Akshay Amar Katha Lyrics: दादाजी के चमत्कारों की अक्षय अमर कथा

इस अक्षय अमर कथा का पाठ दादाजी (संत अखारामजी) की स्तुति करने के लिए किया जाता है| अक्षय अमर कथा को सुनने व इसका जाप करने से भक्तों को दादाजी का आशीर्वाद प्राप्त होता है| इस अक्षय अमर कथा में दादाजी (संत अखारामजी) के जन्म से लेकर वर्तमान तक के सभी चमत्कारों के बारे में विस्तार से बताया गया है तो आइये पाठ करते है इस अक्षय अमर कथा का|

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अक्षय अमर कथा

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अक्षय अमर कथा हिंदी में – Akshay Amar Katha Lyrics in Hindi

|| अक्षय अमर कथा ||

श्रीगणेशजी, सरस्वतीजी, बालाजी, दादाजी, माताजी

|| सोरठा ||

प्रमथनाथ गणनाथ,प्रथम सुमिर पूजन करूं।
रिद्धि सिद्धि संगाथ, नेत्र तीन शोभा अधिक ।।

आसुतोष शिव भाल,चंद गंग संग गौरज्या।
गल मुंडन की माल,मंगलकारी सर्वदा ।।

लक्ष्मीकंत अनंत, सदा क्षीर सागर बसै।
शारद श्रीहनुमंत, कुलदेवी जगदंबिकै ।।

हे हरजी के नंद, अक्षय अमर कथा कहूं।
सब मिल करो आनंद, गुरु चरणन वंदन करूं ।।

|| मुखड़ा ||

मरुधर पावन पुण्य धाम की महिमा कहतें हैं
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को हरते हैं
पावन दादाजी नाम,जय जय परसाणा धाम

|| अंतरा ||

परसनेऊ चूरू मंडल का,एक छोटा सा ग्राम ।
ऊंचे धोरै वहां बिराजै, संत रतन अखाराम ।।

पहले धोक और दरसन है,महाबली हनुमान।
फिर दरसन दादाजी के हैं, दादा संत सुजान ।।

बदरी पीपल और खेजङी,सनमुख उगतो भान।
ऊंचे ऊंचे शिखर बने हैं, लाल सफेद निशान ।।

सांझ सबेरे आरती के शुभ, घंटे बजते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को ।।1।।

सदियों पहले इसी ग्राम में, रहते विप्र सुजान।
सदगृहस्थी संतों का सतसंग, करते थे सनमान।।

गऊ साधु सेवा में तत्पर, इष्ट राम हनुमान।
दधीचि वंश के कुलदीपक थे, श्री हरजी था नाम।।

गुणवंती लक्ष्मी सी पत्नी, शील धीर गुणवान।
गऊ ब्राह्मण निरधन दीनों को, देती वस्त्र अन्नदान।।

रघुनाथ हनुमान विप्र पर किरपा करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।2।।

भादौ कृष्ण पंचमी के दिन, उगियो सुवरण भान।
बाल रुदन तब सुणके जननी, करवाया पय पान।।

दुग्धपान करते करते ही, मुख पर थी मुसकान।
आंचल की तब ओट छुपाये, और न ले कोई जान।।

निरख निरख नित मात हरषती, कैसे करूं बखाण।
हे हनुमंता रक्षा करना, आप बङे बलवान।।

तुमने दिया है तुझ सेवा मे,अरपण करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों।।3।।

हरजी के घर पुत्र जनम, पुरवासी सुनते हैं।
परिजन पुरजन आपस मे मिल,सहज हरषतें हैं।।

मंगल गान सर्व मंगल हो,हर जन कहतें हैं।
मंगल गीत गा रहे गायक,जय जय करतें हैं।।

बंटे बधाई द्वार पिता के,झोली भरते हैं।
अन्नधन वस्त्र रजत सुवरण, पितु आज बरसते हैं।।

बुला बुला सम्मान सभी को, जी भर देते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों।।4।।

राम कृपा से श्री हरजी ने, पाई दो संतान।
पति पत्नी दोनों प्रसन्न थे, मुख पर थी मुसकान।।

नियत समय पर वेद रीत से,संस्कारों का दान।
दिया पिता ने पुत्ररत्न को, शुभ संस्कार महान।।

नामकरण संस्कार करण को,आये विप्र सुजान।
राशी नखतर सूर्य चंद्र सब,ग्रह रहे बलवान।।

बहन बेटियां परिजन पुरजन, आषिश करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।5।।

पंडितजी पंचांग देख कर ,नाम सुनाते हैं।
अक्षय नाम अमर हो जग में, यूं बतलाते हैं।।

अखाराम शुभ नाम सरल है,यह समझाते हैं।
अखा सखा हो गौवंशों का,आनंद पाते हैं।।

घुटनों के बल दौड़ दौड़, मुख मोङ दिखाते हैं।
आ महतारी गोद बैठ,जननी बहलाते हैं।।

अब रूनझुन घुंघरू की सुनने को,पैर ठुमकते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।6।।

रूनझुन की धुन सुन आंगन में, खूब विहरते हैं।
माता ने बुलवाया तो वो,दौङ निकलते हैं।।

पकङ न पाये महतारी ये,लीला रचते हैं।
झुगल्या टोपी पग पैंजनियां,हर मन जंचते हैं।।

ठुमक ठुमक चलतें हैं, नजरें तिरछी करतें हैं।
लाल लाल ओठों की शोभा, देव तरसते हैं।।

तुतलाती बोली में,जब वो राम कहतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।7।।

आठ साल के भये जनेऊ,कंधे पहनाया।
भिक्षा ले झोली भर ली,मित्रों को छिनवाया।।

पढने गये गुरु गृह गुरु ने,पढना सिखलाया।
इनका मन था राम नाम में, बाकी भुलवाया।।

राम राम मेरा मंत्र राम, हृदय में लिखवाया।
शिक्षा मेरी राम रटूं, गुरु समझ नहीं पाया।।

बङा विलक्षण बालक है,गुरु अचरज करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।8।।

त्यागी गुरुकुल की शिक्षा सब,धेनु चराते हैं।
डोली मे ले जाकर गऊयें,बंशी बजाते हैं।।

खुद ब खुद गायें चरती, सब काम भुलाते हैं।
राम राम हनुमान ध्यान की,लगन लगाते हैं।।

संग सखाओं के भोजन कर,भजन सुनाते हैं।
सांझ भये गायों को लेकर,घर लौटाते हैं।।

मंदिर मे दरसन को जाकर,सुमिरन करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।9।।

खेलन की थी उम्र सखा सब,हांक लगाते थे।
दङी गेडिया छुङा उन्हें भी,भजन सिखाते थे।।

राम ही गैंद राम ही डंडा,राम रमाते थे।
देखे राम रूप जग सारा, और मुसकाते थे।।

भोजन छोङ भजन सतसंगत, नित्य कराते थे।
जिवू बाई छोटी बहना को,कथा सुनाते थे।।

संग संग रंग भजन का,बहना को भी रंगते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।10।।

माता की आज्ञा ले अक्षय, साधु बाना धार लिया।
दिक्षा ले भगवंत गुरु से,त्याग पूरा घरबार दिया।।

डोली मे जाकर तप करते, धूणा एक धुकाय दिया।
भोजन भजन दोनों ही निशदिन,लंगर एक लगाय दिया।।

आप भजन मे मस्त रहे, भूखों को राम जिमाय रैया।
आवै सो अन्नजल पा जावै,राम रोट सब खाय रैया।।

भरा रहे भंडार धान सब,अचरज करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।11।।

डोली मे जा करी तपस्या, भूल गये घरबार।
धूप छांव सरदी गरमी चाहे,मेघ हो मूसलधार।।

भूख प्यास बिसराये मन से,वायु थी आधार।
तन तिनका सा सूख चला, पर सुध बुध दयी बिसार।।

तन परवाह कभी नहीं की थी, मन में थे करतार।
काम और क्रोध लोभ मद छोङा,त्यागा अहंकार।।

राम नाम मय तन मन होगया, राम सुमिरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।12।।

एक दिन एक संत आये थे, देखन मे बलकारी।
अलख जगाई आ धूणे पर,और करी किलकारी।।

तेज पुंज सूरज सा मुखङा, वाणी शीतल प्यारी।
बोले तुम संग भजन करेंगे, करलो तुम तैयारी।।

रैण नैण एक पलक नींद नहीं, भजन बना था भारी।
सुबह हुई सुजान संत के, चलने की तैयारी।।

बोले अखाराम मैं जाऊं, हम फिर मिलतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।13।।

इसी तरह से चला सिलसिला, नित प्रति मिलने का।
सतसंग भजन व कथा राम की,नेम न टलने का।।

रात मे रहें सुबह चले जायें, संत बङे मस्तान।
जाते कहां कहां से आते, पङी नहीं पहचान।।

बरसों बीत गये बातों में, न रहा वक्त का ज्ञान।
जटाजूट तापस काया ना,रहा देह अभिमान।।

समता भाव सुभाव मे,सुख दुख एक समझते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।14।।

अक्षय अमर कथा

एक दिन आये संत भजन कर,किया जरा विश्राम।
निकट बुलाया फिर बैठाया, सुन प्यारे अखाराम।।

तुम हो सच्चे राम भक्त और,भोले संत सुजान।
मैं प्रसन्न तुम पर हूं अक्षय, प्रकट करूं पहचान।।

रामदूत मैं पवनपूत सुन,नाम मेरा हनुमान।
प्रकट किया निज रूप कपि ने,तेज पुंज ज्यूं भान।।

इष्ट देव को देख तन मन,सुधी बिसरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।15।।

परमानंद मगन हो अक्षय, सुध बुध खो बैठे।
कभी हंसते कभी रो पङते, कभी चरण पकङ बैठे।।

कभी चलते कभी रुक रुक चलते,कभी-कभी गिर बैठे।
दौड़ दौड़ परिकम्मा करते,जय जय कर बैठे।।

बिखरी जटा ज्यूं शिव हो वस्त्र का,भान भूला बैठे।
एक लंगोटी गले जनेऊ,कपि चरणों में लेटे।।

प्रेमा भक्ति देख कपि, बाहों मे भरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।16।।

मिले हृदय से हृदय दोय जब ,सेवक स्वामी का।
बजरंगी पहचान गये घर,अवध निवासी का।।

जिस घट मे श्रीराम बिराजै, घर अविनाशी का।
मैं भी रहूं राम संग घट है,हृढ विश्वासी का।।

ज्यूं रहते शिव सदा कृपालु, वास है काशी का।
एसे वास करूं तेरे घट मे,घट सुखरासी का।।

अखाराम तेरे संग रहूंगा, वादा करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।17।।

एक अरज है मालिक मेरी, किरपा कर देना।
सगुण रूप मूरत बन सेवा, चरणों की देना।।

नित्य सबेरे सांझ आरती, एसा मन देना।
खीर चूरमा राम रोट का,भोग लगा लेना।।

तुलसी दल अर्पण करदूं, जलपान करा लेना।
संत भगत गौ पक्षी आवै,उदर पूरा देना।।

संत हृदय की इच्छा को कपि, पूरण करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।18।।

परहित सेवा की अरजी सुन, हनुमत हरषायै।
अति प्रसन्न बोले बजरंगी, मांग जो मन चाहे।।

मांग मांग वर मांग भगत, किंचित ना शरमाये।
हर इच्छा को पूरण करूंगा, हनुमत बतलाये।।

जिसको आप का दरस हुआ,क्या इच्छा रह जाये।
अष्ट सिद्धि नवनिधि वरदायक, दाता कहलाये।।

एसे मालिक आप कमी क्या, अक्षय कहते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।19।।

फिर भी आप दे रहे मालिक, दास अरज करते।
मरूधरा धोरों में स्वामी, विषधर बहुत बसते।।

किरसा ग्वाल पथिक जन खेतों में, विचरण करते।
बिच्छू सांप गोहिरा बांडी, जब चाहे डसते।।

सांझ सबेरे मुंह अंधेरे, सोते और जगते।
बना रहे भय काल सर्प का, मौत बिना मरते।।

विषधर के भय से अभय करो, ये अरजी करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।20।।

कलवाणी की कला दई,जो विष की हारक है।
जल मे खोल चिमटा, भभूती कष्ट निवारक है।।

रक्षा सूत्र में सात गांठ, तांती हितकारक है।
हृढ विश्वास राख कर बांधे, प्राण उबारक है।।

तेरा सुमिरन मेरे सुमिरन सा,फलदायक है।
दूं संकलाई अभी तुझे,हर जन सुखदायक है।।

महाबली बजरंगी शक्ति तुझमे भरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।21।।

शक्ति भारी दीन्ह कपि तब,अंतर्ध्यान हुये।
श्री विग्रह की करे प्रतीक्षा, बहु दिन बीत गये।।

एक दिन एक बलद गाडै में, मूरत एक आई।
धणीं पधारै परसाणै, मन मे खुशियां छाई।।

पूछा कौन कहां से आये, कहां मूरत पाई।
गांव बेनाथा की रोही से, बातें बतलाई।।

परसाणै पंहुचा दो मुझे, सपनें में कहतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।22।।

शुभ दिन शुभ घङी वार मुहूर्त में, स्थापित कपी हुये।
जिस पल आप पधारे गांव में, सुन्दर सगुन हुये।।

उदय अस्त आरती होवे, झालर शंख बजै।
गहरे शब्द नगारा गाजै, सेवक चंवर ढुलै।।

जय जयकार भजन किरतन की, जागण सदा सजै।
खीर चूरमा भोग लगे ,सब चलता राम रजै।।

दुखिया भी दरसन करके मन ,खुशियां भरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।23।।

पीपल और खेजङी बदरी, निज कर लगवाये।
ऊंचा मिंदर लाल धणीं का,झंडा लहराये।।

गांव गांव चरचा संकलाई, की करते बातें ।
सुन सुन दुखी दीन जन बातें, दरसन को आते।।

निरधनियां धन पाते, रोगी शक्ति पा जाते।
निसंतान दया से प्रभु की,गोदी सुख पाते।।

खाली झोली करुण भाव से,खुशियां भरते हैं
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।24।।

सर्प दंश भय दूर हुआ, महिमा सबने जानी।
एक औषधि रामबाण हुई, तांती कलवाणी ।।

कोई फूंक झाङ नहीं मंतर, ना ओझा भोपा।
अमृत बना कुंड निरमल जल,संग भभूती का।।

चिमटा खोल बणा कलवाणी, जिसको पिला दिया।
चमत्कार एसा होता, मुरदों को जिला दिया।।

रोही जंगल मे सुबह शाम, निर्भय विचरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।25।।

विपदा दूर करे जन जन की, बरसों बीत गये।
चमत्कार सुनने में आते,नित नित नये नये।।

संत महंत साधु सिद्धों ने, माया रचवाई।
फैला दिये पग पग पर विषधर, राह न रहपाई।।

बुला लिया बस्ती के बाहर,अक्षय समझाई।
सोचा लैण परीक्षा आये,देखो संकलाई।।

पहन खङाऊ उडण भरी, आकाश मे चलते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।26।।

