  • स्तोत्र का जाप करते समय ध्यान केंद्रित रखना चाहिए और मन को शांत रखना चाहिए।
  • जाप के दौरान भगवान विष्णु की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठना चाहिए।

निष्कर्ष

गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत एक पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन करता है। इस स्तोत्र में गजेंद्र ने भगवान की शरण में आकर अपने जीवन को बचाने के लिए प्रार्थना की है।

इस स्तोत्र के माध्यम से, हमें भगवान की महिमा और उनकी शक्ति का पता चलता है। भगवान विष्णु सारे संसार के आधार हैं, जिन्होंने इस संसार को बनाया है और जो प्रकृति का स्वरूप हैं। गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत हमें यह भी सिखाता है कि भगवान की शरण में आकर हम अपने जीवन को बचा सकते हैं। भगवान हमारी रक्षा करते हैं और हमें संकटों से बचाते हैं।

इस स्तोत्र का पाठ करने से हमें भगवान के प्रति श्रद्धा और विश्वास बढ़ता है, और हमें अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन करने में मदद मिलती है। गजेंद्र मोक्ष स्त्रोत एक पवित्र और शक्तिशाली स्तोत्र है, जो हमें भगवान की महिमा का वर्णन करता है और हमें उनकी शरण में आकर अपने जीवन को बचाने के लिए प्रेरित करता है।

Sapta Chiranjeevi Mantra Lyrics: सप्त चिरंजीवी मंत्र हिंदी अर्थ सहित

सप्त चिरंजीवी मंत्र (Sapta Chiranjeevi Mantra) एक शक्तिशाली और पवित्र मंत्र है जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित आठ अमर व्यक्तियों की आराधना के लिए उपयोग किया जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, हम सभी के बीच ऐसे आठ व्यक्ति मौजूद है जो युगों से अभी तक जीवित है।

आपने भी कभी न कभी बड़े बुजुर्गों के मुँह से इन चिरंजीवियों के बारे में सुना होगा और सप्त चिरंजीवी मंत्र भी सुना होगा। तो आज हम जानते है इस सप्त चिरंजीवी मंत्र और उसके पीछे के अर्थ के बारे में। पुराणों के अनुसार पृथ्वी पर ऐसे आठ व्यक्ति हैं, जो चिरंजीवी हैं। यह सब किसी न किसी वरदान या अभिशाप की देंन है और यह सभी चिरंजीवी वचनों से बंधे हुए हैं। यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र

योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियां इनमें विद्यमान है। सनातन धर्म में सप्त चिरंजीवी को पृथ्वी के सात महामानव कहा गया है, क्योंकि इन आठ व्यक्तियों के अलावा किसी भी व्यक्ति के पास अमरता का वरदान नहीं है।

इन आठ व्यक्तियों को सप्त चिरंजीवी कहा जाता है, जिसका अर्थ है “सात अमर व्यक्ति”।जिसमें अश्वत्थामा, महाबलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, और परशुराम शामिल है। इनके साथ ही आठवें चिरंजीवी के रूप में ऋषि मार्कण्डेय भी शामिल है। इस मंत्र का महत्व यह है कि यह व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है, साथ ही साथ स्वास्थ्य, धन, और समृद्धि भी प्राप्त होती है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र क्या है ?- What is Sapta Chiranjeevi Mantra?

सप्त चिरंजीवी मंत्र एक शक्तिशाली और पवित्र मंत्र है जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित आठ अमर व्यक्तियों की आराधना के लिए उपयोग किया जाता है। यह मंत्र व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति, स्वास्थ्य, धन, और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है। सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित किया जाता है।

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमांश्च विभीषणः ।
कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरंजीविनः ॥1

सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम् ।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित ॥2

अर्थ– अश्वत्थामा, महाबलि, वेद व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य, और परशुराम – ये सात व्यक्ति अमर हैं, चिरंजीवी हैं। [1]

यदि इन सात महापुरुषों और आठवे ऋषि मार्कण्डेय का प्रतिदिन स्मरण किया जाए तो शरीर के सारे रोग समाप्त हो जाते है और 100 वर्ष की आयु प्राप्त होती है। [2]

इस सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप प्रतिदिन करने से व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति, स्वास्थ्य, धन, और ज्ञान प्राप्त होता है। यह मंत्र व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से बचाता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित करता है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र जप के लाभ- Benefits of Chanting Sapta Chiranjeevi Mantra

ऐसा माना जाता है कि सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप करने से साधक को कई लाभ मिलते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इससे आध्यात्मिक विकास, आंतरिक शांति और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता बढ़ती है।

