Bhaum Pradosh Vrat Katha: भौम प्रदोष व्रत कथा

हिन्दू धर्म में भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) को सुनने का बहुत ही बड़ा महत्व बताया गया है| हिन्दू धर्म तिथियों का बहुत को बहुत ही महत्वपूर्ण तथा शुभ माना जाता है| मुख्य रूप से प्रदोष तिथि का व्रत तथा प्रदोष व्रत की कथा भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए की जाती है| जब यह प्रदोष व्रत की तिथि मंगलवार के दिन आती है तो इसे भौम प्रदोष व्रत भी कहा जाता है| भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) के बिना यह व्रत पूर्ण नहीं माना जाता है| हिन्दू धर्म में भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) को कहना एवं सुनना बहुत ही पुण्यदायी माना गया है|

भौम प्रदोष व्रत कथा

माना जाता है कि जो भी इस भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) को सच्ची श्रद्धा से पढ़ता है तो उस भक्त निश्चित रूप से ही भगवान शंकर का आशीर्वाद प्राप्त होता है तथा उस व्यक्ति के जीवन सभी प्रकार दुःख व कष्ट दूर हो जाते हैं| भौम प्रदोष व्रत की तिथि के दिन भगवान शिव की पूजा करके भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) का जाप करना चाहिए| तो आइये आज इस लेख के माध्यम से भौम प्रदोष व्रत कथा (Bhaum Pradosh Vrat Katha) के बारे में जानेंगे|

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भौम प्रदोष व्रत की कथा –

बहुत ही पुराने समय की बात है| किसी गाँव में एक वृद्ध महिला रहती थी| उसका केवल एक ही पुत्र था| वह वृद्ध महिला भगवान हनुमान जी की बहुत बड़ी भक्त थी| वृद्ध महिला प्रत्येक मंगलवार के दिन हनुमान जी के लिए उपवास करती तथा उन्हें भोग भी लगाती थी| इस दिन वह महिला न तो घर को लीपती थी और न ही मिट्टी को खोदती थी| एक बार हनुमान अपनी इस भक्त की परीक्षा लेने का विचार किया| जिसके पश्चात हनुमान जी एक साधु का वेश धारण करके उस वृद्ध महिला की कुटिया के बाहर पहुंचे|

वृद्ध महिला की कुटिया के बाहर जाकर साधु का रूप बनाए हनुमान जी ने बोला – हे कोई ऐसा हनुमान भक्त ! जो हमारी इच्छा को पूर्ण कर सके? जैसे ही साधु की आवाज़ उस वृद्ध महिला के कानों में पड़ी| वह तुरंत ही बाहर चली आई तथा उन साधु को प्रणाम करके बोली – आज्ञा कीजिये महाराज | उस वृद्ध महिला के ऐसा बोलने पर साधु वेशभूषा में स्थित हनुमान जी ने कहा कि हे देवी ! मैं भूखा हूँ, मुझे भोजन करना है| इसलिए मेरे लिए थोड़ी-सी जमीन को लीप दो| साधु के ऐसा कहने पर वृद्ध महिला दुविधा में पैड गयी क्योंकि उस दिन मंगलवार था|

भौम प्रदोष व्रत कथा

वृद्ध महिला ने कहा कि हे महाराज ! लीपने तथा मिट्टी खोदने के अतिरिक्त मुझे कोई अन्य आज्ञा दे| मैं उसे अवश्य ही पूरी करुँगी| वृद्ध महिला से तीन बार प्रतिज्ञा करने के बाद साधु ने कहा – तू अपने बेटे को बुला| मैं उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन बनाऊंगा| साधु के ऐसा कहते ही वृद्ध महिला घबरा गई किन्तु वह वचनबद्ध थी| महिला ने अपने बेटे को बुलाया व उन साधू सौंप दिया| इसके पश्चात हनुमान जी ने महिला के द्वारा अपने उसके पुत्र को पेट के बल लिटाया तथा उसकी पीठ पर आग जलवाई|