आकर बहु सनमान सहित, संतों से मिलन हुआ।
भगत भगत पहचान गये, आपस मे धन्य कहा।।

धन्य धन्य तुम धन्य अखा, तेरे धन्य पिता माता।
धन्य धरा मरुधरा दधीचि कुल,धन्य बहन भ्राता ।।

धन्य हमारे श्रवण आज और,धन्य हुई वाणी।
धन्य हमारा समय पा गये, पावन अन्नपाणी।।

अमर नाम अक्षय ध्रुव जैसा,संत उचरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।27।।

अखारामजी वृद्ध भये, दादाजी नाम पङा।
यही नाम सबके मन भाये,छोटा हो या बङा।।

दादाजी एक बार पास के, गांव में थे आये।
दिन भर भजन संगत संतों की, वक्त ना लख पाये।।

अस्तांचल आ पंहुचे दिनकर,तब कुछ भान हुआ।
सांझ आरती समय हुआ, एक भक्त ने एसे कहा।।

दोनों वक्त आरती नित, दादाजी करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।28।।

चुपके से एक भगत उठे, दादा ने जान लिया।
हो असवार अश्व काठी पर,अश्व को ऐङ दिया।।

घङी पाव मे पंहुचें मंदिर, दरसन जाय किया।
दादाजी कर रहे आरती, यह क्या कैसे हुआ।।

मेरी घोङी पवनवेग से ,मुझको ले आई।
दादाजी वहां बैठे छोङे, मति मेरी भरमाई।।

आरूढ पुनः हो आये वहीं, दादा राम सुमिरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।29।।

हाथ जोड़कर चरण पकङ, वो भगत वहां बोला।
सिद्ध संत हैं दादाजी, फरक न इक तोला।।

एक दादाजी भजन करें यहां, एक मंदिर के मांय।
दो दो रूप धार कर बैठे, मन संशय कछु नांय।।

दादाजी मुसकाय कहे तुम, भजन करो भाई।
भगती त्याग तपस्या सेवा, खुश हो कपिराई।।

सेवा परम धरम करलो तुम,शुभ फल मिलते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।30।।

शत आयु जब पार हुई तो,करनें लगे विचार।
काल धरम हर तन व्यापत है, चाहे हो अवतार।।

आज्ञा लेकर रामदूत से, गांव लिया बुलवाय।
जीवित समाधि मे बैठूंगा, पक्की दो चुनवाय।।

टप टप नीर नैण से टपके, मच गया हाहाकार।
रुदन करे अरदास ग्राम जन,अब किसका आधार।।

शोक करो ना यहीं रहूंगा, ये पण करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।31।।

अक्षय अमर कथा

उसी समाधि पर भगतों ने,मंदिर बनवाया।
छङी चीमटा और खङाऊ, सिगङी पुजवाया।।

पूजा करे पुजारी हर दिन ,ज्योत हूवै भारी।
गौघृत श्रीफल धूप गुग्गुल सब,होमे नर नारी।।

भोग लगै नित खीर चूरमा, दरसन बलिहारी।
जो मांगे दादा से मिलता, एसी दातारी।।

कृष्ण पक्ष की पांचम शुभ दिन, मेले भरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।32।।

रतनगढ़ के सेठ चौधरी, भगत बङे भारी।
दरसन को आते रहते, संग रहते परिवारी।।

विश्राम रैन के साधन की एक,कमी बङी भारी।
धरमशाल दिखणादे पासे,बणा दई प्यारी।।

दूर दूर गावों से संत नित, आते संसारी।
कुंड पक्का निरमाण किया,जल पावै नर नारी।।

इसी तरह से भगत कई,रचनायें रचते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।33।।

कुछ परिवार रहे परसाणै, बंडवा जाय बसै।
गये धीरदेसर कुछ परिजन, छापर आय बसै।।

दादा की किरपा से परिजन, पुरजन सभी फलै।
सेवक पोता और संबंधी, एक से एक भलै।।

जात पात सम भाव वर्ण, दादा ना भेद करे।
दीन दुखी रोगी निरधनियां, सबका कष्ट हरे।।

उनका हो जाता दादा, जो सुमिरन करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।34।।

चमत्कार तो लाखों हैं, कैसे मैं कह पाऊं।
मति अनुसार एक दो वरणूं, थोङे मे समझाऊं।।

गुलजी गंगा डूब गये,चिमटे से उबार लिया।
रामबगस के पुत्र हुकम का,विष भी हरण किया।।

गोली चली धनराज बचे,एक दुष्ट ने वार किया।
फिसल सामने वापस आ,उस दुष्ट को जख्म दिया।।

ऐसे सच्चे कथन बहुत, जन जन से सुनते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।35।।

संवत दो हजार छत्तीस मे,जीर्णोद्धार हुआ।
सपना देखा था भगतों ने,सपना सफल हुआ।।

पांच दिवस श्रीराम यज्ञ था,किरतन खूब हुआ।
सुबह शाम भंडारा चलता, भोजन नया नया।।

परसाणै ग्राम जनों उत्सव हित,भारी काम किया।
छत्री जाट कुंभार ग्राम जन, तन श्रम बहुत किया।।

कारीगर छापर के चांदजी, चेजा करते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।36।।

दो हजार छत्तीस की संवत, पौष मास आया।
कृष्ण पक्ष की पांचम थी, शुभ मुहूर्त बली पाया।।

पंडित गोविंदराम भाव से, पूजा करवाई।
हुकमचंद यजमान बने,पत्नी काली बाई।।

सुन्दर मूरत दादाजी की, स्थापित आज हुई।
जय जयकार करे सब सेवक, खुशियां बहुत हुई।।

सौनजी गंगाधर रामेसर, पूजा करतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।37।।

जीर्णोद्धार एक हुआ पुनः, मंदिर का अति भारी।
शिखर विशाल विशाल भवन की,रचना है न्यारी।।

सौम्य रूप गुणशील भूप, दादा परसाणै सोहै।
पचरंग पाग केसरी जामा,धारण नये नये।।

मोतियन माल भाल पर केसर,चंदन तिलक किये।
पगां खङाऊ चंदन की, और चिमटा रतन जङै।।

दादा के दरबार मे आ सब मन की कहतें हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।38।।

कृष्ण पक्ष भादौ की पांचम, जनम दिवस आये।
भगतों के मन आनंद भर कर,खुशियां लहरायें।।

देश विदेश जहां जो बसते, दरसन को आये।
चढ चढ वाहन पांव पियादे, मारग भर जावै।।

कोई युगल कोई भक्त अकेला, परिजन संग आवै।
खाली झोली भर ले जावै,मनवांछित पावै।।

दादा हमें बुलाना जल्दी, यह सब कहते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को।।39।।

मैं मतिमंद निपट अज्ञानी, कविता क्या गाऊं।
सुना सुनाया अनुभव पाया,तुमको सुनवाऊं।।

भाषा भूल माफ कर देना,जो मैं लिख पाऊं।
किरपा क्षमा बनाये रखना, पुनि पुनि दोहराऊं ।।

वन जन गगन अगन जल मे,मैं निकट तुम्हें पाऊं।
तेरे हाथ हजारों की नित,रक्षा मैं पाऊं।।

चंपा अक्षय अमर कथा, चरणों में धरते हैं।
परसाणै दादा अखाराम कष्टों को हरते हैं।।40।।

श्री बालाजी दादाजी माताजी की जय जय जय

।।सम्पूर्ण।।

Shri Satyanarayan Vrat Katha in Hindi: सत्यनारायण व्रत कथा समस्त अध्याय

सत्यनारायण व्रत की कथा लोक में प्रचलित है। हिन्दू धर्मावलम्बियों के बीच सबसे प्रतिष्ठित व्रत कथा के रूप में भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप की सत्यनारायण व्रत कथा है। कुछ लोग मनौती पूरी होने पर, कुछ अन्य नियमित रूप से इस कथा का आयोजन करते हैं।

सत्यनारायण व्रत कथा के दो भाग हैं, व्रत-पूजा एवं कथा। सत्यनारायण व्रतकथा स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड से संकलित की गई है। सत्य को नारायण (विष्णु जी) के रूप में पूजना ही सत्यनारायण भगवान की पूजा है। इसका दूसरा अर्थ यह है कि संसार में एकमात्र भगवान नारायण ही सत्य हैं, बाकी सब माया है।

सत्यनारायण व्रत कथा

भगवान की पूजा कई रूपों में की जाती है, उनमें से भगवान का सत्यनारायण स्वरूप इस कथा में बताया गया है। इसके मूल पाठ में पाठान्तर से लगभग 170 श्लोक संस्कृत भाषा में उपलब्ध है जो पाँच अध्यायों में बँटे हुए हैं। इस कथा के दो प्रमुख विषय हैं- जिनमें एक है संकल्प को भूलना और दूसरा है प्रसाद का अपमान।

व्रत कथा के अलग-अलग अध्यायों में छोटी कहानियों के माध्यम से बताया गया है कि सत्य का पालन न करने पर किस प्रकार की समस्या आती है। इसलिए जीवन में सत्य व्रत का पालन पूरी निष्ठा और सुदृढ़ता के साथ करना चाहिए।

ऐसा न करने पर भगवान न केवल नाराज होते हैं अपितु दण्ड स्वरूप सम्पत्ति और बन्धु बान्धवों के सुख से वंचित भी कर देते हैं। इस अर्थ में यह कथा लोक में सच्चाई की प्रतिष्ठा का लोकप्रिय और सर्वमान्य धार्मिक साहित्य हैं। प्रायः पूर्णमासी को इस कथा का परिवार में वाचन किया जाता है।

अन्य पर्वों पर भी इस कथा को विधि विधान से करने का निर्देश दिया गया है। इनकी पूजा में केले के पत्ते व फल के अतिरिक्त पंचामृत, पंचगव्य, सुपारी, पान, तिल, मोली, रोली, कुमकुम, दूर्वा की आवश्यकता होती जिनसे भगवान की पूजा होती है।

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श्री सत्यनारायण व्रत कथा उद्देश्य

वेदों के अनुसार सत्यनारायण कथा करने से हजारों वर्षों के यज्ञ के बराबर फल मिलता है। सत्यनारायण कथा को सुनने से भी सौभाग्य की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार सत्यनारायण कथा को सुनने वाले को उपवास अवश्य करना चाहिए।

ऐसा माना जाता है कि श्री हरि विष्णु इससे जीवन की सभी समस्याओं को दूर करने में सक्षम हैं। स्कंद पुराण के अनुसार सत्यनारायण भगवान विष्णु का स्वरुप है। कहा जाता है कि ऐसी स्थिति में सत्यनारायण कथा सुनने और करने से भगवान विष्णु भक्त पर कृपा करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यह किसी के जीवन में खुशी और शांति लाता है।

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इस सत्यनारायण व्रत कथा को करने का सबसे मुख्य उद्देश्य ही सत्य की पूजा करना है| मान्यताओ के अनुसार सत्यनारायण व्रत के दिन भगवान शालिग्राम की पूजा की जाती है| इस दिन व्रत करने वाले भक्तों सुबह जल्दी ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तत्पश्चात स्नान आदि से मुक्त होकर भगवान सत्यनारायण का ध्यान करना चाहिए| इसके पश्चात सूर्य भगवान को प्रणाम करके व्रत का संकल्प ले|

श्री सत्यनारायण व्रत कथा विधि

सत्यनारायण व्रत कथा पुस्तिका के प्रथम अध्याय में यह बताया गया है कि सत्यनारायण भगवान की पूजा कैसे की जाए। संक्षेप में यह विधि निम्नलिखित है-

जो व्यक्ति सत्यनारायण की पूजा का संकल्प लेते हैं उन्हें दिन भर व्रत रखना चाहिए। पूजन स्थल को गाय के गोबर से पवित्र करके वहां एक अल्पना बनाएँ और उस पर पूजा की चौकी रखें। इस चौकी के चारों पाये के पास केले का वृक्ष लगाएँ।

इस चौकी पर शालिग्राम या ठाकुर जी या श्री सत्यनारायण की प्रतिमा स्थापित करें। पूजा करते समय सबसे पहले गणपति की पूजा करें फिर इन्द्रादि दशदिक्पाल की और क्रमश: पंच लोकपाल, सीता सहित राम, लक्ष्मण की, राधा कृष्ण की।

इनकी पूजा के पश्चात ठाकुर जी व सत्यनारायण की पूजा करें। इसके बाद लक्ष्मी माता की और अन्त में महादेव और ब्रह्मा जी की पूजा करें। पूजा के बाद सभी देवों की आरती करें और चरणामृत लेकर प्रसाद वितरण करे।

श्री सत्यनारायण भगवान व्रत कथा

सत्यनारायण व्रत कथा प्रथम अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

सत्यनारायण व्रत कथा का पूरा सन्दर्भ यह है कि पुराकालमें शौनकादिऋषि नैमिषारण्य स्थित महर्षि सूत के आश्रम पर पहुँचे। ऋषिगण महर्षि सूत से प्रश्न करते हैं कि लौकिक कष्टमुक्ति, सांसारिक सुख समृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य की सिद्धि के लिए सरल उपाय क्या है?