इसके अलावा, भक्त अक्सर ईश्वर के साथ गहरे संबंध और जीवन में स्पष्टता और उद्देश्य की बढ़ी हुई भावना का अनुभव करते हैं। मंत्र के कंपन मानस के माध्यम से प्रतिध्वनित होते हैं, जिससे ब्रह्मांड व्यवस्था के साथ एक समाज का भी भला होता है।

जीवन की कठिनाइयों में, जहां नकारात्मकता भरपूर मात्रा में हैं और कठिनाइयां हमारे जीवन में लिये संकल्प की परीक्षा लेती हैं, सप्त चिरंजीवी मंत्र आशा और शक्ति और सकारात्मक ऊर्जा की किरण के रूप में खड़ा है।

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यह अमर सत्ताओं के कालातीत ज्ञान को समेटे हुए है तथा आध्यात्मिक पथ पर साधकों को सांत्वना और मार्गदर्शन प्रदान करता है।

जैसे-जैसे हम आत्म-खोज और उत्कर्ष की अपनी यात्रा पर आगे बढ़ रहे हैं, आइए हम इस पवित्र मंत्र की परिवर्तनकारी शक्ति का उपयोग करें और अपने भीतर सुप्त दिव्यता को जागृत करें।

यह ध्यान में रखना चाहिए की मंत्र का वास्तविक सार केवल शब्दों का उच्चारण करने में नहीं, बल्कि उसके उच्चारण में निहित है, भक्ति की गहराई और दिल की ईमानदारी में।

प्रत्येक अक्षर की ध्वनि में, हम सप्त चिरंजीवी मंत्रा से सन्निहित शाश्वत सत्यों के साथ एकता प्राप्त करें, तथा उनका आशीर्वाद हमारे ज्ञानोदय के मार्ग को प्रकाशित करे।

सप्त चिरंजीवी मंत्र के जाप करने से एक व्यक्ति को कई लाभ होते हैं, जिनमें से कुछ लाभ इस प्रकार हैं:

  • ध्यात्मिक शक्ति और ज्ञान प्राप्त होता है।
  • स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त होती है।
  • धन और समृद्धि प्राप्त होती है।
  • नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है।
  • सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित किया जाता है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र के जाप के नियम

इस मंत्र के जाप के नियम लिए निम्नलिखित नियमों का पालन करना चाहिए –

  • इस मंत्र का जाप हर रोज सुबह और शाम को करना चाहिए।
  • जाप करने से पहले स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र पहनना चाहिए।
  •  जाप करते समय ध्यान केंद्रित रखना चाहिए और मन को शांत रखना चाहिए।
  •  जाप के दौरान भगवान की तस्वीर या मूर्ति के सामने बैठना चाहिए।
  •  जाप करने के बाद प्रार्थना करनी चाहिए और भगवान को धन्यवाद देना चाहिए।

सप्त चिरंजीवी मंत्र में बताये गए चिरंजीवी कौन है?- Who are the Chiranjeevis mentioned in Sapta Chiranjeevi Mantra?

1. अश्वत्थामा

महाभारत का उल्लेख बिना अश्वत्थामा के अधूरा है जो गुरु द्रोण के पुत्र थे। अश्वत्थामा जो 11 रुद्र अवतारों में से एक थे। अश्वत्थामा को भी अमरता का वरदान प्राप्त हुआ था। गुरु द्रोण पुत्र की कामना करते थे और भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तपस्या की, जिन्होंने उन्हें पुत्र प्रदान किया।

अश्वत्थामा के माथे पर एक मणि थी जो उसे मनुष्यों से नीचे की किसी भी प्राणी के से सुरक्षा प्रदान करती थी, और हथियारों, भूख, और बीमारियों से उसे प्रतिरक्षा देती थी। लेकिन जैसे-जैसे अश्वत्थामा बड़े हुए वे दुर्योधन के मित्र बन गए और सत्ता की प्यास से प्रेरित होकर महाभारत में कौरवों का पक्ष लिया। कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान उनकी भावनाओं से प्रेरित होकर की गई कार्यवाहियों के कारण कई ग़लतियां हुई। उन्होंने अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा पर आक्रमण किया जो गर्भवती थी

उन्हें दंडित करने के लिए भगवान कृष्ण ने अश्वत्थामा के माथे से मणि को हटा दिया और उन्हें श्राप दिया कि उनकी चोट कभी ठीक नहीं होगी। उनके पूरे शरीर को कोड से ग्रस्त कर दिया, जो मवाद और घावों से भरा रहेगा इसके अलावा भगवान कृष्ण ने आदेश दिया कि अश्वत्थामा अपने जीवन में दुखों से गुज़रेगा और उसकी स्थिति के कारण कोई भी उसे मदद नहीं करेगा या उसे भोजन या आश्रय प्रदान नहीं करेगा।