थोड़ी देर के बाद ही साधु ने वृद्ध महिला को बुलाया और कहा कि मेरा भोजन तैयार हो गया है| अपने पुत्र को भी बुला ताकि वो भी भोग लगा ले| इस पर वृद्ध महिला ने कहा कि हे महाराज ! उसका नाम लेकर मुझे कष्ट ना दे| लेकिन साधु के ना मानने पर उसके अपने पुत्र को आवाज़ लगाईं| आवाज़ लगाते ही उसका बेटा उसके पास आ गया| अपने पुत्र को जीवित देखकर वह महिला आश्चर्य में पड़ गयी तथा साधु के चरणों में गिर गयी| उस समय हनुमान जी अपने वास्तविक रूप में आ गए व वृद्ध महिला को उसकी भक्ति के लिए आशीर्वाद दिया|

Utpanna Ekadashi Vrat Katha: उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा: हिन्दू धर्म में एकादशी व्रत को बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है| पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| मान्यताओं के अनुसार इस एकादशी में भगवान विष्णु के साथ ही देवी एकादशी की पूजा भी की जाती है| यह उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत तथा पूजन भगवान श्री विष्णु को समर्पित माना जाता है|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

इस उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के बारे में एक मान्यता है जो कि काफी पुराने समय से चली आ रही है कि मार्गशीर्ष महीने के 11 वे दिन भगवान विष्णु के शरीर से एक देवी उत्पन्न हुई थी| इसलिए इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| आज हम लेख के माध्यम से आपको उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के महत्व एवं उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा (Utpanna Ekadashi Vrat Katha) के बारे में आपको बताएँगे|

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उत्पन्ना एकादशी का महत्व – Importance Of Utpanna Ekadashi

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे भगवन ! मैंने कार्तिक शुक्ल एकादशी जिसे प्रबोधिनी एकादशी भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा

युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण बोले कि मार्गशीर्ष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से जाना जाता है| शंखोद्धार तीर्थ स्थान में स्नान करके भगवान के दर्शन करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, वह उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत करने के समान होता है| माना जाता है कि उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) व्रत करने वाले व्यक्ति को चोर, निंदक अथवा झूठ बोलने वाले लोगों से दूर रहना चाहिए| इस उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा (Utpanna Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही महत्व बताया है| जिसे अब मैं तुमसे कहूंगा|

उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा – Utpanna Ekadashi Vrat Katha

सतयुग काल में एक मुर नाम का राक्षस उत्पन्न हुआ| वह इतना शक्तिशाली था कि दैत्य इंद्र, आदित्य, वसु, वायु तथा अग्नि आदि सभी देवताओं को पराजित कर दिया था| उसके राक्षस के आतंक से परेशान होकर सभी देवतागण भगवान शिव के पास गए तथा उन्हें पूरा वृतांत बताते हुए कहा कि हे महादेव ! मुर दैत्य से भयभीत होकर देवता मृत्यु लोक में फिर रहे है| इस भगवान शिव ने कहा – हे देवताओं ! आप सभी इस सृष्टि के पालनहार, अपने भक्तों के दुखों को दूर करने वाले भगवान विष्णु की शरण में जाओ|

इसमें वह आपकी सहायता अवश्य करेंगे| भगवान शिव के कहने पर सभी देवता भगवान विष्णु के पास सहायता के लिए पहुंचे| भगवान विष्णु को शयन करते हुए देखकर सभी देवतागण उनकी स्तुति करने लग गए तथा उनसे कहा कि हे देवताओं की रक्षा करने वाले मधुसूदन ! आपको नमस्कार है| कृपया आप हमारी रक्षा करे| हम सभी देवता मुर राक्षस से भयभीत होकर आपकी शरण में आये है| आप ही इस सम्पूर्ण जगत के पालनकर्ता तथा संहार करने वाले है| आप ही सभी जीवो को शांति प्रदान करते है| आकाश और पाताल भी आप ही है| आप बिना एक संसार में चर तथा अचर कुछ भी नहीं है|

हे प्रभु ! राक्षसों ने हमे पराजित करके स्वर्ग से बाहर भगा दिया है| हम सभी देवता उन असुरों से भयभीत होकर इधर-उधर भागते फिर रहे है| कृपया उनसे हमारी रक्षा करे| इंद्र देव को भयभीत देखकर भगवान विष्णु ने उनसे पूछा कि हे इन्द्रदेव ! ऐसा कौन मायावी राक्षस आया है जिसने सभी देवताओं को पराजित कर दिया, वह कितना बलशाली है, कहाँ है तथा किसकी शरण में है| यह सब मुझे बताओ| भगवान विष्णु के ऐसा कहने पर इंद्रदेव ने कहा हे भगवन ! प्राचीन काल में एक नाडीजंघ नामक राक्षस था| यह राक्षस उसी का पुत्र है तथा इसका नाम मुर है|