महर्षि सूत शौनकादिऋषियों को बताते हैं कि ऐसा ही प्रश्न नारद जी ने भगवान विष्णु से किया था। भगवान विष्णु ने नारद जी को बताया कि लौकिक क्लेशमुक्ति, सांसारिक सुखसमृद्धि एवं पारलौकिक लक्ष्य सिद्धि के लिए एक ही राजमार्ग है, वह है सत्यनारायण व्रत। सत्यनारायण का अर्थ है सत्याचरण, सत्याग्रह, सत्यनिष्ठा। संसार में सुखसमृद्धि की प्राप्ति सत्याचरणद्वारा ही संभव है। सत्य ही ईश्वर है। सत्याचरण का अर्थ है ईश्वराराधन, भगवत्पूजा।

कथा का प्रारम्भ सूत जी द्वारा कथा सुनाने से होता है। नारद जी भगवान श्रीविष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति करते हैं। स्तुति सुनने के अनन्तर भगवान श्रीविष्णु जी ने नारद जी से कहा- महाभाग! आप किस प्रयोजन से यहाँ आये हैं, आपके मन में क्या है? कहिये, वह सब कुछ मैं आपको बताउँगा।

नारद जी बोले – भगवन! मृत्युलोक में अपने पापकर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेशों से दुखी हो रहे हैं। हे नाथ! किस लघु उपाय से उनके कष्टों का निवारण हो सकेगा, यदि आपकी मेरे ऊपर कृपा हो, तो वह सब मैं सुनना चाहता हूँ। उसे बतायें।

श्री भगवान ने कहा – हे वत्स! संसार के ऊपर अनुग्रह करने की इच्छा से आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। जिस व्रत के करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाता है, उसे आपको बताता हूँ, सुनें। हे वत्स! स्वर्ग और मृत्युलोक में दुर्लभ भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्यप्रद व्रत है। आपके स्नेह के कारण इस समय मैं उसे कह रहा हूँ। अच्छी प्रकार विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण व्रत करके मनुष्य शीघ्र ही सुख प्राप्त कर परलोक में मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

भगवान की ऐसी वाणी सनुकर नारद मुनि ने कहा -प्रभो इस व्रत को करने का फल क्या है? इसका विधान क्या है? इस व्रत को किसने किया और इसे कब करना चाहिए? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्री भगवान ने कहा – यह सत्यनारायण व्रत दुख-शोक आदि का शमन करने वाला, धन-धान्य की वृद्धि करने वाला, सौभाग्य और सन्तान देने वाला तथा सर्वत्र विजय प्रदान करने वाला है।

जिस-किसी भी दिन भक्ति और श्रद्धा से समन्वित होकर मनुष्य ब्राह्मणों और बन्धुबान्धवों के साथ धर्म में तत्पर होकर सायंकाल भगवान सत्यनारायण की पूजा करे। नैवेद्य के रूप में उत्तम कोटि के भोजनीय पदार्थ को सवाया मात्रा में भक्तिपूर्वक अर्पित करना चाहिए।

केले के फल, घी, दूध, गेहूँ का चूर्ण अथवा गेहूँ के चूर्ण के अभाव में साठी चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़ – यह सब भक्ष्य सामग्री सवाया मात्रा में एकत्र कर निवेदित करनी चाहिए।

बन्धु-बान्धवों के साथ श्री सत्यनारायण भगवान की कथा सुनकर दक्षिणा देनी चाहिए। तदनन्तर बन्धु-बान्धवों के साथ भोजन कराना चाहिए। भक्तिपूर्वक प्रसाद ग्रहण करके नृत्य-गीत आदि का आयोजन करना चाहिए।

तदनन्तर भगवान सत्यनारायण का स्मरण करते हुए अपने घर जाना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्यों की अभिलाषा अवश्य पूर्ण होती है। विशेष रूप से कलियुग में, पृथ्वीलोक में यह सबसे छोटा सा उपाय है।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा प्रथम अध्याय सम्पूर्ण ॥

सत्यनारायण व्रत कथा दूसरा अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

श्रीसूतजी बोले – हे द्विजों! अब मैं पुनः पूर्वकाल में जिसने इस सत्यनारायण व्रत को किया था, उसे भली भाँति विस्तारपूर्वक कहूँगा। रमणीय काशी नामक नगर में कोई अत्यन्त निर्धन रहता था। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह प्रतिदिन पृथ्वी पर भटकता रहता था।

प्रिय भगवान ने उस दुखी को देखकर वृद्ध का रूप धारण करके उस द्विज से आदरपूर्वक पूछा – हे ! प्रतिदिन अत्यन्त दुखी होकर तुम किसलिए पृथ्वपर भ्रमण करते रहते हो। हे द्विजश्रेष्ठ! यह सब बतलाओ, मैं सुनना चाहता हूं।

बोला – प्रभो! मैं अत्यन्त दरिद्र हूँ और भिक्षा के लिए ही पृथ्वी पर घूमा करता हूँ। यदि मेरी इस दरिद्रता को दूर करने का आप कोई उपाय जानते हों तो कृपापूर्वक बतलाइये।

वृद्ध बोला – हे देव! सत्यनारायण भगवान् विष्णु अभीष्ट फल को देने वाले हैं। हे विप्र! तुम उनका उत्तम व्रत करो, जिसे करने से मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

व्रत के विधान को भी यत्नपूर्वक कहकर वृद्ध रूपधारी भगवान् विष्णु वहीं पर अन्तर्धान हो गये। ‘वृद्ध ने जैसा कहा है, उस व्रत को अच्छी प्रकार से वैसे ही करूँगा’ – यह सोचते हुए उस को रात में नींद नहीं आयी।

अगले दिन प्रातःकाल उठकर ‘सत्यनारायण का व्रत करूंगा’ ऐसा संकल्प करके वह भिक्षा के लिए चल पड़ा। उस दिन भिक्षा में बहुत सा धन प्राप्त हुआ। उसी धन से उसने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान सत्यनारायण का व्रत किया।

इस व्रत के प्रभाव से वह श्रेष्ठ सभी दुखों से मुक्त होकर समस्त सम्पत्तियों से सम्पन्न हो गया। उस दिन से लेकर प्रत्येक महीने उसने यह व्रत किया। इस प्रकार भगवान् सत्यनारायण के इस व्रत को करके वह श्रेष्ठ सभी पापों से मुक्त हो गया और उसने दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त किया।

हे विप्र! पृथ्वी पर जब भी कोई मनुष्य श्री सत्यनारायण का व्रत करेगा, उसी समय उसके समस्त दुख नष्ट हो जायेंगे। ! इस प्रकार भगवान नारायण ने महात्मा नारदजी से जो कुछ कहा, मैंने वह सब आप लोगों से कह दिया, आगे अब और क्या कहूं? हे मुने! इस पृथ्वी पर उस से सुने हुए इस व्रत को किसने किया? हम वह सब सुनना चाहते हैं, उस व्रत पर हमारी श्रद्धा हो रही है।

श्री सूत जी बोले – मुनियों! पृथ्वी पर जिसने यह व्रत किया, उसे आप लोग सुनें। एक बार वह द्विजश्रेष्ठ अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार बन्धु-बान्धवों तथा परिवारजनों के साथ व्रत करने के लिए उद्यत हुआ।

इसी बीच एक लकड़हारा वहाँ आया और लकड़ी बाहर रखकर उस ब्राह्मण के घर गया। प्यास से व्याकुल वह उस को व्रत करता हुआ देख प्रणाम करके उससे बोला – प्रभो! आप यह क्या कर रहे हैं, इसके करने से किस फल की प्राप्ति होती है, विस्तारपूर्वक मुझसे कहिये।

विप्र ने कहा – यह सत्यनारायण का व्रत है, जो सभी मनोरथों को प्रदान करने वाला है। उसी के प्रभाव से मुझे यह सब महान धन-धान्य आदि प्राप्त हुआ है। जल पीकर तथा प्रसाद ग्रहण करके वह नगर चला गया।

सत्यनारायण देव के लिए मन से ऐसा सोचने लगा कि ‘आज लकड़ी बेचने से जो धन प्राप्त होगा, उसी धन से भगवान सत्यनारायण का श्रेष्ठ व्रत करूँगा।’ इस प्रकार मन से चिन्तन करता हुआ लकड़ी को मस्तक पर रख कर उस सुन्दर नगर में गया, जहाँ धन-सम्पन्न लोग रहते थे। उस दिन उसने लकड़ी का दुगुना मूल्य प्राप्त किया।

इसके बाद प्रसन्न हृदय होकर वह पके हुए केले का फल, शर्करा, घी, दूध और गेहूँ का चूर्ण सवाया मात्रा में लेकर अपने घर आया। तत्पश्चात उसने अपने बान्धवों को बुलाकर विधि-विधान से भगवान श्री सत्यनारायण का व्रत किया।

उस व्रत के प्रभाव से वह धन-पुत्र से सम्पन्न हो गया और इस लोक में अनेक सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर अर्थात् बैकुण्ठलोक चला गया।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा द्वितीय अध्याय सम्पूर्ण ॥

सत्यनारायण व्रत कथा तीसरा अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

श्री सूतजी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब मैं पुनः आगे की कथा कहूँगा, आप लोग सुनें। प्राचीन काल में उल्कामुख नाम का एक राजा था। वह जितेन्द्रिय, सत्यवादी तथा अत्यन्त बुद्धिमान था। वह विद्वान राजा प्रतिदिन देवालय जाता और धन देकर सन्तुष्ट करता था। कमल के समान मुख वाली उसकी धर्मपत्नी शील, विनय एवं सौन्दर्य आदि गुणों से सम्पन्न तथा पतिपरायणा थी।

राजा एक दिन अपनी धर्मपत्नी के साथ भद्रशीला नदी के तट पर श्रीसत्यनारायण का व्रत कर रहा था। उसी समय व्यापार के अनेक प्रकार की पुष्कल धनराशि से सम्पन्न एक साधु नाम का बनिया वहाँ आया। भद्रशीला नदी के तट पर नाव को स्थापित कर वह राजा के समीप गया और राजा को उस व्रत में दीक्षित देखकर विनयपूर्वक पूछने लगा। साधु ने कहा – राजन्! आप भक्तियुक्त चित्त से यह क्या कर रहे हैं? कृपया वह सब बताइये, इस समय मैं सुनना चाहता हूँ।

राजा बोले – हे साधो! पुत्र आदि की प्राप्ति की कामना से अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मैं अतुल तेज सम्पन्न भगवान् विष्णु का व्रत एवं पूजन कर रहा हूँ। राजा की बात सुनकर साधु ने आदरपूर्वक कहा – राजन् ! इस विषय में आप मुझे सब कुछ विस्तार से बतलाइये, आपके कथनानुसार मैं व्रत एवं पूजन करूँगा। मुझे भी सन्तति नहीं है। ‘इससे अवश्य ही सन्तति प्राप्त होगी।’

ऐसा विचार कर वह व्यापार से निवृत्त हो आनन्दपूर्वक अपने घर आया। उसने अपनी भार्या से सन्तति प्रदान करने वाले इस सत्यव्रत को विस्तार पूर्वक बताया तथा – ‘जब मुझे सन्तति प्राप्त होगी तब मैं इस व्रत को करूँगा’ – इस प्रकार उस साधु ने अपनी भार्या लीलावती से कहा। एक दिन उसकी लीलावती नाम की सती-साध्वी भार्या पति के साथ आनन्द चित्त से ऋतुकालीन धर्माचरण में प्रवृत्त हुई और भगवान् श्रीसत्यनारायण की कृपा से उसकी वह भार्या गर्भिणी हुई।

दसवें महीने में उससे कन्यारत्न की उत्पत्ति हुई और वह शुक्लपक्ष के चंद्रमा की भाँति दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी। उस कन्या का ‘कलावती’ यह नाम रखा गया। इसके बाद एक दिन लीलावती ने अपने स्वामी से मधुर वाणी में कहा – आप पूर्व में संकल्पित श्री सत्यनारायण के व्रत को क्यों नहीं कर रहे हैं? साधु बोला – ‘प्रिये! इसके विवाह के समय व्रत करूंगा।’ इस प्रकार अपनी पत्नी को भली-भाँति आश्वस्त कर वह व्यापार करने के लिए नगर की ओर चला गया। इधर कन्या कलावती पिता के घर में बढ़ने लगी।

तदनन्तर धर्मज्ञ साधु ने नगर में सखियों के साथ क्रीड़ा करती हुई अपनी कन्या को विवाह योग्य देखकर आपस में मन्त्रणा करके ‘कन्या विवाह के लिए श्रेष्ठ वर का अन्वेषण करो’ – ऐसा दूत से कहकर शीघ्र ही उसे भेज दिया। उसकी आज्ञा प्राप्त करके दूत कांचन नामक नगर में गया और वहां से एक वणिक का पुत्र लेकर आया। उस साधु ने उस वणिक के पुत्र को सुन्दर और गुणों से सम्पन्न देखकर अपनी जाति के लोगों तथा बन्धु-बान्धवों के साथ सन्तुष्ट चित्त हो विधि-विधान से वणिकपुत्र के हाथ में कन्या का दान कर दिया।

उस समय वह साधु बनिया दुर्भाग्यवश भगवान् का वह उत्तम व्रत भूल गया। पूर्व संकल्प के अनुसार विवाह के समय में व्रत न करने के कारण भगवान उस पर रुष्ट हो गये। कुछ समय के पश्चात अपने व्यापारकर्म में कुशल वह साधु बनिया काल की प्रेरणा से अपने दामाद के साथ व्यापार करने के लिए समुद्र के समीप स्थित रत्नसारपुर नामक सुन्दर नगर में गया और अपने श्रीसम्पन्न दामाद के साथ वहां व्यापार करने लगा। उसके बाद वे दोनो राजा चन्द्रकेतु के रमणीय उस नगर में गये। उसी समय भगवान् श्रीसत्यनारायण ने उसे भ्रष्टप्रतिज्ञ देखकर ‘इसे दारुण, कठिन और महान् दुख प्राप्त होगा’ – यह शाप दे दिया।

एक दिन एक चोर राजा चन्द्रकेतु के धन को चुराकर वहीं आया, जहां दोनों वणिक स्थित थे। वह अपने पीछे दौड़ते हुए दूतों को देखकर भयभीतचित्त से धन वहीं छोड़कर शीघ्र ही छिप गया। इसके बाद राजा के दूत वहाँ आ गये जहां वह साधु वणिक था।

वहाँ राजा के धन को देखकर वे दूत उन दोनों वणिकपुत्रों को बाँधकर ले आये और हर्षपूर्वक दौड़ते हुए राजा से बोले – ‘प्रभो! हम दो चोर पकड़ लाए हैं, इन्हें देखकर आप आज्ञा दें’। राजा की आज्ञा से दोनों शीघ्र ही दृढ़तापूर्वक बाँधकर बिना विचार किये महान कारागार में डाल दिये गये। भगवान् सत्यदेव की माया से किसी ने उन दोनों की बात नहीं सुनी और राजा चन्द्रकेतु ने उन दोनों का धन भी ले लिया।

भगवान के शाप से वणिक के घर में उसकी भार्या भी अत्यन्त दुखित हो गयी और उनके घर में सारा-का-सारा जो धन था, वह चोर ने चुरा लिया। लीलावती शारीरिक तथा मानसिक पीड़ाओं से युक्त, भूख और प्यास से दुखी हो अन्न की चिन्ता से दर-दर भटकने लगी।

कलावती कन्या भी भोजन के लिए इधर-उधर प्रतिदिन घूमने लगी। एक दिन भूख से पीडि़त कलावती एक के घर गयी। वहां जाकर उसने श्रीसत्यनारायण के व्रत-पूजन को देखा। वहां बैठकर उसने कथा सुनी और वरदान मांगा। उसके बाद प्रसाद ग्रहण करके वह कुछ रात होने पर घर गयी।

माता ने कलावती कन्या से प्रेमपूर्वक पूछा – पुत्री ! रात में तू कहाँ रुक गयी थी? तुम्हारे मन में क्या है? कलावती कन्या ने तुरन्त माता से कहा – माँ! मैंने एक घर में मनोरथ प्रदान करने वाला व्रत देखा है। कन्या की उस बात को सुनकर वह वणिक की भार्या व्रत करने को उद्यत हुई और प्रसन्न मन से उस साध्वी ने बन्धु-बान्धवों के साथ भगवान् श्रीसत्यनारायण का व्रत किया तथा इस प्रकार प्रार्थना की – ‘भगवन! आप हमारे पति एवं जामाता के अपराध को क्षमा करें।