2. महाबली

महाबली, जिन्हें बली के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में एक प्रसिद्ध दानव रहा है। वे तीन लोकों के शासक है। इन्द्रदेव,जो देवताओं के राजा है, बली की सर्वोच्चता से ईर्ष्यालु और अहंकारी हो गए।

दुखी होकर इन्द्र महाबली को हराने के लिए भगवान विष्णु की शरण ली। इंद्र की प्रार्थना का जवाब देते हुए भगवान विष्णु ने वामन रूप में अवतार लिया। बली के पास पहुंचकर वामन ने विनम्रतापूर्वक 4 कदमों में जितनी भूमि उन्हें मिल सके उतनी भूमि मांगी।

सप्त चिरंजीवी मंत्र

बली ने वामन की क़द-काठी को कम समझते हुए तुरंत सहमति दे दी। केवल 3 कदमों में वामन ने पूरे तीन लोकों को समाहित कर दिया। चूंकि बली ने 4 कदमों का वादा किया था, उसके पास देने के लिए कोई भूमि नहीं बची। जब उनसे चौथे क़दम के बारे में पूछा गया तो बली ने अपनी निष्ठा से अपने सिर को अर्पण कर दिया।

बली की सच्ची निष्ठा से प्रेरित होकर भगवान विष्णु ने उन्हें अमरता का वरदान दिया। हालाँकि उन्हें पाताल लोक में निर्वासित कर दिया गया था। बली को हर साल एक बार अपने प्रजा मिलने का आशीर्वाद मिला, इस मुलाक़ात का त्योहार ओनम के रूप में मनाया जाता है।

3. ऋषि व्यास

हम हर साल गुरु पूर्णिमा मनाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह दिन महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। पराशर और सत्यवती के पुत्र वेदव्यास, जो महाभारत के लेखक हैं बुद्धिमत्ता यान ओ दृष्टि का प्रतिक है। संस्कृत में वेदव्यास का अर्थ है, वह जो वेदों का वर्गीकरण करता है। वेदव्यास को भगवान विष्णु के अवतार में से एक माना जाता है ।

विष्णु पुराण के अनुसार हर युग में वेदों के संकलनकर्ता को वेदव्यास की उपाधि दी जाती है । और महर्षि वेदव्यास 24वे है। ऐसा माना जाता है कि वेदव्यास ने तीन युवकों को देखा है। वे त्रेतायुग के अंत में पैदा हुए थे। द्वापर-युग की पूरी अवधि देखी, और कलियुग के शुरुआती दिनों में जीवित रहे। इस अवधि के बाद उनका भाग्य रहस्यमय हो गया।

कई लोग मानते हैं कि वेदव्यास कभी मरे ही नहीं और अब भी अमर है। कुछ यह भी सुझाव देते हैं कि दुनिया की हिंसा और बुराई से निराश होकर वेदव्यास उत्तरी भारत के एक छोटे से गाँव में चले गए जहाँ वे अब भी निवास करते हैं।

4. हनुमान

जैसे अश्वत्थामा महाभारत के एक महान पात्र हैं, वैसे ही हनुमान रामायण के सबसे बहादुर नायक हैं। भगवान राम के सच्चे भक्त हनुमान का भाग्य था कि वे उनके साथ ही रहे। जब रावण ने माता सीता का अपहरण किया और उन्हें अपने साथ लंका लेके आया, तो भगवान राम बहुत दुखी थे। क्योंकि लंका दूर थी और यात्रा कठिन थी। हालाँकि हनुमान ने अपनी उड़ान की क्षमता के साथ इस कठिन यात्रा को सफलतापूर्वक पूरा किया। और माता सीता को रावण के महल के अशोक वाटिका में पाया।

हनुमान ने कैसे अमरता प्राप्त की इसके बारे में कई सिद्धांत थे, कुछ शास्त्रों के अनुसार जब हनुमान ने माता सीता को ढूंढा और उन्हें बताया कि वह भगवान राम के मित्र हैं, तो माता सीता ने अपनी खुशी और आभार में उन्हें अमरता का वरदान दिया।

इसके अतिरिक्त जब रामायण के पात्रों को मोक्ष प्राप्त हुआ तो हनुमान ने देवताओं से अनुरोध किया कि वे उन्हें पृथ्वी पर रहने दें जब तक भगवान राम का नाम गाया जाता रहे। इसलिए आज भी जब सच्चे भक्त भगवान राम का नाम जपते हैं तो हनुमान को उपस्थित माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि जब भी राम कथा का आयोजन होता है तो हनुमान सबसे पहले पहुँचते हैं, और सबसे और सबसे बाद में जाते हैं।