इसने सभी देवताओं को पराजित कर स्वर्ग से बाहर निकल दिया तथा अब स्वयं स्वर्ग लोक पर अपना अधिकार करके बैठा है| उसने इंद्र, अग्नि, यम, वायु, चंद्रमा, आदि सबके स्थान पर अधिकार कर लिया है| वह स्वयं ही सूर्य बनकर प्रकाश कर रहा है व स्वयं ही मेघ बना हुआ है| हे प्रभु ! हम सभी आपसे विनती करते है कि राक्षस का वध करके देवताओं को अजेय बनाइये|

देवताओं द्वारा यह वचन सुनकर भगवान विष्णु ने कहा – हे देवताओं ! मैं अतिशीघ्र ही उस असुर का संहार करूँगा| तुम सभी चन्द्रावती नगर जाओं| इसी के साथ भगवान विष्णु के सहित सभी देवताओं में चन्द्रावती नगर की ओर प्रस्थान किया| जब सभी देवता भगवान विष्णु के साथ वहां पहुंचे तो उन्होंने देखा कि राक्षस मुर सेना सहित उनकी प्रतीक्षा कर रहा था| युद्धभूमि में उस असुर मुर की गर्जना से सभी देवता भयभीत होकर इधर-उधर भागने लगे| जब भगवान विष्णु युद्धभूमि में आए तो सभी राक्षस उन पर भी आक्रमण करने लग गए|

किन्तु भगवान विष्णु ने सर्प की भांति उन सभी असुरों को अपने बाणों से मार दिया| युद्ध में बहुत सारे दैत्य मारे गए लेकिन मुर बच रहा| वह अविचल भाव से भगवान से युद्ध कर रहा था| भगवान विष्णु के द्वारा चलाए गए बाणों से पूरा शरीर छिन्न- भिन्न हो गया किन्तु इसके पश्चात भी यह युद्ध करता रहा| भगवान विष्णु तथा राक्षस मुर का युद्ध 10 हज़ार वर्षों तक चलता रहा लेकिन फिर भी वह राक्षस नहीं हारा| इतने समय तक मुर से युद्ध करने की वजह से भगवान विष्णु थककर बद्रिकाश्रम चले गए|

उस स्थान पर एक हेमवती नामक बहुत ही सुन्दर गुफा स्थित थी| माना जाता है कि यह गुफा लगभग 12 योजन लम्बी तथा केवल इसका एक ही द्वार था| भगवान विष्णु उस गुफा में जाकर योगनिद्रा की गोद में जाकर सो गए| वह मुर राक्षस भी भगवान विष्णु के पीछे-पीछे उस गुफा में आ गया| भगवान विष्णु को सोया हुआ देख वह राक्षस भगवान को मारने के उद्यत हुआ| उसी क्षण भगवान विष्णु के शरीर से कांतिमय रूप वाली एक देवी प्रकट हुई| देवी ने उस असुर को ललकारा तथा उससे युद्ध करके उसे तत्काल ही मार दिया|

जब भगवान विष्णु अपनी योगनिद्रा से जागे तो सारी बातें जानने के पश्चात भगवान विष्णु ने उन देवी से कहा कि आपने एकादशी के दिन जन्म लिया है अतः आप इस सम्पूर्ण संसार में उत्पन्ना एकादशी (Utpanna Ekadashi) के नाम से पूजित होंगी तथा जो मेरे भक्त होंगे, वह आपके भी भक्त होंगे|

Mokshada Ekadashi Vrat Katha: मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा: मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के रूप में जाना जाता है| जैसा कि आप सभी लोगों को ज्ञात है कि हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही बड़ा महत्त्व बताया गया है| लगभग हर एकादशी तिथि में भगवान श्री विष्णु की पूजा की जाती है| मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के दिन भगवान विष्णु की पूर्ण विधि-विधान से पूजा करनी चाहिए|

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा

माना जाता है कि मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तो को अपार सुख-समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है| इस दिन मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha) को पढने तथा सुनने का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है| आज हम इस लेख की सहायता से आपको मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के महत्व तथा मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बताएँगे|

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मोक्षदा एकादशी का महत्व – Importance of Mokshada Ekadashi

धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे भगवन ! मैंने मार्गशीर्ष कृष्ण एकादशी जिसे मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे  मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष एकादशी में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है|

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इस पर भगवान श्रीकृष्ण बोले – हे युधिष्ठिर मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) कहा जाता है| माना जाता है कि मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) व्रत को करने मोक्ष की प्राप्ति एवं चिंतामणि की भांति ही सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती है| इसकी मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) व्रत की सहायता आप अपने पितरों के सभी दुखों को भी खत्म कर सकते है| अब मैं तुम्हे मोक्षदा एकादशी व्रत कथा (Mokshada Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बताऊंगा| जिसको मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) के दिन पढ़ना बहुत ही शुभ माना जाता है|

मोक्षदा एकादशी व्रत कथा – Mokshada Ekadashi Vrat Katha

बहुत ही पुराने समय की बात है एक गोकुल नामक शहर में वैखानस नाम के राजा का शासन था| माना जाता है कि उस राजा के राज्य में चारों वेदों के बहुत बड़े ज्ञाता ब्राह्मण रहते थे| वह राजा अपनी प्रजा के प्रति बहुत ही दयालु था एवं उनका पुत्रवत पालन करता है| एक बार रात्रि के समय राजा को एक स्वप्न आया| जिसमे राजा ने यह देखा कि उनके पिता नरक में है| यह देखकर राजा को बहुत आश्चर्य हुआ| सुबह होते ही राजा अपने विद्वान ब्राह्मणों के साथ गया तथा उन्हें अपने स्वप्न के बारे में बताया|

राजा ने ब्राह्मणों से कहा कि उन्होंने अपने पिता को नरक में कष्ट सहते हुए देखा तथा उन्होंने मुझसे कहा है कि हे पुत्र ! मैं नरक में हूँ| मुझे यहाँ से मुक्त करवाओ| जिस समय मैंने अपने पिता के द्वारा यह सुना उस समय से ही में बहुत परेशान हो रहा हूँ| मेरे मन भी अशांत है| उस स्वप्न के बाद से ही मुझे इस राज्य, पुत्र, स्त्री, हाथी, घोड़े, धन आदि कहीं पर भी सुख प्रतीत नहीं हो रहा है| कृपया मुझे बताइए मैं क्या करूँ? राजा ने उन सभी से कहा कि हे ब्राह्मण देवताओं ! इस दुःख के कारण मेरा सम्पूर्ण शरीर भीतर से जल रहा है| मुझ पर कृपा करके तप, व्रत, दान आदि कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मेरे पिता को मुक्ति मिल सके|

राजा ने कहा कि ऐसे पुत्रों का जीवन पूर्ण रूप से व्यर्थ है जो अपने माता-पिता का उद्धार नहीं कर सकते है| जिस प्रकार एक चंद्रमा सम्पूर्ण जगत में प्रकाश कर देता है, उसी प्रकार एक सर्वोत्तम पुत्र जो कि अपने माता पिता का उद्धार कर सकता है, वह हजारों मूर्ख पुत्रों से बेहतर है| ब्राह्मणों ने राजा कहा कि हे मान्यवर ! यहाँ पास ही भूत,वर्तमान तथा भविष्य के ज्ञाता पर्वत ऋषि का आश्रम है| वह आपकी समस्या को हल करने में आपकी सहायता अवश्य करेंगे|

ब्राह्मणों के कहने पर राजा उन मुनि के आश्रम में पहुंचे| उस आश्रम बहुत सारे ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे थे| उसी स्थान पर पर्वत ऋषि भी विराजमान थे| राजा ने पर्वत ऋषि को साष्टांग दंडवत प्रणाम किया| ऋषि ने राजा से उनकी कुशलता के बारे में पूछा| जिसका उत्तर देते हुए राजा ने कहा कि आपकी कृपा से राज्य में सब कुछ कुशल मंगल है किन्तु कुछ समय से मेरे मन में अशांति हो रही है| राजा के इतना कहने पर पर्वत मुनि ने अपनी आँखे बंद की तथा भूतकाल को विचारने लगे|