वे दोनों अपने घर शीघ्र आ जायें।’ इस व्रत से भगवान सत्यनारायण पुनः सन्तुष्ट हो गये तथा उन्होंने नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को स्वप्न दिखाया और स्वप्न में कहा – ‘नृपश्रेष्ठ! प्रातः काल दोनों वणिकों को छोड़ दो और वह सारा धन भी दे दो, जो तुमने उनसे इस समय ले लिया है, अन्यथा राज्य, धन एवं पुत्रसहित तुम्हारा सर्वनाश कर दूँगा।’

राजा से स्वप्न में ऐसा कहकर भगवान सत्यनारायण अन्तर्धान हो गये। इसके बाद प्रातः काल राजा ने अपने सभासदों के साथ सभा में बैठकर अपना स्वप्न लोगों को बताया और कहा – ‘दोनों बन्दी वणिकपुत्रों को शीघ्र ही मुक्त कर दो।’

राजा की ऐसी बात सुनकर वे राजपुरुष दोनों महाजनों को बन्धनमुक्त करके राजा के सामने लाकर विनयपूर्वक बोले – ‘महाराज! बेड़ी-बन्धन से मुक्त करके दोनों वणिक पुत्र लाये गये हैं। इसके बाद दोनों महाजन नृपश्रेष्ठ चन्द्रकेतु को प्रणाम करके अपने पूर्व-वृतान्त का स्मरण करते हुए भयविह्वन हो गये और कुछ बोल न सके।

राजा ने वणिक पुत्रों को देखकर आदरपूर्वक कहा -‘आप लोगों को प्रारब्धवश यह महान दुख प्राप्त हुआ है, इस समय अब कोई भय नहीं है।’, ऐसा कहकर उनकी बेड़ी खुलवाकर क्षौरकर्म आदि कराया। राजा ने वस्त्र, अलंकार देकर उन दोनों वणिकपुत्रों को सन्तुष्ट किया तथा सामने बुलाकर वाणी द्वारा अत्यधिक आनन्दित किया।

पहले जो धन लिया था, उसे दूना करके दिया, उसके बाद राजा ने पुनः उनसे कहा – ‘साधो! अब आप अपने घर को जायें।’ राजा को प्रणाम करके ‘आप की कृपा से हम जा रहे हैं।’ – ऐसा कहकर उन दोनों महावैश्यों ने अपने घर की ओर प्रस्थान किया।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा तृतीय अध्याय सम्पूर्ण ॥

सत्यनारायण व्रत कथा चौथा अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

श्रीसूत जी बोले – साधु बनिया मंगलाचरण कर और ब्राह्मणों को धन देकर अपने नगर के लिए चल पड़ा। साधु के कुछ दूर जाने पर भगवान सत्यनारायण की उसकी सत्यता की परीक्षा के विषय में जिज्ञासा हुई – ‘साधो! तुम्हारी नाव में क्या भरा है?’

तब धन के मद में चूर दोनों महाजनों ने अवहेलनापूर्वक हँसते हुए कहा – ‘दण्डिन! क्यों पूछ रहे हो? क्या कुछ द्रव्य लेने की इच्छा है? हमारी नाव में तो लता और पत्ते आदि भरे हैं।’ ऐसी निष्ठुर वाणी सुनकर – ‘तुम्हारी बात सच हो जाय’ – ऐसा कहकर दण्डी संन्यासी को रूप धारण किये हुए भगवान कुछ दूर जाकर समुद्र के समीप बैठ गये।

दण्डी के चले जाने पर नित्यक्रिया करने के पश्चात उतराई हुई अर्थात जल में उपर की ओर उठी हुई नौका को देखकर साधु अत्यन्त आश्चर्य में पड़ गया और नाव में लता और पत्ते आदि देखकर मुर्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ा। सचेत होने पर वणिकपुत्र चिन्तित हो गया। तब उसके दामाद ने इस प्रकार कहा – ‘आप शोक क्यों करते हैं? दण्डी ने शाप दे दिया है, इस स्थिति में वे ही चाहें तो सब कुछ कर सकते हैं, इसमें संशय नहीं। अतः उन्हीं की शरण में हम चलें, वहीं मन की इच्छा पूर्ण होगी।’

दामाद की बात सुनकर वह साधु बनिया उनके पास गया और वहाँ दण्डी को देखकर उसने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया तथा आदरपूर्वक कहने लगा – आपके सम्मुख मैंने जो कुछ कहा है, असत्यभाषण रूप अपराध किया है, आप मेरे उस अपराध को क्षमा करें – ऐसा कहकर बारम्बार प्रणाम करके वह महान शोक से आकुल हो गया। दण्डी ने उसे रोता हुआ देखकर कहा – ‘हे मूर्ख! रोओ मत, मेरी बात सुनो। मेरी पूजा से उदासीन होने के कारण तथा मेरी आज्ञा से ही तुमने बारम्बार दुख प्राप्त किया है।’ भगवान की ऐसी वाणी सुनकर वह उनकी स्तुति करने लगा।

साधु ने कहा – ‘हे प्रभो! यह आश्चर्य की बात है कि आपकी माया से मोहित होने के कारण ब्रह्मा आदि देवता भी आपके गुणों और रूपों को यथावत रूप से नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित होने के कारण कैसे जान सकता हूं! आप प्रसन्न हों। मैं अपनी धन-सम्पत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूँगा। मैं आपकी शरण में आया हूं। मेरा जो नौका में स्थित पुरा धन था, उसकी तथा मेरी रक्षा करें।’ उस बनिया की भक्तियुक्त वाणी सुनकर भगवान जनार्दन संतुष्ट हो गये।

भगवान हरि उसे अभीष्ट वर प्रदान करके वहीं अन्तर्धान हो गये। उसके बाद वह साधु अपनी नौका में चढ़ा और उसे धन-धान्य से परिपूर्ण देखकर ‘भगवान सत्यदेव की कृपा से हमारा मनोरथ सफल हो गया’ – ऐसा कहकर स्वजनों के साथ उसने भगवान की विधिवत पूजा की।

भगवान श्री सत्यनारायण की कृपा से वह आनन्द से परिपूर्ण हो गया और नाव को प्रयत्नपूर्वक संभालकर उसने अपने देश के लिए प्रस्थान किया। साधु बनिया ने अपने दामाद से कहा – ‘वह देखो मेरी रत्नपुरी नगरी दिखायी दे रही है’। इसके बाद उसने अपने धन के रक्षक दूत को अपने आगमन का समाचार देने के लिए अपनी नगरी में भेजा।

उसके बाद उस दूत ने नगर में जाकर साधु की भार्या को देख हाथ जोड़कर प्रणाम किया तथा उसके लिए अभीष्ट बात कही -‘सेठ जी अपने दामाद तथा बन्धुवर्गों के साथ बहुत सारे धन-धान्य से सम्पन्न होकर नगर के निकट पधार गये हैं।’ दूत के मुख से यह बात सुनकर वह महान आनन्द से विह्वल हो गयी और उस साध्वी ने श्री सत्यनारायण की पूजा करके अपनी पुत्री से कहा -‘मैं साधु के दर्शन के लिए जा रही हूं, तुम शीघ्र आओ।’

माता का ऐसा वचन सुनकर व्रत को समाप्त करके प्रसाद का परित्याग कर वह कलावती भी अपने पति का दर्शन करने के लिए चल पड़ी। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गये और उन्होंने उसके पति को तथा नौका को धन के साथ हरण करके जल में डुबो दिया। इसके बाद कलावती कन्या अपने पति को न देख महान शोक से रुदन करती हुई पृथ्वी पर गिर पड़ी। नाव का अदर्शन तथा कन्या को अत्यन्त दुखी देख भयभीत मन से साधु बनिया से सोचा – यह क्या आश्चर्य हो गया? नाव का संचालन करने वाले भी सभी चिन्तित हो गये।

तदनन्तर वह लीलावती भी कन्या को देखकर विह्वल हो गयी और अत्यन्त दुख से विलाप करती हुई अपने पति से इस प्रकार बोली -‘ अभी-अभी नौका के साथ वह कैसे अलक्षित हो गया, न जाने किस देवता की उपेक्षा से वह नौका हरण कर ली गयी अथवा श्रीसत्यनारायण का माहात्म्य कौन जान सकता है!’ ऐसा कहकर वह स्वजनों के साथ विलाप करने लगी और कलावती कन्या को गोद में लेकर रोने लगी।

कलावती कन्या भी अपने पति के नष्ट हो जाने पर दुखी हो गयी और पति की पादुका लेकर उनका अनुगमन करने के लिए उसने मन में निश्चय किया। कन्या के इस प्रकार के आचरण को देख भार्यासहित वह धर्मज्ञ साधु बनिया अत्यन्त शोक-संतप्त हो गया और सोचने लगा – या तो भगवान सत्यनारायण ने यह अपहरण किया है अथवा हम सभी भगवान सत्यदेव की माया से मोहित हो गये हैं। अपनी धन शक्ति के अनुसार मैं भगवान श्री सत्यनारायण की पूजा करूँगा।

सभी को बुलाकर इस प्रकार कहकर उसने अपने मन की इच्छा प्रकट की और बारम्बार भगवान सत्यदेव को दण्डवत प्रणाम किया। इससे दीनों के परिपालक भगवान सत्यदेव प्रसन्न हो गये। भक्तवत्सल भगवान ने कृपापूर्वक कहा – ‘तुम्हारी कन्या प्रसाद छोड़कर अपने पति को देखने चली आयी है, निश्चय ही इसी कारण उसका पति अदृश्य हो गया है। यदि घर जाकर प्रसाद ग्रहण करके वह पुनः आये तो हे साधु बनिया तुम्हारी पुत्री पति को प्राप्त करेगी, इसमें संशय नहीं।

कन्या कलावती भी आकाशमण्डल से ऐसी वाणी सुनकर शीघ्र ही घर गयी और उसने प्रसाद ग्रहण किया। पुनः आकर स्वजनों तथा अपने पति को देखा। तब कलावती कन्या ने अपने पिता से कहा – ‘अब तो घर चलें, विलम्ब क्यों कर रहे हैं?’

कन्या की वह बात सुनकर वणिकपुत्र सन्तुष्ट हो गया और विधि-विधान से भगवान सत्यनारायण का पूजन करके धन तथा बन्धु-बान्धवों के साथ अपने घर गया। तदनन्तर पूर्णिमा तथा संक्रान्ति पर्वों पर भगवान सत्यनारायण का पूजन करते हुए इस लोक में सुख भोगकर अन्त में वह सत्यपुर बैकुण्ठलोक में चला गया।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा चतुर्थ अध्याय सम्पूर्ण ॥

सत्यनारायण व्रत कथा पाँचवाँ अध्याय

Satyanarayan Vrat Katha in Hindi

श्रीसूत जी बोले – श्रेष्ठ मुनियों! अब इसके बाद मैं दूसरी कथा कहूँगा, आप लोग सुनें। अपनी प्रजा का पालन करने में तत्पर तुंगध्वज नामक एक राजा था। उसने सत्यदेव के प्रसाद का परित्याग करके दुख प्राप्त किया।

एक बार वह वन में जाकर और वहां बहुत से पशुओं को मारकर वटवृक्ष के नीचे आया। वहां उसने देखा कि गोपगण बन्धु-बान्धवों के साथ संतुष्ट होकर भक्तिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा कर रहे हैं। राजा यह देखकर भी अहंकारवश न तो वहां गया और न ही उसने भगवान सत्यनारायण को प्रणाम ही किया।

पूजन के बाद सभी गोपगण भगवान का प्रसाद राजा के समीप रखकर वहां से लौट आये और इच्छानुसार उन सभी ने भगवान का प्रसाद ग्रहण किया। इधर राजा को प्रसाद का परित्याग करने से बहुत दुख हुआ। उसका सम्पूर्ण धन-धान्य एवं सभी सौ पुत्र नष्ट हो गये। राजा ने मन में यह निश्चय किया कि अवश्य ही भगवान सत्यनारायण ने हमारा नाश कर दिया है। इसलिए मुझे वहां जाना चाहिए जहां श्री सत्यनारायण का पूजन हो रहा था।

ऐसा मन में निश्चय करके वह राजा गोपगणों के समीप गया और उसने गोपगणों के साथ भक्ति-श्रद्धा से युक्त होकर विधिपूर्वक भगवान सत्यदेव की पूजा की। भगवान सत्यदेव की कृपा से वह पुनः धन और पुत्रों से सम्पन्न हो गया तथा इस लोक में सभी सुखों का उपभोग कर अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुआ।

श्रीसूत जी कहते हैं – जो व्यक्ति इस परम दुर्लभ श्री सत्यनारायण के व्रत को करता है और पुण्यमयी तथा फलप्रदायिनी भगवान की कथा को भक्तियुक्त होकर सुनता है, उसे भगवान सत्यनारायण की कृपा से धन-धान्य आदि की प्राप्ति होती है।

दरिद्र धनवान हो जाता है, बन्धन में पड़ा हुआ बन्धन से मुक्त हो जाता है, डरा हुआ व्यक्ति भय मुक्त हो जाता है – यह सत्य बात है, इसमें संशय नहीं। इस लोक में वह सभी ईप्सित फलों का भोग प्राप्त करके अन्त में सत्यपुर वैकुण्ठलोक को जाता है। इस प्रकार मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से मुक्त हो जाता है।

कलियुग में तो भगवान सत्यदेव की पूजा विशेष फल प्रदान करने वाली है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कोई ईश और कोई सत्यदेव तथा दूसरे लोग सत्यनारायण नाम से कहेंगे। अनेक रूप धारण करके भगवान सत्यनारायण सभी का मनोरथ सिद्ध करते हैं।

कलियुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्यव्रत रूप धारण करके सभी का मनोरथ पूर्ण करने वाले होंगे। हे श्रेष्ठ मुनियों! जो व्यक्ति नित्य भगवान सत्यनारायण की इस व्रत-कथा को पढ़ता है, सुनता है, भगवान सत्यारायण की कृपा से उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। हे मुनीश्वरों! पूर्वकाल में जिन लोगों ने भगवान सत्यनारायण का व्रत किया था, उसके अगले जन्म का वृतान्त कहता हूं, आप लोग सुनें।

महान प्रज्ञासम्पन्न सत्यनारायण व्रत करने के प्रभाव से दूसरे जन्म में सुदामा हुए और उस जन्म में भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करके उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया। लकड़हारा भिल्ल गुहों का राजा हुआ और अगले जन्म में उसने भगवान श्रीराम की सेवा करके मोक्ष प्राप्त किया।

महाराज उल्कामुख दूसरे जन्म में राजा दशरथ हुए, जिन्होंने श्रीरंगनाथजी की पूजा करके अन्त में वैकुण्ठ प्राप्त किया। इसी प्रकार धार्मिक और सत्यव्रती साधु पिछले जन्म के सत्यव्रत के प्रभाव से दूसरे जन्म में मोरध्वज नामक राजा हुआ। उसने आरे से चीरकर अपने पुत्र की आधी देह भगवान विष्णु को अर्पित कर के मोक्ष प्राप्त किया।

महाराजा तुंगध्वज जन्मान्तर में स्वायम्भुव मनु हुए और भगवत्सम्बन्धी सम्पूर्ण कार्यों का अनुष्ठान करके वैकुण्ठलोक को प्राप्त हुए। जो गोपगण थे, वे सब जन्मान्तर में व्रजमण्डल में निवास करने वाले गोप हुए और सभी राक्षसों का संहार करके उन्होंने भी भगवान का शाश्वत धाम गोलोक प्राप्त किया। इस प्रकार श्रीस्कन्दपुराण के अन्तर्गत रेवाखण्ड में श्रीसत्यनारायणव्रत कथा का यह पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।

॥ इति सत्यनारायण व्रत कथा पञ्चम अध्याय सम्पूर्ण ॥

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्र. सत्यनारायण व्रत क्यों करते हैं?