एक अन्य सिद्धांत के अनुसार रावण को हराने के बाद लोगों ने हनुमान से उनकी भगवान राम के प्रति निष्ठा साबित करने को कहा। जवाब में हनुमान ने अपने सीने को फाड़ कर दिखाया कि भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण उनके दिल में निवास करते हैं। हनुमान के प्रेम और सच्ची निष्ठा से प्रभावित होकर भगवान राम ने उन्हें अमरता का वरदान दिया।

5. विभीषण

क्या आप रामायण के दो प्रसिद्ध भाइयों को जानते हैं, रावण और विभीषण। जहां रावण को सत्ता, लालच, और धोखे ने बर्बाद कर दिया, वहीं विभीषण अपनी ईमानदारी और अच्छाई के कारण अमर हो गए। विभीषण, रावण के छोटेभाई थे।

जब रावण ने माता सीता का अपहरण किया और उसे लंका लाया तो सबसे पहले विभीषण ने आवाज़ उठायी इस कार्य को अनैतिक बताते हुए। हालाँकि रावण ने उनकी सलाह को नज़रअंदाज़ कर दिया। अंततः ईमानदारी की विजय में विश्वास करते हुए विभीषण ने भगवान राम की मदद करने का निर्णय लिया। उन्होंने माता सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

भगवान राम और वानर सेना की मदद की । विभीषण ने यह दिखाया कि हमेशा से ही कार्य करने का विकल्प होता है। युद्ध के बाद विभीषण को लंका का राजा बनाया गया। उन्हें अमरता का वरदान दिया गया था कि वे लंका के लोगों को वफ़ादारी, सही आचरण, और धर्म के मामलों में लगातार मार्गदर्शन कर सके।

6. कृपाचार्य

कृपाचार्य, महाभारत के महत्वपूर्ण पात्रों में से एक है और इसके कई कारण हैं। उन्होंने युवा राजकुमारों को युद्ध और युद्धकला की तकनीक सिखायी। कृपाचार्य की विशिष्टता उनकी असाधारण उत्पत्ति में निहित है।

वे मानव गर्भ से भी जन्मे थे। आश्चर्यजनक रूप से उनके जन्म का कारण उनके पिता के वीर्यं का धरती पर गिरना था, जिससे वे महाभारत के एक अद्वितीय और उल्लेखनीय पात्र बने। हालाँकि महाभारत में अन्य पात्र भी असामान्य जन्म लेते हैं।

कृपाचार्य की विशेषता उनके चरित्र और सिद्धांतों में निहित है। कृपाचार्य अपनी निष्पक्षता और निष्ठा के लिए जाने जाते थे। और किसी भी प्रकार के पक्षपात को नापसंद करते थे। कुरुक्षेत्र युद्ध में कौरवों के पक्ष के निरर्थकता को समझते हुए भी वे उनके प्रति वफ़ादार बने रहे।

यह वफ़ादारी कोरवों के प्रति उनके आभार से उत्पन्न हुई जिन्होंने उन्हें जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं प्रदान की थी। उनकी निष्पक्ष और धर्मयुद्ध प्रवृत्ति ने भगवान कृष्ण को प्रभावित किया जिन्होंने उन्हें अमरता का वरदान दिया।

7. भगवान परशुराम

भगवान परशुराम, भगवान विष्णु के छठे अवतार, को सबसे विनाशकारी अवतारों में से एक माना जाता है। वे अत्यधिक कुशल योद्धा है। और सभी अस्त्रों शस्त्रों और दिव्य हथियारों में पारंगत है। ब्राह्मण परिवार में जन्में परशुराम को संसार से सभी बुराईयों को हटाने के लिए प्रेरित माना जाता है ।

यह भी माना जाता है कि परशुराम अमर है और अब भी इस संसार में मौजूद हैं। कल्कि पुराण के अनुसार, कलियुग के अंत में भगवान विष्णु कल्कि के रूप में अवतरित होंगे और परशुराम एक गुरु के रूप में पुनः उभरेंगे। इस भूमिका में भी कल्कि अवतार को अस्त्रों, शस्त्रों, और दिन में हथियारों के उपयोग में मार्गदर्शन करेंगे जिस इससे वे संसार से सभी बुराइयों का उन्मूलन कर सके।