कुछ ही समय के पश्चात पर्वत ऋषि ने कहा – हे राजन ! मैंने अपनी योगशक्ति के बल पर तुम्हारे पिताजी के द्वारा किये गए कर्मों के बारे में पता लगाया है| उन्होंने अपने पिछले जन्म में कामातुर होकर एक पत्नी को रति प्रदान की किन्तु सौत के कहने पर दूसरी पत्नी को ऋतुदान मांगने पर भी नहीं दिया| उनके द्वारा किये गए इसी पापकर्म के कारण ही उन्हें नरकलोक में जाना पड़ा| पर्वत मुनि के ऐसा कहने पर राजा ने उनसे इसका समाधान बताने के लिए कहा| तब मुनि ने कहा – हे राजन ! आपको अपने पिता की नरक से मुक्ति कराने के लिए मार्गशीर्ष एकादशी का व्रत करना चाहिए| 

इस एकादशी व्रत के प्रभाव से आपके पिता को नरक से मुक्ति अवश्य मिल जाएगी| पर्वत मुनि के कहने पर वह राजा अपने महल आया एवं उनके कहे अनुसार ही अपने पूरे परिवार के साथ मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) का व्रत किया तथा उसका सम्पूर्ण पुण्य अपने पिताजी को समर्पित कर दिया| इस मोक्षदा एकादशी (Mokshada Ekadashi) व्रत को करने उसके पिता को मुक्ति मिल गयी और स्वर्ग जाते हुए अपने पुत्र से कहने लगे – हे पुत्र तेरा कल्याण हो| यह कहकर स्वर्ग की चले गए|

Saphala Ekadashi Vrat Katha: सफला एकादशी व्रत कथा

पौष माह में आने वाली एकादशी को सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के नाम से जाना जाता है| सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है| इस वर्ष 2024 सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) 7 जनवरी को है| रविवार के दिन पूरे विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा की जाएगी| हिन्दू धर्म की मान्यताओं के अनुसार भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है|

सफला एकादशी व्रत कथा

सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के दिन भगवान विष्णु की पूर्ण श्रद्धा से पूजा करने पर भक्तों की समस्त परेशानियां दूर होती है| सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के दिन सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) बहुत महत्व बताया गया है| आज हम आपको इस लेख के माध्यम से आपको सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के महत्व तथा सफला एकादशी व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बताएँगे|

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सफला एकादशी का महत्व – Importance of Saphala Ekadashi

भगवान श्रीकृष्ण तथा युधिष्ठिर के बीच हो रहे संवाद में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे जनार्दन ! मैंने मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी जिसे मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे पौष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है|

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इस पर भगवान श्रीकृष्ण बोले – पौष माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)कहा जाता है| इस सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) के दिन भगवान श्री विष्णु की पूजा की जाती है| पौराणिक मान्यताओं के अनुसार सफला एकादशी (Saphala Ekadashi) व्रत को विधि-पूर्वक करना चाहिए| जिस प्रकार पक्षियों में गरुड़, नागों में शेषनाग, सभी ग्रहों में चंद्रमा तथा देवो में सबसे श्रेष्ठ भगवान श्रीनारायण है| उसी प्रकार व्रतों में सर्वश्रेष्ठ एकादशी व्रत को माना जाता है| जो भी व्यक्ति सदैव एकादशी का व्रत करता है, वह व्यक्ति मुझे प्रिय होता है|

भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि हे धर्मराज ! मैं तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण तुम्हे यह बताता हूँ कि एकादशी व्रत के अलावा मैं किसी भी अधिक से अधिक दक्षिणा प्राप्त होने वाले यज्ञ से भी प्रसन्न नहीं होता हूँ| इसलिए इस एकादशी व्रत को पूर्ण भक्ति के साथ करना चाहिए| इसी के साथ मैं तुम्हे सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के महात्म्य या सफला एकादशी व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बताऊंगा| सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)के दिन सफला एकादशी व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) करने का बहुत ही अच्छा विधान है|

सफला एकादशी व्रत कथा- Saphala Ekadashi Vrat Katha

कथा के अनुसार यह बताया गया है कि चम्पावती नामक एक नगरी में महिष्मान नामक एक राजा का शासक था| जिसके चार पुत्र थे| उन सभी पुत्रों में से सबसे बड़ा पुत्र जिसका नाम लुम्पक था, वह बहुत ही बड़ा महापापी था| वह पापी सदैव वैश्यगमन, परस्त्री तथा अन्य बुरे कार्यों में अपने पिता का धन व्यर्थ ही खर्च करता था| इसके अलावा वह सदैव ही ब्राह्मणों, वैष्णवों तथा देवताओं की निंदा करता रहता है| जैसे ही राजा महिष्मान को उनके ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक के दुष्कर्मों के बारे में ज्ञात हुआ| उसी समय राजा ने उसे दण्ड स्वरुप अपने राज्य से बाहर निकाल दिया|