उ.श्री सत्यनारायण व्रत अभीष्ट फल प्रदान करने वाला है|

प्र. सत्यानारण भगवान की कथा कब करनी चाहिए?

उ.श्री सत्यनारायण व्रत सांयकाल में किसी भी दिन या शुभ कार्य से पहले किया जा सकता है। सक्राति, पूर्णमासी अमावस्या या एकादशी में सत्यदेव का पूजन अति उत्तम माना गया है।

प्र. सत्यनारण व्रत कथा का उल्लेख किस ग्रथ में मिलता है?

उ.सत्यनारायण व्रत कथा स्कन्दपुराण के रेवाखण्ड से संकलित की गई है।

प्र. सत्यनारायण व्रत कथा में कितने श्लोक और अध्याय है ?

उ.सत्यनारायण व्रत में 170 श्लोक है जो पाँच अध्यायों में बँटे हुए हैं।


Mohini Ekadashi Vrat Katha: पढ़े सम्पूर्ण मोहिनी एकादशी व्रत कथा

मोहिनी एकादशी व्रत कथा: एकादशी तिथि हिन्दू धर्म में बहुत ही महत्व रखती है| एकादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तों को सौभाग्य की प्राप्ति होती है| वैशाख के महीने में आने वाली एकादशी को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| हिन्दू धर्म के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की सम्पूर्ण विधि – विधान से पूजा की जाती है|

भगवान विष्णु की पूजा तब तक पूर्ण नहीं होती है, जब तक मोहिनी एकादशी व्रत कथा का जाप नहीं किया जाए| पौराणिक कथाओं के अनुसार जब समुन्द्र मंथन में अमृत का कलश निकला था तो अमृत कलश को दानवों से दूर रखने के लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी का अवतार धारण किया था|

मोहिनी एकादशी व्रत कथा

इस कारण भगवान विष्णु के मोहिनी अवतार की पूजा के साथ – साथ मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) को भी पढ़ा जाता है| जो भी भक्त इस इस एकादशी के दिन मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) पढता या सुनता है, उसे एक हजार को गायों को दान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है|

साथ ही पूर्ण श्रद्धा से भगवान विष्णु भगवान की पूजा करने से भक्तों के सभी कष्ट दूर हो जाते है| आइये जानते है मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) के बारे में|

इसके आलवा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे अंगारक दोष पूजा (Angarak Dosh Puja), विवाह पूजा (Marriage Puja), तथा गृह प्रवेश पूजा (Griha Pravesh Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है| इसी के साथ हमसे जुड़ने के लिए आप हमारे Whatsapp पर भी हमसे संपर्क कर सकते है|

मोहिनी एकादशी व्रत का महत्व – Importance of Mohini Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से कहा कि हे भगवन ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ| मैंने आपके द्वारा वैशाख मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे वरूथिनी एकादशी भी कहा जाता है, के बारे सम्पूर्ण विस्तार से सुना है| किन्तु आप अब मुझे वैशाख मास के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में बताइए कि इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से क्या फल प्राप्त होता है?

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इस पर भगवान श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा कि – हे धर्मराज ! वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को मोहिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| इस एकादशी का व्रत करने से भक्तों को सम्पूर्ण पापों एवं दुखों से छुटकारा प्राप्त होता है|

हे युधिष्ठिर ! मैं तुम्हे बता दूँ कि इस एकादशी के दिन मोहिनी एकादशी व्रत कथा (Mohini Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का बहुत ही महत्व है| इसके सन्दर्भ में जो कथा मैं बताने वाला हूँ| वह कथा महर्षि वशिष्ठ जी ने श्री राम को सुनाई थी|

मोहिनी एकादशी व्रत कथा – Mohini Ekadashi Vrat Katha

एक समय की बात है भगवान श्री राम में महर्षि वशिष्ठ जी से कहा कि – हे गुरुदेव ! मैंने सीता जी के वियोग में कई सारे दुखों को भोग है| अतः मुझे ऐसे व्रत के बारे में बताइए जिससे समस्त पाप और दुःख नष्ट हो जाए| इस पर महर्षि वशिष्ठ जी ने भगवान श्री राम से कहा – हे राम ! आपके द्वारा पूछा गया प्रश्न बहुत ही अच्छा है| आपकी बुद्धि अत्यंत ही पवित्र है| आपका नाम लेने मात्र से ही भक्तों की आत्मा पवित्र हो जाती है|

वैशाख माह के शुक्ल में आने वाली एकादशी को मोहिनी एकादशी कहा जाता है| जो भी मनुष्य मोहिनी एकादशी का व्रत करता है| उस मनुष्य के जीवन से समस्त दुःख व पाप नष्ट हो जाते है| मैं अब इसकी कथा कहता हूँ| इस ध्यानपूर्वक सुनो|

प्राचीन समय में सरस्वती नदी के किनारे भद्रावती नामक राज्य में द्युतिमान नामक राजा का शासन था| उस राज्य में ही धन – धान्य से संपन्न धनपाल नाम का एक वैश्य भी रहता था| वह भगवान विष्णु का बहुत ही बड़ा भक्त था| उसने सम्पूर्ण भद्रावती नगरी कई सारे कुँए, धर्मशाला, भोजनालय, सरोवर, प्याऊ आदि का निर्माण एवं सड़कों पर आम, नीम, जामुन इत्यादि विभिन्न प्रकार के कई पेड़ भी लगवाये थे|

धनपाल के पांच पुत्र थे – सुमना, मेधावी, सद्बुद्धि, धृष्टबुद्धि एवं सुकृति| इन्हें धृष्टबुद्धि नामक पुत्र बहुत ही पापी था| धृष्टबुद्धि पितरों को नहीं मानता था| इसके अलावा वह गलत संगतियों में रहकर जुआ खेलता, पर – स्त्री के भोग विलास करता एवं मांस – मदिरा का भी सेवन करता था|

इसी प्रकार गलत कर्मों में वह अपने पिता के धन को नष्ट कर रहा था| जब पिता को इन सब के बारे में ज्ञात हुआ तो उन्होंने परेशान होकर धृष्टबुद्धि को घर से निकाल दिया|

मोहिनी एकादशी व्रत कथा

पिता के द्वारा घर से निकलने के पश्चात उसने कुछ समय तक अपने वस्त्र एवं गहनों को बेचकर अपना जीवन यापन किया| किन्तु जब उसके पास धन समाप्त हो गया तो उसके सभी दुराचारी साथियों ने उसका साथ छोड़ दिया| इसके बाद वह भूख – प्यास से परेशान हो गया|

कोई मार्ग ना दिखने पर धृष्टबुद्धि ने चोरी करना प्रारम्भ कर दिया| जब प्रथम बार वह चोरी करता हुआ पकड़ा गया तो लोगों ने वैश्य का पुत्र जानकार उसे चेतावनी देकर छोड़ दिया| लेकिन जब वह दूसरी बार चोरी करता पकड़ा गया तो राजा की आज्ञा के अनुसार उसे कारागार में डाल दिया गया|

धृष्टबुद्धि को कारागार में बहुत यातनाएं दी गयी| इसके पश्चात राजा ने उसे राज्य से निकाल दिया| इसके पश्चात के वह जंगल की ओर चला गया और वहां पशु – पक्षियों को मारकर खाने लगा| कुछ समय के बाद में वह बहेलिया बन गया| वह धनुष – बाण लेकर पशु – पक्षियों का शिकार करके उन्हें खाता था|

एक दिन की बात है वह भोजन की तलाश में इधर – उधर भटक रहा था| भोजन की तलाश करते हुए वह ऋषि कौण्डिन्य के आश्रम में पहुँच गए| कौण्डिन्य ऋषि गंगा स्नान करके आ रहे थे तो उनके गीले कपड़ों से गंगा जल के छींटे उस पर भी गिरे| जिससे उसे सद्बुद्धि प्राप्त हुई|

इसके बाद में धृष्टबुद्धि ने कौण्डिन्य ऋषि के पास जाकर हाथ जोड़ते हुए कहा – हे महामुनि ! मैंने अपने जीवन में कई सारे पाप किये है| कृपया आप मुझे इन सभी पापों से मुक्ति पाने के लिए बिना धन का उपाय बताइए| धृष्टबुद्धि के ऐसे वचन सुनकर कौण्डिन्य ऋषि उससे प्रसन्न हुए और उससे कहा कि तुम वैशाख माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली मोहिनी एकादशी का व्रत करो| इस व्रत को करने से मनुष्य के पर्वत के समान पाप भी नष्ट हो जाते है|

ऋषि कौण्डिन्य के मुख से यह बात सुनकर वह बहुत ही प्रसन्न हुआ और उनके द्वारा बताई गई विधि के अनुसार उसने मोहिनी एकादशी के व्रत को किया| हे राम ! मोहिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो गए और अंत में वह गरुड़ जी पर बैठकर विष्णुलोक को गया|

इस व्रत को करने से सभी प्रकार के मोह से छुटकारा मिलता है| इस व्रत कथा के महात्म्य को पढने अथवा सुनने से एक हजार गायों को दान करने के समान फल प्राप्त होता है|

Kamada Ekadashi Vrat Katha: जाने कामदा एकादशी व्रत कथा व महत्व

Kamada Ekadashi Vrat Katha: अन्य एकादशी तिथियों की तरह ही कामदा एकादशी का भी हिन्दू धर्म में बहुत ही महत्व है| चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है| कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान होता है| कामदा एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा करने से भक्तों को भगवान विष्णु का आशीर्वाद प्राप्त होता है|

इस एकादशी के दिन कामदा एकादशी व्रत कथा (Kamada Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करना तथा इसका कथा का श्रवण करना बहुत ही शुभ माना जाता है| इससे भक्तों की सभी मनोकामनाएं भी पूर्ण होती है| इस तिथि के दिन केवल फलाहार करते हुए कामदा एकादशी का व्रत किया जाता है| आज इस लेख के माध्यम से हम कामदा एकादशी व्रत कथा (Kamada Ekadashi Vrat Katha) के बारे में पढ़ेंगे|

कामदा एकादशी व्रत कथा

इसके अलावा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे गृह प्रवेश पूजा (Griha Pravesh Puja), सरस्वती पूजा (Saraswati Puja), तथा रुद्राभिषेक पूजा (Rudrabhishek Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है|

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कामदा एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance Of Kamada Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से कहा कि – हे भगवान! मैं आपको शत – शत नमन करता हूं| आपने मुझे चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी , पापमोचनी एकादशी के बारे में बहुत ही अच्छे प्रकार तथा विस्तार से बताया| इसके पश्चात में आपसे विनती करता हूं – हे माधव! आप मुझे चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में मुझे सम्पूर्ण जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधि पूर्वक बताएं|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण से कहा – हे धर्मराज युधिष्ठिर! चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि कामदा एकादशी के नाम से जानी जाती है| एक बार यही प्रश्न राजा दिलीप के द्वारा महर्षि वशिष्ठ से किया गया था| इसके बारे में जो भी ऋषि वशिष्ठ ने राजा दिलीप को बताया, वही मैं तुम्हे बतलाता हूं|

कामदा एकादशी व्रत कथा – Kamada Ekadashi Vrat Katha

बहुत ही पुराने समय में एक भोगीपुर नाम का राज्य था| वहां पर एक पुण्डरीक नामक राजा का राज्य था जो कि अनेकों ऐश्वर्यों से युक्त था| इस राज्य में बहुत सारी अप्सराएँ, किन्नर तथा गांधर्व निवास करते थे| उसी स्थान पर एक ललिता तथा ललित नाम के दो स्त्री तथा पुरुष बहुत ही वैभवशाली घर में निवास करते थे|

उन दोनों पति – पत्नी में बहुत ही अधिक स्नेह था| यदि वह दोनों ज्यादा समय के लिए एक दुसरे से अलग हो जाते थे तो दोनों ही बहुत व्याकुल हो जाते थे| एक समय की बात है कि पुण्डरीक की सभा में सभी गंधर्वों के साथ ललित भी गान का कार्यक्रम कर रहा था|

कामदा एकादशी व्रत कथा

गान करते हुए उसे अपनी प्रिय ललिता का स्मरण आ गया| जिस कारण उसका स्वर बिगड़ने से सम्पूर्ण गान का स्वरुप बिगड़ गया| ललित के मन के भाव को जानकार कार्कोट नामक नाग में पद भंग होने के कारण उसने राजा से सम्पूर्ण बात कह दी| इस कारण राजा पुण्डरीक ने क्रोध में उससे कहा कि तु मेरे समक्ष गाते हुए अपनी पत्नी का स्मरण कर रहा है|

इसलिए सजा के रूप में तुझे नरभक्षी दैत्य बनकर अपने कर्मों का फल भोगना होगा| राजा पुण्डरीक के द्वारा दिए गए श्राप के कारण उसी समय ललित एक बहुत ही भयानक तथा विशालकाय राक्षस के रूप में परिवर्तित हो गई| उसका मुख बहुत भयंकर, नेत्र सूर्य – चंद्रमा के समान प्रदीप्त तथा उसके मुख से अग्नि भी निकल रही थी|

उसका सम्पूर्ण शरीर भी पर्वत के समान विशालकाय हो गया| इस प्रकार वह राक्षस बनकर अनेकों प्रकार के दुखों को भोगने लगा| यह बात जब ललित की पत्नी को पता लगी तो उसे बहुत ही दुःख हुआ तथा वह अपने पति को इस श्राप से मुक्त करने के मार्ग के बारे में सोचने लगी|

उसका राक्षस रूपी पति वन में रहकर अनेक प्रकार के दुःख सहने लगा| उसकी पत्नी ललिता उसके पीछे जाती तथा विलाप करती| एक बार ललिता अपने पति का पीछा करती हुई विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई| उस पर्वत पर ऋषि श्रृंगी का आश्रम था| ललिता उनके पास गई तथा उनसे प्रार्थना करने लगी|

उसे देखकर ऋषि श्रृंगी ने कहा – हे सुभगे! आप कौन है तथा यहाँ किस लिए आई हो? इस पर ललिता ने कहा कि – हे मुनि! मेरा नाम ललिता है तथा मेरे पति राजा पुण्डरीक के द्वारा दिए गए श्राप के कारण राक्षस बन गए है| उनके उद्धार का कोई उपाय बताइए| इस पर मुनि श्रृंगी ने कहा – हे कन्या! अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसे कामदा एकादशी के नाम से जाना जाता है|

इस उपवास को करने से मनुष्य के सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होते है| यदि तुम इस कामदा एकादशी का व्रत करके उसका पुण्य अपने पति को प्रदान कर दो तो शीघ्र ही तुम्हारे पति को राक्षस योनि से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी|

ऋषि के कहे अनुसार ही ललिता ने चैत्र शुक्ल में आने वाली का व्रत किया तथा द्वादशी तिथि के दिन ब्राह्मणों के सामने अपने व्रत का फल अपने पति को देती हुई भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगी – हे प्रभु! मैंने जो यह व्रत किया है इसका फल मेरे पति देव को प्राप्त हो जिससे उन्हें जल्द ही इस राक्षस से योनि से मुक्त हो जाए| एकादशी उपवास का फल जैसे ही उसके पति को राक्षस योनि से मुक्ति प्राप्त हो गई तथा इसके पश्चात वह दोनों विमान में बैठकर स्वर्गलोक की ओर चले गए|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.कामदा एकादशी कब आती है?