8. ऋषि मार्कण्डेय

शिव और विष्णु दोनों के भक्त, ऋषि मृकंडु, भृगु वंश के थे। मृकंदु और उनकी पत्नी मरुदमती ने शिव से पुत्र प्राप्ति का वरदान मांगा। उन्हें विकल्प दिया गया था कि या तो उन्हें अल्पायु पुत्र का आशीर्वाद दिया जाए, या कम बुद्धि वाले लंबे जीवन वाले बच्चे का आशीर्वाद दिया जाए। मृकंदु ने पहले विकल्प को चुना और उन्हें एक अनुकरणीय पुत्र मार्कंडेय का आशीर्वाद मिला, जिनकी 16 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई।

मार्कण्डेय शिव के बहुत बड़े भक्त थे। अपनी मृत्यु के दिन भी वह शिवलिंग की पूजा करते रहे। शिव के प्रति समर्पण के कारण, ‘मृत्यु के देवता’ यम के पास मार्कंडेय के जीवन को लेने का दिल नहीं था। तब यमराज, मार्कंडेय के प्राण लेने के लिए स्वयं आए, और युवा ऋषि के गले में अपना फंदा डाल दिया। फंदा गलती से शिवलिंग के चारों ओर उतर गया, शिव क्रोध में उभरे और यम पर हमला किया।

बाद में, शिव ने यम को पुनर्जीवित किया और उन्हें अमरता का आशीर्वाद दिया। इसलिए, शिव को कालान्तक, मृत्यु का विनाशक, के नाम से जाना जाता था। साथ ही भगवान शिव ने ऋषि मार्कंडेय को सदा ही जीवित रहने का वरदान प्रदान किया। “महामृत्युंजय मंत्र” की रचना भी ऋषि मार्कंडेय ने स्वयं ही की थी।

निष्कर्ष

सप्त चिरंजीवी मंत्र एक शक्तिशाली और पवित्र मंत्र है जो हिंदू पौराणिक कथाओं में वर्णित आठ अमर व्यक्तियों की आराधना के लिए उपयोग किया जाता है। हिंदू पौराणिक कथाओं में आठ व्यक्तियों का वर्णन है जो अमर हैं और पृथ्वी पर रहते हैं। ये व्यक्ति विभिन्न वरदानों, शापों और वचनों से बंधे हुए हैं और दिव्य शक्तियों से संपन्न हैं।

यह मंत्र व्यक्ति को आध्यात्मिक शक्ति, स्वास्थ्य, धन, और ज्ञान प्राप्त करने में मदद करता है। सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप करने से व्यक्ति को नकारात्मक ऊर्जा से बचाव होता है और सकारात्मक ऊर्जा को आकर्षित किया जाता है।

इस मंत्र का नियमित जाप करने से व्यक्ति को अपने जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त हो सकती है। अतः, सप्त चिरंजीवी मंत्र का जाप करना प्रत्येक व्यक्ति के लिए लाभदायक हो सकता है।

सप्त चिरंजीवी मंत्र की महिमा और शक्ति को समझने से हमें अपने जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में मदद मिल सकती है। अतः, हमें इस मंत्र का नियमित जाप करना चाहिए और अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रयास करना चाहिए।

Siddha Kunjika Stotram in Hindi: माँ दुर्गा का चमत्कारी सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

माँ दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए सिद्ध कुंजिका स्तोत्र (Siddha Kunjika Stotram in Hindi) का जाप करना बहुत ही लाभकारी माना जाता है| अक्टूबर के माह में नवरात्रि प्रारम्भ हो जाएगी| नवरात्रि के नौ दिनों को बहुत ही पवित्र माना जाता है इसलिए इन दिनों में सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का जाप करने से भक्तों को मां दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त होता है| सिद्ध कुंजिका स्तोत्र को अति कल्याणकारी माना जाता है|

पौराणिक मान्यता है कि इस सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का जाप करने से मनुष्य को जीवन में चल रही समस्त परेशानियां तथा कष्टों से मुक्ति मिल जाती है| इस मंत्र में बीज समावेश होते है एवं बीज किसी भी मंत्र की शक्ति माने जाते है| कहा जाता है कि यदि आपको दुर्गा सप्तशती का पाठ करना कठिन लग रहा हो तो आप सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ कर सकते है|

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नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि – Siddh Kunjika Mantra Lyrics in Sanskrit

॥ सिद्धकुञ्जिकास्तोत्रम् ॥

॥ शिव उवाच ॥

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥1॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥

॥ अथ मन्त्रः ॥

ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालयज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वलहं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥

॥ इति मन्त्रः ॥

नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥2॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥5॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥6॥

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं।
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥7॥

पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥8॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यंगोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुञ्जिकाया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥

॥ इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
॥ ॐ तत्सत् ॥