अपने पिता के द्वारा राज्य से निकाल देने पर वह यह विचार करने लगा कि अब आगे क्या किया जाए | थोड़ी देर सोचने के पश्चात उसने चोरी करने का फैसला किया| अब वह दोपहर के समय वन निवास करता तथ रात्रि के समय अपने पिता के राज्य में ही लोगों का सामान चोरी करता, उन्हें परेशान करता तथा कभी-कभी तो उनकी हत्या भी कर देता था| उसके इस कुकर्म के कारण सम्पूर्ण गाँव वाले बहुत ही भयभीत रहने लगे| अब वह जंगल में रहकर पशुओ को मारकर खाने लग गया| उसे कई बार गाँव के लोगों तथा राज्य के कर्मचारियों का द्वारा पकड़ा गया किन्तु राजा के भय के कारण उसे छोड़ दिया जाता था|

सफला एकादशी व्रत कथा

जिस वन में वह निवास करता था उसे देवताओं की क्रीडास्थली के रूप में जाना जाता था| उस वन में एक बहुत ही प्राचीन पीपल का पेड़ था| जिसकी गाँव के लोग देवता के समान पूजा करते थे| वह महापापी उसी पेड़ के नीचे निवास करता था| कुछ ही समय के बाद में पौष माह में कृष्ण पक्षमी की दशमी तिथि को वस्त्रहीन होने के वजह से शीत लहर के चलते वह पूरी रात भर नहीं सो पाया| सर्दी होने के कारण उसका पूरा शरीर अकड़ गया था| सुबह होते हुए वह मूर्छित हो गया| इसके पश्चात दोपहर के समय सूर्य की किरणे पड़ने से उसकी मूर्छा दूर हुई|

इसके पश्चात वह गिरता-पड़ता हुआ भोजन की तलाश में वन में निकला किन्तु ज्यादा थका हुआ होने की वजह से वह शिकार करने में सक्षम नहीं था| इसके पश्चात वह पेड़ों से गिरे हुए फलों को उठाकर पुनः उस पीपल के वृक्ष के नीचे आ गया| अब उसने उन फलों को वृक्ष के नीचे रख कर कहा कि हे भगवान ! यह फल में आपको ही अर्पित करता हूँ| आप ही इन फलों से तृप्त हो जाइए| उस रात्रि को भी दुःख के कारण लम्पुक को नींद नहीं आई| उसके द्वारा किये गए इस उपवास तथा जागरण की वजह से भगवान भी उससे प्रसन्न हो गए तथा सम्पूर्ण जीवन में किये गए उसके सभी पाप भी नष्ट हो गए|

अगले दिन सुबह एक बहुत ही सुन्दर घोड़ा विभिन्न प्रकार की सुन्दर वस्तुओं से सजा हुआ उनके सामने आकर प्रकट हो गया| उसी समय एक आकाशवाणी हुई कि हे पुत्र ! भगवान श्री नारायण की कृपा से तुम्हारे द्वारा किये गए सभी पापों को नष्ट कर दिया गया है| अब तुम अपने पिताजी के पास जाकर राज्य प्राप्त करो| यह बात सुनते ही लम्पुक बहुत ही खुश हो गया| और तुरंत ही अपने पिता के पास चला गया| उसके पिता ने उसे सम्पूर्ण राज्य संभला दिया व स्वयं वन की ओर प्रस्थान कर गए|

अब लम्पुक भी शास्त्रों के अनुसार राज्य को संभालने लग गया| उसका सम्पूर्ण परिवार भी भगवान श्री नारायण की पूजा करने लग गया| वृद्ध होने पर उसने अपना समस्त राज्य अपने पुत्रों को सौंप दिया तथा वन में तपस्या करने के लिए चला गया तथा अंत में वैकुंठ को प्राप्त हो गया| अतः जो भी मनुष्य सफला एकादशी (Saphala Ekadashi)व्रत को करता है उसे अंत में मुक्ति प्राप्त होती है| ग्रंथों की मान्यता के अनुसार इस सफला एकादशी व्रत कथा (Saphala Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ने तथा सुनने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है|