A.चैत्र माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि कामदा एकादशी के नाम से जानी जाती है|

Q.कामदा एकादशी का जाप करने से क्या फायदा है?

A. इस एकादशी का जाप करने से मनुष्य के समस्त पाप नष्ट होते है तथा राक्षस योनि से मुक्ति भी प्राप्त होती है|

Q.ललित को राक्षस योनि में भटकने का श्राप किसने व क्यों दिया?

A.गान करते हुए उसे अपनी प्रिय ललिता का स्मरण आ गया| जिस कारण से उसका स्वर बिगड़ गया, जिससे सम्पूर्ण गान का स्वरुप बिगड़ गया| ललित के मन के भाव को जानकार कार्कोट नामक नाग में पद के कारण राजा से सम्पूर्ण बात कह दी| इस कारण राजा पुण्डरीक ने क्रोध में उससे कहा कि तुम मेरे समक्ष गाते हुए अपनी पत्नी का स्मरण कर रहा है| राजा पुण्डरीक के द्वारा दिए गए श्राप के कारण उसी समय ललित एक बहुत ही भयानक तथा विशालकाय राक्षस के रूप में परिवर्तित हो गई|

Q.ललिता ने अपने पति को श्राप से मुक्त करने के लिए किससे सहायता मांगी?

A.एक बार ललिता अपने पति का पीछा करती हुई विन्ध्याचल पर्वत पर पहुँच गई| उस पर्वत पर ऋषि श्रृंगी का आश्रम था| ललिता उनके पास गई तथा उनसे प्रार्थना करने लगी|

Amalaki Ekadashi Vrat Katha: आमलकी एकादशी व्रत कथा

Amalaki Ekadashi Vrat Katha: हिन्दू धर्म में एकादशी तिथि का बहुत ही महत्व माना जाता है| एकादशी तिथि का दिन भगवान विष्णु को समर्पित किया जाता है| हिन्दू धर्म के अनुसार फाल्गुन माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को आमलकी एकादशी के रूप में मनाया जाता है| इस आमलकी एकादशी पर भगवान विष्णु के साथ – साथ आंवले के पेड़ की भी पूजा की जाती है| इस व्रत का पूर्ण रूप से फल पाने के लिए आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करना चाहिए|

आमलकी एकादशी व्रत कथा

आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का जाप तथा उपवास करने से 100 गाय दान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है तो आइये जानते है कि आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का महत्व तथा आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) के बारे में|

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे खाटू श्याम चालीसा [Khatu Shyam Chalisa], सरस्वती आरती [Saraswati Aarti], या जया एकादशी व्रत कथा [Jaya Ekadashi Vrat Katha] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है| इसके अलावा आप हमारे एप 99Pandit For Users पर भी आरतियाँ व अन्य कथाओं को पढ़ सकते है| इस एप में सम्पूर्ण भगवद गीता के सभी अध्यायों को हिंदी अर्थ समझाया गया है|

आमलकी एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance of Amalaki Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन! आपने मुझसे फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे विजया एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधि पूर्वक बताएं|

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भगवान श्री कृष्ण ने उनसे कहा कि – हे राजन! फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी को आमलकी एकादशी कहा जाता है| जो भी व्यक्ति इस एकादशी का व्रत करता है तथा आमलकी एकादशी व्रत कथा (Amalaki Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करता है, उस व्यक्ति के जीवन के सभी पाप नष्ट हो जाते है| एक एकादशी के व्रत करने से एक हज़ार गायों का दान करने के समान पुण्य की प्राप्ति होती है| हे राजन, अब मैं आपको उस कथा के बारे में कहूँगा जो महर्षि वशिष्ठ ने राजा मांधाता को सुनाई थी|

आमलकी एकादशी व्रत कथा – Amalaki Ekadashi Vrat Katha

राजा मान्धाता ने ऋषि वशिष्ठ जी से कहा कि – हे ऋषिवर! कृपया मुझ पर कृपा करके एक ऐसी व्रत कथा कहिये, जिसको केवल सुनने मात्र से ही मेरा उद्धार हो जावे| इस पर ऋषि वशिष्ठ से कहा – हे मान्यवर! सभी व्रतों में से सबसे उत्तम तथा अंत में मोक्ष प्रदान करने वाली केवल आमलकी एकादशी ही है|

यह एकादशी फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की तिथि को आती है| एक वैदिश नाम का राज्य था| उस राज्य में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शुद्र चारों वर्णों के लोग बहुत ही आनंद के साथ रहते थे| उस नगरी में हमेशा केवल वेदों की ध्वनि ही सुनाई देती थी तथा पाप, द्वेष आदि उस राज्य में कुछ नहीं था|

आमलकी एकादशी व्रत कथा

उस राज्य के शासक का नाम चैतरथ था| वह राजा बहुत ही विद्वान तथा धर्मी था| उस राज्य में कोई भी व्यक्ति गरीब या कंजूस नहीं था| वहां की एक बात बहुत ही अद्भुत थी कि उस नगर के सम्पूर्ण लोग केवल भगवान विष्णु के भक्त थे तथा सभी लोग एकादशी तिथि का उपवास करते थे|

एक बार जब फाल्गुन माह के शुक्ल पक्ष की आमलकी एकादशी आई तो उस राज्य के राजा, उनकी प्रजा तथा सभी लोगों के द्वारा इस एकादशी का बहुत ही उत्साह के साथ उपवास किया गया| इसके पश्चात राजा अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ मंदिर गये व मंदिर जाकर कुंभ स्थापित करके धूप, नैवेद्य, पंचरत्न इत्यादि से आंवले के पौधे का पूजन करने लगे|

इसके बाद इस प्रकार से स्तुति करने लगे – हे धात्री! आप ब्रह्मस्वरूप हो, आप ब्रह्माजी के द्वारा उत्पन्न हुए हो तथा समस्त पापों का नाश करने वाले हो| कृपा करके मेरा अर्घ्य को स्वीकार करे| आप भगवान अहरी रामचंद्र जी के द्वारा समर्पित है|

मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि आप मेरे सभी पापों को नष्ट कर दे| इसके पश्चात सभी नगरवासियों ने उस मंदिर में रात्रि को जागरण किया| रात के उस मंदिर में एक बहेलिया आया, जो की बहुत पापी तथा दुराचारी प्रवृत्ति का था| भूख तथा प्यास से परेशान होकर वह बहेलिया मंदिर में जागरण होता हुआ देख एक कोने में जाकर बैठ गया|

जागरण में वह बहेलिया भगवान विष्णु की आमलकी एकादशी के महात्म्य को सुनाने लगा| इस प्रकार उसने सभी लोगों की तरह सारी रात जागकर ही बिता दी| सुबह होने के पश्चात जब सभी लोग अपने – अपने घर चले गए तो वह बहेलिया भी अपने घर की ओर चला गया| घर पहुँच कर उसने भोजन किया तथा कुछ समय के पश्चात ही उस बहेलिये की मृत्यु हो गई|

किन्तु आमलकी एकादशी का महात्म्य सुनने तथा सारी रात जागरण करने के कारण उसे राजा विदूरथ के घर में जन्म लिया एवं उसका नाम वसुरथ रखा गया| जब वह युवा हुआ तो वह उसकी चतुरंगिनी सेना के साथ तथा धन – धान्य से युक्त होकर 10 हज़ार गाँवों का पालन – पोषण करने लगा| उसका तेज सूर्य से समान था, कांति में वह चंद्रमा के समान, वीरता में भगवान विष्णु की भांति एवं क्षमा में पृथ्वी के समान था| वह बहुत ही धार्मिक, कर्मवीर तथा भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था|

वह उसकी प्रजा समान रूप से भरण – पोषण करता था| एक दिन राजा शिकार करने के लिए गया| देवयोग के कारण वह अपना मार्ग भटक गया तथा दिशा के बारे पता न होने के कारण वह एक वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगा| कुछ समय के पश्चात उस स्थान पहाड़ी म्लेच्छ आ गये तथा राजा को अकेला पाकर मारो, मारों तेज आवाज़ में बोलते हुए राजा की दौड़े| म्लेच्छ कहने लगे कि यह वही राजा ने जिसने हमारे परिवार के सदस्यों का वध किया है तथा उन्हें राज्य से बाहर निकाल दिया| इस कारण इसे निश्चित रूप मारना चाहिए|

उन्होंने राजा को मारने के लिए कई सारे अस्त्र-शस्त्र राजा की ओर फेंके, लेकिन उस शस्त्रों से राजा को किसी भी प्रकार की कोई हानि नहीं हुई बल्कि वह सभी अस्त्र राजा पर फूल बनकर गिरने लगे| इसके बाद उन अस्त्रों से म्लेच्छों के अस्त्र स्वयं उन पर ही आक्रमण कर लगे जिस कारण सभी कई म्लेच्छ मूर्छित हो गए| कुछ समय बाद राजा के शरीर से एक बहुत ही सुन्दर देवी प्रकट हुई| उन्होंने उन सभी म्लेच्छों का वध कर दिया|

जब राजा उठा तो उसने सभी म्लेच्छों को मरा हुआ पाया तथा वह कहने लगा कि इस वन में मेरा ऐसा कौनसा हितेषी है जिसने मेरी सहायता की| वह ऐसा विचार कर ही रहा था कि कुछ समय के बाद आकाशवाणी हुई – हे राजा! इस संसार में भगवान विष्णु के अलावा और कौन है जो तेरी सहायता कर सकता है| यह आकाशवाणी सुनकर राजा अपने राज्य लौट गया तथा सुख के साथ अपना राज्य करने लगा|

Varuthini Ekadashi Vrat Katha: पाठ करे वरूथिनी एकादशी व्रत कथा का

Varuthini Ekadashi Vrat Katha: वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि के दिन वरूथिनी एकादशी का उपवास किया जाता है| वरूथिनी एकादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है तथा वरूथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) का श्रवण भी किया जाता है| वरूथिनी एकादशी के दिन वरूथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करने से जातको को शुभ फल की प्राप्ति होती है|

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

सभी एकादशी तिथि का एक अलग महत्व है| वरूथिनी एकादशी का व्रत करने से जातक को शारीरिक तथा मानसिक कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है| इस एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को मृत्यु के पश्चात मुक्ति भी मिल जाती है| आइये जानते है वरूथिनी एकादशी तथा वरूथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) के बारे में|

इसके अलावा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे गृह प्रवेश पूजा (Griha Pravesh Puja), सत्यनारायण पूजा (Satyanarayan Puja), तथा विवाह पूजा (Marriage Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है|

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वरूथिनी एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance of Varuthini Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे चैत्र महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे कामदा एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले है|

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अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि वैशाख माह शुक्ल एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका कथा क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधि पूर्वक बताएं|

इस पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा – हे राजन! वैशाख माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि वरूथिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| यह वरूथिनी एकादशी व्रत कथा का प्रभाव सौभाग्य प्रदान करने वाली, समस्त पापों को नष्ट करने वाला तथा अंत के समय में मोक्ष प्रदान करने वाला है| इस वरूथिनी एकादशी व्रत कथा (Varuthini Ekadashi Vrat Katha) के बारे में अब मैं तुमसे कहने वाला हूँ|

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा – Varuthini Ekadashi Vrat Katha

पौराणिक काल में नर्मदा नदी के किनारे पर एक मान्धाता नामक एक राजा राज था| कहा जाता है कि वह राजा बहुत ही तपस्वी तथा दानवीर थे| एक समय की बात है कि वह राजा जंगल के बीच में अपनी तपस्या में लीन थे| कुछ समय पश्चात वहां पर एक जंगली भालू आ गया तथा तपस्या में लीन राजा के पैर को चबाने लगा| कुछ देर के बाद वह भालू राजा का पैर चबाता हुआ उन्हें घसीट कर जंगल में ले गया|

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

जब वह भालू राजा को घसीट कर ले जा रहा था| तब राजा बहुत घबरा रहे थे किन्तु तापस धर्म की पालना करते हुए उन्होंने क्रोध तथा हिंसा न करके वह भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगा व करुणा भाव से उन्हें पुकारने लगा| राजा की पुकार सुनकर भगवान विष्णु उसकी सहायता हेतु प्रकट हुए| जिसके पश्चात भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उस भालू का वध कर दिया किंतु तब तक वह भालू राजा का पूरा पैर खा चुका था|

अपने पैर को गवाने के कारण राजा मान्धाता विलाप कर रहे थे| जिसे देख भगवान विष्णु को बहुत ही दुःख हुआ तथा उन्होंने राजा से कहा – हे वत्स! तुम इसका शोक मत करो| इस भालू ने जो तुम्हारा हाल किया है, यह तुम्हारे पिछले जन्म का अपराध है| इसकी पूर्ति के लिए तुम मथुरा में जाओ तथा वहां जाकर मेरे वराह अवतार की पूजा करो तथा वरूथिनी एकादशी व्रत करो| वरूथिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से तुम पुनः सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे|

भगवान विष्णु के कहे अनुसार राजा मान्धाता मथुरा नगरी में गए तथा पूर्ण श्रद्धा के साथ वरूथिनी एकादशी व्रत को किया| इस एकादशी व्रत के प्रभाव से राजा का शरीर पुनः सुदृढ़ अंगों वाला हो गया तथा इस वरूथिनी एकादशी का व्रत करने के कारण राजा को स्वर्ग की प्राप्ति हुई| इसलिए जो भी व्यक्ति भय से पीड़ित हो, उसे वरूथिनी एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.वरुथिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के किस अवतार की पूजा होती है?

A.इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु के वराह अवतार की पूजा की जाती है|

Q.वरुथिनी एकादशी व्रत कथा का क्या महत्व है?

A.यह वरूथिनी एकादशी तिथि सौभाग्य प्रदान करने वाली, समस्त पापों को नष्ट करने वाली तथा अंत के समय में मोक्ष प्रदान करने वाली है|

Q.वरूथिनी एकादशी कब आती है?

A.वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी के दिन वरूथिनी एकादशी का उपवास किया जाता है|

Q.राजा मान्धाता को भगवान विष्णु ने उनके सुदृढ़ अंगों को पुनः पाने के लिए क्या मार्ग बताया?

A.भगवान विष्णु बोले – इस भालू ने जो तुम्हारा हाल किया है, यह तुम्हारे पिछले जन्म का अपराध है| इसकी पूर्ति के लिए तुम मथुरा में जाओ तथा वहां जाकर मेरे वराह अवतार की पूजा करो तथा वरूथिनी एकादशी का व्रत करो| वरूथिनी एकादशी व्रत के प्रभाव से तुम पुनः सुदृढ़ अंगों वाले हो जाओगे|

Vijaya Ekadashi Vrat Katha: विजया एकादशी व्रत कथा

Vijaya Ekadashi Vrat Katha: धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन महीने में आने वाली एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है| भगवान विष्णु जी की कृपा पाने के लिए एकादशी के व्रत का बहुत ही महत्व है| विजया एकादशी का व्रत तथा विजया एकादशी व्रत कथा (Vijaya Ekadashi Vrat Katha) का जाप करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है तथा विजया एकादशी का उपवास करने से भक्तों को सभी प्रकार के कष्टों से मुक्ति प्राप्त होती है|

विजया एकादशी व्रत कथा

किसी भी एकादशी व्रत को उसकी व्रत कथा का जाप किये बिना अधूरा माना जाता है| इसी कारण आज इस लेख के माध्यम से हम आपको विजया एकादशी व्रत कथा (Vijaya Ekadashi Vrat Katha) बताने जा रहे है जो भी भक्त फाल्गुन माह में आने वाली एकादशी का व्रत करता है| उसे इस विजया एकादशी व्रत कथा का जाप जरूर करना चाहिए|

प्रत्येक महीने की कृष्ण पक्ष की एकादशी को विजया एकादशी का व्रत किया जाता है| इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान होता है| इस दिन सम्पूर्ण विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा तथा विजया एकादशी का उपवास करने से भक्तों को शुभ फल की प्राप्ति होती है|

इसी के साथ यदि आप किसी भी आरती या चालीसा जैसे खाटू श्याम जी की आरती [Khatu Shyam ji Ki Aarti], कनकधारा स्तोत्र  [Kanakdhara Stotra], या पापमोचनी एकादशी व्रत कथा [Papmochani Ekadashi Vrat Katha] आदि भिन्न-भिन्न प्रकार की आरतियाँ, चालीसा व व्रत कथा पढना चाहते है तो आप हमारी वेबसाइट 99Pandit पर विजिट कर सकते है|

इसके अलावा आप हमारे एप 99Pandit For Users पर भी आरतियाँ व अन्य कथाओं को पढ़ सकते है| इस एप में सम्पूर्ण भगवद गीता के सभी अध्यायों को हिंदी अर्थ समझाया गया है|

विजया एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance of Vijaya Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे माघ महीने के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे जया एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले है|

अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधि पूर्वक बताएं|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण ने बोला – हे राजन! फाल्गुन मास में आने वाली एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है| जो भी भक्त विजया एकादशी का उपवास करता है, उसे हर क्षेत्र में विजय प्राप्त होती है| भगवान श्री कृष्ण कहते है कि इस एकादशी के दिन विजया एकादशी व्रत कथा (Vijaya Ekadashi Vrat Katha) को पढ़ना अथवा सुनना मनुष्य के सभी पापों को नष्ट कर देता है|

यदि आप किसी ऐसी परिस्थिति में हो, जिसमें चारों ओर से शत्रुओं से घिरे हुए हो, आपका विजय होना संभव न हो| उस समय विजया एकादशी व्रत आपको हर कार्य में विजयी बनाने की क्षमता रखता है|

विजया एकादशी व्रत कथा – Vijaya Ekadashi Vrat Katha

बहुत ही पुराने समय की बात है एक बार भगवान नारद जी ने इस जगत के सृजनकर्ता (जगत पिता) ब्रह्मा जी से कहा – हे प्रभु! आप मुझसे फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली विजया एकादशी के विधान के बारे में कहिये|

इस पर ब्रह्मा जी ने कहा कि – हे नारद देवता! विजया एकादशी का व्रत करने सभी कालों के पापों का नाश होता है| विजया एकादशी की विधि के बारे में अभी तक मैंने किसी को भी नहीं बताया है| विजया एकादशी का विधि पूर्ण उपवास करना जातक को किसी भी परिस्थिति में विजयी बना सकता है|

विजया एकादशी व्रत कथा

त्रेता युग के समय भगवान विष्णु के अवतार मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री रामचंद्र जी को चौदह वर्ष के लिए जब वनवास जाना पड़ा था| तब वह अपने छोटे भाई श्री लक्ष्मण तथा उनकी धर्मपत्नी माता सीता के साथ पंचवटी वन की ओर निकल गए तथा वही पर ही निवास करने लगे|

उसी समय दुष्ट रावण ने माता सीता का छल से हरण कर लिया| इसकी सूचना जब भगवान श्री राम तथा लक्ष्मण जी को ज्ञात हुई तो वह अत्यंत व्याकुलता के साथ माता सीता की खोज ने निकल पड़े| माता सीता की खोज करते हुए उन्हें मार्ग में जटायु मरणासन्न की स्थिति में मिले|

जटायु जी ने उन्हें सीता माता हुआ सम्पूर्ण वृत्तांत बता दिया तथा अंत में स्वर्गलोक पधार गए| जटायु जी के कहे अनुसार भगवान श्री राम वानर राज सुग्रीव के पास पहुंचे तथा उनसे मित्रता की| सुग्रीव की सहायता हेतु भगवान श्री राम ने सुग्रीव के भाई बाली का भी वध किया| इसके पश्चात हनुमान जी ने लंका जाकर माता सीता को प्रभु श्री राम तथा सुग्रीव की मित्रता तथा अन्य बातों के बारे में बताया| वहां से लौटने के पश्चात हनुमान जी ने प्रभु श्री राम को सम्पूर्ण समाचार दे दिया|

इसके बाद भगवान श्री राम ने सुग्रीव तथा उनकी सम्पूर्ण वानर सेना के साथ लंका की ओर प्रस्थान किया| जब भगवान श्री राम किनारे पर पहुंचे तो वहां पर मगरमच्छों से युक्त उस अनंत सागर को देख उन्होंने लक्ष्मण जी से कहा कि हम इस सागर को किस प्रकार पार करेंगे| इस पर श्री लक्ष्मण – हे भ्राता! आप आदिपुरुष है व सब कुछ जानते है| यहाँ से कुछ ही दूरी पर कुमारी द्वीप पर ऋषि वकदाल्भ्य रहते है| इस संदर्भ में वह हमारी सहायता अवश्य करेंगे|

लक्ष्मण की बात सुनकर भगवान श्री राम मुनि वकदाल्भ्य के आश्रम में पहुंचे तथा उन्हें प्रणाम करके उनके समीप बैठ गए| इसके पश्चात मुनि ने उनसे पूछा – हे राम! आपका यहाँ आना कैसे हुआ? इस पर भगवान श्री राम ने उनसे कहा कि – हे महात्मा! मैं अपनी सम्पूर्ण सेना के साथ राक्षसों के अंत करने के लिए लंका जा रहा हूँ| आप कृपा करके हमें इस विशाल समुद्र को पार करने का कोई मार्ग बताइए| मैं इस कारणवश आपके पास आया हूँ|

इस पर ऋषि वकदाल्भ्य ने उनसे कहा कि फाल्गुन माह में आने वाली एकादशी तिथि का विधिपूर्वक व्रत करने आपको निश्चित ही विजय की प्राप्ति होगी तथा यह आपको समुन्द्र पार करने में अवश्य सहायता करेगा| इस व्रत की विधि यह है कि दशमी तिथि के दिन सोना, चांदी, तांबा या मिट्टी का एक घड़ा बनाए|

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उस घड़े में जल भरकर तथा पांच पल्लव रखकर उसे वेदिका पर स्थापित करे| उस घड़े के ऊपर सतनजा तथा जौ रखे| इसके पश्चात भगवान विष्णु की स्वर्ण की मूर्ति को स्थापित करे| एकादशी तिथि के दिन स्नान आदि से निवृत होकर नैवेद्य, धूप, दीप नारियल आदि से भगवान श्रीनारायण की पूजा करे|

इसके पश्चात उस मूर्ति के सामने बैठकर ही अपना सम्पूर्ण दिन व्यतीत करना है तथा रात्रि में उसी भांति जागरण करना है| अगले दिन नित्य कार्यों से निवृत होकर उस घड़े को किसी ब्राह्मण को दे देवे| हे राम! यदि आप इस व्रत को अपने सभी सेनापतियों के साथ करते है तो युद्ध में अवश्य ही विजय प्राप्त होगी| भगवान श्री राम ने ऋषि वकदाल्भ्य के कहे अनुसार व्रत किया तथा युद्ध में विजय प्राप्त की|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.विजया एकादशी कब आती है?

A.धार्मिक मान्यताओं के अनुसार फाल्गुन महीने में आने वाली एकादशी को विजया एकादशी के नाम से जाना जाता है|

Q.विजया एकादशी के दिन किस देवता की पूजा की जाती है?

A.समस्त एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित की जाती है| इसी कारण पापमोचनी एकादशी के दिन भी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है|

Q.भगवान श्री राम को विजया एकादशी व्रत करने के लिए किसने कहा था?

A.ऋषि वकदाल्भ्य ने प्रभु श्री राम से कहा कि फाल्गुन माह में आने वाली एकादशी तिथि का विधिपूर्वक व्रत करने आपको निश्चित ही विजय की प्राप्ति होगी तथा यह आपको समुन्द्र पार करने में अवश्य सहायता करेगा|

Q.विजया एकादशी का व्रत करने से क्या लाभ है?

A.इस एकादशी के दिन विजया एकादशी व्रत कथा को पढ़ना अथवा सुनना मनुष्य के सभी पापों को नष्ट कर देता है| यदि आप किसी ऐसी परिस्थिति में हो, जिसमें चारों ओर से शत्रुओं से घिरे हुए हो, आपका विजय होना संभव न हो| उस समय विजया एकादशी व्रत आपको हर कार्य में विजयी बनाने के क्षमता रखता है|

Papmochani Ekadashi Vrat Katha: पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

Papmochani Ekadashi Vrat Katha: हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाले एकदशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| हिन्दू धर्म के लोगों के द्वारा पापमोचनी एकादशी का व्रत किया जाता है| एकादशी तिथि का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है| पापमोचनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है| इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करने भक्तों को सभी प्रकार भी परेशानियों से रहत मिलती है|

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

इसी के साथ पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) का जाप करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है मान्यताओं के अनुसार कहा जाता है कि पापमोचनी एकादशी का उपवास करने तथा पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) का सच्ची श्रद्धा से जाप करने से सभी पापों से मुक्ति प्राप्त होती है तथा जीवन में आ रहे उतार-चढ़ाव भी कम होते है| इस एकादशी के दिन पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) का पाठ बहुत ही शुभ माना जाता है| आइये जानते है पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) के बारे में|

इसके अलावा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे रुद्राभिषेक पूजा (Rudrabhishek Puja), सरस्वती पूजा (Saraswati Puja), तथा गृह प्रवेश पूजा (Griha Pravesh Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है|यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है| बस आपको “Book a Pandit” विकल्प का चुनाव करना होगा और अपनी सामान्य जानकारी जैसे कि अपना नाम, मेल, पूजा स्थान, समय,और पूजा का चयन के माध्यम से आप अपना पंडित बुक कर सकेंगे|

पापमोचनी एकादशी का महत्व – Importance of Papmochani Ekadashi

अर्जुन भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे माघ शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे जया एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले है| अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि चैत्र माह के कृष्ण पक्ष मे आने वाली एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसकी व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधिपूर्वक बतलाए|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन से कहा – हे पार्थ! चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| एक समय की बात है कि पृथ्वीपति राजा मान्धाता ने लोमश ऋषि से यही प्रश्न किया था, जो कि तुम्हारे द्वारा मुझसे किया गया है| उसके पश्चात जो भी लोमश ऋषि ने राजा मान्धाता को बताया, वही मैं अब तुम्हे बताने जा रहा हूँ| राजा मान्धाता ने महर्षि लोमश जी से पूछा कि – हे ऋषिदेव! मनुष्य द्वारा किये गए पापों का मोचन किस प्रकार संभव है? कृपा करके हमे कोई ऐसा मार्ग बताये, जिससे सभी लोगों सरलता से अपने पापों से मुक्ति मिल जाए|

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा – Papmochani Ekadashi Vrat Katha

महर्षि लोमश ने कहा – हे राजन! चैत्र मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है| इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य सभी पाप नष्ट हो जाते है| अब मैं तुम्हे पापमोचनी एकादशी व्रत कथा (Papmochani Ekadashi Vrat Katha) के बारे में बता रहा हूँ जिसे तुम ध्यानपूर्वक सुनना| पौराणिक काल में चैत्ररथ नामक एक जंगल था| उस वन में अप्सराएँ किन्नरों के साथ विहार करती थी| उस स्थान पर हमेशा ही वसंत का मौसम रहता था| इसका अर्थ यह है कि उस स्थान हमेशा अलग-अलग प्रकार के पुष्प खिले हुए रहते थे| उस वन कभी गन्धर्व कन्याएं विहार किया करती थी, तो कभी भगवान इंद्र अन्य देवताओं के साथ वहां क्रीडाएं करते थे|

पापमोचनी एकादशी व्रत कथा

उसी वन में मेधावी नामक एक ऋषि भी अपनी तपस्या में लीन थे| वह भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे| एक दिन बात है जब एक अप्सरा जिसका नाम मञ्जुघोषा था, ने मेधावी ऋषि को मोहित करके उनकी निकटता का लाभ उठाने का सोचा, इसलिए वह ऋषि मेधावी से कुछ दूरी पर बैठ कर वीणा का वादन करने लगी| उसी समय कामदेव भी शिव भक्त ऋषि मेधावी को जीतने का प्रयास करने लगे| कामदेव ने उस सुन्दर अप्सरा के भ्रू को धनुष बनाया| कटाक्ष को उस धनुष की प्रत्यंचा बनायी तथा नेत्रो को मञ्जुघोषा का सेना पति बनाकर कामदेव अपने शत्रुभक्त को जीतने के लिए तैयार हुआ|

उस समय शिव भक्त ऋषि मेधावी युवावस्था में ही थे| उन्होंने यज्ञोपवित तथा दण्ड धारण कर रखा था| उस समय ऋषि मेधावी दूसरे कामदेव की भांति प्रतीत हो रहे थे| उन मुनि को देखकर कामदेव के वश में हो मञ्जुघोषा ने वीणा पर मधुर स्वर में गाना शुरू किया| जिससे ऋषि मेधावी उनके मीठे स्वर तथा उनके सौन्दर्य पर मोहित हो गए| ऋषि मेधावी उस अप्सरा के सौदर्य में मोहित होकर शिव रहस्य के बारे में भूल गए तथा काम के वश में होकर मञ्जुघोषा के साथ में रमण करने लगे| काम के वश में होने के कारण महर्षि मेधावी को दिन तथा रात के बारे में कुछ भी ज्ञात ना रहा तथा बहुत ही समय तक वह उस अप्सरा के साथ रमण करते रहे|

इसके पश्चात मञ्जुघोषा ने ऋषि मेधावी से कहा कि हे मुनि! अब मुझे बहुत समय हो गया है| अत: मुझे अब स्वर्ग जाने की आज्ञा देवे| अप्सरा की बात को सुनकर ऋषि मेधावी ने उनसे कहा कि हे मोहिनी! संध्या को तो आयी हो, प्रात:काल होने पर चली जाना| ऋषि मेधावी के यह वचन सुनकर अप्सरा उनके साथ रमण करने लगी| इस प्रकार दोनों ने बहुत अधिक समय एक दुसरे के साथ में व्यतीत किया| अप्सरा ने एक दिन मेधावी ऋषि से कहा कि हे ऋषिवर! अब मुझे स्वर्ग जाने की आज्ञा दीजिए|

इस बात पर मुनि ने वही कहा कि – हे रूपसी! अभी कुछ ज्यादा समय व्यतीत नहीं हुआ है, कुछ समय और रुको| मुनि की बात सुनकर मञ्जुघोषा ने कहा कि हे ऋषिवर! आपकी रात तो बहुत ही ज्यादा लम्बी है| आप स्वयं ही इस बारे में विचार कीजिये कि मुझे आपके पास आये कितना समय हो गया| अब मेरा यहाँ और अधिक ठहरना क्या सही है? मञ्जुघोषा की बात सुनने के पश्चात मुनि को समय का बोध हुआ तथा वह गंभीरता से इसके बारे में सोचने लगे| जब उन्हें समय का ज्ञान हुआ कि उन्हें रमण करते हुए 57 वर्ष हो चुके है तो मञ्जुघोषा को ऋषि मेधावी काल का रूप समझने लगे|

इतना अधिक समय भोग-विलास में व्यर्थ करने के कारण ऋषि मेधावी को बहुत अधिक क्रोध आया| अब वह भयंकर क्रोध में उनके ताप का नाश करने वाली उस मञ्जुघोषा अप्सरा की ओर देखने लगे| अत्यधिक क्रोध की वजह से उनकी समस्त इन्द्रियाँ बेकाबू हो गयी| क्रोध से थरथराते स्वर में ऋषि ने अप्सरा से कहा: मेरे तप को नष्ट करने वाली दुष्टा! तू महापापिन तथा बहुत दुराचारिणी है, तुझ पर धिक्कार है| अब तू मेरे श्राप से पिशाचिनी बन जा| ऋषि मेधावी के क्रोध युक्त श्राप के कारण वह अप्सरा पिशाचिनी बन गई|

यह सब देखकर वह व्यथित होकर बोली – हे ऋषिवर! अब मुझपर क्रोध को त्यागकर प्रसन्न होइए तथा कृपा करके मुझे इस श्राप से मुक्ति पाने का कोई उपाय भी बताये| विद्वानों द्वारा कहा गया है कि साधुओं की संगत अच्छा फल प्रदान करने वाली होती है एवं आपके साथ तो मैंने बहुत वर्ष व्यतीत किये है| अतः अब आप मुझ पर प्रसन्न हो जाए अन्यथा लोग कहेंगे कि एक पुण्य आत्मा के साथ रहकर भी मञ्जुघोषा को पिशाचिनी बनना पड़ा| इसके पश्चात ऋषि मेधावी ने पिशाचिनी बनी हुई मञ्जुघोषा से कहा कि तूने मेरा बहुत बुरा किया है फिर भी मैं तुझे इस श्राप से मुक्ति पाने का उपाय बताता हूँ| चैत्र माह में कृष्ण पक्ष की जो एकादशी है उसे पापमोचनी के नाम से जाना जाता है|

इस एकादशी का उपवास करने से तुझे इस पिशाचिनी के देह से मुक्ति मिल जाएगी| इतना कहकर ऋषि मेधावी ने मञ्जुघोषा को व्रत का सम्पूर्ण विधान समझा दिया| इसके पश्चात वह अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए अपने च्यवन ऋषि के पास चले गए|

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च्यवन ऋषि ने जब अपने पुत्र को देखा और कहा – हे पुत्र तुमने ऐसा क्या कर्म किया जिस कारण तुम्हारे सभी तप नष्ट हो गए है? जिससे तुम्हारा समस्त तप मलिन हो गया है? मेधावी ऋषि ने शर्म से अपना सिर झुकाकर कहा – पिताजी! मेने एक अप्सरा के साथ रमण करके बहुत बड़ा पाप किया है| इसी कारणवश मेरा समस्त तप तथा तेज नष्ट हो गया है| कृपा करके आप मुझे इस पाप से मुक्ति का उपाय बताइए| ऋषि ने कहा – हे पुत्र! तुम चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी का विधि पूर्वक उपवास करो| इससे तुम्हारे सभी पाप नष्ट हो जाएंगे|

अपने पिता की बात को सुनकर मेधावी ऋषि ने पापमोचनी एकादशी का श्रद्धापूर्वक उपवास किया| जिसके प्रभाव से ऋषि मेधावी सम्पूर्ण के पाप नष्ट हो गए| वही दूसरी ओर मञ्जुघोषा अप्सरा भी पापमोचनी एकादशी का उपवास करने से उसे पिशाचिनी के देह से भी मुक्ति मिल गई तथा पुनः अपना सुन्दर रूप धारण करके स्वर्गलोक चली गयी|

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

Q.पापमोचनी एकादशी कब आती है?

A.हिन्दू पंचांग के अनुसार चैत्र माह के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को पापमोचनी एकादशी के नाम से जाना जाता है|

Q.पापमोचनी एकादशी के दिन किस देवता की पूजा होती है?

A.समस्त एकादशी तिथि भगवान विष्णु को समर्पित की जाती है| इसी कारण पापमोचनी एकादशी के दिन भी भगवान विष्णु की पूजा की जाती है|

Q.पापमोचनी एकादशी व्रत करने से क्या लाभ होता है?

A.पापमोचनी एकादशी का उपवास करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है तथा समस्त पापों से मुक्ति मिलती है|

Q.च्यवन ऋषि कौन थे?

A.ऋषि च्यवन मुनि मेधावी के पिताजी थे|

Jaya Ekadashi Vrat Katha: जया एकादशी व्रत कथा

Jaya Ekadashi Vrat Katha: जया एकादशी का हिन्दू धर्म में बहुत महत्व माना जाता है| प्रत्येक वर्ष समस्त हिन्दू समुदाय के लोगों द्वारा जया एकादशी का व्रत किया जाता है| जया एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूर्ण विधिवत पूजा का विधान है| इस जया एकादशी तिथि के दिन व्रत करने तथा जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) को पढने या सुनने से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है|

जया एकादशी व्रत कथा

जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही महत्व बताया गया है| इस एकादशी के दिन व्रत रखने के साथ-साथ जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) का पाठ करना भी बहुत ही आवश्यक होता है| पद्म पुराण के अनुसार माना जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर को इस जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) की महिमा के बारे में बताया था| तो आइये जानते है क्या बताया गया है जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) में|

इसके अलावा यदि आप ऑनलाइन किसी भी पूजा जैसे सरस्वती पूजा (Saraswati Puja), गृह प्रवेश पूजा (Grha Pravesh Puja), तथा विवाह पूजा (Marriage Puja) के लिए आप हमारी वेबसाइट 99Pandit की सहायता से ऑनलाइन पंडित बहुत आसानी से बुक कर सकते है|यहाँ बुकिंग प्रक्रिया बहुत ही आसान है| बस आपको “Book a Pandit” विकल्प का चुनाव करना होगा और अपनी सामान्य जानकारी जैसे कि अपना नाम, मेल, पूजा स्थान, समय,और पूजा का चयन के माध्यम से आप अपना पंडित बुक कर सकेंगे|

जया एकादशी व्रत कथा का महत्व – Importance of Jaya Ekadashi Vrat Katha

युधिष्ठिर भगवान श्री कृष्ण से बोले कि – भगवन ! आपने मुझसे माघ महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी जिसे षटतालिका एकादशी के नाम से भी जाना जाता है, का बहुत ही अच्छे व सरल रूप वर्णन किया है| हे प्रभु आप स्वदेज, जरायुज चारों प्रकारों के जीवों को उत्पन्न, पालन तथा नाश करने वाले है| अब मैं आपसे विनती करता हूँ कि माघ शुक्ल एकादशी के बारे में मुझे कुछ जानकारी प्रदान करे| इस एकादशी का क्या नाम है? इसका विधान क्या है? इसका व्रत करने से किस प्रकार के फल की प्राप्ति होती है| सब विधिपूर्वक बतलाए|

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इस पर भगवान श्री कृष्ण कहते है कि – हे राजन ! माघ शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी तिथि को जया एकादशी के नाम से जाना जाता है| इस व्रत को करने से जातक ब्रह्म हत्यादि के पापों को से मुक्त हो जाता है तथा इसके प्रभाव से जीव भूत, पिशाच आदि योनियों से मुक्त हो जाता है| जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) को सुनने का ही बहुत बड़ा महत्व बताया गया है| जया एकादशी व्रत को विधिपूर्वक करना जातक के लिए बहुत लाभकारी होता है| जया एकादशी व्रत कथा (Jaya Ekadashi Vrat Katha) का वर्णन पद्म पुराण में दिया गया है|

जया एकादशी व्रत कथा – Jaya Ekadashi Vrat Katha

एक समय की बात है कि देवराज इंद्र देव स्वर्ग में राज करते थे तथा अन्य सभी देवतागण भी सुखपूर्वक स्वर्ग में निवास करते थे| इस समय इंद्र देव अपनी इच्छा के अनुसार नंदन वन में अप्सराओं के साथ विहार कर रहे थे तथा गान्धर्व गान कर रहे थे| उन गन्धर्वों में सबसे प्रसिद्ध पुष्पदंत तथा उनकी कन्या पुष्पवती और चित्रसेन तथा उसकी धर्मपत्नी मालिनी भी उपस्थित थे| साथ ही मालिनी का पुत्र पुष्पवान तथा उसका पुत्र माल्यवान भी उपस्थित थे|

पुष्पवती गन्धर्व कन्या माल्यवान को देखकर उसपर मोहित हो गई एवं माल्यवान पर काम-बाण का प्रयोग करने लगी| पुष्पवती ने अपने रूप, हावभाव से माल्यवान को अपने वश में कर लिया| वह पुष्पवती बहुत ही सुन्दर थी| इसके पश्चात वे इंद्र देव को प्रसन्न करने के लिए अपना गान शुरू करते है किन्तु एक-दुसरे से मोहित होने के कारण उनका ध्यान भटक गया| इनके इस प्रकार से भ्रमित होने से इंद्र देव को इनमे प्रेम के बारे में ज्ञात हो गया| उन्होंने इस गलती को अपनी बेज्ज़ती माना तथा उन दोनों को श्राप दे दिया कि वह स्त्री-पुरुष के रूप में मृत्यु लोक में जाकर पिशाच रूप धारण करके अपने कर्मों के फल को भोगे|

जया एकादशी व्रत कथा

इंद्र देव के इस भयानक श्राप के कारण के वे दोनों अत्यंत ही दुखी हुए| इसके पश्चात वह दोनों हिमालय पर्वत पर ही अपना जीवन व्यतीत करने लगे| उन्हें गंध,रस तथा स्पर्श के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं था| जिस वजह से उन्हें हिमालय पर्वत पर रहने में बहुत ही कठिनाई होती थी| कभी- कभी तो वह निंद्रा भी नहीं ले पाते थे| उस स्थान पर अत्यंत ही शीत था| जिस वजह से उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता था| शीत के कारण उनके दांत बजते थे| एक दिन पिशाच ने अपनी स्त्री से कहा कि हमने पीछे जन्म क्या बुरे कर्म किये है| जिस कारण से हमे इतना कष्ट सहना पड़ रहा है|

इस दुःख से तो नरक की पीड़ा सहना ही उत्तम है| इसलिए हमे अब किसी भी प्रकार का कोई पाप नहीं करना चाहिए| ऐसे ही विचार करते-करते वह अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे| कुछ समय के पश्चात माघ माह के शुक्ल पक्ष की जया एकादशी तिथि आ गई| इस दिन उन दोनों ने भोजन नहीं किया एवं पुरे दिन केवल अच्छे-अच्छे कार्य ही किये| इस दिन उन्होंने केवल फल-फूल खाकर ही अपना गुज़ारा किया| शाम के समय दोनों दुखी स्थिति में पीपल के वृक्ष के नीचे बैठ गए| उस दिन बहुत ही अधिक ठंड थी, जिस कारण से वह दोनों मृतक के समान ही एक-दुसरे से लिपटे रहे| उस रात्रि को भी उन्हें नींद नहीं आई|

जया एकादशी का व्रत करने के अगले ही उन दोनों को पिशाच योनि से छुटकारा मिल गया| इसके पश्चात वह दोनों अपनी पूर्ण वेशभूषा में स्वर्ग लोक की ओर प्रस्थान कर गए| मार्ग में देवतागणों ने उनका पुष्पवर्षा से स्वागत किया| स्वर्ग लोक में पधारते ही उन्होंने सर्वप्रथम देवराज इंद्र को प्रणाम किया| उन दोनों पुनः अपने रूप में देख कर इंद्र देव आश्चर्यचकित हो गए तथा उनसे पूछा कि हे माल्यवान आप दोनों पिशाच योनि से किस प्रकार मुक्त हुए| इसके बारे में हमे बतलाइये|

इस पर गान्धर्व माल्यवान बोले कि हे देवेन्द्र ! भगवान विष्णु तथा जया एकादशी व्रत के प्रभाव से ही हम पिशाच योनि से मुक्त हो पाए है| इसके पश्चात भगवान इंद्र ने उनसे कहा कि हे माल्यवान ! भगवान विष्णु की कृपा एवं एकादशी व्रत करने से ना केवल आपकी पिशाच योनि छूट गई बल्कि हम भी वन्दनीय हो गए है क्योंकि विष्णु और शिव के भक्त हमने भी पूजनीय है| आप लोग धन्य है| अब आप पुष्पवती के साथ जाकर विहार करो|